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Thursday, May 28, 2026

उनको ये रंज था कि शोहरत नहीं मिली जमाने से... बशीर बद्र साहब को नमन

केवल तिवारी

बशीर बद्र साहब को नमन। उनका जिक्र अपने कई ब्लॉग में भी मैंने पहले किया है। आज पुराना दौर याद आया। असल में वह दौर था जब हम अनेक मित्रों की बातें शेर-ओ-शायरी में होती थी। पुस्तक मेलों से उनकी रचनाओं की किताबें तो जरूर खरीदीं जातीं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निधन के बाद उनके एक शेर को अक्सर हम लोग कहते थे, जिसके बोले थे-

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नये मिजाज का शहर जरा फासले से मिला करो। 

जब बातें होती थीं तो उनके एक इंटरव्यू का भी जिक्र होता था। एक जगह उन्होंने कहा था कि आज शोहरत और दौलत उम्र के ऐसे पड़ाव में मिली जब उसका बहुत ज्यादा आनंद नहीं लिया जा सकता है। बताया जाता है कि जब बद्र साहब 65 पार के हुए उसके बाद यकायक उनकी शेरो-शायरियां खूब प्रचलित होने लगीं। 

इंटरने पर मिली जानकारी के अनुसार बद्र साहब का पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। कहा जाता है कि उर्दू में पढ़ाई करने वाले बशीर साहब की कई रचनाएं मेरठ दंगों में नष्ट हो गयीं। इस वाकये ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। वर्ष 1935 में जन्मे बद्र साहब को 1999 में भा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इसी साल उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। शायरियों में आम प्रचलन की भाषा के इस्तेमाल के लिए जाने जाने वाले बशीर साहब की गजलें युवाओं की जुबां पर होती थीं। वर्ष 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के दौरान उन्होंने दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हों जैसी कालजई पंक्तियां लिखी थीं। कहा जाता है कि मीर तकी मीर की गजलों की तरह बद्र की गजलों में भी अत्यधिक समकालीन उर्दू थी लेकिन उसे आसानी से समझा जा सकता था इसलिए लोग इसे सराहते भी थे। उनकी कुछ उत्कृष्ट कृतियों ने व्यथित प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में काम किया और जीवन के रहस्यों को भी व्यक्त किया। बशीर साहब की 69 गजलों का संग्रह 'आस' को उनकी चर्चित कृतियों में गिना जाता है। उनका एक अन्य संग्रह, जिसका शीर्षक 'कुल्लियते बशीर बद्र' है, पाकिस्तान में प्रकाशित हो चुका है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने सात साल की कम उम्र में कविता लिखना शुरू कर दिया था। बद्र साहब को समर्पित एक वेबसाइट के मुताबिक वह अपने कई गीतों में उर्दू की कोमलता को अंग्रेजी उच्चारण में घोल देने में अग्रणी थे। जानकारों के मुताबिक बशीर बद्र की गजलों में शब्द व संवेदना की सतह पर ताजगी, काव्यात्मकता और सौंदर्य हुआ करते थे, जो उन्हें दूसरे शायरों से अलग करती थी। उन्होंने उर्दू में सात से अधिक कविता संग्रह और हिंदी में एक कविता संग्रह प्रकाशित किया। उनके प्रमुख गजल संग्रहों में इकाई, इमेज, आमद, आस, आसमान और आहट शामिल हैं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनके चाहने वाले उन्हें अमेरिका, दुबई, कतर और पाकिस्तान सहित दुनिया भर के विभिन्न मुल्कों में आमंत्रित किया करते थे। 

बशीर साहब की कुछ शायरियों का जिक्र तो अक्सर किया जाता है। उनमें से कुछ इस तरह से हैं- 


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो। न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए


दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों


न जी भर के देखा न कुछ बात की। बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की


हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा


यहां लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं, मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे। 


तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा। मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा। 


मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला। अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला


इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी। लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे


पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला। मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा


मैं बोलता हूं तो इल्ज़ाम है बग़ावत का। मैं चुप रहूं तो बड़ी बेबसी सी होती है


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में। तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है। तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा


काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के। दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया


शबनम के आंसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ। आंखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ


है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है। कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है


बशीर बद्र साहब का बृहस्पतिवार 28 मई, 2026 को 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनको नमन।

साहित्य और लेखन की बात : बैठक, तीन दशक से सिर्फ चर्चा... अब चंडीगढ़ में देखी भव्य शुरुआत @ Writer's Forum

केवल तिवारी

चंडीगढ़ आए हुए मुझे धीरे-धीरे डेढ़ दशक होने को है। दैनिक ट्रिब्यून में आकर यहां भी डेस्क की नौकरी के साथ-साथ कुछ-कुछ कवरेज के लिए भेजा जाता रहा। इस दौरान रचनाधर्मिता की बातें भी होतीं। कभी ऑफिस में और कभी ऑफिस के बाहर। बातों-बातों में कुछ लोगों ने अपनी रचनाएं पढ़ने को दीं। कुछ ने थोड़ी-बहुत मेरी भी सुन लीं। फिर मैंने बताया कि वर्ष 2000 के आसपास हम कुछ साहित्य प्रेमियों ने गाजियाबाद में 'बैठक' की शुरुआत की थी। हम लोग आपस में पूछते थे कि अगली बैठक किसके घर है। वहां अनेक वरिष्ठ लेखक आते थे। एक-दो बार मुझे भी अपनी कहानी सुनाने का मौका मिला। मैंने उस वक्त आइडिया दिया कि इसे ऑनलाइन मंच पर भी लाया जाये। मैंने शुरुआत भी की। लेकिन देखा कि एक बार मेरी कहानी पर जब कुछ साथियों ने आलोचनात्मक टिप्पणी की तो एक-दो वरिष्ठ लोगों ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। उनका इनकार मुझे दुत्कार जैसा लगा। मेरा कोई ऐसा बैकग्राउंड नहीं। कोई गॉड फादर नहीं। मैंने उन्हीं लोगों में से अनेक को सुना है एक युवा लेखक की बेहद तारीफ करते हुए। ये लोग तारीफ में भी बैकग्राउंड या भविष्य की संभावनाएं देखते थे। मुझे वह इनकार चुभ गया। मैं धीरे-धीरे से बैठक से दूर हो गया। कुछ दिनों बाद पता चला कि बैठक ज्यादा नहीं चल पाई। बैठक आगे न बढ़ पाने का तो मुझे बेहद दुख हुआ, लेकिन यह विचार मुझे बहुत पसंद आया। चंडीगढ़ आकर यहां भी अनेक लोगों से चर्चा की। उनमें से कुछ बहुत बुजुर्ग हो चुके हैं। एक महिला साहित्यानुरागी की तो असमय मौत ही हो गयी। यहां मैंने भी यह राय रखी। अनेक लोगों ने सहमति भी जताई। मैंने यह भी आइडिया दिया कि अगर इसे 'मॉनीटरी' कर दें। यानी आर्थिकी से जोड़ दें तो बहुत अच्छा रहेगा। जैसे हर माह सौ, दो सौ रुपये भी जमा करते रहें। और जरूरी हो तो उस पैसे को आपस में ही लोन की तरह बांटे। ब्याज फिक्स कर दें। साल के अंत में उस ब्याज से या तो कोई कार्यक्रम कर लें या आपस में बांट लें। ऐसा करने से जुड़ने का एक और कारण बन जाएगा और आर्थिकी कई बार बड़ा काम कर जाती है। कुछ लोगों ने कहा कि हर महीने प्रेस क्लब मिल लिया करेंगे। खैर... बातें होती रहीं। अनेक लोग सेवानिवृत्त हो गये। जीवन की आपाधापी में सब खो गये। मैं भी। जो थोड़ा बहुत लेखन का कीड़ा था उसे अपने ब्लॉग ktkikanw-kanw.blogspot.com पर लिखता रहा। थोड़ा बहुत मौका मुझे अखबार में लिखने का भी मिलता रहा। जीवन चलता रहा। इस बीच 27 मई, 2026 को ट्रिब्यून चौक के पास नोवोटेल (NOVOTEL Hotel)में एक कार्यक्रम कवर करने के लिए संपादक जी द्वारा भेजा गया। वहां जाकर देखा कि 'राइटर्स फोरम' की जो भव्य और दिव्य शुरुआत इस सिटी ब्यूटीफुल में हो रही है, वह तो करीब तीन दशक पुराना हमारे जैसे लोगों का भी आइडिया था। खैर इस कार्यक्रम में गया तो उनकी बातें अच्छी लगीं। बातें तो हमेशा ऐसी अच्छी ही होती हैं। वह धरातल पर कितना उतर पाएगा, यह देखने वाली बात है। इस कार्यक्रम की पीआर एजेंसी द्वारा भेजी गयी प्रेस विज्ञप्ति और फिर मेरे द्वारा लिखी गयी खबर को नीचे हू-ब-हू पेस्ट करूंगा। साथ में साभार : dainiktribuneonline.com का लिंक भी। 

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अच्छी लगी हिंदी की बात

जैसा कि होता है, Elite Class हमेशा अंग्रेजी से अपनी शुरुआत करता है। यहां भी वैसा ही दिखा। फिर एक नयी शुरुआत देखी कि हर किसी से अपना परिचय देने को कहा गया। मेरी भी बारी आई। मैंने थोड़ा आश्चर्य जताते हुए एक लाइन में अपना परिचय दिया। फिर सवाल-जवाबों का दौर चला। बात जब रचना सुनाने की आई तो ज्यादातर लोगों ने हिंदी में ही सुनाई। एक दो लाइन का बेहद भावुक शेर पंजाबी में भी सुनाई दिया। फिर तो हिंदी में ही चल पड़ा सारा मंजर। अनेक भाषाओं का आना बहुत अच्छी बात है। लेकिन मां भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त करना शायद ज्यादा आसान होता है। अंग्रेजी को फैशन के तहत अपनाना थोड़ा अजीब दिखता है। यहां पर एक बहुत पुराना किस्सा याद आ रहा है। एक वरिष्ठ पत्रकार का बेटा हिंदुस्तान में एक बार मिला। उससे हम लोगों ने ऐसे भी पूछ लिया कि क्या तुम भी पत्रकारिता में आओगे। उसने कहा, हो सकता है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में तो कतई नहीं। बाद में मेरे एक सीनियर बोले, देखो हिंदी पत्रकारिता में इनके पिता का इतना नाम है, उसी से परिवार चल रहा है, लेकिन ये सज्जन मना कर रहे हैं। आज वह बच्चा काफी बड़ा हो गया है और मीडिया में ही है, हिंदी मीडिया में। रचनाएं भी लिखता है हिंदी में। खैर... आप जितनी भाषाएं जानते हैं ये आपकी योग्यता है। कहीं भी जाएं जिस भाषा में सहज हों, उसे अपनाएं। 


लेखक मंच की वह योजना

इस कार्यक्रम की कवरेज के दौरान मुझे अपने समय के वरिष्ठ साहित्यकार रहे भीमसेन त्यागी जी की याद आई। एक बार आकाशवाणी के कार्यक्रम में एक बातचीत कार्यक्रम के लिए टॉलस्टॉय के 'वार एंड पीस' पर उनसे कुछ जानने के लिए गया था। माध्यम बने मित्र अनुराग। अनुराग भी साहित्यानुरागी हैं। अपना यूट्यूब चैनल भी चलाते हैं। तब त्यागी जी ने कहा था कि मेरा सपना है लेखक मंच बनाने का। मंच ही नहीं, लेखक गांव बनाने का। जहां रचनाशील लोग अपनी कलम से बेहतरीन रचनाएं सृजित करें। बाद में उन्होंने लेखक मंच के नाम से पत्रिका भी निकाली। मेरे भी कुछ संस्मरण उसमें छपे। बाद में त्यागी जी दुनिया से रुखसत हो गये। आर्थिक तंगी आई। वह सपना पूरा नहीं हो पाया, लेकिन अनुराग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसे जिंदा रखे हुए हैं। अभी तो कुछ बाध्यताएं हैं, लेकिन भविष्य में उसके साथ पूरी तरह जुड़ुंगा। 


कुछ सरकारें भी कर रही हैं ऐसा... लेकिन

लेखकों के लिए विशेष ग्राम यानी लेखक ग्राम की जिस सपने की बात मैंने ऊपर की थी, उसकी एक शुरुआत उत्तराखंड में हुई है, लेकिन उसमें भी अनेक किंतु-परंतु हैं। सवाल चाहे जो भी हों, लेकिन शुरुआत तो हुई है। बताया जा रहा है कि दक्षिण के कुछ राज्य भी ऐसा करने की योजना में हैं। कुछ राज्य बेहतरीन साहित्य को आंचलिक भाषा में अनुवाद कराने की भी योजना को सिरे चढ़ाते दिख रहे हैं। हालांकि अनुवाद का काफी काम अब कृत्रिम मेधा यानी artificial inteligence AI के जरिये होने लगा है लेकिन साहित्य की आत्मा को बचाये रखने के लिए इसे साहित्यकारों के जरिये ही करवाया जाना चाहिए। 

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अब वह खबर जो Writer's Forum की तरफ से बतौर रिलीज भेजी गयी। उसके बाद मेरी खबर साभार : Dainik Tribune और कुछ फोटो। 

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प्रेस विज्ञप्ति

राइटर्स फोरम (डब्ल्यूएफ) का अनावरण: साहित्यिक अभिव्यक्ति और समावेशी रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देने का उद्देश्य

मौलिकता, लोकतांत्रिक भागीदारी और सार्थक साहित्यिक जुड़ाव को प्रोत्साहित करने के लिए नया मंच

• संस्थापक और मुख्य सदस्यों की परिकल्पना — एक जीवंत समुदाय जहाँ हर लेखक को अपनी आवाज और अपनापन मिले

चंडीगढ़, 27 मई 2026: एक नए साहित्यिक समूह राइटर्स फोरम (डब्ल्यूएफ) का औपचारिक शुभारंभ चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र और उससे आगे के साहित्यिक समुदाय के लिए किया गया। इसका उद्देश्य लेखकों, कवियों, आलोचकों और साहित्य-प्रेमियों के लिए एक समावेशी, बौद्धिक रूप से समृद्ध और लोकतांत्रिक मंच तैयार करना है।

जहाँ शब्दों को अपनी आवाज़ मिले, जहाँ लेखक अपने समुदाय से मिलें’ — इस मूल विचार पर स्थापित यह मंच लोकप्रियता या सामाजिक प्रभाव की सीमाओं से परे जाकर प्रामाणिक साहित्यिक अभिव्यक्ति और सार्थक रचनात्मक सहभागिता को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

यह मंच प्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका सुधा अग्रवाल के नेतृत्व में स्थापित किया गया है। प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने कहा कि इस फोरम की स्थापना ऐसे साहित्यिक वातावरण की आवश्यकता से हुई, जहाँ लेखकों का सम्मान उनके विचारों की ईमानदारी और अभिव्यक्ति की शक्ति के आधार पर हो, न कि बाहरी मान्यता या सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर।

उल्लेखनीय है कि सुधा अग्रवाल का कविता-संग्रह हिरायथ वर्ष 2023 में टैगोर थिएटर में लॉन्च किया गया था। उनकी कविता-पुस्तक पर आधारित एक पिक्चर सहगल हाउस को द नैरेटर्स आर्ट सोसाइटी द्वारा रूपांतरित भी किया गया।

उन्होंने कहा कि राइटर्स फोरम केवल एक और साहित्यिक समूह नहीं है। यह एक गंभीर प्रयास है — ऐसा रचनात्मक समुदाय बनाने का, जहाँ लेखक निर्भय होकर स्वयं को व्यक्त कर सकें, सार्थक भागीदारी निभा सकें और संवाद तथा पारस्परिक सम्मान के माध्यम से सामूहिक रूप से विकसित हो सकें।

फोरम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह मंच उभरते लेखकों को आत्मविश्वास और गरिमा के साथ आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करेगा, बिना किसी भय या दबाव के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करेगा, मौलिकता और वास्तविक प्रतिभा को संरक्षित करेगा, प्रत्येक सदस्य को नेतृत्व के अवसर देगा और गंभीर सुनवाई तथा सार्थक संवाद के माध्यम से सम्मानजनक साहित्यिक सहभागिता सुनिश्चित करेगा।

फोरम का उद्देश्य लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर कार्य करना भी है, जहाँ निर्णय सामूहिक रूप से बहुमत की सहमति से लिए जाएँगे ताकि पारदर्शिता और समान भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

प्रख्यात लेखिका, साहित्यिक आलोचक और पूर्व अंग्रेज़ी के प्रोफेसर डॉ. मंजीत कौर ने कहा कि आज के तेज़ी से बदलते साहित्यिक परिवेश में ऐसे मंचों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है । राइटर्स फोरम अर्थपूर्ण साहित्यिक संवादों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेगा।”यह उल्लेखनीय है कि डॉ. कौर को लिटरेरी एक्सीलेंस अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है तथा उन्हें वर्ष 2018 में दुबई में अंतरराष्ट्रीय पहचान भी प्राप्त हुई थी।कवयित्री, शिक्षाविद् और नेशनल डेंटल कॉलेज, डेराबस्सी में प्रोस्थोडोंटिक्स विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अनु गिरधर ने कहा कि कोई भी साहित्यिक मंच तभी सार्थक बनता है जब वह लोगों को अपनी रचनात्मक आवाज़ खोजने की प्रेरणा दे। यह पहल ऐसा ही वातावरण तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है ।डॉ. गिरधर पाँच कविता पुस्तकों की लेखिका हैं और उन्हें वर्ष 2022 में रवीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है।वर्डस देट विस्पर की लेखिका तथा अमैरा मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में डायरेक्टर (ऑपरेशंस) सीमा शर्मा ने कहा कि साहित्य वहीं फलता-फूलता है जहाँ संवेदनशीलता, गंभीर सुनवाई और सम्मानजनक संवाद को पोषित किया जाता है। हमारा प्रयास ऐसा मंच तैयार करना है जहाँ लेखक केवल अपनी रचनाएँ साझा न करें, बल्कि एक-दूसरे की यात्राओं और दृष्टिकोणों से वास्तविक रूप से जुड़ सकें प्रेम, विरह और मानवीय भावनाओं की काव्यात्मक अभिव्यक्तियों के लिए प्रसिद्ध चंडीगढ़ के कवि और उपन्यासकार संजीव बंसल ने कहा कि “साहित्य मौन को भाषा देता है और मानवीय संवेदनशीलता को गरिमा प्रदान करता है।” उनके अनुसार दृश्यता और मान्यता की दौड़ में मौलिकता अक्सर दब जाती है। राइटर्स फोरम लेखकों को यह याद दिलाने का प्रयास करेगा कि स्थायी साहित्य ईमानदारी, गहराई और जीवन के वास्तविक अनुभवों से जन्म लेता है। फोरम की योजना नियमित साहित्यिक सत्रों, कविता-पाठ, चर्चाओं, कार्यशालाओं और संवादात्मक कार्यक्रमों के आयोजन की है, जिनका उद्देश्य क्षेत्र और उससे बाहर के लेखकों के बीच रचनात्मकता, सहयोग और बौद्धिक विकास को प्रोत्साहित करना होगा।

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और जो मैंने खबर छापी  साभार दैनिक ट्रिब्यून 

आभासी और जुगाड़ू दुनिया के तिलिस्म से मौलिकता को बचाने की कवायद

चंडीगढ़ में 'राइटर्स फोरम' की औपचारिक शुरुआत

केवल तिवारी/ट्रिन्यू

चंडीगढ़, 27 मई हिंदी में रचनाशीलता की बात। पंजाबी, अंग्रेजी और उर्दू साहित्य की बात। बात पुराने 'कॉफी हाउस चर्चा' की, जहां बैठकर लेखक लोग कहानी, कविता और अन्य विधाओं की रचनाओं पर समालोचनात्मक टिप्पणियां कर सकें। बात आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के दौर में मौलिकता की। बात प्रोत्साहन की भी। बात 'जुगाड़ू' दुनिया से इतर मेहनत की। ये सारी बातें हुईं चंडीगढ़ में एक नये साहित्यिक समूह 'राइटर्स फोरम' (डब्ल्यूएफ) के औपचारिक शुरुआत के मौके पर। फोरम का उद्देश्य साहित्य प्रेमियों और रचनाधर्मिता के लिए मंच प्रदान करना है। दावा है कि यह ऐसा मंच होगा जो 'घेराबंदी' से मुक्त होगा। फोरम में फिलवक्त 30 प्रतिष्ठित लोग जुड़े हैं, जो अपने विभिन्न माध्यमों से किसी भी रचनाशील व्यक्ति की कृति को हजारों लोगों तक पहुंच मुहैया कराएंगे। कवयित्री और लेखिका सुधा अग्रवाल के नेतृत्व में स्थापित इस फोरम की खास बात होगी कि यहां मौलिकता को ही प्राथमिकता दी जाएगी और नवोदित लेखकों की हर संभव मदद की जाएगी। सुधा का कविता संग्रह हिराएथ आ चुका है और इसका नाट्य रूपांतरण भी हो चुका है। फोरम से जुड़ीं लेखिका, आलोचक एवं अंग्रेजी की प्रोफेसर रहीं डॉ. मंजीत कौर ने कहा, 'राइटर्स फोरम अर्थपूर्ण और भावपूर्ण लेखन को सार्थक मंच देगा।' लिटरेरी एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित डॉ. कौर ने कहा कि मूल लेखन आज की जरूरत है। कवयित्री, शिक्षाविद और नेशनल डेंटल कॉलेज, डेराबस्सी में प्रोस्थोडॉन्टिस विभाग की अध्यक्ष डॉ. अनु गिरधर ने सीखने और सृजनशील बनने की जरूरत पर बल दिया। डॉ. अनु की पांच किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ख्यात कवयित्री एवं लेखिका लिली स्वर्ण ने कहा कि मौलिकता अपना स्थान स्वयं बना लेती है। 

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मासिक गोष्ठियों में मोबाइल बैन :मंचासीन फोरम सदस्यों ने कहा कि सार्थक चर्चा के लिए हम लोग मासिक गोष्ठियों में मोबाइल बैन कर देते हैं। उन्होंने कहा कि आज कुछ लोग पुरस्कारों, चर्चाओं के इर्द-गिर्द होते हैं। समय आने पर ऐसी चौकड़ी से बाहर निकलकर वास्तविक लेखकों के लिए उनका फोरम पुरजोर मेहनत करेगा। उन्होंने कहा कि फोरम से कोई भी जुड़ सकता है, बस संवेदनाओं के साथ अपनी रचनाशीलता होनी चाहिए। फोरम फिलहाल देश के विभिन्न कोनों से साहित्य प्रेमियों से जुड़ा है। आगे चलकर इसे वैश्विक बनाने की कोशिश रहेगी।


Saturday, May 16, 2026

शिव कुमार का असमय जाना... इसी सत्य को कोई न जान पाया



कभी सोचा भी नहीं था कि शिव कुमार जी के बारे में ऐसा कोई मैसेज आएगा। पेजीनेशन सेक्शन में जाता हूं तो किनारे की उस सूनी सीट को देख मन उचाट सा हो जाता है। लगता है मानो कुछ देर बाद वही मुस्कुराता चेहरा एक बार फिर दिख जाएगा। बुधवार 6 मई की रात करीब साढ़े ग्यारह बजे रोज की तरह मैं घर जाते वक्त उनसे मिलकर गया। मेरा रुटीन है कि जाते वक्त एक बार पेजीनेशन सेक्शन के साथियों से पूछ लूं कि एडिशन सही से रिलीज हो गए या नहीं। कई बार कोई विज्ञापन अटका होता है। ऐसे विज्ञापन के न आ पाने पर कुछ बैकअप रखना पड़ता है। वहां से क्लीयरेंस लेकर ही घर की तरफ कदम बढ़ाता हूं। बुधवार की रात अक्सर एक मजाक होता था आज तो बुधवार है। असल में चंडीगढ़ प्रेस क्लब में बुधवार को डेस्क नाइट होती है। यानी देर रात तक खाना-पीना। उस दिन भी यही मजाक हुआ कि चलें आज तो बुधवार है। हंसी-मजाक के साथ ही यह बात तय हुई कि अगले बुधवार को तो चलना ही है। लेकिन शिव कुमार जी के लिए अगला बुधवार आया ही नहीं। सात मई की सुबह सलिल जी के मैसेज से पता चला कि उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हो गया है। सलिल जी ने अपने स्टाफ से छुट्टी कैंसल करने का आग्रह किया और खुद भी वह छुट्टी पर चल रहे थे और दो दिन पहले एमरजेंसी में लौटकर आए। शिव कुमार जी के छोटे भाई से साथी सूरज के फोन से बात की तो उन्होंने बताया कि हालत नाजुक है। फोन पर शिव जी का बेटा साहिल रोने लगा। हालात यहां तक पहुंच गए कि उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया। डॉक्टर लगे थे। मैं इधर प्रार्थना कर रहा था कि भगवान कोई तो चमत्कार करो। मेरी पत्नी भी उनसे परिचित थी, वह बहुत दुखी हुई। साथ में प्रार्थना करने लगी। तीसरे दिन मैं सुबह-सुबह अस्पताल पहुंचा, इस उम्मीद में कि शायद कोई कहेगा कि थोड़ा सा सुधार हुआ है, लेकिन वहां तो अनहोनी हो चुकी थी। उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल था। व्याकुल साहिल हाथ में एक कागज लिए इधर-उधर घूमते हुए बस रोए जा रहा था। क्या कहता मैं? फिर भी कोशिश की कुछ समझाने की। साहित के कंधे पर हाथ रखा। उससे कहा कि संभाले खुद को। उधर शिव जी के भाई अरविंद पुरजोर कोशिश के बावजूद अपने आसुओं को नहीं रोक पा रहे थे। ऐसे मंजर में, मेरा क्या हाल होता। मेरे भी आंसू निकल आए। पास में सीढ़ियों में ऑफिस के कुछ लोग खड़े थे। थोड़ी देर में मित्र सलिल और नरेंद्र भी आ गए। उधर, शिव कुमार जी की पत्नी बेहोशी जैसी हालत में पहुंच गयीं। एक व्यक्ति उन्हें सांत्वना दे रहे थे। मैंने पूछा आप कौन हैं, बोले- मैं इनका भतीजा हूं। फिर हम लोगों ने कहा कि आप इन्हें घर ले जाएं। थोड़ी देर में शिव कुमार जी की बेटी मुंबई से पहुंच गयी। छोटी सी बच्ची को लेकर। हृदय विदारक दृश्य था वह। बिटिया को आईसीयू में पिता का मुंह देखने जाना था। छोटी सी बच्ची रो रही थी। उसे मामा यानी साहिल ने पकड़ा और उसे चुप कराते-कराते वह खुद भी रो पड़ा। हे ईश्वर... 
बड़ी यादें हैं शिव कुमार जी के साथ। वर्ष 2013 में जब मैंने ट्रिब्यून ज्वाइन किया तो वह भी उन कुछ लोगों में शामिल थे जिनसे अपनापन मिला। दो-चार बार घर भी आना-जाना हुआ। अभी कुछ साल पहले ही उनके माता-पिता का निधन हुआ था। साहिल को अपने दादा-दादी से बड़ा स्नेह था। वह बहुत रोया था। शिव कुमार जी ने मेरे लिए नये इस संस्थान के बारे में बहुत कुछ बताया। पेजीनेशन के दौरान कभी-कबार बहस-मुबाहिसें भी हुईं। हम लोगों की घनिष्ठता थी और भविष्य को लेकर बड़ी बातें करते थे। कभी यह भी कि एक-दूसरे के गांव जाएंगे। सारी बातें रह गयीं। शिव कुमार जी आपने बहुत जल्दी कर दी जाने की। उस जहां में खुश रहना। अपने परिवार के लिए पितर बन चुके हो, उन पर आशीर्वाद बनाए रखना...

Monday, May 11, 2026

बच्चे, परीक्षाएं, दबाव की बात और पैरेंटिंग

केवल तिवारी

पिछले दिनों सीबीएसई, आईसीएसई समेत कई बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आये। सीबीएसई के परिणाम के बारे में इस बार कहा जा रहा है कि नंबर बहुत उदारता से दिये गये। ऐसा दिखा भी। पास प्रतिशत तो अच्छा रहा ही, 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वालों की संख्या भी खूब रही। मेरा छोटा बेटा भी दसवीं में था। उसकी मेहनत को देखकर लग रहा था कि वह नंबर ठीकठाक ले आएगा। वह मुझसे कहता था कि 96 प्रतिशत तक हर हाल में आ जाएंगे। लगभग इतने ही नंबर उसके बड़े भाई के भी करीब 6 साल पहले आए थे। मैंने तो अंकों की इस बात को ज्यादा प्रचारित नहीं किया, लेकिन चूंकि बाजार की महिमा निराली है इसलिए परिवार के लोगों से घूमते हुए मामला प्रचारित हो ही गया। बेटा इससे प्रसन्न नहीं था। बच्चा है, इसलिए भी शायद बधाइयां स्वीकार करने में संकोच कर रहा था। एक दिन तो कहने लगा, पापा कुछ ज्यादा ही नहीं हो रहा है। खैर...। मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी बात थी। मन को संतोष था कि हमने कभी बच्चों पर कोई प्रेशर नहीं डाला। दोनों बच्चों ने अच्छा ही किया है। बड़ा आईआईटीयन है, छोटा भी मेहनत खूब कर रहा है बाकी किस्मत की बात। इस बीच मित्र राजेश डोबरियाल की फेसबुक पोस्ट में एक कमेंट लिखते-लिखते धवल की बात लिख ही बैठा। चूंकि उसकी बातें ज्यादातर समय मजाकिया या व्यंग्यात्मक ही होती हैं। उसने मेरे कमेंट के जवाब में लिखा कि तुम्हें गुस्सा नहीं आया कि 6 नंबर कम क्यों आये। इससे पहले भी उसने एक बार मयूर पब्लिक स्कूल में जब कुक्कू ने बहुत बेहतरीन प्रदर्शन किया था तो पूछा था कि तुम स्कूल की कवरेज करते हो, इसका प्रतिफल तो नहीं दिया जा रहा है। मैं मुस्कुराकर रह गया। इस बार भी मैंने जवाब में लिखा कि नहीं, गुस्सा नहीं हुआ। राहत मिली कि बेटे की 12-12 घंटे की मेहनत रंग लाई। सच में वह कई घंटे तक पढ़ता था। उसके अलवा स्कूल और कोचिंग। साथ में सैंपल पेपर। सैंपल पेपर हल करने के बाद सीबीएसई की आंसर शीट निकालकर मुझे दे देता और कहता चेक करो। 

इन बातों में एक महत्वपूर्ण बात

सच में नंबर का यह खेल है बहुत अजीबोगरीब। इतने भर-भर के नंबर कहां आते हैं। लेकिन मैंने देखा है कि सीबीएसई या कुछ अन्य बोर्ड भी प्रश्नपत्र का पैटर्न ऐसा बनाते हैं कि ठीकठाक पढ़ाई करने वाले से लेकर औसत स्तर तक के बच्चे पास हो ही जाते हैं। एकदम गये गुजरे बच्चे रह जाते हैं। गये गुजरे से मेरा तात्पर्य पढ़ाई में थोड़ा कम। कुछ बच्चे खेलों में बहुत अच्छे होते हैं। कुछ किसी अन्य चीज में। लेकिन मेरा अनुभव और आंखों देखा मंजर कहता है कि वाकई कुछ बच्चे तो कुछ भी नहीं करते। दिन-रात घूमना, अड्डेबाजी में रहना। कई बार ऐसे बच्चे धवल को भी बुलाते थे, लेकिन हमारे घर से परमिशन कुछ समय के लिए थी। शाम को एक-दो घंटे। यह अनुशासन भावना का होता था। मैं तो शाम को ऑफिस में ही होता हूं। इसी बीच, मुझे याद आया द ट्रिब्यून स्कूल में एक बार अभिभावकों के लिए चले सेशन का। वहां स्कूल कमेटी चेयरपर्सन चांद नेहरू ने कहा कि बच्चों के लालन पालन में तीन बातों का ध्यान रखना जरूरी है। लाडवत, दंडवत और मित्रवत एक उम्र तक यानी पांच-सात साल की उम्र तक बच्चों से खूब लाड़-प्यार करना चाहिए। फिर थोड़ा डांटना-डपटना जरूरी है उसके बाद जब वह बड़ा हो जाये तो उसके साथ मित्रवत रहना जरूरी है। अब बच्चों पर दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए की जो थ्योरी है, वह मुझे ठीक से समझ नहीं आती। दबाव नहीं बनाने का मतलब यह है कि बच्चा जो करे, जहां जाये, उसे करने देना चाहिए। या यह है कि वह पढ़ाई के मामले में अपनी च्वाइस बता रहा है, उस पर अपनी पसंद-नापसंद नहीं थोपनी चाहिए। दूसरी वाली बात तो बिल्कुल ठीक है। लेकिन उसे छूट देनी चाहिए वाली बात मेरी समझ से परे है। किशोरावस्था की उम्र ऐसी है कि बच्चों के साथ प्यार और डांट के मिले-जुले रूप से पेश आना चाहिए। आज तो बच्चों के लिए बहुत सारे करिअर ऑप्शन हैं। वह उनमें से चुनाव कर सकता है। अच्छे संस्कार देना और अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। पिछले दिनों एक मित्र ने सही बात कही कि पैरेंटिंग आज के जमाने में ज्यादा टफ हो गयी है। पहले तो एकतरफा होता था। एकतरफा से याद आया कि बच्चों में इस गुण को भी विकसित करने की जरूरत है कि वह सुनना सीखें। तुरंत जवाब देने की आदत अच्छी नहीं। जीवन पथ में तो अभी कितनी परीक्षाएं देनी हैं बच्चो। सातवीं आठवीं तक तो खूब खेलना-कूदना भी जरूरी है। उसके बाद थोड़ा समय कम मिलता है और धीरे-धीरे तो फिर करिअर पथ पर निकलना पड़ता है। इसलिए बच्चो, अपने लिए लक्ष्य तो निर्धारित करो ही, उसके अनुसार मेहनत करो, उसके बाद की चिंता जरूरी नहीं। कुछ न कुछ तो हासिल होगा ही क्योंकि इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं। 

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और ट्रिब्यून स्कूल में मिले सम्मान

आलस कह लीजिए या काम का ऐसा प्रेशर कि इस ब्लॉग को थोड़ा-थोड़ा लिख ही रहा था कि एक दिन धवल के स्कूल (The Tribune School)से फोन आया कि 9 मई की शाम यानी Mother's Day की पूर्व संध्या पर आपने स्कूल आना है। STAR EXCELLENCE समारोह है। आप विशिष्ठ अतिथि हैं और आपने थोड़ा बोलना भी है। मुख्य अतिथि The Tribune Trust के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी होंगे, साथ में चांद नेहरू मैडम, The Tribune की प्रधान संपादक ज्योति मल्होत्रा आदि। मैंने खुशी-खुशी सहमति दी। हम लोग गये। धवल को भी उनकी मैडम ने अलग से कहा था कि वह भी कुछ बोलने के लिए तैयार करे। उसने बेहतरीन पीस तैयार कर लिया। मैं तैयार करके तो कुछ नहीं ले गया। हां, थोड़ा-बहुत बोल गया। कार्यक्रम अच्छा लगा। प्रिंसिपल रानी पोद्दार मैडम का आभारी हूं। उन्होंने इतना सम्मान मिला। कुछ वर्ष पहले बड़े बेटे कार्तिक की वजह से स्कूल में खूब जाना गया और अब धवल की वजह से। दोनों बच्चे स्कूल में हेड बॉय रहे। ईश्वर इन्हें खुश रखे। चूंकि यह ब्लॉग अंकों पर था। इसलिए मैंने अपने भाषण में भी इसी पर फोकस रखा। कहा कि जिनके कम नंबर आये हैं, वे निराश कतई न हों। जहां और भी हैं नंबर के सिवा। कोई खेलों में तरक्की करे और कोई किसी अन्य में। यह बात सभी को पसंद आई। वहीं हमारे ट्रस्टी साहिबान सोढी साहब, उनकी पत्नी बोनी सोढी जी, चांद नेहरू जी, दीपक जी के अलावा हमारी एडिटर इन चीफ ने भी बधाई दी। अच्छा लगा। कार्यक्रम की एक-दो फोटो और उसकी कवरेज साझा कर रहा हूं।







Thursday, May 7, 2026

पंजाब के लिए भाजपाई मंसूबे : ‘सरहदी राज्य’ के नारे संग चुनावी रणनीति

केवल तिवारी

साभार दैनिक ट्रिब्यून



बंगाल जीत से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पैनी नजर अब पंजाब पर है। अकाली दल के साथ पहले भी पंजाब में सत्ता का स्वाद चख चुकी भाजपा अब यहां 'एकला चलो' की रणनीति पर काम कर रही है। बेशक पंजाब के सियासी शतरंज में शह-मात के खेल में गोट फिट करना टेढ़ी खीर है, लेकिन पश्चिम बंगाल और असम जैसे 'बॉर्डर स्टेट्स' के बाद अब वह पंजाब के लिए 'सरहदी राज्य का नारा' देने की तैयारी में है। भाजपा मुख्यालय में बंगाल-असम जीत के जश्न के दौरान भी इसकी झलक मिली। दिल्ली के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा के साथ इस जश्न में अनेक सिख शामिल हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान इन लोगों ने खूब नारे लगाए। पंजाब को लेकर भाजपा इसलिए भी उत्साहित है क्योंकि उसे यकीन है कि फिर से एकजुट हो रहे 'इंडिया' गठबंधन की एकता यहां नहीं रहेगी। इस राज्य में कांग्रेस तो अकेले लड़ेगी ही, आम आदमी पार्टी (आप) सत्ता में वापसी की अलग से पूरी कोशिश करेगी। आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल कह चुके हैं कि भाजपा के विजय रथ को पंजाब रोकेगा। अकाली दल अपनी तैयारी कर ही रहा है। कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों की भी चुनाव में भूमिका होती है। ऐसे में भाजपा बिखरे विपक्ष का फायदा उठाएगी। इसी तरह का लाभ उसे बंगाल और असम में भी मिंला है। चुनाव परिणाम के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में दिल्ली के पूर्व सीएम केजरीवाल ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए ये आखिरी विजय हैं। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि पंजाब के बाद मोदी सरकार गिर जाएगी। आप से भाजपा में गए राज्यसभा सदस्यों का जिक्र करते हुए केजरीवाल ने कहा कि मोदी सरकार ने पंजाबियों की इन सीटों को लूटा है। यहां उल्लेखनीय है कि बंगाल, असम चुनाव परिणाम के बाद विपक्ष के सभी बड़े नेता आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा ने सीटों को लूटा है या चोरी की है। पश्चिम बंगाल की निवर्तमान मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने पहली प्रतिक्रिया में आरोप लगाया कि भाजपा ने सौ सीटों की लूट की है। इसी तरह सपा प्रमुख अखिलेश यादव एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी चुनाव में सीट चोरी का आरोप लगाया है। वह मोदी के खिलाफ अक्सर 'चोरी' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। इस बीच, भाजपा नेताओं ने 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में मिली सफलता को दोहराने का भरोसा जताया है। भाजपा के रणनीतिकार सरहदी राज्य की सुरक्षा, नशा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। वैसे पंजाब के अलावा अगले साल गुजरात, गोवा, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव हैं, लेकिन भाजपा के लिए पंजाब प्रमुख है। पार्टी यहां अपना वर्चस्व बनाकर एक संदेश देने की कोशिश में है। अन्य राज्यों में भी भाजपा की तैयारी जोरों पर है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। इन राज्यों में पार्टी पदाधिकारियों की विभिन्न बैठकों में भाग ले चुके नबीन अब पीएम और गृह मंत्री अमित शाह के साथ चर्चा कर रहे हैं। इन राज्यों के साथ ही भाजपा उत्तराखंड के लिए भी जोरशोर से जुट गयी है। उत्तराखंड, गुजरात भी एक तरह से सरहदी राज्य हैं। उत्तराखंड में जहां चीन और नेपाल की सीमाएं लगती हैं, वहीं गुजरात का एक हिस्सा पाकिस्तान सीमा से सटा है। पंजाब भी पाकिस्तान सीमा से सटा है। मणिपुर राज्य भी म्यांमार से सटा है और यहां कुछ समय तक अशांति रही। हालांकि अभी भी इस सरहदी राज्य में हिंसा की छिटपुट वारदातें हो रही हैं। दो समुदायों के बीच संघर्ष को सुलझाने का काम भाजपा सरकार नहीं कर पाई है। मणिपुर को लेकर कांग्रेस अनेक बार भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधती रही है।

काबिल-ए-गौर है कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भाजपा की सरकार है, जबकि पंजाब में आप और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 207 सीटें जीतकर दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर इतिहास रच दिया। यहां उसने तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत कर दिया। असम में सत्तारूढ़ राजग दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के बाद लगातार तीसरी बार राज्य में सत्ता में लौटा है। राजग ने 126 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटों पर जीत दर्ज की। भाजपा ने 82 सीट पर जीत हासिल की जबकि उसके सहयोगी दलों- बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद (एजीपी) को 10-10 सीट पर जीत मिली है। राज्य में भाजपा ने पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल किया है। भारत के ज्यादातर राज्यों में काबिज हो चुकी भाजपा या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) अब पूरा जोर पंजाब पर लगाएगी। उधर, हालिया हार के बाद इंडिया गठबंधन एकजुट होने की एक बार फिर कोशिश कर रहा है। अब देखना होगा कि पंजाब में भाजपा अपने पूर्व सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के साथ फिर से मैदान में उतरने की कोशिश करती है या फिर इस राज्य में भी वह कोई नया प्रयोग करेगी। वैसे दोनों दलों के कुछ स्थानीय कार्यकर्ता इस गठबंधन को जरूरी बता रहे हैं, लेकिन शीर्ष स्तर पर इस तरह की किसी चर्चा की कोई बात सामने नहीं आई है। इस एका की बात के उलट भाजपा के बड़े नेता सार्वजनिक मंचों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं। लगभग आठ महीने बाद चुनावी रण में पार्टियां नजर आएंगी। देखना होगा कि पुरजोर कोशिश में लगी भाजपा को उसके विरोधी दल रोकने के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं।