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Friday, April 24, 2020

विश्वास जगाना होगा बड़ी चुनौती

कोरोना का खौफनाक संक्रमण काल चल रहा है। जो जहां है, वहीं रह गया है। ऐसे में लॉकडाउन खुलने का सभी को इंतजार है। इस इंतजार में ही छिपा है एक प्रश्न? प्रश्न है विश्वास का। आपसी प्रेम का। अभी कई लोग एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं। कोई मित्र या रिश्तेदार के यहां रुकता है तो कोई कहीं और। कोरोना काल से पहले लोग भी स्वागत को तैयार रहते थे, अब वैसी ही स्थिति आने में न जाने कितना वक्त लगेगा। कई लोगों को चिंता यही है कि अभी तक आ रहा हूं... जैसे सवाल के जवाब में कहा जाता था, 'स्वागत है।' खाना, सोना बिल्कुल अपने घर जैसा ही। अब संकोच भले ही बना रहे, लेकिन स्वागत की वह गर्माहट फिलहाल तो नहीं दिखेगी। ऐसा ही एक और सवाल है मुलाकात के दौरान हाथ मिलाने का। फिलहाल लोग मिल भी रहे हैं तो नमस्ते, सतश्री अकाल या सलाम करते हैं। तो क्या आने वाले समय में मुलाकात के दौरान यही सब चलता रहेगा या हाथ मिलाने की परंपरा फिर कायम होगी। फिलहाल तो दुनिया के तमाम देशों के बड़े-बड़े नेताओं ने भी हाथ मिलाना छोड़ दिया है। कोरोना के बाद के दौर के लिए कई चुनौतियां हैं, देखना होगा कि उन पर कैसे पार पाया जाये। फिलहाल तो बड़ी चुनौती कोरोना से पार पाने की है। 

Friday, April 17, 2020

एक सवाल और जवाब में समाधान ... जब जिक्र हुआ अवलीन मैडम का

पड़ावों की भव्यता पर मत रख नजर, बस तू चलता रह अपने सफर पर
एक कविता की यह पंक्ति कई मायने छिपाए हुए है। उसी तरह जैसे एक पुराना फिल्मी गीत है, ‘छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ीं, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी...।’ वाकई कई वाकये ऐसे होते हैं जो हमारे मन मस्तिष्क पर छाये रहते हैं। जरूरी नहीं सबके साथ ऐसा होता हो, लेकिन मेरे मामले में तो ऐसा है। कभी किसी सुगंध के कारण हमें पुरानी बात याद आती है, कई बार तो किसी शब्द को बोलते वक्त भी किसी की याद आ जाती है। मसलन, जब भी में आम या नींबू का ‘होम मेड’ अचार खाता हूं तो मुझे मेरी सबसे बड़ी दीदी याद आती हैं। पूजा-पाठ करते वक्त मां की याद आती है। कुछ शब्दों को लिखता हूं या बोलता हूं तो कई मित्रों की याद आती है। शायद ऐसा ही होता होगा। या नहीं भी। खैर...। अभी इसके लिखने का मौजूं था। असल में बच्चों का स्कूल बंद है। online क्लास चल रही हैं। इसी दौरान कई टीचर्स से संपर्क बना रहता है। कभी व्हाट्सएप (whatsapp) के जरिये तो कभी सीधे फोन कर। जब बच्चे घर पर ही हों तो जाहिर है गुस्सा, प्यार-दुलार और पढ़ाई के संबंध में चर्चा भी उन्हीं की होगी। इसी चर्चा के
श्रीमती अवलीन कौर 
दौरान ट्रिब्यून मॉडल स्कूल में काउंसलर रहीं अवलीन कौर मैडम का जिक्र हुआ।
इन दिनों ऑफिस से पहले के मुकाबले जल्दी पहुंच जाता हूं। सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान घर पर भी रखना पड़ता है। संवाद होता है, पूरी दूरी के साथ। कई बार बहसें भी होती हैं। कभी किसी मुद्दे पर और कभी बिना मुद्दे के। बातोंबातों में एक दिन में थोड़ा झल्लाया फिर पत्नी ने याद दिलायी अवलीन मैडम की। बोलीं-पता है एक बार हम बच्चे के बारे में कुछ पूछने गये थे तो उन्होंने क्या कहा था। फिर याद दिलाया गया कि उन्होंने कहा था, ‘पहले आप दोनों अपने लिए क्लैप करो।’ असल में बड़ा बेटा 10वीं पास कर स्कूल से निकला तो हम लोग छोटे बेटे के लिए पीटीएम PTM में जाते थे। एक छोटी सी समस्या छोटे को लेकर ही थी, हम उसी का जिक्र कर रहे थे। अवलीन मैडम ने पहले ताली बजवाई तो मैंने कारण पूछा। उन्होंने कहा, ‘आपके बेटे कार्तिक ने आपकी बड़ी तारीफ की।’ असल में स्कूल में कुछ टॉपर्स को बुलाया गया और 10वीं के नये बच्चों को टिप्स देने को कहा गया। इसी क्रम में मेरे बेटे ने मेरी तारीफ कर दी। उससे पहले भी अवलीन मैडम से बात होती थी तो वह कहती थीं कि आप दोनों पति-पत्नी हमेशा पीटीएम में आते हैं, यह अच्छा लगता है और बोलते भी संयमित होकर। एक के बाद एक हैं। मुझे याद आया अपने जीवन का वह दौर जब मैं लखनऊ में ट्यूशन पढ़ाया करता था। बच्चों के माता-पिता पढ़ाई से ज्यादा जिक्र उसकी आदतों को लेकर करते थे। कोई कहता, ‘यह सब्जी नहीं खाता।’ किसी की समस्या होती, ‘दूध पीने में आनाकानी करता है।’ कई बार तो बच्चों के माता-पिता मुझसे बात करते-करते लड़ने भी लगते। उन दिनों में भी तो ‘बच्चा’ ही था। लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज में बीए का छात्र। खैर उसके बाद धीरे-धीरे कई दौर आये। अब कहीं भी जाते हैं या घर पर भी अगर बहस होती है तो कम से कम मैं और मेरी पत्नी एक-दूसरे की बात काटते हुए नहीं लड़ते। बहुत आदर्श नहीं हैं हम लोग। लड़ते हैं। बोलचाल भी बंद होती है, लेकिन बच्चों पर इसका असर कम से कम पड़े, इसका खयाल रहता है। ऐसे ही स्कूल में जाते हैं तो कोशिश होती है कि दोनों साथ नहीं बोलें। खैर यह जीवन का सफर है। अवलीन मैडम की एक और बात याद आयी। जब समस्या उनको बतायी गयी तो उन्होंने तीन वाक्यों में हल निकाल दिया। उन्होंने हमारे सवाल पर एक सवाल पूछा और फिर कहा, ‘आपके जवाब में ही समस्या का समाधान है।’ जीवन की इन छोटी-छोटी बातों को याद करने से ही जीवन बढ़ता है। एक शायर ने कहा है-
 आए ठहरे और रवाना हो गए, ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है।
एक और शेर पेश करता हूं, मेरा नहीं है-
बस यही दो मसले जिंदगी भर ना हल हुए, ना नींद पूरी हुई ना ख्वाब मुकम्मल हुए...।

संभवत: ऐसा ही होता है। सबकुछ पूरा नहीं होता। अवलीन कौर मैडम का धन्यवाद। बेशक वह अभी ट्रिब्यून स्कूल में नहीं हैं, लेकिन उनसे संवाद बना रहेगा, ऐसी कामना है। उन्होंने भी एक छोटे से वाक्य के लिए मुझे शुक्रिया कहा।

Friday, April 10, 2020

कोरोना संकट, रुटीन लाइफ, रामायण और इफेक्ट-विफेक्ट

केवल तिवारी
कोरोना वायरस के खौफ के बीच देश में चल रहे लॉकडाउन से चारों ओर सन्नाटा पसरा है। सन्नाटा पसरने से पहले ही हमारे समाज के ‘सयाने’ लोगों ने अफरातफरी सी मचा दी थी। जरूरत से पांच गुना सामान खरीद लिया। ऐसा कहा गया कि अब सब खत्म, अपन ध्यान रखो बस... बाकी कुछ नहीं। इसी माहौल में अनेक लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मदद के लिए हाथ बढ़ाये। मेरी रुटीन लाइफ में बेशक ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन अपने मोहल्ले में और आसपास का वातावरण देखकर लगता है वाकई कुछ लोगों को बहुत फर्क पड़ा है। कुछ लोग एक-दो दिन बाद ही हायतौबा करने लगे, लेकिन इसी दौरान देखा कि खाने-पीने के मामले में जैसी बातें फैलाई जा रही थीं, वैसा कुछ नहीं। मसलन, एक दिन बाद ही दुकानें खुल गयीं। दूध वाला कॉलोनी में ही आने लगा। सब्जी वाले भी आने लगे। इससे पहले भी अनेक मौके ऐसे आये जब यह अहसास हुआ कि कुछ अफवाह तंत्र और कुछ जमाखोरी का एक कीड़ा हमारी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करता रहा है। 
फोटो : साभार इंटरनेट
खैर... इन्हीं दिनों नवरात्र भी चल रही थीं। सुबह ठीकठाक वक्त पूजा-पाठ में लगता है। इसके साथ रामानंद सागर द्वारा निर्मित टीवी धारावाहिक रामायण भी फिर से प्रसारित हो गया है। सुबह एक घंटा कब निकल गया पता ही नहीं चलता। मैंने शुरुआत में कोशिश की कि बच्चों को अपने साथ बिठाकर दिखाऊं। बच्चों ने हल्की रुचि दिखाई। एक बेटे की तो ऑन लाइन पढ़ाई तेजी से चालू है, इसलिए वह इसे नहीं ही देखता है, लेकिन छोटा वाला देखता है। देखते वक्त उसके तमाम बालसुलभ सवालों की बौछार भी होती है। सवालों के दौरान ही वह अचानक कह उठता है पापा इतने अजीब से इफेक्ट। मैं उसे समझाने की कोशिश करता कि भाव समझो। लेकिन कार्टून फिल्म, टीवी रियलिटी शो देखने वाले बच्चे के समझ में भाव ज्यादा नहीं समझ आये। उसने कुछ तकनीकी कमियां निकाल ही दीं। कुछ दिन बाद मैंने देखा कि वाकई उसे रामायण में दिलचस्पी आने लगी है। कई बार तो उसे आगे की कहानी जानने की लालसा रहती। रामायण की संक्षिप्त कहानी को तो सब जानते हैं, लेकिन धारावाहिक में विस्तार से दिखाया गया है। इसी दौरान राम के वनवास और निषाद राज द्वारा उन्हें छोड़ने का प्रसंग आया। इसी प्रसंग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में निषाद राज नीचे बैठ जाते हैं। मुनि भारद्वाज समझाते हैं कि कोई ऊंची-नीच नहीं होता। राम के मित्र होने के नाते तो आप उनके बराबरी में बैठने के हकदार हो। इसी दौरान बड़ा बेटा बोल बैठा, ‘पापा ये होती है अच्छी बात। एक सीरियल आजकल जो आ रहा है भीमराव। उसमें भीमराव और उनके परिवार के साथ ऊंची जाति के लोग कितना अत्याचार करते हैं।’ फिर पत्नी ने समझाया पहले ऐसा कोई भेदभाव नहीं था, बाद में जब धर्म के ठेकेदार बनने लगे तो ऐसा होने लगा। खैर अब लगातार रामायण देखी जा रही है। घरवाले दोनों समय देखते हैं। चूंकि शाम के वक्त मैं ऑफिस में होता हूं, इसलिए शाम के समय देख नहीं पाता। इस दौरान मुझे वे दिन भी याद आए जब लखनऊ में रामलीला में राम की भूमिका निभाता था। बीच-बीच में चौपाई आदि गाने लगता हूं तो बच्चे नाराज होते हैं। कहते हैं सीरियल खत्म होने दो, उसके बाद गा लेना। खैर जारी है जिंदगी...।

पलायन का वह खौफनाक मंजर
रोज शाम को ऑफिस में खबरों में ही खेलना होता है। खबरों में भी कोरोना के अलावा कुछ है नहीं। कुछ दिन अखबार नहीं आया तो बेचैनी हुई, लेकिन पहली अप्रैल से रुटीन में अखबार आने लगे। इस दौरान कोरोना के खौफ से पलायन संबंधी खबरें आईं। बेहद दुखद। दिल चीरने वाली। कुछ चैनल चलाते कि कोरोना पर भूख भारी। कई चैनल इसी तरह खबर चलाते कि ये सब भूखे-नंगे हैं। दुख हुआ। असल में इन्हें सही से समझाया नहीं गया। वे सिर्फ भूख के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी भाग रहे थे कि मानो कयामत आ गयी। कयामत आ गयी तो घरवालों के संग ही प्राण क्यों न निकले। इस दौरान दिल्ली सरकार के बारे में भी खबरें आईं कि उसका रुख बेहद अगंभीर रहा। खैर ये सब तो जांच का विषय है। फिलहाल इस परेशानी से सब ही जूझ रहे हैं।

पशुओं की स्थिति
इन दिनों पशु बेचैन हैं। आखिर ये दो पैरों वाला पशु चला कहां गया है। अक्सर रात के समय भौंकने वाले कुत्ते दिन में भी भौंकने लगते हैं। चंडीगढ़ की सड़कों पर सांभर, तेंदुए की कई वीडियो वायरल हुई हैं। चंडीगढ़ में हरा-भरा क्षेत्र काफी है। इन दिनों दोपहर तीन बजे मैं जब घर से निकलता हूं तो कई बार कुत्तों, गायों की बदली हुई सी हरकतों को देखता हूं। इक्का-दुक्का चल रही गाड़ियों के बीच वे भौंचक्के से दिखते हैं। हमेशा वाहनों की चिल्ल-पौं मची रहने के दौरान अचानक यह क्या हो गया।

क्या भगवान ने दिखावा न करने का दिया है संदेश
ब्लॉग लिखते-लिखते कई दिन बीत चुके हैं। आज 10 अप्रैल को इसे पूरा कर पा रहा हूं। दो दिन पहले कई लोगों से बात हो रही थी। एक-दो मित्रों ने कहा कि क्या भगवान दिखावे से नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा कि आज इबादत की किसी भी जगह चले जाओ, चाहे मंदिर हो या मस्जिद, चर्च हो या फिर गुरुद्वारा। हर जगह भयानक भीड़। कई जगह जबरन दान की मांग। अनेक जगह दिखावा। कतार में धक्का-मुक्की। क्या ऊपरवाले ने एक सबक दिया है सबको कि भक्ति में दिखावा न हो। मन चंगा तो कठौती में गंगा। घर पर भी इबादत हो सकती है। सही इबादत तो दीन-दुखियों की सेवा है। क्या जाने क्या है। पर इस वक्त सब ऊपर वाले के भरोसे पर हैं।
बीच-बीच में डराता मौसम
अप्रैल आने पर भी ऑफिस में कई लोगों को जैकेट या हाफ स्वेटर पहने देखता हूं तो यकीन नहीं होता कि अप्रैल का आधा माह निकलने को है। प्रदूषण में आई कमी इसका कारण है या कुदरत की कुछ और इच्छा कि बीच-बीच में पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय हो जाता है और बारिश या तेज हवा मौसम के गर्म होते मिजाज को फिर ठंडा कर देता है। कुछ भी हो कुदरत के सामने सारी कायनात बौनी है।
ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल के लेख पर प्रतिक्रिया
Vandana Saxena
Principal Tribune School
इसी दौरान ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल वंदना सक्सेना जी से व्हाट्सएप के जरिये बात हुई। असल में उन्होंने पहली अप्रैल से ही सभी कक्षाओं के लिए व्हाट्सएप ग्रूप बनवा दिये और सभी टीचर्स बच्चों को हल्का-फुल्का काम देने लगे और उनका बच्चों से सीधा संवाद होने लगा। बच्चे इसे एंजॉय भी कर रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने एक लेख लिखा और जीवन को नये नजरिए से देखने संबंधी बात उसमें कही। मैंने वह लेख पढ़ा और उनके अंग्रेजी लेख की प्रतिक्रिया हिंदी में दी। वर्ष 1996 से हिंदी आंदोलन से जो जुड़ा ठहरा। नीचे है मेरी प्रतिक्रिया-

नमस्कार मैडम। महज यह नहीं कहूंगा कि लेख बहुत अच्छा है। असल में आपने रिश्तों को फिर से परिभाषित करने की बात से लेकर डार्विन के सिद्धांत योग्यतम की उत्तरजीविता तक का जिक्र करते हुए अनिश्चितता भरे माहौल में उम्मीद की किरण जगाई है। बेशक मेरी रुटीन लाइफ में ज्यादा फर्क नहीं आया, लेकिन घर, परिवार, जानकार लोगों के अनुभव अद्भुत हैं। अनेक लोगों की बुरी लतें छूट गई हैं। भविष्य का पूर्वानुमान इन दिनों कल्पना से परे है, लेकिन आभासी दुनिया में पूरी तरह खो चुके इंसान के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है। वशीर बद्र साहब ने बहुत पहले लिख दिया था- कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये हादसों का शहर है जरा फासले से मिला करो। उनसे भी पहले कवि प्रदीप ऐसे गीत लिख गए थे। योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत के साथ ही हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। परिवर्तन हो रहा है और होगा। यह दौर भी निकल जाएगा। बुराई में भी कुछ अच्छाई छिपी होती है। आज प्रदूषण कम हो गया है, रिश्तों में दूरी के बावजूद नयी गर्माहट आई है। सोशल मीडिया के संदेशों में फर्क आ गया है, जो विदेश न जाने के कारण कुंठित रहते थे वे अब ऐसा नहीं सोचते। आपका लेख बहुत बेहतरीन है जो खूबसूरत नयी सुबह की उम्मीद जगाती है। वाकई जीवन प्रवाह में यह रुकावट आत्ममंथन के लिए वक्त मिलने जैसा है और ऐसे लेख उस दिशा में एक कदम के साथ ही मानवता के यज्ञ में एक आहूति सरीखा है। आपको साधुवाद। - केवल तिवारी, चंडीगढ़