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Thursday, May 19, 2022

घुमंतू जनजातियां... बात सिर्फ इतनी सी नहीं है

 केवल तिवारी

घुमंतू जनजातियों के बारे में आप कुछ जानते होंगे। शायद यह भी कि अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें और भी कई उपनामों से जाना जाता है। हो सकता है इतिहास खंगालने की कोशिश में आप कुछ और जान गए होंगे, लेकिन इन सबसे भी इतर इनके बारे में कई बातें हैं। कुछ पुराने समय की और कुछ वर्तमान की। ज्यादातर बातें हैं रौंगटे खड़े करने वालीं। इनके संबंध में पिछले दिनों एक अनौपचारिक परिचर्चा में चर्चा हुई। घुमंतू जनजातियों के जीवन के संबंध में लंबे समय से काम कर रहे अनिल जी ने बताया कि अंग्रेजों ने इनके संबंध में कड़ा कानून बनाया। इन्हें अपराधी घोषित किया गया। किसी व्यक्ति को जन्म से ही अपराधी मानने वाली अंग्रेजी मानसिकता का यह जहर आजाद भारत में भी बहुत लंबे समय तक चलता रहा, बल्कि यूं कहें कि अब भी कई जगह है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कुछ जगह इनकी स्थिति सुधारने की कोशिश हुई। इस कोशिश में अंग्रेजों के जमाने का वह कानून तो हटाया गया जिसमें इन्हें जन्मजात अपराधी घोषित किया गया था, लेकिन इन्हें आदतन अपराधी बताया गया। इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि घुमंतू जनजाति के इन लोगों को पुलिस जब-तब पकड़ लेती। कई जगह तो हद ही हो गयी। अपराध कोई और करता, लेकिन जब पुलिस किसी को पकड़ने में फेल रहती तो इनके समाज से किसी व्यक्ति को अरेस्ट कर लिया जाता। अनिल जी ने बताया कि लंबे प्रयासों के बाद हरियाणा में इनके समाज के लिए बहुत कुछ किया गया। आलम यह है कि आज हर राजनीतिक पार्टी का ‘घुमंतू जनजाति प्रकोष्ठ’ है। केंद्र सहित कई राज्य सरकारों ने इन्हें आदतन अपराधी कानून को निरस्त किए जाने के मुद्दे पर विचार शुरू कर दिया गया है। इसके लिए बाकायदा आयोग गठित किया गया।

घुमंतु, अर्धघुमंतु और विमुक्त समाज

इस समुदाय के लोग सरकारी दस्तावेजों में तीन तरह के होते हैं। एक घुमंतु, दूसरे अर्धघुमंतु और विमुक्त। घुमंतु तो वे हैं जो हमेशा यहां से वहां चलते रहते हैं और अर्ध घुमंतु वे हैं जो कुछ समय तक एक जगह ठहरते हैं या उनका परिवार ठहरता है और कमाऊ पुरुष इधर से उधर जाते रहते हैं और विमुक्त वे हैं जिन्हें कठोर कानून से छुटकारा मिल चुका है। इस संदर्भ में बता दें कि संसद में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री कृष्णपाल सिंह गुर्जर ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान बताया कि राष्ट्रीय विमुक्ति घुमंतु तथा अर्धघुमंतु जनजाति आयोग की अंतरिम रिपोर्ट में आदतन अपराधी अधिनियम को निरस्त करने का सुझाव दिया गया है। द्रमुक सदस्य तिरुची शिवा के सवाल पर गुर्जर ने बताया कि देश के तमाम इलाकों में इन जनजातियों को आदतन अपराधी की नजर से देखा जाता है इसलिए पुराने समय से चले आ रहे इस कानून की वजह से इन समुदायों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करना मुश्किल हो रहा है। गुर्जर ने बताया कि साल 2005 में गठित आयोग की 2008 में पेश रिपोर्ट में इस बारे में कोई संस्तुति नहीं की गई थी। इस समस्या को देखते हुए 2015 में फिर से इस आयोग का गठन किया गया। मनोनीत सदस्य के टी एस तुलसी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के हवाले से आदतन अपराधी कानून निरस्त करने की सिफारिश के पूरक प्रश्न के जवाब में गुर्जर ने कहा नवगठित आयोग की जुलाई 2017 में पेश अंतरिम रिपोर्ट में भी इसे निरस्त करने की संस्तुति की गई थी। सरकार भी इस कानून को निरस्त करने के पक्ष में है।

हरियाणा में उत्थान के लिए व्यापक प्रयास

हरियाणा सरकार इन्हें आदतन अपराधी के दायरे से बाहर ले आई है। इस संबंध में बने एक्ट में प्रदेश में 26 जातियां शामिल हैं तथा प्रदेश में करीब 20 लाख आबादी है। असल में घुमंतू जातियों पर आदतन अपराधी एक्ट अंग्रेजों द्वारा थोपा गया था, जिसकी वजह से विमुक्त घुमंतू जातियां देश आजाद होने के बाद भी अपराधी होने का दंश झेल रही हैं। इन जातियों में शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, रोहतक, पानीपत, करनाल, रेवाड़ी, फरीदाबाद कुरुक्षेत्र में काफी काम चल रहा है।

वकील पारधी किताब और एक खौफनाक सच

अनौपचारिक चर्चा के दौरान पता चला कि इन जनजातियों में एक समुदाय ऐसा भी है जिसमें लड़कियों से देह व्यापार कराया जाता है। इस समाज में सामान्यत: महिलाओं का ही वर्चस्व होता है। इस समाज के लोग पको कुछ काम करते दिख जाएंगे। मसलन-सब्जी बेचना, सड़क किनारे पानी बेचना, जूते पॉलिश करना, लेकिन असल में ये ग्राहकों से बातचीत करने के लिए यह सब करते हैं। यह पूछने पर कि क्या किसी लड़की ने प्रतिरोध नहीं किया, बताया गया कि अब तक ऐसा मामला सामना आया नहीं क्योंकि उनकी ग्रूमिंग ही ऐसी हुई है, लेकिन अब स्वास्थ्य, सफाई को लेकर इन लोगों में जागरूकता आ रही है। बातों के दौरान मुझे लक्ष्मण गायकवाड़ की किताब वकील पारधी की याद आई। मैंने यह किताब समीक्षार्थ पढ़ी थी। उसमें इसी समुदाय के लोगों का खौफनाक सच उकेरा गया है। पहले मुझे उस किताब में कुछ नाटकीय मिश्रण लगा, लेकिन अब पता चला कि सचमुच कितना दंश झेलता आ रहा है यह समाज। हालांकि कुछ लोगों के कारण बदनामी का दौर अभी भी जारी है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि ये राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ेंगे।

Thursday, May 5, 2022

ज्योति की छवि, मधु मैडम और मदर्स डे

 डॉ. ज्योति अरोड़ा

मैं अपने छोटे मुख से कैसे करूं तेरा गुणगान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


भाव यही हैं, शब्दों में बयां मैं कर रही हूं। बात कर रही हूं अपनी बच्ची छवि की। यह मौका है मां की फीलिंग को समझने का। मदर्स डे। यूं तो हर दिन मां का होता है, लेकिन इस हर पल हर दिन के संबंध को किसी एक दिवस के रूप में मनाने का मौका हो तो क्यों न इसे अनुभव किया जाये। मेरी बच्ची छवि अभी छोटी बच्ची है, जैसा कि कहते हैं न कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, सचमुच उसी सच्चाई से घर से बाहर यानी स्कूल में मां जैसी टीचर मिलीं मधु। मधु मैडम को वह कितना प्यार करती है, इसका अंदाजा तब लगा जब उसकी क्लास बदल गई। टीचर बदल गई। स्कूल के ऐसे नियम शायद बच्चों के हित में ही बनते होंगे। जैसे कि ट्रांसफर के नियम। खैर, बच्ची हैै, परेशान हो गयी। उसके इस लगाव को देख अनायास ही चंद पंक्तियां निकल पड़ीं-



घर से स्कूल के लिए निकली नन्ही जान
छवि ने मधु मधुर में जैसे पा लिया अपना जहान
मुझे लगता मानो मिला हो खुशियों का आसमान
मदर्स डे पर दो-दो बधाइयां देती हूं
ये मेरी अरमानों की ज्योति और वो मधु सी मुस्कान।
मधु मैडम



नन्ही बिटिया छवि की जो भावनाओं को समझ सकी, वो उपरोक्त चंद पंक्तियों की मानिंद ही है। पता नहीं क्या था कि उसमें स्कूल का खौफ नहीं था। निश्चित रूप से यह खौफ इसलिए नहीं था कि स्कूल का वातावरण बहुत शानदार था। लेकिन उससे भी ज्यादा इसलिए कि छवि को मां सरीखी टीचर मधु मिली थीं। वह कितनी तो बातें शेयर करतीं। जब इस टीचर से थोड़ी सी दूरी बन गयी तो वह टूट सी गयी। घर में मेरे साथ प्यार और मनुहार, लेकिन स्कूल में वह ढूंढ़ती रहती मधु सी दुलार। खैर जीवन चक्र में ऐसे बदलाव आते रहते हैं, लेकिन बच्ची की ओर से मदर्स डे पर दो-दो बधाइयां। मधु जी को बहुत-बहुत साधुवाद। आप यूं ही हंसते रहिए, मुस्कुराते रहिए।
कुछ पंक्तियां पेश हैं, इन भावनाओं के समान में

घुटनों से रेंगते-रेंगते, कब पैरों पर हो गई खड़ी
तेरी ममता की छाँव में, जाने कब होने लगी बड़ी
 काले टीके के साथ, टीकों का रखा ध्यान
तेरे लाड़ को मां कोटि कोटि सम्मान
खाना पीना और दूध मलाई
आज भी सब कुछ वैसा है,
मैं ही मैं हूँ हर जगह,
माँ प्यार ये तेरा कैसा है?
सीधा-साधा, भोला-भाला,
मैं ही सबसे अच्छी हूूं
कितना भी हो जाऊं बड़ी,
मैं तो तेरी बच्ची हूं।


हम बड़े हुए तो क्या हुआ। मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हो तो बच्चों की बातों के जरिए ही सही। 
मधु मैडम का मधुर प्यार आज बना भावुक अंदाज
ज्योति की ऐसी छवि बनी कौन खुश और नाराज।
धन्यवाद।

Wednesday, April 27, 2022

महाभारत का संजय, पत्रकार धर्म और प्रो कुठियाला, केजी सुरेश व विजय क्रांति की खास बातें

 केवल तिवारी

महाभारत का एक महत्वपूर्ण किरदार है संजय। उसका झुकाव पांडवों की ओर है, लेकिन जब वह अपना काम करता है यानी धृतराष्ट्र को युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाता है तो उसकी वाणी में कोई अंतर नहीं होता। जब अभिमन्यु बध का दृश्य होता है तब भी वह शांत स्वभाव से सबकुछ बताता है और जब दुर्योधन का बध होता है तब भी। यानी पहले न तो उसके स्वर में कोई पीड़ा झलकती है और न ही बाद में खुशी। उसका धर्म और कर्त्तव्य सूचना देना था। वह समावेशी भाव से ऐसा कर रहा था। यही एक पत्रकार का धर्म भी होता है। उसे निष्पक्षता बनाये रखते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा, साथ ही समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह तय करे कि मीडिया किस तरह का हो। खासतौर से आज के बदले परिप्रेक्ष्य में समाज का यह दायित्व और बढ़ जाता है। इस तरह की बातें पिछले दिनों हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद, पंचकूला के अध्यक्ष प्रोफेसर बृज किशोर कुठियाला ने कहीं। 



कुठियाला एक संगोष्ठी में बोल रहे थे। संगोष्ठी का विषय था 'समाज के प्रति मीडिया की जवाबदेही।' कुठियाला ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि मीडिया को समाज पोषित होना चाहिए। साथ ही यह भी चिंतन का विषय होना चाहिए कि समाज की मीडिया के प्रति क्या जिम्मेदारी है। इस संगोष्ठी का आयोजन वरिष्ठ पत्रकार एवं पत्रकारों के हक में लड़ाई रहते रहे श्याम खोसला की पहली पुण्यतिथि पर किया गया। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व कुलपति प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला ने श्याम खोसला को बौद्धिक योद्धा बताते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्र की परिभाषा, हिंदुत्व की व्याख्या और धर्म एवं रिलीजन पर अपनी अलग चिंतन पद्धति दी। श्याम खोसला के साथ दो किताबें लिखने वाले प्रो. कुठियाला ने कहा कि पत्रकारिता का धर्म क्या है और समाज के प्रति एक पत्रकार का दायित्व बोध क्या होना चाहिए, इस पर श्री खोसला का विशेष फोकस रहता था। उन्होंने श्याम खोसला के शब्द ‘बौद्धिक योद्धा।’ पर जोर दिया। उन्होंने पत्रकार का समाज को और समाज का मीडिया को बौद्धिक योगदान के महत्व को रेखांकित किया। कुठियाला ने कहा कि मीडिया को समाजपोषित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को उच्च मानदंडों पर ले जाने वाले बौद्धिक योद्धा के महत्व को आज का समाज समझे। इस कार्यक्रम में अन्य वक्ता भी रहे। वक्ताओं ने कहा कि खबर सही हो और उसके निर्माण में ईमानदारी बरती जाये, इसके लिए जरूरी है कि खबरनवीस जानकार हो और तथ्यों का महत्व समझता हो। साथ ही जरूरी है कि खबरों एवं पत्रकारिता के संबंध में राष्ट्रीय मीडिया पॉलिसी बने।  

संगोष्ठी में मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति केजी सुरेश, वरिष्ठ पत्रकार विजय क्रांति रहे। कार्यक्रम में हरियाणा के शहरी निकाय मंत्री डॉ कमल गुप्ता ने फोन के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए। पूर्व मंत्री एवं हरियाणा के मुख्यमंत्री से संबद्ध कृष्ण बेदी ने बातचीत की शुरुआत करते हुए बताया कि किस तरह हरियाणा सरकार ने पत्रकारों के हित में अनेक कदम उठाये हैं। वरिष्ठ पत्रकार विजय क्रांति ने कहा कि आज परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। प्रतिस्पर्धा की गलाकाट लड़ाई में गलती होने की आशंका तो अनेक हैं ही, साथ ही चुनौतियां भी अपार हैं। उन्होंने कहा कि सूचना एकत्र करने में ईमानदारी की दरकार है। साथ ही सूचना एकत्र करने वाले पत्रकार को खुद भी इतना ज्ञानशील होना चाहिए कि उसे इस बात का भान हो कि उसकी जरा सी चूक बहुत बड़ी वारदात का कारण भी बन सकती है। उन्होंने कहा कि समाज के प्रति जवाबदेही सिर्फ मीडिया की नहीं, बल्कि समाज को भी मीडिया के प्रति जवाबदेह होना होगा। समाज को तय करना होगा कि उसे कैसी मीडिया चाहिए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति केजी सुरेश ने नेशनल मीडिया पॉलिसी बनाये जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने तथ्यों के सटीक होने पर जोर दिया। इस मौके पर श्याम खोसला के साथ लंबे समय तक काम कर चुके एवं उनके साथ कई मौकों पर साथ रहे वरिष्ठ पत्रकार वीपी प्रभाकर, बीडी शर्मा, डॉ केएस आर्य ने भी अपने विचार रखे। मंच संचालन वरिष्ठ पत्रकार अशोक मलिक ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सीजेए के अध्यक्ष दीपक वाशिष्ठ एवं इंडियन मीडिया सेंटर-चंडीगढ़ के राकेश शर्मा ने किया। सभी वक्ताओं ने श्याम खोसला की विभिन्न खूबियों के बारे में बताया और उनके बताए मार्ग पर चलने की जरूरत पर बल दिया।
कुछ लिंक भी शेयर कर रहा हूं।

The ForeFront :
https://youtu.be/3BXcvageBFo

https://youtu.be/EwzcviRSXy4

https://youtu.be/E87u5ASiPC8

Sunday, April 24, 2022

मयंक की शादी : भांजियों का समागम और संत सरीखी उपस्थिति

केवल तिवारी

भांजियों के इस समागम में संत सरीखी उपस्थिति रही। अनेक परिजन ऐसे थे जिनसे 20-25 साल के अंतराल में मुलाकात हुई। किस्मत से मेरी पांच भांजियां हैं और इतने ही भांजे। किस्मत के एक कदम आगे की बात कि इस बार बड़ी भांजी के बेटे ललित मोहन उर्फ मयंक की शादी थी। लता और हरीश पंत जी का फोन महीनेभर पहले आ गया था। 15 अप्रैल की दोपहर जब हल्द्वानी के कठघरिया स्थित उनके निवास स्थल पर पहुंचा तो मन प्रसन्न हो गया। 

दादी और नानी के साथ दूल्हा मियां। साथ में भाई


भांजियों, उनके पतियों और बच्चों से तो मुलाकात हुई ही, उस दीदी से विशेष मुलाकात हुई जिसके नाती की आज शादी थी। यानी विमला दीदी। जाहिर है दीदी के करीबी अनेक लोगों से मिला। चूंकि मेरे जीवन में शाहजहांपुर का दो साल का निवास एक अहम पड़ाव वाला है, इस लिहाज से वहीं से दीदीयों की ननदों और अन्य परिजनों से मिलने या बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ था, आज फिर उनमें से कई लोगों से मुलाकात हुई। समय तो काफी लंबा निकल गया, लेकिन बदलाव बहुत ज्यादा कहां आता है। मुझे भी अनेक लोगों ने पहचान लिया और मैंने भी उन्हें पहचाना। जानने-पहचानने के इस क्रम में हंसी मजाक भी चलती रही और कार्यक्रम भी संपन्न होते रहे। 



कुछ कार्यक्रमों से मैं पहली बार परिचित हुआ और इसे आत्मसात किया क्योंकि बदलते समय के साथ अगर कदमताल करते रहें तो उसमें हर्ज कैसा। जैसा कि परिवार के कुछ लोगों को हल्दी की रस्म के बाद दी गयीं विशेष टी शर्ट और उन पर लिखे कमेंट। पंत जी यानी दूल्हे के पिताश्री की टीशर्ट पर लिखा था ‘मैं सब जानता हूं।’ बन्ना भांजी जहां ‘मौसी ब्यूटीफुल थी’ वहीं उसके पति अनुज का पुष्पा स्टाइल ‘झुकेगा नहीं साला।’ वैसे इस कमेंट से मैंने इत्तेफाक नहीं रखा। रमा भांजी ‘बिंदास मौसी’ बनी तो उसके पति को ‘कभी-कभी खुद के जवान होने का गुबान था।’ वैसे संजय यानी हमारे प्रिय संजू हमेशा जवान हैं। उनका गांभीर्य स्वभाव मुझे भाता है। उनकी बेटी के कमेंट पर मैं पूरी तरह सहमत था। ‘एटीट्यूड क्वीन’ की तो आंखों से शरारत टपकती है। प्यारी है बच्ची। अविरल बाबू हैं ही स्मार्टी, ऐसे ही निक्कू आदि भी कमेंट के मुताबिक। लखनऊ से पहुंचे दूल्हेराजा के चाचा नित्यानंद जी वाकई वही कर रहे थे जो उन्हें कमेंट मिला था, ‘रिस्पोंसेबल चाचा।’ ऐसे ही दूल्हे के छोटे भाई वाकई ‘शर्मीला देवर’ लग रहे थे। वैसे मुकुल बाबू की एक जिम्मेदारी वाला भाव मुझे इतना भाया कि अब तक उसकी चर्चा करता हूं। वह हर रस्मो रिवाज पर दादी का हाथ पकड़कर उस समारोह स्थल पर लाना नहीं भूले। गुड मुकुल बेटे। फिर लखनऊ से पधारे पंडित नानू मामा का वह कमेंट तो सचमुच जोरदार था, ‘मामा का भौकाल, जय महाकाल।’ कमेंट की बातों के बीच प्रिय भांजे पंकज की पत्नी मनीषा और इनकी बिटिया अग्रणी के साथ नवीन पंडितजी उर्फ नानू की बिटियाएं रिद्धि-सिद्धि का भी जिक्र जरूरी है। मनीषा को मैंने बुलाकर प्रणाम करवाया। भीड़ थी, मैं लोगों को दिख नहीं रहा था। ऐसे भी अपने स्टैंडर्ड साइज के कारण दिख कहां पाता हूं। ऑफिस में भी जब कहा कि भांजी के बेटे की शादी में जाना है तो लोग गौर और हैरत से मुझे देख रहे थे। खैर जब मैं बच्चों से कह रहा था कि मैं तुम सबका नाना हूं तो अविरल बाबू आये और बोले, अगर आप इनके नाना हैं तो मेरे भी होंगे। मैंने कहा बिल्कुल। पैर छू लो और अपनी मम्मी का नाम बताओ। जैसे ही उसने बन्ना का नाम लिया मैं समझ गया इसी बच्चे को दिल्ली में नामकरण के बाद आज पहली बार यहां हल्द्वानी में देख रहा हूं। मनीषा के पिताजी से मिला और उनसे सीखा कि जिजीविषा बहुत जरूरी है। पूरे कार्यक्रमों में पंकज को मिस करते रहे। हालांकि उससे चैटिंग चलती रही। 



चार दीदीयां और फिर पांच भांजे एवं पांच भांजियां। बहुत सौभाग्यशाली हूं। साथ ही जीवन के अनेक किंतु-परंतु। खैर यहां ज्यादा जिक्र नहीं। भांजी रुचि उसके पति दीपेश, भांजी रेनु उसके पति कंचन और कंचन की माताजी से भी कार्यक्रम में मुलाकात हुई। इन मुलाकातों के बीच में अगर ससुराल का जिक्र नहीं करूंगा तो... तो... तो...। ससुराल वाले भी आए। उन्हें भी निमंत्रण था। लखनऊ प्रवास के समय से ही मेरे मित्र शेखर जोशी एवं उनकी पत्नी यानी हमारी भाभी भी पहुंची थीं। अच्छा लगा। खूब बातें हुईं। इस विशेष समारोह की बातें तो इतनी हैं कि न जाने कितना लिख जाऊं, लेकिन इसी लेख में कुछ फोटो भी तो साझा करूंगा जो खुद कहानी बयां करेंगे। लेकिन यह सच है कि सभी सज्जनों की मौजूदगी और हरीश पंत जी के पारिवारिक बौंडिंग ने भाव विभोर कर दिया। दूर-दूर तक के रिश्तेदार आए हुए थे। लता-हरीश जी को बहुत-बहुत बधाई।



और उर्मिला दीदी को विशेष धन्यवाद

सुआल पथाई वाली शाम भावना की थोड़ी तबीयत बिगड़ गयी। मैंने बन्ना से इसका जिक्र किया। उसने तुरंत पड़ोस में उर्मिला दीदी के यहां व्यवस्था कर दी। पंतजी एवं बन्ना लोगों की दोस्ती का असर तो होगा ही, उर्मिला दीदी का भी स्वभाव होगा कि उन्होंने खूब आतिथ्य सत्कार किया। सुबह गर्म पानी, बेहतरीन चाय से लेकर पूरे घर को हमारे हवाले करने जैसे उनके स्वभाव ने दिल जीत लिया। दो दिन बाद रिसेप्शन के मौके पर उन्होंने अपनी बहू से हमारी मुलाकात कराई। उर्मिला दीदी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना, बस यही कहना आप यूं ही हंसते-मुस्कुराते रहें, स्वस्थ रहें। थैंक्स ए लॉट।

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सुख-दुख दोनों जहां, जीवन है वो गांव... कहीं धूप तो कहीं छांव

जीवन चक्र है, यहां सबकुछ चलता है। शादी कार्यक्रम संपन्न होने के अगले दिन यानी रिसेप्शन वाले दिन नानू के ससुर जी का निधन हो गया। चारों तरफ ध्यान रखने वाली हमारी साहसी दीदी विमला दीदी नानू एवं उसके परिवार को लेकर वहां पहुंची। आवश्यक रस्में पूरी करवाईं। शाम को नानू मिला तो संवेदनाएं प्रकट कीं। मनीषा और नानू ने बताया कि कुछ दिन से वह ज्यादा ही कष्ट में थे। इसी आवागमन की बात पर बता दूं कि मैं शादी से पहले यानी 14 अप्रैल को सीधे चोरगलिया गया और वहां प्रेमा दीदी के गले लगकर एक बार फिर खूब रोया। कुछ दिन पहले तक जीजाजी रमेश चंद्र मिश्र जी  कहते थे हल्द्वानी में शादी में मिलेंगे। लेकिन इससे पहले ही वह अनंत यात्रा पर निकल गए। भावना, धवल के साथ था। वहां मनोज आदि खेती-बाड़ी भी समेट रहे थे और हर मौके पर जीजाजी को याद कर रहे थे। उधर, बातों-बातों में भतीजे बिपिन का भी जिक्र हो रहा था जिसकी बरसी अभी 20 अप्रैल को हुई है। ईश्वर से प्रार्थना है सबको शक्ति देना। महामारी के इस रूप को अब खत्म करना।

Saturday, April 9, 2022

कुछ तो लोग कहेंगे ... आशीष सर से मुलाकात का संयोग और योग

 केवल तिवारी

बहुत लंबे समय बाद स्कूल में चहल-पहल दिखी। चंडीगढ़ के सेक्टर 29 स्थित ट्रिब्यून मॉडल स्कूल। बेटा धवल 7वीं में गया है। बड़े बेटे कार्तिक ने यहीं से 10वीं की थी। कोविड काल के बाद दो साल बाद जब 2 अप्रैल को स्कूल में जाना हुआ तो आनंद की अनुभूति हुई। बच्चे तो कम ही थे, क्योंकि पीटीएम थी, लेकिन माहौल में उत्साह साफ नजर आ रहा था। अलग-अलग ग्रूप बनाए हुए थे। काउंसलर मैडम निकिता अपने संबोधन में सहभागिता की जरूरत को समझा रही थीं। चूंकि हमारा टर्म अभी आना बाकी था, इसलिए पहले संगीत कक्ष में गए। वहां अतुल सर से बात हुई। फिर स्पोर्ट्स रूम में गए। वहां सचिन सर और अनुज सर मिले। फिर बेटे ने कहा कि चलो लाइब्रेरी चलते हैं। लाइब्रेरी में जाना ही संयोग था। वहां आशीष सर मिले। आशीष शुक्ला। योग टीचर।


औपचारिक मुलाकात के बाद अनौपचारिक बातचीत शुरू हो गयी। पूछा हालचाल। मैंने उनसे मंडूकासन के बारे में पूछा। उन्होंने कुछ बातें बताईं। फिर सेहत, कम होते वजन पर मैंने उनसे कुछ बातें शेयर कीं। कुछ देर मेरी बातों को समझने के बाद वह बोले, किशोर कुमार का वह गाना एकदम सही है जिसके बोल हैं, 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।' फिर उन्होंने एक उदाहरण दिया। एक व्यक्ति अगर किसी तरह इंतजाम करके फाइव स्टार होटल में अपने बेटे या बेटी की शादी की रिसेप्शन देता है तो कई लोग कहेंगे, 'अथाह पैसा है तो देगा ही फाइव स्टार में पार्टी।' अगर वह साधारण सी दावत देता है तो फिर उनके अल्फाज हो जाएंगे, 'इतना पैसा होते हुए भी फटीचर ही बना रहता है।' इसलिए छोड़िए इन बातों को। तनाव कम कीजिए। साथ खड़ी पत्नी ने सहमति जताते हुए कहा कि ये छोटी-छोटी बातों का तनाव ले लेते हैं। 
योगासन करते आशीष शुक्ला।

कुछ दिन पहले होमियोपैथ डॉक्टर ने भी कहा था कि तनाव से कई रोग जन्म लेते हैं। अनेक बातें होने के बाद उन्होंने एक दो आसन बताए और प्राणायाम के बारे में समझाया। आशीष सर से बातें करके बहुत अच्छा लगा। ऐसी अनौपचारिक बातें कई बार मेरा मार्गदर्शन करती हैं, लेकिन अनेक बार ऐसा होता है कि अपनत्व की बातें आगे बढ़ते-बढ़ते मैं बहुत कुछ शेयर करने लगता हूं और फिर शुरू होता है तनाव का एक नया अध्याय। हालांकि शेयर करने में कोई दिक्कत नहीं। एक बार एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा था कि कितना ही अविश्वास हो, कुछ लोगों को तो आपको अपना बनाना पड़ेगा जिनसे आप बहुत कुछ शेयर कर पाएं। आशीष सर की बताई कुछ बातों को फॉलो कर रहा हूं। उम्मीद है कि अगली मुलाकात में कह सकूं कि जो वेट लॉस हुआ था, वह अब गेन हो रहा है क्योंकि दुआ और दवा साथ चल रही है। प्रयास भी जारी हैं।



Thursday, April 7, 2022

बदले नजारे और नजारों का बदलाव

 केवल तिवारी

डॉक्टरी सलाह पर सुबह टहलना जरूरी हो गया है। वैसे तो संभव हो तो सभी को सुबह टहलना चाहिए। सुबह उठने, टहलने की जब सिर्फ बात होती है तो ती तरह के नजारों का रेखाचित्र बनता है। एक वे हैं जिनके पास सुबह समय ही नहीं है। हालांकि समय की कमी का रोना महज रोना ही है। समय तो सभी के लिए 24 घंटों का होता है। खैर...। दूसरे वे हैं जिनके पास सुबह-सुबह समय ही समय है, लेकिन या तो देर रात तक जगने के कारण या आलस्य के कारण वे कहीं नहीं जाते। तीसरी श्रेणी वह है जिन्हें डॉक्टर ने सलाह दी है कि समय निकालकर टहलना ही टहलना है या एक्सरसाइज करनी है। तीसरी श्रेणी में खुद को रखते हुए इन दिनों पार्क में नियमित तौर पर जाना होता है। वहां का नजारा देखकर लगा कि फिटनेस को लेकर कितनी जागरूकता है। बुजुर्ग व्यक्ति भी एक्सरसाइज कर रहे हैं। युवा भी योग आदि में व्यस्त हैं। कुछ बच्चों का झुंड भी है। पहले तो देखकर अच्छा लगा कि बच्चे भी सुबह-सुबह टहल रहे हैं फिर मन में सवाल उठा कि इनका तो स्कूल टाइम है, ये कैसे यहां। लेकिन बच्चे मस्त होकर खेल रहे थे। गौर से देखा तो उनकी बातचीत सन्न करने वाली थी। गाली-गलौज। झूलों में तोड़फोड़। कुछ के पास स्मार्ट फोन। उसे लेकर कहीं कोने में बैठे हैं। सोचा, इन्हें कुछ समझा दूं, लेकिन मैं राउंड लगाता रहा। मन में मंथन चलता रहा। तभी एक बुजुर्ग से सज्जन उनके पास आए और पूछा कि उन्हें पार्क में आना कैसा लग रहा है। दो-तीन बोले, बहुत अच्छा। फिर उन्होंने समझाया जब अच्छा लग रहा है तो इसे अच्छा बनाए रखो। झूलों में तोड़ फोड़ करोगे तो फिर कौन ठीक करेगा। कुछ की समझ में बात आयी या डर गए, वे वहां से चले गए। तभी कुछ बच्चे स्कूली ड्रेस में दिखे। कुछ 'जोड़े' भी दिखे। वे टहलने आए हैं, ऐसा तो कदापि नहीं लग रहा था। चलिए सुबह की इस चहचहाहट को कुछ दिन और गौर से देखा जाए। फिर संभवत: कुछ सार्थक लिखना हो पाएगा। अभी तो नजारे बदले हैं और बदलाव में भी नजारे हैं।

Monday, March 21, 2022

स्टार थे, स्टार बन गए...खुश रहना जीजा जी, मिश्रा जी

 केवल तिवारी

कल्पना से परे भी चीजें चली जाती हैं।

अस्वस्थता के कारण जीवन की कुछ-कुछ कल्पना मैं भी करने लगता हूं, लेकिन जिंदादिली भी तो कोई चीज होती है। जब जिंदादिली के मायने हैं तो मौत कैसे आ गई...और यह मौत दबे पांव आई क्योंकि डरती थी वह जिंदादिल इंसान से। ऐसे इंसान से जो सचमुच महात्मा था। उसने गरीबी को भी ठाठ से जिया। उसने अफसोस जताने के बजाय आगे की ओर देखा। वर्तमान में जीने वाला आदमी... रमेश चंद्र मिश्रा। यही नाम था जीजा जी का।

खुशी के वे फल

विष्णु भगवान का ही नाम होता है या रमेश मतलब विष्णु। और छोड़ गए हैं हमें। अपने पीछे परिवार... यादें... विचार। मेरे साथ रिश्ता तो जीजा जी का था, लेकिन वह मेरे अभिभावक जैसे भी थे। मेरे दोस्त जैसे भी थे और मेरे दोस्तों के भी दोस्त। अक्सर तो पूछते थे फलां कैसा है, उनके क्या हाल हैं। करीब 3 माह पूर्व आए थे चंडीगढ़। प्रेमा दीदी के साथ मंदिर में गए हम लोग। ज्वाला जी माता मंदिर में उनको चक्कर आ गया। मैं और प्रेमा दीदी फटाफट उनको रेस्टोरेंट में लाए। उनके लिए खाना लिया उन्होंने खाना खाया। तब तक शीला दीदी, जीजाजी भांजा कुणाल भी पहुंच गए। सभी ने खाना खाया। इतने में जीजा जी खाना खा चुके थे। प्रेमा दीदी ने उनकी तरफ देखा। समझ गए थे वह कि दीदी स्वास्थ्य के बारे में सवाल पूछना चाह रही है। अपने आप बोले अब मैं ठीक हूं और उठकर काउंटर पर गए और खुशी-खुशी सभी के खाने का भुगतान करा आए। यहां बता दूं जब मैं छोटा था यानी विद्यार्थी वह केएमओ स्टेशन पर हमें समोसे और मिठाई खिलाते थे। मुझे लगता था, मेरे जीजा जी कितने अमीर हैं, बाद मैं...। खैर मंदिर में दीदी जीजाजी ने एक दूसरे को देखा और दोनों निश्चिंत कि सब ठीक है। उस दिन यानी 11 मार्च को अपनी सालगिरह की अगली सुबह जब उन्होंने इस संसार से रवानगी डाली तो प्रेमा दीदी की यही इच्छा तो थी कि वह एक बार तो उनकी ओर देखते। एक बार तो कहते कि अब मैं ठीक हूं या नहीं हूं। इतना बोलने वाला व्यक्ति जब अंतिम सफर पर निकला, तो एकदम चुपचाप। इतने चुपचाप जाना ही था तो एक दिन पहले सबसे इतना क्यों बोले। बधाई वाली हंसी। मजाक किया। फिर चल दिए। जीजा जी हमें भी कहां पता था कि आपके विवाह की वर्षगांठ 10 मार्च को होती है। वह तो 10 मार्च 2010 को धवल हुआ तो दीदी ने बताया। दीदी और आपने कितना साथ दिया। कुक्कू होने वाला था, डॉक्टर ने डरा दिया। तुरंत आपको फोन किया कि ईजा को लेकर आओ। आप अगली शाम पहुंच गए, ईजा को लेकर। धवल होने वाला था तो आप दीदी को छोड़ गए। भावना का आपरेशन हुआ तो आप आए। क्या कहूं। सालगिरह की बधाई देते महज 12 साल हुए थे। आज शायद ठीक उसी समय जब करीब 44 साल पहले हमारी दीदी को दुल्हन बना कर विदा कराकर चले होंगे हमारे घर से डोली से दीदी को ले गए होंगे आप दीदी को छोड़कर चले गए। 11 मार्च को भांजी रेनू का फोन सुबह 6:00 बजे आया। थोड़ी सी घबराहट तो हुई, फिर विचार आया कि शायद मेरे बेटे धवल को जन्मदिन की बधाई देने के लिए किया होगा क्योंकि यही तो यादगार दिन था जब धवल का जन्मदिन और दीदी जीजाजी की सालगिरह एक ही दिन पड़ता था। फोन उठाते उठाते भावना से पूछा कल भूल गए थे शायद। इसलिए आज कर रहे होंगे। लेकिन यह क्या? फोन पर भांजी के पति कुलदीप प़ंत यानी कंचू थे। बोले, मामाजी चोरगलिया पापा जी एक्सपायर हो गए हैं। यही शब्द थै।  कितना चिल्लाकर बोला मैं क्या कह रहे हो... फिर कुछ नहीं बोल पाया। पंत जी बोले आप परिवार में अन्य लोगों को भी बता देना। मैं रोने लगा। पत्नी रोने लगी। बगल के कमरे से पहली रात 2:00 बजे सोया बेटा कुक्कू भी उठ गया वह भी रोने लगा। वहीं पर सोया धवल भी जग गया। बड़ी हिम्मत की। सबसे पहले लखनऊ दाज्यू को फोन किया। क्या बात होती। बस इस अभागी सूचना का आदान प्रदान हुआ। अब क्या करूं? क्या गाड़ी लेकर निकल जाऊं? सवाल-जवाब मंथन।  फिर हिम्मत की। शीला दीदी को फोन किया‌ रो रो कर बुरा हाल। एक दिन पहले ही जीजा-साली ने कितनी बातें की थीं। शीला दीदी के सामने असमंजस का चौराहा था। समझाया मैंने। पता नहीं कहां से आ गई हिम्मत। कसम दी मैंने। अपनी विदेश यात्रा को टालना मत। जीजा जी भगवान बन गए हैं। पुण्य आत्मा को मोक्ष मिल गया है। क्या करता।  मुझे भी डॉक्टर के पास जाना था,  अपनी मेडिकल रिपोर्ट लेकर। फटाफट डॉक्टर के पास बेटे कार्तिक के साथ गया। बस का पता किया और चल दिया चोरगलिया के लिए। कैसे...क्या... क्यों... सवालों का उमड़ घुमड़ जारी था। यहीं से थोड़ी दूर नानकमत्ता में कुछ माह पहले लखनऊ भाभी जी के जीजा जी का निधन हुआ था। भाभी जी को मैसेज किया था मैंने। मन किया वहां जाऊं, लेकिन बेदर्द प्राइवेट नौकरी। आजकल बड़ा परिवर्तन है...। खैर 

काठगोदाम से मेरे ससुराल वाले फोन करते रहे। नंदू भाई साहब ने चोरगलिया पहुंचाया। रेनू सबसे पहले मिली। फिर दीदी। उफ क्या रूप देखा दीदी का। हमारे परिवार की सबसे सुंदर लड़की बताया जाता था उसको। अत्यधिक गोरी होने के कारण उसे कुरुली यानी सफेद दूध जैसी कहते थे। यह कुरुली आज कुरूप हो गई। बहुत समझाया। धीरे-धीरे पीतांबर जीजाजी मिले। हरिद्वार से लौटे चंद्रशेखर जीजाजी मिले। सभी बच्चे, दीदीयां। सब अपनी यादें बताने लगे। आसपास के लोग बोलने लगे अपने जेठ के लिए बहुओं को ऐसे रोते हुए हमने पहली बार देखा है। आंखें नम। साथ में काम भी। भांजा मनोज तो बस एक ही रट लगाए रहा। बहुत मलाल रह गया मामा। पापा कुछ तो मौका देते। मैंने लखनऊ पंकज भांजे का हवाला दिया। कितने मलाल रह गये उसके मन में। मैं जितना बोलता,  उसकी आंखें भर आती। मनोज की छोटी अबोल बच्ची की आंखें दादा को तलाशतीं। नहीं दिखते तो रो जाती। जीवा, काव्या को थोड़ा समझाया मैंने। कहा आपके दादा, आपके नाना अब स्टार बन चुके हैं। बच्चे का सवाल रात को दिखेंगे? मैंने कहा हां,  लेकिन तब, जब आप सो चुके होगे। जीजा जी आप हमारे स्टार थे। स्टार हो। और स्टार हो गए हो। आपने खूब संघर्ष किया। रेनू कितने किस्से बता रही थी। रुचि रो रही थी मौसा जी की याद में। आपने जीवन के कठिन दौर देखे। आपका निजी जीवन भी अजीब रहा, वह एक अलग संघर्ष था। अब आपके लिए थोड़ा चैन भरे दिन आए थे। लेकिन आप तो स्थाई शांति में चले गए। कोई बात नहीं, मौत की परिकल्पना अगर कोई करता तो ऐसी ही मौत मांगता। कोई भी। मैं भी। आप खुश रहना। आशीर्वाद बनाए रखना। जीवन चलायमान है। सब चल रहे हैं। मैं भी। अगले दिन चंडीगढ़ के लिए चल पड़ा। यह कहकर कि सब चलते रहिए। स्टार का स्टार में विलीन होना। बच्चों का समझना और समझाना। रोते हुए देख कर जीवा का दुखी होना और छोटी बच्ची कनिष्का का कुछ ढूंढना। दीदी का रोना। सबका दुखी होना। जीजा जी आपका चले जाना। आप यादों में हमेशा रहेंगे। यही रीत है जीवन की। चल रही है। चलते रहेंगे। खुश रहना आप अपने नए जहां में। सुख दुख के साथी  रहे भविष्य में भी पूरे परिवार पर आशीर्वाद बनाए रखना। जीजा जी आपको नमन।

Friday, March 4, 2022

अब क्या जानवरों के बुत ही दिखेंगे?

 केवल तिवारी

शनिवार 27 फरवरी। चंडीगढ़ के आकाश में सुबह से ही घने बादल दिख रहे थे। बाहर का नजारा देखकर लग रहा था कि रात से ही कुछ बूंदाबांदी भी हुई है। बेटे कार्तिक और धवल के साथ ही उनकी मम्मी भावना भी थोड़ी उदास थीं। क्योंकि एक हफ्ते से कार्यक्रम बना था कि छतबीड़ जू चलना है। बड़े दिनों बाद बच्चों को आसपास कहीं लेकर जाने का कार्यक्रम बना था। दस बजे तक हम लोग स्नान-ध्यान के बाद नाश्ता कर चुके थे। कार्यक्रम टल ही गया था। छोटे बेटे की उदासी देखकर अजीब लग रहा था। फिर उसने ही कहा, 'क्या पता चिड़ियाघर वाले इलाके में बारिश न हो रही हो?' मैं उठा और सबसे कहा कि तैयार होओ चलते हैं। बारिश होगी तो वापस आ जाएंगे। करीब 11 बजे हम चले और साढ़े ग्यारह बजे वहां पहुंच गए। वाकई तब तक हल्की धूप दिखने लगी। वहां पहुंचे, वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट दिखाकर टिकट लिया और शुरू किया जू में घूमना। 



बच्चों का यहां आने के लिए सबसे उत्साहजनक बात थी यहां नया बनाया गया डायनासोर पार्क। वाकई अच्छा बना है। उससे पहले कई पिंजड़ों को देखा। अनेक पिंजड़े खाली थे। कोई जानवर नहीं था, कहीं जानवर छिपे हुए थे, शायद मौसम के कारण। पक्षी पार्क भी अच्छा लगा। डायनासोर पार्क देखते-देखते बेटा कार्तिक बोला, 'लगता है कुछ सालों बाद ऐसे ही बुत जैसे ही जानवरों को देखना पड़ेगा।' धवल का जवाब था, 'हां अब जानवर खत्म हो रहे हैं।' फिर हर पिंजरे को देखकर बच्चों का यही कहना होता कि इन्हें देखकर दया आ रही है। कहां ये जंगलों में मदमस्त होकर घूमते कहां ये कैद हैं। मैंने समझाया कई जानवर तो आदमखोर हो जाते हैं इसलिए भी चिड़ियाघरों में लाए जाते हैं। कुछ जानवर बहुतायत में हैं जैसे लोमड़ी या शियार। हां बाघ, शेर, चीते आदि अब लुप्तप्राय से ही हो रहे हैं। कुछ जानवरों के पिंजरे के बाहर लिखा भी था कि अब इनकी प्रजाति बची नहीं है। तमाम बातों के बीच मुझे 'भविष्य में जानवरों के बुत' वाली बात भावुक लगी। क्या वाकई ऐसा होगा? शंकाएं...आशंकाएं। इसी बीच, यह बात भी याद आई कि बेशक जानवरों के बारे में कहा जा रहा हो कि इनकी संख्या बहुत कम हो गयी है, लेकिन उत्तराखंड से तो कई बार खबरें आती हैं कि बाघ (तेंदुआ, शेर, लकड़बग्घा आदि) ने इतनों को मार दिया। खैर...। जानवरों का संसार तो उन्मुक्त होता ही है, लेकिन चिड़ियाघरों में दर्शनीयता का अंदाज भी अब बदल रहा है। क्रिएटिविटी हो रही है। बच्चों के साथ बड़ों को भी बदलता अंदाज भा रहा है। भविष्य पेड़-पौधों का भी कोई ऐसा पार्क हो जहां आम जनता जा सके तो कितना अच्छा हो। मुगल गार्डन जैसा या ट्यूलिप गार्डन जैसा। एक ही क्षेत्र में हजारों तरह के पेड़-पौधे और फल-फूल। पूरी जानकारी लेते हुए इन्हें देखना अच्छा लगेगा ना।

Thursday, February 24, 2022

तिनका तिनका डासना... नायाब काम का संवेदनशील दस्तावेज

 केवल तिवारी

न तो यह समीक्षा है और न ही किताब पर कोई टिप्पणी। हां, मेरे इस लेख में अब जो भी मेरे अल्फाज आगे निकलेंगे वह किताब की प्रतिध्वनि ही होगी। किताब है ‘तिनका तिनका डासना।’ जेल में जिंदगी को महसूस करने का जतन। डॉ वर्तिका नंदा की वह कोशिश, जो जारी है। उस कोशिश ने जिंदगी को सलाम किया है। ऐसी जिंदगी, जो सलाखों के पीछे है। उनकी किताब तो करीब महीनेभर पहले मिल गयी थी, लेकिन पढ़नी मैंने शुरू की मिलने के हफ्तेभर बाद। असल में मेरे ऑफिस से मुझे दो किताबें समीक्षार्थ मिली थीं और लगभग पूरी होने को थीं। 


खैर... वर्तिका जी की इस किताब को पढ़ते-पढ़ते पत्रकारिता जीवन के अपने पुराने दौर में चला गया। एक बार याद है गाजियाबाद से हमारे रिपोर्टर (उस वक्त में हिंदुस्तान अखबार में था) ने खबर लिखी थी जेल की रोटियां खाने की जुगत में कई लोग। स्टोरी पढ़ी, अच्छी लगी और उसका डिस्प्ले अच्छा किया। उसकी कहानी थी कि डासना जेल प्रशासन से रोटी की विनती कई लोग इसलिए करते हैं कि उन्हें बताया गया कि एक बार जेल की रोटी खा लो तो कभी भी जेल जाने की नौबत नहीं आएगी। उस वक्त वह स्टोरी किसी और एंगल से पठनीय लगी और आज उस स्टोरी का वह खौफ समझ में आ रहा है कि सलाखों के पीछे जाने की कल्पनाभर से कोई इंसान कैसे सिहर उठता है। फिर सलाम है उन लोगों को जो वहां भी अपनी जिंदगी को एक नया मोड़ देते हैं। वह मोड़ यूं ही नहीं आता, उसके लिए तिनका तिनका जैसा प्रयास करना पड़ता है। फिर मुझे आरुषि केस की याद आई। मैंने एक बार मीटिंग में कहा था कि आरुषि को लेकर जिस तरह की रिपोर्टिंग हो रही है, वह दुखद है। सचमुच उस समय मीडिया का एक वर्ग खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सारे मानक ताक पर रख दिए थे। आरुषि और उसके माता-पिता का चरित्र हनन जिस तरह से किया गया, वह शर्मनाक था। डॉ वर्तिका नंदा ने किताब में आरुषि के माता-पिता राजेश और नूपुर के बारे में बहुत संवेदनशील तरीके से लिखा है। सलाखों के पीछे जीवन गुजार रहे लोगों को समझा है डॉ वर्तिका ने। तभी तो ऐसी अनूठी पहल की है। उन्होंने ठीक ही लिखा है-‘वे अगरबत्ती और पेंटिंग तो बनाते हैं लेकिन उनकी अपनी जिंदगी में न महक है, न रंग।’ निपट अनपढ़ सुरेंद्र कोली के कानून का जानकार बनने की बात हो या फिर विजय बाबा की योग जीवनशैली, सभी को डॉ वर्तिका ने प्रवाहमयी शैली में सहज और सरल भाषा में बयां किया है। सरल सिर्फ समझने-पढ़ने में ही नहीं, सरल ऐसी भाषा कि जो भीषण कठिन सफर को तुरंत समझ सके.. हां इसे समझने के लिए संवेदनाएं जिंदा होनी चाहिए। और पाठन संजीदगी के साथ। जेल के अंदर रह रहे अपराधी या अपराध के आरोप में घुटते लोग ही नहीं, वर्तिका जी ने उन पुलिसकर्मियों की जीवनचर्या को भी उकेरा है जिनके लिए काम के कोई घंटे नहीं होते। जिम्मेदारियों के जबरदस्त अहसास के साथ ही जो कैदियों को अनुशासन में भी रखते हैं। मसलन, तत्कालीन डिप्टी जेलर शिवाजी यादव।

पूरी किताब में कविताएं हैं, तस्वीरें हैं। हर तस्वीर में दिल की गहराई में उतर जाने वाला कैप्शन। कैप्शनों की एक बानगी देखिए-फाटक के उस पार रात नहीं ढलती... इधर बेचैनी, उधर उदासी...जहां लोहा पिघलना चाहता है... इस बचपन का पता है जेल... खाना पकता है पर भूख नहीं लगती, वगैरह-वगैरह। अब तो जेल से जुड़े हर सरकारी, गैर सरकारी से इतर के लोग भी डॉ वर्तिका जी को जानने लगे हैं। जाहिर है अनेक लोगों ने उन्हें खत लिखे। मीडिया के हर प्रारूप में उनका जिक्र हुआ। इन सभी बातों का भी इस किताब में जिक्र है। यहां यह बताना मौजूं होगा कि वर्तिका जी राष्ट्रपति से पुरस्कृत हो चुकी हैं, उनके प्रयास को लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दो बार जगह मिली है और भी कई उपलब्धियां हैं उनके खाते में...। मैं ज्यादा बयां क्या करूं...।

संवेदनाओं की बात हो और कविताएं न हों, ऐसा कैसे हो सकता है। वर्तिका जी अपने काम के कारण या सहजभाव की वजह से या फिर रचनाधर्मिता.... कारण जो भी हो, कवयित्री भी हैं। उन्होंने अनेक जेल गीत लिखे हैं। उन्होंने हर लम्हे को कविताओं में भी समेटने की कोशिश की है। तुम नहीं मिले... हथेली में चिपके उस आंसू में भी नहीं जो सिर्फ तुम्हारी वजह से ढलके थे...। न कागज की कश्ती थी... न रूठने की मस्ती...। ऐसे ही कई अल्फाज जो निश्चित रूप से संवेदनशील दिल से निकले होंगे और जो जेल का परिचय गान भी बन गए होंगे जैसे-... होंगी अपनी कुछ मीनारें... टूटे फिर भी आस ना... ये अपना डा-सना। वर्तिका जी आप चले चलिये... आपके पहाड़ सरीखे बुलंद हौसलों के इस पथ पर शुभकामनाओं के कुछ तिनके हमारी ओर से भी। सादर।

Thursday, January 20, 2022

हाय रे आइसोलेशन... नाम बड़ा और घर छोटा

 केवल तिवारी

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क्या करें इस आइसोलेशन का। नाम इतना बड़ा है और हमारा घर छोटा', अरुण जी अपने मित्र सौमित्र से फोन पर बात करते हुए झल्लाए जा रहे थे। सौमित्र जी भी चिचिया गये, 'अरे जाओ काहे का बड़ा नाम। बेड़ा गर्क कर रखा है।' वह अपनी बात जारी रखते हुए बोले, 'बेवकूफी की तो हद हो रखी है। कोई बता रहा था कि बच्चों के नाम भी कोरोना पर ही पड़ रहा है। किसी बच्ची का नाम कोराना सिंह, किसी का नाम लॉकडाउन कुमार कोई सेनेटाइजर शर्मा हैं तो अब कोई ओमीक्रॉन रखने लगा है। सब पगला गए हैं और उन्हीं पागलों की जमात में तुम भी शामिल हो।' अरुण जी सौमित्र जी की पूरी कहानी के बीच में दसियों पर हेलो... हेलो... हेलो बोले जा रहे थे, लेकिन जो मजाल वह अपनी बात पूरी करने से पहले रुकते। जब अपनी बात पूरी कर ली तो बोले, 'काहे बीच में हेलो-हेलो चिल्ला रहे थे, सुनाई नहीं पड़ रहा था क्या?' अरुण जी ने शांत होकर कहा, 'दोस्त हम काहे पगलाये हैं, ये बताओ। हम तो बस आइसोलेशन का नाम ही तो बड़ा बता रहे हैं।' 'तो काहे का बड़ा है यह नाम, यही तो हम आपसे पूछ रहे हैं?' सौमित्र जी के तेवर जस के तस थे। दोनों के बीच फोन पर ही वाद-विवाद चल रहा था। अब तो अनलिमिटेड कॉल ऑप्शन सभी ने ले रखा है। इसलिए घंटों बात चल भी जाये तो क्या फर्क पड़ता है। वैसे अनलिमिटेड कॉल ऑप्शन से कुछ होता नहीं, कई लोगों की बातें तो अब जो कम हो गयी हैं। अपनी-अपनी व्यस्तता। किसी की किसी से बनती नहीं। कोई खुद को व्यस्त दिखाना चाहता है। किसी को सोशल मीडिया में एक्टिव रहने में मजा आता है... वगैरह-वगैरह कई कारण हैं फोन पर बात होने या न होने की। खैर आज तो अरुण जी और सौमित्र जी की बातें खूब हो रही थीं। मुद्दा, वही आजकल का हॉट टॉपिक। अरुण जी फिर बोले, 'अरे मैं कह रहा हूं कि आइसोलेशन सुनने में इतना बड़ा लगता है, लेकिन....', उनकी बात पूरी होने से पहले ही सौमित्र जी भड़क गए, 'फिर तुम बड़ा कहोगे। ऐसे तो लॉकडाउन भी बहुत बड़ा नाम है, स्पेलिंग मिला लो' फिर बीच में वह हंस पड़े, बोले, 'ओफहो तुम स्पेलिंग नहीं जानते होगे।' अरुण जी बोले, 'गनीमत है आप हंसे तो, वैसे हंसने की बात नहीं। यहां जान आफत में आई है और तुम हो कि मेरी बात का मतलब ही नहीं समझ रहे हो।' 'क्या बात है, बोलो', सौमित्र जी आदेशात्मक लहजे में बोले। 'अरे क्या बताएं, पत्नी को कोरोना जैसे लक्षण हैं, डॉक्टर कहते हैं कि आइसोलेट कर दो', 'ऐं क्या... सौमित्र फोन की तरफ देखकर ऐसे चौंके जैसे उनके फोन से ही कोरोना झांक रहा हो।' फिर तुरंत संयत होकर बोले, 'अरे तुरंते कर दो भैया आइसोलेट, लेट किए तो तुम लेट जाओगे।' अरुण जी फिर बोले, 'वही तो आपको समझाना चाह रहा हूं। कुल एक कमरे का मकान है, उसमें कहां बीबी को रखें, कहां खुद जायें।' सौमित्र बोले, 'अभी उसी कमरे में हो, तुमसे बोले थे कि दूसरा घर ले लो।' अरुण जी इस बात पर सिर्फ हंस दिये। फिर सौमित्र जी हंसते हुए बोले, 'एक कमरे का मकान है ना मजे में रहो, जब तुम्हें भी ऐसी ही दिक्कत हो जाये तो दोनों साथ-साथ आइसोलेशन में रहना।' फोन पर दोनों हंसने लगे, लेकिन समस्या गंभीर है। जिस व्यक्ति के पास एक ही कमरे का घर हो तो वह क्या करेगा। किसी एक के बीमार होने पर दूसरे का भी बीमार होना तय है। हालात ऐसे हैं। लोगों की नौकरियों पर बन आई है। बड़ा घर कैसे लें। हे ईश्वर इस महामारी का अब अंत ही कर दो।

Wednesday, January 19, 2022

यास्मीन का सफर, चलता रहे अनवरत

 केवल तिवारी

ये यास्मीन हैं। ऑफिस में मेरे साथी सतनाम जी की बेटी। वैसे इस परिचय से तो मैं अभी हाल ही में रू-ब-रू हुआ हूं। कुछ महीने पहले सतनाम जी मेरे पास आये थे। बेटी के बारे में बताया कि वह पंजाबी अदाकारा है। मैंने खुशी और आश्चर्य दोनों जताया। फिर वो बोले कि बेटी आपको जानती है क्योंकि वह ट्रिब्यून मॉडल स्कूल में पढ़ी है। मुझे सुनकर अच्छा लगा। असल में इसी स्कूल से मेरा बड़ा बेटा कार्तिक भी पढ़कर निकला है और अब छोटा बेटा पढ़ रहा है। मैंने घर जाकर कार्तिक से पूछा। उसने कहा, 'हां पापा यास्मीन दीदी हमसे सीनियर थीं और स्कूल की हेड गर्ल रह चुकी हैं।' अपनी बात में उसने यह भी जोड़ा कि वह अब पंजाबी सिनेमा में जाना-पहचाना चेहरा बन रही हैं। बहुत खुशी हुई यह जानकर। मैं यास्मीन पर एक प्रोफाइल कॉलम लिखना चाहता था, लेकिन फिर तय किया कि कुछ दिन बाद इस काम को अंजाम दिया जाएगा। इसी दौरान कोविड महामारी के कारण अखबारों में पेज कम हो गए और खबरें सीमित होने लगी। फिलवक्त यास्मीन चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में अंतिम सेमेस्टर की छात्रा हैं।
वह समझदारी भरा जवाब


पिछले दिनों यास्मीन का फोन ही आ गया। टैगोर थियेटर में एक नाटक 'जब शहर हमारा सोता है'  के सिलसिले में। इसके मंचन में यास्मीन का किरदार अहम था। यास्मीन के आग्रह पर मैंने कहा, 'यास्मीन मैं आ नहीं सकता, लेकिन इसकी कवरेज करवा दूंगा। कोई इनविटेशन या मैटर तैयार करवाना तो मुझे भेज देना।' यास्मीन ने मेरी बात का बहुत ही समझदारी से जवाब दिया। वह बोलीं, 'नहीं, एक्चुअली मैं तो चाहती थी कि आप इसे देखें। अगर कोई और आना चाहे तो आप बता देना।' मुझे यास्मीन का जवाब बहुत अच्छा लगा। एक मैच्योर कलाकार की तरह। असल में शाम का समय हमारे लिए बहुत काम वाला होता है। अगर साप्ताहिक छुट्टी वाला दिन होता तो मैं अवश्य जाता। मैंने दो-चार थियेटर प्रेमियों को मैसेज फॉरवर्ड किया। मेरी दुआ है कि यास्मीन इतनी सफलता पाए कि एक दिन उसका इंटरव्यू लेने के लिए मुझे समय लेना पड़े।
... और वह मंचन


रविवार 16 जनवरी को 'जब शहर हमारा सोता है' का मंचन टैगोर थियेटर में हुआ तो वहां पहुंचे लोगों ने बताया कि बहुत ही बेहतरीन था नाटक। उन्होंने बताया कि यूं तो सभी ने लाजवाब अभिनय किया और निर्देशन में हर बारीकी और प्रकाश का ध्यान दिया गया था, तराना का अभिनय बहुत ही जीवंत था। खुशी हुई कि तराना की ही भूमिका यास्मीन निभा रही थी। यही नहीं, कोविड महामारी के दौरान उदासी के आलम में दर्शकों ने इस मंचन को ताजगी का बूस्टर डोज बताया। जीरो परफॉर्मिंग आर्ट्स और अवलोकन थिएटर मंच ने पीयूष मिश्रा द्वारा लिखित नाटक प्रस्तुत किया। इसमें तराना की भूमिका अदा की यास्मीन ने। करीब पौने दो घंटे चले इस मंचन के दौरान एक भी दर्शक ऐसा नहीं था जो अपनी जगह से हिला हो। मंचन था ही इतना लाजवाब। नाटक का निर्देशन थिएटर बिरादरी के एक प्रमुख व्यक्तित्व साहिल मंजू खन्ना ने किया था।
चक्रेश कुमार, डॉ मनीष जांगड़ा की उपस्थिति में प्रस्तुत इस नाटक को देखने अनेक लोग पहुंचे थे। कोविड मानकों को मानते हुए इस मंचन को देखने के बाद लोगों ने बताया कि कोविड महामारी जैसी उदासीनता के बीच इस मंचन ने एक अलग ताजगी और अनूभूति दी। यास्मीन के अलावा इसमें आभास (विकास ठाकुर), विलास (साहिल मंजू खन्ना), असलम (यदुनंदन), तब्बसुम (हिना बत्रा), निशि (तरन्नुम खान), त्यागी (दिव्यांश कुमार) जैसे किरदारों ने बेहतरीन अदाकारी की। इनके अलावा खोपकर (अक्षय रावत), चाचा और मधमस्त (अंकज कुमार), चीना (कुणाल बत्रा), अंता (नमन धीमान), बबुआ (चिराग शर्मा), आवेन (खुशी पंडोत्रा), अकील (यक्ष पांडे), रफीक (साहिल पांडे), अख्तर (चेतन शर्मा), मोइन अली (रोहन ठाकुर), मुनीरा (साधिया)। ने भी इसमें भूमिका निभाई। यास्मीन के अभिनय का अलग ही लेवल था।
इच्छा है प्रेरक अभिनय की
यास्मीन ने बताया कि उसकी इच्छा प्रेरक अभिनय यानी जो दूसरों को प्रेरणा दे सके, वैसा अभिनय करने की है। अभिनय के क्षेत्र में कैसे आना हुआ और आपका ड्रीम रोल क्या है, पूछने पर यास्मीन ने कहा, 'स्कूली पढ़ाई के दौरान वार्षिक समारोह में परफॉर्म का मौका मिला जो मंच पर अभिनय का मेरा पहला अनुभव था। यूनवर्सिटी में कुछ सीनियर्स से गीत पेश करने के लिए कहा, तब मैंने पहली बार कैमरा फेस किया। फिर मुझे अभिनय में आनंद आने लगा। मुझे अहसास हुआ कि मैं अपनी कला को निखार सकती हूं और अभिनय में आगे बढ़ सकती हूं। साथ ही अभिनय से मुझे काफी खुशी और सुकून मिलता है। जहां तक बात है मेरे ड्रीम करैक्टर अभिनय की तो मैं दिल से चाहती हूं कि कोई प्रेरक अभिनय करूं।' सचमुच अपने बलबूते पर यास्मीन अभिनय की कुछ सीढ़ियों पर चढ़ चुकी हैं। निश्चित रूप से उन्हें सफलता मिलेगी क्योंकि ऐसे ही लोगों के लिए बशीर बद्र साहब ने कहा है-
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा