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Monday, September 14, 2026

प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय का मीडिया सम्मेलन और माउंट आबू की मेरी यात्रा

केवल तिवारी
ओम शांति। इसी संबोधन से मिलना होता है ब्रह्माकुमारीज परिसर में। प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर माउंट आबू में पिछले दिनों राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन हुआ। सम्मेलन राष्ट्रीय था, मकसद विश्व शांति था। सम्मेलन का विषय था, 'Empowered Media for Building a Better World'यानी एक बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए सशक्त मीडिया। गत नौ से 13 सितंबर तक के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में मुझे भी अपने संपादक नरेश कौशल जी ने भाग लेने का मौका दिया। मैं नौ तारीख की रात पहुंचा और 13 तारीख की सुबह चंडीगढ़ पहुंच गया। ब्रह्माकुमारीज संस्थाओं के कार्यक्रमों में बतौर रिपोर्टर तो मैं बहुत गया हूं, लेकिन तीन-चार दिनों के लिए जाना और बतौर वक्ता भागीदारी करने का यह मेरा पहला कार्यक्रम था। मुझे जिस पर बोलना था, उसका विषय था, 'सत्य, विश्वास एवं पारदर्शिता : मीडिया उत्तरदायित्व की पुनर्परिभाषा।' अनेक विद्वानों के बीच मुझे भी बोलने का मौका मिला। मैंने जो कहा, उसे तो हू-ब-हू नीचे दूंगा, लेकिन उससे पहले अपने आध्यात्मिक अनुभव का थोड़ा सा विवरण।
जिस ट्रेन से मैं माउंट आबू गया वह करीब डेढ़ घंटा लेट थी। आबू रोड स्टेशन पर नौ सितंबर की रात 9:30 बजे मैं पहुंचा। वहां से संस्थान की ओर से आई कैब से मानसरोवर स्थित मुख्य कार्यक्रम स्थल की ओर चला। रास्ते में एक सज्जन को शांतिवन में उतरना था। वहां उतरते ही मुझे सचमुच एक आध्यात्मिक तेज सा महसूस हुआ। बचपन से जिस श्लोक को पढ़ते थे, उसका अर्थ लिखा था। वही श्लोक जिसमें कहा गया है, 'विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम। पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम।' हितोपदेश के इस श्लोक को बचपन से बोलते-सुनते आए हैं, अर्थ भी जानता हूं, लेकिन इस परिसर में पहुंचकर लगा जैसे मंथन करने के लिए कहा जा रहा है। करीब दस बजे जब मानसरोवर स्थित संस्थान के प्रांगण में पहुंचा तो एक नैसर्गिक आनंद की अनुभूति हो गयी। लगा थकान तो जैसे रही ही नहीं। बीके पूनम दीदी ने बीके राजेश भाई को जिम्मेदार दी थी मुझे सबकुछ समझाने के लिए। राजेश जी वहीं मिल गये। मुझे कमरा बताया। चौथी फ्लोर तक साथ गये और ताकीद की कि फ्रेश होकर भोजन के लिए आ जाइये। कमरे में पहुंचा तो सुखद संयोग रहा कि वहां श्रीगोपाल नारसन जी मिले। उनके साथ ही मुझे रूम शेयर करना था। रुड़की निवासी नारसन भाई एडवोकेट हैं, पत्रकार हैं और लेखक हैं। अगले दिन उनकी पुस्तक का विमोचन भी सेमिनार के दौरान होना था। बातों-बातों में उनसे काफी कुछ सीखने को मिला। सुखद संयोग यह रहा कि वह हमारे सहायक संपादक अरुण नैथानी जी के बहुत पुराने मित्र हैं और पिछले साल उनकी मुलाकात संपादक जी से भी ऐसे ही कार्यक्रम में हुई थी। मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि रूम शेयरिंग अच्छे व्यक्ति के साथ हो रही है। इस सेमिनार में जितने भी पत्रकार मित्र या शिक्षाविद आए थे धीरे-धीरे उनसे मिलना-जुलना होता रहा। इस बीच बीके रामअवतार शर्मा भाई, बीके संत भाई समेत अनेक लोगों से मुलाकात हुई। जाने-माने शिक्षाविद डॉ. संजय द्विवेदी, मधुकर द्विवेदी, राणा यशवंत जी, राजेश असनानी जी, अंकुर विजय वर्गीय जी, डॉ. सारिका जी, पत्रकार सुशील शर्मा जी, रेणु शर्मा जी, दैनिक ट्रिब्यून संवाददाता सतीश जोशी जी, मित्र सुनील सौरभ के अलावा ओडिशा से आए गोविंद चंद्र, नारायण बेहरा, लखनऊ से आए संभव सोनी, मुंबई से आए पीपी पांडे आदि अनेक लोगों से बातें हुईं, मुलाकातें हुईं। कुछ लोगों से व्हाट्सएप चैटिंग हो पाई, लेकिन आमने-सामने बातचीत का मौका नहीं मिल पाया। लेकिन इस कार्यक्रम के दौरान परिसर में रहने के दौरान गजब की आध्यात्मिक शांति, अनुशासित जीवन का एक अनूठा अनुभव रहा। बीच-बीच में गायक पवन भाई के गीत, कलाकारों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम और एक सत्र में अमेरिका से आईं ब्रह्माकुमारी की प्रशासनिक प्रमुख बीके मोहिनी दीदी के सुविचार से मन प्रफुल्लित हुआ। हर चेहरे पर मुस्कुराहट, शांत भाव सचमुच भाव विभोर कर देने वाला रहा। बीके शांतनु भाई और बीके पूनम बहन का बहुत-बहुत आभार। अखबार के लिए तो एक स्टोरी अलग से करूंगा ही, लेकिन निजी अनुभव को यहां साझा करना बहुत जरूरी था। अनुभव बहुत हैं। धीरे-धीरे किस्तों में चलेंगे। यादें लंबे तक संजोकर रखने की जरूरत है। यहां अपना मूल भाषण और कुछ फोटो साझा कर रहा हूं।

मेरा मूल भाषण
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के इस प्रांगण में आयोजित इस दिव्य समारोह में पहुंचकर नैसर्गिक प्रसन्नता हो रही है। यहां उपस्थित सभी प्रमुख लोगों को प्रणाम करता हूं। मैं केवल तिवारी चंडीगढ़ से आया हूं और दैनिक ट्रिब्यून में उप समाचार संपादक हूं। मैं अपने संपादक श्री नरेश कौशल जी की ओर से आप सभी को शुभकामनाएं देता हूं। इससे पहले के एक इसी तरह के कार्यक्रम में कौशल जी ने अपने संबोधन में कहा था कि शांति स्थापना में मीडिया की आध्यात्मिक दृष्टि मददगार है। उनके विस्तृत संबोधन में हर बात बेहद महत्वूर्ण थी। उस कार्यक्रम में हमारे संपादक ने कहा था- कलम उठे तो अमन की कहानी लिखी जाये, हर एक खबर में इंसानियत दिखी जाये। मीडिया अगर ठान ले दिलों को जोड़ना, तो धरती पर जन्नत की निशानी लिखी जाये।
आज मुझे इसी दिव्य संस्था की ओर से सत्य, विश्वास एवं पारदर्शिता : मीडिया उत्तरदायित्व की पुनर्परिभाषा विषय पर अपने विचार रखने के लिए कहा गया है। इसके लिए इस संस्थान और अपने संपादक जी का दिल से आभारी हूं।
असल में मीडिया हमेशा से जनता और सत्ता को दिशा देने का सशक्त माध्यम रहा है। पहले जहां यह जनता और सत्ता के बीच में सेतु का काम करता था, वहीं आज मीडिया बहुत विस्तारित हो चुका है। अगर कहा जाए कि हर व्यक्ति आज पत्रकार है तो यह बात सच के बेहद करीब है, लेकिन संपूर्ण नहीं है। खबरों के लिए दोनों पक्षों को कोट करना होता है, लेकिन खबर अब किसी के पास भी पहले पहुंच सकती है। एक समय था जब पत्रकार के जरिये खबर सबको मिलती थी, यहां तक कि अगर किसी स्थान विशेष के लिए खबर हो तो वहां के लोग भी यह देखने को उत्सुक होते थे कि खबर छपी या नहीं। आज खबर सबके पास है। खबर चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक। जब हर व्यक्ति पत्रकार के तौर पर मौजूद है तो जाहिर है उसके स्वभाव का असर दूर तलक जाएगा। जब असर दूरगामी है तो नैतिकता और विश्वसनीयता पर ध्यान देना सर्वोपरि हो जाता है। तो इस नैतिकता और विश्वसनीयता की पहली सीढ़ी सत्य है। सत्य से ही विश्वास बढ़ेगा और जब विश्वास बढ़ेगा तो पारदर्शिता आएगी। अब बात आती है कि आज मीडिया के उत्तरदायित्व को फिर से परिभाषित करने की। जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं कि मीडिया शब्द आज बहुत विस्तारित हो चुका है। लाइक, व्यूज, कमेंट और सबसे पहले की गलाकाट लड़ाई में ऊल-जुलूल चीजों की सोशल मीडिया पर भरमार तो है ही, विश्वास और सत्य भी आज कसौटी पर हैं। गनीमत है कि उस पर नियंत्रण रखे जाने की बात सामने आ रही है और ऐसी चीजों को न देखने और संबंधित मंच से संबंधित व्यक्ति को अनफॉलो करने का ऑप्शन हमारे पास है। जब नैतिकता का यह मामला मीडिया संस्थानों के संदर्भ में देखा जाएगा तो जाहिर है इसके असर का दायरा भी बड़ा होगा।
अब बात है सत्य की, विश्वास और पारदर्शिता की। इस मामले में सबसे पहले मैं प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय और इससे जुड़े सभी लोगों का धन्यवाद करता हूं कि वे इस तरह के सालाना कार्यक्रम कर जागरूकता का काम करते हैं। सत्य के संबंध में हर पत्रकार को हितोपदेश के उस श्लोक के मर्म को जरूर आत्मसात करना चाहिए, जिसमें कहा गया है,
सत्यं माता, पिता ज्ञानं, धर्मो भ्राता, दया सखा।शान्तिः पत्नी, क्षमा पुत्रः, षडेते मम बान्धवाः॥
इसका अर्थ है- सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, धर्म भाई है, दया मित्र है, शान्ति पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है- ये छह चीज ही ही मेरे सच्चे सगे-संबंधी हैं। जिस विषय पर मुझे बोलने का मौका मिला है, वह आज के दौर में सच में बहुत गंभीर है। चारों तरफ सच्ची-झूठी कहानियों का दौर है। परोसने का अंदाज निराला है। ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गयी है। मीडिया की पुनर्परिभाषा का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हमें इसकी आलोचना ही करनी है। लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि समय के हिसाब से अपनी भूमिका यानी खबरों को परोसते वक्त हमें ध्यान रखना होगा वास्तविकता का।
आज के मीडिया का जो भी स्वरूप हो, ऐसे में बात आती है आखिर व्यावहारिक रूप में नैतिकता, सत्यता आये कैसे? ऐसे में जरूरत है आध्यात्मिक सशक्तीकरण। इस काम के लिए ब्रह्माकुमारीज जैसी संस्थाएं साधुवाद की पात्र हैं। कई दिनों के इस बेहद खास कार्यक्रम का अगर तनिक भी असर पड़े तो यह सफल है। क्योंकि कहा भी गया है- बिंदु बिंदु से सिंधु बना है। हमारी विरादरी को यह ध्यान रखना चाहिए कि सच के साथ चलें और इस बात का ध्यान रखें जैसे की एक श्लोक में कहा गया है-
कावयशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम । व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।। अर्थात बुद्धिमान और ज्ञानी लोग अपना समय काव्य (साहित्य, कविता) और शास्त्रों (ज्ञान-विज्ञान, धर्मग्रंथों) के पठन-पाठन और चर्चा-विनोद में आनंदपूर्वक व्यतीत करते हैं। इसके उलट मूर्ख लोग अपना समय बुरे व्यसनों (नशा, बुरी आदतें), अत्यधिक सोने (घोर निद्रा) या फालतू के लड़ाई-झगड़े (कलह) में बर्बाद करते हैं।
टीआरपी, लाइक और व्यूज के इस गलाकाट लड़ाई में अगर पेशेवर मजबूरी के चलते शामिल होना भी पड़े तो तो सत्य को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आपकी रिपोर्टिंग से अगर किसी का भला होता है तो यह कितनी सुकून देने वाली बात है। अखबारों, चैनलों में डेस्क और रिपोर्टिंग दो भाग होते हैं। जिम्मेदार मीडिया घरानों में खबरों की सत्यता कई स्तरों पर जांची जाती है। लेकिन जो एकल मीडिया चल पड़ा है, उन्हें ज्यादा जिम्मेदार होने की जरूरत है। एकल मीडिया से मतलब 'स्वयंभू।' खुद का चैनल, खुद ही पत्रकार और खुद संपादक या मालिक।
सोचिए, अगर आप किसी बीमार और लाचार व्यक्ति की खबर को प्राथमिकता देते हैं तो आपकी खबर के जरिये उसके लिए मदद के कितने हाथ उठेंगे। किसी गरीब बच्चे की शिक्षा के लिए बात उठाते हैं तो कितने लोग मदद के लिए आएंगे, लेकिन सोचिए अगर ऐसी ही खबरें झूठ हों और फ्रॉड के जरिये कमाई करने के लिए हों तो समाज और आत्मिक नुकसान कितना होगा। आज जेन जी और जेन अल्फा की बातें हो रही हैं। इन्हीं बातों के साथ मानवीय मूल्य, संवेदनाओं और भावनाओं की बातें भी जरूर होनी चाहिए। नशे से दूर रहने की बातें होनी चाहिए। किसी भी मुद्दे पर तस्वीर हमेशा उतनी अच्छी भी नहीं होती जितनी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाती है और उतनी बुरी भी नहीं होती जितनी भयावह दिखाई जाती है। हाल ही में नेपाल में आयी भीषण बाढ़ के संबंध में कई खबरें आईं। ऐसी भी खबरें आईं कि लूटने की मंशा रखने वालों ने लाशों को भी नहीं छोड़ा। किसी ने किसी मृत महिला के जेवर निकाल लिए तो किसी ने किसी पुरुष की जेब साफ की। ऐसी दुखद खबरों के बीच ऐसी खबरें भी आईं कि रातों-रात लोगों ने दान के जरिये अरबों रुपये जमा कर दिए। अनेक संस्थाओं के स्वयंसेवकों ने अपनी सारी जमा पूंजी पीड़ितों की मदद में लगा दी। बातों का मुख्य तात्पर्य है कि शुरुआत स्वयं से करनी होगी। खासतौर से मीडिया से जुड़े लोगों को। अगर स्वयं सुधरने की या सीखने की ललक नहीं होगी तो बात आगे नहीं बढ़ेगी।
इसीलिए तो कहा जाता है- यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं। लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय मीडिया महासम्मेलन 2026 के इस कार्यक्रम में मुझे अपनी बातें रखने का मौका देने के लिए मैं संस्थान का दिल से आभार व्यक्त करता हूं और यहां से मिली सकारात्मक ऊर्जा निश्चित ही मेरी लेखनी में भी झलकेगी। यह अच्छा संयोग है कि मैं हमेशा से सकारात्मकता का पक्षधर रहा हूं और अनेक स्कूलों में सकारात्मकता पर व्याख्यान दिए हैं। एक बार फिर से आप सभी का धन्यवाद।
साभार दैनिक ट्रिब्यून 









जानी-अंजानी सबकी कहानी

केवल तिवारी

पिछले दिनों बॉलीवुड में लेखन-निर्देशन से जुड़े शैलेंद्र झा लिखित उपन्यास 'कंबोडिया कंपाउंड' पढ़ने को मिली। इस उपन्यास को शुरू किया ही था कि खत्म होने तक छोड़ा ही नहीं। कुछ जरूरी कारणों से बीच में थोड़ा ब्रेक लिया, फिर दो-तीन दिन में निपटा दी। लगातार पढ़ते रहने का कारण बेहतरीन शैली में लिखी गयी कहानी। सस्पेंस, थ्रिल और भी बहुत कुछ। हमारे अखबार दैनिक ट्रिब्यून के संपादकीय विभाग से मुझे यह किताब समीक्षार्थ मिली। उसी पर पूरी समीक्षा यहां पेश है-

साभार दैनिक ट्रिब्यून 


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रोमांस, थ्रिल, सस्पेंस और जिंदगी की जद्दोजहद। किसी धारावाहिक या फिल्म में यह सब हो तो आप उसे देखते रहते हैं, इस जिज्ञासा के साथ कि आगे क्या होगा? कभी आपकी कल्पना के अनुरूप और कभी कल्पनातीत होती है कहानी। ठीक उसी तरह जैसे उपन्यास 'कंबोडिया कंपाउंड' में है। लेखक हैं शैलेंद्र झा। पूरा उपन्यास एक चलचित्र की तरह लगता है।

कुछ स्थानों पर सेंसरशिप की कैंची जैसी बात अगर आ जाए तो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने जैसी फिल्म। सचमुच ऐसा उपन्यास जिसे आपने शुरू किया तो खत्म होने तक रहा नहीं जाएगा। और एक बेहतरीन लेखन की तरह कहानी के अंत में एक नयी शुरुआत सी लगती हुई। सामान्य परिवार की कहानी।मियां बीवी और चार बच्चे। हर किसी की जिंदगी अलग और सपना अलग। साथ चलते कुछ अन्य किरदार, जिनमें साइबर ठगों को अपनी पूरी जमा पूंजी लुटा देने वाला पत्रकार, एक बिल्डर, अपराध का भीषण नेटवर्क चलाने वाले कुछ लोग और भी कुछ अहम पात्र। कहानी कई पड़ावों पर रुकती, उतरती, चलती जाती है। पाठक के मन में सवाल उठता है आगे क्या? कभी आशंका से मन कांप उठता है और कभी उम्मीद से दिल भर जाता है, लेकिन होता कुछ और है। बेशक इस उपन्यास का अहम किरदार असीम सबकी नजरों में नाकारा होता है, लेकिन वह तो असली 'हीरो' साबित हुआ। मजबूरी में नौकरी कर रही राधिका मजबूत बहुत है। आनंद ऑटो चलकर गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, लेकिन उनकी छोटी बेटी तूलिका के सपने बहुत बड़े हैं। इसी में साइबर ठगों की एक अलग दुनिया है। नित नए शिकार को फंसाना, लूटना। अच्छा कमाने के लिए विदेश जाना कभी कबार कितना खौफनाक हो सकता है, यह अतुल की कहानी से साफ झलक जाता है। बेहतर यही होगा की समीक्षा में भी एक सस्पेंस बना रहे। शैलेंद्र झा की रचना सचमुच बहुत बेहतरीन है उसी तरह जैसे फिल्म लेखक और निर्देशक इम्तियाज अली का एक कोट किताब के कवर पृष्ठ पर लिखा गया है, 'यह उपन्यास आपको पन्ने पलटते रहने पर मजबूर करता है और फिर रात भर जगाए रहता है‌' भाषा शैली बिल्कुल आमजन की है क्योंकि कहानी ही आमजन की है।

Monday, September 7, 2026

मेरी नज़र में फिल्म हनुमान अंश

 केवल तिवारी 

शिक्षक दिवस यानी 5 सितंबर को मैं भी फिल्म 'हनुमान अंश' देख आया। यूं तो हॉल में जाकर फिल्म देखने का बहुत कम संयोग बन पाता है, हालांकि बड़ा बेटा कार्तिक अनेक बार कहता है कि चले जाया करो पर ... 

फोटो साभार सोशल मीडिया 


खैर इस बार छोटे बेटे धवल को एक पेपर देने जाना था, साथ में उसके मामा (भास्कर) के बेटे भव्य को भी। दोनों एक ही क्लास में हैं। सुबह 8:45 बजे से इनका पेपर था। उसके मामा ने पूछा 'हनुमान अंश' देखने चलें, फिल्म चर्चा में थी सो हामी भर दी और बच्चों को पेपर के लिए सेंटर भेजकर हम दो जोड़ी चल दिए फिल्म देखने। फिल्म देखने के बाद हम इस पर कुछ चर्चा करते, व्यस्तता बढ़ गई। कुछ फोन आ गये, फिर कहीं जाना हो गया, शाम को ऑफिस चला गया। पत्नी से भी इतना ही कह पाया कि नीम करौली बाबा का जिसने भूमिका निभाई है वह तुम्हारे मोनू यानी पंचायत सदस्य रहे नवीन पांडे की तरह दिख रहे थे। असल में मोनू जी काठगोदाम के ब्यूरा गांव के सरपंच रहे हैं। मेरी भी उनसे अच्छी बातचीत है। खैर...

शाम को ऑफिस में लोगों को बताया कि मैं 'हनुमान अंश' देख आया। लोगों ने टिप्पणी जाननी चाही। मैंने कहा कि सिर्फ आस्था के नजरिए से देखना होगा तभी आनंद आएगा। इसका दूसरा भाग भी आना तय है। असल में, मैं शुरू से ही उत्तराखंड के कैंची धाम को मन में रखकर सोच रहा था, लेकिन फिल्म की समाप्ति पर कैंची धाम आया। यानी तय है कि अगले भाग की शुरुआत कैंची धाम से होगी। फिल्म देखकर नीम करौली बाबा के बारे में बहुत कुछ जानने का मौका मिला। मैं पांचवीं पास कर अपने मूल गांव रानीखेत के पास स्थित डढूली से लखनऊ आ गया था, तब से हर साल दो या तीन बार गांव आना जाना होता ही है। कैंची धाम यानी नीम करौली बाबा के साधना स्थल पर जाना होता ही था। इक्का दुक्का लोग मिलते थे। अगर बस से गये तो बैठे बैठे हाथ जोड़ लेते, लेकिन कार से जाने पर आराम से मंदिर में जाते, हाथ जोड़कर कुछ देर ध्यान करते, गुड़ और चने का प्रसाद ग्रहण करते। बिल्कुल भी भीड़ नहीं होती। भीड़ सिर्फ 15 जून के आसपास होती, जब वहां मेला लगता। करीब एक दशक पहले तक ऐसा ही था, (ब्लॉग के अंत में कुछ पारिवारिक फोटो शेयर करूंगा जो सात-आठ साल पहले के हैं) लेकिन आज वहां तिल रखने की जगह नहीं। कुछ सेलिब्रिटी के जाने के बाद तो वहां जनसैलाब उमड़ने लगा है। अच्छा है अनेक लोगों को रोजगार मिला है। हालांकि मुझे अनेक ऐसे लोग भी मिले हैं जो करिअर की दहलीज पर खड़े हैं। उनके सपने उन सेलिब्रिटी की तरह हैं जो वहां जा चुके हैं। मेरा आग्रह है कि बाबा को मन में सुमिरन कर पहले करिअर पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जो सेलिब्रिटी वहां पहुंचे हैं, वे अपनी तरक्की के चरम पर पहुंचे हैं, बाकी श्रद्धा है।

फिल्म देखते हम चार


अब थोड़ी बात फिल्म पर। पता चला कि यह फिल्म मात्र दो करोड़ में बनी है। यह रकम भी अच्छी खासी है, लेकिन आजकल जिस तरह से हजारों करोड़ में फिल्में बन रही हैं, उसके मुकाबले कुछ नहीं। फिल्म में कोई मसाला नहीं। लेकिन बनी बहुत शानदार। रोचक है कि जहां हम लोग देखने गए थे, वहां जेनजी वर्ग के लोग भी बहुत थे। महिलाओं की टोली भी। यह फिल्म शुद्ध रूप से आस्था की कहानी है, जिसमें कोई भटकाव नहीं। देखना सिर्फ आस्था के चश्मे से होगा। इसीलिए उसमें एक गीत है, ये विषय नहीं शोध का, ये बात है आत्मबोध का। चमत्कार दिखाए गए हैं, लेकिन शुद्ध चमत्कार नहीं। एक बीमार बाबा के पास आता है तो बाबा आशीर्वाद देते हैं, उससे पहले कहते हैं कि वैद्य को दिखा देना। बाबा मुस्कुराते रहने की सीख देते हैं। सारा श्रेय हनुमान जी को देते हैं। बाबा घबराने के बजाय मुकाबला करने की सीख देते हैं। बाबा को जो भक्त चमत्कारी मानना चाहता है तो बाबा कहते हैं यह तुम्हारी दृष्टि है, तुम्हारे मन में शिव हैं, मैं तुमको वैसा दिख रहा हूं। जाकी रही भावना जैसी...भक्ति में कोई किंतु परंतु नहीं, संदेश साफ देते हैं। उनकी पूजा करने वालों से भी कहते हैं नासै रोग हरे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा। फिल्म की पूरी टीम बधाई की पात्र है। वह गीत तो जुबां पर चढ़ गया है जिसके बोल हैं, मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डार दई। जै हो नीम करौली बाबा।





Friday, August 21, 2026

सात राज्यों में चुनाव : सत्ताईस में सत्ते पे सत्ता

सात राज्य चुनाव की दहलीज पर हैं। संबंधित मुद्दे पर दैनिक ट्रिब्यून में एक लेख छपा। उसकी फोटो साभार और मूल लेख





केवल तिवारी

करीब साढ़े चार दशक पहले बॉलीवुड फिल्म 'सत्ते पे सत्ता' लोगों, खासतौर से युवाओं को बहुत पसंद आई थी। सात भाइयों पर आधारित फिल्म का कथानक तो रोचक था ही, इसका गीत 'दुक्की पे दुक्की हो या सत्ते पे सत्ता, गौर से देखा जाए तो बस है पत्ते पर पत्ता... कोई फर्क नहीं अलबत्ता' सबकी जुबान पर चढ़ गया था। वह थो ती रील लाइफ, अब इस वक्त की सियासत की रियल लाइफ को लेकर आगामी 'सत्ते पे सत्ता' पर सबकी नजर है। यानी अगले साल 2027 में सात राज्यों में होने वाले चुनाव पर। युवाओं को भायी थी फिल्म सत्ते पे सत्ता और अब देशभर में यही युवा सियासतदानों की नजर में है। असल में जेनजी वर्ग (वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्म लेने वाले) चर्चाओं में है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफे के लिए मजबूर करने के बाद इन्होंने झारखंड में तो अपनी ताकत दिखाई ही, सोशल मीडिया के ज्यादातर प्लेटफॉर्म पर इन्हीं का दबदबा है। एक अनुमान के मुताबिक आगामी चुनावों में 50 से 55 फीसदी के बीच मतदाता युवाशक्ति है। ऐसे में हर सियासी दल किसी न किसी रूप में युवाओं को आकर्षित करने में जुटे हैं। उन्हीं के अंदाज में उन्हीं की बात।
गौरतलब है कि अगले साल पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। हर राज्य के अपने विशेष मुद्दे हैं। सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष, हर कोई मुद्दों को घुमाने, तोड़ने-मरोड़ने में जुटा है। कहीं उपलब्धियों का गुणगान है तो कहीं खामियों का बखान। जहां तक युवाओं के मुद्दों का मामला है, उनमें सबसे अहम शिक्षा की अच्छी व्यवस्था और रोजगार के अवसर सबसे पहले हैं। जिस जेन-जी की बात की जा रही है उनमें से कुछ तो नये वोटर होंगे जबकि कुछ ऐसे भी हैं जो वोटर पहले से हैं और गृहस्थी की दहलीज पर कदम रख चुके हैं। यानी 18 से 29 आयुवर्ग की यह जनता आगामी चुनाव में बड़ा 'खेला' कर सकती है। अगर बात करें कुल मतदाताओं में इनकी भागीदारी की, तो यह हर राज्य में अलग-अलग है, लेकिन संख्या अच्छी खासी है। पंजाब में इस आयुवर्ग के मतदाताओं की संख्या 21-22 प्रतिशत के बीच है। अगले साल की चुनावी डगर पर चल रहे दो पहाड़ी राज्यों- हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में इनकी संख्या 31 से 32 फीसदी के बीच है। उत्तर प्रदेश और गोवा की तो आधी आबादी युवा है। जाहिर है युवा मतदाताओं की संख्या भी वहां बहुत ज्यादा है। गुजरात में जेन-जी वर्ग की संख्या करीब 22 फीसदी है। मणिपुर में तो 35 फीसदी से ज्यादा मतदाता युवा हैं। इन राज्यों में चुनावी रणनीतिकार युवाओं पर विशेष नजर रख रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया आंदोलन में उभरे युवाओं के नये वर्ग में जात-पात से इतर, सीधे मुद्दों को उठाने का माद्दा है। अगर इस विचार में सत्यता है तो ज्यादातर सियासतदानों का गणित बिगड़ सकता है। लेकिन इसी विचार के उलट यह भी कहा जा रहा है कि आरक्षण का मुद्दा भले यह वर्ग नहीं उठा रहा हो, लेकिन उससे छेड़खानी या उसके खिलाफ बोलना भी किसी दल को भारी पड़ सकता है। ऐसे में पूर्व के मुद्दों के साथ ही इस वक्त राजनीतिक दलों की पूरी कोशिश युवा वर्ग को आकार्षित करने की है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल के प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से उस वर्ग के हिसाब से ही उनसे मुखातिब हुए यानी इंस्टाग्राम एवं अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो डालकर, उसे इसी संदर्भ में जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष लगातार युवाओं से संवाद कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड के देहरादून और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में राहुल गांधी की 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में सीधी बातचीत तो की ही, साथ ही ऑनलाइन 'मुझसे कुछ भी पूछो' अभियान भी चलाया। इसके साथ ही जेन-जी को लेकर प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने या तो बयान जारी किया है या कार्यक्रम चलाया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने तो संवाद कार्यक्रम भी चलाया।
अगर बात करें मुद्दों को सीधे जोड़ने की तो किसान आंदोलन से लेकर आरक्षण आंदोलन तक हर जगह युवाओं की भागीदारी ठीकठाक रही। पेपर लीक मामले को तो युवाओं ने सीधे अपने ही हाथ में ले लिया। श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में हेराफेरी पर अभी युवाओं को सीधे नहीं जोड़ा जा सका है, लेकिन इसे भी युवाओं से जोड़ने की भरपूर कोशिश की जा रही है। रोजगार युवाओं का सबसे बड़ा मुद्दा है। रोजगार के मुद्दे पर ही विपक्ष ने अग्निवीर मामले को छोड़ा नहीं है। भाजपा नीत एनडीए का दावा है कि इस योजना से युवाओं को रोजगार मिल रहा। चार वर्ष फौज की नौकरी के बाद उन्हें अर्धसैनिक बलों समेत कई राज्य सरकारों में प्राथमिकता से नौकरी मिल रही है। उधर, कांग्रेस समेत अनेक विपक्षी दल वादा कर रहे हैं कि वे सत्ता में आने पर अग्निवीर योजना को समाप्त करेंगे। उधर, गोवा में बेशक कई स्थानीय मुद्दे हावी हैं, लेकिन यहां युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने को हर दल मुहीम चला रहे हैं। मणिपुर में दो समुदायों के बीच लगातार चले हिंसक संघर्ष के बीच सियासी दल युवाओं को मुख्य धारा में लौटकर काम करने का आग्रह कर रहे हैं। युवा शक्ति हमेशा ही किसी भी देश की ताकत होती है। बदले माहौल में इस ताकत को अपनी ओर खींचने में फिलहाल राज्य स्तर पर जुटे सियासी दलों का दांव कितन सटीक बैठता है यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन सत्ताईस में सात राज्यों की सत्ता पर ये युवा सटीक निशाना लगाएंगे, यह तो निश्चित है। क्योंकि ये जेन-जी है, ये सब जानती है।

Saturday, August 1, 2026

डॉ. शमीम शर्मा जी से मुलाकात, उनकी पुस्तक का विमोचन और गरिमामयी कार्यक्रम

केवल तिवारी

हमारे अखबार दैनिक ट्रिब्यून में शमीम जी का व्यंग्य नियमित छपता रहता है। व्यंग्य के अंत में एक चुटकुले में उनके दो पात्र नत्थू और सुरजा हम लोगों के बीच अक्सर चर्चा में रहते हैं। एक बार उन्होंने किसी गंभीर विषय पर भी टिप्पणी की थी, बेशक टिप्पणी व्यंग्यात्मक थी, लेकिन विषय गंभीर था। ऐसे में उन्होंने खुद ही लिख दिया था आज कोई चुटकुला नहीं। इससे लेखक की संवेदनशीलता का पता चलता है। उनकी रचनाओं पर बात करते-करते मैंने कुछ समय पूर्व अपने संपादक नरेश कौशल जी से कहा कि कभी शमीम साहब से मिलवाइएगा। असल में मिलवाने की बात यूं ही नहीं हुई। उन्होंने अपने पिछले संपादकत्व के दौर को याद करते हुए कहा कि उन्होंने एक विशेष पुलआउट निकाला और उसमें लेखकों को आमंत्रित किया। इनमें से शमीम जी को 'चौपाल से' कॉलम में लिखने के लिए कहा। बाद में यह कॉलम 'तिरछी नजर' हो गया। मेरे मिलवाने की चर्चा पर संपादक जी मुस्कुराये और बोले कि वे शमीम साहिबा हैं। जल्दी मिलेंगे। संयोग देखिये कि इसी बीच उनकी पुस्तक 'दो बूंद सौ सवाल' के लोकार्पण के समारोह की अध्यक्षता के लिए कौशल साहब को बुलावा आया। उन्होंने मुझसे साथ चलने को कहा। कवरेज भी हो जाएगी और मुलाकात भी। कार्यक्रम बहुत लाजवाब रहा। हरियाणा भवन में आयोजित कार्यक्रम में सभी प्रबुद्धजन मिले। अनेक लोगों से बातें हुईं। सबसे अहम कि डॉ. शमीम शर्मा मैडम से बात हुई। उनके बारे में जितना जानता था, उनसे भी ज्यादा जानने को मिला। बहुत गजब संयोग रहा कि जिस पुस्तक का विमोचन हुआ, उसकी समीक्षा का दायित्व भी मुझे मिला है। पढ़ना शुरू किया है, जल्दी ही पूर्ण कर समीक्षा लिखूंगा। फिलहाल उस दिन की खबर और उसके लिंक को साभार दैनिक ट्रिब्यून यहां पेस्ट कर रहा हूं। साथ ही दो फोटो भी। शमीम जी और उनकी बहू डॉ. सरिता शर्मा जी को हार्दिक शुभकामनाएं। कार्यक्रम में हरियाणा उद्योग विभाग के आयुक्त एवं सचिव डॉ. अमित अग्रवाल जी की सहजता से हिंदी भाषा को लेकर कही गयीं बातें और प्रतीकों माध्यम से जल बचाने के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर रखे गये विचारों ने बहुत प्रभावित किया। उन्हें साधुवाद। संपादक जी ने यह विशेष मौका मिला उन्हें भी दिल से धन्यवाद।

खबर साभार दैनिक ट्रिब्यून 

भाषायी दरिद्रता के दौर में राहत देता है उत्कृष्ट साहित्य सृजन : डॉ. अमित अग्रवालडॉ. शमीम शर्मा और डॉ. सरिता शर्मा की पुस्तक 'एक बूंद सौ सवाल' का लोकार्पणचंडीगढ़, 31 जुलाई हाल के दिनों में एक आंदोलन के दौरान युवा वर्ग के कुछ लोगों की भाषा-शैली और उसमें प्रयुक्त शब्दों ने बहुत दुख पहुंचाया। लगा जैसे भाषा की शून्यता हो गयी है। भाषायी दरिद्रता का यह दौर और कितना खतरनाक होगा कहा नहीं जा सकता, लेकिन इसी दौर में राहत की बात यह भी है कि कुछ लोग साहित्य सृजन, खासतौर पर हिंदी में उत्कृष्ट लेखन कर रहे हैं। यह बात हरियाणा सरकार के उद्योग एवं वाणिज्य विभाग में आयुक्त और सचिव डॉ. अमित अग्रवाल ने कही। वह लेखिका द्वय डॉ. शमीम शर्मा एवं डॉ. सरिता शर्मा की पुस्तक 'एक बूंद सौ सवाल' के विमोचन कार्यक्रम को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता दैनिक ट्रिब्यून के संपादक नरेश कौशल ने की। कार्यक्रम में बतौर विशिष्ट अतिथि हरियाणा उर्दू अकादमी के निदेशक डॉ. चंद्र त्रिखा मौजूद रहे।  डॉ. अग्रवाल ने कहा कि अपनी भाषा पर हम सबको गर्व होना चाहिए। अलग-अलग बोलियों में ही सही हिंदी आज सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। यह बात दुखद है कि बेहतरीन साहित्य सृजन कम हो रहा है। उन्होंने कहा, 'इस किताब में पानी के सभी आयामों को जोड़ा गया है। हर आयुवर्ग को समझ आ सकने वाली है और सहज अंदाज में लिखी गयी है।' उन्होंने कहा कि हरियाणा में पानी के महत्व को समझाने के लिए कुआं पूजन जैसे अनेक कार्यक्रम जल बचाओ और स्वच्छता अपनाओ जैसे वैज्ञानिक तरीकों को प्रतीकों में समझाने के लिए होते थे। उन्होंने कहा कि बुलंदियां छू रहीं हरियाणा की बेटियों के सुखद सफर में शमीम जैसी कर्मठ कार्यकर्ता और लेखिका का भी योगदान है। पुस्तक लोकार्पण में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चंद्र त्रिखा ने डॉ. शमीम शर्मा के साहित्यिक सफर की शुरुआत को याद किया और उनकी रचनाशीलता को सराहा। इससे पहले कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत करते हुए अतिथियों के सम्मान में डॉ. शमीम ने कहा, 'तुम हमारे करीब बैठे हो, अब दुआ कैसी और दवा कैसी।' संपादक नरेश कौशल को पत्रकारिता का परचम और निर्भीक बताते हुए उन्होंने कहा, 'जहां से तेज हवाओं का आना-जाना है, कुछ भी हो चिराग वहीं जलाना है।' किताब की दूसरी लेखिका डॉ. सरिता शर्मा ने पुस्तक के बारे में संक्षेप में बताया। कुछ प्राध्यापिकाओं ने पानी से संबंधित दो गीत 'ओहरे ताल मिले नदी के जल में...' और 'पानी रे पानी तेरा रंग कैसा...' गाकर समां बांध दिया। अंत में छोटी सी बच्ची नदिया ने एक प्यारी सी कविता के माध्यम से धन्यवाद ज्ञापित किया। -

कुछ व्यक्तित्व समय की पहचान बन जाते हैं : नरेश कौशल

पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं दैनिक ट्रिब्यून के संपादक नरेश कौशल ने डॉ. शमीम शर्मा के साथ चार दशकों के सफर को याद किया। उन्होंने कहा कि उनके पहले कार्यकाल में 'चौपाल से' और अब 'तिरछी नजर' स्तंभ में वह लगातार छपती रहती हैं। व्यंग्य के इस इस कॉलम में उनके चुटकुले के दो किरदारों को उन्होंने याद किया तो सभागार में जोरदार तालियां बजीं। कौशल ने कहा, 'कुछ व्यक्तित्व अपने समय में केवल उपस्थित नहीं होते, वे अपने समय की पहचान बन जाते हैं। डॉ. शमीम शर्मा ऐसा ही एक नाम हैं, जिन्होंने शिक्षा, साहित्य, समाजसेवा और सांस्कृतिक चेतना को अपने जीवन का ध्येय बनाया। कहानी, कविता, व्यंग्य, आत्मकथा, स्त्री-विमर्श और हरियाणवी हास्य-साहित्य हर विधा में डॉ. शमीम शर्मा ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। हरियाणवी भाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान करने में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।' उन्होंने डॉ. शमीम के कृतित्व का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा, 'डॉ. शमीम शर्मा का व्यक्तित्व साहित्य तक सीमित नहीं है। सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनका योगदान समान रूप से प्रेरणादायी रहा है।'




Saturday, July 25, 2026

रील का चस्का : मूर्खतापूर्ण हरकतों में गुम होती बुद्धिमत्ता

 


परेशान करने वाली है नादानी की कहानी 

साभार : दैनिक ट्रिब्यून 

केवल तिवारी 

किसी ऐतिहासिक पर्यटन स्थल पर घूमने गए एक परिवार के बच्चों ने वहां जाने से इसलिए मना कर दिया कि उस परिसर में मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं थी। बच्चों को उसी जगह जाना पसंद था जहां वे फोटो खींच सकें, वीडियो या रील बना सकें और उन्हें अपने सोशल मीडिया मंचों पर अपलोड कर सकें। बच्चों की जिद के आगे परिवार के बड़े सदस्य नतमस्तक हो गये और बाहर से लौट आये। यह वाकया छोटा सा है, लेकिन इसके असर दूरगामी हैं। फोटो खींचने, वीडियो बनाने का यह जुनून अब अपने खतरनाक रूप की ओर बढ़ चला है। 'लाइक', 'कमेंट' और 'व्यूज' को बटोरने और उसके जरिये कमाई करने की कोशिशों में हदें पार हो रही हैं।

जिंदगी की राहों में रील बनाने का चस्का उहापोह के चौरोह पर पहुंच चुका है। आयेदिन इस चस्के के कारण जान चली जाने की खबरें तो आती ही हैं, किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे बच्चों की बुद्धिमत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कुछ समय पूर्व एक शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि अगर आप किसी खास जगह पर घूमने जाएं और वहां हर समय फोटो-वीडियो बनाने में ही व्यस्त रहेंगे तो आपको अपने इस पर्यटन की यादें बहुत समय तक नहीं रहेंगी। इसके उलट अगर आप एक बार फोटो खिंचा लें फिर उन नजारों का आनंद लें तो लंबे समय तक ये यादें आपके जेहन में रहेंगी। आप इनकी चर्चा भी अपने जानने वालों से करते रहेंगे। रिपोर्ट में इस बात का जिक्र था कि जिन पर्यटन या धार्मिक स्थलों पर फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी की मनाही होती है या मोबाइल ले जाना प्रतिबंधित होता है, वहां की यादें लोगों के जेहन में लंबे समय तक रहती हैं। आजकल बहुतायत में यह देखा जाता है कि पर्यटन पर निकले लोग फोटो खिंचाने या वीडियो बनाने में ही व्यस्त नजर आते हैं। वह अपनी यात्रा को कितना अपने मन-मस्तिष्क में संजोकर रख पाते होंगे, ये वही जानें। यह तो हो गया निजी मामला, कोई यादों को मन में सहेजना चाहे या नहीं, उन पर निर्भर करता है, लेकिन रील बनाने का चस्का अब लोगों की भावनाओं से भी खिलवाड़ करने तक पहुंच गया है। गरीबी का मजाक उड़ाया जाता है। रेहड़ी-पटरीवालों और बुजुर्गों के प्रति संवेदनशून्यता नजर आती है। स्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचाई जाती है और कई बार तो सांस्कृतिक विरासत के साथ भी बेहूदगी होती है। पिछले दिनों उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में अनेक लोगों ने ऐसी ही कुछ रील्स का सार्वजनिक तौर पर विरोध किया। मामला था 'रंगवाली पिछौड़ा' का। दरअसल, उत्तराखंड में, खासतौर पर कुमाऊं क्षेत्र में शुभ कार्यों के दौरान महिलाएं एक विशेष किस्म की ओढ़नी से सिर ढकती हैं जिसे 'रंगवाली पिछौड़ा' कहते हैं। रील्स की लत लगाए बैठे लोगों ने कुछ कुत्तों को इसे ओढ़ाकर वीडियो बनाईं। उसे अपने सोशल मीडिया मंचों पर अपलोड भी कर दिया। ऐसी रील्स का लोगों ने जमकर विरोध किया और फटाफट 'अनफॉलो' भी करना शुरू किया। ऐसे ही बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल के अनेक प्रवासी कहते हैं कि उनके यहां भी रील्स का अजीब चस्का है। बुजुर्ग दुकानदारों, सब्जी-फल बेच रहीं महिलाओं को ‘ठगा’ जाता है। ‘प्रैंक’ के नाम पर ऊल-जलूल हरकतें होती हैं। गनीमत है कि कुछ रील्स की आप संबंधित मंचों पर ही रिपोर्ट कर सकते हैं। उन्हें देखने से इनकार कर सकते हैं। अनफॉलो कर सकते हैं, लेकिन उन वीडियो का क्या होगा जो बच्चे यूं ही देखते चले जा रहे हैं। क्योंकि रील बनाने का जितना चस्का है, उससे कहीं अधिक उन्हें देखने का भी है। अनगिनत रील। कहीं बिना प्रमाण के डॉक्टरी सलाह हैं तो कहीं हंसी-मजाक। कहीं भयानक फूहड़ता है तो कहीं भद्दे चुटकुले। रील्स की इस भयावहता का अंदाजा अनेक देश लगा चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया का नाम इनमें सबसे पहले आता है जहां 16 वर्ष से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध है। ऑस्ट्रेलिया के अलावा अनेक देश भी ऐसा प्रतिबंध लगा चुके हैं या लगाने की तैयारी में हैं। इनमें से प्रमुख हैं- ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, मलेशिया, नॉर्वे, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, स्पेन, ब्रिटेन आदि। प्रतिबंध से पहले वहां शोध करवाए गए। बताया गया कि शोध अध्ययन की फाइनल रिपोर्ट में कहा गया कि सोशल मीडिया पर वीडियो देखने की लत से बच्चों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। रील्स का एक एल्गोरिदम है। आप जैसा देखते हैं, वैसी रील्स लगातार आपके पास आने लगती हैं। ऐसे में हानिकारक और हिंसक सामग्री बच्चों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है। यह नुकसान न केवल देखने में है, बल्कि बनाने में भी। एक अध्ययन में सामने आया है कि भारत के महानगरीय जीवनशैली में माता-पिता खुद अपने बच्चों को रील्स बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कई बार तो खुद भी उनके साथ शामिल हो रहे हैं। इससे उनकी पढ़ाई पर तो प्रतिकूल असर पड़ ही रहा है, वास्तविक जीवन से भी वे दूर होते जा रहे हैं। कुछ लोग खुद को सोशल मीडिया सनसनी के तौर पर मानने लगे हैं और उनको 'स्टारडम' जैसा अनुभव होने लगा है। रील्स बनाने और इस चस्के पर लगाम जरूरी है। कानूनी डंडे से ज्यादा कारगर सामाजिक जागरूकता होगी। उससे भी पहले शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। पढ़ने और करिअर बनाने की उम्र में कम से कम बच्चों को तो इस ओर जाने से रोकना हम सबकी जिम्मेदारी बनती है।

https://www.dainiktribuneonline.com/news/comment/the-story-of-ignorance-is-disturbing/

Friday, July 10, 2026

सरल, सहज और सौम्य... यादों में महावीर पंडित अंकल

केवल तिवारी


सरलता, सहजता और सौम्यता... सभी गुण किसी एक व्यक्ति में शायद ही दिखते हों, लेकिन मुझे याद है महावीर पंडित अंकल में ये तीनों बातें मौजूद थीं। इससे भी बड़ी बात थी कि वे औरों की बात भी धैर्यपूर्वक सुनते थे।

अक्सर मेरी पीढ़ी के लोगों का आरोप होता है कि हमारे बुजुर्ग सुनते नहीं, बस अपनी ही कहते चले जाते हैं। महावीर पंडित अंकल में ऐसी बात नहीं थी। ये अंकल मेरे मित्र सुरेंद्र पंडित के पिताजी। सुरेंद्र वह मित्र जिसने हम अनेक मित्रों को कुछ समय के लिए एकसाथ बसा दिया। वह कहानी लंबी और यादगार है। जब साथ रहने लगे तो जाहिर है कि मित्रों के माता-पिता से भी मुलाकात होना लाजिमी था। इस बसने और मिलने के सिलसिले को करीब तीन दशक होने को हैं। हम लोग दिल्ली के पास ही बसे गाजियाबाद के कौशांबी स्थित हिमगिरि अपार्टमेंट में रहते थे। नौवीं मंजिल पर। संघर्ष का दौर था। सभी का था, मेरा थोड़ा सा ज्यादा। कुछ समय के लिए अपनी माताजी को भी साथ ले आया था। उसी दौरान महावीर अंकल का भी आना हुआ। दोनों बातें करते थे। ज्यादातर बातें होतीं- एकादशी कब है, पूर्णमासी कब है। इस बार सोमवार को अमावस्या पड़ रही है, शनिवार को हनुमान जयंती है, वगैरह-वगैरह। बाद में हम मित्रगण अपनी-अपनी गृहस्थी में समाने लगे। लेकिन बोलचाल जारी रही। मित्र सुरेंद्र की शादी में भी मित्रमंडली जुटी। उससे पहले भी अनेक मौकों पर महावीर अंकल से मिलने का मौका मिला। आंटी से भी बातचीत होतीं, लेकिन थोड़ी-बहुत। आंटी भी करीब एक दशक पहले ही दुनिया से रुखसत हो गयीं, पिछले दिनों अंकल भी चले गये। मित्र धीरज का मैसेज देखा। फिर मैंने फोन किया और खुर्जा में उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुआ। मुझे याद है जब आंटी की अंत्येष्टि में गया था तो गमगीन माहौल के बीच अंकल लोगों को बता रहे थे कि यह केवल है, चंडीगढ़ से आया है। वह कहते थे लंबे समय तक टिकी रहने वाली दोस्ती और इसे टिकाये रहने वाले दोस्त, दोनों अच्छे होते हैं। उनकी अनेक बातें याद रहेंगी। उम्र के ऐसे पड़ाव में हम लोग पहुंच चुके हैं जब हमारे अपनों का साया उठता जा रहा है। ईश्वर अंकल को अपने श्रीचरणों में स्थान दे। ऊं शांति

Thursday, June 11, 2026

विरोधाभास के चक्रव्यू में बचत मंत्र

 साभार : दैनिक ट्रिब्यून 



केवल तिवारी

बचत करने की अर्थव्यवस्था हम भारतीयों के मूल में है। देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग तरीके की 'गुल्लक संस्कृति' है। कभी बच्चों के शादी-ब्याह के नाम पर आय का एक हिस्सा बचाकर रखना तो कभी घर बनाने के लिए बचत। छोटी-छोटी बचत अनेक बार बड़ी काम आती है। बचाने की इस प्रवृत्ति के कारण ही अनेक बार मंदी के दौर में उतना बड़ा झटका आम लोगों को नहीं लगा जितनी आशंका जताई गयी थी। नोटबंदी के दौरान गुल्लक संस्कृति काम आई। बड़े नोट बंद हुए, लेकिन छोटी-छोटी बचत वालों ने उस दौर में अपने इन छोटे नोटों से ही काम चलताया। इस बचत की संस्कृति को समझते हुए अनेक सरकारों ने भी समय-समय पर कई योजनाएं शुरू कीं। मसलन- किसान विकास पत्र, सुकन्या समृद्धि योजना, लाडो लक्ष्मी, कन्या सुमंगल, महिला सम्मान बचत वगैरह-वगैरह। 

लेकिन आज, बदले वैश्विक परिदृश्य में सत्ता के शिखर से बचत का एक अन्य मंत्र दिया जा रहा है। विदेश यात्राओं से परहेज करें। अभी आभूषण नहीं खरीदें। ईंधन बचाएं। अघोषित तरीके से सीधा संदेश यह भी है कि बचत करें। आज की युवा पीढ़ी विरोधाभास के चक्रव्यूह में फंसी है। वह घूमने-फिरने की शौकीन है। वह नये-नये कपड़े खरीदने, खानपान के नये अड्डों में जाने और आभूषणों को खरीदने की शौकीन है। यह पीढ़ी क्रेडिट कार्ड संस्कृति वाली है। जितना है, उतना तो खर्च करना ही है, उससे भी ज्यादा खर्च करने में विश्वास। यानी इस पीढ़ी को बचत की बहुत ज्यादा फिक्र नहीं है। पहले से ही खुलकर खर्च करने वाली इस पीढ़ी को लेकर रही-सही कसर आयकर प्रणाली की नयी व्यवस्था ने पूरी कर दी है। करीब 12 लाख रुपये तक कोई कर नहीं, उसके बाद बचत का कोई फायदा नहीं। पुरानी व्यवस्था में कर (टैक्स) बचाने के नाम पर ही सही, नौकरी-पेशा व्यक्ति एक सीमा तक बचत करने की कोशिश करता था। शायद इसी बहाने कुछ बच जाये। अब, चूंकि बचत योजनाओं से ज्यादा फायदा होना ही नहीं है तो उस ओर सोचना ही क्या? प्रोविडेंट फंड योजना में अभी बेसिक वेतन का 12 प्रतिशत जमा होने का प्रावधान है। इसे 30 प्रतिशत तक बढ़ा भी सकते हैं। आमतौर पर इसे सेवानिवृत्ति के लिए बचाया गया धन माना जाता है। इस बचत से पैसा निकालना कठिन होता था। अभी तक भी ऐसा ही है, लेकिन अब इसमें भी नयी व्यवस्था पर काम लगभग पूरा हो चुका है। इस बचत को भी अब सेविंग अकाउंट की तरह बनाने की कवायद चल रही है। यादी एटीएम की तरह इसमें से पैसे निकाले जा सकते हैं। नयी व्यवस्था के मुताबिक कर्मचारी को अपने नियोक्ता से मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। गौर हो कि पहले पीएफ राशि निकालना बहुत आसान नहीं था। अब नयी व्यवस्था में अपने कुल पीएफ राशि का पचास से 75 फीसदी तक सीधे निकाला जा सकता है। हालांकि बदले नियमों के तहत खाते में हर समय कुल योगदान का न्यूनतम 25 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित रखना अनिवार्य है। 

एक तरफ बचत की बात और दूसरी ओर खर्च करने के लिए इतनी छूट। आज का युवा वर्ग बचत के इस मंत्र में विरोधाभास के चक्रव्यूह में फंस गया है। चक्रव्यूह का पहला द्वार तो वे खुद ही हैं। खाओ-पीओ, घूमो-फिरो और ऐश करो की नीति। इस द्वार को किसी तरह पार कर भी लें या यूं कहें कि अपनी आदतों पर किसी तरह काबू पा भी लें तो दूसरा द्वार आयकर में अब बचत प्रावधान करीब-करीब खत्म। टैक्स स्लैब में फायदा मिलना ही नहीं है या टैक्स कटना ही है तो कोई अतिरिक्त बचत करके फायदा क्या? इसे भी पार पाने की जुगत कर ले। या बचत जरूरी है मानकर कुछ बचा भी ले तो अब पीएफ से निकासी की नयी व्यवस्था। यह तो सर्वमान्य सत्य है कि घर-गृहस्थी में रुपयों की जरूरत आयेदिन रहती है। अपनी कमाई से भी अधिक की जरूरत होती है। इस पर साधारण सा मनोवज्ञान है कि लोन आदि लेने से पहले व्यक्ति अपनी ही बचत पर नजर डालता है। ऐसे में उसे अब सबसे पहले पीएफ ही नजर आएगा। वैसे जानकार कहते हैं कि बेशक आज का युवा इससे पहले की पीढ़ी के लोगों से जरा हटकर है, लेकिन वह शेयर मार्केट, म्यूचुअल फंड और एसआईपी (सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) में दूसरी तरह से बचत करता है। हालांकि ये सब 'सब्जेक्ट टू मार्केट रिस्क' हैं, लेकिन वह जोखिम ले लेता है। इसमें कुछ पार पा लेते हैं, कुछ गंवा बैठते हैं। 'जनरेशन गैप' के तथ्यों से इतर वह भविष्य की योजनाएं भी करता है, उसका स्वरूप दूसरा होता है। उसके फोन में बचत विशेष के कई एप हैं। बदलते दौर में यह तो मानकर चलना पड़ेगा कि बेसक बचत मंत्र में विरोधाभास हो, लेकिन नयी पीढ़ी विरोधाभास के चक्रव्यूह से निकल ही जाएगी। फिर नियम भी बदलते रहते हैं, समय चक्र की तरह। विरोधाभास के इस चक्रव्यूह को तोड़ने की जरूरत पड़ी तो 'अभिमन्यु' बनकर वह बाहर आने की कोशिश कर लेगा। हां, ध्यान रखना होगा कि कहीं बाहर निकलने की तेज आपाधापी में वह अंतिम पायदान पर कहीं घिर न जाये। क्योंकि बड़ी-बड़ी कंपनियों की चकाचौंध में 'हायर एंड फायर' का ऐसा प्रावधान भी छिपा है जो पलभर में अर्श से फर्श पर ले आता है।

https://www.dainiktribuneonline.com/news/comment/a-generation-trapped-in-a-paradoxical-cycle-of-savings/

Friday, June 5, 2026

सुहागन दादी

 केवल तिवारी

रितेश और मनीष। नामों से दोनों युवा लगते हैं, लेकिन बुढ़ापे की दहलीज पर हैं। रिटायरमेंट की कगार पर। आजकल समीर के घर आए हैं। समीर इन दोनों के रिश्तेदार हैं। इन दोनों से भी उम्र में बड़े। व्यवहार मित्रवत। तीनों जब बातों का सिलसिला शुरू करते हैं तो रिश्तेदारी भूल जाते हैं और हंसी-मजाक से लेकर गंभीर मुद्दों तक खिंचती चली जाती है वार्तालाप। बीच-बीच में समीर की माताजी की भी चर्चा। रीता देवी नाम है अम्मा का। सब उन्हें अम्मा ही तो कहते आए हैं। पिछले दिनों परिवार के अनेक लोग जुटे। किसी पारिवारिक समारोह में। खूब जमीं महफिलें। इन्हीं में से कुछ साहित्य प्रेमी भी। महफिल जमी हो और साहित्य से लगाव हो और पुराने हो चले लोग हों तो महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की चर्चा होनी ही थी। उनकी रचनाओं पर चर्चा होने लगी। बीच-बीच में रितेश उन रचनाओं से किसी एक किरदार को पकड़ लेते। ईदगाह कहानी में हामिद महान है या उसकी दादी। गोदान में कौन सा पात्र सुहाता है- होरी, रायसाहब, अमरपाल सिंह,. प्रोफ़ेसर मेहता, गोबर या मालती। कभी-कभी मनीष खीझ जाता, यार इतनी गहराई से पात्रों पर क्यों जाते हो? कथानक देखो ना। बातों-बातों में सब हंस पड़ते। 

इन महफिलों के बीच-बीच में इनके आसपास के रिश्तेदारों की भी एंट्री होती। कोई अपनी कहानी सुनाता तो किसी को शेरो-शायरी से लगाव। कोई कहता, क्या यार तुम लोग कथा-कहानी में फंसे हो। पुराने गीत सुनते हैं। कभी-कबार पुराने गीतों का भी दौर चलता। इसी बीच कोई कहता कि यूट्यूब या स्पोर्टीफाई चलाने से क्या फायदा। स्टार मेकर लगाओ हम लोग खुद अपनी-अपनी पसंद के गीत गाएंगे। ऐसा नहीं कि हर बार ये चर्चाएं तभी होतीं जब सब मिल-बैठते। इन बातों का सिलसिला कभी लंबी यात्रा पर निकले हों तो भी होती या फिर कभी भी जब कुछ देर के लिए भी कहीं साथ हों। हालांकि फोन पर इन लोगों की बातचीत औपचारिकता तक ही सिमटी रहती। 

पिछले दिनों एक दिन ऐसी ही एक चर्चा में आ गया प्रेमचंद जी का महान उपन्यास गबन। रमानाथ, जालपा, रतन, जोहरा, देवीदीन, मुंशी दयानाथ, रामेश्वरी देवी, मुंशी दीनदयाल और रमेश बाबू जैसे किरदार। यहां कहानी होती अजीब है और जैसा कि कहानियों का अंत होता है, सुखांत और वही होता है। लेकिन इस चर्चा में आज समीर बहुत गंभीर होकर बैठे थे। उन्होंने एक-दो सवाल पूछे- मसलन रामनाथ आखिरकार लौट आता है न। इस कहानी की चर्चा के दौरान आज अम्मा पर वार्तालाप छिड़ जाती है। थोड़ी-थोड़ी जालपा जैसी। लेकिन अम्मा के नायक की कहानी थोड़ी उलट थी। बातों-बातों में पता चला कि अम्मा के पति भी कई दशकों से लापता हैं। उन पर गबन का आरोप लगा। आरोप सच में आरोप ही थे, हकीकत में दूर-दूर तक ऐसा नहीं था। सच्चरित्र व्यक्ति। अम्मा भी इतनी भली महिला कि आज के दौर में ऐसी महिला कल्पनातीत ही हैं। सबसे स्नेह रखने वाली। एक चलती-फिरती कहानी। चौथी अवस्था में अम्मा को अब अपने उनकी याद आने लगी है। बातों-बातों में वह फोटो की ओर देखती हैं। रितेश उन्हें कुरेदता है। वह धीरे से बोलती हैं, शायद वह जोगी बन गए हैं। हरिद्वार में होंगे। अम्मा अब कैसे पहचानोगी, रितेश तो मजाक के मूड में होता है, लेकिन अम्मा हंस-बोल लेगी, बातें करेगी, लेकिन पतिदेव के मामले में मजाक उन्हें बर्दाश्त नहीं। महान है हमारी यह धार्मिक प्रवृत्ति। हाड़तोड़ मेहनत से बच्चों को बड़ा किया। खूब संघर्ष किया। शायद कोई और महिला हो तो हर बात पर अपने पति को कोसे। लेकिन अम्मा ऐसी नहीं। वह तो चाहतीं कि वह संघर्ष और कच्ची गृहस्थी के उस दौर में चले गए थे, वह भी झूठे आरोपों पर। काश वह अब चले आएं। देखें कि उनके बच्चे कितने बड़े हो गये हैं। बच्चे ही नहीं, बच्चों के बच्चे भी बड़े हो गए हैं। घर में उत्सव सरीखा माहौल है। असल में हर कोई अपने-अपने काम और घर-परिवार में व्यस्त हैं। अम्मा का भी पूरा खयाल रखा जा रहा है, लेकिन अम्मा के अंदर एक कसक है। कोई कहता क्या पता दादाजी कहीं.... नहीं, नहीं... ऐसी बात तो बोलना भी गुनाह है। वह तो जीवित हैं। इसीलिए तो ये दादी सुहागन रहती हैं। बिंदी लगाती हैं, चूड़ी-कंगन पहनती हैं। अब तो वह बड़े आत्मविश्वास से कहती हैं कि वह उन्हें ढूंढ़ लेंगी। उनकी बातें लोगों को काल्पनिक लगतीं। हां, उनके प्रति सहानुभूति सबको होती। इन दिनों उत्सव सरीखे माहौल में यह दादी यानी अम्मा बीमार सी रहने लगी हैं। पता नहीं क्या हुआ है? लोगों से पूछती हैं, क्या मैं ठीक हो जाऊंगी। घर में कुछ दिनों बाद एक सामूहिक पूजा का कार्यक्रम है। सभी रिश्तेदारों को बुलाया है। कुछ तो आने भी लगे हैं। अम्मा कुछ खा नहीं पा रही है, लेकिन हौसले में कोई कमी नहीं है। सबसे हंस-बोलकर बातें करना। फिर धीरे से किसी-किसी से पूछना, क्या मैं ठीक हो जाऊंगी। अम्मा जीवट हैं। सभी कहते कि उनकी जीवटता ही उनको लंबी आयु देगी, नहीं तो डॉक्टर तो कह चुके हैं कि वह कुछ ही दिनों की मेहमान हैं। जब ऐसी बातें होती हैं तो फिर बीमारी का नाम क्या लेना। घर में सलाह-मशविरा हुआ और सामूहिक पूजा का कार्यक्रम कुछ ही दिनों बाद तय कर दिया गया। अम्मा को कहा गया कि बाद में रिश्तेदारों के बच्चों की परीक्षाएं हैं। सरल और सहज स्वभाव की अम्मा इस बात को मान गयीं। चहल-पहल देखकर वह बहुत खुश होती हैं। अपनी बहू यानी समीर की पत्नी से भी बेटी जैसा नाता रखती हैं। बहू भी ऐसी कि अम्मा की हालत पर बार-बार आंसू निकाल दे। सब समझाते, इलाज तो करा ही रहे हैं। बाकी ईश्वर को जो मंजूर हो। वह भरसक प्रयास से अम्मा के साथ मुस्कुरातीं, लेकिन उनकी हालत पर किसी भी रिश्तेदार के सामने रो देतीं। ननद के साथ तो अक्सर रोना-धोना हो जाता। ननद भी तो मां की तबीयत के कारण पुणे से एक महीने में चार बार आ चुकी हैं। आज पूजा-पाठ संपन्न हो गयी। सब अपने-अपने घरों को चले गये। समीर के आसपास के रिश्तेदार अब लगभग रोज आने लगे। अम्मा का हालचाल लेने। हालांकि कोशिश रहती कि उन्हें कुछ न बताया जाये। समय-समय पर दवा देते रहते और कहते कि सब ठीक होगा। हालांकि अम्मा अब कुछ-कुछ समझ रही हैं। हर कोई क्यों आ रहा है। मेरे पास इतनी देर क्यों बैठ रहा है। फिर खुद ही तसल्ली देतीं कि अच्छा तो है। इन सबके साथ हमने कितना समय बिताया। इन दिनों यह अम्मा यानी सुहागन दादी, दादाजी के बारे में कुछ ज्यादा ही रट लगाने लगी हैं। इस बात के कई अर्थ लगाए जा रहे हैं। अब रिश्तेदारों की बातचीत में साहित्य कम और अम्मा की कहानी ज्यादा होने लगी है। 

आज... आज... ओह... वही हुआ जिसकी आशंका थी, लेकिन हर कोई यकीन नहीं कर रहा था...। मुस्कुराती दिखने वाली दादी शांत। आंखें मूंद ली। सदा के लिए। हमेशा के लिए।  दादी की आंखें बंद होते वक्त पूरा परिवार साथ था। वही नहीं थे जो अक्सर उनसे उनकी पुरानी बातों की यादों को ताजा कर दिया करते थे। दादी की विदाई की तैयारी हो गयी। अंतिम विदाई। कैसे विदा करें? सुहागन के रूप में। वह तो हमेशा से खुद को सुहागन ही मानती रही हैं। पूरा शृंगार। 'सुहागन दादी' को ले जाया गया। इस बार डोली कहां... पता नहीं दादाजी वहीं इंतजार कर रहे हैं या बाद में जाएंगे। रिश्तेदारों के बीच चर्चाएं तो अब भी हैं, लेकिन अब खिलखिलाहट कम है। कभी-कबार दादी की पुरानी बातें याद करते हैं तो कुछ हंसी आ जाती है। वह दादी रुलाने वाली थोड़ी थीं, वह तो हंसमुख थी। 'सुहागन दादी' को प्रणाम। क्या पता उनको दादाजी भी मिल ही गये हों।

Thursday, May 28, 2026

उनको ये रंज था कि शोहरत नहीं मिली जमाने से... बशीर बद्र साहब को नमन

केवल तिवारी

बशीर बद्र साहब को नमन। उनका जिक्र अपने कई ब्लॉग में भी मैंने पहले किया है। आज पुराना दौर याद आया। असल में वह दौर था जब हम अनेक मित्रों की बातें शेर-ओ-शायरी में होती थी। पुस्तक मेलों से उनकी रचनाओं की किताबें तो जरूर खरीदीं जातीं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निधन के बाद उनके एक शेर को अक्सर हम लोग कहते थे, जिसके बोले थे-

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नये मिजाज का शहर जरा फासले से मिला करो। 

जब बातें होती थीं तो उनके एक इंटरव्यू का भी जिक्र होता था। एक जगह उन्होंने कहा था कि आज शोहरत और दौलत उम्र के ऐसे पड़ाव में मिली जब उसका बहुत ज्यादा आनंद नहीं लिया जा सकता है। बताया जाता है कि जब बद्र साहब 65 पार के हुए उसके बाद यकायक उनकी शेरो-शायरियां खूब प्रचलित होने लगीं। 

इंटरने पर मिली जानकारी के अनुसार बद्र साहब का पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। कहा जाता है कि उर्दू में पढ़ाई करने वाले बशीर साहब की कई रचनाएं मेरठ दंगों में नष्ट हो गयीं। इस वाकये ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। वर्ष 1935 में जन्मे बद्र साहब को 1999 में भा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इसी साल उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। शायरियों में आम प्रचलन की भाषा के इस्तेमाल के लिए जाने जाने वाले बशीर साहब की गजलें युवाओं की जुबां पर होती थीं। वर्ष 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के दौरान उन्होंने दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हों जैसी कालजई पंक्तियां लिखी थीं। कहा जाता है कि मीर तकी मीर की गजलों की तरह बद्र की गजलों में भी अत्यधिक समकालीन उर्दू थी लेकिन उसे आसानी से समझा जा सकता था इसलिए लोग इसे सराहते भी थे। उनकी कुछ उत्कृष्ट कृतियों ने व्यथित प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में काम किया और जीवन के रहस्यों को भी व्यक्त किया। बशीर साहब की 69 गजलों का संग्रह 'आस' को उनकी चर्चित कृतियों में गिना जाता है। उनका एक अन्य संग्रह, जिसका शीर्षक 'कुल्लियते बशीर बद्र' है, पाकिस्तान में प्रकाशित हो चुका है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने सात साल की कम उम्र में कविता लिखना शुरू कर दिया था। बद्र साहब को समर्पित एक वेबसाइट के मुताबिक वह अपने कई गीतों में उर्दू की कोमलता को अंग्रेजी उच्चारण में घोल देने में अग्रणी थे। जानकारों के मुताबिक बशीर बद्र की गजलों में शब्द व संवेदना की सतह पर ताजगी, काव्यात्मकता और सौंदर्य हुआ करते थे, जो उन्हें दूसरे शायरों से अलग करती थी। उन्होंने उर्दू में सात से अधिक कविता संग्रह और हिंदी में एक कविता संग्रह प्रकाशित किया। उनके प्रमुख गजल संग्रहों में इकाई, इमेज, आमद, आस, आसमान और आहट शामिल हैं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनके चाहने वाले उन्हें अमेरिका, दुबई, कतर और पाकिस्तान सहित दुनिया भर के विभिन्न मुल्कों में आमंत्रित किया करते थे। 

बशीर साहब की कुछ शायरियों का जिक्र तो अक्सर किया जाता है। उनमें से कुछ इस तरह से हैं- 


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो। न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए


दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों


न जी भर के देखा न कुछ बात की। बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की


हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा


यहां लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं, मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे। 


तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा। मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा। 


मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला। अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला


इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी। लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे


पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला। मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा


मैं बोलता हूं तो इल्ज़ाम है बग़ावत का। मैं चुप रहूं तो बड़ी बेबसी सी होती है


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में। तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है। तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा


काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के। दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया


शबनम के आंसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ। आंखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ


है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है। कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है


बशीर बद्र साहब का बृहस्पतिवार 28 मई, 2026 को 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनको नमन।

साहित्य और लेखन की बात : बैठक, तीन दशक से सिर्फ चर्चा... अब चंडीगढ़ में देखी भव्य शुरुआत @ Writer's Forum

केवल तिवारी

चंडीगढ़ आए हुए मुझे धीरे-धीरे डेढ़ दशक होने को है। दैनिक ट्रिब्यून में आकर यहां भी डेस्क की नौकरी के साथ-साथ कुछ-कुछ कवरेज के लिए भेजा जाता रहा। इस दौरान रचनाधर्मिता की बातें भी होतीं। कभी ऑफिस में और कभी ऑफिस के बाहर। बातों-बातों में कुछ लोगों ने अपनी रचनाएं पढ़ने को दीं। कुछ ने थोड़ी-बहुत मेरी भी सुन लीं। फिर मैंने बताया कि वर्ष 2000 के आसपास हम कुछ साहित्य प्रेमियों ने गाजियाबाद में 'बैठक' की शुरुआत की थी। हम लोग आपस में पूछते थे कि अगली बैठक किसके घर है। वहां अनेक वरिष्ठ लेखक आते थे। एक-दो बार मुझे भी अपनी कहानी सुनाने का मौका मिला। मैंने उस वक्त आइडिया दिया कि इसे ऑनलाइन मंच पर भी लाया जाये। मैंने शुरुआत भी की। लेकिन देखा कि एक बार मेरी कहानी पर जब कुछ साथियों ने आलोचनात्मक टिप्पणी की तो एक-दो वरिष्ठ लोगों ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। उनका इनकार मुझे दुत्कार जैसा लगा। मेरा कोई ऐसा बैकग्राउंड नहीं। कोई गॉड फादर नहीं। मैंने उन्हीं लोगों में से अनेक को सुना है एक युवा लेखक की बेहद तारीफ करते हुए। ये लोग तारीफ में भी बैकग्राउंड या भविष्य की संभावनाएं देखते थे। मुझे वह इनकार चुभ गया। मैं धीरे-धीरे से बैठक से दूर हो गया। कुछ दिनों बाद पता चला कि बैठक ज्यादा नहीं चल पाई। बैठक आगे न बढ़ पाने का तो मुझे बेहद दुख हुआ, लेकिन यह विचार मुझे बहुत पसंद आया। चंडीगढ़ आकर यहां भी अनेक लोगों से चर्चा की। उनमें से कुछ बहुत बुजुर्ग हो चुके हैं। एक महिला साहित्यानुरागी की तो असमय मौत ही हो गयी। यहां मैंने भी यह राय रखी। अनेक लोगों ने सहमति भी जताई। मैंने यह भी आइडिया दिया कि अगर इसे 'मॉनीटरी' कर दें। यानी आर्थिकी से जोड़ दें तो बहुत अच्छा रहेगा। जैसे हर माह सौ, दो सौ रुपये भी जमा करते रहें। और जरूरी हो तो उस पैसे को आपस में ही लोन की तरह बांटे। ब्याज फिक्स कर दें। साल के अंत में उस ब्याज से या तो कोई कार्यक्रम कर लें या आपस में बांट लें। ऐसा करने से जुड़ने का एक और कारण बन जाएगा और आर्थिकी कई बार बड़ा काम कर जाती है। कुछ लोगों ने कहा कि हर महीने प्रेस क्लब मिल लिया करेंगे। खैर... बातें होती रहीं। अनेक लोग सेवानिवृत्त हो गये। जीवन की आपाधापी में सब खो गये। मैं भी। जो थोड़ा बहुत लेखन का कीड़ा था उसे अपने ब्लॉग ktkikanw-kanw.blogspot.com पर लिखता रहा। थोड़ा बहुत मौका मुझे अखबार में लिखने का भी मिलता रहा। जीवन चलता रहा। इस बीच 27 मई, 2026 को ट्रिब्यून चौक के पास नोवोटेल (NOVOTEL Hotel)में एक कार्यक्रम कवर करने के लिए संपादक जी द्वारा भेजा गया। वहां जाकर देखा कि 'राइटर्स फोरम' की जो भव्य और दिव्य शुरुआत इस सिटी ब्यूटीफुल में हो रही है, वह तो करीब तीन दशक पुराना हमारे जैसे लोगों का भी आइडिया था। खैर इस कार्यक्रम में गया तो उनकी बातें अच्छी लगीं। बातें तो हमेशा ऐसी अच्छी ही होती हैं। वह धरातल पर कितना उतर पाएगा, यह देखने वाली बात है। इस कार्यक्रम की पीआर एजेंसी द्वारा भेजी गयी प्रेस विज्ञप्ति और फिर मेरे द्वारा लिखी गयी खबर को नीचे हू-ब-हू पेस्ट करूंगा। साथ में साभार : dainiktribuneonline.com का लिंक भी। 

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अच्छी लगी हिंदी की बात

जैसा कि होता है, Elite Class हमेशा अंग्रेजी से अपनी शुरुआत करता है। यहां भी वैसा ही दिखा। फिर एक नयी शुरुआत देखी कि हर किसी से अपना परिचय देने को कहा गया। मेरी भी बारी आई। मैंने थोड़ा आश्चर्य जताते हुए एक लाइन में अपना परिचय दिया। फिर सवाल-जवाबों का दौर चला। बात जब रचना सुनाने की आई तो ज्यादातर लोगों ने हिंदी में ही सुनाई। एक दो लाइन का बेहद भावुक शेर पंजाबी में भी सुनाई दिया। फिर तो हिंदी में ही चल पड़ा सारा मंजर। अनेक भाषाओं का आना बहुत अच्छी बात है। लेकिन मां भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त करना शायद ज्यादा आसान होता है। अंग्रेजी को फैशन के तहत अपनाना थोड़ा अजीब दिखता है। यहां पर एक बहुत पुराना किस्सा याद आ रहा है। एक वरिष्ठ पत्रकार का बेटा हिंदुस्तान में एक बार मिला। उससे हम लोगों ने ऐसे भी पूछ लिया कि क्या तुम भी पत्रकारिता में आओगे। उसने कहा, हो सकता है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में तो कतई नहीं। बाद में मेरे एक सीनियर बोले, देखो हिंदी पत्रकारिता में इनके पिता का इतना नाम है, उसी से परिवार चल रहा है, लेकिन ये सज्जन मना कर रहे हैं। आज वह बच्चा काफी बड़ा हो गया है और मीडिया में ही है, हिंदी मीडिया में। रचनाएं भी लिखता है हिंदी में। खैर... आप जितनी भाषाएं जानते हैं ये आपकी योग्यता है। कहीं भी जाएं जिस भाषा में सहज हों, उसे अपनाएं। 


लेखक मंच की वह योजना

इस कार्यक्रम की कवरेज के दौरान मुझे अपने समय के वरिष्ठ साहित्यकार रहे भीमसेन त्यागी जी की याद आई। एक बार आकाशवाणी के कार्यक्रम में एक बातचीत कार्यक्रम के लिए टॉलस्टॉय के 'वार एंड पीस' पर उनसे कुछ जानने के लिए गया था। माध्यम बने मित्र अनुराग। अनुराग भी साहित्यानुरागी हैं। अपना यूट्यूब चैनल भी चलाते हैं। तब त्यागी जी ने कहा था कि मेरा सपना है लेखक मंच बनाने का। मंच ही नहीं, लेखक गांव बनाने का। जहां रचनाशील लोग अपनी कलम से बेहतरीन रचनाएं सृजित करें। बाद में उन्होंने लेखक मंच के नाम से पत्रिका भी निकाली। मेरे भी कुछ संस्मरण उसमें छपे। बाद में त्यागी जी दुनिया से रुखसत हो गये। आर्थिक तंगी आई। वह सपना पूरा नहीं हो पाया, लेकिन अनुराग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसे जिंदा रखे हुए हैं। अभी तो कुछ बाध्यताएं हैं, लेकिन भविष्य में उसके साथ पूरी तरह जुड़ुंगा। 


कुछ सरकारें भी कर रही हैं ऐसा... लेकिन

लेखकों के लिए विशेष ग्राम यानी लेखक ग्राम की जिस सपने की बात मैंने ऊपर की थी, उसकी एक शुरुआत उत्तराखंड में हुई है, लेकिन उसमें भी अनेक किंतु-परंतु हैं। सवाल चाहे जो भी हों, लेकिन शुरुआत तो हुई है। बताया जा रहा है कि दक्षिण के कुछ राज्य भी ऐसा करने की योजना में हैं। कुछ राज्य बेहतरीन साहित्य को आंचलिक भाषा में अनुवाद कराने की भी योजना को सिरे चढ़ाते दिख रहे हैं। हालांकि अनुवाद का काफी काम अब कृत्रिम मेधा यानी artificial inteligence AI के जरिये होने लगा है लेकिन साहित्य की आत्मा को बचाये रखने के लिए इसे साहित्यकारों के जरिये ही करवाया जाना चाहिए। 

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अब वह खबर जो Writer's Forum की तरफ से बतौर रिलीज भेजी गयी। उसके बाद मेरी खबर साभार : Dainik Tribune और कुछ फोटो। 

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प्रेस विज्ञप्ति

राइटर्स फोरम (डब्ल्यूएफ) का अनावरण: साहित्यिक अभिव्यक्ति और समावेशी रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देने का उद्देश्य

मौलिकता, लोकतांत्रिक भागीदारी और सार्थक साहित्यिक जुड़ाव को प्रोत्साहित करने के लिए नया मंच

• संस्थापक और मुख्य सदस्यों की परिकल्पना — एक जीवंत समुदाय जहाँ हर लेखक को अपनी आवाज और अपनापन मिले

चंडीगढ़, 27 मई 2026: एक नए साहित्यिक समूह राइटर्स फोरम (डब्ल्यूएफ) का औपचारिक शुभारंभ चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र और उससे आगे के साहित्यिक समुदाय के लिए किया गया। इसका उद्देश्य लेखकों, कवियों, आलोचकों और साहित्य-प्रेमियों के लिए एक समावेशी, बौद्धिक रूप से समृद्ध और लोकतांत्रिक मंच तैयार करना है।

जहाँ शब्दों को अपनी आवाज़ मिले, जहाँ लेखक अपने समुदाय से मिलें’ — इस मूल विचार पर स्थापित यह मंच लोकप्रियता या सामाजिक प्रभाव की सीमाओं से परे जाकर प्रामाणिक साहित्यिक अभिव्यक्ति और सार्थक रचनात्मक सहभागिता को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

यह मंच प्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका सुधा अग्रवाल के नेतृत्व में स्थापित किया गया है। प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने कहा कि इस फोरम की स्थापना ऐसे साहित्यिक वातावरण की आवश्यकता से हुई, जहाँ लेखकों का सम्मान उनके विचारों की ईमानदारी और अभिव्यक्ति की शक्ति के आधार पर हो, न कि बाहरी मान्यता या सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर।

उल्लेखनीय है कि सुधा अग्रवाल का कविता-संग्रह हिरायथ वर्ष 2023 में टैगोर थिएटर में लॉन्च किया गया था। उनकी कविता-पुस्तक पर आधारित एक पिक्चर सहगल हाउस को द नैरेटर्स आर्ट सोसाइटी द्वारा रूपांतरित भी किया गया।

उन्होंने कहा कि राइटर्स फोरम केवल एक और साहित्यिक समूह नहीं है। यह एक गंभीर प्रयास है — ऐसा रचनात्मक समुदाय बनाने का, जहाँ लेखक निर्भय होकर स्वयं को व्यक्त कर सकें, सार्थक भागीदारी निभा सकें और संवाद तथा पारस्परिक सम्मान के माध्यम से सामूहिक रूप से विकसित हो सकें।

फोरम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह मंच उभरते लेखकों को आत्मविश्वास और गरिमा के साथ आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करेगा, बिना किसी भय या दबाव के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करेगा, मौलिकता और वास्तविक प्रतिभा को संरक्षित करेगा, प्रत्येक सदस्य को नेतृत्व के अवसर देगा और गंभीर सुनवाई तथा सार्थक संवाद के माध्यम से सम्मानजनक साहित्यिक सहभागिता सुनिश्चित करेगा।

फोरम का उद्देश्य लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर कार्य करना भी है, जहाँ निर्णय सामूहिक रूप से बहुमत की सहमति से लिए जाएँगे ताकि पारदर्शिता और समान भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

प्रख्यात लेखिका, साहित्यिक आलोचक और पूर्व अंग्रेज़ी के प्रोफेसर डॉ. मंजीत कौर ने कहा कि आज के तेज़ी से बदलते साहित्यिक परिवेश में ऐसे मंचों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है । राइटर्स फोरम अर्थपूर्ण साहित्यिक संवादों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेगा।”यह उल्लेखनीय है कि डॉ. कौर को लिटरेरी एक्सीलेंस अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है तथा उन्हें वर्ष 2018 में दुबई में अंतरराष्ट्रीय पहचान भी प्राप्त हुई थी।कवयित्री, शिक्षाविद् और नेशनल डेंटल कॉलेज, डेराबस्सी में प्रोस्थोडोंटिक्स विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अनु गिरधर ने कहा कि कोई भी साहित्यिक मंच तभी सार्थक बनता है जब वह लोगों को अपनी रचनात्मक आवाज़ खोजने की प्रेरणा दे। यह पहल ऐसा ही वातावरण तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है ।डॉ. गिरधर पाँच कविता पुस्तकों की लेखिका हैं और उन्हें वर्ष 2022 में रवीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है।वर्डस देट विस्पर की लेखिका तथा अमैरा मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में डायरेक्टर (ऑपरेशंस) सीमा शर्मा ने कहा कि साहित्य वहीं फलता-फूलता है जहाँ संवेदनशीलता, गंभीर सुनवाई और सम्मानजनक संवाद को पोषित किया जाता है। हमारा प्रयास ऐसा मंच तैयार करना है जहाँ लेखक केवल अपनी रचनाएँ साझा न करें, बल्कि एक-दूसरे की यात्राओं और दृष्टिकोणों से वास्तविक रूप से जुड़ सकें प्रेम, विरह और मानवीय भावनाओं की काव्यात्मक अभिव्यक्तियों के लिए प्रसिद्ध चंडीगढ़ के कवि और उपन्यासकार संजीव बंसल ने कहा कि “साहित्य मौन को भाषा देता है और मानवीय संवेदनशीलता को गरिमा प्रदान करता है।” उनके अनुसार दृश्यता और मान्यता की दौड़ में मौलिकता अक्सर दब जाती है। राइटर्स फोरम लेखकों को यह याद दिलाने का प्रयास करेगा कि स्थायी साहित्य ईमानदारी, गहराई और जीवन के वास्तविक अनुभवों से जन्म लेता है। फोरम की योजना नियमित साहित्यिक सत्रों, कविता-पाठ, चर्चाओं, कार्यशालाओं और संवादात्मक कार्यक्रमों के आयोजन की है, जिनका उद्देश्य क्षेत्र और उससे बाहर के लेखकों के बीच रचनात्मकता, सहयोग और बौद्धिक विकास को प्रोत्साहित करना होगा।

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और जो मैंने खबर छापी  साभार दैनिक ट्रिब्यून 

आभासी और जुगाड़ू दुनिया के तिलिस्म से मौलिकता को बचाने की कवायद

चंडीगढ़ में 'राइटर्स फोरम' की औपचारिक शुरुआत

केवल तिवारी/ट्रिन्यू

चंडीगढ़, 27 मई हिंदी में रचनाशीलता की बात। पंजाबी, अंग्रेजी और उर्दू साहित्य की बात। बात पुराने 'कॉफी हाउस चर्चा' की, जहां बैठकर लेखक लोग कहानी, कविता और अन्य विधाओं की रचनाओं पर समालोचनात्मक टिप्पणियां कर सकें। बात आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के दौर में मौलिकता की। बात प्रोत्साहन की भी। बात 'जुगाड़ू' दुनिया से इतर मेहनत की। ये सारी बातें हुईं चंडीगढ़ में एक नये साहित्यिक समूह 'राइटर्स फोरम' (डब्ल्यूएफ) के औपचारिक शुरुआत के मौके पर। फोरम का उद्देश्य साहित्य प्रेमियों और रचनाधर्मिता के लिए मंच प्रदान करना है। दावा है कि यह ऐसा मंच होगा जो 'घेराबंदी' से मुक्त होगा। फोरम में फिलवक्त 30 प्रतिष्ठित लोग जुड़े हैं, जो अपने विभिन्न माध्यमों से किसी भी रचनाशील व्यक्ति की कृति को हजारों लोगों तक पहुंच मुहैया कराएंगे। कवयित्री और लेखिका सुधा अग्रवाल के नेतृत्व में स्थापित इस फोरम की खास बात होगी कि यहां मौलिकता को ही प्राथमिकता दी जाएगी और नवोदित लेखकों की हर संभव मदद की जाएगी। सुधा का कविता संग्रह हिराएथ आ चुका है और इसका नाट्य रूपांतरण भी हो चुका है। फोरम से जुड़ीं लेखिका, आलोचक एवं अंग्रेजी की प्रोफेसर रहीं डॉ. मंजीत कौर ने कहा, 'राइटर्स फोरम अर्थपूर्ण और भावपूर्ण लेखन को सार्थक मंच देगा।' लिटरेरी एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित डॉ. कौर ने कहा कि मूल लेखन आज की जरूरत है। कवयित्री, शिक्षाविद और नेशनल डेंटल कॉलेज, डेराबस्सी में प्रोस्थोडॉन्टिस विभाग की अध्यक्ष डॉ. अनु गिरधर ने सीखने और सृजनशील बनने की जरूरत पर बल दिया। डॉ. अनु की पांच किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ख्यात कवयित्री एवं लेखिका लिली स्वर्ण ने कहा कि मौलिकता अपना स्थान स्वयं बना लेती है। 

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मासिक गोष्ठियों में मोबाइल बैन :मंचासीन फोरम सदस्यों ने कहा कि सार्थक चर्चा के लिए हम लोग मासिक गोष्ठियों में मोबाइल बैन कर देते हैं। उन्होंने कहा कि आज कुछ लोग पुरस्कारों, चर्चाओं के इर्द-गिर्द होते हैं। समय आने पर ऐसी चौकड़ी से बाहर निकलकर वास्तविक लेखकों के लिए उनका फोरम पुरजोर मेहनत करेगा। उन्होंने कहा कि फोरम से कोई भी जुड़ सकता है, बस संवेदनाओं के साथ अपनी रचनाशीलता होनी चाहिए। फोरम फिलहाल देश के विभिन्न कोनों से साहित्य प्रेमियों से जुड़ा है। आगे चलकर इसे वैश्विक बनाने की कोशिश रहेगी।