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Tuesday, February 25, 2020

निकिता मैम ने कहा-‘आप अपने लिए भी जीयें’ ... बस पड़ गया फर्क

इस बार वर्षों बाद वह घर आया है, अपने साथ खुद को भी लाया है।
अपने साथ खुद को लाने की एक शायर की यह बात है बहुत गंभीर। वाकई कई लोग आपाधापी में खुद को भूल चुके हैं। कोई बच्चों को समर्पित है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है। किसी को प्रतिष्ठा की चिंता है और कोई दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही इतना व्यस्त है कि उसे अपने बारे में ही कुछ पता नहीं। लेकिन कई बार कुछ मोड़ ऐसे आते हैं कि आपको लगता है-
जीवन पथ पर आएंगे कई मोड़, पल वही अपने जो आपको खुद से दे जोड़।
Nikita Mam
कुछ मंजर ऐसा ही हुआ कुछ दिन पहले। चलिए इसकी शुरुआत करते हैं-कोई लाग-लपेट नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं। आमना-सामना हुआ। हाल-चाल पूछा फिर अचानक सवाल, ‘आज बहुत कमजोर क्यों लग रहे हैं। तनाव ज्यादा लेने लगे हैं।’ निकिता मैम पहले मुझसे मुखातिब थीं, फिर मेरी पत्नी भावना की तरफ हंसते हुए मजाकिया अंदाज में पूछा, ‘आप ध्यान नहीं रख रहीं इनका।’ कुछ पल हंसी मजाक। फिर उन्होंने गंभीर होकर कहा, ‘देखिए आप अपना कर्म कर रहे हैं। बच्चों पर पूरा ध्यान दे रहे हैं फिर तनाव पालकर क्या होगा।’ अमूमन मैं खूब बोलने वाला हूं, लेकिन उस दिन ज्यादा नहीं बोला। यह बात है नवंबर या दिसंबर की। सही तारीख याद नहीं। ट्रिब्यून मॉडल स्कूल (Tribune Model School) में बेटे धवल की पीटीएम (PTM) थी। मेरी और पत्नी की हमेशा कोशिश होती है कि पीटीएम में हम दोनों जाएं। उस दिन भी यही हुआ। हम दोनों पीटीएम से लौट रहे थे। सीढ़ियों के पास निकिता मैम मिल गयीं। उन्होंने यह भी कहा कि आपसे फिर विस्तार से बात करेंगे। विस्तार से बात करने की बात पर भावना कई दिनों तक इसलिए तनाव में रहीं कि कहीं धवल कोई शैतानी तो नहीं कर रहा। धवल अकसर दोस्तों की ऐसी बातें भी बताता कि मन सन्न रह जाता। इतनी छोटी उम्र में भी बच्चे ऐसी बातें। मैंने भावना को समझाया कि तुम भले ही परेशान हो, मैं तो रिलेक्स हूं। अगली बार मैडम से मिलेंगे तो सकारात्मक बातें होंगी।
भावना की चिंता भी वाजिब थी। इस पर एक कवि की चंद पंक्तियां याद आती हैं-
बारिश तो आती है पर क्या, सावन में सावन दिखता है। बच्चे तो दिखते हैं काफ़ी, कितनों में बचपन दिखता है।
बिल्डिंग में कमरे ही कमरे, गायब घर-आंगन दिखता है। अपनापन तो नहीं, पर इन दिनों परायापन खूब दिखता है।
खैर...मुझे याद है करीब चार साल पहले निकिता मैम मेरे बेटे धवल को पढ़ाती थीं। उसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। बेटा उन्हें बहुत मिस करने लगा। वक्त गुजरता गया, एक दिन पता चला कि निकिता मैम ने फिर ज्वाइन कर लिया है, इस बार स्पेशल एजुकेटर के तौर पर। उन्होंने इसके लिए बाकायदा कोर्स किया है। उनके आने के बाद एक बार सभी पैरेंट्स को एक साथ बिठाकर कुछ टिप्स दिये गये। खासतौर पर उन्हें जिनके बच्चे बोर्ड परीक्षा देने वाले थे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक उस दौरान 10वीं की तैयारी कर रहा था। पढ़ने में ठीक ही था। थोड़ी सी किशोरावस्था वाली चीजें उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो रही थीं। थैंक्स ट्रिब्यून
स्कूल का, स्कूल की प्रिंसिपल का, क्लासटीचर बिनेश सर का, निकिता मैम का और अब स्कूल छोड़ चुकीं अवलीन कौर मैमम का। आगे बढ़ने से पहले किसी शायर की दो लाइनें पेश करना चाहता हूं-
अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को, मैंने औरों से सुना है कि परेशान हूं मैं
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया, ख़ुश हूं कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया।
बहरहाल, वापस आते हैं निकिता मैम पर। एक दिन स्पेशल पैरेंट्स क्लास हुई। उसमें निकिता मैम ने जोर-जोर से ए फॉर एप्पल और वन टू थ्री सबसे बोलने को कहा। कुछ लोग ऐसा करने में संकोच भी कर रहे थे। लेकिन देखते ही देखते सबको मजा आने लगा। थोड़ी देर बाद निकिता मैम ने कहा, कैसा लगा, सब हंसने लगे और बोले-मजा आ गया। निकिता मैम ने कहा जब छोटी-छोटी बातों से आनंदित हुआ जा सकता है तो आप बच्चों के साथ कभी-कभी बच्चा क्यों नहीं बन जाते। सचमुच बात बहुत अच्छी और बहुत छोटी सी लगी। मैंने अब तक पैरेंटिंग पर 200 के करीब आर्टिकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साइट्स पर लिखे होंगे, लेकिन बात जब अपने पर आती है तो उसी तरह हो जाता है कि जैसे डाॅक्टर खुद का इलाज नहीं कर पाता। ऐसे ही अनेक मौकों पर निकिता मैम से बातें होने लगीं। स्कूल से मेरा नाता एक अभिभावक के अलावा भी है। कई बार बच्चों को मोटिवेशनल लेक्चर दिया है। कहानी लिखने के टिप्स दिए हैं। चुपचाप अभिभावक की भूमिका में जाता हूं, कभी रिपोर्टर के तौर पर और कभी स्कूल की मीटिंग में। हर बार कुछ सीखने को मिलता है।
बत फिर वहीं से,  
जब निकिता मैम ने कहा कि आप अपने लिए भी जीना सीखें। चिंता न करें, कर्त्तव्य करें। मैंने मन ही मन ठान लिया कि अगली बार मैडम से मिलूंगा तो शायद शिकायत का मौका नहीं दूंगा। इस बार भी अभी 15 फरवरी को फिर पीटीएम में गया। इस बार निकिता मैम से स्पेशल मिलने जाने का मन बनाया, लेकिन इसी बीच कुछ टीचर्स के साथ लंबी बातचीत होने से समय ज्यादा निकल गया। भावना बोलीं, चलो निकिता मैम से मिलकर आते हैं। जब तक वहां पहुंचे मैडम का कमरा बाहर से बंद था। हम लोग लौटने लगे तो मैडम फिर सीढ़ियों के पास मिल गयीं। कुछ पैरेंट्स से बात करते हुए। हमने इंतजार किया फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैंने ही पूछा मैडम आज तो मैं ठीक लग रहा हूं ना। वो थोड़ा आगे बढ़ीं प्रिंसिपल मैम के कमरे के बाहर हेल्पडेस्क के टेबल को छुआ और कहा टचवुड। फिर हम लोग पास ही रखे सोफे पर बैठ गए। उन्होंने कुछ बातें तो बेटे धवल को समझाईं। फिर हमसे भी बातें होने लगीं। हम लोगों ने तय किया कि बच्चों और पैरेंट्स को लेकर हम लोग अक्सर मिलेंगे और बात करेंगे। शायद इनसे कुछ ऐसी बातें निकलें कि जो औरों के लिए भी आगे चलकर फायदेमंद हो सके;
हर तमन्ना जब दिल से रुखसत हो गई, यकीन मानिए फुर्सत ही फुर्सत हो गई।
नादान हैं जो बाजार में वक्त खरीदने चले हैं, वक्त उसी का है जो वक्त के साथ चले हैं।

कुछ टीचर्स का चले जाना, हर एक से कुछ सीखना

मुझे सात साल हो गये हैं चंडीगढ़ आए और बच्चों को छह साल। यानी ट्रिब्यून माॅडल स्कूल से नाता जुड़े भी छह साल ही हो गये हैं। मैं बड़े बेटे को लेकर कई टीचर्स से सवाल पूछता तो हर कोई कहते बहुत अच्छा बच्चा है। यकीनन मुझे अच्छा तब लगा जब एक बार एक मैडम ने कहा कि आपने उस पर उम्मीदों का पहाड़ लादा है। वह हंसता नहीं। इतना गंभीर क्यों। मैंने इस पर होमवर्क किया, लेकिन बड़ा बेटा कार्तिक आदतन ऐसा है। वैसे टीचर्स के सुझाव के बाद उसे बदलने की कोशिश की। आज वह ट्रिब्यून स्कूल से निकल चुका है, लेकिन यहां से बहुत कुछ सीखकर निकला। हिंदी की आशा भारद्वाज मैडम हों या रजनी मैडम, इन लोगों से अकसर बातें होती हैं। म्यूजिक के अतुल सर से लेकर वीआरएस ले चुकी अनुपमा मैम, सबसे बातचीत का सिलसिला जारी है। विनिमा मैम, नम्रता मैम, निधि मैम, स्वाति मैम और कुछ नये आए टीचर्स। मेरी कोशिश होती है कि मैं सबसे मिलकर बच्चे की पढ़ाई के अलावा उसकी हरकतों के बारे में भी बात करूं। इन सबके बीच प्रिंसिपल वंदना सक्सेना मैम का बेहतरीन सहयोग। एक बार प्रिंसिपल मैम को मैंने अपनी एक कहानी का लिंक भेजा, उन्होंने प्रतिक्रिया स्वरूप पूछा, इज इट धवल। वंदना मैम के साथ तो इतने अनुभव हैं कि उन पर एक लंबी कहानी लिखने का इरादा है।
केवल तिवारी

Sunday, February 23, 2020

नितिन की शादी और एक परिवार-नेक परिवार

केवल तिवारी

कुछ पल बचा लो अपनों के लिए, जो देखोगे पलट के, ये मिलेंगे कहां
वक़्त का तक़ाज़ा कहता है यही, जो बीत गये पल, फिर आएंगे कहां
आओ इस पल को यादगार बना लें, जो बातें होंगी अभी, फिर करेंगे कहां।
भाभी-भैया संग मिनी, दीपा
जी हां! एक कवि की उक्त पंक्तियां मानो उसी दौर के लिए लिखी थीं जो कुछ दिन पहले हमने सपरिवार महसूस कीं। मौका था नितिन की शादी का। एक-एक लम्हा (कई दिनों के कार्यक्रमों में तीन दिन मैं भी मौजूद रहा) यादगार रहा। यहां अपनापन था। सम्मान था। जान-पहचान वालों से मेल-मुलाकात का एक दुर्लभ अवसर था। बातों का संगम था, अपनों का समागम था। नितिन के मम्मी-पापा को साधुवाद कि उन्होंने बेहतरीन मौसम और बेहतरीन टाइमिंग पर सभी समारोहों को रखा। मैं विपिन से कई बार पूछता, ‘तन-मन से सहयोग को तैयार हूं, मेरे लायक सेवा बताना।’ विपिन का आग्रह होता, ‘चाचा जी आप समय पर पहुंच जाना। इतना ही बहुत है।’ रिश्ता हमारा बेशक चाचा-भतीजा वाला है, लेकिन संबंध दोस्ताना हैं। आइये चलते हैं उस यादगार लम्हों को फिर से समेटेते हुए।
स्थान : वसुंधरा (Vasundhara Ghaziabad Uttar Pradesh)में वोल्वो बस के अंदर, समय : सुबह के लगभग 8:30 बजे। दिनांक : 9 फरवरी। मौका : नितिन की बारात में जाने का। मुझे एक दिन पहले हुए कार्यक्रम की कुछ फोटो-वीडियो दिखाई गईं। तभी आवाज आई, ‘चाचाजी को उस प्रोग्राम की वीडियो और फोटो दिखाओ ताकि इन्हें पता चले कि इन्होंने क्या मिस किया है।’ आवाज दर्शन पांडे जी की थी। दर्शन जी मेरी भतीजी नीरा के पति। भतीजे हरीश, दीप और प्रकाश ने भी उनके साथ सहमति जताई। इसके बाद एक जोरदार ठहाका। मैंने माना, ‘हां मैंने इसे मिस किया।’ यह तो अभी अपने लोगों के बीच बातचीत और हंसी-मजाक की शुरुआत थी। विपिन से भतीजे का रिश्ता है तो जाहिर है नितिन पोता लगा। वह मुझे कहता भी बड़बाज्यू है। एक बार उसकी अम्मा यानी मेरी भाभी यानी विपिन की मांताजी ने नितिन को यह रिश्ता समझाया था उसने तब से इसे गांठ बांध ली। कभी पारिवारिक समारोहों में मिलते भी तो नितिन कहता, ‘आओ बड़बाज्यू डांस करते हैं।’ पूरी बात से पहले उस विवाह समारोह की जो खूबसूरत चीज थी उसे बयां करना चाहूंगा। इस कार्यक्रम में पूरा परिवार एक जगह था। विस्तृत परिवार। बारात जाने के दौरान महिला मंडली जिसमें मेरी भतीजियां, मेरी बहुएं, मेरी दीदी और नाती-नातिन, पोते-पोतियां भी शामिल थे, भी बस में बैठना चाहती थी। उन्होंने कहा बुजुर्ग इनोवा में चले जाएं हम यहां हुड़दंग करेंगे। कितना सुंदर था वह ‘हुड़दंग’ कहना। मैं, लखनऊ से आए दाज्यू भुवन चंद्र तिवारी, जीजा जी, एक मित्र उमेश पंत आगे की सीटों पर बैठे थे। मैंने कहा, ‘बुजुर्ग आगे बैठे हैं, उनके पीठ पीछे कुछ भी करो।’ जहां तक मेरा संबंध है, वह थोड़ा अजीब है। एक तो अपने घर यानी अपने माता-पिता की सबसे छोटी संतान हूं, लेकिन पूरे परिवार में रिश्ते में ‘सीनियर’ लोगों का भी चाचा लगता हूं। यानी छोटा सा बुजुर्ग हूं। इसीलिए परिवार में जिनसे अनौपचारिक बातें नहीं हुईं हैं, वे अभी तक ‘झिझकती हैं।’ बुजुर्ग मानें तो कैसे, ‘जमीन से जुड़ा व्यक्त लगता है, जमीन से ही जुड़ा रह गया।’ बराबर के हैं नहीं, छोटा मान नहीं सकते। वैसे बीना यानी नितिन की मम्मी से काफी बातें शेयर होती हैं, जहां मैं असहज होता हूं, वहां मेरी पत्नी भावना चीजों को संभाल लेती है, लेकिन यहां कुछ कारणों से वह समारोह में नहीं आ सकी। खैर... ये तो हुई हा हा हा वाली बात। आइये समेटते चलें उन यादगार लम्हों को।
 बस का वह खूबसूरत सफर (Travelling by Bus)
बस में सबसे पहले नितिन की बहन यानी बिपिन-बीना की बिटिया एक माइक लेकर मेरे पास आईं और बोलीं, ‘बड़बाज्यू कुछ अनाउंस कर दो।’ मैंने थोड़े जयकारे लगाये फिर काम सौंप दिया प्रकाश को। प्रकाश जो हर काम को निभाने में अग्रणी भूमिका निभाता है। हमारे परिवार में समारोहों का तारणहार। उसके बाद बस में शुरू हो गया अंताक्षरी का कार्यक्रम। विपिन भी हम लोगों के साथ ही चल दिया। वहां नितिन के दोनों मामाओं से मुलाकात हुई। ये लोग बहुत पुराने परिचित हैं और एक व्हाट्सएप ग्रूप के साथी। आगे की दो-चार सीटों पर हम लोग बातें करते रहे और पीछे चलते रहे गीत। बीच-बीच में हम लोग भी इसका आनंद ले रहे थे। एक जगह टोल नाके पर लंबा जाम मिला। विपिन और प्रकाश ने नीचे उतरकर किसी तरह हमारी बस को आगे करवाया। गजरौला से पहले एक बेहतरीन रेस्तरां में हम लोगों न नाश्ता किया। होते-करते करीब 3 बजे हम लोग हल्द्वानी स्थित देवाशीष होटल पहुंचे। वहां गांव से आए उमेशदा, दीप दा और जो लोग बस के बजाय इनोवा में आये थे जैसे नोएडा कैलाश चंद्र पांडेजी (उम्र 65 साल रिश्ते में मेरे भांजे), प्रयागदा (उम्र 72 साल रिश्ते में मेरे भतीजे), रानीखेत से आए सुनीलदा, कैलाश दा (विपिन के ममेरे भाई) मिले। सुनीलदा और उनकी पत्नी प्रणाम कहने लगे तो मैंने टोका, लेकिन वह बोल पड़े, ‘चाचाजी रिश्त ठुल हुनी हय’ यानी चाचाजी रिश्ता बड़ा होता है। इन लोगों के साथ बातचीत के बाद हम लोगों ने थोड़ा आराम किया। कुछ फोटो वगैरह खींचे और बारात के लिए तैयार होने लगे। बारात रामपुर रोड से शुरू हुई। वहां डांस करना, पार्टी में शामिल होना, हंसी मजाक करना, विपिन का खुद ही एक जगह बेहतरीन मंत्रोच्चारण करना सबकुछ याद आता है।
बड़बाज्यू चलो डांस करने (grandpa dance)
सोमवार दोपहर बाद बारात वसुंधरा पहुंच गयी। वापसी में लोगों की थकान साफ दिख रही थी। इस दौरान हरीश ने यूट्यूब पर बेहतरीन गाने लगा दिए। कभी गुलजार के तो कभी जावेद अख्तर के। बीच-बीच में बातें भी होती रहीं। दर्शनजी ने कई पुरानी बातें कीं। अगले दिन शाम को भव्य पार्टी थी। मिराया बैंकट में वसुंधरा के कई जानकार, गुलाबी बाग (Gulabi Bagh) से आए कुछ लोग मिले। जश्न मना और बातें हुईं। इसी दौरान बिटिया दीपू आई बोली, ‘बड़बाज्यू चलो डांस करने।’ मैं चला गया। वहां से भतीजी कनु साथ आई और कई लोगों से मेल मिलाप का दौर चला।
वे रिश्ते की दुश्वारियां और हंसी-मजाक के लम्हे
स्वागत में तैयार बिपिन और बीना।
रिश्तों की दुश्वारियों के बीच हंसी-मजाक भी तो जरूरी था। शुरुआत हुई बिना मजाक के मजाक की। हल्द्वानी में शादी कार्यक्रम (पूजा-पाठ) संपन्न होने के बाद विपिन ने अपनी समधन और अन्य लोगों से मुलाकात कराई। मैंने कहा, ‘थोड़ी देर पहले आपने हमसे कहा था कि सामान मैं अंदर कमरे में अभी रखवाती हूं, मुझे लगा आप दुल्हन की दीदी हैं।’ वह हंसी और बोलीं, ‘कंप्लीमेंट के लिए थैंक्स।’ फिर मैंने कहा आप यूं ही युवा बने रहें। उसके बाद गाजियाबाद में रिसेप्शन पार्टी में मैंने विपिन से धीरे से कहा, ‘बर ब्योली जस तुम लोग लागण छा।’ विपिन ने हंसते हुए कहा, ‘मुझसे ही कहोगे या अपनी बहू से भी।’ मैंने कहा, ‘रिश्तों की दुश्वारियां हैं।’ विपिन ने कहा, ‘कह डालो।’ फिर मैं बीना के पास गया और बोला, ‘नजर न लगे तुम दोनों को, बहुत जच रहे हो।’ बीना हंसते हुए बोली, ‘थैंक्यू चाचाजी।’ उसके बाद खाते-पीते, भैया-भाभी, दीदी-जीजाजी, भतीजे-भतीजी आदि से बात होती रही।
ऐसे मौकों के लिए एक शेर याद आ रहा है-
दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं, साया-ए-दर भी नज़र आए तो घर लगता है।
 पार्टी के इस मौके पर पता ही नहीं चला कि कब रात के 11 बज गये और याद आया कि अब कश्मीरी गेट (Kashmiri gate) बस अड्डे पहुंचकर चंडीगढ़ के लिए बस भी पकड़नी है। मन में उस समय एक फिल्मी गीत बार-बार याद आ रहा था और उसे गुनगुनाने का भी मन हो रहा था...

ऐ वक़्त रुक जा, थम जा, ठहर जा... वापस ज़रा दौड़ पीछे...

Sunday, February 2, 2020

कुफरी काॅल्स.... और चल पड़ी मित्रों की टोली (Kufri, the ideal vacation spot)

(Kufri Himachal Pradesh) यू ट्यूब पर दो भजन सुनने के बाद एक मित्र गुनगुनाने लगा, ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साये।’ तभी दूसरा बोला, इस वक्त तो यही गाना बजना चाहिए, सफर भी तो अब पहाड़ का शुरू होने वाला है। तुरंत यूट्यूब पर सर्च कर गाना लगा दिया गया। पिंजौर आ चुका था और वाकई पहाड़ों का सफर शुरू हो चुका था। सफर था शिमला से थोड़ा आगे ढली का। यह विवरण है गत 26 जनवरी को चार मित्रों के एक छोटे से सफर का। सफर बर्फीली वादियों का। सफर शिमला का। सफर जाखू टैंपल का। नरेंद्र ने 10 जनवरी के आसपास प्रस्ताव रखा 27 को सोमवार है, अगर छुट्टी मिल जाती है तो चलते हैं शिमला। मैंने तुरंत हामी भर दी। दो दिन बाद मीनाक्षी मैडम से छुट्टी के बावत पूछा तो उसके लिए भी हां हो गयी। शुरुआत अच्छी थी तो चलने की तैयारी करनी थी। दो दिन बाद ही नरेंद्र का मैसेज आया कि टॉय ट्रेन में रिजर्वेशन करा लिया है, लेकिन वेटिंग है। मैंने कहा, वेटिंग लेने की जरूरत नहीं थी। खैर...एक-दो दिन यूं ही निकल गये। मैंने कहा टॉय ट्रेन से जाने का मतलब ज्यादा घूम नहीं पाएंगे। फिर ध्यान आया हमारे पेज डिजाइनर रवि भारद्वाज कई बार शिमला चलने की बात करते हैं। मैं उनसे पूछने गया तो उन्होंने हामी भर दी। अब हो गये तीन। तय हुआ कि कार से चलना है। एक साथी और चाहिए था। अच्छा लगता। हालांकि हम तैयारी कर चुके थे कि चार नहीं भी हुए तो तीन ही चलेंगे। खैर अचानक सलिल मौर्य ने हामी भरी तो बात बन गयी। एक व्यक्ति हमें ‘सलिल जी जैसा’ भी चाहिए था। 26 जनवरी को सुबह 8 बजे चलने का फैसला किया गया। कहां जाना है, कहां ठहरना है, कुछ नहीं मालूम। रवि साथ हैं तो फिर अंधेरा कहां रहना। पिंजौर पार करने के बाद पता चला कि हम लोग पहले ढली जाएंगे। ढली में रवि के जीजाजी योगराज शर्मा जी का घर है, रेस्तरां है। मैं थोड़ा सकुचाया कि घर में जाना ठीक रहेगा क्या। बेवजह दीदी-जीजा और बच्चों को डिस्टर्ब करेंगे। सभी बोले, चलते हैं, कुछ अटपटा लगेगा तो देख लेंगे। इस दौरान अलग-अलग पसंद के गीत चलते रहे। बीच में एक जगह किन्नू खरीदे। हम लोग करीब 12 बजे ढली पहुंच गये। वहां शर्मा जी पहले से इंतजार कर रहे थे। उन्होंने पहले रेस्तरां में ही चाय पिलाई फिर घर ले गये। उनके बच्चे इन दिनों कहीं गये थे। सिर्फ दीदी थीं और वे खुद। बेहद आलीशन घर। हम लोग कुछ मिनट वहां रुके फिर चल दिए कुफ्री को। ढली से निकलते ही चारों ओर बर्फीले नजारे ने मन मोह लिया। इस बीच नरेंद्र वीडियो बनाते रहे।
वो अंकल, वो सवाल-जवाब और सेब (Apple)
बर्फीले वादियों में हम लोग जगह-जगह रुके। एक जगह वीडियो बनाते-बनाते नरेंद्र एक सज्जन के घर चले गये। वह अपनी छत पर करीब 3 फुट जमी बर्फ को एक फावड़े से काट-काटकर निकाल रहे थे। नरेंद्र ने उनसे कुछ सवाल पूछे और वो सज्जन इन्हें अपने घर के अंदर ले गये। वहां उन्होंने इनको एक बड़ा से सेब दिया। नरेंद्र ने कहा, अंकल दो सेब दो क्योंकि हम चार लोग हैं और आधा-आधा खाएंगे। ‘धड़कते हैं दिल कितनी आजादियों से’ गीत की मानिंद उन्होंने तुरंत दो सेब दे दिए। शाम को ढली लौटे। दीदी ने लाजवाब व्यंजन बनाए थे। चार तरह की सब्जी (उनमें से एक हिमाचल स्पेशल), राजमा, चटनी, चावल और चपाती। खाना खाकर हम लोग उनके ऊपरी फ्लोर में आ गये। वहां बड़ा सा हीटर लगाकर कुछ हंसी मजाक चली। बात करते-करते सभी सो गये।
जाखू दर्शन, पूजा अर्चना और थोड़ी बेचैनी

अगले दिन सुबह करीब 8 बजे तक हम लोग स्नान ध्यान कर तैयार हो गये। दीदी ने आलू के पराठे बनाये। भरपेट पराठे खाकर पहले हम लोग जाखू मंदिर गये। वहां बंदरों की शरारतों और उनके मान जाने के नजारे देखे। भगवान हनुमान जी की गगनचुंबी प्रतिमा देखी। बाबा बालकनाथ के मंदिर गये। फिर पैदल ही रिज की तरफ लौट आये। इस रास्ते में जगह-जगह बोतलों, पन्नियों को देखकर
मन खट्टा हुआ। कई लोग अब भी ऐसे हैं जो पर्यावरण की चिंता नहीं कर रहे। रिज पर पहुंचे तो वहां रवि की बुआ के बेटे मिले। वह जिम ट्रेनर हैं। सरकारी जिम देखा। फिर शिमला प्रेस क्लब गये। वहां एक-एक चाय पी। और दोपहर होते-होते हमारा चंडीगढ़ का सफर शुरू हो गया। बेहद यादगार रहा वह ट्रिप और हमने नाम दिया ‘kufri calls’