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Wednesday, April 1, 2026

कुक्कू का यज्ञोपवीत संस्कार, धार्मिक स्थल पर दिखा मेरा परिवार

केवल तिवारी

कुक्कू की जनेऊ करवाई,

मां बहुत याद आई।

लग रहा था उस जहां

से बरस रहा आशीर्वाद

तभी तो सब लोगों

ने मिलकर

पूर्ण कर दिया काज।

आचार्य गोविंद वल्लभ जी का

दिल से धन्यवाद

पंडित केवलानंद जी का

हार्दिक आभार।

सचमुच अनूठी परंपरा है हमारे यहां। हर शुभ कार्य के मौके पर पूर्वजों को याद किया जाता है। लखनऊ से भाभी (राधा तिवारी) संग पहुंचे दाज्यू (भुवन चंद्र तिवारी) जब आवदेव (पितरों का विशेष पूजन) में बैठे और पंडित जी ने दादा, पिताजी, माताजी का नाम लेने को कहा तो मैं भावुक हो गया। अपने पितरों की विस्तृत कहानी क्या कहनी, लेकिन माताजी, ससुर जी, तीन जीजाजी और कोरोना का ग्रास बने बिपिन की बहुत याद आई। माताजी यानी ईजा कुक्कू को मेरी तरह नफरी कहती थी। मेरे ससुर इसे गोबर गणेश कहते थे। बचपन में यह ज्यादा तंग नहीं करता था, अब तो बिल्कुल ही नहीं करता। खैर... चलिए पितरों का पूजन हो रहा था तो उनकी याद आनी लाजिमी थी, लेकिन साथ लग रहा था कि गंगा किनारे उस जहां से सभी पितर आशीर्वाद दे रहे हैं और इसी आशीर्वाद का परिणाम था कि कुछ दिनों से मन में हो रही धुकर-धुकर से इतर आखिरकार मेरे ज्येष्ठ सुपुत्र कार्तिक तिवारी का जनेऊ संस्कार निर्विघ्न संपन्न हो गया। तमाम किंतु-परंतु से हटकर हरिद्वार जाना बहुत आनंददायक और आध्यात्मिक रहा। इस आयोजन में आये लोगों से मुझे बल मिला और महसूस हुआ कि मैं अकेला नहीं हूं। कामकाज के मौके पर मेरा परिवार मेरे साथ है। आचार्य गोविंद वल्लभ जोशी जी का दिल से धन्यवाद है क्योंकि उन्होंने पंडित केवलानंद पांडेय जी से परिचय करवाया और पांडेय जी ने ही हरिद्वार में पूजा संपन्न कराई। उनकी बुलंद आवाज और लयबद्ध श्लोक उच्चारण से आत्मिक शांति मिली और मां गंगा की आरती के दिव्य दर्शन हुए। मैं खुशकिस्मत हूं कि श्रेष्ठ ब्राह्मण माने जाने वाले भानजे-भानजियों में अनुपात समान है। यानी पांच भानजियां और पांच भानजे। कुछ कारणों से सब नहीं पहुंच पाये, लेकिन प्रिय गौरव के अलावा भानजी रुचि और रेनू ने सपरिवार पहुंचकर मेरे कामकाज में मानो चार चांद लगा दिये। भाभी-दाज्यू इस कार्यक्रम में विनीत थे, उनके सानिध्य में प्रेमा दीदी जो कुक्कू के पैदा होने के समय पर भी पहले ही पहुंच गयी थी, का विशेष प्यार मिला। उससे गले मिलते वक्त भावुक हो गया था और जीजा जी जिनका नाम मैंने अपने फोन में जीजाजी मिश्राजी करके सेव किया था, याद आ गये। मैंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए उसके गाल थपथपाए और सप्रयास हंस दिया। इसी मौके पर मुझे पुष्पा दीदी की भी याद आयी। उसने ही मेरी शादी तय करवाई और उसी के घर से विवाह के सभी कार्यक्रम संपन्न हुए। कार्यक्रम में दाज्यू लोगों के संग मुझसे पहले ही पहुंचीं शीला दीदी और पूरन जीजा जी का स्नेह तो वर्णनातीत है। अधिकारपूर्वक उनसे कई आग्रह कर लेता हूं। मुझे समय-समय पर अच्छी सीख देते हैं और मदद करने में आगे बढ़कर रहते हैं। इन सबके बीच हमारी पूजनीय भाभी जी (हरीश की ईजा) और उनके संग प्रकाश एवं दोनों भाइयों का पूरा परिवार। साथ में भतीजा हेम और दीप तिवारी एवं उसका परिवार। इन सबके साथ इस विशेष पवित्र कार्यक्रम की शोभा बढ़ी मेरी सभी भतीजियों का प्रतिनिधित्व करने वाली निर्मला से। वह सपरिवार पहुंची और बेटे को आशीर्वाद दिया। दर्शन जी, दीपेश जी और कुलदीप जी के साथ भानजे गौरव को ब्राह्मण देवता स्वरूप सामने देखकर बहुत ही प्रसन्नता से मेरा काम संपन्न होता चला गया। जो लोग नहीं पहुंच पाए उन्होंने फोन पर बधाई दी। बड़ी दीदी विमला दीदी ने फोन पर खूब आशीर्वाद दिया और कुक्कू को बधाई दी। भतीजी कन्नू ने भी फोटो भेजते रहने के लिए कहा।

ससुराल पक्ष का वह अविस्मरणीय सहयोग

इस शुभ कार्य की तैयारी बहुत पहले से चल रही थी। इस तैयारी में मेरी पत्नी भावना के बड़े भाई यानी बच्चों के बड़े मामा नंदाबल्लभ जी की पत्नी आदरणीय भाभीजी, उनकी बिटिया नेहा, दूसरे भाई शेखर जोशी और उनकी पत्नी लवली भाभी का विशेष सहयोग रहा। साथ ही में भावना के जुड़वां भाई भास्कर जोशी (राजू), उनकी पत्नी प्रीति संग हम चंडीगढ़ में ही बातचीत करते और योजनाएं बनाते। राजू ने परिजनों के चाय-नाश्ते और लंच-डिनर की व्यवस्था में विशेष सहयोग किया। प्रीति यानी पिंकी तो प्रसन्न मुद्रा में सबके साथ घुलमिल कर उत्साह को दोगुना कर देती है। शेखरदा अक्सर तैयारी के बाबत पूछते रहते। लवली भाभी ने चंडीगढ़ आकर सुंदरकांड एवं श्री सत्यनारायण कथा संबंधी कार्यक्रम में खूब सहयोग किया। साढू भाई सुरेश पांडेय जी नहीं पहुंच पाए क्योंकि उनकी माताजी (जिन्हें मैं ईजा कहता हूं) इन दिनों बहुत ज्यादा अस्वस्थ हैं। लेकिन फोन पर उनसे बात होती रहती और हरिद्वार में कार्यक्रम संपन्न होते ही उनका बधाई संदेश एवं फोन आ गया। इन सबका सहयोग अविस्मरणीय है। धन्यवाद शब्द तो इसके लिए बहुत छोटा है। हां इनसे बच्चों के प्रति आशीर्वाद की दरकार हमेशा रहेगी ही। बच्चों के जिक्र में छोटे बेटे धवल, शेखरदा के बेटे सिद्धांत जोशी (सिद्धू) एवं राजू के बेटे भव्य का उत्साहजनक माहौल बनाए रखने एवं छोटे-छोटे, लेकिन थकाऊ काम को संपन्न कराने में विशेष सहयोग रहा। इन सबको ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद।


मां गंगा की दिव्य आरती और स्नान

हरिद्वार पहुंचे तो बिश्नोई धर्मशाला में भाभी-दाज्यू, शीलादी-जीजाजी पहुंचे हुए थे। कुछ ही देर में चंडीगढ़ से हम आठ लोग पहुंच गए। थोड़ी देर में काठगोदाम की टीम भी आ गयी। दोपहर बाद पंडित केवलानंद पांडेय जी भी मिलने आई। उन्होंने पूछा कि क्या गंगा आरती देखनी है, हम सबने उत्साहपूर्वक हां में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि आरती तो साढ़े छह बजे होगी, लेकिन पहुंचना पड़ेगा पांच बजे। हम सब थके हुए थे। एकबारगी गंगा तट पर जाने का कार्यक्रम टालने का सा मन हो गया, लेकिन कुछ ही देर में मां गंगा का आशीर्वाद ऐसा असर कर गया कि बच्चों को छोड़कर (भव्य साथ गया) हम सब पहुंच गये। पंडित जी ने एकदम करीब ही बैठने की व्यवस्था कर दी। वह स्वयं गंगा आरती करवाने वालों में शामिल थे। पहले ही कह चुके थे कि पांच बजे बाद फोन नहीं उठा पाऊंगा। हम लोगों ने देश-विदेश से आए हजारों लोगों के साथ गंगा आरती में भाग लिया। प्रणाम किया और लौट आये। एक-एक चाय पीकर कमरों में गये और तब तक दो भानजियां सपरिवार पहुंच गयीं और कुछ देर बाद भतीजा प्रकाश भी सपरिवार वहां पहुंच गया। कुछ देर मुलाकात के बाद बाकी लोग कहीं अन्यत्र चले गये, उन्होंने अपने ठहरने की अलग व्यवस्था कर रखी थी। फिर चला मेहंदी का कार्यक्रम। गीत-संगीत। इसी बीच चर्चा हुई कि क्यों ने सुबह-सुबह गंगा स्नान किया जाये। साथ ही पंडित जी ने कहा था कि अगर सुबह की आरती देखनी हो तो भी आ सकते हैं। हम लोग रात करीब एक बजे सोये होंगे, लेकिन उत्साह ऐसा कि सुबह चार बजे उठ गये। करीब सवा पांच बजे हम लोग हर की पौड़ी पहुंच गये। वहां सबने स्नान किया और लौट आये।


और जनेऊ संस्कार, सुंदरकांड व श्रीसत्यनारायण कथा संपन्न

करीब दस बजे पंडित जी बिश्नोई धर्मशाला के पास ही भीमगोड़ा घाट पहुंच गये। कार्यक्रम शुरू हुआ। भाभी जी लोगों ने शकुनआखर और भगवत भक्ति के अन्य गीत गाये। इस बीच, सभी परिजन पहुंच गये। बीच-बीच में चाय का दौर चला और बूंदाबांदी भी हुई। बेहतरीन तरीके से कुक्कू का जनेऊ संस्कार संपन्न हो गया। रात करीब आठ बजे हम लोग चंडीगढ़ पहुंच गये। लखनऊ से आये दाज्यू-भाभी भी हमारे साथ ही आये। अन्य लोग भी यथासमय अपने-अपने घर पहुंच गये। सोमवार को थोड़ा आराम कर मंगलवार को हमने पहले सुंदरकांड का पाठ किया फिर श्री सत्यनारायण पाठ के लिए पंडित जोशी जी पहुंच गये। कुछ लोगों की भागीदारी में कार्य संपन्न हुआ। जीवन चलने का नाम और इसी चलने के नाम पर ही सभी अपने-अपने काम में लग गये हैं। ईश्वर सब पर अपना आशीर्वाद बनाये रखना। जय गंगा मैया। जय ग्वेल देवता। जय भगवती माता। जय ईजा। जय बंबई नाथ स्वामी। जय हो बिनसर महादेव। सर्वेभ्यो, देवेभ्यो नम:



















Wednesday, March 25, 2026

स्वागत है कीट तुम्हारा, मेरी क्यारी में बनाओ बसेरा...

केवल तिवारी

कुछ समय पहले की बात है, अपनी क्यारी में कुछ भी बोता था तो पौधा बनने के कुछ समय ही बाद ही ज्यादातर में एक सफेद किस्म का पदार्थ (फंगस) दिखता और धीरे-धीरे पहले उसकी पत्तियां चौपट होतीं फिर पौधा। किसी ने सुझाव दिया कीटनाशक यानी Pesticide डालो। मैं बाजार जाकर एक शीशी और स्प्रे खरीद लाया।  कुछ पौधों पर छिड़का भी, उसकी तीक्ष्ण गंध मुझे बहुत खराब लगी। मैंने गौर किया कि जब तक गंध का असर रहा, अक्सर वहां दिखने वाली रंग-बिरंगी तितलियां और पंछी भी गायब हो गये। मैंने उस स्प्रे को फेंक दिया। अपने शौक के मुताबिक कभी गेंदा merigold, कभी लाल रंग के 'फोर ओ क्लॉक' फूल को क्यारियों में लगा दिया। 


इसी बीच, कहीं से कसूरी मेथी और सामान्य मेथी बोने का सुझाव मिला। बीज भी मिल गए। मैंने बो दिए। साथ ही पालक भी लगा दिया। क्यारी में भिंडी और बैंगन पर तो ऐसा फंगस लगा कि एक भी पौधा न बढ़ पाया और न ही बच पाया। वही सफेद चिपचिपे से फंगस के कारण। इसी दौरान मैंने एक बागवानी एक्सपर्ट का दैनिक ट्रिब्यन चैनल के लिए इंटरव्यू किया। उस इंटरव्यू का लिंक एक-दो जानकारों को भेजा। इस पर चर्चा के दौरान एक सज्जन ने बताया कि उन्होंने एक बार कीट पतंगों को मारने का उपाय पूछा तो उन्हें किसी बागवानी एक्सपर्ट ने कहा, क्यों मारते हो। कीट-पतंगे हों या कोई भी जानवर, इंसानों से कम ही खाते हैं। मुझे उनकी बात भी जमी। फिर एक दिन देखा कि एक अन्य पौधे पर सफेद चिपचिपा पदार्थ फैल गया है। उस पर कुछ चीटिंयां भी रेंग रही हैं। लेकिन इस बीच मेथी और कसूरी मेथी खूब हुई। पालक भी उग आया। मैंने छोटी-छोटी क्यारियां बनाईं। उसमें कहीं फूल तो कहीं कुछ और लगा दिया। अभी पिछले दिनों सभी क्यारियों को साफ कर उनकी गुड़ाई कर रहा था तो मुझे छोटे-छोटे कीट नजर आये। याद आया कि बचपन में इनको हाथ में रखकर हम पास-फेल, पास-फेल कहते थे। पास कहने पर उड़ जाता तो हम मान लेते कि इस बार तो कक्षा पास कर लेंगे। मुझे ध्यान है चौथी-पांचवीं तक ऐसा करते थे। कभी-कभी तो देखते थे कि यह कीट पंखों को फड़फड़ा रहा है यानी लगभग उड़ने वाला है तभी हम पास-पास, पास-पास एकतरफा बोलने लगते थे ताकि फेल का विकल्प ही न रहे। आज उन हरकतों पर हंसी आती है। लेकिन इस कीट के बारे में जब पता किया तो वाकई यह पास है। गूगल सर्च में देखा तो पास-फेल इंसेक्ट भी इसके सर्च ऑप्शन search option में से एक है। लेडी बग lady bug भी कहते हैं। कहीं लिखा दिखा कि अगर यह कीट दिख जाए तो भूलकर भी कीटनाशक न डालें। पिछले दिनों जब में क्यारी खोद रहा था तो यह खूबसूरत कीट दिखा। एक नहीं, अनेक। छोटे बेटे धवल ने भी रुचि दिखाई। आश्चर्यमिश्रित जवाब, ये तो लेडी बग है। हां। फिर मैंने बचपन की कहानी सुनाई। एक कीट उसने भी हाथ पर रखा। फुर्र से पास ही में गेंदे के पौधे पर जा बैठी। फसल का नया सीजन आने वाला है। कुछ में भिंडी, कुछ में धनिया और अरबी बो दी है। देखते हैं ये लेडी बग कितना विस्तार दिखाती हैं। कुछ फूल के पौधों पर तो दिख रही रही हैं। स्वागत है इस रंग-बिरंगे कीट का। 








Sunday, March 15, 2026

दैनिक ट्रिब्यून और पंडित अनिरुद्ध जी

 केवल तिवारी






28 फरवरी, 2026 को दैनिक ट्रिब्यून प्रूफ सेक्शन से पंडित अनिरुद्ध शर्मा जी सेवानिवृत्त हो गये। उनके लिए एक गेट टू गेदर के लिए हम दैनिक ट्रिब्यून न्यूजरूम के लोग कुछ योजना बना ही रहे थे कि पता चला कि खुद पंडित जी ने 27 तारीख की शाम को चाय-पानी की व्यवस्था अपनी ओर से की है। जब उन्होंने खुद ही चाय-पानी की व्यवस्था की तो फिर क्या कहना था। यह तो विदाई संबंधी बात का समापन था। 


असल में बात की अब शुरुआत करता हूं उस वाकये से जो उन्होंने 27 फरवरी की रात करीब साढ़े दस बजे किया। असल में सेवानिवृत्ति के एक दिन पहले भी उन्होंने पूरी नौकरी की और साथ ही संपादक नरेश कौशल जी के सामने ही सभी टीम से कहा कि अब भी कभी मेरे लायक जरूरत पड़ी तो नि:शुल्क हाजिर रहूंगा। पंडित अनिरुद्ध जी को हम लोग ऑफिस के मुख्य गेट तक छोड़ने गये। उन्होंने गेट पर अंदर की ओर मुंह करके ट्रिब्यून जैसे महान संस्थान को दंडवत प्रणाम किया। इसके मुख्य दरवाजे पर शीश नवाया। मैं बात करूं पंडित जी के साथ अपने संबंधों की तो उनके साथ दो तरह से मिलना होता था। एक तो ऑफिस में हम साथ-साथ। इसके अलावा ट्रिब्यून स्कूल में उनकी बिटिया और मेरा बेटा एक ही क्लास में पढ़ते थे। अनेक बार पीटीएम में उनसे मुलाकात होती। इसके अलावा उनके बेटे का नाम कार्तिक और मेरे भी बेटे का नाम। वह जीरकपुर की तरफ से चंडीगढ़ के प्रवेश द्वार के करीब स्थित ट्रिब्यून सोसायटी कांप्लेक्स में पहले रहे। बाद में भी उसी घर के सामने दस साल मैं भी वहीं रहा। यानी उनकी बातें अक्सर होती रहतीं। जहां से भी सुनता, उनके बारे में यही कहा जाता कि वह धार्मिक व्यक्ति हैं। अच्छा संदेश देते हैं। बातों ही बातों में यहां बताना जरूरी समझता हूं कि एक दिन वह मुझे ऑफिस की कैंटीन में मिले और मुझसे कुछ बातें कहीं। साथ ही कहा कि आप खुलकर जीयें। बहुत परवाह क्यों करनी। मैं मान गया उनको। असल में, मेरी अजीब सी आदत है, छोटी-छोटी बातों को भी बहुत सोचता हूं। उनकी उस बात पर भी मैंने एक ब्लॉग लिखा था (https://ktkikanw-kanw.blogspot.com/2022/08/blog-post_19.html)खैर... पंडित जी की सहृदयता की चर्चा के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण बात है कि वह किसी की भलाई के लिए दो कदम आगे बढ़कर चलने वाले हैं। एक बार हमारे एक साथी पर संकट आ गया। साथी ही क्या, संस्थान पर ही संकट सा आ गया। उन्होंने कहीं इसके बारे में पूछा (पूछा से तात्पर्य है धार्मिक स्थिति से एक ऐसे व्यक्ति से पूछताछ जो सच्चे मन से कुछ करने के लिए कहते हैं)। अनिरुद्ध जी का मेरे पास फोन आया। कहा, 'एक उपाय है, करके देख लेते हैं, लेकिन 11 बजे तक अनवरत आना पड़ेगा। खान-पान सात्विक करना होगा।' मैंने तुरंत हामी भर दी। उसके बाद हम दो-चार लोग 11 दिनों तक विशेष पूजा में सुबह करीब दो घंटे लगाते। अंतिम दिन हम लोगों ने पारायण किया। हनुमान ध्वज लगाया। ईश्वर की कृपा और पंडित जी की शुभकामना रही कि तात्कालिक संकट टल गया। इसके बाद हम पंडित जी के गांव भी गये। उन व्यक्ति से भी मिले जिन्होंने यह उपाय बताया था। ऐसे अनेक किस्से हैं जब बातों-बातों में पंडित अनिरुद्ध जी का जिक्र आ जाता है। एक बार उन्होंने गुरुवानंद जी के किसी कार्यक्रम में बुलाया। डीएवी स्कूल में। उसके बाद एक अन्य कार्यक्रम में जो कलाग्राम में हुआ थ। अब अनेक लोग मिलते हैं तो आपस में जय गुरुदेव कहते हैं। अनेक लोगों की गलत आदतों को उन्होंने छुड़वा दिया। एक बार पंडित जी ने गृह प्रवेश में डेराबस्सी बुलाया। वहां भी अनेक लोग मिले। अभी हाल ही में, गत 11 मार्च को पंडित जी के सुपुत्र कार्तिक के विवाह समारोह में जाना हुआ तो वहां अनेक पुराने जानकार मिले। चर्चाएं हुईं। अच्छा लगा। पंडित जी बेशक ऑफिस से सेवानिवृत्त हुए हैं, लेकिन उनसे सलाह मशविरा जारी रहेगा। कुछ काम भी हैं जो उनसे मिलकर पूरे होंगे। पंडित आप स्वस्थ रहें यही कामना है। ईश्वर की, गुरुदेव की कृपा आप पर बनी रहे। 

Thursday, March 12, 2026

16 बरस का धवल, नये संकल्प, नयी उड़ान

केवल तिवारी

इस ब्लॉग या विशेष चिट्ठी को दो दिन पहले यानी 10 मार्च को ही लिख देना चाहिए था क्योंकि मेरे छोटे बेटे धवल का जन्मदिन मंगलवार 10 मार्च को था। इस बार वह 16 साल का हो गया। सुबह पारंपरिक पूजा-पाठ संपन्न कराने के बाद शाम को मैं ऑफिस से कुछ देर के लिए गया। केक कटिंग सेरेमनी में शामिल हुआ। उसके मामा भास्कर (राजू), मामी और उनका बेटा भव्य भी मौजूद रहे। मैं तो तुरंत वापस ऑफिस आ गया, लेकिन बाकी लोग रात 10 बजे तक बातचीत और खान-पान में व्यस्त रहे। उसके अगले दिन यानी बुधवार को भी कुछ व्यस्तताएं रहीं। शाम को एक विवाह समारोह में भी शामिल हुए। आते वक्त गाड़ी पंक्चर, फिर धवल का उस संकट से उबरने में मदद, आदि-आदि से लगा कि बच्चा अब बड़ा हो गया है। 10 और 11 मार्च ऐसे ही निकल गये। आज 12 मार्च को कुछ लिखने का मौका मिला है। खैर... यह तो है छोटा सा विवरण बर्थडे सेलेब्रेशन के दिन का और उसके बाद की व्यस्तताएं।



अब मुख्य बात, धवल ने इस बार 10वीं की बोर्ड परीक्षा दी है। खूब मेहनत करने के बाद। अगर कोई बच्चा मेहनत करता हुआ दिखता है तो फिर परिणाम के लिए बहुत परेशान नहीं होना चाहिए। बतौर अभिभावक मैं बड़े बेटे कार्तिक को भी समझाता था कि तुम मेहनत कर रहे हो, बाकी सब अच्छा ही होगा। यही बात धवल को भी बताता हूं। धवल यह बात तुमसे विशेष तौर पर कि खूब मेहनत करो। परेशानी को हावी मत होने देना। हम जो बातें अक्सर बताते हैं, गाहे-ब-गाहे उन्हीं बातों को कभी स्कूल में तो कभी मोटिवेशनल लेक्चर में बताया जाता है। हां यह जरूर होता है कि 'घर की मुर्गी दाल बराबर', हालांकि जब कभी मैं कोई पुरानी बात दोबारा या तिबारा बताता हूं तो तुम याद करते हो कि पापा ये आप बता चुके हो। धवल अब तुम्हारे सामने दो साल की कड़ी परीक्षा है, इसके लिए तुम मानसिक तौर पर तैयार भी हो। तुम हम लोगों से खुद ही कहते हो कि मुझे लगे रहने दो। ध्यान रखना। इन दिनों तुम्हारा एलर्जिक ट्रीटमेंट चल रहा है। उसका तो इलाज हो जाएगा, लेकिन कुछ आदतों पर सुधार की आवश्यकता है। वैसे समय के साथ अवश्यंभावी बदलाव आ ही जाता है। लिखने को हजारों बातें हैं, लेकिन अभी यह छोटी सी ही चिट्ठी, बाकी बातें चलती रहेंगी। ईश्वर और हमारे पूर्वजों, बुजुर्गों का आशीर्वाद तुम पर बना रहे। हमेशा खु

Thursday, February 19, 2026

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कार्यक्रम की एक याद

 




करीब तीन साल पहले हमारे संपादक नरेश कौशल जी ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित रत्नावली कार्यक्रम में भेजा था। वहां से लौटने के बाद एक स्टोरी लिखी थी। वह आज मेरे पुराने डाक्यूमेंट्स में दिख गयी। सोचा ब्लॉग पर ही चेप देता हूं। मैंने इंट्रो आदि लिखकर पूरी तरह तैयार की थी स्टोरी।

केवल तिवारी

सरकारी दस्तावेज के मुताबिक भले ही हरियाणा ने पिछले दिनों अपना 56वां जन्मदिन मनाया हो, लेकिन यहां की संस्कृति, कला, विरासत की लंबी गाथा है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरियाणा स्थापना दिवस समारोह का नामकरण सम्राट हर्षवर्धन के नाटक के ‘रत्नावली’ से हुआ। कला प्रेमी हर्षवर्धन की राजशाही हरियाणा के थानेसर और उसके आसपास थी। प्रागैतिहासिक काल से ही हरियाणवी कला-संस्कृति के विविध आयाम रहे हैं। बोलने की अपनी खास शैली के लिए पहचाने जाने वाले हरियाणवी आज हर क्षेत्र में उच्च पायदान पर हैं। हरियाणवी विरासत की जानकारी और उसे सहेजने में युवाओं की भागीदारी का रंगारंग दर्शन हुआ पिछले दिनों कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित ‘रत्नावली’ के 35वें समारोह में।

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 ‘सुखद-समृद्धि’ की ओर हरियाणवी विरासत

यहां बेबाकी है। बेतकल्लुफी है। माटी से जुड़े रहने की ‘जिद’ है। आसमान में ‘उड़ने’ का हौसला है। परिवर्तन की गवाही है। सांस्कृतिक लिहाज है। आधुनिकता का खुलापन है। यह हरियाणा है। इस हरियाणा के सांस्कृतिक समृद्धि की झलक पिछले दिनों कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित ‘रत्नावली’ कार्यक्रम में दिखी। संस्कृति की विभिन्न विधाओं में ‘लट्ठ गाड़ने’ वाले हरियाणावी देश-विदेशों में छा चुके हैं। खेलों में परचम लहरा रहा युवा वर्ग संस्कृति को सहेजने में जुटा है। विस्मृत की जा चुकी चीजों पर शोध कर रहा है। तभी तो जाने-माने कलाकार युवाओं को संदेश देते हैं, ‘सपनों का पीछा करो और ईमानदारी से आगे बढ़ो।’

गत 28 से 31 अक्तूबर तक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की रौनक कुछ अलग ही रही। प्रवेश करने से पहले ढोल की गूंज सुनाई देने लगती थी। रंग-बिरंगा परिसर और वहां सजे विभिन्न स्टॉल। कोने पर ही पगड़ी पहनने की होड़। बगल में ही दामण, लहंगा, चुनरी, हसली और कमरमंद का स्टॉल। बाहर के नजारे से जरा अंदर पहुंचे तो ऑडिटोरियम की दर्शक दीर्घा में हर कोई झूमने को मजबूर। झूमे भी क्यों ना। कभी रसिया, कभी लूर तो कभी समूह नृत्य। कलाकार जिन गीतों पर थिरके और संग-संग दर्शक झूमे जरा उन पर गौर फरमाइये- ‘दामन बावन गज का…, मैं मटक चलूंगी…’, ‘रुत आई बंसत बहार की मेरा चुंदड़ उड़ उड़ जा…’, ‘तेरे बिन आवे न चैन…’, ‘चलो री सखी मंगल गा लो…’ ‘यू म्हारा हरियाणा…’, ‘बसेरे आए रे बसेरे…’, ‘यशोदा मईया करो कमाल, रसिया हम खेले फागन में…’, ‘ऐसो कियो कमाल, बलम घर पडवा दे…’ ‘ब्रज में होरी मोरी रसिया…’, ‘होली खेलो कृष्ण मथुरा की गली…।’ मुख्य ऑडिटोरियम के बगल में दूसरे हॉल में सुनाई दीं कविताएं। कुल 26 महाविद्यालयों के काव्य प्रतिभागियों ने अलग ही माहौल बनाया। प्रथम, द्वितीय तो प्रतियोगिता की परिणति है, लेकिन दर्शकों को हर किसी की कविताओं ने मोह लिया। कविताओं के साथ ही कॉलेज विद्यार्थियों की हरियाणवी वेशभूषा और ‘सभी नै राम-राम’ का संबोधन सबको भाग गया।

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मजाकिया अंदाज, कटाक्ष के साथ संवाद

रत्नावली समारोह में भले ही ज्यादातर कार्यक्रम प्रतियोगी स्वरूप में थे, लेकिन जीत-हार और प्रथम-द्वितीय की बात को दरकिनार रखा जाये तो इनके प्रस्तुतीकरण से सबका मन मोह लिया। मजाकिया अंदाज रहा और कटाक्षभरे संवाद। सिस्टम पर भी चोट और बात भी पते की। देखिये कुछ संवाद, ‘रै बालकों थम भी क्या याद करोगे, थारते कोरोना के सीजन में बिना पेपर दिए पास किया. इसते बत्ती ओर के चाहो हो, छह-छह साल में जो पास न होए, कोरोना मैं म्हारी दी छूट मै उनका कलेश कट गया।’ इस संवाद का जवाबी अंदाज देखिए, ‘इन बालकां का तो भला हो गया, पर उनके पेट पै लाठी लगी जो पिसे देकै पास कराकै अपना टब्बर पालैं ते।’ अब थोड़ा सियासत मजाकिया छौंक। देखिए संवाद-

‘एक नेता बोल्या म्हारे तै वोट दो, म्हारे तै वोट मिलण तै देश नै इतना ऊंचा ले जैंगे.... अर इतनी ऊंचा... इतनी ऊंचा.... बस न्यूं समझल्यों ऊंचे तै भी ऊंचै। दूसरा नेता बोल्या- रोक दै मित्र इतनी ऊंचे तू देश नै लेग्या, ओड़े ऑक्सीजन का टोटा पड़ जैगा... अर ऑक्सीजन का टोटा दूर करना थारै बसका सोदा कौने।’ कोरोना काल में ऑक्सीजन संकट पर यह गहरी चोट थी। ऐसे ही अनेक कार्यक्रम हुए जिनमें हंसी-मजाक के संदेश भी थे। यही तो है हरियाणा और हरियाणवियों का अंदाज।

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रघुवेंद्र मलिक : संजीदा कलाकार हरियाणवी धरोहरों से प्यार

जाने-माने कलाकार रघुवेंद्र मलिक की संजीदगी हमें अनेक मंचों पर देखने को मिलती रही है। कई फिल्मों में अपनी सशक्त भूमिका से दर्शकों का दिल जीतने वाले मलिक हरियाणवी धरोहरों को भी संजोने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी इच्छा इन धरोहरों को संजोकर रखने की है। यानी एक संग्रहालय बनाने की ताकि हरियाणा की आने वाली पीढ़ियों के मन से ये विस्मृत न हो जायें। कर्यक्रम से इतर उन्होंने कुछ चित्र दिखाए। चित्र उन धरोहरों के जो उनके पास हैं। इनके नाम देखिए परात, दोही, बोहिया, दरांत, पलिए, कुंडी, सिप्पी, लोटा, कटोरदान, छाज, छालणी, मूसल, हारी, तेलड़ी, दीपदान, लोढणी, छिक्का, खुरपी, तुंबा, खुरेहरा, बीजणा, फरमे, ठप्पे, लालटेन, डोल वगैरह-वगैरह। रघुवेंद्र ने कहा, ‘ये सभी चीजें हमारे रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल रहा करती थीं।’ हरियाणा में इनमें से कुछ चीजें भले ही समय के साथ लुप्त हो गई हों, लेकिन अभिनेता रघुवेंद्र के पास इनका संकलन है और वह यह काम जारी रखे हुए हैं। उक्त सामानों के अलावा खेती-बाड़ी के लिए भी कई ऐसी चीजें थी जिनमें से शायद अब बहुत कुछ ना हो और लोगों को तो उनका पता ही ना हो जैसे दो सींगा चार सींगा जेली, गडासी, हालस, सांटा, जुआ, फरसा, गोपिया, नकेल, हल, हलस वगैरह-वगैरह। घर-परिवार की जिन चीजों को महिलाएं तैयार करती थीं, उनका संग्रह भी उनके पास हैं। इनमें शामिल हैं घागरा, ओढ़नी, झूला, टोपी, बटुए, बिंदरवाल, मोड़, तागड़ी, ईढ़ी, खेस, खरड़, पालना, दरी, मुड्डे, झुनझुना, चौपड़ आदि। मनोरंजन की सामग्री में संगीत से जुड़े कुछ वाद्य यंत्रों का भी उन्होंने जिक्र किया जैसे सारंगी, ग्रामोफोन, नगाड़ा, बीन, बांसली, डफ, तासा वगैर-वगैरह। मलिक ने हरियाणवी फिल्मों पर भी बात की और उम्मीद जताई कि आज के युवा निश्चित रूप से स्थानीय सिने संसार को आगे ले जाएंगे।

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चार बार हुई शादी कैसे टूट सकती है : राजेंद्र गुप्ता

संजीदा अभिनेता राजेंद्र गुप्ता से अनेक बातें हुईं। लेकिन जैसे ही उनसे प्रेम के संबंध में पूछा गया तो आसपास खड़े युवा ऐसे चौकन्ने हुए मानो उनके जवाब के लिए ‘इरशाद’ कर रहे हों। उन्होंने शुरुआत में कहा, ‘जब मैं 1963 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का छात्र था, लड़कियों की तरफ देखते हुए भी डरता था। वह वक्त कुछ और था।’ जवाब से जुड़ा सवाल, ‘आपने भी तो प्रेम विवाह किया, कैसे हुआ सबकुछ और कैसा अनुभव है जीवन में?’ बोले- ‘कैसे हुआ तो मैं भी नहीं जानता। फिल्मी सी कहानी है। नाटक अंधा युग की शूटिंग के दौरान दो दिन की मुलाकात के बाद तीसरे दिन बातचीत हुई और पहले मंदिर में चुपचाप शादी की। घर आए तो घरवालों ने हिंदू रीति-रिवाज से शादी कर दी। फिर कुछ संबंधियों ने कहा कोर्ट मैरिज करेंगे। वह भी हुआ। उसके बाद ससुराल भोपाल जाकर उनके रीति रिवाज यानी ईसाई धर्म के अनुसार विवाह हुआ। यानी चार बार शादी की रस्में।’ फिर हंसते हुए बोले- ‘चार बार हुई शादी कैसे टूट सकती है।’ एक समृद्ध व्यापारी का बेटा फिल्मों में कैसे, पूछने पर उन्होंने कहा, ‘व्यापार के लिए संवेदनाओं को कुचलना पड़ता है क्योंकि उसका पहला ध्येय मुनाफा है, वह मेरे से नहीं हुआ। रसायन शास्त्र की पढ़ाई में भी मन कम लगा और जहां लगा वहां आज हूं।’ उन्होंने कहा कि हरियाणवी सिनेमा को और समृद्ध बनाने के लिए हर किसी को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी।

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चीजों को संभालना, बेहतरी के परिवर्तन को होगा स्वीकारना

कलाकारों ने माना कि समय के साथ-साथ कुछ चीजें लुप्तप्राय हुई हैं तो कुछ में परिवर्तन हुआ है। फैशन से जुड़े लोगों ने जहां माना कि दामण, कमरबंद और ऐसे ही अन्य चीजों में इनोवेशन हुई है और दावा किया कि नये रूप में इन्हें स्वीकारा जा रहा है। इसी तरह हरियाणवी सांग में बहुत मोडिफिकेशन हुआ है और लूर नृत्य में शोध हुए हैं। कलाकार नामसिंह सांझी कहते हैं, 'सांग तो आठ-नौ घंटे तक चलता था। लोग भी इतने धैर्यवान थे कि डटे रहते थे, लेकिन समय के साथ आज इसे पहले दो-तीन फिर एक घंटे तक का करना पड़ा।' 'कलाकार संदीप ने कहा कि लंबे सांग में दर्शक गायब हो जाते हैं। हमने युवाओं के मन को पढ़ा और इसमें परिवर्तन किया।' उन्होंने कहा, 'छोटा सांग बड़े वर्ग को जोड़ेगा।' इसी तरह कई कलाकारों ने रसिया और अन्य नृत्यों के बारे में भी कहा कि इसमें परिवर्तन हो रहा है और युवाओं की भागीदारी सुखद अनुभूति है।

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कलाकृतियों में भी रंगों का गजब संयोजन

रत्नावली उत्सव में कला प्रतियोगिताएं भी हुईं। एक ओर जहां मझे हुए कलाकारों की पेंटिग्स की प्रदर्शनी चली तो दूसरी ओर नौजवानों ने कला के प्रति अपनी रुचि का इजहार किया। इनमें ज्यादातर प्रतिभागियों ने चटख रंग का प्रयोग किया था। वॉटर पेंटिंग, स्टिकर्स आर्ट्स, बुकमार्क्स, राइजिंग की-चेन, इयरिंग्स इंक वर्क व मुख्य रूप से एल्कोहलिक इंक मार्क्स की पेंटिंग को देखते-देखते दर्शकों का हुजूम प्रतियोगिता के तौर पर बन रही चित्रकारी पर भी अटक जाता। पास में ही बने सेल्फी पाइंट पर भी लोगों का जमावड़ा देखा गया। खासतौर पर युवा वर्ग का। चरखी दादी की रीना कहती हैं, ‘सेल्फी क्लिक करने का ट्रेंड और अलग ही स्वैग है।’

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और छा गए यशपाल शर्मा

कार्यक्रम के अंतिम दिन यानी 31 अक्तूबर को जाने-माने अभिनेता यशपाल ने समां बांध दिया। पहले उन्होंने दर्शक दीर्घा में बैठे युवा वर्ग से सीधा संवाद किया और उनकी फिल्म दादा लखमी चंद की बात शुरू होते ही युवाओं की तालियों से सभागार गूंज उठा। इस फिल्म के प्रोमो भी समारोह परिसर में चल रहे थे। इस फिल्म में जहां वह लीड रोल में हैं, वहीं उन्होंने इसे निर्देशित भी किया है। उन्होंने इसकी तैयारी में पांच साल लगाए। उनकी इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। है। उल्लेखनीय है कि दादा लखमी फिल्म पंडित लखमीचंद के संगीतमयी यात्रा पर आधारित है। जिसको हाल में ही ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ से नवाजा गया है। बताया गया कि फिल्म लगभग 300 लोगो की 6 साल की कड़ी मेहनत का परिणाम है। पंडित लखमीचंद सोनीपत के गांव जाटी से थे।

Friday, January 30, 2026

छोटे से सफर के कई हमसफर और यादें उम्रभर की...

केवल तिवारी

हर अगला पल बीता हुआ हो जाएगा, कुछ यादों को ये मन गुनगुनाएगा
आपाधापी-भागादौड़ी से सुकून थोड़ा, यादों के तिनकों को

हमने जोड़ा
कुछ अपनी सुनाई, कुछ सबकी सुनी, इस सफर पर हमने कहानी बुनी
तरोताजा हुए दिल से निकली आवाज, वादियों में बजी जिंदगी की साज

तारीख 26/01/26, दिन सोमवार। अखबारी दुनिया में कुछ छुट्टियां होती हैं जिनमें सभी साथी एक साथ कहीं आ-जा सकते हैं। दिल्ली में था तो ऐसी छुट्टियां दो ही होती थीं। एक होली और दूसरी दिवाली। इन छुट्टियों में पारिवारिक दायित्व होते थे, लिहाजा दिनभर के लिए मित्र मंडली में गपशप नहीं हो सकती थी। चंडीगढ़ में ऐसी छुट्टियां चार होती हैं। उक्त दो में दो और... एक पंद्रह अगस्त और दूसरी 26 जनवरी। अपने (दैनिक ट्रिब्यून के) संपादक नरेश कौशल जी से हम कुछ लोगों ने आग्रह किया कि इस बार गणतंत्र दिवस पर कहीं चलते हैं। काम में पूरा समर्पण और फुर्सत के पलों में खूब हंसी-मजाक को तवज्जो देने वाले कौशल साहब ने हामी भर दी और कहा कि पूरे न्यूज रूम एवं उनके स्टाफ से बात कर लीजिए। ज्यादातर लोग राजी हो गए और कुछ को जरूरी काम से बाहर जाना था। हम 17-18 लोग सुबह नौ बजे के करीब एक बस से चल पड़े कसौली के लिए। कोई शिकवा-शिकायत नहीं। कोई इधर-उधर की नहीं। सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन। किसी ने गीत सुनाया तो किसी ने चुटकुला। कोई शेर-ओ-शायरी में सिद्धहस्त दिखा तो किसी ने रामचरित मानस की चौपाइयां सुनाईं। कसौली जाना, वहां कुछ घंटे रुकना फिर देर शाम तक घर लौट आना, सारा मंजर ऐसा लगा मानो अभी कोई सपना देख रहे थे और नींद खुल गयी। एक शायर की दो लाइनें याद आ रही हैं-
तुम पर क्या बीती हमको सुनाओ, ए जाते हुए लम्हों तुम लौट के आना
यह सफर बहुत यादगार रहा। इससे जुड़ी कुछ फोटो और वीडियो साझा कर रहा हूं। सफर संबंधी उस सदाबहार शेर के साथ
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ, ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां। 






 



Saturday, January 24, 2026

परिवार मिलन की एक और भोर... साथ ले चलें आओ गांव की ओर

केवल तिवारी

संस्कारों की खास महत्ता, बूटा-बूटा, पत्ता-पत्ता।

कण-कण में भगवान हमारे, नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे।

ऋत्विक का जनेऊ संस्कार, साथ मिला पूरा परिवार।

डगर जब चली उधर, अपने गांव में पग आए धर। 

प्रिय भानजी रुचि और दामाद दीपेश का बहुत पहले फोन आ गया था कि बेटे रिशू (ऋत्विक) का जनेऊ यानी यज्ञोपवीत संस्कर है। मुख्य आयोजन 22 और 23 जनवरी को। बता दें कि उत्तराखंड में यज्ञोपवीत संस्कार भी वैवाहिक कार्यक्रम की तरह होता है। मैंने तैयारी कर ली। पत्नी भावना साथ जा नहीं सकती थी क्योंकि छोटे बेटे धवल के प्री बोर्ड चल रहे हैं। सब लोगों से मिलने का लालच और जब हल्द्वानी तक गए ही हैं तो क्यों न एक थोड़ी देर के लिए गांव भी हो लिया जाए। थोड़ी-बहुत पूजा-पाठ हो जाएगी और कुछ मिलना-जुलना। साथ में जन्मभूमि को प्रणाम। हालांकि बहुत शॉर्ट कार्यक्रम था, लेकिन रहा शानदार। 

जरूरी हैं ऐसे आयोजन : मेरा मानना है कि हो सके तो ऐसे आयोजन कर लेने चाहिए। भव्यता या नव्यता अलग बात है, लेकिन परंपरागत गीत-संगीत, अपनों से मेल-मिलाप और नयी पीढ़ी के साथ पुरानी का संयोजन। हालांकि आजकल बच्चों की परीक्षाओं, नौकरी संबंधी कई दिक्कतों के चलते उन्हें शामिल करना मुश्किल भी हो रहा है, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये उनको जोड़ लेना चाहिए। 

दीपेश-रुचि और उनका परिवार : दीपेश-रुचि को सैल्यूट है कि वह हर एक चीज का ध्यान रख रहे थे, मसलन- कब लोगों को चाय पूछना है, कब नवआगंतुक से हालचाल लेना है और कब विदाई के समय कुछ देना है। इस दौरान अस्वस्थ उनकी माताजी। बेशक शरीर से वह अस्वस्थ हैं, लेकिन मन से पूरी ऊर्जा है। हर आने-जाने वाले से ऐसे मिल रहीं थीं कि अगर सिर्फ बातचीत सुनी जाये यानी वीडियो रूप में न हो और सिर्फ ऑडियो हो तो लगे कि चलते-चलते दो लोग बात कर रहे हैं। इस सबसे इतर बटुक यानी रिशू के ताऊ-ताई सुबोध और तृप्ति का काम निभाना और मौका निकालकर नाच-गाने में शामिल हो जाना। दोनों ने समां बांध दिया। इस सबके बीच नन्हे ओम की नटखट शरारत दिल को छू लेती। कुछ फोटो और वीडियो साझा करूंगा, देखिएगा-सुनिएगा। 

दीदीयों का जन्मदिन : इत्तेफाक रहा कि 22 तारीख को विमला दीदी का जन्मदिन था। कुछ ही दिन पहले शीला दीदी का था और दो दिन बाद प्रेमा दीदी का है। हम सबने मिलकर तीनों दीदीयों का जन्मदिन मनाया। सबसे बड़ी दीदी यानी रुचि की मम्मी सितारों के उस पार से हमें देख रही थी और आशीर्वाद दे रही थी। साथ थे हम सबके प्यारे दद्दू यानी दीपेश के पापा। हमने महसूस किया उनके आशीर्वाद को। 

... और गांव की यात्रा : मेरा अपने गांव रानीखेत के पास डढूली में जाना लंबे समय से टल रहा था। एक बार लखनऊ दाज्यू लोगों से बात की, लेकिन समय का संयोजन हो न सका। इस बार मैंने ठान ली कि चलना है। मेरे जेठू यानी भावना के बीच वाले भाई साहब ने पूरा साथ दिया। उनकी कार से हम तीनों (साथ में मनोज पंडित जी) गांव होकर आये। लगा जैसे छूकर छूमंतर हुए। पहले अपने पुश्तैनी मकान पर गये। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुके घर की देहरी पर शीश नवाया। फिर आसपास विरादरों से मिले। वसंतदा घर पर नहीं थे, भाभी जी मिलीं। पनदा के यहां भाभी ने चाय बनायी। बाद में गोलथान में धूप बत्ती की। रोली, चंदन, अक्षत और फूल भाभी ने दे दिए। फिर गांव के लोगों से मिलते हुए पहुंचे धूनी यानी बंबईनाथ स्वामी के दर पर। यहां भी कुछ समय पूजा-अर्चना के बाद वापस आ गए। 

वह 103 साल की चाची : तल बाखई नरदा की ईजा से हमेशा सबसे पहले मिलन होता है। हम उन्हें चाची कहते हैं। चाची अंदाजन 103 साल की हो गयी हैं। बताती हैं कि उन्होंने मेरी ईजा की भी शादी देखी है। उनके कान और आंख के साथ पाचन शक्ति भी सही है। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें। 

कई यादों को सहेजे यह यात्रा भी सुखद रही। इन सबके बीच, काठगोदाम थोड़ी देर के लिए जाना, नेहा के हाथों चाय पीना, निर्माणाधीन घर को देखना, पहली रात उस घर से संबंधित लवली भाभी और सिद्धू के प्रयास से बने बेहतरीन और भावुक वीडियो देखना, सुरेश पांडेय जी और हेमंत पांडे एवं परिवार से मिलना वगैरह वगैरह यादें भी हैं। इस सफर की बातें तो बहुत सी हैं, लेकिन उन्हें कहानीनुमा अंदाज में अगले ब्लॉग में। कुछ फोटो और वीडियो।












Tuesday, January 13, 2026

दूसरों को चेतावनी देते -देते खुद झांसे में आ गया, गनीमत है यह फ्रॉड नहीं था... फिर भी सावधान




केवल तिवारी 

मंगलवार की सुबह एक फोन आया। दूसरी ओर से एक मैडम ने कहा कि HDFC Bank से बोल रही हूं। आपका अकाउंट हमारे यहां है। कोई issue तो नहीं है। मैंने बताया कि पिछले दिनों मैंने एक छोटी सी online payment की, उसके 28 रुपए चार्ज काट लिया। मैडम ने hold करने के लिए कहा और बताया कि आपने यानी मैंने net banking से नहीं, कार्ड से पेमेंट किया है। विश्वास के लिए इतना पर्याप्त था। इससे पहले भी जब फोन आया तो Truecaller और Airtel की तरफ से कोई अलर्ट मैसेज नहीं आया। खैर बात होने लगी। कुछ विश्वास जमने पर मैडम ने कहा कि मेरे लिए credit card offer है। लाइफ टाइम फ्री। हालांकि इस फ़्री में कितना सत्य होता है, यह किसी से छिपा नहीं। एक दिन पहले भी HDFC Bank से फोन आया था, इसी बात के लिए, मैंने मना कर दिया था। लेकिन इस वक्त पता नहीं क्या हुआ कि मैं बात करता रहा और OTP बता दिया। पहले account releted फिर आधार संबंधी। मैंने तमाम आशंकाएं जताई, लेकिन मैडम ने कहा कि आप पिन genrate करने से पहले Bank आ जाना। Satisfaction के बाद ही कार्ड का इस्तेमाल करना। इसी दौरान कार्ड apply का मैसेज आ गया। बात खत्म होने के बाद मैंने 10 बार account check किया। हम लोवर मिडिल क्लास के खाते में होता ही कितना है, लेकिन जितना भी होता है, सबकुछ होता है। मुझे याद आया अपने पुराने पड़ोसी जोगिंदर लाल जी वाला किस्सा। वह गांव गये थे। उनके पास फोन आया एक व्यक्ति का। उसने अपने आप को पंजाब नेशनल बैंक का कर्मचारी बताया और कहा कि आपने जो कार्ड के लिए अप्लाई किया है, वह बन गया है। सीनियर सिटीजंस को हम लोग घर जाकर कार्ड दे रहे हैं इसलिए आपके पास एक ओटीपी आएगा वह बता देना। जोगिंदर लाल जी ने कहा कि जो फोन बैंक से लिंक है वह तो मेरी पत्नी के पास है। वह चंडीगढ़ में है। मैं गांव आया हूं। उस व्यक्ति ने जोगिंदर लाल जी को बातों में लगाया और उनकी श पत्नी का नंबर ले लिया। थोड़ी देर में उनकी पत्नी के पास भी एक फोन आ गया। उनसे भी उसने वही ओटीपी वाली बात कही। जोगिंदर लाल जी की पत्नी मेरे पास आ गईं। बोलीं देखिए एक बैंक से फोन आया है यह ओटीपी मांग रहे हैं। आप जरा बता देना। मैंने उनका मोबाइल देखा उससे बात की और वहीं पर मेरी पत्नी भी खड़ी थी। मैंने उस कथित बैंक वाले व्यक्ति से कहा। भैया क्यों किसी को बेवकूफ बना रहे हो। किसी की गाढ़ी कमाई क्यों लूटने की कोशिश कर रहे हो। उसने मुझे इतनी गंदी-गंदी गालियां दीं कि मेरी पत्नी और व जोगिंदर लाल जी की पत्नी थी, इसलिए मैं कुछ बोल नहीं पाया। उसने फोन काट दिया। यानी पूरी तरह फ्रॉड था। अगर ओटीपी दे दिया होता तो शायद उनका अकाउंट खाली हो गया होता। आज वही घटना मुझे याद आ गई और अभी भी वही बार-बार में सिहर रहा हूं कि मैंने ऐसा कैसे कर दिया कि थोड़ी देर की बातचीत के बाद मैंने पहले बैंक का ओटीपी फिर अपने आधार का ओटीपी दे दिया। इससे पहले अनेक बार मेरे पास fraud call आ चुकी हैं। हर बार मैं सतर्क रहा। आज ऐसा कैसे हो गया। गनीमत है कि मेरी किस्मत अच्छी है कि वह फ्रॉड कॉल नहीं थी। सही कॉल थी। मैडम बैंक अधिकारी ही थीं। लेकिन मैं सभी को आगाह करूंगा कि कभी भी कृपया फोन पर ओटीपी ना बताएं बैंक वाले भी खुद ऐसा ही कहते हैं। कोई ऐसी बात हो तो आप ब्रांच जाएं। भविष्य के लिए खुद भी प्रण लेता हूं कि ऐसा कुछ होगा तो ब्रांच में जाऊंगा, लेकिन कभी फोन पर ओटीपी नहीं बताऊंगा। अब क्रेडिट कार्ड को कितना भुगतना होगा, यह तो भविष्य बताएगा। इस घटनाक्रम का मैंने office में मित्र नरेंद्र और सूरज से भी किया। उन लोगों ने भी आश्चर्य जताया। एक मित्र वीरेंद्र सिंह बोले, अभी बना लो, देखना कभी बंद नहीं कर पाओगे। बैंक वाले क्रेडिट कार्ड बंद करवाने पर नाकों चने चबवा देते हैं। जय हो। 

पत्रकारिता का मूल कभी नहीं बदल सकता, पढ़ाई के तरीके में बदलाव की दरकार, विश्व संवाद केंद्र की कार्यशाला में अनेक राज्यों से आये युवाओं से बातचीत में निकली कई बातें




केवल तिवारी

न्यू मीडिया के उभरते दौर में पत्रकारिता की पढ़ाई के तरीके में बदलाव की दरकार महसूस की जा रही है। इस बात से अधिसंख्य इत्तेफाक रखते हैं कि पत्रकारिता की मूल भावना कभी बदल नहीं सकती, लेकिन इसे समझने और समझाने का तरीका बदल सकता है। यह भी हो सकता है कि सीधे लेक्चर देने, नोट्स तैयार कराने के बजाय चर्चा-परिचर्चा के तौर पर इसे किया जाये। यानी विचारों का आदान-प्रदान हो। असल में पत्रकारिता संबंधी कई मुद्दों पर पिछले दिनों चर्चा हुई। मौका था विश्व संवाद केंद्र की ओर से पंचकूला में विवेकानंद जयंती के मौके पर आयोजित 'राष्ट्र निर्माण में नागरिक पत्रकारिता की भूमिका' विषय पर आयोजित कार्यशाला का। मुझे भी कुछ बोलने का मौका मिला। मैं पहुंचा था तो खचाखच भरे हॉल में कुछ वरिष्ठ कुछ बच्चे बैठे थे। कुछ की निगाहें आपस में टकरा रही थीं, कुछ की मेरी ओर भी थी। इसीलिए मैंने शुरुआत ही कर दी बिहारी की दो पंक्तियों से, 'कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन मैं करत हैं, भौंवन ही सो बात॥' खैर पहले कहा गया था कि मुझे मोबाइल पत्रकारिता पर कुछ बोलना है। विषय थोड़ा विस्तारित और तकनीक संबंधी था, फिर भी मैंने MoJo Journalism पर कुछ तैयारी की। बाद में कार्यक्रम के मुख्य आयोजक उत्तर क्षेत्र के प्रचार प्रमुख अनिल कुमार जी ने कहा कि चूंकि आप ब्लॉग लिखते हैं, इसलिए कटेंट राइटिंग पर फोकस्ड रहिए। मुझे मन मांगी मुराद मिली। सभागार में पहुंचा तो वहां वरिष्ठ पत्रकार एवं दैनिक ट्रिब्यून में समाचार संपादक रहे हरेश वाशिष्ठ जी, राजेश शांडिल्य जी आदि अनेक लोग मिले। बाद में द ट्रिब्यून के वरिष्ठ पत्रकार साई वैद्यनाथन भी आ गए। मैंने पत्रकारिता की मूल भावना का जिक्र किया कि जो जैसा है, उसे सही और कोट के साथ परोसिये। कोशिश रहनी चाहिए कि आप जज न बनें। कुछ स्टूडेंट्स ने कहा कि समस्या यह है कि पत्रकारिता पढ़ाने वाले आते हैं, लेक्चर देते हैं और चले जाते हैं। मेरी इस बात पर ज्यादातर लोगों ने इत्तेफाकी रखी कि कटेंट की महानता कभी खत्म नहीं हो सकती। लाख एआई का जमाना आ जाये, जो मूल कटेंट है, वह जितना शानदार होगा, वही चमकेगा। आज के युग में हर व्यक्ति पत्रकार है। सबके हाथों में मोबाइल है। मैंने जोर देकर कहा कि जब आप कोई चीज सार्वजनिक करते हैं तो आपको जिम्मेदार नागरिक बनना चाहिए। सोमालिया की वीडियो को लोग पंचकूला या चंडीगढ़ की बताने लगते हैं। कभी भी फॉरवर्ड में जल्दबाजी न करें। अपने कंटेंट में दम रखें। बातें और भी कई हुईं, समयाभाव के कारण चर्चा कम हुई, लेकिन सार्थक हुई। 

वह भाषायी दिक्कत और हीन भावना

मेरी बात खत्म होते-होते एक विद्यार्थी ने कहा, सर अंग्रेजी हम बोल नहीं पाते, हिंदी हमसे लिखी नहीं जाती। उसकी बात पर सब हंस पड़े। मैंने कहा, अपनी कमी को ही अपनी ताकत बनाओ। मैंने याद दिलाया कि अपनी बात की शुरुआत में मैंने कैसे अपने पर ही एक मजाक बनाया। असल में, अपने ऑफिस में कई बार कहता हूं मैं कोई राजनीतिक पार्टी ज्वाइन कर लेता हूं। समय-समय पर खबर छपवा दिया करूंगा, केवल का कद बढ़ा। असल में हाइट को लेकर लंबे समय तक मैं भी हीन भावना से ग्रस्त रहा। मैंने उस युवक से कहा कि आजकल देसज बोली में वीडियो सुपर हिट चल रहे हैं। देसज बोली में बुलेटिन का जमाना है। खुद से प्यार कीजिए। सीखने की ललक रखिए और आगे बढ़िये। मुझे खुशी है कि वह मेरी बात से सहमत हो गया। यह तो कार्यशाला में मेरा अनुभव था अब उस कार्यक्रम की जो खबर चली उसे देखिए...

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उस कार्यक्रम की जो खबर बनी और चली, उसे हूबहू चला रहा हूं

अच्छे कंटेंट के लिए सही माध्यम का चयन आवश्यकःअनिल कुमार

-नागरिक पत्रकारिता लोकतंत्र की रीढ़ःहरेश वरिष्ठ

-पर्यावरण से जुड़े विषयों को उठाने के लिए आज अनेक तकनीकी साधन उपलब्धःसाईं वैद्यनाथन

-व्यूज, लाइक और शेयर की रेस से बाहर निकलेंः पंकज पम्मू 

-सूचना नहीं, सच्चाई की कमी है पत्रकारिता की असली चुनौतीःराजेश शांडिल्य

-विश्व संवाद केंद्र की कार्यशाला में पांच राज्यों के युवाओं की सहभागिता

पंचकूला। विश्व संवाद केंद्र द्वारा स्वामी विवेकानंद जयंती के उपलक्ष्य में नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यशाला का विषय “राष्ट्र निर्माण में नागरिक पत्रकारिता की भूमिका” रहा। पंचकूला सेक्टर चार माधव कुंज के कांफ्रेंस हाल में आयोजित कार्यक्रम में युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि पत्रकारिता अब केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में उभर रही है।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए उत्तर क्षेत्र के प्रचार प्रमुख अनिल कुमार ने कहा कि अच्छा और प्रभावी कंटेंट स्वतः नहीं मिलता, इसके लिए सही माध्यमों का चयन आवश्यक है। उन्होंने बताया कि कंटेंट लेखन में केवल सूचना नहीं, बल्कि उसका संदेश, दृष्टिकोण और सामाजिक प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने एक्सपोज करने वाले कंटेंट, आख्यान निर्माण (नैरेटिव बिल्डिंग) और तथ्यों को प्रस्तुत करने के तरीके पर उदाहरणों सहित बताया कि कैसे एक ही तथ्य अलग प्रस्तुति में अलग प्रभाव पैदा करता है।

अनिल कुमार ने स्वामी विवेकानंद के आदर्श विचारों का उल्लेख करते हुए जातिगत भेदभाव के उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन और “स्व” के भाव पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने भाषा, भूषा, भोजन और भ्रमण में स्वदेशी और आत्मबोध की भावना को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यशाला मॉड्यूल-वन का हिस्सा है, जिसके बाद मॉड्यूल-टू और मॉड्यूल-थ्री आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने नागरिक कर्तव्यों को समझने और उन्हें पत्रकारिता के माध्यम से समाज तक पहुंचाने पर जोर दिया।

दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ ने कहा कि नागरिक पत्रकारिता लोकतंत्र की रीढ़ है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत नागरिक पत्रकारिता आज लोकतंत्र के एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभर रही है। तकनीक के विकास के साथ पत्रकारिता आम नागरिक के हाथों तक पहुंच चुकी है और अब यह बड़े मीडिया घरानों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, विकास की अनदेखी जैसे मुद्दों पर नागरिक पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि कई बार परंपरागत मीडिया इन मुद्दों तक पहुंच नहीं पाता या उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं देता।

द ट्रिब्यून के मुख्य उप संपादक एवं साहित्यकार पी. साईं वैद्यनाथन ने पर्यावरण परिवर्तन के विषय पर युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली सनातन धर्म की मूल शिक्षा है। सनातन परंपरा में प्रकृति संरक्षण के अनेक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि नागरिक पत्रकारिता में पर्यावरण से जुड़े विषयों को उठाने के लिए आज अनेक तकनीकी साधन उपलब्ध हैं। इसके बाद सनातन धर्म और पर्यावरण पर आधारित एक रुचिकर प्रश्नोत्तर सत्र भी हुआ।

विख्यात आरजे एवं कथाकार पंकज पम्मू ने कहा कि आज मोबाइल फोन के चलते हर व्यक्ति खुद को पत्रकार समझने लगा है, लेकिन स्मार्ट सिटीजन होने के नाते यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम जो भी कंटेंट लिखें, रिकॉर्ड करें या साझा करें, वह जिम्मेदारी के साथ हो। उन्होंने युवाओं से व्यूज, लाइक और शेयर की रेस से बाहर निकलने का आह्वान करते हुए कहा कि बेहतर और सार्थक कंटेंट को देर-सवेर समाज की स्वीकृति अवश्य मिलती है। 

विश्व संवाद केंद्र हरियाणा के संपादक राजेश शांडिल्य ने कहा कि नागरिक पत्रकारिता केवल मोबाइल उठाकर खबरें परोसने तक सीमित नहीं, सच्चाई से जिम्मेदारी उठाने का काम है। आज सूचना की नहीं, बल्कि सच्चाई से पत्रकारिता करने वालों की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। निडरता, सत्यनिष्ठा और दायित्वबोध के बिना खबर समाज को दिशा नहीं, केवल शोर पैदा करेगी। पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्रहित के मुद्दे सामने लाना और समाज के समक्ष सच लाना होना चाहिए। ऐसी जिम्मेदार पत्रकारिता ही समाज में विश्वास कायम कर बेहतर और जागरूक समाज के निर्माण में अपनी प्रभावी भूमिका निभा सकती है।

कार्यशाला संयोजक एवं चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी पत्रकारिता विभाग के एसोसिएट प्रो. डा.विनोद सोनी ने कार्यक्रम आए हुए अतिथियों का आभार जताने के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक विद्यार्थियों के स्वर्णिम भविष्य की कामना की।इस अवसर विश्व संवाद केंद्र सचिव राजेश कुमार,पत्रकारिता विभाग के सहायक डा.तपेश किरण,चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा.रंजन वालिया, महाराजा अग्रसेन यूनिवर्सिटी बद्दी (हिमाचल) के सहायक प्रो.डा.रवि मिश्रा कार्यशाला में प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की और नागरिक पत्रकारिता को समाज व राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बनाने का संकल्प लिया।कार्यक्रम के समापन सत्र में कार्यशाला के प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरण किये गये।