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Friday, January 30, 2026

छोटे से सफर के कई हमसफर और यादें उम्रभर की...

केवल तिवारी

हर अगला पल बीता हुआ हो जाएगा, कुछ यादों को ये मन गुनगुनाएगा
आपाधापी-भागादौड़ी से सुकून थोड़ा, यादों के तिनकों को

हमने जोड़ा
कुछ अपनी सुनाई, कुछ सबकी सुनी, इस सफर पर हमने कहानी बुनी
तरोताजा हुए दिल से निकली आवाज, वादियों में बजी जिंदगी की साज

तारीख 26/01/26, दिन सोमवार। अखबारी दुनिया में कुछ छुट्टियां होती हैं जिनमें सभी साथी एक साथ कहीं आ-जा सकते हैं। दिल्ली में था तो ऐसी छुट्टियां दो ही होती थीं। एक होली और दूसरी दिवाली। इन छुट्टियों में पारिवारिक दायित्व होते थे, लिहाजा दिनभर के लिए मित्र मंडली में गपशप नहीं हो सकती थी। चंडीगढ़ में ऐसी छुट्टियां चार होती हैं। उक्त दो में दो और... एक पंद्रह अगस्त और दूसरी 26 जनवरी। अपने (दैनिक ट्रिब्यून के) संपादक नरेश कौशल जी से हम कुछ लोगों ने आग्रह किया कि इस बार गणतंत्र दिवस पर कहीं चलते हैं। काम में पूरा समर्पण और फुर्सत के पलों में खूब हंसी-मजाक को तवज्जो देने वाले कौशल साहब ने हामी भर दी और कहा कि पूरे न्यूज रूम एवं उनके स्टाफ से बात कर लीजिए। ज्यादातर लोग राजी हो गए और कुछ को जरूरी काम से बाहर जाना था। हम 17-18 लोग सुबह नौ बजे के करीब एक बस से चल पड़े कसौली के लिए। कोई शिकवा-शिकायत नहीं। कोई इधर-उधर की नहीं। सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन। किसी ने गीत सुनाया तो किसी ने चुटकुला। कोई शेर-ओ-शायरी में सिद्धहस्त दिखा तो किसी ने रामचरित मानस की चौपाइयां सुनाईं। कसौली जाना, वहां कुछ घंटे रुकना फिर देर शाम तक घर लौट आना, सारा मंजर ऐसा लगा मानो अभी कोई सपना देख रहे थे और नींद खुल गयी। एक शायर की दो लाइनें याद आ रही हैं-
तुम पर क्या बीती हमको सुनाओ, ए जाते हुए लम्हों तुम लौट के आना
यह सफर बहुत यादगार रहा। इससे जुड़ी कुछ फोटो और वीडियो साझा कर रहा हूं। सफर संबंधी उस सदाबहार शेर के साथ
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ, ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां। 






 



Saturday, January 24, 2026

परिवार मिलन की एक और भोर... साथ ले चलें आओ गांव की ओर

केवल तिवारी

संस्कारों की खास महत्ता, बूटा-बूटा, पत्ता-पत्ता।

कण-कण में भगवान हमारे, नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे।

ऋत्विक का जनेऊ संस्कार, साथ मिला पूरा परिवार।

डगर जब चली उधर, अपने गांव में पग आए धर। 

प्रिय भानजी रुचि और दामाद दीपेश का बहुत पहले फोन आ गया था कि बेटे रिशू (ऋत्विक) का जनेऊ यानी यज्ञोपवीत संस्कर है। मुख्य आयोजन 22 और 23 जनवरी को। बता दें कि उत्तराखंड में यज्ञोपवीत संस्कार भी वैवाहिक कार्यक्रम की तरह होता है। मैंने तैयारी कर ली। पत्नी भावना साथ जा नहीं सकती थी क्योंकि छोटे बेटे धवल के प्री बोर्ड चल रहे हैं। सब लोगों से मिलने का लालच और जब हल्द्वानी तक गए ही हैं तो क्यों न एक थोड़ी देर के लिए गांव भी हो लिया जाए। थोड़ी-बहुत पूजा-पाठ हो जाएगी और कुछ मिलना-जुलना। साथ में जन्मभूमि को प्रणाम। हालांकि बहुत शॉर्ट कार्यक्रम था, लेकिन रहा शानदार। 

जरूरी हैं ऐसे आयोजन : मेरा मानना है कि हो सके तो ऐसे आयोजन कर लेने चाहिए। भव्यता या नव्यता अलग बात है, लेकिन परंपरागत गीत-संगीत, अपनों से मेल-मिलाप और नयी पीढ़ी के साथ पुरानी का संयोजन। हालांकि आजकल बच्चों की परीक्षाओं, नौकरी संबंधी कई दिक्कतों के चलते उन्हें शामिल करना मुश्किल भी हो रहा है, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये उनको जोड़ लेना चाहिए। 

दीपेश-रुचि और उनका परिवार : दीपेश-रुचि को सैल्यूट है कि वह हर एक चीज का ध्यान रख रहे थे, मसलन- कब लोगों को चाय पूछना है, कब नवआगंतुक से हालचाल लेना है और कब विदाई के समय कुछ देना है। इस दौरान अस्वस्थ उनकी माताजी। बेशक शरीर से वह अस्वस्थ हैं, लेकिन मन से पूरी ऊर्जा है। हर आने-जाने वाले से ऐसे मिल रहीं थीं कि अगर सिर्फ बातचीत सुनी जाये यानी वीडियो रूप में न हो और सिर्फ ऑडियो हो तो लगे कि चलते-चलते दो लोग बात कर रहे हैं। इस सबसे इतर बटुक यानी रिशू के ताऊ-ताई सुबोध और तृप्ति का काम निभाना और मौका निकालकर नाच-गाने में शामिल हो जाना। दोनों ने समां बांध दिया। इस सबके बीच नन्हे ओम की नटखट शरारत दिल को छू लेती। कुछ फोटो और वीडियो साझा करूंगा, देखिएगा-सुनिएगा। 

दीदीयों का जन्मदिन : इत्तेफाक रहा कि 22 तारीख को विमला दीदी का जन्मदिन था। कुछ ही दिन पहले शीला दीदी का था और दो दिन बाद प्रेमा दीदी का है। हम सबने मिलकर तीनों दीदीयों का जन्मदिन मनाया। सबसे बड़ी दीदी यानी रुचि की मम्मी सितारों के उस पार से हमें देख रही थी और आशीर्वाद दे रही थी। साथ थे हम सबके प्यारे दद्दू यानी दीपेश के पापा। हमने महसूस किया उनके आशीर्वाद को। 

... और गांव की यात्रा : मेरा अपने गांव रानीखेत के पास डढूली में जाना लंबे समय से टल रहा था। एक बार लखनऊ दाज्यू लोगों से बात की, लेकिन समय का संयोजन हो न सका। इस बार मैंने ठान ली कि चलना है। मेरे जेठू यानी भावना के बीच वाले भाई साहब ने पूरा साथ दिया। उनकी कार से हम तीनों (साथ में मनोज पंडित जी) गांव होकर आये। लगा जैसे छूकर छूमंतर हुए। पहले अपने पुश्तैनी मकान पर गये। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुके घर की देहरी पर शीश नवाया। फिर आसपास विरादरों से मिले। वसंतदा घर पर नहीं थे, भाभी जी मिलीं। पनदा के यहां भाभी ने चाय बनायी। बाद में गोलथान में धूप बत्ती की। रोली, चंदन, अक्षत और फूल भाभी ने दे दिए। फिर गांव के लोगों से मिलते हुए पहुंचे धूनी यानी बंबईनाथ स्वामी के दर पर। यहां भी कुछ समय पूजा-अर्चना के बाद वापस आ गए। 

वह 103 साल की चाची : तल बाखई नरदा की ईजा से हमेशा सबसे पहले मिलन होता है। हम उन्हें चाची कहते हैं। चाची अंदाजन 103 साल की हो गयी हैं। बताती हैं कि उन्होंने मेरी ईजा की भी शादी देखी है। उनके कान और आंख के साथ पाचन शक्ति भी सही है। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें। 

कई यादों को सहेजे यह यात्रा भी सुखद रही। इन सबके बीच, काठगोदाम थोड़ी देर के लिए जाना, नेहा के हाथों चाय पीना, निर्माणाधीन घर को देखना, पहली रात उस घर से संबंधित लवली भाभी और सिद्धू के प्रयास से बने बेहतरीन और भावुक वीडियो देखना, सुरेश पांडेय जी और हेमंत पांडे एवं परिवार से मिलना वगैरह वगैरह यादें भी हैं। इस सफर की बातें तो बहुत सी हैं, लेकिन उन्हें कहानीनुमा अंदाज में अगले ब्लॉग में। कुछ फोटो और वीडियो।












Tuesday, January 13, 2026

दूसरों को चेतावनी देते -देते खुद झांसे में आ गया, गनीमत है यह फ्रॉड नहीं था... फिर भी सावधान




केवल तिवारी 

मंगलवार की सुबह एक फोन आया। दूसरी ओर से एक मैडम ने कहा कि HDFC Bank से बोल रही हूं। आपका अकाउंट हमारे यहां है। कोई issue तो नहीं है। मैंने बताया कि पिछले दिनों मैंने एक छोटी सी online payment की, उसके 28 रुपए चार्ज काट लिया। मैडम ने hold करने के लिए कहा और बताया कि आपने यानी मैंने net banking से नहीं, कार्ड से पेमेंट किया है। विश्वास के लिए इतना पर्याप्त था। इससे पहले भी जब फोन आया तो Truecaller और Airtel की तरफ से कोई अलर्ट मैसेज नहीं आया। खैर बात होने लगी। कुछ विश्वास जमने पर मैडम ने कहा कि मेरे लिए credit card offer है। लाइफ टाइम फ्री। हालांकि इस फ़्री में कितना सत्य होता है, यह किसी से छिपा नहीं। एक दिन पहले भी HDFC Bank से फोन आया था, इसी बात के लिए, मैंने मना कर दिया था। लेकिन इस वक्त पता नहीं क्या हुआ कि मैं बात करता रहा और OTP बता दिया। पहले account releted फिर आधार संबंधी। मैंने तमाम आशंकाएं जताई, लेकिन मैडम ने कहा कि आप पिन genrate करने से पहले Bank आ जाना। Satisfaction के बाद ही कार्ड का इस्तेमाल करना। इसी दौरान कार्ड apply का मैसेज आ गया। बात खत्म होने के बाद मैंने 10 बार account check किया। हम लोवर मिडिल क्लास के खाते में होता ही कितना है, लेकिन जितना भी होता है, सबकुछ होता है। मुझे याद आया अपने पुराने पड़ोसी जोगिंदर लाल जी वाला किस्सा। वह गांव गये थे। उनके पास फोन आया एक व्यक्ति का। उसने अपने आप को पंजाब नेशनल बैंक का कर्मचारी बताया और कहा कि आपने जो कार्ड के लिए अप्लाई किया है, वह बन गया है। सीनियर सिटीजंस को हम लोग घर जाकर कार्ड दे रहे हैं इसलिए आपके पास एक ओटीपी आएगा वह बता देना। जोगिंदर लाल जी ने कहा कि जो फोन बैंक से लिंक है वह तो मेरी पत्नी के पास है। वह चंडीगढ़ में है। मैं गांव आया हूं। उस व्यक्ति ने जोगिंदर लाल जी को बातों में लगाया और उनकी श पत्नी का नंबर ले लिया। थोड़ी देर में उनकी पत्नी के पास भी एक फोन आ गया। उनसे भी उसने वही ओटीपी वाली बात कही। जोगिंदर लाल जी की पत्नी मेरे पास आ गईं। बोलीं देखिए एक बैंक से फोन आया है यह ओटीपी मांग रहे हैं। आप जरा बता देना। मैंने उनका मोबाइल देखा उससे बात की और वहीं पर मेरी पत्नी भी खड़ी थी। मैंने उस कथित बैंक वाले व्यक्ति से कहा। भैया क्यों किसी को बेवकूफ बना रहे हो। किसी की गाढ़ी कमाई क्यों लूटने की कोशिश कर रहे हो। उसने मुझे इतनी गंदी-गंदी गालियां दीं कि मेरी पत्नी और व जोगिंदर लाल जी की पत्नी थी, इसलिए मैं कुछ बोल नहीं पाया। उसने फोन काट दिया। यानी पूरी तरह फ्रॉड था। अगर ओटीपी दे दिया होता तो शायद उनका अकाउंट खाली हो गया होता। आज वही घटना मुझे याद आ गई और अभी भी वही बार-बार में सिहर रहा हूं कि मैंने ऐसा कैसे कर दिया कि थोड़ी देर की बातचीत के बाद मैंने पहले बैंक का ओटीपी फिर अपने आधार का ओटीपी दे दिया। इससे पहले अनेक बार मेरे पास fraud call आ चुकी हैं। हर बार मैं सतर्क रहा। आज ऐसा कैसे हो गया। गनीमत है कि मेरी किस्मत अच्छी है कि वह फ्रॉड कॉल नहीं थी। सही कॉल थी। मैडम बैंक अधिकारी ही थीं। लेकिन मैं सभी को आगाह करूंगा कि कभी भी कृपया फोन पर ओटीपी ना बताएं बैंक वाले भी खुद ऐसा ही कहते हैं। कोई ऐसी बात हो तो आप ब्रांच जाएं। भविष्य के लिए खुद भी प्रण लेता हूं कि ऐसा कुछ होगा तो ब्रांच में जाऊंगा, लेकिन कभी फोन पर ओटीपी नहीं बताऊंगा। अब क्रेडिट कार्ड को कितना भुगतना होगा, यह तो भविष्य बताएगा। इस घटनाक्रम का मैंने office में मित्र नरेंद्र और सूरज से भी किया। उन लोगों ने भी आश्चर्य जताया। एक मित्र वीरेंद्र सिंह बोले, अभी बना लो, देखना कभी बंद नहीं कर पाओगे। बैंक वाले क्रेडिट कार्ड बंद करवाने पर नाकों चने चबवा देते हैं। जय हो। 

पत्रकारिता का मूल कभी नहीं बदल सकता, पढ़ाई के तरीके में बदलाव की दरकार, विश्व संवाद केंद्र की कार्यशाला में अनेक राज्यों से आये युवाओं से बातचीत में निकली कई बातें




केवल तिवारी

न्यू मीडिया के उभरते दौर में पत्रकारिता की पढ़ाई के तरीके में बदलाव की दरकार महसूस की जा रही है। इस बात से अधिसंख्य इत्तेफाक रखते हैं कि पत्रकारिता की मूल भावना कभी बदल नहीं सकती, लेकिन इसे समझने और समझाने का तरीका बदल सकता है। यह भी हो सकता है कि सीधे लेक्चर देने, नोट्स तैयार कराने के बजाय चर्चा-परिचर्चा के तौर पर इसे किया जाये। यानी विचारों का आदान-प्रदान हो। असल में पत्रकारिता संबंधी कई मुद्दों पर पिछले दिनों चर्चा हुई। मौका था विश्व संवाद केंद्र की ओर से पंचकूला में विवेकानंद जयंती के मौके पर आयोजित 'राष्ट्र निर्माण में नागरिक पत्रकारिता की भूमिका' विषय पर आयोजित कार्यशाला का। मुझे भी कुछ बोलने का मौका मिला। मैं पहुंचा था तो खचाखच भरे हॉल में कुछ वरिष्ठ कुछ बच्चे बैठे थे। कुछ की निगाहें आपस में टकरा रही थीं, कुछ की मेरी ओर भी थी। इसीलिए मैंने शुरुआत ही कर दी बिहारी की दो पंक्तियों से, 'कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन मैं करत हैं, भौंवन ही सो बात॥' खैर पहले कहा गया था कि मुझे मोबाइल पत्रकारिता पर कुछ बोलना है। विषय थोड़ा विस्तारित और तकनीक संबंधी था, फिर भी मैंने MoJo Journalism पर कुछ तैयारी की। बाद में कार्यक्रम के मुख्य आयोजक उत्तर क्षेत्र के प्रचार प्रमुख अनिल कुमार जी ने कहा कि चूंकि आप ब्लॉग लिखते हैं, इसलिए कटेंट राइटिंग पर फोकस्ड रहिए। मुझे मन मांगी मुराद मिली। सभागार में पहुंचा तो वहां वरिष्ठ पत्रकार एवं दैनिक ट्रिब्यून में समाचार संपादक रहे हरेश वाशिष्ठ जी, राजेश शांडिल्य जी आदि अनेक लोग मिले। बाद में द ट्रिब्यून के वरिष्ठ पत्रकार साई वैद्यनाथन भी आ गए। मैंने पत्रकारिता की मूल भावना का जिक्र किया कि जो जैसा है, उसे सही और कोट के साथ परोसिये। कोशिश रहनी चाहिए कि आप जज न बनें। कुछ स्टूडेंट्स ने कहा कि समस्या यह है कि पत्रकारिता पढ़ाने वाले आते हैं, लेक्चर देते हैं और चले जाते हैं। मेरी इस बात पर ज्यादातर लोगों ने इत्तेफाकी रखी कि कटेंट की महानता कभी खत्म नहीं हो सकती। लाख एआई का जमाना आ जाये, जो मूल कटेंट है, वह जितना शानदार होगा, वही चमकेगा। आज के युग में हर व्यक्ति पत्रकार है। सबके हाथों में मोबाइल है। मैंने जोर देकर कहा कि जब आप कोई चीज सार्वजनिक करते हैं तो आपको जिम्मेदार नागरिक बनना चाहिए। सोमालिया की वीडियो को लोग पंचकूला या चंडीगढ़ की बताने लगते हैं। कभी भी फॉरवर्ड में जल्दबाजी न करें। अपने कंटेंट में दम रखें। बातें और भी कई हुईं, समयाभाव के कारण चर्चा कम हुई, लेकिन सार्थक हुई। 

वह भाषायी दिक्कत और हीन भावना

मेरी बात खत्म होते-होते एक विद्यार्थी ने कहा, सर अंग्रेजी हम बोल नहीं पाते, हिंदी हमसे लिखी नहीं जाती। उसकी बात पर सब हंस पड़े। मैंने कहा, अपनी कमी को ही अपनी ताकत बनाओ। मैंने याद दिलाया कि अपनी बात की शुरुआत में मैंने कैसे अपने पर ही एक मजाक बनाया। असल में, अपने ऑफिस में कई बार कहता हूं मैं कोई राजनीतिक पार्टी ज्वाइन कर लेता हूं। समय-समय पर खबर छपवा दिया करूंगा, केवल का कद बढ़ा। असल में हाइट को लेकर लंबे समय तक मैं भी हीन भावना से ग्रस्त रहा। मैंने उस युवक से कहा कि आजकल देसज बोली में वीडियो सुपर हिट चल रहे हैं। देसज बोली में बुलेटिन का जमाना है। खुद से प्यार कीजिए। सीखने की ललक रखिए और आगे बढ़िये। मुझे खुशी है कि वह मेरी बात से सहमत हो गया। यह तो कार्यशाला में मेरा अनुभव था अब उस कार्यक्रम की जो खबर चली उसे देखिए...

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उस कार्यक्रम की जो खबर बनी और चली, उसे हूबहू चला रहा हूं

अच्छे कंटेंट के लिए सही माध्यम का चयन आवश्यकःअनिल कुमार

-नागरिक पत्रकारिता लोकतंत्र की रीढ़ःहरेश वरिष्ठ

-पर्यावरण से जुड़े विषयों को उठाने के लिए आज अनेक तकनीकी साधन उपलब्धःसाईं वैद्यनाथन

-व्यूज, लाइक और शेयर की रेस से बाहर निकलेंः पंकज पम्मू 

-सूचना नहीं, सच्चाई की कमी है पत्रकारिता की असली चुनौतीःराजेश शांडिल्य

-विश्व संवाद केंद्र की कार्यशाला में पांच राज्यों के युवाओं की सहभागिता

पंचकूला। विश्व संवाद केंद्र द्वारा स्वामी विवेकानंद जयंती के उपलक्ष्य में नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यशाला का विषय “राष्ट्र निर्माण में नागरिक पत्रकारिता की भूमिका” रहा। पंचकूला सेक्टर चार माधव कुंज के कांफ्रेंस हाल में आयोजित कार्यक्रम में युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि पत्रकारिता अब केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में उभर रही है।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए उत्तर क्षेत्र के प्रचार प्रमुख अनिल कुमार ने कहा कि अच्छा और प्रभावी कंटेंट स्वतः नहीं मिलता, इसके लिए सही माध्यमों का चयन आवश्यक है। उन्होंने बताया कि कंटेंट लेखन में केवल सूचना नहीं, बल्कि उसका संदेश, दृष्टिकोण और सामाजिक प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने एक्सपोज करने वाले कंटेंट, आख्यान निर्माण (नैरेटिव बिल्डिंग) और तथ्यों को प्रस्तुत करने के तरीके पर उदाहरणों सहित बताया कि कैसे एक ही तथ्य अलग प्रस्तुति में अलग प्रभाव पैदा करता है।

अनिल कुमार ने स्वामी विवेकानंद के आदर्श विचारों का उल्लेख करते हुए जातिगत भेदभाव के उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन और “स्व” के भाव पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने भाषा, भूषा, भोजन और भ्रमण में स्वदेशी और आत्मबोध की भावना को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यशाला मॉड्यूल-वन का हिस्सा है, जिसके बाद मॉड्यूल-टू और मॉड्यूल-थ्री आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने नागरिक कर्तव्यों को समझने और उन्हें पत्रकारिता के माध्यम से समाज तक पहुंचाने पर जोर दिया।

दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ ने कहा कि नागरिक पत्रकारिता लोकतंत्र की रीढ़ है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत नागरिक पत्रकारिता आज लोकतंत्र के एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभर रही है। तकनीक के विकास के साथ पत्रकारिता आम नागरिक के हाथों तक पहुंच चुकी है और अब यह बड़े मीडिया घरानों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, विकास की अनदेखी जैसे मुद्दों पर नागरिक पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि कई बार परंपरागत मीडिया इन मुद्दों तक पहुंच नहीं पाता या उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं देता।

द ट्रिब्यून के मुख्य उप संपादक एवं साहित्यकार पी. साईं वैद्यनाथन ने पर्यावरण परिवर्तन के विषय पर युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली सनातन धर्म की मूल शिक्षा है। सनातन परंपरा में प्रकृति संरक्षण के अनेक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि नागरिक पत्रकारिता में पर्यावरण से जुड़े विषयों को उठाने के लिए आज अनेक तकनीकी साधन उपलब्ध हैं। इसके बाद सनातन धर्म और पर्यावरण पर आधारित एक रुचिकर प्रश्नोत्तर सत्र भी हुआ।

विख्यात आरजे एवं कथाकार पंकज पम्मू ने कहा कि आज मोबाइल फोन के चलते हर व्यक्ति खुद को पत्रकार समझने लगा है, लेकिन स्मार्ट सिटीजन होने के नाते यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम जो भी कंटेंट लिखें, रिकॉर्ड करें या साझा करें, वह जिम्मेदारी के साथ हो। उन्होंने युवाओं से व्यूज, लाइक और शेयर की रेस से बाहर निकलने का आह्वान करते हुए कहा कि बेहतर और सार्थक कंटेंट को देर-सवेर समाज की स्वीकृति अवश्य मिलती है। 

विश्व संवाद केंद्र हरियाणा के संपादक राजेश शांडिल्य ने कहा कि नागरिक पत्रकारिता केवल मोबाइल उठाकर खबरें परोसने तक सीमित नहीं, सच्चाई से जिम्मेदारी उठाने का काम है। आज सूचना की नहीं, बल्कि सच्चाई से पत्रकारिता करने वालों की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। निडरता, सत्यनिष्ठा और दायित्वबोध के बिना खबर समाज को दिशा नहीं, केवल शोर पैदा करेगी। पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्रहित के मुद्दे सामने लाना और समाज के समक्ष सच लाना होना चाहिए। ऐसी जिम्मेदार पत्रकारिता ही समाज में विश्वास कायम कर बेहतर और जागरूक समाज के निर्माण में अपनी प्रभावी भूमिका निभा सकती है।

कार्यशाला संयोजक एवं चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी पत्रकारिता विभाग के एसोसिएट प्रो. डा.विनोद सोनी ने कार्यक्रम आए हुए अतिथियों का आभार जताने के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक विद्यार्थियों के स्वर्णिम भविष्य की कामना की।इस अवसर विश्व संवाद केंद्र सचिव राजेश कुमार,पत्रकारिता विभाग के सहायक डा.तपेश किरण,चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा.रंजन वालिया, महाराजा अग्रसेन यूनिवर्सिटी बद्दी (हिमाचल) के सहायक प्रो.डा.रवि मिश्रा कार्यशाला में प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की और नागरिक पत्रकारिता को समाज व राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बनाने का संकल्प लिया।कार्यक्रम के समापन सत्र में कार्यशाला के प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरण किये गये।

Sunday, January 4, 2026

याद आया राग दरबारी... श्रीलाल शुक्ल के सौ साल

केवल तिवारी
श्रीलाल शुक्ल जी की व्यंग्य रचना 'राग दरबारी' को लिखे करीब-करीब छह दशक होने को हैं, लेकिन आज भी वह उतनी ही लोकप्रिय है, जितनी अपने दौर में थी। सरकारी तंत्र और इस तंत्र का फायदा उठाने वालों पर करारी चोट करते इस व्यंग्य उपन्यास की एक-एक लाइन की व्याख्या हो सकती है। मुझे यह उपन्यास पढ़े करीब ढाई दशक हो गया। उस दौर में दो-तीन बार पढ़ डाली थी। फिर किसी ने मांगी, अपने किताबों के ढेर में इसे बहुत ढूंढ़ा, लेकिन मिल नहीं रही। ऐसी ही एक और किताब मनोहर श्याम जोशी की 'कसप' भी गायब है। खैर... पिछले दिनों खबर आई कि श्रीलाल शुक्ल जी की सौवीं जयंती मनाई जा रही है। तब अचानक फिर राग दरबारी की याद आई। कुछ मित्रों से इस उपन्यास की चर्चा करने लगा तो सबने अपने-अपने ढंग से इसकी कुछ पंक्तियों को याद किया। इस दौरान कई खबरें भी चलीं। फिर याद आने लगे पुराने दौर के व्यंग्य रचनाकारों की। हास्य कलाकारों की। किसी ने काका हाथरसी का नाम लिया तो किसी ने केपी सक्सेना का। कुछ ने गोपाल चतुर्वेदी को याद किया किसी ने शौकत थानवी, रघुवीर सहाय और मुद्राराक्षस का नाम लिया। चूंकि पढ़ाई-लिखाई लखनऊ में हुई तो उन दिनों वहां स्वतंत्र भारत छपता था। उसमें उपरोक्त लेखकों के अलवा उर्मिल कुमार थपलियाल के भी व्यंग्य छपते थे। इंदिरा नगर की ओर जाना होता था तो कुछ व्यंग्यकारों के घर देखकर ही खुश हो जाया करता था। अनेक लेखक ऐसे हैं जो बातें भले बड़ी-बड़ी करते हों, लेकिन मिलने-मिलाने के पीछे भी कारण ढूंढ़ते हैं, इसलिए मिलना कभी नहीं हो पाया। बाद में तो पत्रकारिता की ही लाइन में आया तो अनेक लेखकों से मिलना हुआ, छपना और छापना हुआ। खैर... आज बात महान व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल की। 
साभार: इंटरनेट 


बातों के दौरान उनकी कुछ पंक्तियों की चर्चा देखिये- 'नहीं यह ट्रक सड़क से आधा बाहर नहीं है, यह आधा सड़क के अंदर है।' ऐसी ही कुछ पंक्तियां हैं
हर बड़े राजनीतिज्ञ की तरह वे राजनीति से नफ़रत करते थे और राजनीतिज्ञों का मज़ाक उड़ाते थे।
वैद्यजी के प्रभाव से वह किसी भी राह चलते आदमी पर कुत्ते की तरह भौंक सकता था, पर वैद्यजी के घर का कोई कुत्ता भी हो, तो उसके सामने वह अपनी दुम हिलाने लगता था। यह दूसरी बात है कि वैद्यजी के घर पर कुत्ता नहीं था और सनीचर के दुम नहीं थी।
यह हमारी गौरवपूर्ण परम्परा है कि असल बात दो–चार घंटे की बातचीत के बाद अंत में ही निकलती है।
इंसानियत का प्रयोग शिवपालगंज में उसी तरह चुस्ती और चालाकी का लक्षण माना जाता था जिस तरह राजनीति में नैतिकता का
लेक्चर का मज़ा तो तब है जब सुननेवाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूं।
श्रीलाल शुक्ल जी की सौवीं जयंती पर खबरों का भी दौर चला। उनकी जिस महान रचना का मैं ऊपर वर्णन कर चुका हूं, उसके कारण वे उपहास का भी पात्र बने। नेमीचंद जैन जैसे प्रमुख लेखकों और आलोचकों ने इसे 'असंतोष का शोर' बताया था और श्रीपत राय ने इसे 'महान बोरियत का महान उपन्यास' कहा था। लेकिन इन तमाम आलोचनाओं के बावजूद शुक्ल ने अगले साल 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता और यह तीखा व्यंग्य समय की कसौटी पर खरा उतरा। कहते हैं कि यह हिंदी साहित्य के सबसे ज्यादा पढ़े गए तथा अनुवादित उपन्यासों में से एक है। असल में 1968 में लिखी गई 'राग दरबारी' उनके नाम का पर्याय बन गयी है जिसे अब हिंदी व्यंग्य लेखन में एक मील का पत्थर माना जाता है। श्रीलाल शुक्ल का 2011 में निधन हुआ और अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने 25 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें 'मकान', 'सूनी घाटी का सूरज', 'पहला पड़ाव' और 'बिश्रामपुर का संत' शामिल हैं। 2005 में 'श्रीलाल शुक्ल: जीवन ही जीवन' शीर्षक से निबंधों के एक संग्रह में, उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज में जन्मे आईएएस अधिकारी शुक्ल ने याद किया कि किस तरह उपन्यास ने उन्हें लगभग छह साल तक 'बीमार रखा', जिससे वह एक बहिष्कृत व्यक्ति बन गए। उन्होंने लिखा था, 'उन गंवार किरदारों के साथ दिन-रात रहते-रहते मेरी ज़बान घिस गई। इज़्ज़तदार औरतें कभी-कभी खाने की मेज़ पर मेरी तरफ़ भौंहें चढ़ाकर देखती थीं, और मैंने अपने परिवार से तथा मेरे परिवार ने मुझसे दूर रहना शुरू कर दिया। मेरी समस्या यह थी कि किताब लिखने के लिए कोई जगह सही नहीं लग रही थी।' यहां बता दूं कि मोहनलाल गंज भी लखनऊ से लगा हुआ है और अक्सर यहां आना-जाना भी होता था। शिवपालगंज नाम के काल्पनिक गाँव पर आधारित 'राग दरबारी' ने भारतीय सत्ता संरचना की आलोचना की, जहां गांव एक ऐसे राष्ट्र का रूपक बन जाता है जो शासन और नैतिकता दोनों में विफल रहा है। भारत की सामाजिक-राजनीतिक संरचना की तीखी आलोचना को इसके किरदारों के ज़रिए यादगार बनाया गया, जिनमें नैतिक संतुलन की कमी है, जो 'सभ्यता' से रहित हैं, और एक ऐसे समाज का सामूहिक चित्र बनाते हैं जहां भ्रष्टाचार सामान्य है, आदर्श सिर्फ़ दिखावे के हैं, और अस्तित्व ईमानदारी के बजाय अनुकूलन पर निर्भर करता है। हिंदी साहित्य में शुक्ल के योगदान के बारे में कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने एक जगह कहा कि लेखक ने भारत में विकास के इर्द-गिर्द फैले मिथक को तोड़ दिया। उन्होंने 'राग दरबारी' में जो किया- यह दिखाना कि यह तथाकथित विकास विरोधाभासों, भ्रष्टाचार, देरी, लापरवाही, बेफिक्री और जड़ता से कैसे भरा हुआ था, और इसने लोगों के रोज़मर्रा के जीवन को कैसे प्रभावित किया- वह सच में महत्वपूर्ण था। अगर हम हिंदी साहित्य के पिछले 100 वर्षों को देखें, तो श्रीलाल शुक्ल निस्संदेह इसके महान दिग्गजों में से एक हैं। उन्होंने मुख्य रूप से गद्य लिखा और एक प्रमुख उपन्यासकार थे। चर्चा में कुछ लोगों ने व्यंग्य उपन्यास राग दरबारी को गांवों को परेशान करने वाली बदसूरती या विकृतियों को दिखाने वाली बताया। किसी ने इसे आज भी प्रासांगिक बताया। कई लोग इस बात से भी इत्तेफाक रखते हैं कि श्रीलाल शुक्ल को समझने के लिए सिर्फ राग दरबारी ही नहीं, शुक्ल के अन्य रचनाओं को भी पढ़ना पढ़ेगा। खैर शुक्ल जी की अनेक रचनाओं की चाहे जितनी बात हो, उन्हें पहचान तो राग दरबारी ने ही दिलाई। समय भले बदल गया हो, लेकिन उपन्यास में उल्लिखित किरदार हम-आपमें किसी न किसी रूप में मौजूद हैं ही।

Tuesday, December 30, 2025

बगिया को बुहारो तुम....

केवल तिवारी 

आंगन में खिले ये फूल 

इनको तनिक निहारो तुम

बगिया को बुहारो तुम

घर का उपवन तुमने संवारा

अपनी खुशियों को भी वारा

छोटी सी बात न पकड़े तूल

क्यों सोचना हमने ऊल-जुलूल

छोटी सोच को करो संपादन तुम

जीवन का करो रसास्वादन तुम

परिवार को गेंदा फूल बनाया

हम सबको भी खूब समझाया

अपने लिए अब जीयो भरपूर

हर्षोल्लास का भी चमके नूर

समझो हमारी भावना को तुम

केवल, कार्तिक और धवल हो तुम

आंगन में खिले ये फूल 

इनको तनिक निहारो तुम

बगिया को बुहारो तुम....

Wednesday, December 17, 2025

अब उम्दा भी चले गए... उस जहां में भी आनंदित रहना उमेश

केवल तिवारी

एक माह के भीतर ही फिर एक मनहूस खबर आई कि खिलगजार उमेश दा इस जहां को छोड़कर चले गए। मैं भी उमेश दा कहता था। बल्कि उम्दा कहता था। इसमें मुझे अच्छा भी लगता था। उम्दा मतलब बेहतरीन। यह अलग बात है कि रिश्ते में वह मेरे भतीजे लगते थे। उनका अभिवादन का तरीका होता था, 'चाचसैप नमस्कार।' मुझे याद है वह जब पहली बार गांव में प्रधान चुने गए थे तो इत्तेफाक से मैं भी उन दिनों लखनऊ से गांव गया था। उनका चुनाव चिन्ह संभवत: कुर्सी था। उन दिनों शायद एक ही ग्रामसभा थी हमारे गांव में। अब तो दो गयी हैं। सरना और मलोटा। हो सकता है इन बातों में कुछ तथ्यात्मक गलतियां हों क्योंकि बेशक हमारे रिश्ते चाचा-भतीजा वाले हों, लेकिन वह मुझसे लगभग 15 साल बड़े थे। करीब पांच साल पहले जब भतीजा प्रिय विपिन कोविड की लहर में काल कलवित हुआ तो उम्दा का फोन आया था, सांत्वना जताने। क्योंकि उम्दा से चाहे जितना पुराना संबंध हो, विपिन के साथ गांव आने-जाने के क्रम में यह मित्रता बढ़ गयी थी। हम खिलगजार उनके घर जरूर जाते थे। वैसे भाभी जी (उम्दा की माता जी) और दाज्यू (उम्दा के पिताजी) से हमारे स्नेहिल संबंध रहे। उनके घर में होने वाली कथा और अन्य पूजन कार्यक्रमों की मुझे बहुत याद है। उनका आदेश देना और अन्य बातों पर बातों को साझा करना अच्छा लगता। खैर इस वक्त बात उम्दा की। प्रधानी के समय के अलावा मुझे उम्दा की दूसरी बात याद है जब वह डाबर घट्टी में 'सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान' के प्रोपराइटर थे। हम कहीं से भी आते तो वह दुकान हमारा अड्डा होती। ज्यादा सामान हुआ तो उनके दुकान पर रख दिया और घर को चल दिए। मैं तो उन दिनों चाय नहीं पीता था, लेकिन अगर मेरे साथ कोई होता तो वह जरूर वहां चाय पीता। उम्दा की कई बातें जेहन में उमड़-घुमड़ रही हैं। इसी क्रम में उनकी एक कमी का भी जिक्र करना जरूरी है। वह बहुत जल्दबाज सरीखे थे। मानो संदेश दे रहे हों कि भागते रहे, भागना ही जिंदगी है। कभी मेरा मन करता कि उनसे कहूं कि भागना, नहीं चलना ही जिंदगी है, लेकिन चूंकि उम्र में बड़े थे, इसलिए कहते हुए संकोच होता।

बिना माइक राम की लीला का मंचन 

बचपन की उन स्मृतियों में भी उमदा हैं जब रामलीला मंचन में माइक नहीं होते थे। गैस लाइट का इंतजाम होता था। कलाकार की आवाज बुलंद होती थी। उमदा भी राम की भूमिका में आते और बुलंद आवाज होती। सब यादें हैं।

उम्दा संबंधी बातों का जिक्र होते-होते एक प्रकरण याद आ रहा है। करीब दो साल पहले हल्द्वानी में मैं और मेरी पत्नी पीली कोठी के लिए ऑटो में बैठे। उसी वक्त एक सुंदर युवक भी हमारे साथ बैठा। मैं और पत्नी कुछ बोल ही रहे थे कि उसने कहा कि आप लखनऊ वाले हो। मैंने कहा हां। वह बोला, मैं खिलगजार उमेश जी... अच्छा...अच्छा। मैंने समझा कि उनका कोई रिश्तेदार है। मैंने कहा, आपका नाम। वह बोला, विनोद तिवारी। भाजपा के किसी सम्मेलन की तैयारी में जुटा हूं। हमने नंबरों का आदान-प्रदान किया। उसके बाद विनोद कुछ प्रेस रिलीज और जानकारियों को भेजने लगा। अब जब पिछले दिनों उम्दा के निधन की खबर आई तो मैंने दिल्ली में अपने भतीजे प्रकाश से कहा कि उम्दा के बच्चों का नंबर दो। दो बोल सांत्वना के बोल दूंगा। उसने नंबर भेजा और कहा कि यह उनके बेटे का नंबर है। मैंने जैसे ही क्लिक किया, वह नंबर पहले से सेव था। तब पता चला कि जिसे मैंने भाजपा नेता के नाम पर सेव किया था, वह तो विनोद है, उम्दा का बेटा। असल में उम्दा के भाइयों हरीशदा, दीपदा या चचेरे भाइयों मदन, कृपाल एवं नवीन से तो बात होती रहती थी, लेकिन बच्चों से ज्यादा बातचीत का सिलसिला नहीं चल पाया। विनोद और पूरे परिवार को दिल से सांत्वना। दुख की इस घड़ी में मैं परिवार के साथ हूं। उम्दा अब तो आप चले ही गए हो, उस जहां में खुश रहना...।

Sunday, December 14, 2025

स्वाति चली ससुराल, कार्यक्रम में सब हुए निहाल

 केवल तिवारी 

परिवार मिलन का शुभ संदेशा आया, पांडेय जी ने सबको बुलाया। 

जाग्रत हो गयी खुशियों की 'चेतना', अब तो मनीष को है सबको देखना।

भाइयों ने शुरू की पुलकित तैयारी, बहनें गुफ्तगू करें बारी-बारी।

समधी-समधन, मौसी और बुआ, हर परिजन ने मांगी दुआ।

सदा खुश रहे स्वाति हमारी, मां-बाप की लाडली, दादी की दुलारी। 

विवाह समारोह की अब लिखता हूं पूरी बात, चलो करता हूं शुरुआत


एक अम्मा (दादी) हैं। अम्मा की एक पोती है। पोती की शादी है। उसका नाम स्वाति है। स्वाति का एक भैया है। दूर एक जगह ट्रेनिंग में व्यस्त होने से वह अनुपस्थित है। पारिवारिक भाइयों ने समा बांधा है। खुशनुमा माहौल में भावनाओं का उमड़-घुमड़ है। परिचय का दौर चलता है। हंसते-गाते कार्यक्रम संपन्न होते हैं। यह विशेष ब्लॉग हल्द्वानी में सुरेश पांडे जी (मेरे साढू भाई) की बेटी स्वाति के विवाह समारोह को लेकर है। जाहिर है साढू भाई हैं तो इनसे मुलाकात शादी के बाद होनी थी, यानी 24 सालों की मुलाकात। उसके बाद से इनको जितना समझ पाया हूं, वह यही कि पांडेय जी इंसान हैं। निश्छल। 'निंदा रस' में कोई रुचि नहीं। टू द पाइंट बात करने वाले। भविष्य में मेरे लिए 'घर' का इंतजाम करने वाले। हंसमुख और चरित्रवान। उतनी ही अच्छी इनकी पत्नी यानी मेरी पत्नी की दीदी। गुड़िया दीदी, नाम के अनुरूप ही हैं। यह निक नेम है। माता-पिता का दिया हुआ नाम और हम इसी नाम से उन्हें पुकारते हैं। इन्हें देखकर पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि जोड़ियां ऊपर ही बनती हैं। इनकी माता जी। जिन्हें मैं ईजा कहता हूं। संघर्षशील महिला। सबको आशीर्वाद देने वाली महिला। चौथी अवस्था में भी लाज का घूंघट रखने वाली महिला। सबको सम्मान देने वाली महिला। सबको आशीर्वाद देने वाली ईजा। परिवार का बाकी जिक्र इस ब्लॉग में आ ही जाएगा। 

पांडे जी से जब फोन पर बात हुई तो हमने कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया। चूंकि मैं और राजू (यह निक नेम है, असली नाम भास्कर, मेरी पत्नी भावना का जुड़वां भाई) चंडीगढ़ में ही रहते हैं, इसलिए दोनों परिवारों का कार्यक्रम साथ-साथ बना। राजू से भी रिश्ते से इतर दोस्ती है। एक-दूसरे से बिना 'मोल-भाव' के बातें शेयर करने वाली दोस्ती। राजू का बेटा भव्य और मेरा छोटा बेटा धवल अपनी बालसुलभ मस्ती के बीच तैयारी में जुट गए। अपनी-अपनी मम्मियों से कई बातें करने लगे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक का मन भी खूब था कार्यक्रम में पहुंचने का, लेकिन बेंगलौर में नयी-नयी नौकरी के चक्कर में छुट्टी का संकट था। दूरी भी एक प्रमुख कारण था, उसके न पहुंचने का। लेकिन वीडियो कॉल से हम उसे हर रस्म को दिखाते रहे। खैर... हम लोग बुधवार 10 दिसंबर को चल पड़े। ट्रेन अम्बाला से थी। सुबह दस बजे ट्रेन में बैठे। रास्ते भर अंताक्षरी खेलते हुए, कुछ बातें करते हुए हम लोग कब शाम करीब सात बजे पांडेजी के घर पहुंच गए पता ही नहीं चला। असल में बड़ी राहत मिली जब शेखर दा (स्वाति के दूसरे मामा, इस ब्लॉग में अब सारे रिश्ते इसी तरह से चलने चाहिए) कार लेकर लालकुआं आ गए। मैं और राजू बाद में कैब से चले गए, बाकी परिवार आराम से पहले पहुंच गया। हम दोनों को एक जगह सिद्धांत जोशी उर्फ सिद्धू (शेखर दा का बेटा) लेने आ गया। उस शाम कोई खास कार्यक्रम नहीं था, लेकिन हंसी-मजाक कुछ देर चली। अगले दिन हल्दी और मेहंदी का कार्यक्रम था। उस कार्यक्रम से पहले मैं और राजू एक चक्कर काठगोदाम (मेरा ससुराल) चले गए। वहां नंदू भाई (स्वाति के सबसे बड़े मामा) से मुलाकात हुई। उनके नये घर और शेखर दा के under constructio घर को देखा। सिद्धू भाई का डिजाइन बहुत पसंद आया। ऐसे मौके पर जो हंसी-मजाक होती है, वह भी हुआ और गंभीर discussion भी। खैर... स्वाति की हल्दी रस्म पर सुबह से ही चहल-पहल थी। इस चहल-पहल के बीच ज्योति (स्वाति की बड़ी दीदी) और उमाजी (स्वाति की बुआ) विशेष तौर पर व्यस्त नजर आ रही थीं। स्वाति की मम्मी की तो बात ही अलग थी। काम करते-करते वह कब चाय बनाकर ले आईं, पता ही नहीं चला। काम और तैयारी के बीच सामंजस्य बिठाना कोई उनसे सीखे। इसी तरह ज्योति भी। ज्योति के पति कपिल जी, उसके ससुरजी, सासू मां, ननद और उनके पति भी कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनसे परिचय हुआ। बिटिया के ससुर जी से कई बातें हुईं। ज्योति अपनी तैयारी के साथ-साथ अपने दोनों परिवार (ससुराल व माईके के परिजन का पूरा ध्यान रख रही थी)। विशेष अवसरों पर ज्योति का यह टैलेंट मैं उसके बचपन में भी देख चुका हैं। उसे सैल्यूट। खैर... हल्दी की रस्म बहुत शानदार और भव्य तरीके से संपन्न हुई। हल्दी कार्यक्रम के बीच में स्वाति की नजर सामने बैठी अम्मा पर गयी। उधर से अम्मा उठीं और इधर से स्वाति। दोनों गले मिलीं और रोने लग गयीं। आज के बेहद ज्यादा भौतिकवादी युग में यह दृश्य शुभ संकेत था इस बात का कि 'परिवार व्यवस्था अभी जिंदा है।' इस दृश्य पर मेरी और मेरे बगल में खड़े देवी दा (भावना की मामी के बेटे और ज्योति की ननदिया सास के पति के बेटे) की आंखों में भी आंसू आ गए। इसी रस्म के बीच स्वाति के भाई इशान जिसे प्यार से ईशू कहते हैं, से वीडियो कॉल करवाई गयी। वह इन दिनों धर्मशाला में इंटर्नशिप (होटल मैनेजमेंट कोर्स) कर रहा है। वह कार्यक्रम में नहीं आ पाया। इन दो चीजों से आप मेरे इस ब्लॉग के इंट्रो (किसी खबर या लेखन की शुरुआत, दोहा-कविता को छोड़कर, को इंट्रो कहा जाता है)। सभी कार्यक्रमों की कुछ फोटो ब्लॉग के अंत में शेयर करूंगा। हल्दी की रस्म के साथ-साथ दोपहर भोज के बाद तैयारी शुरू हो गयी मेहंदी कार्यक्रम की। इस कार्यक्रम में नाच-गाना हुआ। अनेक जानकारों से परिचय भी होता रहा। भोजन के बाद हम लोग (चंडीगढ़ ग्रुप) शेखरदा के यहां चले गए। मुख्य कार्यक्रम अगले दिन यानी 12 दिसंबर को थे। दिन में महिला संगीत। शाम को शादी। दोनों ही कार्यक्रमों में अनेक लोगों से मिला। कुछ को पहली बार में ही पहचान गया, कुछ से परिचय लेना पड़ा। अनेक लोगों ने कहा, कमजोर हो गये हो, कुछ ने कहा, पहले से ठीक लग रहे हो। मैं मजाक में किसी से कहता, 'क्या थे, क्या हुए और क्या होंगे अभी' लोग हंस पड़ते और किसी से कह देता, 'आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे, मेरे अपने, मेरे होने की निशानी मांगें।' मेरे इस अंदाज पर कोई बोल देता, अब तो यकीन हो गया कि आप, आप ही हो। खैर... महिला संगीत में खुशी और भव्यता के बीच, भावनाओं का उमड़-घुमड़ होता और चंद आंसू भी निकल आते। इस बीच, अल्मोड़ा वाली नानी जी (सिद्धू की नानी), लता दीदी, एक और गुड़िया दीदी, बैणी-वसंत और तिवारी जी, दिसि, निहित एवं अन्य लोगों से भी मुलाकात हुई। बातचीत में स्वास्थ्य, लाइफ स्टाइल भी मुद्दा रहा। एक माता जी से मुलाकात रह गई, जल्द मिलूंगा।

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यादगार रहा नेहा और ज्योति की अपनेपन की भागदौड़, मुनिया की एनर्जी 

इस संपूर्ण कार्यक्रम के दौरान अगर बच्चियों नेहा और ज्योति का जिक्र न किया जाए तो अन्याय होगा। नेहा स्वाति के मामा नंदाबल्लभ यानी नंदू भाई की बिटिया है। टीचर है। ज्योति का जिक्र पहले भी कर चुका हूं, स्वाति की दीदी। उधर, नेहा करीब एक माह से पहले अपनी बुआओं, चाचियों के बारे में सोच रही थी, चर्चा कर रही थी। यानी उनके शृंगार से लेकर गीतों के चयन को लेकर। साथ ही अन्य कार्यक्रमों के बारे में। नेहा नौकरी के साथ-साथ जिस तरह से बाकी काम भी संभाल रही थी, वह काबिले गौर और काबिले तारीफ था। ऐसा अपनापन और शिद्दत से जिम्मेदारी निर्वहन की ऐसी जद्दोजहद प्रेरित करती है। इधर, ज्योति का खाना खाते वक्त भी अपनी जिम्मेदारी निभाने और सबका ध्यान रखने का अंदाज अलग ही लेवल का था। प्राहिल की मम्मी नेहा और घर-परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही नेहा, दोनों को सैल्यूट। इस सबके बीच, हमारी योगाचार्य जिसे उसके शेखर मामा मुनिया कहते हैं और हम सब मुन्नू की एनर्जी देखने लायक थी। रातभर जगने के बाद भी तरोताजा लगी जो घर आते ही गहरी नींद में सो गयी। God bless her.

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etiquette वाले और बेहद आकर्षक मनीष

इस पूरे कार्यक्रम में हीरो का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। मनीष। दूल्हे राजा। फिलवक्त छत्तीसगढ़ में कार्यरत। मेरा पूर्व परिचय नहीं था, लेकिन जब मिला तो लगा ही नहीं कि हम अपरिचित हैं। बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी मनीष को शिष्टाचार का भी पता था। मैं देख रहा था कि दूल्हा-दुल्हन के लिए बने मंच पर बैठे मनीष जैसे ही किसी बड़े व्यक्ति को आते देखते, उठ जाते। कई बार उनसे बैठने के लिए भी कहा गया। बातचीत में भी सौम्यता। अभी ज्याता तारीफ नहीं करूंगा। भविष्य में मिलेंगे, लंबी बातचीत होगी तब बातें और लेखन जारी रहेगा। एक बात तो यहां बनती है कि सभी बाराती और मनीष के परिजन पहली मुलाकात में भा जाने वाले लगे। कुछ से मिल पाया, कुछ से नहीं। ऐसे कार्यक्रमों में ऐसा ही होता है। 

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तीन-तीन लड़कों की तिकड़ी, मचा दी धमाचौकड़ी

इस कार्यक्रम में जो अलग छाए रहे, वे थे तीन लड़के। सिद्धू, धवल और भव्य। इनका जिक्र ऊपर कर चुका हूं। इनके अलावा योग गुरु रोहित, चिन्मय और तन्मय। इन सबके लिए लड़का शब्द कहने पर कोई आपत्ति न करे, क्योंकि इनकी एनर्जी, काम निभाने का अंदाज और डांस आदि में गजब का जोश था। धवल और भव्य को सुपरवाइज कर तो रहे थे सिद्धांत जोशी, लेकिन इन्हें आदेश-निर्देश कोई भी दे रहा था। ये लोग बिना उफ्फ किए तन-मन से जुट जाते। बस विदाई के समय धवल बहुत रो गया और उसके अनेक सवालों ने मुझे भी हैरान कर दिया। उन सवालों का जिक्र फिर कभी। अब इस ब्लॉग के आखिर में यही कहूंगा कि सुरेश पांडे जी की बिटिया की इस शादी में परिवार, समाज और संसार में अपनेपन की भीनी खुशबू महसूस हुई। जय हो।

अब कुछ तस्वीरें 













Wednesday, December 10, 2025

निरंतर मेहनत और लगन से हासिल होती है उत्कृष्टता : नायब सैनी ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड’ में बोले हरियाणा के सीएम- सफल वही होते हैं, जो सपनों को धरातल पर उतारने का साहस रखते हैं

 



साभार : दैनिक ट्रिब्यून

केवल तिवारी/ट्रिन्यू

चंडीगढ़, 7 दिसंबर

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि निरंतर मेहनत और लगन से ही उत्कृष्टता हासिल होती है। उन्होंने कहा कि सफल वही लोग होते हैं, जो सपनों को धरातल पर उतारने का साहस रखते हैं। शनिवार शाम चंडीगढ़ के ‘द ताज’ होटल में आयोजित ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड्स’ में नायब सैनी बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे। उन्होंने कार्यक्रम में सम्मानित होने वाली प्रमुख हस्तियों को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप केवल सफल व्यक्ति नहीं हैं, आप समाज के प्रकाश स्तम्भ हैं, जो अंधेरे में भी रास्ता दिखाते हैं।’ कार्यक्रम में ‘द ट्रिब्यून’ के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी, गुरबचन जगत, परमजीत सिंह पटवालिया, ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ के महाप्रबंधक अमित शर्मा, ‘द ट्रिब्यून’ की एडिटर इन चीफ ज्योति मल्होत्रा, ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के संपादक नरेश कौशल, ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ की संपादक अरविंदर पाल कौर जौहल, अनेक उद्योगपति, समाजसेवी एवं लोक कलाकार मौजूद रहे।

दीप प्रज्वलन से शुरू हुए कार्यक्रम में लोक कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। इससे पहले, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी एवं सम्मानित होने वाले उद्यमियों, समाज सेवियों का स्वागत करते हुए ‘द ट्रिब्यून’ के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी ने ट्रिब्यून के समृद्ध एवं प्रतिष्ठित इतिहास को याद किया। उन्होंने कहा, ‘हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी से हमें बहुत गर्व महसूस हो रहा है। हरियाणा के लोगों के विकास और भलाई के लिए उनकी लीडरशिप और कमिटमेंट को सब मानते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ भविष्य में भी योग्यता को सम्मान देता रहे।’ उन्होंने याद किया कि दूरदर्शी समाजसेवी स्वर्गीय सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने ‘द ट्रिब्यून’ को शुरू किया था। इसका मकसद था- सच्चाई, आज़ादी और ईमानदारी के साथ समाज की सेवा करना। 144 से ज्यादा वर्षाें से ‘द ट्रिब्यून’ ने ‘दैनिक ट्रिब्यून’ और ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ के साथ मिलकर इस मिशन को पूरी लगन से निभाया है। उन्होंने कहा कि ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ आज के मीडिया माहौल में सबसे अलग है। यह गैर व्यावसायिक, नॉन-कॉर्पोरेट है और पूरी तरह से जनसेवा के लिए समर्पित है। पीढ़ियों से जाने-माने ट्रस्टियों के दिशा-निर्देश में यह ट्रस्ट निष्पक्षता, ज़िम्मेदारी और निडर पत्रकारिता के सिद्धांतों पर मजबूती से खड़ा है। यह विरासत सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, यह हमारे रोज के काम में


निरंतर मेहनत और लगन से हासिल होती है उत्कृष्टता : नायब सैनी


अपने संबोधन में मुख्यमंत्री नायब सैनी ने संविधान के शिल्पी भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर नमन करते हुए कहा कि समाज को कुछ देने की जिजीविषा हर सफल व्यक्ति को होती है। उन्होंने कहा कि यह बहुत हर्ष का विषय है कि स्थापना के समय से लेकर हमेशा से ही ‘ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह’ ने अपनी छवि, गरिमा और ऊंचे मानदंडों को बनाए रखा। ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड’ का जिक्र करते हुए सीएम सैनी ने कहा, ‘अचीवर शब्द अपने आप में ऊर्जा, संकल्प, परिश्रम और साहस की कहानी कहता है।’ उन्होंने कहा कि चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, विज्ञान हो, उद्यमिता हो, कला-संस्कृति हो, नवाचार हो, खेल हो, स्वास्थ्य क्षेत्र हो या सामाजिक सेवा, आप सभी की उपलब्धियां नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। ये हमें विश्वास दिलाती हैं कि भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। उन्होंने कहा कि आप जैसे ‘गेम चेंजर्स’ आगे आते हैं तो समाज भी तरक्की करता है। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि, सभी ट्रस्टियों, प्रतिभागियों का एवं मौजूद लोगों का धन्यवाद देते हुए ट्रिब्यून ट्रस्ट के महाप्रबंधक अमित शर्मा ने कहा कि यह कार्यक्रम बहुत सफल और यादगार रहा। दैनिक ट्रिब्यून के संपादक नरेश कौशल का विशेष धन्यवाद देते हुए उन्होंने सभी सहयोगियों को आभार व्यक्त किया।


देश को आगे ले जाने वालों के साथ है हरियाणा

सीएम सैनी ने कहा कि देश और समाज को सशक्त बनाने वालों के साथ हरियाणा सरकार है। सरकार के विभिन्न कदमों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमने हरियाणा सीएसआर एडवाइजरी बोर्ड का गठन किया है। इसका पोर्टल भी बनाया गया है। इस पर सेवा करने वाले लोग, कंपनियां, उद्यमी आदि अपना पंजीकरण करवाते हैं। उन्होंने ‘राज्य शिक्षक पुरस्कार’, ‘हरियाणा विज्ञान रत्न पुरस्कार’, ‘अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन पुरस्कार’, ‘कल्पना चावला हरियाणा सोलर अवार्ड’ एवं ‘सुषमा स्वराज अवार्ड आदि का जिक्र करते हुए कहा कि देश को आगे बढ़ाने में मददगारों के साथ हरियाणा सरकार है। उन्होंने कहा कि अच्छा काम करने वाले श्रमिकों को ‘मुख्यमंत्री श्रम पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाता है। इसी प्रकार, पद्म पुरस्कार विजेताओं को भी ‘हरियाणा गौरव सम्मान’ से विभूषित किया जाता है।


रंगारंग कार्यक्रम ने बांधा समां

अचीवर्स अवार्ड समारोह में रंगारंग कार्यक्रम ने भी समा बांधा। निर्माता निर्देशक हरविंदर मलिक के नेतृत्व में लोक कलाकार महावीर गुड्डू, नम्रता शांडिल्य एवं विधि देसवाल ने अलग-अलग प्रस्तुतियां दीं। विधि देसवाल एवं उनकी टीम ने जब ‘जगत में न कोई परमानेंट, काल सभी को खा जाएगा लेडी हो जेंट...’ गाया तो खचाखच भरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। इसके साथ ही गंगाजी के प्यार में..., ‘यो म्हारा हरियाणा’ आदि प्रस्तुतियों ने सभागार में मौजूद लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। सभी कलाकारों को भी कार्यक्रम में सम्मानित किया गया और बाद में सभी ने सीएम सैनी एवं ट्रस्टी पटवालिया के साथ फोटो खिंचवाई।


https://www.dainiktribuneonline.com/news/nation/excellence-is-achieved-through-continuous-hard-work-and-dedication-nayab-saini/

Friday, November 21, 2025

माध्यम बदले हैं, लेखन और पाठन कम नहीं हुआ : डॉ. सुमिता मिश्रा, तीन दिवसीय चंडीगढ़ लिट फेस्ट 21 नवंबर से

केवल तिवारी

पढ़ने के माध्यम भले ही बदले हों, लेकिन साहित्यानुराग कम नहीं हुआ। हां यह भी एक तथ्य है कि लेखन का स्वरूप भी बदला है। यह बात कही डॉ. सुमिता मिश्रा, आईएएस, चेयरपर्सन, चंडीगढ़ लिटरेरी सोसाइटी (सीएलएस) और फेस्टिवल डायरेक्टर, सीएलएफ लिटराटी ने। इस वर्ष यानी 2025 के चंडीगढ़ लिटफेस्ट के संबंध में डॉ. सुमिता ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तार से जानकारी दी। इस मौके पर उनके साथ मौजूद मनमोहन सिंह आदि ने भी माना कि बच्चे हों या बड़े रीडिंग हैबिट बनी रहनी चाहिए। साहित्य और कला से संबंधित अनेक सवालात इस दौरान किए गए। सुखद है कि ऐसे साहित्योत्सव हो रहे हैं। चंडीगढ़ भी इसका गवाह बन रहा है। दिल्ली में अनेक पुस्तक मेलों में जाने का मौका मिलता था, कवरेज भी खूब किया। इस बार इस कार्यक्रम में जाने का मन बना। कार्यक्रम तो आगामी 21 से 23 नवंबर के बीच है, फिलहाल कट एंड रेजर यानी प्री इवेंट की इस कवरेज से संबंधित मीडिया विज्ञप्ति को हू-ब-हू नीचे दे रहा हूं। अपने अखबार दैनिक ट्रिब्यून के लिए खबर बन चुकी है।



लिटरेचर फेस्ट के सीएलएफ लिटराटी 2025 का आयोजन 21 नवंबर से शहर में

एड गुरु प्रह्लाद कक्कड़, अभिनेत्री -कवि संध्या मृदुल, पुलिस अधिकारी व लेखक अमित लोढ़ा सहित अन्य के अलग अलग सेशन आयोजित होंगे

डॉ.सुमिता मिश्रा, आईएएस, चेयरपर्सन, चंडीगढ़ लिटरेरी सोसाइटी (सीएलएस) और फेस्टिवल डायरेक्टर, सीएलएफ लिटराटी 2025 (चंडीगढ़ लिटफेस्ट) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 21 से 23 नवंबर तक आयोजित होने वाले आगामी सीएलएफ लिटराटी 2025 (चंडीगढ़ लिटफेस्ट) की घोषणा की। डॉ. मिश्रा ने बताया कि यह लिटरेचर फेस्टिवल सीएलएस द्वारा आयोजित किया जा रहा है और 21 नवंबर को उत्सव की शुरुआत के उपलक्ष में एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि लिटफेस्ट के दौरान साहित्यिक चर्चाएं 22-23 नवंबर को लेक क्लब में शांत सुखना लेक की पृष्ठभूमि में होंगी।

डॉ. सुमिता मिश्रा ने कहा कि इस वर्ष साहित्य, विचारों और कल्पना के उत्सव का थीम 'वर्ल्डस विदइन वर्ड्स' है। दो दिनों तक चलने वाले इंटरैक्टिव सेशंस में 27 लेखक, कवि, एड फिल्म निर्माता और कलाकार भाग लेंगे। इस उत्सव में पंद्रह (15) विचारोत्तेजक सत्र, चार (4) पुस्तक विमोचन और एक क्रिएटिव राइटिंग वर्कशॉप होगी।

डॉ. मिश्रा ने आगे कहा कि हमने पूरे भारत और ऑस्ट्रेलिया के लेखकों की एक दिलचस्प सूची तैयार की है, जो समकालीन विमर्श को आकार देने वाले मुद्दों पर जाने-माने वार्ताकारों के साथ चर्चा करते नज़र आएंगे।

इस वर्ष के उत्सव में सबसे प्रतीक्षित नामों में से एक एड फिल्म निर्माता और एड गुरु प्रह्लाद कक्कड़ हैं, जो प्रतिष्ठित विज्ञापन कैम्पेंस के लिए जाने जाते हैं। इस शानदार कार्यक्रम में साहित्य और कला जगत के अन्य जाने-माने नामों के साथ प्रशंसित अभिनेत्री और कवियत्री संध्या मृदुल भी शामिल होंगी।

21 नवंबर की शाम रानी लक्ष्मी बाई भवन, सेक्टर 38 में प्रसिद्ध कलाकार भुवन शर्मा द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक प्रस्तुति 'साज़ औ आवाज़' से लिटरेचर फेस्टिवल का शुभारंभ होगा।

साहित्यिक आदान-प्रदान शनिवार, 22 नवंबर को डॉ. सुमिता मिश्रा के स्वागत भाषण के साथ शुरू होगा, जिसके बाद राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के प्रेसीडेंट माधव कौशिक उद्घाटन भाषण देंगे। इसके बाद निम्नलिखित संवादात्मक सत्र आयोजित किए जाएंगे:

'द पावर ऑफ़ अ स्टोरी: एडवरटाइजिंग इनसाइट्स' में प्रह्लाद कक्कड़ लेखिका अराधिका शर्मा के साथ बातचीत करेंगे; 'इंडियन डेमोक्रेसी: इवॉल्विंग पॉलिटी एंड पब्लिक डिस्कोर्स' में पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी, जो अपने संस्मरण 'आई, विटनेस: इंडिया फ्रॉम नेहरू टू नरेंद्र मोदी' के लिए जाने जाते हैं; राशीद किदवई, जिन्हें '24 अकबर रोड' और 'द हाउस ऑफ सिंधियाज' जैसी किताबों के लिए जाना जाता है, और पुरस्कार विजेता पत्रकार नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार रमेश विनायक के साथ बातचीत करेंगे; 'बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन' में, प्रशंसित लेखक दीप हलदर, जिन्हें 'ब्लड आइलैंड, बंगाल' और 'बीइंग हिंदू इन बांग्लादेश' पुस्तकों के लिए जाना जाता है; और लेखक और रिसर्चर रामी देसाई, वरिष्ठ पत्रकार कार्तिकेय शर्मा के साथ आमने-सामने के अंदाज में बातचीत करेंगे।

उत्सव के दूसरे दिन दो पुस्तकों का विमोचन होगा, महक ग्रोवर की 'द साइलेंट ब्रेव' और मंजू जैदका की 'द लीजेंड ऑफ सांझी-गिरी'।

इसके बाद एक सेशन 'शब्द की सुगंध: हिंदी साहित्य का नया दौर' होगा जिसमें माधव कौशिक, कवि और जीवनी लेखक चंद्र त्रिखा और मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक चंद्रशेखर वर्मा वरिष्ठ पत्रकार शायदा बानो के साथ बातचीत करेंगे। 'दिल दे कागज़ उत्ते: नवी लहर दे कलमकार' में, सेवानिवृत्त मनमोहन सिंह (आईपीएस) और एक प्रशंसित और पुरस्कार विजेता कवि और लेखक-शायर बब्बू तीर लेखिका रावी पंधेर के साथ बातचीत करेंगे। 'चंडीगढ़: द सिटी दैट इज़, एंड दैट वाज़ नॉट' में आर्किटेक्चर इतिहासकार रजनीश वत्स इतिहासकार और लेखक राजीव लोचन के साथ बातचीत करते हुए दिखाई देंगे; डॉ सुमिता मिश्रा प्रसिद्ध कवि पत्रकार मनराज ग्रेवाल के साथ 'शी राइट्स, शी लीड्स: स्टेटक्राफ्ट एंड स्टैंज़ा' में बातचीत करते हुए दिखाई देंगे;और 'अनटेमड साइलेंस: द मेनी लाइव्स ऑफ़ संध्या मृदुल' में, संध्या मृदुल लेखिका और कवि सोनिया चौहान के साथ बातचीत करेंगी।

22 नवंबर की शाम को, सीएलएस 'नृत्य प्रांगण', भवन डांसिंग कोर्टयार्ड के सहयोग से भारतीय विद्या भवन, सेक्टर 27 में डॉ सुचेता भिड़े-चापेकर के शिष्यों द्वारा भरतनाट्यम प्रस्तुति 'स्वरित मुद्राएं' प्रस्तुत करेगा।

तीसरे दिन - रविवार, 23 नवंबर को उत्सव के अंतिम दिन, सोनिका सेठी और देवयानी सिंह द्वारा 'क्रिएटिव राइटिंग वर्कशॉप' के साथ फेस्टिवल की शुरुआत होगी; 'स्प्रिचुअल कोर्ड्स: स्टोरीज ऑफ चेंज एंड चॉयस' में शालिनी मोदी जिन्होंने 'रासा इन डिवाइन रिलेशनशिप्स एंड इम्मॉर्टैलिटी: ए बून ऑर ए कर्स' पुस्तक लिखी है और कृष्णपद दास कृष्ण - अक्षय पात्र फाउंडेशन के एक आध्यात्मिक गुरु, अन्नूरानी शर्मा, एक बाइलैंग्वुअल कवि, लेखक और भक्ति गायक के साथ बातचीत करेंगे। 'रूट्स एंड रेसिपीज़: ए वेलनेस कन्वर्सेशन' में भारत की प्रमुख न्यूट्रीनिशस्ट और पब्लिक हेल्थ एडवोकेट रुजुता दिवेकर शामिल होंगी। वहीं, 'बिहार डायरीज़ एंड ग्राउंड ज़ीरो: रियल हीरोज़, रियल स्टोरीज़' में आईपीएस अधिकारी अमित लोढ़ा शामिल होंगे, जिनकी बेस्टसेलिंग कृति 'बिहार डायरीज़, लाइफ इन द यूनिफ़ॉर्म, एंड पुलिस अफेयर्स' को एक लोकप्रिय ओटीटी सीरीज़ में बनाया गया था , अमित लोढ़ा के साथ पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी वीना रमन भी होंगी और दोनों आईपीएस अधिकारी और लेखक अर्श वर्मा के साथ बातचीत करेंगे ।


इन सेशंस के बाद दो पुस्तकों - सोनिया वशिष्ठ ओबेरॉय की 'लाइफ, लव एंड अस' और रावी पंधेर की 'इकोज़ ऑफ़ द सोल' का विमोचन होगा।

पुस्तक विमोचन के बाद, कई और सेशन होंगे, जिनमें 'इंडिया थ्रू मेमोरी एंड ट्रैवल' जिसमें ऑस्ट्रेलियाई लेखक सीन डॉयल कवि सुनैना जैन के साथ बातचीत करेंगे; 'टेलिंग टेल्स, टचिंग लाइव्स' में पुरस्कार विजेता लेखिका शोभा थरूर और एक अन्य पुरस्कार विजेता लेखिका मोना वर्मा सोनिका सेठी के साथ बातचीत करेंगी। राईवर्स पब्लिशिंग ग्रुप के संस्थापक-निदेशक और सूफी कॉलमनिस्ट अफ्फान यस्वी और एक सूफी संगीतकार, जिन्हें 'प्रिंस ऑफ कव्वाली' के नाम से जाना जाता है - ध्रुव सांगारी - कवि, अनुवादक और रिसर्चर डॉ. विशाखा गोयल के साथ बातचीत करेंगे। 'सीधा संवाद' में हिंदी लेखक बलराम और प्रसिद्ध कवि, कहानीकार और नाटककार विजय कपूर के बीच चर्चा होगी। 'फ्रॉम कृष्णा टू चाणक्य: रिटेलिंग भारत विद ए ट्विस्ट' में इंग्लिश फिक्शन लेखक अश्विन सांघी 'सुनीता विलियम्स: एस्ट्रोनॉट एक्स्ट्राऑर्डिनेयर' की लेखिका आराधना शर्मा के साथ बातचीत करेंगे।

महोत्सव का समापन सीएलएफ लिटराटी अवॉर्ड समारोह के साथ होगा जिसमें डॉ. सुमिता मिश्रा और टीम लिटराटी द्वारा अंग्रेजी और हिंदी दोनों की फिक्शन और नॉन-फिक्शन कैटेगरीज में विजेताओं को सीएलएफ लिटराटी अवॉर्ड्स प्रदान किए जाएंगे।


सीएलएफ लिटरेचर अवॉर्ड्स के लिए चयनित पुस्तकें:

इंग्लिश नॉन-फिक्शन में

देवदत्त पटनायक द्वारा ‘अहिम्सा: 100 रिफलेक्शंस ऑन द हड़प्पन सिविलाइजेशन’ (हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया); गोपालकृष्ण गांधी द्वारा ‘द अनडाइंग लाइट: ए पर्सनल हिस्ट्री ऑफ इंडिपेंडेंट इंडिया’ (एलेफ बुक कंपनी); नजमा हेपतुल्ला द्वारा ‘इन परस्यूट ऑफ डेमोक्रेसी: बियॉन्ड पार्टी लाइन्स’ (रूपा पब्लिकेशंस इंडिया); रस्किन बॉन्ड द्वारा ‘अनदर डे इन लंडौर: लुकिंग आउट फ्रॉम माई विंडो’ (हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया) और शशि थरूर द्वारा ‘ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड: अराउंड द वर्ड इन 101 एसेज’ (एलेफ बुक कंपनी)।


इंग्लिश फिक्शन में


अमिताभ बागची द्वारा ‘अननोन सिटी: ए नॉवेल’ (हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया); अनीता देसाई द्वारा ‘रोसारिता पैन’ (मैकमिलन इंडिया); एनी जैदी द्वारा ‘द कमबैक: ए नॉवेल’ (एलेफ बुक कंपनी); 'द अयोध्या एलायंस: भारत कलेक्शन 8' अश्विन सांघी (हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया) द्वारा और 'व्हिसल्स ऑफ द सिफूंग: टेल्स फ्रॉम द बोडो हार्टलैंड' रश्मि नारज़ारी (ओम बुक्स इंटरनेशनल) द्वारा।


हिंदी फिक्शन/नॉन-फिक्शन में


बलराम (राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड) द्वारा 'शुभ दिन'; गीताश्री (राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड) द्वारा 'कामनाओं की मुंडेर पर' और कैफ़ी हाशमी (लोकभारती प्रकाशन) द्वारा 'शीया बटर'।

Saturday, November 15, 2025

हिम्मत से जीने वाली भाभी जी, मौत से भी बेखौफ नजरें मिलाईं

केवल तिवारी

जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेके जायेगी। फिल्म मुकद्दर का सिकंदर के इस गीत के बोल बरबस तब याद आए जब गांव से मदन ने सूचना दी कि खिलगजार भाभीजी नहीं रही। उस परिवार की बुजुर्गतम महिला। हमारे परिवार की भी। लंबा-चौड़ा परिवार है हमारा। भाभी जी मुकद्दर का सिकंदर थीं या नहीं, इस पर सबकी अपनी राय हो सकती है, लेकिन शायद इसमें दो मत नहीं होंगे कि वह बहुत हिम्मती थीं। इतनी हिम्मती कि चौथी अवस्था में भी बड़े आराम से कहतीं, 'सब इंतजाम हो जाएगा।' कुछ साल पहले की बात है, मैंने उनसे कहा, 'बोजी (भाभीजी) हम लोग घर आएंगे, लेकिन...' पूरा सवाल सुने बिना ही वह समझ गयीं कि गांव में इंतजाम की बात पूछी जा रही है। हमारा मूल घर जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। अचानक किसी के घर इतने लोग कैसे पहुंच सकते हैं? भाभीजी ने बीच में ही रोककर कहा, सब इंतजाम हो जाएगा, बस हफ्तेभर पहले बता देना। सच में उनके इंतजामात का असली आनंद आता जब वह भागवत करातीं। स्नेह से सबको बुलातीं। दीदीयों को भी नहीं भूलतीं। सबको निमंत्रण देना, गांव पहुंचने पर बहुत खुश होना और आशीर्वाद का पिटारा खोल देना, यही सोच थी उनकी। उनसे बेहद लगाव था। बहुत पुरानी बात याद करूं तो वह है प्रेमा दीदी की शादी का। कन्यादान जोड़े में ही हो सकता है। माता-पिता का जोड़ा तो पहले ही टूटा हुआ था, याद भी नहीं कि पिताजी कब चले गये। निकट परिवार में सब नौकरी-पेशा वाले, दूर-दराज निवासी। भाई साहब की शादी हुई नहीं थी, ऐसे में यही भाभी ने आंचल फैलाया और आशीर्वाद दिया। बाद तक भी कहती रहीं, 'प्रेमा ललि तो मेरि चेली जस छन।' यानी प्रेमा (ललि मतलब ननद) तो मेरी बेटी जैसी हैं। उसके बाद मेरा कुछ वर्षों का प्रारंभिक जीवन गांव में चला। बहुत ज्यादा चीजें समझ नहीं आती थीं। बाद में लखनऊ आ गया। एक बार 12वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान गांव गया। ईजा (माताजी) ने मिठाई की पुड़िया खिलगजार आदि जगह देने के लिए कहा। वह बोलीं, इसी बहाने तू सबसे मिल भी आएगा। तब भाभी जी ने कहा था, केवल तुमने इतना बोलना कहां से सीख लिया। असल में, मैं बहुत अंतर्मुखी टाइप व्यक्ति था। फिर मैंने उनकी बात पर गौर किया तो लगा सचमुच मैं बोलने और लिखने वाला बहुत हो गया हूं। खुद ही जवाब ढूंढ़ लिया, अब ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया है, इसलिए शायद बहुत बलार (बोलने वाला) हो गया हूं। शाहजहांपुर में ट्यूशन पढ़ाता था तो बच्चों से ज्यादा उनके मां-बाप को सिखाना पड़ता था। पढ़ाई के अलावा भी बच्चों के प्रति उनके अनेक आग्रह और दुराग्रह रहते थे। खैर... बाद में भाभीजी से साल-दो साल में मिलना होता रहता था। इस दौरान माताजी चल बसीं। वह अक्सर कहतीं, तुम्हारी ईजा तो भगवान का रूप थीं। महात्मा थीं। मैं मुस्कुरा देता। मां के प्रति मेरा अगाध स्नेह रहा है, जैसा कि हर बच्चे का अपनी मां के प्रति रहता ही है। मुझे उनकी बातें याद रहतीं। बातों ही बातों में भले ही हम पुरानी चीजों को याद करते, लेकिन उनका संदेश भविष्य के प्रति ज्यादा होता। बीती ताहि बिसार दे... का भाव लिए हुए। वह भागवत करातीं तो कभी बिपिन के साथ तो कभी अकेले जाना हुआ। बिपिन भी अब दुनिया में नहीं रहा। पिछली बार मैं जा नहीं पाया था। इस बार भाभी जी खुद ही चली गयीं। बिना किसी को कोई कष्ट दिये और बिना खुद कोई शारीरिक कष्ट झेले। मानसिक रूप से वह कैसे मजबूत रहती थीं, वहीं जानें। गांवों में पुराने संस्कार ऐसे ही थे कि हम ज्यादातर बड़े लोगों का नाम ही नहीं जानते थे। कोई चाची, कोई ताई और कोई भाभी। कभी किसी के नाम का पता ही नहीं चला। प्रसंगवश एक किस्सा याद आ रहा है। मैं एमए में जब पढ़ रहा था तो गांव गया। ईजा भी उन दिनों गांव में थी। मैंने कहा, ईजा मैंने माकोट (ननिहाल) नहीं देखा है। चलते हैं। वहां गये तो शाम के वक्त एक पूजा में बैठे थे। तभी एक बुजुर्ग सज्जन ने ईजा का नाम लिया और पूछा, तू कब आई। ईजा के नाम का संबोधन और बहन की तरह आत्मीय भाव से ऐसा पुकारा जाना मुझे बेहद भावुक कर गया। तभी ईजा ने मुझसे कहा, बेटा ये मामा हैं, पैर छुओ। पहली बार किसी के मुंह से मैंने मां का नाम सुना। गांव में तो अक्सर किसी के मुंह से उनके लिए अम्मा, ताई, चाची या भाभी जैसे ही संबोधन सुने थे। अब मुझे इन भाभी का भी नाम का पता ही नहीं। मैंने किसी से पूछा भी नहीं। खिलगजार की बोजी को सादर नमन। पुण्यात्मा का यदा-कदा स्मरण होता ही रहेगा। ऊं वासुदेवाय नम: