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Tuesday, February 25, 2020

निकिता मैम ने कहा-‘आप अपने लिए भी जीयें’ ... बस पड़ गया फर्क

इस बार वर्षों बाद वह घर आया है, अपने साथ खुद को भी लाया है।
अपने साथ खुद को लाने की एक शायर की यह बात है बहुत गंभीर। वाकई कई लोग आपाधापी में खुद को भूल चुके हैं। कोई बच्चों को समर्पित है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है। किसी को प्रतिष्ठा की चिंता है और कोई दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही इतना व्यस्त है कि उसे अपने बारे में ही कुछ पता नहीं। लेकिन कई बार कुछ मोड़ ऐसे आते हैं कि आपको लगता है-
जीवन पथ पर आएंगे कई मोड़, पल वही अपने जो आपको खुद से दे जोड़।
Nikita Mam
कुछ मंजर ऐसा ही हुआ कुछ दिन पहले। चलिए इसकी शुरुआत करते हैं-कोई लाग-लपेट नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं। आमना-सामना हुआ। हाल-चाल पूछा फिर अचानक सवाल, ‘आज बहुत कमजोर क्यों लग रहे हैं। तनाव ज्यादा लेने लगे हैं।’ निकिता मैम पहले मुझसे मुखातिब थीं, फिर मेरी पत्नी भावना की तरफ हंसते हुए मजाकिया अंदाज में पूछा, ‘आप ध्यान नहीं रख रहीं इनका।’ कुछ पल हंसी मजाक। फिर उन्होंने गंभीर होकर कहा, ‘देखिए आप अपना कर्म कर रहे हैं। बच्चों पर पूरा ध्यान दे रहे हैं फिर तनाव पालकर क्या होगा।’ अमूमन मैं खूब बोलने वाला हूं, लेकिन उस दिन ज्यादा नहीं बोला। यह बात है नवंबर या दिसंबर की। सही तारीख याद नहीं। ट्रिब्यून मॉडल स्कूल (Tribune Model School) में बेटे धवल की पीटीएम (PTM) थी। मेरी और पत्नी की हमेशा कोशिश होती है कि पीटीएम में हम दोनों जाएं। उस दिन भी यही हुआ। हम दोनों पीटीएम से लौट रहे थे। सीढ़ियों के पास निकिता मैम मिल गयीं। उन्होंने यह भी कहा कि आपसे फिर विस्तार से बात करेंगे। विस्तार से बात करने की बात पर भावना कई दिनों तक इसलिए तनाव में रहीं कि कहीं धवल कोई शैतानी तो नहीं कर रहा। धवल अकसर दोस्तों की ऐसी बातें भी बताता कि मन सन्न रह जाता। इतनी छोटी उम्र में भी बच्चे ऐसी बातें। मैंने भावना को समझाया कि तुम भले ही परेशान हो, मैं तो रिलेक्स हूं। अगली बार मैडम से मिलेंगे तो सकारात्मक बातें होंगी।
भावना की चिंता भी वाजिब थी। इस पर एक कवि की चंद पंक्तियां याद आती हैं-
बारिश तो आती है पर क्या, सावन में सावन दिखता है। बच्चे तो दिखते हैं काफ़ी, कितनों में बचपन दिखता है।
बिल्डिंग में कमरे ही कमरे, गायब घर-आंगन दिखता है। अपनापन तो नहीं, पर इन दिनों परायापन खूब दिखता है।
खैर...मुझे याद है करीब चार साल पहले निकिता मैम मेरे बेटे धवल को पढ़ाती थीं। उसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। बेटा उन्हें बहुत मिस करने लगा। वक्त गुजरता गया, एक दिन पता चला कि निकिता मैम ने फिर ज्वाइन कर लिया है, इस बार स्पेशल एजुकेटर के तौर पर। उन्होंने इसके लिए बाकायदा कोर्स किया है। उनके आने के बाद एक बार सभी पैरेंट्स को एक साथ बिठाकर कुछ टिप्स दिये गये। खासतौर पर उन्हें जिनके बच्चे बोर्ड परीक्षा देने वाले थे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक उस दौरान 10वीं की तैयारी कर रहा था। पढ़ने में ठीक ही था। थोड़ी सी किशोरावस्था वाली चीजें उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो रही थीं। थैंक्स ट्रिब्यून
स्कूल का, स्कूल की प्रिंसिपल का, क्लासटीचर बिनेश सर का, निकिता मैम का और अब स्कूल छोड़ चुकीं अवलीन कौर मैमम का। आगे बढ़ने से पहले किसी शायर की दो लाइनें पेश करना चाहता हूं-
अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को, मैंने औरों से सुना है कि परेशान हूं मैं
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया, ख़ुश हूं कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया।
बहरहाल, वापस आते हैं निकिता मैम पर। एक दिन स्पेशल पैरेंट्स क्लास हुई। उसमें निकिता मैम ने जोर-जोर से ए फॉर एप्पल और वन टू थ्री सबसे बोलने को कहा। कुछ लोग ऐसा करने में संकोच भी कर रहे थे। लेकिन देखते ही देखते सबको मजा आने लगा। थोड़ी देर बाद निकिता मैम ने कहा, कैसा लगा, सब हंसने लगे और बोले-मजा आ गया। निकिता मैम ने कहा जब छोटी-छोटी बातों से आनंदित हुआ जा सकता है तो आप बच्चों के साथ कभी-कभी बच्चा क्यों नहीं बन जाते। सचमुच बात बहुत अच्छी और बहुत छोटी सी लगी। मैंने अब तक पैरेंटिंग पर 200 के करीब आर्टिकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साइट्स पर लिखे होंगे, लेकिन बात जब अपने पर आती है तो उसी तरह हो जाता है कि जैसे डाॅक्टर खुद का इलाज नहीं कर पाता। ऐसे ही अनेक मौकों पर निकिता मैम से बातें होने लगीं। स्कूल से मेरा नाता एक अभिभावक के अलावा भी है। कई बार बच्चों को मोटिवेशनल लेक्चर दिया है। कहानी लिखने के टिप्स दिए हैं। चुपचाप अभिभावक की भूमिका में जाता हूं, कभी रिपोर्टर के तौर पर और कभी स्कूल की मीटिंग में। हर बार कुछ सीखने को मिलता है।
बत फिर वहीं से,  
जब निकिता मैम ने कहा कि आप अपने लिए भी जीना सीखें। चिंता न करें, कर्त्तव्य करें। मैंने मन ही मन ठान लिया कि अगली बार मैडम से मिलूंगा तो शायद शिकायत का मौका नहीं दूंगा। इस बार भी अभी 15 फरवरी को फिर पीटीएम में गया। इस बार निकिता मैम से स्पेशल मिलने जाने का मन बनाया, लेकिन इसी बीच कुछ टीचर्स के साथ लंबी बातचीत होने से समय ज्यादा निकल गया। भावना बोलीं, चलो निकिता मैम से मिलकर आते हैं। जब तक वहां पहुंचे मैडम का कमरा बाहर से बंद था। हम लोग लौटने लगे तो मैडम फिर सीढ़ियों के पास मिल गयीं। कुछ पैरेंट्स से बात करते हुए। हमने इंतजार किया फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैंने ही पूछा मैडम आज तो मैं ठीक लग रहा हूं ना। वो थोड़ा आगे बढ़ीं प्रिंसिपल मैम के कमरे के बाहर हेल्पडेस्क के टेबल को छुआ और कहा टचवुड। फिर हम लोग पास ही रखे सोफे पर बैठ गए। उन्होंने कुछ बातें तो बेटे धवल को समझाईं। फिर हमसे भी बातें होने लगीं। हम लोगों ने तय किया कि बच्चों और पैरेंट्स को लेकर हम लोग अक्सर मिलेंगे और बात करेंगे। शायद इनसे कुछ ऐसी बातें निकलें कि जो औरों के लिए भी आगे चलकर फायदेमंद हो सके;
हर तमन्ना जब दिल से रुखसत हो गई, यकीन मानिए फुर्सत ही फुर्सत हो गई।
नादान हैं जो बाजार में वक्त खरीदने चले हैं, वक्त उसी का है जो वक्त के साथ चले हैं।

कुछ टीचर्स का चले जाना, हर एक से कुछ सीखना

मुझे सात साल हो गये हैं चंडीगढ़ आए और बच्चों को छह साल। यानी ट्रिब्यून माॅडल स्कूल से नाता जुड़े भी छह साल ही हो गये हैं। मैं बड़े बेटे को लेकर कई टीचर्स से सवाल पूछता तो हर कोई कहते बहुत अच्छा बच्चा है। यकीनन मुझे अच्छा तब लगा जब एक बार एक मैडम ने कहा कि आपने उस पर उम्मीदों का पहाड़ लादा है। वह हंसता नहीं। इतना गंभीर क्यों। मैंने इस पर होमवर्क किया, लेकिन बड़ा बेटा कार्तिक आदतन ऐसा है। वैसे टीचर्स के सुझाव के बाद उसे बदलने की कोशिश की। आज वह ट्रिब्यून स्कूल से निकल चुका है, लेकिन यहां से बहुत कुछ सीखकर निकला। हिंदी की आशा भारद्वाज मैडम हों या रजनी मैडम, इन लोगों से अकसर बातें होती हैं। म्यूजिक के अतुल सर से लेकर वीआरएस ले चुकी अनुपमा मैम, सबसे बातचीत का सिलसिला जारी है। विनिमा मैम, नम्रता मैम, निधि मैम, स्वाति मैम और कुछ नये आए टीचर्स। मेरी कोशिश होती है कि मैं सबसे मिलकर बच्चे की पढ़ाई के अलावा उसकी हरकतों के बारे में भी बात करूं। इन सबके बीच प्रिंसिपल वंदना सक्सेना मैम का बेहतरीन सहयोग। एक बार प्रिंसिपल मैम को मैंने अपनी एक कहानी का लिंक भेजा, उन्होंने प्रतिक्रिया स्वरूप पूछा, इज इट धवल। वंदना मैम के साथ तो इतने अनुभव हैं कि उन पर एक लंबी कहानी लिखने का इरादा है।
केवल तिवारी