केवल तिवारी
गौरव संग मनीषा चली
खुशियों की बयार बही
इस मौके पर जुटा परिवार
रिश्तों में आई वसंत बहार
बीना का स्नेहिल निमंत्रण
नितिन-मानसी का प्रबंधन
मनीषा-गौरव हुए एक-दूजे के
स्वागत करे दीपू हंस-हंस के
कुल देवता से अर्जी हमारी
शुभकार्य होते रहें बारी-बारी।
गत 26 अप्रैल को जब नोएडा से लौट रहा था तो उक्त पंक्तियां अपने आप मन में चल रही थीं। उसी सुबह हमारी प्यारी मिन्नी यानी मनीषा दुल्हन बनकर गौरव के घर के लिए विदा हुई थीं। तीन दिनों के इस शुभ कार्य में दो दिन मेरी भी सपत्नीक भागीदारी रही। सच में, पता ही नहीं चला कि ये दो दिन कब निकल गये। अपनों से मिलन, पुरानी बातें, भविष्य का दर्शन, पूजा-पाठ का विवरण, बच्चों के भविष्य संबंधी तैयारी से लेकर तमाम बातें हुईं। करीब डेढ़ माह पहले बीना का फोन आ गया था। उन्होंने कहा था कि बिटिया की शादी में आना है और हर कार्यक्रम में शामिल होना है। उसी दौरान नितिन से भी बात हुई, वह बचपन से ही मुझे बड़बाज्यू (दादाजी) बोलता है। रिश्ता ही यही है। उसने भी कहा कि हम लोग कार्यक्रम में समय पर पहुंचें। मिन्नी यानी मनीषा के विवाहोत्सव का मुख्य कार्यक्रम 25 अप्रैल की रात का था। चंडीगढ़ से मैं और भावना (पत्नी) 24 की सुबह निकले और दोपहर होते-होते हम लोग नोएडा सेक्टर 121 स्थित Cleo County अपार्टमेंट पहुंच गये। पहले हरीश से बात हुई, फिर नितिन ने पार्किंग पास बनवाने की औपचारिकता पूरी की। लिफ्ट में चढ़ने की तैयारी ही थी कि मानसी (बीना की बहू, नितिन की पत्नी, मिन्नी की भाभी और लाव्या की मां) अपनी माताजी के साथ मिल गयीं। भावना से इनकी पहली मुलाकात थी। मैं तो कई बार मिल चुका था। मानसी और उनकी माताजी ने सबसे पहले हमें बधाई दी। असल में कुछ दिन पहले ही मेरे छोटे बेटे धवल का रिजल्ट आया था। हमने बधाई स्वीकारी और उन्हें भी बधाई दी मिन्नी के विवाह की। हम लोग बीना के घर पहुंचे। वहां गीत संगीत चल रहा था। बेटियां हों या महिलाएं, उत्सव तो वही होती हैं। फिर हमारे पहाड़ में रिवाज तो बेहतरीन है। पंडित जी मंत्रोच्चारण करते रहते हैं और महिलाएं गीत संगीत। सकूना देवा। गजानन शंभू के नंदन। कुछ मेल-मिलापों के बाद हमसे उसी सोसाइटी में दूसरे फ्लैट 25वीं मंजिल पर चलने के लिए कहा गया। वहां लंच तैयार था। वहां पहुंचे तो कुछ लोग लंच कर रहे थे और कुछ तैयारी में थे। वहां दाज्यू, हेम, हरीश, दीप, प्रकाश आदि से मुलाकात हुई। भोजन के बाद मन हुआ कि कुछ देर सोया जाये। थकान थी। दाल-भात और रायता भी खाया था। लेकिन अपनों से मिलने की खुशी और बातों का लालच। बातों-बातों में पूरा दिन निकल गया। शाम की चाय के बाद तैयारी होने लगी लेडीज संगीत कार्यक्रम की। वहां अन्य सभी लोगों के अलावा नितिन के ससुर जी हरीश शर्मा जी से कुछ देर बात हुई। फिर लेडीज संगीत का यह कार्यक्रम कब शुरू हुआ और कब खत्म, पता ही नहीं चला। परिवार के लोगों के बीच उत्साहपूर्वक सभी ने समूह नृत्य किया और अनेक ने व्यक्तिगत भी। इन सबमें छाये रहे भाई-बहन। लड़के-लड़कियों ने मंच पर पहुंचकर समा बांध दिया। साथ में आई हमारी मिन्नी। अगली सुबह हल्दी के तैयार होने की ताकीद के साथ ही हम लोग 25वीं फ्लोर के फ्लैट में अपनी-अपनी जगह पहुंच गये। अगली सुबह प्रकाश ने गरम पानी और चाय के प्याले के साथ उठाया। उसका प्रबंधन हमेशा बेहतरीन रहता है। किससे क्या काम लेना है, यह भी उसे बखूबी आता है। खैर हम तो अब बुजुर्ग की श्रेणी में आ गये हैं। रिश्ता हमारा बचपन से ही बुजुर्ग वाला है, इसलिए आराम से ही रहे। नयी पीढ़ी के उत्साह को एंजॉय किया। 25 अप्रैल की सुबह हल्दी कार्यक्रम, वहीं नाश्ता हुआ। इसी बीच नितिन के मामा द्वय- दिनेश और मुन्नू से भी कुछ देर वार्तालाप हुई। दोपहर बाद हम कुछ लोग पास ही में एक होटल में चले गये जहां बारात पहुंच रही थी। नितिन ने वहां व्यवस्था देखने को कहा। वहां गौरव (दूल्हे राजा) के पिताजी, भाई समेत करीब-करीब सभी बारातियों से मुलाकात हुई। लखनऊ पूरन जीजा जी के समधी-समधन भी शाम को शादी में पहुंचे, उनके साथ भी अच्छा समय बीता। होटल फिर बैंकट हॉल और शादी व्याह के दौरान अपनों से मुलाकात के इस दौर में रात का एक कब बज गया सच में पता नहीं चला। इस बीच ऐसा लगा जैसे कई मौकों पर मेरे साथ बिपिन (बीना का पति मेरा भतीजा और नितिन, मिन्नी, दीपू के स्वर्गवासी पिता) चल रहा है। ऐसा भी महसूस हुआ जैसे मैं उससे बात कर रहा हूं। असल में, वह रिश्ते में भतीजे जैसा था और हकीकत में दोस्त जैसा। बहुत बातें शेयर करते थे हम लोग। कोरोना काल का दूसरा दौर उसके लिए प्राणघातक हुआ। खैर... वह यादों में तो सदा जीवित रहेगा ही। वह कहीं न कहीं से हम सबको देख रहा होगा। मिन्नी की शादी के इस समारोह में अनेक ऐसे लोग मिले जिन्हें मैं बिपिन की वजह से ही जानता था। वे लोग आए, मुलाकात हुई। कई परिजन भी मिले। हालचाल लिए। इसी बीच मैं एक सोफे पर पसर गया। तभी केक काटकर तालियां बजने की आवाज आई। पता चला कि दीप-ज्योति की शादी की सालगिरह है। मैंने भी वहां जाकर उन दोनों को बधाई दी और फिर दीप मुझे रात करीब ढाई बजे फ्लैट पर ले आया। मेरे लिए एक-दो घंटा सोना जरूरी था क्योंकि अगली सुबह मैंने चंडीगढ़ के लिए लौटना था। बहुत शानदार रहा समूचा आयोजन। पूरे परिवार बधाई के पात्र हैं।
तिवारी परिवार के बच्चों को सैल्यूट
अमित, नीरज, हितेश, प्रशांत, चिराग, दीपेश, शुभम, सार्थक (लड़कों की टोली) और दीपू, दीया, गुन्ना और उनकी सहेलियां (लड़कियों की टोली)। तिवारी परिवार एवं उनके परिजन के इन बच्चों ने हर कार्यक्रम में समां बांधा। उत्सव सरीखे इन बच्चों ने काम भी निभाया और माहौल को भी आनंदित किया। इनमें से ज्यादातर बच्चों की नौकरी लग चुकी है और कुछ कगार पर हैं। लेडीज संगीत के दौरान ग्रूप डांस हो या फिर दिन में सामान इधर से उधर पहुंचाना। बीच-बीच में घरवालों के साथ तालमेल की बात हो या फिर किसी को गाड़ी से इधर-उधर छोड़ने की। इन सबका उत्साह देखते ही बनता था। हर किसी के निर्देश पर ये अपने डग भर लेते और थकान तो जैसे छू मंतर थी। शायद कभी हम लोग भी ऐसे ही हुआ करते थे। हां काम और उसके तरीके अलग होंगे। इन सभी बच्चों को सैल्यूट।
साथ बैठकर कीं पुरानी यादें ताजा
काफल, हिसालू, कैरुवा, तरुड़, सम्यो और किलमौड़। इन नामों को पढ़कर किसी के मन में सवाल उठना लाजिमी है, लेकिन ये भी हमारी चर्चा का विषय रहे। असल में हरीश ने गांव की पुरानी बातों को याद किया। इनमें से कुछ फल हैं, जंगली फल और कुछ सब्जी, वह भी जंगल में पाई जाने वाली और एक ऐसी पत्ती जो धूप का काम करती है, वह भी जंगलों में नमी वाले इलाकों में मिलती है। हम सब लोग इन बातों में कई साल पीछे चले गये। मन-मस्तिष्क में एक चित्र सा खिंचने लगा। इसी बीच, कुछ राजनीति पर भी चर्चा शुरू हो गयी। हमारा हरीश सर्वगुण संपन्न है। मेडिकल, विज्ञान की जानकारी के अलावा उसे धर्म-कर्म का भी ज्ञान है। मेहंदी रस्म के दौरान जब उसे तिलक लगाने का काम सौंपा गया तो वह धारा प्रवाह संस्कृत में मंत्रोच्चारण कर रहा था। इसी दौरान अपने जमाई गौरवजी (भतीजी प्रेमा के पति) से भी हमारी बात हो रही थी। जमाई से भी मित्रवत बात हो रही थी। दूसरे जमाई दर्शन जी (भतीजी निर्मला के पति) मुझे शादी वाली शाम ही मिले। वह मेहंदी वाले दिन आए थे, लेकिन उस रात मैं वहां पहुंचा नहीं था। कुल मिलाकर हम लोगों ने ढेरों बात की। इस दौरान हर कोई अपने मोबाइल को भूल गया। यानी हमने इस बात को गलत साबित किया कि सब मोबाइल पर लगे रहते हैं आजकल। बड़े भाई साहब भुवन चंद्र तिवारी जी सबसे सीनियर थे फिर हेम, हरीश, मैं और दीप। साथ ही जमाई गौरव जी और छोटे भतीजे प्रकाश से भी चर्चा होती रही।
और बीना का काबिल-ए-गौर धैर्य
बीना की बिटिया की विदाई थी। चारों ओर से अनेक कार्यों का प्रेशर होना लाजिमी है। उसके मन में भी भावनाओं-विचारों का समुद्र हिलोरे मार रहा होगा, लेकिन उसके अंदर जबरदस्त धैर्य था। सीखने लायक धैर्य। हर रस्म में हर किसी का ध्यान रखना और सभी कार्यों को सही से संपन्न कराना। अपनी माताजी का हाथ पकड़कर हर जगह ले जाना और बच्चों को जरूरी निर्देश देना। इस बीच, हर किसी से खाने-पीने और डांस करने के लिए पूछना। खुद भी सभी कार्यों में शामिल होना। बीना इसी धैर्य को बनाए रखना और अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना। ऐसे ही शुभ कार्यों में हम सबकी भागीदारी बनी रहे। जय ग्वेल देवता।
बिपिन की मौजूदगी का अहसास
जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि इस कार्यक्रम में बिपिन की बात न होना बेईमानी है। मैं उसे समय-समय पर याद कर रहा था। वहां वह सपने में भी आया और हकीकत में भी ऐसा लगा कि बिपिन आसपास ही मौजूद है। भतीजे बिपिन के साथ मित्रवत व्यवहार था। गुलाबी बाग से जब अनेक लोग शादी वाली रात पहुंचे तो सभी से थोड़ी-थोड़ी बात हुई। बिपिन की अनेक वीडियो और फोटो मेरे पास हैं। मेरे बच्चों के नामकरण और अन्न प्रासन में सपरिवार उसकी भागीदारी को याद करता हूं। अनेक मौकों पर दिलासा दिलाने की उसकी अदा को याद करता हूं। गांव अक्सर उसके साथ जाने के कार्यक्रम को याद करता हूं। यादों में जिंदा है बिपिन। उस जहां में भी खुश रहो और अपना आशीर्वाद बनाए रखो।
कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूं



























































