केवल तिवारी
हर अगला पल बीता हुआ हो जाएगा, कुछ यादों को ये मन गुनगुनाएगा
कुछ अपनी सुनाई, कुछ सबकी सुनी, इस सफर पर हमने कहानी बुनी
तरोताजा हुए दिल से निकली आवाज, वादियों में बजी जिंदगी की साज
तारीख 26/01/26, दिन सोमवार। अखबारी दुनिया में कुछ छुट्टियां होती हैं जिनमें सभी साथी एक साथ कहीं आ-जा सकते हैं। दिल्ली में था तो ऐसी छुट्टियां दो ही होती थीं। एक होली और दूसरी दिवाली। इन छुट्टियों में पारिवारिक दायित्व होते थे, लिहाजा दिनभर के लिए मित्र मंडली में गपशप नहीं हो सकती थी। चंडीगढ़ में ऐसी छुट्टियां चार होती हैं। उक्त दो में दो और... एक पंद्रह अगस्त और दूसरी 26 जनवरी। अपने (दैनिक ट्रिब्यून के) संपादक नरेश कौशल जी से हम कुछ लोगों ने आग्रह किया कि इस बार गणतंत्र दिवस पर कहीं चलते हैं। काम में पूरा समर्पण और फुर्सत के पलों में खूब हंसी-मजाक को तवज्जो देने वाले कौशल साहब ने हामी भर दी और कहा कि पूरे न्यूज रूम एवं उनके स्टाफ से बात कर लीजिए। ज्यादातर लोग राजी हो गए और कुछ को जरूरी काम से बाहर जाना था। हम 17-18 लोग सुबह नौ बजे के करीब एक बस से चल पड़े कसौली के लिए। कोई शिकवा-शिकायत नहीं। कोई इधर-उधर की नहीं। सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन। किसी ने गीत सुनाया तो किसी ने चुटकुला। कोई शेर-ओ-शायरी में सिद्धहस्त दिखा तो किसी ने रामचरित मानस की चौपाइयां सुनाईं। कसौली जाना, वहां कुछ घंटे रुकना फिर देर शाम तक घर लौट आना, सारा मंजर ऐसा लगा मानो अभी कोई सपना देख रहे थे और नींद खुल गयी। एक शायर की दो लाइनें याद आ रही हैं-
तुम पर क्या बीती हमको सुनाओ, ए जाते हुए लम्हों तुम लौट के आना
यह सफर बहुत यादगार रहा। इससे जुड़ी कुछ फोटो और वीडियो साझा कर रहा हूं। सफर संबंधी उस सदाबहार शेर के साथ
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ, ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां।





1 comment:
बढिया रेखाचित्र
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