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Thursday, December 31, 2020

21वां साल शुभ हो...

 केवल तिवारी

21वीं सदी का 21वां साल शुरू हो गया है। या यूं कहें कि यह सदी भी अब उस दौर में पहुंच गयी है जब उमंगें होती हैं, उत्साह होता है। जज्बा होता है। घबराहट कम होती है। पीछे ज्यादा देखते नहीं, आगे की चिंता कम रहती है। अगर आप प्रौढ़ या वृद्ध हैं तो याद कीजिए अपने जीवन का 21वां साल। मैं यह नहीं कहता तब सबकुछ मस्त रहा होगा। हो सकता है हम-आप में अनेक ऐसे होंगे जिनके लिए 21वां साल खराब ही रहा हो, लेकिन फिर भी वैसी परिस्थितियां आज आ जायें तो क्या आप-हम में इतनी हिम्मत है कि हम उतनी ही आसानी से जीवन पथ पर बढ़ चलें। खैर...

21वां साल असल में कई मायने में अनूठा होता है। कहा जाता है कि मनुष्य बनने से पहले 84 हजार योनियों में कोई भी जीव विचरण करके आता है। अगर यह सच है कि 84 हजार योनियां होती हैं तो इसका चौथाई भाग है 21, यानी 21वां साल कुल योनियों की संख्या का चौथाई भाग। या हमारे जीवन का एक चौथाई भाग। अगर सौ वर्षों के जीवन की गणना सोचें तो चार साल बाद मनुष्य का गृहस्थ आश्रम शुरू हो जाता है। यानी यहां भी चार का अंक। इसी तरह कुंडली में 12 ग्रह होते हैं। इस 12 की संख्या को उलट दें तो 21 बनता है।

हम तो अपनी युवावस्था से ही सुनते आ रहे हैं कि भारत 21वीं सदी के लिए तैयार हो रहा है। लो जी देखते ही देखते 21वीं सदी के 20 साल निकल भी गये। जो जिंदगी 20-20 क्रिकेट की मानिंद रफ्तार से भाग रही थी, उसी जिंदगी में 2020 में ब्रेक लग गया। यह ब्रेक था कुछ सोचने के लिए वक्त लेने का। कुदरत ने कुछ समझाया, दुनियादारी ने कुछ समझाया और कुछ समझ पाये कुछ नहीं। कुछ की उम्र भी ऐसी हो गयी कि उन्हें संभवत: सोचने की बहुत जरूरत भी नहीं। जो भी हो, समय तो अपनी रफ्तार से चलता ही है। सो चल रहा है। अब 21वां साल शुरू हो गया है। यह साल सबके लिए शुभ हो, यही कामना है और इसी कामना के साथ एक कविता आपके लिए पेश है-


कुछ भूलेंगे, कुछ याद रह जाएगा


वो वक्त गुजर गया, ये वक्त भी चला जाएगा।

कुछ चीजें भूल जाएंगे, कुछ याद रह जाएगा।

क्यों उलझें इक-दूजे से

न मैं रहूंगा, न तू रह पाएगा।

संपूर्ण न मैं हूं, न तुम हो

किसी का कुछ भी न रह पाएगा।

भगवान न मैं हूं, न तुम हो

यह बात इंसान कब समझ पाएगा

भ्रम ने पैदा कर दीं इंसानी दूरियां

समझ ही से भ्रम को उतार पाएगा।

हम दोष देते हैं, इक दूजे को

न मैं झुकता हूं, न तू आगे आएगा।

इस सदी के दो दशक देखो गए

यूं ही हमारा यह जीवन भी चला जाएगा।

आओ नयी इबारत लिखें

बाद में न मैं रहूंगा, न तू रह पाएगा।

Monday, December 7, 2020

मैं तो ऐसा/ऐसी ही हूं... बदलना होगा यह भाव

 केवल तिवारी

‘कोई भला माने या बुरा, मेरी तो यही आदत है।’ ‘अपने को फर्क नहीं पड़ता।’ इस तरह के डायलॉग अक्सर अनेक लोगों से आप लोगों ने सुना होगा। अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि असल में ऐसा कहने वाले एक तो अपनी आदत सुधारना चाहते हैं, लेकिन attitude change problem बीच में आ जाती है। ऐसे ही जो कहते हैं कि मुझे फर्क नहीं पड़ता, वाकई उन्हें फर्क पड़ता है। बस ऐसे लोग यह दिखाने के चक्कर में कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, अंदर ही अंदर कुढ़ते रहते हैं परेशान रहते हैं। रिश्तों में खटास आती रहती है, स्वाभाविक प्रक्रिया है। क्योंकि मानव मशीन नहीं है। उसके अंदर गुस्सा, प्रेम, आदर, तिरष्कार, क्रोध आदि मनोभाव आते रहते हैं। जानकारों का कहना है कि अचानक आने वाले मनोभाव स्थायी नहीं रहने चाहिए। या यूं कहें कि स्थायी रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसका उदाहरण देते हुए पिछले दिनों एक सज्जन ने समझाया, ‘आप कभी उन बातों पर गौर कीजिए जिसकी शुरुआत में हम कहते हैं आज से कभी नहीं होगा या आज से उससे बातचीत बंद।’ असल में स्थायी घोषणा तो क्षणिक आवेग है। यानी हमेशा के लिए कोई चीज बंद करने या शुरू करने की बात कहना क्षणिक आवेग है। बाद में कुछ पल सोचना चाहिए। फिर मंथन करना चाहिए जब हमारा जीवन ही स्थायी नहीं है तो कोई चीज कैसे स्थायी हो सकती है। परिवर्तन तो सृष्टि का नियम है। फिर बिना नव्यता के सुख कहां मिलता है। नवीनता लाने के लिए मनोभावों के संबंध में स्थायी घोषणा भी कैसे हो सकती है।

आखिर शुरू कैसे करें

हो सकता है आपका मन कर रहा हो कि अब नयी शुरुआत करनी चाहिए। रिश्तों में गर्माहट लाने की कोशिश होनी चाहिए। दूसरा पक्ष इससे अनजान है तो आप एकाध कोशिशें कर सकते हैं। यदि उन कोशिशों का कोई प्रतिफल नहीं मिला तो निराश होने की जरूरत नहीं। कुछ दिन हालात को वक्त के हवाले कर दीजिए। असल में वक्त हर घाव को भर देता है। रिश्तों को बनाये रखने के लिए दोनों ओर से संवाद आवश्यक है। संवादहीनता की स्थिति तो अच्छी बात नहीं। यूं तो सब जानते हैं कि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है। यानी मृत्यु निश्चित है। जीवन अनिश्चित। कोरोना काल ने इस संबंध में हमें और सचेत कर दिया है। अपने हिस्से के काम को अच्छे से निर्वहन करना बेहद जरूरी है।

सोशल मीडिया के संदेश और हम

आप अगर दो-चार व्हाट्सएप ग्रूप, फेसबुक या ऐसे ही अन्य सोशल साइट्स पर कुछ लोगों के मैसेज पर गौर करेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि ज्ञान का भंडार भी वहां है और नफरत भी। कुछ लोग नकारात्मक (negative) बातों को ज्यादा प्रसारित करते हैं और कुछ हमेशा अच्छी बातों को। इन बातों से ही हमें खुद के लिए कुछ चीजों को चुनना है। जो ज्ञान गंगा बहती है, अगर उसमें से कुछ बूंदें भी हम सहेज लें और उन पर अमल कर लें तो हम अपने हिस्से में तो अच्छे हो ही जाएंगे। इसलिए न तो नकारात्मक बातों को तवज्जो दें और न ही उन्हें प्रसारित करें।

बच्चों को अपनों के बारे में बतायें

शहरी जीवनशैली में जहां एकल परिवार प्रथा (single family system) चल रहा है वहां बच्चों को कई बार रिश्तों की जानकारी नहीं होती। कोरोना काल में लंबे समय से परिवार के लोगों से मिलना नहीं हो रहा होगा। ऐसे में जरूरी है बच्चों को परिवार की अहमियत बताना। अपनों से बात कराते रहना। हो सके तो बच्चों को पुरानी कोई ऐसी बात न बताएं जिससे नफरत की जरा सी भी बू आती हो। कुछ समय के लिए तो यह अच्छा लग सकता है कि आपके बच्चे उन नफरतभरी बातों से आपको और ज्यादा अपनापन देने लग जाएं, लेकिन ये सब दीर्घकालिक गलत संदेश देने वाली शुरुआत होती है। तो चलिए कुछ अच्छा सोचें। अच्छा बोलें। रिश्तों को नये सिरे से जोड़ें। कौन जाने कल हो न हो। 

Thursday, November 26, 2020

अब कटारा जी की सूचना... बिछड़े सभी बारी-बारी

 केवल तिवारी

यह क्या हो रहा है? हर कुछ दिन बाद ऐसी सूचना। अभी दिनेश तिवारी जी के जाने की चर्चाएं ही चल रही थीं कि आज दोपहर पता चला राजीव कटारा जी नहीं रहे। हिंदुस्तान में जब मैं था वह स्पोर्ट्स एडिटर थे। मैंने जब 2008 में हिंदुस्तान छोड़ा और उनसे मिलने गया तो खुद सीट से उठकर उन्होंने मुझे गले लगा लिया। कुछ बातें हुईं और मुस्कुराते हुए वह मेरे साथ लोकल रिपोर्टिंग केबिन तक आये। उसके दो साल बाद उनसे फिर मिलने गया तो उन्होंने गर्मजोशीर से गले लगाया और मेरे साथ चलकर कई नये लोगों से मुलाकात कराई। उसके बाद उनसे फेसबुक पर ही बात होती। कभी-कबार व्हाट्सएप पर वह कुछ भेजते। 


उनके लेखन का कायल रहा हूं। फेसबुक पर वह त्योहारों पर छोटे-छोटे पीस लिखते जो कम शब्दों में बहुत कुछ सिखा जाते। कादंबिनी सरीखी पत्रिका के संपादक रहे कटारा जी से पिछले कुछ समय से बात करने का मन कर रहा था। खासतौर पर तब कादंबिनी के बंद होने की खबर आयी, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया। फिर सोचा कुछ दिन बाद बाद करूंगा। अभी पिछले दिनों अपने संपादक जी से उनके बारे में चर्चा हुई। तय हुआ कि कटारा जी से कुछ लिखवाया जाये। नये साल पर उनसे कुछ लिखने का आग्रह करेंगे। लेकिन वह मौका ही नहीं आया। कटारा जी चले गये। उनका वह मुस्कुराता चेहरा हमेशा याद रहेगा। हमेशा कुर्ते में ही रहने का उनका अंदाज भी निराला था। कटारा जी अभी समय तो नहीं हुआ था, लेकिन आप आखिर चले ही गये। हमेशा याद आएंगे। 

Sunday, November 15, 2020

अब क्या गायें और क्या सुनायें... चले गये दिनेश तिवारी जी

केवल तिवारी 

एक आसूं भी न निकल पाया जो उनके चले जाने की खबर सुनी। 
न खबर पे यकीन हुआ न बातों पर जाने कितनी कहानियां थी बुनीं 
वो बातें, वो मुलाकातें और लिखने-पढ़ने की वो योजनाएं। 
कुछ दिनों से वे मौन थे, अब क्या गायें और क्या सुनाएं।

हम एक-दूसरे को करीब 20 सालों से जानते थे। अनौपचारिक बातचीत शुरू हुई साल 2013 से। मेरे चंडीगढ़ आने के बाद। वो भी चंडीगढ़ दो-तीन बार आये। हम लोग घंटों साथ रहे। कभी मित्र मंडली की बात करते तो कभी कुछ लेखन की। इस लॉकडाउन से पहले हमारी योजना थी हिमाचल प्रदेश के पालमपुर जाने की। चंडीगढ़ प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष जसवंत सिंह राणा जी के सान्निध्य में बनी थी योजना। उनकी और राणा जी की भी अच्छी मित्रता हो गयी थी। मैं कभी दिल्ली जाता तो उनसे रीगल सिनेमा के पास कॉफी हाउस में या फिर प्रेस क्लब में मुलाकात होती। कुछ समय से वह योग, ध्यान पर काफी जोर देने लगे थे। लेकिन अचानक यह चैप्टर खत्म हो गया। बात कर रहा हूं वरिष्ठ पत्रकार और मुझे छोटा भाई जैसा मानने वाले दिनेश तिवारी जी की। इंडियन प्रेस क्लब के पूर्व उपाध्यक्ष एवं दैनिक हिंदुस्तान में एसोसिएट एडिटर रहे दिनेश तिवारी। दिवाली के दिन मनहूस खबर आई उनके चले जाने की। पिछली दिवाली और यह दिवाली बहुत अजीब सी रही। पिछली दिवाली मेरी बड़ी दीदी चल बसी थीं। इस बार भी दिवाली की पहली रात से मेरी पत्नी की तबीयत बहुत खराब हो गयी। तेज बुखार और बदन दर्द। कोरोना के इस खौफनाक माहौल में अजीब-अजीब लग रहा था। सुबह उठा बच्चों को उठाया। छोटा बेटा रोना लगा, बोला त्योहार पर मम्मा बीमार हो गयीं, अजीब लग रहा है। बड़े बेटे ने नाश्ता बनाया, मैंने घर की साफ-सफाई की। किसी को दिवाली विश करने का भी मन नहीं हो रहा था। 10 बजे तक पत्नी की तबीयत थोड़ी ठीक हुई, तब तक मैं डॉक्टर से भी बात कर चुका था और अस्पताल जाने की तैयारी कर रहा था। इसी बीच मैंने दो-चार व्हाट्सएप ग्रूप पर बधाई के संदेश भेज दिये। डॉक्टर के यहां से लौटकर पत्नी को एक डोज दवा देकर चाय बनाई और बच्चों से कहा कि चलो त्योहार की तैयारी करो। मम्मा अब ठीक हो जाएंगी।
दो साल पहले चंडीगढ़ लेक क्लब में दिनेश तिवारी जी के साथ की एक तस्वीर।
करीब साढ़े ग्यारह बजे मित्र फजले गुफरान का फोन आया। बड़े बेमन से उन्होंने दिवाली की बधाई दी। मैंने पूछा सब खैरियत तो है, बोले-क्या खैरियत है, कोई अच्छी खबर नहीं आ रही है। हर जगह से बुरी खबर ही आ रही है। मैंने कहा, ‘क्या हुआ?’ बोले-क्या बताऊं, दिनेश तिवारी जी नहीं रहे। मैं सन्न रह गया। कैसे, कहां जैसे तमाम सवाल हुए। उनसे बात करने के बाद मैंने व्हाट्सएप ग्रूप चेक किए। एक ग्रूप में दिवाकर जी का मैसेज था। फिर उसमें प्रमोद जोशी जी और प्रदीप सौरभ जी का भी मैसेज आ गया। दुर्भाग्य से यह खबर सच थी। लोग कह रहे थे फेसबुक पर कई लोगों ने टिप्पणियां की हैं। चूंकि मैंने लंबे समय से फेसबुक बंद कर रखा है, इसलिए कुछ जानकारों से बातचीत हुई। इस बीच तमाम लोगों के दिवाली बधाई के संदेश भी आये, कुछ के फोन भी आये, लेकिन मन उचाट सा रहा। पिछले साल तिवारी जी चंडीगढ़ आये थे। प्लान बना कि मार्च या अप्रैल में पालमपुर चलेंगे। जसवंत राणा जी ने कहा कि वहां एक-दो खूबसूरत लोकेशन हैं, वहां चलेंगे। कुछ लिखने-पढ़ने का भी मैटर मिलेगा। इस बीच, लॉकडाउन हो गया। कोरोना का खौफ पसर गया। बस फोन पर ही बात होती। मैं कई बार फोन नहीं भी कर पाता था, दिनेश जी का 20 या 25 दिनों के अंतराल में कोई व्हाट्सएप मैसेज या फोन आ जाता था। लेकिन इस बार 25 अक्तूबर से उनसे कोई बात नहीं हुई थी। मुझे लगा शायद कानपुर गये होंगे। या फिर अपनी पत्रिका में व्यस्त होंगे। वो इन दिनों उन लोगों को कोसते थे जो बेवजह लड़ते-झगड़ते या बैर पालते हैं। उनका कहना था कि आदमी कुछ बुरा-भला कहने या करने या लालच करने से पहले अपनी उम्र के बारे में सोच ले। कितना और जीयेगा। क्यों न सबको साथ लेकर चला जाये। उनको कई कविताएं कंठस्थ थीं। पुराने गीतों के बड़े शौकीन थे। कई बार मुझे भी लिंक भेजते थे। जब हिन्दुस्तान में वह नयी दिशाएं सप्लीमेंट निकालते थे तो कभी-कबार लिखने के लिए कहते थे, बस इतनी ही बात होती थी। इधर अब उनसे अक्सर ही बात होने लगती थी। इस बीच, बस यही कहते, दिल्ली आने का प्लान बने तो बताना। न वो चंडीगढ़ आये, न मैं दिल्ली जा पाया। और न ही करीब एक महीने से बात हुई। कुछ भी नहीं हुआ, वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था, पर उस सफर पर किसी को जाने से कौन रोक सकता है। भगवान दिनेश जी की आत्मा को शांति दे। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

Thursday, November 12, 2020

भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आर्य... मैं आर्यपुत्र हूं

केवल तिवारी
पिछले दिनों एक किताब ‘मैं आर्यपुत्र हूं’ पढ़ डाली। लेखक हैं मनोज सिंह। आर्यों को लेकर जो तरह-तरह की शंकाएं-आशंकाएं पैदा होती हैं या की जाती हैं, उसके संबंध में प्रामाणिक तौर पर किताब में विस्तार से बताया गया है। इस किताब में सबसे जुदा बात यह है कि सूत्रधार शैली में आर्य एवं आर्या के के संवादों के जरिये पूरी बात कही गयी है। किताब को लेकर अपनी पूरी टिप्पणी करूं, इससे पहले इसके कुछ संवाद पर गौर फरमाइये- ‘आर्यपुत्र, धर्म व आस्था एक ऐसा विषया है, जिस पर आधुनिक युग में वार्तालाप की सर्वाधिक आवश्यकता है। धर्म और आस्था के नाम पर आधुनिक युग ने जितना अधर्म व अमानवीयता की है, वह चिंतनीय है।’ ..... वर्ण व्यवस्था तो ठीक समझ आ रही है, लेकिन यह जाति बीच में कहां से, कैसे आ गई? यह बताइये आर्यपुत्र!’
मैं यह कभी नहीं कहूंगा कि सिर्फ भारत में ही कृषि का विकास हुआ। मेरा उद्देश्य तो सिर्फ कुछ विद्वानों के मत को खंडित करना है, जो यह कहते हैं कि कृषि की दिशा में पहल पश्चिमी एशिया में हुई थी और वहां से भारत के भूखंड में आई। असल में किसी भी विकास को अपने क्षेत्र या अपने मानव समुदाय से जोड़कर देखना एक मानवीय कमजोरी के रूप में देखा जाना चाहिए। मगर इस चक्कर में हम बहुत सारे तकनीकी और सांस्कृतिक विकासक्रम समझ नहीं पाते। जैसा कि अब 10-15 हजार साल पुराने ऐसे पुरातात्विक प्रमाण मिल रहे हैं, जिनका संबंध भारत में कृषि से है। मैं तो पहले से ही कह रहा हूं कि पश्चिम के विद्वान, जो मेरे कालखंड को सीमित करके देखना चाहते हैं, वह असल में ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनका स्वयं का इतिहास मात्र दो-चार हजार साल पुराना है। मेरे अति प्राचीन होने के जैसे-जैसे प्रमाण मिलेंगे वामपंथी इतिहासकार चौंकेंगे। हम आर्यों का प्रतीक चिन्ह स्वास्तिक सौभाग्य और समृद्धि के लिए माना जाता रहा है। वह चारों दिशाओं का प्रतीक भी है। यह विश्व ब्रह्मांड में शुभ व मंगल का प्रतिरूप बन गया। किसी भी मांगलिक कार्य को प्रारंभ करने से पहले हम स्वस्तिवाचन करते हैं (यजुर्वेद 25/19)। यह मोहनजोदड़ो में भी मिला है। इसका आज भी हिंदुस्तान के हर कर्मकांड में प्रयोग किया जाता है। ... मोहनजोदड़ो में कमंडल भी मिला है, जो हम आर्यों से ही संबंधित है।... आर्यपुत्र, पूरे विवरण को समग्रता से देखकर कुछ बातें स्पष्ट रूप से कही जा सकती हैं। हम आर्य अपने कालखंड में असाधारण रूप से संपन्न थे। तकनीकी रूप से विकसित थे। सामाजिक रूप से सभ्य थे। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध थे। ज्ञान की तो कोई सीमी ही नहीं थी, वेद इसका प्रमाण हैं।‘ जी आर्या, जहां तक रही बात हम वैदिक आर्यों की कर्मभूमि की, तो इसका विस्तार ऋग्वेद 10.75 सूक्त के ‘ऋषि सिंधुक्षित प्रैमयेध’ की ऋचाओं से स्पष्ट होता है। इसके देवता नदी समूह हैं। इसे नदी सूक्त भी कहा जाता है। इसमें 9 ऋचाएं, जिसमें 9 ऋचाएं, जिसमें सप्तसिंधु की पूरबी और पश्चिमी सीमा का उल्लेख है।... संवाद समाप्त अब आता हूं अपनी टिप्पणी में। सबसे पहले धन्यवाद ऑफिस के मेरे साथी ब्रजमोहन तिवारी जी का जिन्होंने यह रोचक, अनमोल किताब मुझे उपलब्ध कराई। पहले उन्होंने जब चर्चा की तो मैंने पूछा क्या ऑफिस में समीक्षा के लिए किताब आई है, उन्होंने कहा कि समीक्षा के लिए भी जमा कराई गयी है। मैंने उनसे कहा कि आप रहने दीजिए हो सकता है मुझे समीक्षा के लिए ही मिल जाये तो इससे दोनों काम हो जाएंगे। लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि आप पढ़ना शुरू करो। समीक्षा के लिए मिल गयी तो लेखक की प्रति आप मुझे दे देना। खैर समीक्षा के लिए संभवत: किसी और को दी गयी और मैं किताब पढ़ने लगा। इतिहास का विद्यार्थी रहा हूं तो रोचक लगता है ऐसी किताबों को पढ़ना। इस किताब में सबसे पहले तो अच्छा लगा कि एक आर्य हैं और एक आर्या और दोनों संवादों के जरिये यह साबित करते हैं कि ‘भारतीय ही तो आर्य थे।’ आर्यों के आने के बारे में इतिहासकारों में मतभेद हैं। इस किताब में आर्य परंपरा और प्राचीन भारतीय परंपरा को तर्कों, साक्ष्यों के आधार पर जिस तरह जोड़ा गया है वह निश्चित रूप से रोचक है, पठनीय भी। लेखक मनोज सिंह ने मैं और मेरे आर्यपुत्र से लेकर मैं कलियुग में तक कुल 17 शीर्षकों के अलग-अलग पाठों के जरिये विस्तार से इसमें आर्य परंपरा का जिक्र किया है। शैली और भाषा सहज एवं सरल होने से आसानी से सबकुछ समझ आ सकने वाला है। तर्क-वितर्क और कुतर्क की हमेशा गुंजाइश बनी रहती है और तार्किक बात ही हमेशा अच्छी लगती है। मानव जीवन के हर अहम पड़ावों से लेकर विविध आयामों तक लेखक ने बहुत बेबाकी से चीजों को सामने रखा है। उन्होंने आश्रमों के बारे में भी बहुत रोचक वर्णन किया है, यथा कण्व आश्रम... शकुंतला यहीं रही थीं। भारद्वाज आश्रम। अगस्त्य आश्रम... आदि। कृषि, अर्थव्यवस्था, धर्म पद्धति जैसी बातों और आर्य परंपरा के साथ हमारे प्रागैतिहासिक काल खंड से मिलती-जुलती जीवनशैली का चित्रण किताब में है। किताब में मनोज सिंह ने लिखा है कि कैसे वह अगली किताब ‘मैं रामवंशी हूं’ में श्रीराम के जीवनचरित पर प्रकाश डालेंगे। जिस तरह यह किताब रोचक बन पड़ी है, उम्मीद है आने वाली किताब भी रोचक होगी। मनोज जी को साधुवाद। किताब उपलब्ध कराने के लिए बृृृजमोहनज जी का भी धन्यवाद।

Tuesday, November 10, 2020

आधार (Aadhar) के प्रयोग की कुछ जरूरी बातें जान लीजिए

अगर आप अपने आधार Aadhar कार्ड का कहीं प्रयोग करने जा रहे हों तो अपने अनुभव के आधार पर आपको कुछ बातें बता दूं। पहले तो अगर आप आधार का कलर प्रिंट कहीं से निकलवा रहे हैं तो पूरा प्रिंट निकालें। यानी wallet में रखने वाले आधार कार्ड को reject किया जा सकता है। चंडीगढ़ में कुछ कामों के लिए जगह-जगह ई संपर्क E Sampark केंद्र हैं। Industrial area स्थित E Sampark केंद्र पर मैं अपने छोटे बेटे के लिए निवास प्रमाणपत्र यानी Domicile Certificate बनवाने गया। पहले तो दो घंटे करीब इंतजार के बाद नंबर आया। इस बीच मैंने पांच रुपये का कोर्ट स्टैंप ले लिया। मेरे पास आधार कार्ड Wallet आकार का था। हालांकि फोटो कॉपी मैंने दोनों तरफ का एक ही पन्ने पर करवा रखी थी, लेकिन काउंटर पर मौजूद शख्स ने मना कर दिया। मैंने उनको पासपोर्ट की कॉपी और ऑरिजनल दिखाया तो उन्होंने इसे address proof मानने से ही इनकार कर दिया। यही नहीं मैंने उनसे कहा कि मैं E-Aadhar का print दे देता हूं, उन्होंने उसे भी मानने से इनकार करते हुए कहा कि पूरा आधार कार्ड रंगीन चाहिए। दो घंटे से मैं चुपचाप खड़ा था, इस वक्त मुझे गुस्सा आ गया। उनसे पूछा कि आप पासपोर्ट को भी प्रूफ नहीं मान रहे। खैर इस बीच, बगल के काउंटर पर बैठीं एक महिला ने कहा कि मैंने आपसे पूछा था कि फॉर्म कंप्लीट है। मैंने कहा, आपके सवाल पर मैं कह चुका था कि हां। असल में फॉर्म तो मेरा कंप्लीट ही था। खैर कुछ देर की बातचीत के बाद मैंने निवास प्रमाणपत्र नहीं बनाने का ही फैसला ले लिया क्योंकि उनका कहना था कि आज apply करने के 10 से 15 दिन के बाद प्रमाणपत्र बनकर आयेगा। चूंकि Sainik School में form भरने की अंतिम तिथि 20 नवंबर है, इसलिए कोई फायदा भी नहीं था, लेकिन इससे एक सबक मिला कि आधार कार्ड का original पूरा ही प्रिंट निकलवाना चाहिए यानी रंगीन एक पूरा पेज। फिर अगर कोई wallet size आधार प्रिंट लेना चाहिए तो एक प्रिंट तो पूरा निकलवा ही लेना चाहिए। खैर इसके बाद मैंने अपने गांव के प्रधान से बात की है। आश्वासन तो मिला है, देखते हैं क्या हो पाता है। इन तमाम कवायदों के बाद कुछ बातें समझ आती हैं, मसलन- कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें की जायें, धक्के तो आपको खाने ही पड़ेंगे। online का जमाना हो या फिर पुराना ही। लाख कोई सरकार बड़े-बड़े दावे करे, सरकारी काम अपने ही ढर्रे से होता है। फर्जीवाड़ा में समय कम लगता है। कई लोगों ने मुझे वैसे रास्ते भी बताये, लेकिन मुझे सही documents के साथ originally बनवाना था। सही रास्ते पर ही चलना चाहिए, सबकुछ सही होने पर थोड़ी दिक्कत आती है, लेकिन अंतत: आपका काम होगा ही।  

Thursday, November 5, 2020

इस खुशी को क्या नाम दूं...

केवल तिवारी 1. उदास चेहरा लिये पार्क में अक्सर बैठा रहने वाला शोभित आज खुश था। पार्क का चक्कर तो वह आज भी लगा के आ गया, लेकिन आज उसने उदासी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। ऐसा उसे कई मौकों पर होता था। एक तब, जब बेंगलुरू रह रहे अपने भाई से बात कर लेता या फिर वह घर आता था। इसके अलावा जब उसकी दीदी मायके आती तब भी वह बहुत खुश होता था। आज दीदी आने वाली थी। रांची शताब्दी से। दिल्ली में पली-बढ़ी उसकी बहन स्नेहा शादी के बाद रांची चली गयी थी। कोरोना महामारी के दौरान रांची से वह दिल्ली आये कि नहीं, इस पर असमंजस बना हुआ था। पहले स्नेहा ने ही फोन पर कहा कि आ रही हूं, फिर पता नहीं क्या बात हुई, खुद ही कहने लगी रहने देते हैं माहौल खराब है। जब मम्मी-पापा, भाई ने कहा कि आ जाओ कोई बात नहीं तो फिर आने का कार्यक्रम बना लिया। हालांकि शायद यह पहली बार था जब वह पति और बच्चों के बगैर आ रही थी। स्नेहा की बिटिया 10वीं में पढ़ती है, बेटा आठवीं में। पति ने ही समझाया कि बच्चों को दादा-दादी के पास ही रहने दो, बाद में हो आएंगे। मौका रक्षा बंधन का था और स्नेहा पिछले तीन सालों से मायके नहीं आ पायी थी। इस बार मार्च में बच्चों की छुट्टियों के बाद कार्यक्रम बना तो लॉकडाउन हो गया। अब अनलॉक की प्रक्रिया के दौरान कुछ ट्रेनें चलीं तो स्नेहा का मन बहुत व्याकुल हो गया। असल में स्नेहा के पिता मधुरेंद्र सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके हैं। मां थोड़ा अस्वस्थ रहती हैं। छोटे भाई शोभित की कहीं नौकरी नहीं लग पाई। बस कभी कहीं छोटी-मोटी नौकरी मिलती भी है तो शोभित वहां टिक नहीं पाता। बड़ा भाई राकेश पढ़ने में ठीक था। बीटेक करते ही बेंगलुरू में नौकरी लग गयी। वह सपाट सा है। स्नेहा से फोन कर उसने कह दिया अभी जाने की क्या जरूरत है। वह बात खरी करता है, लेकिन उसकी बात का कुछ लोग बुरा मान जाते हैं। हालांकि उसे इस बात की परवाह नहीं कि उसकी बात का बुरा माना जा रहा है या भला। शोभित उसे फोन पर खूब चाटता है। राकेश कभी-कभी शोभित के लिए पैसे भी भेज देता है। वह डांटता भी है तो शोभित बुरा नहीं मानता। लो जी स्नेहा आ गयी। शोभित चला गया लेने। स्टेशन से जैसे ही स्नेहा बाहर को आती दिखी, शोभित भागकर गया और अपनी दीदी का बैग ले लिया। स्नेहा ने उसे बैग थमाया और जोर से उसकी नाक खींच दी। ‘नाक को इतनी जोर से खींच दिया दीदी... आह’ शोभित चिल्लाया। ‘पहले मेरे पैर क्यों नहीं छुए,’ ‘स्नेहा ने सवाल किया।’ ‘सोशल डिस्टेंसिंग दीदी,’ शोभित बोला और दोनों पहले से बुक करके लायी गयी कैब की ओर चल दिये। आज शोभित के घर में अजब उत्साह था। मां भी जैसे भली-चंगी हो गयी। मधुरेंद्र भी बेहद खुश थे और सबसे ज्यादा चहक रहा था शोभित। हर कोई इस खुशी को समझ रहा था। लेकिन शोभित के समझ में नहीं आ रहा था कि इस खुशी को वह क्या नाम दे। 2. ‘भाई तूने अच्छा किया जो अलग रहने लग गया,’ मनीष ने यह बात अपने भाई मनन से कही। मनीष और मनन अभी नये-नये जवान हुए हैं। दोनों जुड़वां हैं। मनन को एक छोटी-मोटी जॉब क्या मिली वह आफिस और घर की दूरी का बहाना बनाकर मां-बाप से अलग रहने लगा। पता नहीं परवरिश में रह गयी कोई कमी है या फिर संगत का असर दोनों भाइयों की अपने माता-पिता से नहीं बनती। मां के प्रति तो प्रेम कभी उमड़ भी जाता है, लेकिन पिता के प्रति नहीं। उन्हें लगता है कि पिता हमेशा टोकाटाकी करते रहते हैं। वैसे उनके पिता इंद्रमोहन भी टोकाटाकी कुछ ज्यादा ही करते हैं। ‘निकल जाओ मेरे घर से’ जैसा डॉयलॉग तो वह एक दिन में एक-दो बार दोहरा ही देते हैं। असल में उन्हें लगता है कि बच्चे उनके हिसाब से पढ़-लिख नहीं पाये, जबकि बच्चे कहते हैं कि उनका जहां अलग है। मनीष एक्टिंग में हाथ आजमाना चाहता है और मनन संगीत में। हालांकि अपनी पसंद की फील्ड में भी दोनों कुछ खास कर नहीं पाये। उनकी मां ममता बिल्कुल आदर्श गृहिणी हैं। कभी पति की सुनती है और कभी बेटों की। अब मनन अलग रहने लगा तो मां को लगा कि ऑफिस से दूरी होगी ही इसीलिए अलग रहने लगा है। घर में भले ही खटपट हो लेकिन अजीब बात है कि मनीष और मनन कभी लड़ते नहीं, उल्टे एक दूसरे के पक्के दोस्त बनकर रहते हैं। मनन ने मनीष के लिए एक एक्टिंग स्कूल में बात की है। अगले हफ्ते से वह जाएगा। फीस मनन चुकाएगा। मनीष आज बहुत खुश है। अपने स्वभाव के अनुकूल वह फिलहाल आगे की नहीं सोच रहा है, बस एक्टिंग स्कूल में जाने को बेताब है। वह घर में इधर-उधर घूम रहा है, प्रसन्न है। उसके पिता भी यह सोचकर खुश हैं कि दूसरे बेटे ने अपने लिए नौकरी और ठीया ढूंढ़ लिया है, मां तो बेचारी सबके खुश रहने पर ही खुश है। सब खुश हैं, लेकिन किसी के समझ नहीं आ रहा है कि इस खुशी को क्या नाम दें। 3. मिसेज रजनी कृष्ण को तो बस अब कुछ दिन तक अलग तरह का भोजन बनाने, अचार बनाने और पाचक नमक तैयार करने में ही मजा आएगा। बेटा राजीव जो आया है। वैसे बेटे की कोई फरमाइशें नहीं रहतीं। वह तो बस मम्मी के हाथ का बना साधारण खाना ही पसंद करता है। बचपन से ही ऐसा है। उसे मम्मी के हाथ का बना अचार, खासतौर से तैयार किया पाचक नमक जिसमें उसकी मां जीरा, हींग, आजवाइन, सरसों के दाने, लौंग, काली मिर्च और काला नमक बनाकर तैयार करती है, जैसी चीजें पसंद हैं। हां बचपन से उसे आलू के पराठे दही के साथ बहुत अच्छे लगते हैं। एक हफ्ते के लिए आया है राजीव। अनेक मित्रों से मिलने भी जाना है। कुछ खाने की भी जिद करेंगे, लेकिन रजनी कृष्ण जी हैं कि मन कर रहा है कि सातों दिन बेटा उसी के हाथ से खाना खाये। बचपन से धीर-गंभीर राजीव ने पढ़ाई की और पढ़ाई पूरी होते ही हैदराबाद की एक कंपनी में लग गया। पूरे डेढ़ साल बाद आया है मेरठ स्थित अपने घर। मेरठ उनका मूल निवास नहीं है, लेकिन राजीव के पापा की जॉब के चलते यहीं घर बना लिया और यहीं के होकर रह गये। पापा भी रिटायर हो गये हैं। राजीव के आने पर बेहद खुश हैं। उनका मन तो बस राजीव से बातें ही करते रहने का होता है। रजनी जी तो इन दिनों सब भूलकर बस बेटे के लिए व्यंजन बनाने की विधि सीखने में ही मशगूल है। उनका मन कर रहा है कि कई चीजें बनाकर राजीव के लिए तैयार कर दें। कुछ रोज खाने को और कुछ ले जाने को। वह बहुत खुश हैं। खुश उनके पति भी हैं। हालांकि इस खुशी को कोई कुछ नाम नहीं दे पा रहा है। 4. आज तुम्हारा ऑफ है इसलिए मूड को ऑन रखो। खाने में क्या-क्या बनाऊं बताओ। गणेश कुमार की पत्नी रेखा ने सुबह की चाय के वक्त सवाल किया। अरे जो बच्चों को पसंद आये बना दो, मैं क्या खास बताऊं, गणेश ने अखबार पर नजर डालते हुए कहा। रेखा बोली, कभी तो अपनी पसंद बता दिया करो। गणेश कुमार ने अखबार किनारे रखा और मोबाइल में कुछ देखने लगे। रेखा ने पूछ लिया क्या ऑनलाइन सर्च कर रहे हो। गणेश मुस्कुराया नहीं पति-पत्नी पर खाने के संबंध में बने एक जोक किसी ने भेजा था, वही देख रहा था फिर खुद ही हंसने लग गया। रेखा उठकर चली गयी। असल में गणेश कुमार बेहद सरल व्यक्ति हैं। खाने-पीने की कोई खास फरमाइश नहीं। बच्चों की पसंद में ही उनकी पसंद है। हालांकि रेखा ने उनकी कुछ-कुछ पसंद पर गौर किया है और गाहे ब गाहे वह ऐसी चीजें बना दिया करती है, लेकिन उसकी इच्छा होती है कि पति कभी-कभी फरमाइश किया करे। हां, बच्चों की पसंद पर बेशक वह अक्सर बनाती रहती हैं, लेकिन सख्ती के साथ। जैसे हर समय तला-भुना नहीं, कई बार बिना पसंद के भी खाना पड़ेगा, वगैरह-वगैरह। आज गणेश कुमार के मन में आया कुछ बता ही दिया जाये। वह भी उठकर रेखा के पीछे किचन में चले गये और नाश्ते से लेकर डिनर तक के तीन-चार चीजें बना दीं। उसमें लंच बच्चों की पसंद का था। फिर क्या था रेखा आज बहुत खुश है। बाहर बूंदाबांदी हो रही है। इससे उमस बढ़ गयी है। बच्चे उठकर अपने-अपने काम में लग गये हैं, गणेश कुमार भी कुछ किताबों में सिर खपाये बैठे हैं, कभी टीवी भी देखने को उठ जाते हैं। रेखा है कि बहुत खुश है, पति ने फरमाइश तो की। हालांकि रेखा के समझ नहीं आ रहा है कि इस खुशी को वह क्या नाम दे। गणेश कुमार भी तो नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर रेखा आज इतनी क्यों खुश नजर आ रही है, जबकि काम का प्रेशर ज्यादा है। उक्त सभी किरदारों पर गौर करते हुए सवाल उठना लाजिमी है कि इस खुशी को क्या नाम दूं। शोभित का बहन के आने का इंतजार करना, मनन का अपने भाई मनीष को एक्टिंग स्कूल में भेजना, रजनी कृष्ण का बेटे राजीव के लिए खाना बनाना, रेखा का गणेश की फरमाइश पर इतराना। आखिर ये कौन सी खुशी है। इसका कोई तो नाम हो। शायद यह अनाम खुशी ही सबसे अनमोल है। क्या आपको भी होती है ऐसी अनाम खुशी...।

Sunday, October 25, 2020

इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं... शुभम ने कर दिखाया

इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं, अगर सच्ची लगन हो तो रास्ते आसां होते हैं।

शुभम

यह बात सच कर दिखाई है चंडीगढ़ के रायपुर खुर्द निवासी शुभम घणघस ने। शुभम का चयन राष्ट्रीय मिलिट्री कॉलेज, देहरादून में हो गया है। यूं तो दाखिले की प्रक्रिया इसी साल मार्च में पूरी हो जानी थी, लेकिन कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन के चलते इसमें कुछ विलंब हुआ। अंतत: शुभम के लिए मिलिट्री कॉलेज से बुलावा आ ही गया।

शुभम के पिता रणबीर सिंह ने बताया कि बच्चे को लेकर देहरादून जाना है, जहां कुछ औपचारिकताओं के बाद पढ़ाई का सिलसिला चल निकलेगा।

अब बात कुछ शुभम की तैयारी के बारे में। मैं शुभम के पिता रणबीर सिंह को तभी से जानता हूं जब से मैं चंडीगढ़ आया हूं। इनकी किराना की दुकान है। रणबीर किरयाणा स्टोर। शुरू-शुरू में एक-दो बार गया, इनका व्यवहार बहुत अच्छा लगा। धीरे-धीरे उनके पास जाना ‘अपनी दुकान में जाना’ जैसा लगने लगा। मेरा भले ही आना-जाना कम रहता हो, लेकिन मेरे परिवार का इसी दुकान से हर सामान लेने का सिलसिला चलता है। पैसे कम हो जायें तो कोई लिखिल हिसाब-किताब नहीं। बाद में दे दिया जाता है। और तो और कभी एमरजेंसी पड़ने पर पैसे भी मांग लेते हैं। चलता रहता है विश्वास का यह रिश्ता।

अपने माता-पिता के साथ शुभम।


खैर... कोई तीन साल पहले शुभम के पिता से एक स्कूल में मुलाकात हुई जहां वह और मैं अपने-अपने बेटे को आरआईएमसी में दाखले के लिए किसी प्रशिक्षण स्कूल की परीक्षा कराने ले गये थे। मैंने बताया मेरे बेटे का बहुत मन नहीं है, बस परीक्षा दिलाने ले आया हूं। रणबीर सिंह ने बताया कि उनके बेटे की पूरी इच्छा है। मैं समझ गया जब बेटे की इच्छा है तो निश्चित तौर पर उसका प्रवेश होगा। यह बात मैंने तब भी कही थी। क्योंकि मैं जानता था-

कौन कहता है कि ख्वाब सच्चे नहीं होते, मंजिलें उन्हें नहीं मिलती जिनके इरादे पक्के नहीं होते।

इस मुलाकात के बाद शुभम को अक्सर देखता कि वह दुकान पर मां-बाप का पूरा हाथ बंटाता है। शुभम की मम्मी से भी अक्सर उसकी तैयारी को लेकर बात होती रहती। कभी-कभी मेरे मन में आता कि दुकान में बैठकर पढ़ाई करने से कहीं इस बच्चे की राह में कुछ अड़चन न आ जाये। हालांकि वह तल्लीनता से पढ़ता। सबसे अच्छी बात मैंने उसमें देखी कि वह मां-बाप की डांट सुनता, लेकिन कभी पलटकर जवाब नहीं देता था। रायपुर खुर्द में पिछले सात सालों से बच्चों को ऑब्जर्व कर रहा हूं। एक से एक बिगड़ैल बच्चे भी देखे हैं, लेकिन ‘होनहार वीरवान के होत चिकने पात’ जैसी कहावत पर शुभम को हमेशा लक्ष्य की ओर बढ़ते देखा। आज उसने कामयाबी की सीढ़ी पर पहला कदम रखा है। हमारी दुआ है कि यह बच्चा खूब तरक्की करे। अपने माता-पिता का नाम रोशन करे। शुभम की इस कामयाबी पर उसकी दीदी, उसके माता-पिता, ताऊजी, ताईजी, चाचा-चाची समेत पूरे परिवार को बधाई। इस मौके पर यही कहूंगा-

चलते रहना तुम हर बारगी, मत घबराना जिंदगी में परेशानी से, मेहनत से सींचना कोशिशों को, कामयाबी तुम्हारे पास आएगी।

Tuesday, September 29, 2020

वैज्ञानिक सोच, मानवीय संवेदनाओं का व्यक्तित्व : ये हैं तरुण जैन

ये तरुण जैन हैं जिनकी सोच वैज्ञानिक है और व्यक्तित्व मानवीय संवेदनाओं से युक्त। ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ नामक अखबार के संपादक हैं। वैज्ञानिक शोध, नयी जानकारी आदि के संबंध में यह अखबार हिंदी भाषा का पहला ऐसा अखबार है जो पूरी तरह विज्ञान को समर्पित है। तरुण जी के नाम से परिचित था। नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट के जरिये और कुछ मित्रों के जरिये। पहली मुलाकात हुई वर्ष 2016 में जब गोवा में ‘ओस्नोग्राफी’ यानी समुद्री विज्ञान के एक कार्यक्रम में देशभर के अनेक पत्रकार आये थे। बेहद सरल व्यक्तित्व। एक-दो मुलाकातों के बाद पता नहीं क्यों मुझे लगा कि इनसे मेरी पटरी मेल खाएगी। मैं एक तो संकोची स्वभाव का हूं, दूसरा मैं विज्ञान का छात्र नहीं रहा हूं। साहित्य के प्रति मेरा रुझान रहा। यह अलग बात है कि पिछले 20 वर्षों से विज्ञान एवं शोध को लेकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजार से अधिक लेख लिखे। विज्ञान का छात्र न होने के कारण किसी चीज की पूरी ताकीद करने के बाद ही उस पर लिखता हूं। खैर गोवा का वह कार्यक्रम समुद्री विज्ञान पर आधारित था। पूरे दिन वैज्ञानिकों को अलग-अलग विषयों पर सुना। जहां कभी कोई दिक्कत होती, तरुण जी से ही पूछ लेता। कभी लगता कि ये झल्ला न जायें। अभी दो दिन तो हुए मिले हुए, लेकिन ये तो चाटू निकले। मैं खुद पर ये चाटू का लेबल कभी भी चस्पां नहीं होने देता। ऐसा कुछ नहीं हुआ, जैसा मैंने सोचा। एक बात बहुत अच्छी लगी तरुण जी की जब मैंने उनसे कुछ जानना चाहा तो सबसे पहले उन्होंने मुझसे पूछा, आप विज्ञान बैकग्राउंड से हैं या आर्ट्स। उसके बाद उन्होंने शुरू से बताना शुरू किया। कोटा में प्लाज्मा तकनीक के बारे में हो या फिर विज्ञान के अन्य पहलुओं की बात, उनसे काफी चर्चा हुई।
चूंकि उस कार्यक्रम में देशभर से अनेक पत्रकार आये थे। पत्रकार बिरादरी को अच्छी तरह जानता हूं। कहीं स्वाभिमान, कहीं घमंड और कहीं संस्थान का पैमाना। तरुण जी कई बातों के गवाह हैं। वैज्ञानिक बातों के बीच उनका लब्बोलुआब को एक पंक्ति में कहूंगा-
चांद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख, देखना ये है कि इन्सान कहां तक पहुंचे।

 

संक्षिप्त परिचय
ऊपर तो एक संक्षिप्त विवरण था तरुण कुमार जैन से मेरी मुलाकात का। आइये उनके बारे में थोड़ा सा आपको बता दूं। पिंकसिटी जयपुर निवासी तरुण कुमार जैन अपने पाक्षिक अखबार ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ में नित नये मुद्दों को उठाते हैं। वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सार्वजनिक संचार पर 11 वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के पोस्ट कॉन्फ्रेंस सत्र के संयोजक रहे, जिसमें 60 से अधिक देशों के विशेषज्ञों ने भाग लिया था। उन्होंने कई मेगा वैज्ञानिक कार्यक्रमों के दौरान दैनिक विज्ञान समाचार पत्र प्रकाशित किए हैं। तरुण कुमार जैन विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2018 पर प्रिंट मीडिया के माध्यम से विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हैं। उन्हें चौधरी चरणसिंह कृषि अनुसंधान पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए कृषि मंत्रालय भारत सरकार से राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और हिंदी विज्ञान पत्रकारिता के लिए 70 वें स्वतंत्रता दिवस समारोह पर राज्य पुरस्कार, राजस्थान के मुख्यमंत्री द्वारा। डॉ बीसी देब मेमोरियल पुरस्कार मैसूर विश्वविद्यालय में 103 वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान प्रदान किया जा चुका है। इनके अलावा भारतीय विज्ञान लेखक संघ द्वारा दिलीप एम सलवी इस्वा राष्ट्रीय विज्ञान संचार पुरस्कार, तथा विज्ञान संचार और विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में सराहनीय कार्य के लिए दीपक राठौर मेमोरियल अवार्ड से भी पुरस्कृत किया जा चुका है। वह भारत के अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव, वैज्ञानिक दृष्टिकोण सोसाइटी, भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन, भारतीय विज्ञान लेखक संघ जैसे कई संगठनों से जुड़े हैं। वह माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान की पत्रिका के संपादकीय बोर्ड के पूर्व सदस्य रहे और पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर की पत्रिका का भी संपादन किया। वह वर्ष 2012 में भारतीय विज्ञान लेखक संघ के संयुक्त सचिव, पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर के निदेशक मंडल के चार बार सदस्य, जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ़ राजस्थान (जार) के राज्य प्रचार सचिव चुने गए।
परिचय अभी जारी है
तरुण जी से मेरी दूसरी मुलाकात करीब सवा साल पहले कोटा में हुई। यहां परमाणु ऊर्जा संयंत्र के तहत पत्रकारों का एक सम्मेलन था। बेशक एक लंबे समय के बाद उनसे मुलाकात हो रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी-कभी बात हो जाती थी। हमारी मुलाकात को लंबा वक्त हो चुका था, लेकिन अब तक हम लोग घर-परिवार की बातें नहीं कर पाये। फिर उनके अखबार को लेकर चर्चा हुई। मेरे कुछेक सवाल पर उनका अंदाज इस तरह था जैसे एक कवि ने लिखा है-
खुशबू बनकर गुलों से उड़ा करते हैं, धुआं बनकर पर्वतों से उड़ा करते हैं। ये कैंचियां खाक हमें उड़ने से रोकेगी, हम परों से नहीं हौसलों से उड़ा करते हैं|
कोटा में भी अनेक जगहों से आये पत्रकार बंधु मिले। इसी दौरान ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ के विस्तार की भी चर्चा उन्होंने की। उनसे जब कुछ सवालात किए तो उनका अंदाज ऐसे था मानो कह रहे हों-
शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ, कीजै मुझे क़ुबूल मेरी हर कमी के साथ।
इसको भी अपनाता चल, उसको भी अपनाता चल, राही हैं सब एक डगर के, सब पर प्यार लुटाता चल।
कोटा में मेरी दोस्ती कुछ अन्य पत्रकारों से भी हुई। तरुण जी से वे लोग अच्छी तरह परिचित थे, मेरी मुलाकात नयी थी। फिर तो मैंने देखा कि अनेक वैज्ञानिक से लेकर विज्ञान के क्षेत्र में लिखने वाले धुरंधर पत्रकार भी ‘जैन साहब’ को जानते हैं। मुझे लगा-
मिलेगी परिंदों को मंजिल ये उनके पर बोलते हैं, रहते हैं कुछ लोग खामोश लेकिन उनके हुनर बोलते हैं। 
कोटा में मुलाकात को करीब सवा साल हो गया। इस बीच तरुण जी के अखबार को पीडीएफ फॉर्मेट में देखता रहा। इसी बीच, पत्रकार संगठनों में कुछ तनातनी के मसले पर तरुण जी से फोन पर बात हुई। उनकी पहली प्रतिक्रिया थी, ‘हमें मिलजुलकर एक होकर रहना होगा, तभी भलाई है।’ वाकई बिना किसी की बुराई किए, किसी की तारीफ किए उन्होंने मेलजोल की बात कही जो मन को भा गयी। उसी दिन सोचा कि तरुण जी को लेकर अपने ब्लॉग पर कुछ लिखूंगा। आज उन पर कुछ लिखते-लिखते चंद पंक्तियां देखने को मिलीं जिनका यहां जिक्र करना प्रासंगिक लग रहा है-

हो मायूस न यूं शाम से ढलते रहिये, ज़िन्दगी भोर है सूरज सा निकलते रहिये, एक ही पांव पे ठहरोगे तो थक जाओगे, धीरे-धीरे ही सही राह पे चलते रहिये 
हदे शहर से निकली तो गांव गांव चली, कुछ यादें मेरे संग पांव-पांव चली, सफ़र जो धूप का हुआ तो तजुर्बा हुआ, वो जिंदगी ही क्या जो छांव छांव चली।
कोटा सेमिनार के अंतिम दिन मित्र मंडली।



Tuesday, September 15, 2020

बेखौफ समेटिये ताजगी और सेहत... क्योंकि ये फल सब्जियां ‘सेनेटाइज्ड’ हैं

मेरे बुज़ुर्गों का साया था जब तलक मुझ पर, मैं अपनी उम्र से छोटा दिखाई देता था।

उम्र से छोटा दिखने का यह सिलसिला चल सकता है लगातार। जरा उन बुजुर्गों के बारे में भी तो सोचिये जो अकेले रहते हैं। कोरोना के इस दौर में जब चारों ओर खतरा, डर और अविश्वास सा फैला हो तो कोई क्या करे। ऐसे समय में एक छोटी सी शुरुआत की गयी है चंडीगढ़ के सेक्टर 24 में। यह शुरुआत ताजे फलों और सब्जियों के संबंध में। शुरुआत है ‘सेनेटाइज्ड’ सब्जियों और फलों के बारे में। पूरा दावा है कि सेनेटाइज्ड हैं, लेकिन केमिकल से नहीं। यानी फल और सब्जियां ऐसी हैं कि आप ऑनलाइन मंगाइये या आउटलेट पर जाकर खुद लेकर आइये और सीधे खाइये या पकाइये।

असल में फ्रेश चॉप (freshchop) खोलने का पहले पहल आइडिया एकाकी बुजुर्गों को देखकर ही आया। उस शेर की मानिंद जिसके बोल हैं-

उसे भी खिड़कियां खोले ज़माना बीत गया... मुझे भी शाम-ओ-सहर का पता नहीं चलता।

जब इस महामारी के दौर में अनेक बुजुर्ग ऐसे हैं जो खुद जाकर सब्जी या फल नहीं ला सकते। किसी से मंगायें तो डर कि साफ है या नहीं या फिर जो व्यक्ति ला रहा है, वह कैसा है। ऐसे में फ्रेश चॉप (freshchop) का दावा है कि ऑनलाइन मंगाइये या फिर आउटलेट पर खुद जाकर लाइये, सब्जी या फल ताजे होने के साथ साफ तरीके से धुले होंगे। कटे नहीं होंगे। हाथ नहीं लगाया होगा। इसलिए इसमें कीटाणु या विषाणु होने जैसी कोई बात ही नहीं।

इस सबंध में एक खबर के तौर पर कहा गया कि कोरोना काल में बाहर से कुछ भी लाने में लोग घबराते हैं, लेकिन खाने-पीने की जरूरी चीजें तो लानी ही पड़ती हैं। हालांकि डर उसमें भी लगा रहता है। ऐसे में 'फ्रेश चॉप' के नाम से 'ऑनलाइन वेजिटेबल सर्विस' के जरिये इस डर को काफी हद तक डर को दूर करने का दावा किया गया है। एफएसएसएआई से लाइसेंस लेकर शुरू किए गए फ्रेश चॉप के प्रमुख का कहना है कि बिना रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल किए फलों और सब्जियों को साफ किया जाया जाता है। बैक्टीरिया एवं वायरस को खत्म करने के लिए ओजोन क्लीनिंग पद्धति का इस्तेमाल करते हुए वैक्यूम पैक किया जाता है। बताया जा रहा है कि बिना कटे इन फल एवं सब्जियों को पूरी तरह से साफ किया जा सकता है ताकि इसे मंगाने वाले सीधे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। दावा किया जा रहा है कि यह सेवा घर में अकेले रह रहे बुजुर्ग दंपति एवं वर्किंग कपल के लिए बेहद फायदेमंद है। ऑर्डर 7986059017 पर व्हाट्सएप या फोन कर दिया जा सकता है। फ्रेशचॉप का आउटलेट एससीओ 140, सेक्टर 24 डी, चंडीगढ़ में है। फ्रेश चॉप  की ओर से कहा गया कि ऑनलाइन ऑर्डर न करने वाले आउटलेट पर आकर भी सब्जियों एवं फलों को ले सकते हैं।

पूरे प्रकरण पर यही कह सकते हैं-

इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं, अगर सच्ची लगन हो तो रास्ते आसां होते हैं।


Monday, September 7, 2020

एक नया नशा

 उमेश पंत

हमारे मित्र और बड़े भाई जी श्री चन्द्र कांत झा जी पिछले साल ही टाइम्स ऑफ इंडिया से रिटायर होने के बाद "सार्थक प्रयास" से जुड़े और अब अक्सर हमारे साथ चौखुटिया और केदारघाटी के बच्चों से मिलने जाते हैं। अनुभव आपसे शेयर कर रहा हूं। थोड़ा लंबा है पर कोरोना काल  में पढ़ा जा सकता है। जरूर पढें। सार्थक प्रयास को समझने मै आसानी होगी।

(नोट : उमेश पंत जी से पिछले दो दशकों की मित्रता है। सार्थक प्रयास से भी जुड़ा रहा हूं। उनकी यह पोस्ट पढ़ी तो अच्छा लगा उनकी अनुमति से इसे ब्लॉग पर शेयर कर रहा हूं। - केवल तिवारी) 

 


अल्मोड़ा, नैनीताल, रानीखेत - आँखों के आईने में  एक चित्र उभरता था, पहरों का, तालों का, सोतो का, हरियाली का,  फूलों की खुशबू का और कुछ खास जायकों का -- जब पिछले दिनों अल्मोड़ा से करीब 60 किलो मीटर दूर, अंदर चौखुटिया की यात्रा का मौका मिला तो ये चित्र ज़हन में ऐसे गहरे उतरे कि लगा जीवन की आपा धापी में बहुत कुछ पीछे रह गया !! लोगों से मिला और फिर यहाँ के बच्चों से -- तो जीवन का एक और फ़लसफ़ा सामने आया कि, 'भगवान' शाश्वत रूप में कहीं हैं तो इनकी सादगी और मासूमियत में है -- एक प्रश्न अकस्मात् मन में कौंधा, 'फिर मंदिर क्यों और भगवान की खोज वहां क्यों ??' यह खोज मनुष्य और प्रकृति में क्यों न हो भला ??  

बीतते प्रहर के साथ-साथ अनुभव गहराते रहे, उनके रंग और भाव भी बदलते रहे! बातें होने लगीं, परतें खुलने लगीं , ज्ञान चक्शु खुलने लगे, दिल और दिमाग के हालात बदलते चले गए  - जो सच सामने आया  -- लगा की ७० साल की स्वंतंत्रता, ७० साल का विकास या फिर पिछले 6 साल का 'हो हल्ला विकास ', समाज की एकजुटता, लोगों की एक दुसरे के प्रति संवेदना, सभी कुछ खोखला है। ऐसा लगा की यह शहर के आटालिका, रौशनी की जगमगाहट, हाईवे, मॉल, गुड़गाँव मॉडल, सभी कुछ एक मृग तृष्णा भर है। थोड़ी सी नज़र पैनी करें तो यह सब, एक कंकाल या वीरानी शुष्क हवा के अलावा कुछ भी नहीं है। कभी गुड़गाँव या दिल्ली के कुछ एक किलोमीटर अंदर जाएं, कस्बों में कुछ समय लोगों के साथ गुजारें तो यही अनुभव आपका भी होने वाला है। सबका साथ सबका विकास मॉडल फेल दिखाई देने वाला है!! कुल मिला कर स्थिति ह्रदय को द्रवित करने वाली है बशर्ते औहदे, पैसे, ऐशो आराम की ज़िन्दगी ने या फिर किसी की जीवन पार्जन की मजबूरी ने उसे एक 'आत्मकेंद्रित रोबोट' न बना दिआ हो -- वैसे ऐसा अक्सर ही देखने को मिलता है!

इन मासूमों के जीवन के अन्दर झाँका तो पता चला कि इस समाज, इस देश का हर विकास का मॉडल इनके या इनके परिवारों या फिर इस समाज और इस इलाके के जीवन को छूने में अब तक असमर्थ रहा है। आज तक अगर कोई रोज़ी रोटी की लड़ाई लड़ रहा हो, दो जून की रोटी जुटाने में दिन और रात काट जाता हो, या फिर कैसे जुटेगी इसकी चिंता या जुगाड़ में सर ओखली में देता हो और उसकी आत्मा पिसती हो -- साली वो भी तो नहीं पिसती क्योंकि वो पत्थर हो चुकी -- जहाँ बीमारी के इलाज को लोग तरसते हों और जहाँ चूल्हे जलने के लिए भटकना हो। पढ़ाई लिखाई, करीयर, एक दिवा स्व्प्न हो -- वह ज़िन्दगी जिए तो क्या जिए। अल्मोड़ा, नैनीताल के तमाम रंगीन चित्र अचानक से मठमैले होने लगे। यथार्थ सामने मूँह चिढ़ाने लगा -- सैलानी की तरह आये थे कुछ समय बिताने, मज़े करने, खुश होने, और बस इतने में ही 'हिल' गए।

कुछ और पल तो बिताओ चौखुटिया में!! 

इन बच्चों को और इन परिवारों को जानने की उत्सुकता अब बढ़ती गयी थी! कॉरपोरेट नौकरी ने और रोज़ी रोटी के जुगाड़ ने अलग थलग एक मशीन तो बना ही दिया था शरीर को, लेकिन संस्कार और स्वयं के 'मूल' ने आत्मा की संवेदनाओं को अब तक ज़िंदा रखा हुआ था भले ही वो एक कवछ के पीछे से अब तक मजबूरन ही देखा था :: हर बच्चे के पीछे एक कहानी छिपी थी जो मन को हिला देने के लिए अपने में काफी था। अनुभव ऐसा ही था की जैसे पेग के बाद पेग से खुमार चढ़ता जाता है उसी तरह यहाँ हर एक कहानी के बाद दूसरी कहानी ज़हन के खुमार को सुलगा रही थी! सुलगने का पीक (पराकाष्ठा) एक बच्चे का वो दर्द था जो इन शब्दों में सामने आया, "काश मेरा बाप नहीं होता तो शायद मैं कुछ बन गया होता पढ़ लिख कर"। यह मजबूर बच्चा एक शराबी पिता का पुत्र है जिसकी लत ने घर तबाह कर डाला। रोज़ी रोटी से महरूम किया और खान पान की जगह घरवालों को हिंसा दी"। बच्चा इतनी उम्र में ही जवान हो गया है और हक़ीक़त से परिचित, पढ़ने लिखने की जगह रोज़ी रोटी जुटाता है।

ऐसे ही १२वीं पास एक लड़की जिसकी मेधा उसे और पढ़ा सकती थी, कुछ बना सकती थी। लेकिन मजबूर है अपने भाई बहनों के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी से। छोटी सी ज़मीन पर खेती और एक दो गाय बैल, यही तो है पूँजी और साधन उसकी कमाई के। कैसे छोड़े इनको? कैसे दफना दे इनके जीवन को? दफ़नाने को मजबूर है वो अपने अरमानो को नियति के आगे। आखिर उसकी ताई ने भी अपने अरमानों को दफ़ना कर उसे पाला था जब इसके माँ बाप नहीं रहे थे।

हमारी सरकार, हमारा समज, हमारी व्यवस्था इतना भी जुगाड़ न कर पाई है की वहाँ ऐसों के लिए कुछ रोज़गार के साधन ही हो पाएं!!  स्थिति तब और भी विकृत हो जाती है जब ऐसे में कोई बीमारी से ग्रसित हो जाये। और वो भी जिसका इलाज वहां नहीं हो सकता या इलाज लम्बा खिंचता हो। मसलन एक लड़की जिसको टी बी हुआ है, उसकी लड़ाई अब शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, सभी कुछ एक साथ है। क्या करे ऐसे में कहाँ जाये? व्यवस्था के लिए वो एक पेशेंट मात्र है, एक बोझ! उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं!!  यकीन मानिए दिल बैठने लगा था इस हक़ीक़त के आगे -- जो सोच कर आया था, हरियाली, रूमानी वादियाँ -- सभी तेल लेने जा चुके थे।

एक ही संतोष था -- कि आज, जीवन के इस मोड़ पर, जीवन से और भी सार्थक रूप से जुड़ने के प्रयास में तो हूँ -- वही प्रयास तो यहाँ तक ले कर आया है। और धन्यवाद " *सार्थक प्रयास* " संस्थान का जो मुझे ऐसा मौका और ऐसे अनुभवों से रुबरु करा रहा है। ये वही संस्थान है जो इन मजबूरों के जीवन में छोटे छोटे से परिवर्तन की कोशिश कर रहा है। और इन सुदूर, नज़रअंदाज़ किए गए इलाकों में, इन समाजों में, इन बच्चों में -- शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल डेवलपमेंट, के माध्यम से उनको मज़बूत करने में लगा है।

गर्व है इनसे जुड़ कर ! धन्यवाद *सार्थक प्रयास 



Thursday, September 3, 2020

कुछ रिश्ते बनाना क्या tharakipana है

एक मित्र के साथ बात हो रही थी। दारू पार्टी के अगले दिन। लंबा पॉज और आज इस पोस्ट के कयी साल बाद देखा एक लाइन का ब्लॉग। बहुत नाइंसाफी है। लिखूंगा, इसे पूरा करूंगा।

Tuesday, September 1, 2020

पितृ पक्ष... यानी हमारे होने का अर्थ



(यह लेख दैनिक ट्रिब्यून के 30 अगस्त 2020 के अंक में छप चुका है।)
विनय ठाकुर
हम जैसों की पीढ़ी जो धर्म जनता की अफीम है पढ़कर बडी हुई है। वह अपने पहचान व होने के अर्थ की खोज मोबाइल के की पैड पर थिरकती उंगलियों के सहारे सैकड़ों व्हॉट्स ग्रुप व फैसबुक फ्रेंड लिस्ट में खोजती हैं। हमारी यह पीढ़ी धर्म विरोधी करार दिए गए लाल झंडे वाली विचारधारा की दुर्गतिकथा देख सुनकर भी धार्मिक विशेषण लगे हर चीज से ऐसे बिदकती है जैसे वह कोई बिजली का नंगा तार हो और तुरंत करंट मार देगी। कुछ हमारी समझ में इसका गैर जरूरी आऊट डेटेड होना और कुछ पंडित जी की बेदिली नतीजा कर्मकांडों के आवरण के नीचे दबे हमारे संस्कारों के मूल मर्म को हम नहीं समझ पाते हैं। मूल संदेश घंटी शंख और मंत्र के मिले जुले शोर में खो जाता है। इस कठिन कोरोना काल ने कुटुंब और कुटुंब भाव की महत्ता को बड़े गहरे तौर पर रेखांकित महसूस कराया है। कुटुंब से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार है पितृ यज्ञ या श्राद्ध जो हिंदु /सनातन धर्म के पंच महायज्ञों में प्रमुख माना गया है। यूं तो यह नित्य प्रति किया जाना चाहिए पर तेज रफ्तार जिंदगी में यह कुछ अवसरों तक सिमट गया है इसमें प्रमुख अवसर है पितृ पक्ष।
पितृ पक्ष एक ऐसा अवसर है जब हम सही मायने में पुरखों के जरिए प्रकृति में अपना विस्तार करते है व उसके प्रवाह को अपने भीतर महसूस करते हैं। यह ऐसा अवसर है जो हमारी लघुता के दायरे को तोड़कर हमारे होने की अर्थ परिधि का विस्तार करता है। मैं के घेरे को तोड़कर हमारी पहचान उस प्रवाह से कराता है जो बताता है कि मैं पिता पितामह प्रपितामह बृद्ध प्रपितामह के रूप में जारी एक धार का हिस्सा हू और यह धार यहां तक के अर्थ पड़ाव में अकेली नहीं है उसमें माता मातामही बृद्ध मातामही के रूप में आती दूसरी धार का भी संगम है।हम एक श्रृंखला की कड़ी हैं और हमारा दायित्व इस श्रृंखला को कायम रखने के साथ ही उसके विस्तार को भी सुनिश्चित करना है।हमारी नियति महज हमारे कर्मों से ही निर्धारित नहीं होती बल्कि हमारे पुरखों के कर्मं से भी।हमारा दायित्व महज अपने दोषों का परिहार मात्र नहीं है बल्कि अपने पुरखों के दोषों का भी परिहार करना है।यह हमें एक गहरे दायित्व बोध के जरिये संस्कारित करता है। यह हमारी जवाबदेही महज पुरखों तक ही सीमित नहीं कर पंच भूतों व देवताओं के माध्यम से संपूर्ण प्रकृति तक ले जाता है।इसमें श्रद्धा और शुचिता के रूप में विभिन्न आयामों में अनुशासन का पाठ भी है।इसके मूल में करूणा व प्रेम है तो साथ ही है प्रकृति के साथ अंतरंगता भी ।श्राद्ध के श्रेष्ठ स्थानों में नदियों के संगम तालाब के रूप में वे तीर्थ स्थान है जो प्राकृतिक महत्व के है या फिर सार्वजनिक धर्मस्थल है। सामूहिकता श्राद्ध के सार तत्वों में से एक है । ग्रास निकालते वक्त गाय को पहले देना  फिर कौओं कुत्तों को।ये सभी सर्वजनिक स्वास्थ्य व समृद्धी की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मेरे जैसों के लिए पितृपक्ष जैसे शब्द एक बला की तरह थे। कोशिश यह रहती थी कि जितनी जल्दी हो सके जान छुड़ाओ।हम तब तक किसी परेशानी में नहीं थे जब तक आप परिवार के मुखिया की भूमिका में नहीं थे।सबकुछ पिता या बड़े भाई के जिम्मे था। बात बदली जब अचानक माता जी का देहांत हुआ कर्ता की भूमिका मे आना पड़ा। सवाल शुरू हुए धोती धारण कीजिए, आसन लगाकर बैठिए यहां तक सब ठीक कठिनाई थी पर निभा लिया। सिलसिला आगे बढ़ा श्राद्ध के समय पंडित जी ने पूछा नाम गोत्र मदद के लिए परिवार  था बाधा पार कर ली गयी। पर जैसे ही बात पितामह होते हुए प्रपितामह के नाम की आयी एक सन्नाटा पसर गया। पंडित जी ने यथा नाम बोलने की सहूलियत देकर उबार लिया। न जानने का थोड़ा बुरा लगा पर कोई बात नहीं आगे बढ़ा पिता की तरफ तो पितामह तक जा पाया पर बात जब पितामही की आयी तो एक बार फिर निरुत्तर था अब मुझे अपने उपर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।जिनसे कोई रिश्ता नहीं उसकी तो सात पुश्तों के नाम कंठस्थ है यह तो जानना चाहिए। माता पिता के रहते याद नहीं किया अब कौन बताता पिता पहले गुजर चुके थे और माता जी का तो श्राद्धकर्म ही था। पढ़ाकू माने जाने वाला मै अपने आप से बुरी तरह नाराज था पूरी दुनिया के बारे में जिज्ञासा रखने वाले को अगर अपनी ही जड़ों के बारे में कोई जानकारी नही हो तो सारी सामाजिकता और उसके प्रति निष्ठा बेकार है।अचानक लगा कि कितनी छिछली है हमारी जिंदगी बिना जड़ मूल के। पिछले साल किसी ने श्रीमद भागवत पुराण उपहार में दे दिया एक बार को लगा दूसरे लोक के किस्सों और मिथकों को जानकर मैं करूंगा क्या? पर फिर सोचा चलो किसी मौके पर पंडित जी पर ही रौब गांठ लूंगा । पढ़ने लगा तो न समझ में आने वाले कहानियों के बीच से बहुत सी बातें सामने आने लगी जिसने हमारी क्षुद्रता की गांठों को खोलकर हमारी समझ को फैलाना शुरू कर दिया।धूप दीप गंध पुष्प नैवेद्य जल ये महज सज्जा या आचारवश नहीं है प्रकृति के साथ रिश्तों की पहचान व उसका आभार है। कुश पर देवताओं को यूं ही नहीं बिठाया गया है। काल निर्धारण भी प्रकृति के चक्र के हिसाब से किया गया है। 

Friday, August 28, 2020

कादम्बिनी और नंदन का बंद हो जाना


केवल तिवारी
शुक्रवार शाम सूचना मिली कि हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन की पत्रिकाएं-कादम्बिनी और नंदन को बंद कर दिया गया है। संभवत: संस्थान से कुछ लोगों का इस्तीफा भी लिया गया है। कादम्बिनी और नंदन का यूं अचानक बंद हो जाना वाकई बेहद दुखद है। मैंने हिन्दुस्तान अखबार में आठ वर्षों तक काम किया है। बेशक उक्त दोनों मैग्जीनों से सीधे नहीं जुड़ा रहा, लेकिन दोनों में लेख छपे। लेख लिखने से भी ज्यादा यादगार रहे कुछ पल। जैसे नंदन पत्रिका में जाने-माने लेखक प्रकाश मनु से मुलाकात। कादम्बिनी में क्षमा शर्मा जी से मुलाकात। क्षमा जी आजकल हमारे अखबार दैनिक ट्रिब्यून में लिखती हैं। पिछले साल बाल दिवस पर प्रकाश मनु का इंटरव्यू छापा था। मनु जी की किताब ‘ये जो दिल्ली है’ कई बार पढ़ चुका हूं।

इन यादों के अलावा इन पत्रिकाओं से बहुत पुरानी यादें भी जुड़ी हैं। हमारे गांव में पंडित जी थे। पांडे जी। प्रकाश पांडे जी के पिता। मैं जब छठी-सातवीं में पढ़ता था और गर्मियों की छुट्टियों में घर जाता था तो पांडे जी को नंदन और कादंबिनी पढ़ते हुए पाता था। यही नहीं वह इन पत्रिकाओं में छपी कहानियों और चुटकुलों को भी सुनाते। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर पहले से ही बहुत उम्दा था, उस पर दोनों पत्रिकाओं के वह नियमित पाठक थे। दूर रानीखेत से उन्हें मंगवाते थे। दिल्ली से छपकर रानीखेत आने तक ही पत्रिकाओं को कई दिन लगते थे।

इससे पहले एक मशहूर पत्रिका पराग छपा करती थी। करीब 15-20 साल पहले मेरे बारे में किसी ने जिक्र किया होगा तो मुझे एक ऑफर मिला था। कहा जा रहा था कि पराग, चंदामामा आदि पत्रिकाएं फिर शुरू हो रही हैं। मैं वहां मिलने तो गया, लेकिन ज्वाइन नहीं कर पाया। अंतत: इन मशहूर पत्रिकाओं के फिर से शुरू होने की योजना पाइपलाइन में ही रह गयी।

बेशक आज जमाना बदल रहा है, डिजिटल युग आ गया है, लेकिन ऐसी मील का पत्थर के मानिंद इन पत्रिकाओं को यकायक बंद नहीं किया जाना चाहिए था। उनको डिजिटल फार्मेट या अखबार के साथ जोड़कर भी तो जारी रखा जा सकता था। यदि माहौल अच्छा बनता तो उसे फिर शुरू कर सकते थे। लेकिन प्रबंधन कहां घाटे की बात सहता है। दोनों पत्रिकाओं के बंद होने का वाकई दुख है। 

Friday, August 21, 2020

गणपति बप्पा... अपनों की दूरी... पर दिल की नहीं मजबूरी

केवल तिवारी

फिर आये गणपति। फिर क्यों। वे तो हमेशा हैं। हमारे साथ। लेकिन यह पर्व भी तो है। गणपति को घर लाने और फिर विसर्जित करने का। क्या फर्क पड़ता है कि महाराष्ट्र से शुरू हुआ यह उत्सव आज विश्वभर में मनाया जाता है। गणेश तो हैं ही जीवन सार। उनकी एक-एक बात में जीवन का मतलब। उन्हें घर लाने, उन्हें विसर्जित करने, उनके बड़े कान, छोटी आंख, बड़ा पेट, उनके मोदक हर चीज में छिपा है जीवन संदेश। वह कहते हैं अपनों के साथ रहो। उत्सव मनाओ। आज कोरोना महामारी के कारण दूरी बेशक मजबूरी बन गयी है, लेकिन दिल की दूरी नहीं है। होनी भी नहीं चाहिए। मतभेद होना स्वाभाविक है। इंसानों के बीच में मतभेद होता है। मनभेद नहीं होना चाहिए। मनभेद है तो गणपति का संदेश हम नहीं समझ पाये। आपको लगता है कोई आपका अपना नाराज है। ऐसा नहीं है। आप मन में सिर्फ और सिर्फ यही मानिये कि सब मुझे अच्छा मानते हैं। अपना मानते हैं। मेरी गलतियों पर फटकारते हैं। जीवन के इन्हीं सार संदेशों को तो बताते हैं गणेश।

फोटो : भावना
हर साल गणेश उत्सव का मनाने का यही अर्थ तो है। सब काम से पहले करो जय-जय गणेश की.... जय-जय गणेश की सब काम से पहले का मतलब उनके शरीर से समझिये। उनका सिर बहुत बड़ा है अर्थात वह शुभ काम की शुरुआत कर रहे हो तो सोचने का दायरा बड़ा रखना चाहिए। गणेश जी केे सिर की तरह। जब सोच बड़ी होगी तो विचार भी बड़ा होगा। ऊंचे और मजबूत विचार से ही व्यक्ति का उद्धार संभव है।

उनके बड़े-बड़े कान हैं। सूप जैसे। अर्थात ‘सार-सार को गाहि रहे थोथा देहि उड़ाय।’ इसका मतलब सूप अनाज को रखता है और बाकी अवेशष को उड़ा देता है। यही बात गणेश जी मनुष्य को समझाते हैं कि विभिन्न चीजों का सार पकड़ो और निरर्थक बातों को छोड़ो।

गणेश जी की आंखें छोटी हैं : छोटी आंखों का यही मतलब है कि इंसान को दुनियादारी बहुत सूक्ष्म तरीके से समझनी चाहिए। गहराई से चीजों को नहीं समझेंगे तो बुद्धि कभी भी गहराई के तल को छू नहीं पाएगी। बड़ी सोच, चीजों को गहराई से समझना और अच्छी बातों को ही याद रखना जीवन संदेश। यानी वही बात फिर कि जीवन का संदेश दे रहे हैं भगवान गणेश।

गणेश जी का पेट  लंबा है। यानी लंबोदर। उदर लंबा है, लेकिन भोग लगता है सिर्फ मोदक। पेट बड़ा, लेकिन भोजन थोड़ा सा। इसे समझिये। वह भूख को नियंत्रित करने की सीख देते हैं। इस नियंत्रण से जहां मनुष्य का संयम गुण विकसित होता है, वहीं विचार शक्ति भी मजबूत होती है। नियंत्रण का मतलब सिर्फ भोजन कम खाने से नहीं है। व्यसनों पर नियंत्रण, वाणी पर नियंत्रण।

अब आते हैं उनके वाहन पर : उनका वाहन है चूहा। यानी मूषक। मूषक जैसा छोटा वाहन रखने वाले गणपति बताते हैं कि इंसान को अपनी इच्छाओं और भावनाओं को काबू में रखना चाहिए। दिखावे की संस्कृति के जाल में न फंसकर जिंदगी सहज और सरल ढंग से बितानी चाहिए। आज के समय में अधिकतर लोग तनाव और अवसाद का शिकार केवल इसलिए हैं कि वे इस दिखावे के जाल में उलझ गए हैं। जबकि मन के भार को कम करने के लिए जरूरी है कि हम इच्छाओं की सीमा को समझें। अपने जीवन में बनावटी भाव को कभी ना आने दें। दिखावे की सोच इंसान को जरूरी-गैर जरूरी चीजें जुटाने के फेर में उलझा देती है। तन से नहीं ही नहीं, मन से भी बीमार बना देती है। इसीलिए सादगीपूर्ण जीवन जीने की बप्पा की सीख आज के समय में वाकई हमारे जीवन में संतुलन लाने का काम कर सकती है।

अब बात करते हैं उनके प्रिय भोजन मोदक की। मोदक के आकार पर गौर कीजिए। उसका ऊपरी भाग खाएंगे तो हल्का सा स्वाद आएगा। धीरे-धीरे उसमें मेवों का स्वाद आने लगेगा। इसका अर्थ है ऊपर से हमें ज्ञान बहुत छोटे आकार का मालूम पड़ता है, सत्य यह है कि इसे प्राप्त किया जा सकता है गहराई में जाने से। अभ्यास करने पर पता चलता है कि ज्ञान तो अथाह है। और मोदक का निचले भाग का स्वाद  इस बात का प्रतीक है कि गहराई में जाकर पाए ज्ञान का स्वाद बहुत मीठा होता है।

उनके शुभ चिन्ह स्वास्तिक पर ध्यान दीजिए। मनुष्य का कल्याण इस स्वास्तिक चिन्ह को समझने में निहति है। जीवन में आनंद धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के बराबर स्थान से आएगा। अगर किसी एक-दो को ही पकोड़ोगे, तो जीवन का आनंद मिट जाएगा। उनके चार हाथों में अलग-अलग चीजें जो हम देखते हैं, उनका संदेश है कि किसी नये काम को करने पर मंगल तभी होगा जब हमारा प्रबंधन उचित होगा।

 ऊं गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधपति। यह मंत्र हम अपनी पूजा अर्चना के समय करते हैं। इसका मतलब है गणों के पति आप लोगों का जो प्रिय करने वाले स्वामी हो। आप लोगों को धन रूपी भौतिक और प्रेम, सत्कार रूपी अभौतिक संपत्तियां उपलब्ध कराये। शास्त्र कहता है कि जो किसी समूह का स्वामी बनता है, उसमें यह विशेषता होनी चाहिए। गणपति करोड़ों सूरज की तरह दैदिप्यमान हैं।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

 

गणपति का आना और जाना

गणेश भगवान को अपने घर स्थापित करने और कुछ समय बाद उनके विसर्जन की कहानी ज्यादा पुरानी नहीं है। यूं तो ज्यादातर घरों में गणपति और लक्ष्मी को पूजागृह में स्थायी तौर पर विराजमान करने का रिवाज है। गणपति कहां जाते हैं हमारे घर से। हमारा मन ही तो हमारा घर है। लेकिन उन्हें विराजमान करने की शृंखला में अनेक लोग जुड़े हैं। मूर्तिकार, फूलवाला, पूजन सामग्री वाला... आदि-आदि। फिर गणपति बप्पा मोरया का जयघोश। बप्पा का अर्थ है अपना सा। इस संकट में भी इसी अपनेपन को पोषित करने वाले प्रथम पूज्य गणेश घर-घर विराजे हैं। उनका संदेश है सब परिजन मिलकर उत्सव मनायें। इस महामारी में परिजन दूर-दूर हैं तो क्या हुआ। मन में उत्सव मनाइये। कुछ सीख लीजिए। कुछ दिन पूजन के बाद उनके विसर्जन में भी तो संदेश है। पुरानी बातें जाएंगी तभी तो नयी आएंगी। फिर कुदरत का संदेश है बिना नव्यता के सुख कहां। यानी अगर आपके विचारों में नवीनता नहीं होगी, आपको कार्यों में नवीनता नहीं होगी तो सुख कहां मिलेगा। पुरानी रट को ही लगाये रहेंगे तो सुख तो मिलने से रहा। गणेश जी का विसर्जन यही संदेश देता है। अब नये की तैयारी कीजिए। बप्पा का अपना हमेशा साथ रहेगा। तो क्यों ना परिवारजनों के साथ हंसते-मुस्कुराते हुए इस पर्व पर अपनेपन को सहेजा जाये। पुरानी बातों की अच्छाईयों को याद कर नये विचारों को जगह दी जाये। गणपति की ओर आशाभरी निगाहों से देखने का मतलब उलझनें भूल जाने जैसा है। यही वजह है कि बच्चे हों या बड़े, सबके लिए वे अपने से हैं।

 

गणपति तेरे कितने नाम

आदिदेव भगवान श्रीगणेश बुद्धिसागर भी हैं, विनायक भी हैं और प्रथम पूज्य भी। विघ्ननाशी श्रीगणेश का नाम वेदों में ‘ब्रहमणस्पति,  पुराणों में श्रीगणेश और उपनिषद में साक्षात ब्रहम बताया गया है। इन्हें विघ्नेश्वर, गजानन, एकदंत, लम्बोदर, परशुपाणि, द्धैमातुर और आरवुग आदि अनेक नामों से जाना जाता है। वैसे गणेश का अर्थ है गणों का स्वामी। महाराष्ट्र में है गणपति के आठ शक्तिकेंद्र- श्रीमयूरेश्वर, सिद्धिविनायक, श्रीबल्लालेश्वर, श्रीवरदविनायक, श्रीचिंतामणि, श्रीगिरिजात्मक विनायक, श्रीविघ्नेश्वर और त्रिपुरारिवरदे श्रीमहागणपति। ये अपनी अलग तरह की प्रतिमाओं के इतिहास से जुड़े गणपति के आठ विशेष रूप हैं। इन्हें अष्टविनायक भी कहा जाता है। तो घर में पधारो गजानन जी के संदेश के साथ अपने मन मंदिर में गणेश को विराजमान करें जो विघ्नहर्ता हैं। उनके साथ ही अपनों को याद करते हुए मनायें गणेशोत्सव। जय गणेश। 

Monday, August 10, 2020

तो क्या अब गांवों की प्रतिभाओं को नहीं रोकेगी अंग्रेजी की दीवार

केवल तिवारी

केंद्र सरकार ने नयी शिक्षा नीति की घोषणा कर दी है। अभी पूरा अध्ययन मैंने नहीं किया। तमाम बातों के अलावा जो बात समझने की मुझे सबसे जरूरी लगी वह है भाषा। यानी पढ़ाई का माध्यम क्या होगा? शुरुआत में कहा जा रहा था कि पहली से पांचवीं तक के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई ही नहीं जाएगी। फिर कहा गया कि अंग्रेजी एक विषय के तौर पर पढ़ाई जाएगी, न कि माध्यम के रूप में। संभवत: यही बात सत्य है। एक जानकार ने बताया कि अंग्रेजी पढ़ाई तो जाएगी, लेकिन एक सब्जेक्ट यानी विषय के रूप में। बाकी पढ़ाई का माध्यम होगा हिंदी या क्षेत्रीय भाषा। यानी पंजाब में है तो पंजाबी भाषा माध्यम, दक्षिण के किसी राज्य में है तो वहां की भाषा और पूर्वोत्तर या पश्चिम आदि में वहां की भाषा। अब इसका अभी खुलकर तो विरोध हुआ नहीं है, मुझे लगता है कोई बड़ा दल विरोध में उतरेगा भी नहीं, अलबत्ता एआईडीएमके की नेता कनिमोझी ने जरूरी इसे कार्पोरेट कल्चर थोपने वाला बताया है। शिक्षा नीति में ताजा बदलाव पर बहस-मुबाहिशें चल रही हैं। बेशक केंद्रीय कैबिनेट पर इस पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा दी है, लेकिन अभी इसके अमल में आने में लंबा वक्त है।

इन सबके बीच, अगर भाषायी मसला ऐसा ही हो जाता है जैसा सरकार के प्रस्तावित मसौदे में है तो मुझे लगता है ग्रामीण इलाकों से प्रतिभाएं आएंगी। लेकिन एक शंका है कि क्या निजी स्कूलों की व्यवस्था भी ऐसी होगी। अंग्रेजी के कारण ही निजी स्कूलों की दुकानें चमकीं। धीरे-धीरे सरकारी स्कूलों से बच्चे नदारद हो गये। केवल आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के बच्चे ही सरकारी स्कूल का रुख करते हैं। असल में भारत के गांवों में प्रतिभाओं का भंडार है। पढ़ाई, लिखाई से लेकर गीत-संगीत के क्षेत्र में भी। अनेक बार ऐसा होता है कि अंग्रेजी की गिटिर-पिटिर के कारण वे सकुचाते हैं और चुपचाप दूसरी डगर भर लेते हैं। या तो कुंठा में जीते हैं या फिर नियति मानकर अपने दूसरे कामधंधे में लगते हुए जीवन यापन करते हैं। ऐसा नहीं कि अंग्रेजी के कारण हमेशा उनके आगे दीवार ही खड़ी हो। ऐसे भी उदाहरण है जब मेहनती और कर्मठ युवाओं ने इस भाषा पर भी पूरी कमांड पा लेने के बाद शिखर को छुआ है, लेकिन ऐसे उदाहरण कम ही हैं। इसलिए अंग्रेजी भाषा की दीवार फौलादी नहीं होगी तो आने वाले समय में गांवों की प्रतिभाएं भाषायी कुंठा से पीछे नहीं रहेंगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। मुझे याद है जब 25 साल पहले हिंदी आंदोलनों का मैं भी हिस्सा बना था। सिविल सेवा परीक्षाओं में हिंदी एक विषय के तौर पर ही नहीं, बल्कि माध्यम के तौर पर भी अनिवार्य बनाये जाने की मांग की गयी थी। अब देखना यह होगा कि पांचवीं तक अंग्रेजी एक विषय और छठी से माध्यम वाली यह योजना कैसे सिरे चढ़ती है और निजी स्कूल कैसे इसका पालन करते हैं। इससे पहले तो नीति के सिरे चढ़ने का मामला है। 

Thursday, August 6, 2020

ये सफर बहुत है कठिन मगर... मोनू पांडे की संवेदनाओं का जिक्र

अखबार में मिली कवरेज
अखबार में मिली कवरेज
केवल तिवारी

कहीं नहीं कोई सूरज धुआं धुआं है फ़ज़ा 
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो 

मशहूर शायर निदा फाजली का यह शेर मौजूं है उस शख्स के लिए जिसने कोरोना काल में इंसानियत दिखाई। हो सकता है किसी को यह बड़ी बात न लगे, हो सकता है इसे कोई यूं ही समझे, लेकिन जो दौर चल रहा है और जिस दौर में बेहद 'संवेदनशून्य' लोगों की खबरें भी आ रही हैं, उसी दौर में यह काम मुझे तो बेहद प्रभावित कर गया। बात कर रहा हूं काठगोदाम के ब्यूरा निवासी नवीन पांडे की। उन्हें उनके निक नेम मोनू पांडे के नाम से भी जाना जाता है। पहले इलाके के प्रधान भी रह चुके हैं। अभी उनकी पत्नी पार्षद हैं। मेरी भी उनसे आत्मीयता तब से है जब ब्यूरा में अपने ससुराल आना-जाना हुआ। कई मौकों पर बात करते हैं। मजाक करते हैं। फिलहाल उस बात का जिक्र कर रहा हूं, जिसका पता मुझे कल चला। उनके इलाके में एक व्यक्ति की हार्ट अटैक से मौत हो गयी। उम्र ज्यादा नहीं थी। यही कोई 45-50 के बीच। बाद में पता चला उन्हें कोरोना भी हुआ था। तीन बच्चियां हैं। बताया जाता है कि इस बीच उस व्यक्ति की पत्नी ने पति के चले जाने के गम में अपनी बच्चियों के साथ कुछ जहरीला निगल लिया। हालत बिगड़ गयी। अस्पताल कौन ले जाये। सामान्य समय में लोग आगे नहीं आते, इस वक्त तो पता चल चुका था कि पति को कोरोना हुआ था। मोनू पांडे यानी नवीन पांडेय को इसका पता चला तो तुरंत चल दिये। अपनों ने थोड़ा टोका। जाहिर हिचकिचाहट सभी को होती है, लेकिन अपने मिजाज से मिलनसार और लोगों के साथ खड़े रहने वाले मोनू ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और इस पीड़ित परिवार को अस्पताल पहुंचाया। अब खबर है कि जहरीला पदार्थ निगलने वालों की हालत स्थिर है। मोनू ने सुरक्षा की दृष्टि से खुद को क्वारंटीन कर लिया। उनके इस कृत्य पर निदा फाजली साहब का ही एक शेर याद आ रहा है-
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।
वाकई ऐसे काम ही तो हैं जिससे व्यक्ति थोड़ा डिफरेंट बनता है। मोनू पांडे जी शिवभक्त हैं। हर साल अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं। इस बार कोरोना महामारी के कारण अमरनाथ यात्रा स्थगित हो गयी थी। उनके द्वारा किए जा रहे उक्त नेक काम भी अमरनाथ यात्रा सरीखे हैं। ऐसे शख्स को साधुवाद।  

Sunday, July 26, 2020

गमले में वसंत

करेले की बेल
यह मौसम वसंत का तो नहीं है, लेकिन मेरे गमलों में इन दिनों माहौल वसंत जैसा ही है। पेड़-पौधों से बहुत स्नेह है और इस संबंध में बहुत कुछ लिखता भी रहा हूं। पिछले साल गमलों में गेंदे के फूल खिले। रोज पूजा के लिए तोड़ता और अगले दिन फिर खिले मिलते। गेंगे के फूल मुझे बेहद भाते हैं। गमलों में कुछ पौधे तो 10 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। असल में चंडीगढ़ आए हुए सात साल हो गये हैं। जब चंडीगढ़ आया तो गमलों को भी साथ ले आया। मूवर्स एंड पैकर्स के जरिये सामान लाने का फायदा ये हुआ कि गमले सुरक्षित पहुंचे। एक पौधा बौंगनविलिया यानी कागजी फूल का है। इस फूल में कोई खुशबू नहीं होती, लेकिन इसकी छटा निराली होती है। पता नहीं क्या बात है पिछले दो सालों से इसमें फूल नहीं आ रहे हैं। लगता है उसकी उम्र पूरी हो गयी। कुछ दिन और देखूंगा फिर वहां पर कुछ नया पौधा लगेगा। पिछले साल छोटे बेटे धवल को स्कूल से एक पौधा लगाने का प्रोजेक्ट मिला था। उसने एक नीले रंग के फूल अपराजिता की बेल लगायी। खूब फूल आये। इस बार वह नहीं हुआ। इस बार धवल ने मिर्च का एक पौधा लगाया जो धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है। बोंगनविलिया की ही तरह एक और पेड़ सदाबहार का है। दसियों बार कटाई-छंटाई कर चुका हूं। छोटे-छोटे लाल फूल आते हैं।
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एक मनी प्लांट का पौधा है। एक बार तो वह यहां आंगन में पूरा फैल गया। अब उसे हमने कांट-छांट कर गमले तक ही सीमित कर दिया। पिछले साल पत्नी ने एक गमले में पुदीना यानी मिंट लगा दिया। खूब चटनी खाई। इन दिनों कुछ सूख सा गया है। क्योंकि उसी गमले में गेठी की बेल बहुत फैल गयी है। गेठी पहाड़ों में होती है। आप कह सकते हैं बेल पर लगने वाला आलू। लेकिन इस आलू में शुगर नहीं होता। यह पहले हरा होता है बाद में काला। छिलका निकालने के बाद अंदर से आलू जैसा ही होता है। बचपन में इसे खूब खाते थे। इसे पकाकर खाइये या भूनकर। अभी सिर्फ बेल ही खूब फैली है, उस पर गेठी आनी बाकी है। इसे भी पत्नी ने लगाया था। बेहद रोचक किस्सा है। ससुराल से गुछ गेठियां आई थीं। एक गेठी में तोर आ गया। पत्नी ने उसे हल्का सा काटा और गमले में डाल दिया और गेठी की बेल खूब फैल गयी। पहले साल कुछ नहीं हुआ। अगले साल खूब गेठियां आईं। उसके बाद मैंने बेल को जड़ से काट दिया। क्योंकि वह अपने मौसम के हिसाब से सूख चुकी थी। एक बार गांव में किसी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि बेल को उखाड़ना नहीं चाहिए था। क्योंकि अपना मौसम आते ही वह फिर फलने-फूलने लगती है। मुझे अफसोस हुआ कि मैंने क्यों गमला नयी पौध के लिए तैयार किया होगा। लेकिन यह क्या इस बार भी गेठी अपनेआप पनप गयी। यानी थोड़ी सी जड़ गमले में रह गयी होगी। गेठी के अलावा इन दिनों करेले की बेल भी खूब फैल गयी है। उस पर करेले भी लगे हैं। भिंडी के तीन पौधे लगे हैं। तीनों में भिंडियां आ रही हैं। कभी दो तो कभी चार। दो पौधे तुलसी के हैं। कुल मिलाकर चंडीगढ़ के जिस मकान में मैं किराये में रहता हूं, वहां गमले में वसंत आया हुआ है। सात साल हो गये इसी मकान में हूं। मकान मालिक राजेंद्र मोहन शर्मा जी बेहद अच्छे स्वभाव के हैं। बच्चों ने कई ख्वाब संजोये हैं आने वाले समय के लिए, देखना होगा उन ख्वाबों में वसंत बहार कब तक आती है।  

Thursday, July 23, 2020

बहादुर मां और साहसी पड़ोसियों को सलाम

केवल तिवारी

एक मुद्दत से मेरी मां सो नहीं पायी
मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है।

मां को समर्पित यह मशहूर शेर आज जैसे मौजूं लगता है। मां ममतामयी होती है। मां साहसी होती है। बच्चे पर आंच आये तो वह जान की भी परवाह नहीं करती। ऐसा ही हुआ दिल्ली के शकरपुर इलाके में। पूरी कहानी से पहले मैं उस मां को सलाम करता हूं। और उन पड़ोसियों को भी, जो मदद की गुहार सुनते ही जैसी अवस्था में थे, वैसे ही दौड़ पड़े। वर्ना आज कहां कोई किसी की मदद के लिए दौड़ता है। खासतौर पर दिल्ली में तो कई बार ऐसे किस्से सामने आये हैं कि लोग तमाशबीन तो खूब बने, लेकिन आगे आकर मदद की बात तो बस फिल्मों में ही देखते थे।
सीसीटीवी फुटेज।


खैर, अब आते हैं पूरे मामले पर। दिल्ली के शकरपुर इलाके में। यहां दो बाइक सवार बदमाश आये। उनमें से एक स्टार्ट बाइक पर बैठा रहा। दूसरा किसी के घर में घुसा। चार साल की बच्ची को उठाया और स्टार्ट बाइक के पीछे बैठने ही वाला था कि बच्ची की मां तेजी से घर से निकली और बदमाशों से भिड़ गयी। साथ ही शोर मचाती रही। मां की हिम्मत देख बच्ची को उठाने वाला शख्स तेजी से बाइक छोड़कर आगे भाग गया। थोड़ी दूर जाकर वह अपने बैग में कुछ तलाशने लगा। शायद हथियार निकालने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच शोर सुनकर दो-तीन लोग निकले। इन सभी लोगों को सलाम कि वे मदद की गुहार सुनते ही दौड़े आये। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो जिस अवस्था में था उसी अवस्था में दौड़ आया। एक व्यक्ति कच्छे में ही था। हो सकता है वह नहाने के लिए जा रहा हो। या हो सकता है सोकर उठा हो। जो भी हो, उसने परवाह नहीं की और दौड़ पड़ा बदमाश के पीछे। तभी दूसरी तरफ भी दो-तीन लोग निकल आये और बदमाशों को घेर लिया। बदमाश डर के मारे बाइक वहीं पर छोड़ भाग गये। इस बीच, एक बदमाश को चोटें भी आयीं। बदमाश का पीछा करना वाकई खतरे से खाली नहीं था। क्योंकि बाद में पता चला कि उनके पास हथियार भी थे। लेकिन लोगों ने हौसला दिखाया। बाद में इसी बाइक के बलबूते पुलिस पूरी साजिश का पर्दाफाश कर पायी।
सगे चाचा ने रची थी साजिश
पुलिस के मुताबिक बाइक के नंबर प्लेट से उसके मालिक का पता चला। तय पते पर गये तो उसने कहा कि यह साजिश बच्ची के सगे चाचा ने ही रची थी। वह बच्ची के बदले फिरौती लेना चाह रहा था। यह सुनकर मन और द्रवित हो गया और उस बात की एक बार फिर ताकीद हुई कि अपराध करने वाले ज्यादातर तो अपने ही इर्द-गिर्द के लोग होते हैं। एक बार क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से कहा गया था कि बच्चियों से कई तरह के अपराध में ज्यादातर मामले अपनों से ही होते हैं। इसी के बाद यह बात भी कही गयी कि बच्चों को बेड टच और गुड टच के बारे में समझायें। इसका एक पहलू था कि बच्चियों को चौकन्ना बनाया जाये, दूसरा दुखद पहलू यह भी रहा कि भरोसे का रिश्ता धीरे-धीरे कम होता गया।
दिल्ली में मदद को कम ही लोग आते हैं
मैंने दिल्ली के जीवन में करीब 17 साल बिताये हैं। ब्लू लाइन बसों की खूब सवारी की है। उन दिनों बसों में जेब काटने की बहुत वारदात होती थीं। कई लोगों को पता होता था कि जेब कतरों का गैंग बस में घुस चुका है, लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं था। एक बार मैंने एक सज्जन से धीरे से कहा कि अपनी जेब का ध्यान रखना, जेब कतरे घूम रहे हैं, लेकिन वह व्यक्ति जोर से चिल्ला उठा, 'जेब कतरे कहां हैं।' तभी एक जेब कतरा मेरे पास आया, बोला-बहुत सयाना बनता है, तेरे मुंह पर ब्लेड ऐसा मारूंगा कि आइंदा भूल जाएगा। सच मानिये मैं कई हफ्तों तक उस रूट की बस में गया ही नहीं। धीरे-धीरे दिल्लीवाला जैसा बनता चला गया। बाद में ऑफिस की कैब मिली तो आते-जाते सड़क हादसों में कई लोगों की मदद अन्य मित्रों के साथ की। मैं देखता था लोग सड़क पर दुर्घटना देखने के बावजूद निकल पड़ते थे। हम लोग करीब 20 लोगों को अलग-अलग समय पर अस्पताल ले गये। कई बार पुलिस के बेजा सवालों से भी दो-चार हुआ। खैर शकरपुर की इस घटना से जहां स्तब्ध हूं, वहीं खुशी है कि कुछ लोग मदद को तुरंत आगे आये तो। उस मां को तो बड़ा सैल्यूट है। दिल्लीवालों को भी। नहीं तो एक आम धारणा तो ऐसी थी कि-

इस वक्त कौन जाए वहां धुआं देखने
आग कहां लगी, कल अखबार में पढ़ लेंगे।