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Tuesday, October 4, 2022

सुखमें सुमिरन... दुख में सुमिरन

केवल तिवारी 

दुख में सुमिरन सब करेसुखमें करे  कोय। जो सुख में सुमिरन करे दुख काहे को होय। 

कबीरदासजी के इस दोहे को पिछले दिनों नये रूप में महसूस किया।नया रूप क्याकह सकते हैं बदले रूप में उस बदले रूप को लेकर बहसें हो सकती हैं। असल में इस माह की शुरुआत में उत्तराखंड प्रेमा दीदी के पास गयाथा।गत मार्च मेंजीजाजी के निधन केबाद मन में थाकि दो माह में एक बार तो हो हीआऊंगा। हालांकि मेरे जाने से दुख कम नहीं हो जाएगालेकिन सालभर तक का जो भयानक कालखंड होता हैशायद उसमें दो घड़ी मैं दुखों को साझा कर सकूंऐसा मेरा मानना है। हालांकि जीजाजी की स्मृतियां तो हर पल मन में हैंदिल में हैं। दुखों को साझा करनेके ही क्रम में दीदी के साथ बातचीत कर ही रहा था कि दीदी बोली, 'मेरा मन तो पूजा-पाठ में अब बिल्कुल नहीं लग रहा।क्यों कहते हैं कि दुख में सुमिरन सब करे। पूजा-पाठ में तो तभी मन लगता था जब तेरे जीजाजी थे। घर में सब अच्छा चल रहा होता है तो खूब पूजा-पाठ में मन लगता है। दुख में तो सुमिरन हो ही नहीं रहा। मैंने इस बात पर सहमति जताई कि हांदुख जब  जाता हैतो कई बार मन विचलित हो जाता है।पूजा-पाठ या यूं कहेंकि रुटीन के कर्मकांडों में मन कम लगता है।



लेकिन सुमिरन का जो कांसेप्टहैउसकी विशाल व्याख्या हो सकतीलेकिन यहां मैंने दीदी के हां में हां मिलाई और एक दार्शनिक अंदाज में दिल ही दिल में रोते हुए कहा कि 'नियति को यही मंजूर।कबीरदास जी की उक्तियां तो अनेकार्थी हैं। एक-एक वाक्य की बड़ी-बड़ी व्याख्या हो सकती हैलेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनके बारे में दीदी की हां में हां मिलाना ही ठीक लगा। असल में सुमिरन का यह मामला तो उसी तरह है जैसे हमारे सामने कोई तात्कालिक परेशानी आ गयी, हम मन ही मन प्रभु से प्रार्थना करने लगे कि हे ईश्वर दुख दूर करना, जब परिस्थितियां सामान्य हो गयीं तो हम ईश्वर को भूल गये। या सुमिरन करने की औपचारिकता सी निभाने लग गये। असल में यहां सुमिरन करने या नहीं करने की कोई बात नहीं। यहां भाव की बात है। घर में माहौल अच्छा हो तो साफ-सफाई, पूजा-पाठ, मेहमाननवाजी आदि सब में मन लगता है, लेकिन जब माहौल अच्छा नहीं हो तो मन उखड़ा उखड़ा सा लगता है। यही उखड़ा हुआ मन इन दिनों चोरगलिया दीदी के यहां है। जाहिर है सबसे ज्यादा व्यथित दीदी है। दीदी ऐसी दार्शनिक बातें कभी करती नही थी, जैसा इन दिनों कर रही है। लेकिन यह सब भी नियति है और सब समय का फेर है। देसी अंदाज में हमारी माताजी (ईजा) कहती थी, ‘मन करे गुड़मुड़ गाड़मुड़, करम करे निखाणी’ अर्थात मन में हम बहुत मनसूबे बनाते हैं प्लानिंग करते हं, लेकिन कर्म फल तो कुछ और ही लिखे होते हैं। खैर… ईजा की भी याद ही याद हैं और जीजाजी की भी। 

मित्र जैनेंद्र संग चर्चा और अंकल जीकी याद 

इसी दौरान मित्र जैनेंद्र सोलंकी जी के पिताजी के निधन की दुखद सूचना आई। जैनेंद्र जिन्हें हम जैनीबाबू कहते हैं, से करीब 22 साल पुराना नाता है। अंडरस्टैंडिंग है। अंकल जी से भी यदा-कदा मुलाकातें हो जाया करती थीं। जैनीबाबू की शादी में उन्होंने पूछा था, ‘बेटा कैसा इंतजाम है?’ मैंने कहा, ‘अंकल जी शानदार।’ उन्होंने तपाक से कहा, ‘यही सुनना चाहता था।’ वह अक्सर कुछ शारीरिक दिक्कतों का भी जिक्र करते और फिर खुद ही कह देते उम्र बढ़ने के साथ-साथ ऐसी समस्याएं आती रहती हैं। आंटी से अपनापन बहुत मिलता रहता है। इस बीच, जैनीबाबू से बातें हुईं। जो बात उन्होंने कही वाकई वह बहुत गंभीर और हकीकत के करीब थी। जैसे कि अक्सर कुछ बताने को मन होगा तो उनकी याद आएगी। खासतौर पर कोई पॉजिटिव बात। सचमुच ऐसाही होता है। हमारी ईजा को इस दुनिया से गए 13 साल हो गए हैं। आज भी जब कोई खुशी की बात होती है तो मन करता है कि तुरंत ईजा को फोन लगाऊं, लेकिन फिर याद आता है ओह वह तो हैं ही नहीं। फिर पहले उनकी तस्वीर देखता हूं फिर आसमान में और अपनी बात कह देता हूं। क्योंकि मुझे लगता है वह है इसी ब्रह्मांड में है। ऐसे ही जैनीबाबू ने कहा कि अचानक उनकी यादें आया करेंगी। साथ ही हम दोनों ने एक-दूसरे से कहा कि जीवन की असली सच्चाई मौत ही है, बस असमय कुछ नहीं होना चाहिए। बाकी तो सब प्रभु की इच्छा पर निर्भर है।  

दुख के मौके पर भी सामान्य परिस्थिति बनाने में बच्चों का अनमोल योगदान 




बच्चे सचमुच उत्सव सरीखे होते हैं। इनमें से भी लड़कियों का योगदान ज्यादा है। भावुकता का मामला हो या फिर घर में माहौल को अच्छा रखने का, सचमुच लड़कियों का योगदान कुछ अधिक होता है। वह परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाती हैं। जब दीदी के यहां पहुंचा तो था वहां भानजी रेनु अपनी बिटिया काव्या के साथ पहुंची थी। साथ ही भानजा मनोज था। मनोज की दोनों बिटिया जीवा और तनिष्का भी। तनिष्का के तो बोल अभी फूट ही रहे हैं, लेकिन वह इस बात को नहीं समझ पा रही है कि दादाजी आखिर गए कहां। बार-बार फोटो को देखती है और तेज इतनी है कि दादाजी के पसंद का गाना ढूंढ़ने को कहो तो यूट्यूब से खोल देती है। जीवा थोड़ी समझदार हो गयी है। उसने जब दादी यानी मेरी दीदी के गले लगकर यह कहा कि दादी हम हैं न आपके साथ, आप रोया मत करो। दादाजी तो स्टार बन गये हैं, मैं बहुत भावुक हो गया। उनकी कई और बातें भी दीदी ने बताईं जो बेहद भावु हैं। बात करें काव्या की तो पहले वह नाराज हो गयी कि जो चॉकलेट मैं ले गया था, वह उसे खाती ही नहीं। फिर दीदी की बहू दूसरी चॉकलेट लेकर आई तो फिर उसने बात शुरू की। अपने नाना को याद किया। मेरे सवालों का जवाब देते-देते उसने सवाल किया कि आप कल क्यों नहं आये। यानी वह एक दिन पहले आई थी और मेरे साथ खूब वक्त बिताना चाहती थी। फिर उसने मासूम सी बात कही कि शायद हो सकता है हमें भी जाने के लिए बस न मिले। यानी वह दिल से चाहती थी कि आज हम सब साथ रहें। इन बच्चों के मन में एक बात तो छिपी थी कि आज दादी के साथ इतने लोग हैं तो वह घड़ी-घड़ी रो नहीं रही है। इसलिए इस माहौल को बनाये रखना चाहिए। लेकिन ऐसा कहां होता है। दो घंटे बाद काव्या और रेनू चले गए और अगले दिन मैं भी चला आया। लेकिन थोड़े से वक्त में बच्चियों ने माहौल अच्छा बना दिया। आप भी देखिए ये एक-दो वीडियो।  

Monday, August 29, 2022

Twin टावर ध्वस्त ... एक संदेश एक सबक... जीवन दर्शन

केवल तिवारी

नोएडा स्थित बहु चर्चित ट्विन टावर को रविवार की दोपहर ध्वस्त कर दिया गया। कई वर्षों में तैयार करोड़ों के ट्विन टावर को ध्वस्त होने तें महज 10 सेकेंड का समय लगा। दो गगनचुंबी इमारतों के इस तरह से ध्वस्त होने के पीछे एक संदेश है, एक सबक है और जीवन दर्शन भी है। संदेश यही है कि भ्रष्टाचार की सुप्रीम सुनवाई अब भी है, इसलिए व्यवस्था से बहुत निराश होने की जरूरत नहीं है। 
इसी मलबे के ढेर पर खड़े थे टावर


लड़ाई थोड़ी लंबी हो सकती है, लेकिन परिणाम सामने आता ही है। ये इमारतें महज इसलिए नहीं गिराई गयीं कि ये खतरनाक थीं और इसमें रहना जोखिमभरा हो सकता है, बल्कि इसलिए भी गिराई गयीं कि दंभ किसी का नहीं चलेगा। तमाम नियम-कानूनों को ताक पर रखकर जिस तरह से बिल्डर ने यह समझ लिया था कि वह पैसों के बल पर सबकुछ खरीद सकता है, वह ऐसा कर नहीं पाया। सबक यही है कि देशभर में करोड़ों बिल्डर सिर्फ कमाई की ही न सोचें, उस भावना के बारे में भी संजीदगी से विचार करें जो उस व्यक्ति के मन में उमड़ती है जो सपनों का घर या आशियाना बनाने में अपने जीवनभर की कमाई को लगा देता है। इस टावर में भी लोगों ने बड़े अरमानों से पैसे लगाए होंगे, बेशक इसमें अनेक लोग ऐसे होंगे जिन्होंने सिर्फ इनवेस्टमेंट के उद्देश्य से पैसा लगाया होगा, लेकिन ज्यादातर के लिए सपनों का घर बन रहा होगा। दीगर है कि शीर्ष कोर्ट के आदेश के अनुसार उन्हें ब्याज समेत पैसा लौटाया जाएगा।
जीवन दर्शन इस अर्थ में है कि घर, परिवार, दोस्ती यारी सबके बनने में बहुत लंबा समय लगता है, लेकिन अगर उसे खत्म करने की बात हो तो कुछ ही पलों में यह खत्म हो जाता है। यह समाप्ति गलत फहमियों के कारण हो सकती है, विचारों और अहंकार के टकराव से हो सकती है। यदि ट्विन टावर की तरह ध्वस्त ही करना हो संबंधों को तब तो बिल्डर की तरह अड़ियल ही बने रहना ठीक, नहीं तो उदारता के साथ इतनी मजबूत इमारत बनाने की कोशिश करनी चाहिए कि परिस्थितिजन्य कोई भी डायनामाइट इसे उड़ा ही न सके। वैसे पार्ट ऑफ लाइफ यही है कि हवा के झोंकों के मानींद जीवन चलता रहता है।
सभी जानते हैं कि रविवार 28 अगस्त को नोएडा के सेक्टर 93ए में सुपरटेक के ट्विन टावर को उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद धराशायी कर दिया गया। दिल्ली के ऐतिहासिक कुतुब मीनार (73 मीटर) से भी ऊंचे गगनचुंबी ट्विन टावर को खास तकनीक से गिराया गया। ट्विन टावर भारत में अब तक ध्वस्त किए गए सबसे ऊंचे ढांचे थे। राष्ट्रीय राजधानी से लगे नोएडा के सेक्टर 93ए में सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट हाउसिंग सोसाइटी के भीतर 2009 से 'एपेक्स' (32 मंजिल) और 'सियान' (29 मंजिल) टावर निर्माणाधीन थे। इमारतों को ध्वस्त करने के लिए 3,700 किलोग्राम से अधिक विस्फोटकों का इस्तेमाल किया गया। ट्विन टावर में 40 मंजिलें और 21 दुकानों समेत 915 आवासीय अपार्टमेंट प्रस्तावित थे। यानी हजारों घर बसने थे और कई दुकानें भी। इन ढांचों को ध्वस्त किये जाने से पहले इनके पास स्थित दो सोसाइटी एमराल्ड कोर्ट और एटीएस विलेज के करीब 5,000 लोगों को वहां से हटा दिया गया। इसके अलावा, करीब 3,000 वाहनों तथा बिल्ली और कुत्तों समेत 150-200 पालतू जानवरों को भी हटाया गया। अनुमान के मुताबिक, ट्विन टावर को गिराने के बाद इससे उत्पन्न हुए 55 से 80 हजार टन मलबा हटाने में करीब तीन महीने का समय लगेगा। यहां भी एक संदेश है कि संबंधों को झटके से तोड़ा तो जा सकता है, लेकिन उसके बाद उपजी कड़वाहट को खत्म करने में कभी-कभी पूरा जीवन भी लग सकता है। इसलिए जीवन छोटा है, अपने हिस्से की उस जिम्मेदारी को पूरा कर लीजिए जिससे दूसरों को दुख न पहुंचे। हां आनंद ही नकारात्मकता मेें आता है तो कोई कुछ नहीं कर सकता।

Tuesday, August 23, 2022

लिखे हुए को पढ़ना, कहे हुए को सुनना जरूरी

 केवल तिवारी

बात शुरू करने से पहले एक किस्सा सुनाता हूं। करीब 20 साल पहले की बात है। फीचर में लिखने के लिए अनेक लोग अखबारों के दफ्तरों में चक्कर लगाते थे। ऐसे ही किसी लेखक का जिक्र करते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार ने पूछा कि आप किस तरह के लेख लिखते हैं। उन सज्जन ने अपनी लेखकीय विशेषज्ञता का बखान कर दिया। बाद में फीचर प्रभारी महोदय ने उनसे ताकीद की कि आप कुछ दिन लिखने के बजाय पढ़ना शुरू कीजिए। लगता है आप लिखते तो बहुत हैं, लेकिन पढ़ते कम हैं। उन दिनों मैं भी बहुत लिखता था। कुछ-कुछ पढ़ता भी था। खैर इस प्रकरण के बाद जब-जब लिखने का मौका आया, इस किस्से को याद करता हूं। अब दैनिक ट्रिब्यून में पिछले नौ सालों से ब्लॉग चर्चा कॉलम के लिए मैटर जुटाता हूं। जाहिर है कुछ पढ़ने का मौका मिलता ही है, इसके अलावा समीक्षार्थ अनेक पुस्तकें मिलती हैं, उन्हें निश्चित समय में पढ़ना होता है, इस तरह फढ़ना जारी है, इन सबसे इतर काम डेस्क का है, अक्सर खबरें रीराइट करनी होती हैं, तो पढ़ना ही पढ़ना।



 हां अखबार के लिए भले ही लेखन कम हो गया हो, स्वांत: सुखाय के लिए कभी डायरी तो कभी ब्लॉग लेखन जारी है, ऐसे में कल ही विचार आया कि लिखे हुए को पढ़ना जरूरी है। साथ ही कहे हुए को सुनना जरूरी है। कहे हुए को आप सुन तो नहीं सकते। हां अगर कुछ रिकॉर्डिंग की गयी हो तो सुना जा सकता है, लेकिन इस सुनने को दूसरे संदर्भ में इस अर्थ में ले सकते हैं कि आप समाज में बैठें तो सिर्फ अपनी ही बात करने के बजाय, दूसरों की सुनें। समाज में बैठो तो सुनना जरूरी है... असल में यह विचार भी मेरा मौलिक नहीं है। ब्लॉग चर्चा के लिए एक मैटर से मिला। एक आइडिया भी आया और उसपर काम करूंगा। खैर, लिखे हुए को पढ़ने की जहां तक बात है, अपनी दो तीन कहानियां पढ़ डालीं। कुछ डायरी के पन्ने पलटे। कुछ डायरियां बक्से में बंद हैं। यहां रेंडमली कुछ पन्नों का जिक्र कर रहा हूं। सुनने की तो जीन डेवलप हो चुका है। तो चलिए आज कुछ पुरानी बातें, बहुत पुरानी नहीं.... बहुत पुरानी भी शेयर करूंगा। आज कुछ पन्ने पलटते हैं कुछ वर्ष पूर्व की डायरी के-
1- रविवार 10 मई, 2015 चंडीगढ़ दोपहर 1 बजे
इस डायरी की शुरुआत में कई पन्ने ऐसे हैं जो वास्तव में डायरी होने का एहसास दिलाते हैं। मैंने उन पन्नों को इसीलिए अभी खाली छोड़ा है ताकि बीच-बीच में हिसाब किताब लिखूंगा। जैसे अभी थोड़ी देर बाद ही धन संग्रह का अपना हिसाब... खैर आज मैं ऑफिस से मिले अप्रेजल फॉर्म को भर रहा हूं। अभी कुक्कू की मदद ली, अब उसे लिखने जा रहा हूं। धवल और कुक्कू टीवी देख रहे हैं। भावना कपड़े धो रही है। यूं तो आज संडे है, मुझे 1 घंटे बाद ऑफिस जाना होता, लेकिन आज छुट्टी मिल गई है। इसलिए रिलैक्स होकर फॉर्म भर रहा हूं। फिर आज एशियन सर्कस बच्चों को दिखाने का मन है। थोड़ी देर पहले गुलाबी बाग प्रकाश का फोन आ गया था। वे लोग ज्वालाजी, माता चिंतपूर्णी आदि जगह यात्रा पर जा रहे हैं। 30 को चंडीगढ़ आएंगे।... अब फार्म भरने जा रहा हूं। ईश्वर सब ठीक रखना। गलतियां माफ करना। इस फॉर्म के जरिए, कुछ बेहतर हो यही कामना है।
2- सोमवार, 24 अगस्त 2015, तड़के 4:45 बजे
इस वक्त मुझे गहरी नींद में होना चाहिए था, लेकिन पता नहीं क्यों रात करीब 2:00 बजे से मुझे नींद नहीं आ रही है। ऐसी कोई तनाव वाली बात भी नहीं है। पिछले 2 दिनों से मेन डेस्क इंचार्ज हूं। सब सामान्य हो रहा है, लेकिन पता नहीं क्यों जब नींद नहीं आती है तो मन में कुछ तो उमड़-घुमड़ चलती ही है। कभी लखनऊ कन्नू-दीपू के बारे में सोचता हूं तो कभी दिल्ली में उत्तरांचल सोसाइटी और राजेश के कर्ज के बारे में। कभी फर्जीवाड़े की बातों में तो फिर कभी कुछ। कल मुझे मुंबई जाना है। इसका भी उमड़-घुमड़ चल रहा है। इस बार शायद 2 दिन के लिए रहना पड़ जाए। देखता हूं क्या होता है? जब नींद नहीं आ रही है तो सोचा डायरी लेखन यानी ईश्वर से संवाद कर लो। फिर एक अपनी अधूरी कहानी को भी पूरा करना है। और इसी बहाने ईश्वर से प्रार्थना भी हो जाएगी।
3- सोमवार, 19 अक्टूबर 2015, चंडीगढ़, दोपहर 1 बजे
थोड़ी देर पहले कालीबाड़ी मंदिर होकर आया हूं। भावना साथी। वापसी में घर के पास हरेश जी मिले। संक्षिप्त बात हुई। घर आकर तलवार फिल्म देखी। पहले आधी देख चुका था, फिर आधी आज देखी। वाकई फिल्म में जांच के तर्क हैं बहुत जबरदस्त। खैर कालीबाड़ी मंदिर में मैंने भगवान से प्रार्थना की कि दीपू आज कहीं इंटरव्यू देने गया है... उसका हो जाए। मां दुर्गा से अनुरोध है कि दीपू का काम हो जाए प्रसाद चढ़ाऊंगा। मैंने मंदिर परिसर से शीला दीदी को भी फोन लगाया, लेकिन उनका फोन नहीं उठा। मैंने सभी के लिए प्रार्थना की। जो रह गई उसके लिए क्षमा। डायरी लेखन कल रात के सिलसिले में भी लिखना था। पेज प्रीव्यू करने के बाद संपादक जी का मैसेज आया। उनका जवाब आया कि बात करना। इसके बाद मैंने बात की। अजय जी के बारे में बात हुई। मेरे काम को इन दिनों रिकोग्नाइज किया जा रहा है। ईश्वर सब ठीक रखना।
4- मंगलवार, 23 फरवरी 2016, दोपहर एक बजे
लखनऊ सौरभ गौरव का जनेऊ संस्कार बहुत बढ़िया ढंग से संपन्न हो गया। मैंने इस कार्यक्रम को बहुत इंजॉय किया। विपिन का साथ रहना बहुत अद्भुत था। रविवार को दिनभर तेलीबाग निवास भी बहुत अच्छा रहा। जब लौटे तो सबसे पहले तो ट्रेन लेट थी, लेट की खबर ने परेशानी में डाला। यह सोचकर कि 4 घंटे ट्रेन लेट हो गई तो क्या, पहुंच ही जाऊंगा, लेकिन अंततः मुझे कई घंटे बस अड्डे पर इंतजार करने एवं इधर-उधर हांडने के बाद गुलाबी बाग विपिन के यहां जाना पड़ा। वहां बीना ने बहुत बेहतरीन खाना बनाया था। खाना खाकर कुछ आराम किया, फिर शाम को एक बारात में चला गया, लेकिन मेरा मन कहीं भी नहीं लग रहा था। यह मेरे नौकरी के करियर में पहली दफा था जब मैं पहले से निर्धारित तारीख पर नहीं लौट पाया। अगले दिन भी न पहुंच पाया जाट आंदोलन के चलते सारी बसें बंद थी। बस अड्डे पर सहारा वाले नरेश वत्स मिल गए। हम लोग कश्मीरी गेट बस अड्डे से पहले आनंद विहार आए, वहां से गाजियाबाद। फिर वहां से शालीमार एक्सप्रेस पकड़कर मेरठ-मुजफ्फरनगर, सहारनपुर होते हुए अंबाला पहुंचा। वहां से रात 11:00 बजे घर पहुंचा। कुछ सबक भी लिया। पार्टी वगैरह में बैठना ठीक पर अकेले नहीं। मित्र दोस्त के साथ कोई रहे तो सब ठीक इसके अलावा भी बहुत कुछ। खैर इस बार पारिवारिक माहौल बहुत बढ़िया रहा। आज ऑफिस जाऊंगा।
चलिए, चलता रहेगा ये सफर और पुरानी डायरी के कुछ पन्नों को फिर पलटेंगे।

Friday, August 19, 2022

बात से निकली सार्थक बात, जब अनिरुद्ध जी का मिला साथ

 केवल तिवारी 

कुछ दिन पूर्व ऑफिस की कैंटीन में चर्चा के दौरान पंडित अनिरुद्ध से सार्थक बातचीत हुई। उन्होंने कहा कि मुझे कई बार यह लगता है कि आप इस बात का ध्यान ज्यादा रखते हैं कि आपके हावभाव पर दूसरे लोग गौर करते हैं और शायद इसीलिए आप चलने, फिरने और बैठने के अंदाज के प्रति सतर्क रहते हैं। यही नहीं बोलने में भी बहुत संतुलित होकर बोलते हैं। इसी के साथ उन्होंने जोड़ा कि आप अति एनर्जिक रहते हैं। एनर्जिक यानी ऊर्जावान बने रहना बहुत अच्छा है, लेकिन अति एनर्जिक अच्छा नहीं। इसी तरह चिंतन-मनन अच्छा है, लेकिन अति ठीक नहीं। 

पंडित अनिरुद्ध शर्मा 


उन्होंने यह टिप्पणी मेरे कमजोर होते शरीर को देखते हुए कही। मैं भी मानता हूं कि पिछले कुछ समय से मेरा वजन कम हुआ है। उसका पहला कारण तो यही है कि मैं बहुत ज्यादा सोचता हूं। पहली सोच पारिवारिक मसले पर होती है और दूसरी सोच कामकाजी मसले पर। दूसरा कारण है शुगर कंट्रोल रखने की जुगत। इसके तहत प्रतिदिन जहां करीब चार किलोमीटर की सैर है, वहीं मीठे से एकदम परहेज। खैर पंडितजी की कुछ बातों से मैं इत्तेफाक रखता हूं और मानता हूं कि शायद मेरे शरीर पर 'अति' का असर है। शादी-ब्याह में हंसी-ठिठोली का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मन की किया करें। यानी कभी जोर-जोर से हंसना है, कभी गुनगुनाना है और बिना परवाह किए कभी चुटकुले सुनना और सुनाना है। मैं इन सारी बातों से इत्तेफाक रखता हूं, लेकिन ऑफिस परिवेश में कुछ तो डेकोरम होता है। जहां तक एनर्जिक रहने की बात है, मेरी इच्छा है कि हर व्यक्ति ऐसा रहे। कोई लुंज-पुंज जैसा न हो। काम दिया और पहला शब्द हां होना चाहिए, शिकायतें बाद में। वैसे पंडित जी के साथ कई बातें होती हैं। पूजा-पाठ में भी उनके साथ कई बार भागीदारी रही है। परोपकार और निस्वार्थ यथासंभव सेवा के प्रति उनके भाव अनुकरणीय हैं। यह इत्तेफाक है कि जिस दिन उन्होंने ये बातें बताईं, उससे कुछ दिन पूर्व ही एक डॉक्टर से काउंसलिंग के बाद मैंने 'मस्त' रहने का फैसला किया था। असल में कई बातें होती हैं, जिन्हें जानते सब हैं, लेकिन व्यवहार में कई कारणों एवं किंतु-परंतुओं के चलते पालन नहीं कर पाते।

मैं अपने सोच के स्तर की कुछ कमियां गिना दूं। पहला, परिवार में अगर कोई ठीक से बात नहीं करता तो मैं घंटों, महीनों मंथन करने लगता हूं। कोई व्यक्ति अगर कहीं अपनी कार पार्क करता हो और किसी दिन वहां कोई और व्यक्ति कार पार्क कर दे तो मैं तनाव में आ जाता हूं, जबकि मेरा दोनों में से किसी से कोई खास लगाव या ताल्लुकात नहीं। ऑफिस का काम हो या किसी पारिवारिक समारोह का, सारा काम खुद पर उड़ेल लेता हूं, जाहिर है इससे दिक्कतें ही बढ़नी हैं और बढ़ती हैं। कभी हंसी-मजाक कर लूंगा तो फिर सोचने लगता हूं कि कहीं इस मजाक का नकारात्मक असर तो नहीं। कई बार सोचता हूं कोई ऐसा काम ही न करूं जिस पर पछतावा हो, फिर मानवीय स्वभाववश करता भी हूं तो फिर महीनों तक सोचता रहता हूं। कोई मेरी नमस्ते पर अच्छा रेस्पांस न दे तो उस पर भी सोचने लगता हूं। फिर अपनी तरफ से कोशिश करता हूं कि मैं तो ठीक बना रहूं। ऐसे ही बेवजह की बातें हैं। वैसे अब मैंने खुद को बहुत बदला है और उस बदलाव का असर भी मुझे महसूस हो रहा है। खैर...

यह भी इत्तेफाक है कि इसी चर्चा के दौरान मुझे पुस्तक 'बड़ा सोचें, बड़ा करें' पढ़ने को मिली थी। समीक्षार्थ। उसमें भी कुछ बातें बड़ी गजब की हैं। कुछ-कुछ पंडित अनिरुद्ध जी से बातचीत से मिलती जुलती हैं। उसकी कुछ बातें यहां लिख रहा हूं। उसमें एक महत्वपूर्ण संदेश है, 'अहं एक बुलबुला है। इसे फोड़कर सच्चाई जानने के बजाय हम अपनी ज्यादातर ऊर्जा इसकी रक्षा करने में लगा देते हैं।' मैं चाहता हूं कि इस बात को हर कोई समझे। साथ ही यह भी सोचता रहता हूं कि कई बार कुछ लोग क्यों मुझसे द्वेष रखने लगते हैं। फिर इसे भी पार्ट ऑफ लाइफ मानकर खुद को शांत करता हूं। इसी पुस्तक में एक जगह लिखा गया है, 'आदतें हमें उर्वर बनाती हैं, लक्ष्य हमें बंजर बनाते हैं।' लेखक कहता है लक्ष्य छोड़ो आदत बनाओ। आदत पढ़ने की, आदत जानकारी जुटाने की। एक जगह लेखक ने लिखा है, 'शिकायत करने से कभी किसी की समस्या नहीं सुलझती है।' यह बात मुझे अच्छी लगती है और आज तक किसी की शिकायत नहीं की। बल्कि कई बार दूसरों की गलती को अपने माथे पर मढ़ा है।

बातों-बातों से बातें निकलती हैं, ऐसी ही यह बात भी थी। कुछ समझने और कुछ सीखने का अवसर मिल जाए और वह सार्थक हो तो क्या बात। यही दुआ है कि ये बातें होती रहें।

गुरुजी की वह बात याद है, जब उन्होंने कहा था वाह वाह मेरा मन

यहां बता दूं कि एक बार अनिरुद्ध के सौजन्य से ही डीएवी कॉलेज के कार्यक्रम में जाने का मौका मिला। वहां गुरुदेव ब्रह्मर्षि गुरुवानंद जी मुख्य अतिथि थे। उन्होंने बच्चों से दोनों हाथ फैलाकर खुलकर बोलने के लिए कहा, वाह वाह मेरा मन। एक दो बार की कोशिश के बाद सबको ऐसा करने में आनंद आया। उन्होंने कहा कि अपने मन से बढ़कर कुछ नहीं। मन की सुनिए। मन की कीजिए और अपने नजरों से कभी मत गिरिए। इसी दौरान उन्होंने कहा कि संकल्प लें तो उस पथ पर पूरी निष्ठा से चलें क्योंकि संकल्प में विकल्प नहीं होता। यहां मैंने महसूस किया है कि मैंने कई बार संकल्पों में विकल्प ढूंढ़ा है। उस कार्यक्रम के बाद खुद को कई बार अलर्ट किया है और गुरुजी को याद किया है। वाकई उनके स्मरण से कई सकारात्मक चीजें हुई हैं।

Saturday, August 6, 2022

रक्षाबंधन और मुहूर्त : वेद माता श्री गायत्री शक्तिपीठ, देवभूमि कसार के पीठाधीश्वर आचार्य पंडित हुकमचंद मुदगल ने दूर की भ्रम की स्थिति

राहुल देव 
 सावन का महीना कई अर्थों में बहुत ही महत्वपूर्ण है। एक तो इस महीने विवाहिताएं अपने पीहर जाती हैं और सखियों संग झूला झूलती हैं। अठखेलियां करती हैं। इसके अलावा भी सावन के पवित्र महीने में शिव शंकर की पूजा अर्चना की जाती है। इस सबके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं,आध्यात्मिकता भी है और धार्मिक भावनाएं भी हैं। सावन के महीने का समापन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते वाला रक्षाबंधन पर्व के साथ होता ह। रक्षाबंधन का पर्व समय-समय पर कई चीजों की यादों को समेटे हुए हैं। इसमें कुछ कुछ परिवर्तन भी होता रहा है। भाई बहन के अलावा रक्षा सूत्र ब्राह्मण द्वारा बांधा जाना या अपने प्रकृति के प्रति रक्षा की भावना रखना, पर्यावरण को स्वच्छ रखना ऐसे ही अनेक कारण इस पवित्र त्यौहार के पीछे हैं। इसके अलावा भी सावन के महीने में खानपान का एक अलग अंदाज रहता है। मीठा ज्यादा खाया जाता है...
आचार्य पंडित हुकमचंद मुदगल

खैर इन सब बातों से इतर हम आते हैं रक्षाबंधन पर। जैसा कि कई बार होता है त्यौहार की असली तिथि यानी तारीख को लेकर कई बार भ्रम की स्थिति बन जाती है। रक्षा बंधन के संबंध में उत्पन्न भ्रमपूर्ण स्थिति को दूर करते हुए वेद माता श्री गायत्री शक्तिपीठ, देवभूमि कसार के पीठाधीश्वर आचार्य पंडित हुकमचंद मुदगल का कहना है कि रक्षा बंधन सदैव श्रावण मास की पूर्णिमा को ही मनाया जाता है और पूर्णिमा उस दिन 18 से 24 घड़ी या अपराह्न व्यापनी होनी चाहिए, जोकि इस वर्ष 11 अगस्त को 10 बजकर 38 मिनट पर शुरू होकर 12 अगस्त को प्रातः 7 बजकर 5 मिनट तक रहेगी। किंतु पूर्णिमा तिथि शुरू लगते ही भद्रा शुरू होगी जो रात्रि 8 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी, भद्रा के साए में राखी बांधना कष्टदायक हो सकता है। अति आवश्यक होने पर 11 अगस्त को भद्रा पूंछ या दुम के समय 5:18 से 6:18 तक रक्षा बंधन किया जा सकता है अन्यथा 11अगस्त को 8:54 रात्रि से 9:50 रात्रि तक सर्वश्रेष्ठ है। इसके बाद 12 अगस्त को सूर्य उदय समय से 7:05 तक रक्षा बंधन किया जा सकता है। वेदमाता श्री गायत्री शक्तिपीठ, देवभूमि कसार के व्यवस्थापक एडवोकेट राहुल देव मुदगल ने बताया कि रक्षाबंधन सावन मास की पूर्णिमा पर वेदमाता गायत्री की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। उन्होंने बताया इसके अलावा भी शक्तिपीठ में विश्व शांति एवं समृद्धि के लिए पूजा अर्चना के साथ साथ संस्कार संबंधी सुविचारों के आयोजन होते हैं।

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Tuesday, July 26, 2022

चलते रहो तरक्की पथ पर, स्वस्थ रहो और मस्त रहो

प्रिय बेटे कुक्कू (कार्तिक) खूब खुश रहो, खूब तरक्की करो। देखते-देखते बीटेक के दो सेमेस्टर (करीब 9 महीने में एक साल) पूरे हुए। जगह-जगह आईआईटी में चल रही तुम्हारी पढ़ाई के बारे में लोगों की प्रतिक्रिया सुनता हूं तो अपार खुशी से भर जाता हूं। कहीं खुद ही बढ़-चढ़कर बताता हूं कि बेटा बीटेक कर रहा है आईआईटी से। तुम्हें पिछले साल पत्र लिखा था, जब आईआईटी रोपड़ में जाना लगभग तय हो चुका था, लेकिन महामारी के विकराल रूप ने कुछ और ही कर दिया। तुम्हें याद होगा कि पिछले पत्र में एक कविता लिखी थी, वह पूरा पत्र और कविता मेरे ब्लॉग में भी है और शायद तुम्हारी डायरी में भी। अब तो वह डायरी पुरानी हो गयी है। अनुभव, समय के हिसाब से चीजें बदलती हैं, इसलिए तुम भी जब उस डायरी को पढ़ोगे तो कई सारे कैरिकेचर और मैटर पर तुम्हें भी हंसी आएगी। यही होता है, समय के साथ-साथ चीजें बदलती हैं। बस उम्मीदें, जज्बा और जोश को बनाए रखना चाहिए। सपनों को नहीं मरने देना चाहिए। और सबसे बड़ी बात कि अपनी ही नजरों में आदमी को ऊंचा बना रहना चाहिए। हर बर्थडे पर मन करता है कि कुछ बड़ा गिफ्ट दूं, लेकिन हर बर्थडे के आसपास कुछ ऐसा हो जाता है कि बस सोच ही बड़ी रह जाती है। इस बार भी तुमसे पूछा तो था कि क्या दें, लेकिन तुमने भी सारी स्थितियों को समझते हुए कह दिया, सब तो ठीक है। सब ठीक ही, वाकई। सबसे ठीक तो यह है कि घर में हंसी-खुशी का माहौल है। कुछ पारिवारिक मसलों पर मैं जरूर चिंतित रहा हूं, रहता था, शरीर कमजोर हुआ, फिर कई लोगों ने काउंसलिंग की और समझ में आया कि ज्यादा विचार मंथन नहीं करना चाहिए। चूंकि अब तक तुम्हें इन बातों से अंजान रखा था, लेकिन अब तुम कुछ-कुछ समझने लगे हो। बेशक समझो, या कभी हमसे कोई नेगेटिविटी सुनो तो उस पर करेक्शन करना और हमेशा अपनी तरफ से पॉजिटिव बने रहना। परिवार पहले। परिवार के बाद समाज। इसलिए नकारात्मकता को खत्म करना ही ठीक रहता है। जैसा कि तुम्हारा हमेशा फोकस पढ़ाई पर ही रहा है, वह जारी रहेगा ही साथ ही कॉलेज लाइफ को भी एंजॉय करो। अच्छाई-बुराई की समझ रखते हुए आगे बढ़ो। हमेशा मेरी लेखन शैली यानी स्टाइल ऑफ राइटिंग उपदेशात्मक ही रहती है, लेकिन उपदेश के अलावा फिलहाल कुछ ज्यादा दे भी नहीं सकता। जन्मदिन की बहुत-बहुत मुबारक। एक और कविता लिखने की कोशिश की है, पढ़ो कैसी लगती है। सफर पर हम चलते रहें, यूं ही डगर भरते रहें, जीवन के हर मोड़ पर नयी इबारत लिखते रहें। बदलाव को स्वीकार कर, कदम बढ़ते रहें, मंजिलों पर नजर रख, सीढ़ियां चढ़ते रहें। हैं दुआएं यही कुक्कू कि खुशहाली रहे बरकरार, जहां चल पड़ो तुम, तरक्की के खुल जाएं द्वार। अपनेपन की बगिया में समा जाये हमारा संसार, पढ़ाई, लिखाई, हंसी-ठिठोली और हो पूरा प्यार। आएंगे उतार-चढ़ाव, ये तो जिंदगी का दस्तूर, हर पल की अहमियत है, चलते ही रहना बदस्तूर। गिफ्ट के इस दौर में प्यार से बढ़कर कुछ नहीं, जब जुटेंगे सब लोग चल पड़ेंगे दूर कहीं। अपनेपन को बनाये रखना, भावनाओं को समझते रहना, मुबारक हो 20वां साल, मजबूती से चलते रहना। हजारों दुवाओं के साथ तुम्हारा पापा (साथ में मम्मी और भैया की बधाई)

Monday, July 25, 2022

आंगन की हरियाली, सीधे न करें जुगाली... पत्तों को सेवन से पहले धोएं जरूर

केवल तिवारी आपके आंगन में भी छोटी-मोटी बगिया होगी। गमले तो कम से कम होंगे ही। इन दिनों तो किचन गार्डन का भी शौक नये रूप में उभर रहा है। ऐसा ही शौक मेरा भी है। फूल के पौधों के अलावा कुछ रोजमर्रा के काम आने वाले भी पौधे लगाए हैं जैसे तुलसी, पुदीना, सदाबहार, आजवाइन वगैरह-वगैरह। आप लोग भी लगाते ही होंगे? यह पूछने का मेरा मकसद यह नहीं कि मैं कोई बागवानी टिप्स आपके लिए लेकर आया हूं, बल्कि सिर्फ यह ताकीद करना है कि गमले से सीधे तोड़कर पत्ते को चबाने से जरा परहेज करें।
यूं तो बरसात के मौसम में हरी पत्तियों या हरी सब्जी से बचने की सलाह दी जाती है, साथ ही यदि इनका इस्तेमाल करना ही हो तो अच्छी तरह से साफ करके खाने की सलाह दी जाती है, लेकिन यहां पर मैं आपको कोई आयर्वेद का ज्ञान भी आप अपना रुटीन अपने हिसाब से रखें, बस ध्यान रखें कि इस मुगालते में न रहें कि गमले तो आपके आंगन में हैं, आप उसमें नियमित खाद-पानी करते हैं, शुद्ध हैं इसलिए जब चाहें सीधे पत्ते तोड़े और सेवन कर लिया। जैसे कभी तुलसी का पत्ता चबा लिया, कभी सदा बहार का पत्ता लगे खाने। लेकिन ध्यान रखिएगा इन पत्तों को सीधे खाना नुकसानदायक हो सकता है। असल में पिछले दिनों शाम के वक्त मैं आंगन में बैठा था, वहां पुदीने के गमले के पास एक छिपकली दीवार पर लगी किसी चीज को चाट रही थी। यह क्रम लंबे समय तक चलता रहा (देखें वीडियो) इसके कुछ समय बाद ही मैंने देखा कि छिपकली पत्तों के बीच में भी बैठी है हालांकि वह तुरंत भाग गयी इसलिए फोटो या वीडियो नहीं बन पाया। इसी तरह कभी मक्खी, कभी मच्छर इन पत्तों पर बैठे दिखने लगे। पौधा चाहे इनडोर हो या आउटडोर, ऐसे खतरे बने रहते हैं। मैंने यह बात एक-दो मित्रों को बताई तो उनकी पहली प्रतिक्रिया थी, ‘अरे हम तो सीधे तोड़कर कई बार पत्ता मुंह में डाल लेते हैं।’ अब वो भी इस बात को मान रहे हैं कि सफाई तो जरूरी है। तो जब भी अपने ही गमलों की या किचन गार्डन की कोई पत्ती तोड़ रहे हों तो उसे सेवन से पहले धो लें। एक सज्जन तो कहने लगे कि मैं तो कभी-कभी कोई सूखी सी लकड़ी तोड़कर दांत में डाल लेता था, यह भी खतरनाक है। चलिए आज की बात बस इतनी...।

Monday, July 11, 2022

इतना आसान भी नहीं 'होम मेकर' की भूमिका

 केवल तिवारी

कभी गृहिणी, कभी घरवाली और कभी हाउस वाइफ के पद से नवाजी जाने वाली महिला का काम सचमुच बहुत आसान नहीं है। इसी कठिनाई को ध्यान में रखते हुए कुछ लोगों ने इस पद को 'होम मेकर' बना दिया। होम मेकर शब्द थोड़ा सम्मानजनक लगता है। ऐसे में इस सम्मानजनक पद को अनचाहे तौर पर इन दिनों मुझे भी संभालना पड़ा। कहानी लंबी है, शुरुआत संक्षेप से करता हूं। एक दुर्घटना में पत्नी के दाएं हाथ की हड्डी टूट गयी। 
प्लास्टर लगने के बाद उदास भावना


पहले सलाह मिली कि कोई मेड रख ली जाए। फिर सलाह में संशोधन हुआ कि मेड तो एक या दो घंटे के लिए आएंगी फिर कुछ 'रिस्टिक्शंस' भी हैं कि खाना खुद बनाना होगा वगैरह-वगैरह। फिर कहा गया कि किसी रिश्तेदार को बुला लें, रिश्तेदार को बुलाने की बात पर सीधे प्रेमा दीदी की याद आई। लेकिन वह कैसे आ सकती है, उस पर तो खुद ही दुखों का पहाड़ टूटा पड़ा है। उसकी याद सबसे पहले इसलिए आई कि न जाने कितनी बार उसने हमारी गृहस्थी की गाड़ी को सामान्य बनाने में मदद की है। उससे पहले हमेशा मां का साथ रहा। खैर... बात बहुत लंबी हो जाएगी क्योंकि जब मां का जिक्र होगा तो सारा मंजर सिमट जाएगा।
फाइनली पत्नी भावना की भाभी ममता जोशी जी ने वालिंटियरी काठगोदाम से आना स्वीकार कर लिया। इसके बावजूद कि वह खुद भी अस्वस्थ हैं, घर में उनकी उपस्थिति बनी रहनी आवश्यक है। पहले मैं उन्हें न बुलाने पर पूरा जोर डाल रहा था, लेकिन नौकरी के साथ गृहस्थी की गाड़ी भी खींचने में दिक्कत आई तो मैंने भी पत्नी से कह दिया कि बुला ही लो। वह आ गयीं। कुछ दिन मुझे काम का पता नहीं चला। सब काम समय पर हो रहे थे। लेकिन आखिरकार उन्होंने हमारा ख्याल रखा तो हमें भी उनका ख्याल रखना था और हमने उन्हें सस्मान काठगोदाम भेज दिया। पत्नी के हाथ का प्लास्टर कट चुका था और गरम पट्टी लगाने एवं सिकाई करने की ताकीद की गयी थी। इसी दौरान डॉक्टर ने सलाह दी कि फिलहाल प्रभावित हाथ से कोई काम न करें। यानी अभी काम मुझे करना ही था। तीन दिन में ही पता चल गया कि सचमुच 'होम मेकर' का काम कितना कठिन है। इतने कठिन काम को इतनी सहजता से कर लिया जाता है। 
मनसा देवी मंदिर प्रांगण में अपनी भाभी संग प्रसन्न मुद्रा में।


मुझे याद आता है घर के बड़े लोगों की जिन्होंने भरे-पूरे परिवार का दायित्व भी संभाला और हंसी-खुशी संभाला। साथ ही कई जानकारों के बारे में पता है कि कैसे कामकाजी महिलाएं घर का सारा काम करती हैं और साथ में जॉब भी। ऐसी महिलाओं को तो सैल्यूट है। खैर जब महिलाओं को सैल्यूट की बात आती है तो पत्नी को एक सैल्यूट इस बात का बनता है कि उन्होंने बाएं हाथ से काफी काम करना शुरू कर दिया है। मानो कह रही हो, तुम इतना परेशान मत होओ कई काम निपटाना तो हमारे बाएं हाथ का खेल है। फिर फरीदाबाद में भव्य की वह बात भी तो स्मरणीय है जब उसने कहा, बुआ आप कुछ दिनों के लिए हमारे पास आ जाओ, ताकि फूूूफा जी को भी पता चले कि पत्नी के बगैर कितनी दिक्कत होती है। हंसी मजाक। खैर भावना के जल्द स्वस्थ होने की कामना के साथ। चूंकि बात घर-गृहस्थी, मां-बहन और पत्नी पर घूमी तो हर बार की तरह इस बार भी ऐसी देवियों को समर्पित कुछ शेर जिन्हें इधर-उधर से टीपा है-

कोई टूटे तो उसे सजाना सीखो, कोई रूठे तो उसे मनाना सीखो …
रिश्ते तो मिलते है मुकद्दर से, बस उसे खूबसूरती से निभाना सीखो … ।।

जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है, माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।

दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूँ, कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए।

चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है, मैंने जन्नत तो नहीं देखी है, माँ देखी हैै

शरीफ़े के दरख़्तों में छुपा घर देख लेता हूँ, मैं आँखें बंद कर के घर के अंदर देख लेता हूँ।

उसने सारी कुदरत को बुलाया होगा, फिर उसमें ममता का अक्स समाया होगा,
कोशिश होगी परियों को जमीन पर लाने की, तब जाके खुदा ने बहनों को बनाया होगा।

सफ़र वही तक हैं जहाँ तक तुम हो, नजर वहीं तक हैं जहाँ तक तुम हो,
हजारों फूल देखे हैं इस गुलशन में मगर, ख़ुशबू वही तक हैं जहाँ तक तुम हो।

Tuesday, June 28, 2022

रेलवे ई टिकट... और झांसे से बचिए

केवल तिवारी

हो सकता है कि आप लोगों को रेलवे के नियमों का पता हो। यह भी हो सकता है कि आप लोगों में से कई लोग मेरे जैसे अनाड़ी हों। जो भी हो झांसे से बचिएगा। अक्सर सुनता था कि यह सरकार कदम दर कदम कुछ ऐसा कर रही है कि आपको पता नहीं होता और आपकी जेब चुपचाप कट चुकी होती है, लेकिन कहते हैं न कि 'बात समझ में तब आई, जब खुद पर बीत गई।'
आईआरसीटीसी से आया जवाब


असल में 5 जून को भतीजे की शादी के लिए लखनऊ जाना था। महीनेभर पहले ईटिकट लिया। वेटिंग का। लोगों ने उम्मीद जताई कि शायद कनफर्म हो जाए। कुछ 'जुगाड़' की भी व्यवस्था की, लेकिन कुछ काम नहीं आया। कुछ लोगों ने तत्काल टिकट कराने की सलाह दी। ऐन मौके पर उसकी कोशिश की तो पता चला कि तत्काल में भी कई तत्काल हैं। प्रीमियम और पता नहीं क्या-क्या? खैर.... अपनी स्थिति तो वही है
जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
चंडीगढ़ से लखनऊ की ट्रेन में तीन लोगों के लिए कराया गया रिजर्वेशन (वेटिंग) आखिरकार ऐन मौके पर आरएसी हो गया। (पीएनआर नंबर 2341282924) दो लोगों का आरएसी हुआ और तीसरा टिकट वेटिंग ही रहा। एक नंबर पर अटक गया। यानी वेटलिस्ट नंबर एक। मैंने हमेशा की तरह रेलवे पर भरोसा करते हुए जाने का फैसला किया और बेटे धवल जिसका टिकट कनफर्म नहीं हो पाया यानी वेटलिस्ट एक था, उसके लिए काउंटर टिकट ले लिया। किसी तरह एक ही सीट पर बैठकर पूरी रात गुजारी। रात में एक दो लोगों से बात हुई और इस बात पर मैंने आश्चर्य जताया कि आरएसी तो दो ही लोगों का है, लेकिन टीटीई ने बच्चे के टिकट के बारे में क्यों नहीं पूछा। एक - दो लोग हंसते हुए बोले, 'आपने टिकट लिया है ना इसलिए, अगर नहीं लिया होता तो जरूर पूछता।' मैंने भी उनकी बात में हामी भरी। खैर हम लोग पहुंच गये। गनीमत है कि 13 तारीख को वापसी का टिकट कनफर्म था। कुछ दिन इंतजार के बाद भी जब ईटिकट वेटलिस्ट का पैसा नहीं आया तो मैंने अपने मित्रों से बात की। उन्होंने भी कहा कि पैसा तो वापस आ जाना चाहिए था। मैंने फिर आईआरसीटीसी को एक मेल कर दिया। एक दिन बाद मेल का जवाब आया। उसका लब्बोलुआब यह था कि एक नये अधिनियम के तहत नियम बदल गए हैं। अगर टिकट में से किसी का भी आरएससी या कनफर्म हुआ है तो बाकी का पैसा तभी आएगा जब आप ट्रेन छूटने से तीन घंटे पहले उसे कैंसल कराएंगे और एक फॉर्म भरकर देंगे। नहीं तो कोई पैसा नहीं मिलेगा। अब यह नियम कब बन गया, कितनों को पता है, नहीं मालूम। मेरे संपर्क के तो ज्यादातर लोगों को इसका पता नहीं। मैं बेवकूफ था, काउंटर टिकट भी लिया, परेशानी भी झेली और रेलवे वालों ने भी बेवकूफ साबित किया। आप लोगों को भी ऐसी दुश्वारी न झेलनी पड़े, सावधान रहें। यह तो एक बानगी भर है, मामले न जाने कितने होंगे। बात छोटी सी है लेकिन कहनी जरूरी थी। क्योंकि
ख़ामोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है,
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।

Saturday, June 25, 2022

दीपू की शादी, खुशियों की सौगात

 केवल तिवारी

दीपू की शादी, खुशियों की सौगात।

शगुन की हल्दी, मेहंदी की रात।

परिवार का संगम, अपनों से मिलन।

कुछ दौड़ धूप, कुछ बातें-वातें।

चाय की चुस्की, व्यंजन का स्वाद।

पूजा-पाठ और पूर्वजों की याद।

ऐसे ही नजारे रहे प्रिय भतीजे दीपू की शादी के। भावनाओं के उमड़-घुमड़ के बीच तीखी धूप में भी कोई थकान नहीं। खुशियों के इस मौके पर भाभीजी-दाज्यू और प्रिय भतीजी कन्नू का उत्साहपूर्वक अतिथियों का स्वागत और अतिथियों का भरपूर सहयोग सचमुच दिल को छूने वाला नजारा रहा। रिजर्वेशन की मारामारी के बीच डेढ़ घंटे ट्रेन के विलंब के बीच 6 जून को जब हम लखनऊ पहुंचे तो एकदम तरोताजा। ठीक एक महीने पहले भी तो लखनऊ पहुंचा था जब मेरे पहुंचते ही आनन-फानन में दुल्हन (जया) को टीके का कार्यक्रम बनाया गया। उसी दिन दीपू के ससुराल पक्ष से मुलाकात हुई। गजब संयोग है कि दोनों समधी समान नामराशी के हैं। दोनों का नाम भुवन चंद्र। खैर...। बड़े बेटे कार्तिक का मन बहुत था कार्यक्रम में शामिल होने का, लेकिन उसकी पढ़ाई की व्यस्तता के चलते वह हॉस्टल में ही रहा। जिस दिन हम पहुंचे, उसी दिन दीपू (प्रमाणपत्र में नाम प्रदीप) के छोटे मामा विनोद जोशी जी का परिवार भी पहुंचा था। चूंकि पारिवारिक मित्रता के अलावा उनसे तब से प्रगाढ़ संबंध हैं जब से मैं नोएडा गया हूं। यानी लगभग 20 साल पुराना। हालांकि लखनऊ छोड़े हुए मुझे करीब 28 साल हो चुके हैं। चलिए बात फिर से खुशियों की सौगात पर आकर टिकाते हैं। एक-दो दिनों बाद मेहमानों का आना शुरू हुआ। इस बीच, लखनऊ के स्थानीय निवासी भी आते-जाते रहे। कुछ को पहचान पाया, कुछ ने अपना परिचय खुद ही दिया। मैं सबको उसी तरह का लगा, जैसे पहले था, लेकिन मुझे बड़ा परिवर्तन दिखा, लोगों में भी और उस इलाके में भी। विकास की तेज रफ्तार पूरे इलाके में चल चुकी है। आगे वृंदावन कालोनी, फिर नये-नये रूट, सचमुच बहुत बदल गया था तेलीबाग। मैं और कन्नू कई बार बाजार गए। कई बार अकेले भी गया। मन में उमंग, शादी की तरंग। दूल्हे राजा यानी हमारे भतीजेश्री 8 को लखनऊ पहुंचे। उसके बाद जाहिर है रौनक और बढ़नी ही थी और बढ़ी। गणेश पूजन, हल्दी आदि के कार्यक्रम होने लगे। धीरे-धीरे पारिवारिक लोग पहुंच रहे थे और हम सब आनंदित थे। सचमुच ऐसे कार्यक्रम कितने अच्छे होते हैं। 9 जून को दिल्ली से हमारे परिवार के अनेक लोग पहुंच गए। उनके पहुंचने पर खुशी का मंजर देखने लायक था। भतीजा दीप तिवारी, उसका परिवार, प्रकाश और उसका परिवार, आदरणीय बड़ी भाभी जी, बीना, मिन्नीनी, नीरा, प्रेमा और गौरव जी। वातावरण और आनंदमय हो गया।

नौ जून को सुआल पथाई का कार्यक्रम चला। उस दिन गीत-संगीत होते रहे और धार्मिक कार्यक्रम भी। इसी दौरान आवदेव आदि भी हुआ। यहां बता दूं कि हमारे यहां एक बेहतरीन परंपरा है कि हर शुभकार्य में आवदेव होता है, इसमें अपने पूर्वजों दादा-दादी, परदादा-परदादी आदि को याद किया जाता है। यही नहीं मातृ पक्ष से भी यह याद करने का सिलसिला चलता है। इसमें परनाना-परनानी आदि को याद किया जाता है। यह धार्मिक कार्य इस बात की सीख देता है कि हमने अपने से बड़ों का हमेशा सम्मान करना है। पारिवारिक माहौल इसी संदर्भ में बेहतरीन होता है कि बड़ों का सम्मान हो, उनके अनुभवों का लाभ लिया जाए और कुछ सीखा जाये। नयी पीढ़ी को यह समझाया जाये कि पूर्वज हैं तो हम है। खैर... इसी सुआल पथाई का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद उत्सव का प्रतीक माने जाने वाली महिला मंडली ने मेहंदी लगाई। कुछ लोग पहले ही मेहंदी लगा चुके थे। इस दौरान पूरे परिवार की महिलाओं के अलावा पड़ोस की बहुओं ने बढ़चढ़कर भाग लिया। कोई किसी को खाना खिला रहा है, कोई एक-दूसरे की मेहंदी की तारीफ कर रहा था।

हल्दी और गीत संगीत

कार्यक्रम के बीच में ही भतीजी कन्नू से मुझसे कहा, ‘चच्चा मैं चाहती हूं कि ऑरिजनल फूलों की मालाओं की लड़ियां लगाई जाएं।’ मैंने उसकी बात में हामी भरी। दीवाली पर मैं भी गेंदे के फूलों की लड़ियां जरूर लगाता हूं। एक फूलवाले से बात हुई और मालाएं लगा दी गयीं। इन मालाओं ने एक अलग रौनक दी। इसी दौरान मेहंदी और हल्दी का स्टेज भी लगा दिया गया। हल्दी वाले दिन सब लोग एक अलग ही रौनक में दिख रहे थे। जाहिर है पीला रंग खुशी का रंग है। हल्दी वाला रंग है। हम सबने पीले वस्त्र पहने थे। एक अलग खुशी झलक रही थी। इसी दौरान दिल्ली से भतीजा हरीश,  जवांई दर्शन जी और बच्चे प्रशांत, अमित आदि पहुंच गये। उनके आने के बाद खुशियां और बढ़ गयीं। दोपहर बाद महिला संगीत में एक अलग रौनक आई। गीतों का चयन। मैं और भतीजी गीतों को स्पीकर में लगाने लगे। हॉल में नृत्य का कार्यक्रम चला। साथ-साथ चाय-पकौड़े भी। इसी दौरान मेरे कई जानकार मिले। जल्दी-जल्दी में हालचाल लिए। प्रसन्नता व्यक्त की गयी।

शानदार विवाहोत्सव

ऊं ग्वेल देवताय नम:, भगवती माताये नम:, कुल देवियाये नम: सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:। आखिरकार वह घड़ी आई जब हमारा प्यारा भतीजा दूल्हा बना। हम सब सजधज के तैयार हो गये। ढोल बजने लगे। बारात प्रस्थान के लिए सब खड़े थे। दिल्ली से आए भतीजे के साथ आसपास के कुछ लोगों को गाड़ी में स्टीकर चिपकाने का काम दिया। बारात में चलने वाली महिला मंडली के लिए मिनी बस वहीं पहुंच गयी। पुरुषों के लिए बस थोड़ी दूर पर थी। इसमें अंतर का कारण सिर्फ गलियों का संकरी होना था। कुछ मित्र अपने वाहन ले आये। नाचते-कूदते हम लोग चल दिये, जया को बतौर दूल्हन अपने घर लिवाने। कल्याणपुरी के पास बारात पहुंची। शानदार स्वागत हुआ। कुछ देर वहां बैंड बाजे के साथ नाच-गाना हुआ। फिर धूलिअर्ग्घ। उसके बाद जयमाल फिर भोजन।  रात्रि में विवाहोत्सव के दौरान हंसी-मजाक। उधर से आ रही बोलियों का इधर से प्रतिउत्तर। बड़ा मजा आया। कभी कोई महिला दाज्यू के लिए प्रिय समधी जी कहतीं तो यहां से दाज्यू के माध्यम से हम लोग जवाब देते। कभी कुछ तो कभी कुछ। साथ में पूजा-अर्चना। उनके पंडित जी से मेरी मुलाकात महीनेभर पहले ही हुई थी, इसलिए बातचीत हुई। इधर आदरणी पूरन तिवारी जी पुराने जानकार। 







मंत्रोच्चार में भानजे आचार्य नवीन पांडे नानू ने भी खूब रंग जमाया। कुल मिलाकर पूरी रात कब निकल गयी पता ही नहीं चला। इस कार्यक्रम में कुछ फोटो शानदार बनीं। जैसे प्रिय भतीजी प्रेमा का निर्मला और कन्नू के साथ मेरा फोटो खिंचवाना। कभी कन्नू का अपनी मम्मी, चाची और दिल्ली से आईं बहुओं संग फोटो। सचमुच ऐसे शुभकार्यों में ऐसी रौनक भीतर से प्रफुल्लित कर देती है। ईश्वर प्रदीप (दीपू) और जया को खूब प्रसन्न रखे। हम सबका आशीर्वाद है। यहां कुछ फोटो और वीडियो साझा कर रहा हूं। आप लोग देखिए, सुनिये आनंद लीजिए।



Wednesday, June 15, 2022

सुनना सीखिए... ज्ञान की गंगा और कर्णधारों से मिलन का सार्थक प्रयास

 केवल तिवारी

मुझे विलंब हो गया। जिस प्रकरण का यहां जिक्र कर रहा हूं, उसके बाद तो हमारे धन संग्रह परिवार की एक बैठक और हो चुकी है। लेकिन खुद को समझाने जैसी कवायद कि चलो देर आयद, दुरुस्त आयद। बात है 8 मई, 2022 की। बेंगलुरू से विनोद पांडे जी ने पहले से कार्यक्रम बनाकर मेरी राय ली, मैंने धन संग्रह परिवार से और हो गया कार्यक्रम तय। कौन कैसे और कहां से में बात लंबी हो जाएगी... इसलिए आते हैं असल मुद्दे पर। बैठक हमने सबकी सहमति से सार्थक प्रयास के पुस्तकालय में की। यह इच्छा विनोद पांडे जी और मेरी थी। सामाजिक संगठन सार्थक प्रयास के अध्यक्ष उमेश पंत जी ने कहा कि जब बच्चों से मुलाकात का कार्यक्रम तय ही है तो क्यों न हम उनसे कुछ अनौपचारिक बातचीत भी कर लें। इत्तेफाक से उस दिन मदर्स डे था। सबने अपनी भावनाओं को अपने ढंग से व्यक्त किया। इस दौरान बच्चों की जिजीविशा को देखकर बहुत कुछ सीखने को मिला। प्रसंगवश बता दूं कि इस ब्लॉग को इतना विलंब हो गया कि इसी दौरान खबर आई कि सार्थक प्रयास का एक बच्चे रोहित की जॉब लग गयी है और जॉब लगने के बाद वह सबसे पहले सार्थक प्रयास के अपने जानकारों से मिलने आये। मेरी दुआ है कि ऐसे ही अनेक बच्चे आगे बढ़ें और पीछे से आ रहे बच्चों के लिए कुछ न कुछ योगदान करें। खैर... पिछली बात को आगे बढ़ाते हैं।

बच्चों के साथ बातचीत के दौरान पुनीत भट्ट जी और ममगाई जी का भावुक होना एकदम अलग अहसास कराने वाला था। एकदम अलग अंदाज में दिख रहे हमारे भाई भुवन चंद्र सती ने भी बेहतरीन तरीके से बच्चों का हौसला बढ़ाया। मेरे अग्रज हीराबल्लभ शर्मा जी ने बच्चों को बहुत सी प्रेरक बातें बताईं जिनमें से मुझे जिस बात ने सबसे अधिक प्रभावित किया, वह था सुनने की क्षमता को बढ़ाना। उन्होंने कहा कि आलोचना भी करें, निंदा भी करें लेकिन पहले सुनने की क्षमता को विकसित करें। सुनेंगे नहीं तो उसकी अच्छाई या बुराई का विश्लेषण कैसे करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने मेहनत, लगन की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। भास्कर जोशी, सिद्धांत सतवाल, चंदन दा, विनोद जी, उमेश पंत जी, पांडे जी, संजय वर्मा जी, रघुबर सिंह जी, प्रकाश पंत जी आदि ने बच्चों के साथ सार्थक बात की। साथ ही यह भी कहा कि बहुत कुछ इन बच्चों की बातों से भी सीखने को मिला है। मां पर कुछ भावुक टिप्पणियां हुईं और कुछ अन्य कवियों की बातें। थोड़ा विलंब होने पर हर बच्चे का नाम और रचना स्मृति पटल पर नहीं है, लेकिन यकीनन यह संवाद बहुत शानदार रहा। सार्थक प्रयास के बच्चों और पंत जी का विशेष आभार। अधिकतम लोग मौजूद रहे, इसलिए आनंद दोगुना हो गया। कुछ अन्य बातें हैं जिन्हें एक कहानी के रूप में आगामी ब्लॉग में साझा करूंगा। इस ब्लॉग के साथ उस दिन की कुछ फोटो साझा कर रहा हूं।