indiantopbligs.com

top hindi blogs

Saturday, July 25, 2026

रील का चस्का : मूर्खतापूर्ण हरकतों में गुम होती बुद्धिमत्ता

 


परेशान करने वाली है नादानी की कहानी 

साभार : दैनिक ट्रिब्यून 

केवल तिवारी 

किसी ऐतिहासिक पर्यटन स्थल पर घूमने गए एक परिवार के बच्चों ने वहां जाने से इसलिए मना कर दिया कि उस परिसर में मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं थी। बच्चों को उसी जगह जाना पसंद था जहां वे फोटो खींच सकें, वीडियो या रील बना सकें और उन्हें अपने सोशल मीडिया मंचों पर अपलोड कर सकें। बच्चों की जिद के आगे परिवार के बड़े सदस्य नतमस्तक हो गये और बाहर से लौट आये। यह वाकया छोटा सा है, लेकिन इसके असर दूरगामी हैं। फोटो खींचने, वीडियो बनाने का यह जुनून अब अपने खतरनाक रूप की ओर बढ़ चला है। 'लाइक', 'कमेंट' और 'व्यूज' को बटोरने और उसके जरिये कमाई करने की कोशिशों में हदें पार हो रही हैं।

जिंदगी की राहों में रील बनाने का चस्का उहापोह के चौरोह पर पहुंच चुका है। आयेदिन इस चस्के के कारण जान चली जाने की खबरें तो आती ही हैं, किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे बच्चों की बुद्धिमत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कुछ समय पूर्व एक शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि अगर आप किसी खास जगह पर घूमने जाएं और वहां हर समय फोटो-वीडियो बनाने में ही व्यस्त रहेंगे तो आपको अपने इस पर्यटन की यादें बहुत समय तक नहीं रहेंगी। इसके उलट अगर आप एक बार फोटो खिंचा लें फिर उन नजारों का आनंद लें तो लंबे समय तक ये यादें आपके जेहन में रहेंगी। आप इनकी चर्चा भी अपने जानने वालों से करते रहेंगे। रिपोर्ट में इस बात का जिक्र था कि जिन पर्यटन या धार्मिक स्थलों पर फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी की मनाही होती है या मोबाइल ले जाना प्रतिबंधित होता है, वहां की यादें लोगों के जेहन में लंबे समय तक रहती हैं। आजकल बहुतायत में यह देखा जाता है कि पर्यटन पर निकले लोग फोटो खिंचाने या वीडियो बनाने में ही व्यस्त नजर आते हैं। वह अपनी यात्रा को कितना अपने मन-मस्तिष्क में संजोकर रख पाते होंगे, ये वही जानें। यह तो हो गया निजी मामला, कोई यादों को मन में सहेजना चाहे या नहीं, उन पर निर्भर करता है, लेकिन रील बनाने का चस्का अब लोगों की भावनाओं से भी खिलवाड़ करने तक पहुंच गया है। गरीबी का मजाक उड़ाया जाता है। रेहड़ी-पटरीवालों और बुजुर्गों के प्रति संवेदनशून्यता नजर आती है। स्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचाई जाती है और कई बार तो सांस्कृतिक विरासत के साथ भी बेहूदगी होती है। पिछले दिनों उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में अनेक लोगों ने ऐसी ही कुछ रील्स का सार्वजनिक तौर पर विरोध किया। मामला था 'रंगवाली पिछौड़ा' का। दरअसल, उत्तराखंड में, खासतौर पर कुमाऊं क्षेत्र में शुभ कार्यों के दौरान महिलाएं एक विशेष किस्म की ओढ़नी से सिर ढकती हैं जिसे 'रंगवाली पिछौड़ा' कहते हैं। रील्स की लत लगाए बैठे लोगों ने कुछ कुत्तों को इसे ओढ़ाकर वीडियो बनाईं। उसे अपने सोशल मीडिया मंचों पर अपलोड भी कर दिया। ऐसी रील्स का लोगों ने जमकर विरोध किया और फटाफट 'अनफॉलो' भी करना शुरू किया। ऐसे ही बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल के अनेक प्रवासी कहते हैं कि उनके यहां भी रील्स का अजीब चस्का है। बुजुर्ग दुकानदारों, सब्जी-फल बेच रहीं महिलाओं को ‘ठगा’ जाता है। ‘प्रैंक’ के नाम पर ऊल-जलूल हरकतें होती हैं। गनीमत है कि कुछ रील्स की आप संबंधित मंचों पर ही रिपोर्ट कर सकते हैं। उन्हें देखने से इनकार कर सकते हैं। अनफॉलो कर सकते हैं, लेकिन उन वीडियो का क्या होगा जो बच्चे यूं ही देखते चले जा रहे हैं। क्योंकि रील बनाने का जितना चस्का है, उससे कहीं अधिक उन्हें देखने का भी है। अनगिनत रील। कहीं बिना प्रमाण के डॉक्टरी सलाह हैं तो कहीं हंसी-मजाक। कहीं भयानक फूहड़ता है तो कहीं भद्दे चुटकुले। रील्स की इस भयावहता का अंदाजा अनेक देश लगा चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया का नाम इनमें सबसे पहले आता है जहां 16 वर्ष से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध है। ऑस्ट्रेलिया के अलावा अनेक देश भी ऐसा प्रतिबंध लगा चुके हैं या लगाने की तैयारी में हैं। इनमें से प्रमुख हैं- ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, मलेशिया, नॉर्वे, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, स्पेन, ब्रिटेन आदि। प्रतिबंध से पहले वहां शोध करवाए गए। बताया गया कि शोध अध्ययन की फाइनल रिपोर्ट में कहा गया कि सोशल मीडिया पर वीडियो देखने की लत से बच्चों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। रील्स का एक एल्गोरिदम है। आप जैसा देखते हैं, वैसी रील्स लगातार आपके पास आने लगती हैं। ऐसे में हानिकारक और हिंसक सामग्री बच्चों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है। यह नुकसान न केवल देखने में है, बल्कि बनाने में भी। एक अध्ययन में सामने आया है कि भारत के महानगरीय जीवनशैली में माता-पिता खुद अपने बच्चों को रील्स बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कई बार तो खुद भी उनके साथ शामिल हो रहे हैं। इससे उनकी पढ़ाई पर तो प्रतिकूल असर पड़ ही रहा है, वास्तविक जीवन से भी वे दूर होते जा रहे हैं। कुछ लोग खुद को सोशल मीडिया सनसनी के तौर पर मानने लगे हैं और उनको 'स्टारडम' जैसा अनुभव होने लगा है। रील्स बनाने और इस चस्के पर लगाम जरूरी है। कानूनी डंडे से ज्यादा कारगर सामाजिक जागरूकता होगी। उससे भी पहले शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। पढ़ने और करिअर बनाने की उम्र में कम से कम बच्चों को तो इस ओर जाने से रोकना हम सबकी जिम्मेदारी बनती है।

https://www.dainiktribuneonline.com/news/comment/the-story-of-ignorance-is-disturbing/

Friday, July 10, 2026

सरल, सहज और सौम्य... यादों में महावीर पंडित अंकल

केवल तिवारी


सरलता, सहजता और सौम्यता... सभी गुण किसी एक व्यक्ति में शायद ही दिखते हों, लेकिन मुझे याद है महावीर पंडित अंकल में ये तीनों बातें मौजूद थीं। इससे भी बड़ी बात थी कि वे औरों की बात भी धैर्यपूर्वक सुनते थे।

अक्सर मेरी पीढ़ी के लोगों का आरोप होता है कि हमारे बुजुर्ग सुनते नहीं, बस अपनी ही कहते चले जाते हैं। महावीर पंडित अंकल में ऐसी बात नहीं थी। ये अंकल मेरे मित्र सुरेंद्र पंडित के पिताजी। सुरेंद्र वह मित्र जिसने हम अनेक मित्रों को कुछ समय के लिए एकसाथ बसा दिया। वह कहानी लंबी और यादगार है। जब साथ रहने लगे तो जाहिर है कि मित्रों के माता-पिता से भी मुलाकात होना लाजिमी था। इस बसने और मिलने के सिलसिले को करीब तीन दशक होने को हैं। हम लोग दिल्ली के पास ही बसे गाजियाबाद के कौशांबी स्थित हिमगिरि अपार्टमेंट में रहते थे। नौवीं मंजिल पर। संघर्ष का दौर था। सभी का था, मेरा थोड़ा सा ज्यादा। कुछ समय के लिए अपनी माताजी को भी साथ ले आया था। उसी दौरान महावीर अंकल का भी आना हुआ। दोनों बातें करते थे। ज्यादातर बातें होतीं- एकादशी कब है, पूर्णमासी कब है। इस बार सोमवार को अमावस्या पड़ रही है, शनिवार को हनुमान जयंती है, वगैरह-वगैरह। बाद में हम मित्रगण अपनी-अपनी गृहस्थी में समाने लगे। लेकिन बोलचाल जारी रही। मित्र सुरेंद्र की शादी में भी मित्रमंडली जुटी। उससे पहले भी अनेक मौकों पर महावीर अंकल से मिलने का मौका मिला। आंटी से भी बातचीत होतीं, लेकिन थोड़ी-बहुत। आंटी भी करीब एक दशक पहले ही दुनिया से रुखसत हो गयीं, पिछले दिनों अंकल भी चले गये। मित्र धीरज का मैसेज देखा। फिर मैंने फोन किया और खुर्जा में उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुआ। मुझे याद है जब आंटी की अंत्येष्टि में गया था तो गमगीन माहौल के बीच अंकल लोगों को बता रहे थे कि यह केवल है, चंडीगढ़ से आया है। वह कहते थे लंबे समय तक टिकी रहने वाली दोस्ती और इसे टिकाये रहने वाले दोस्त, दोनों अच्छे होते हैं। उनकी अनेक बातें याद रहेंगी। उम्र के ऐसे पड़ाव में हम लोग पहुंच चुके हैं जब हमारे अपनों का साया उठता जा रहा है। ईश्वर अंकल को अपने श्रीचरणों में स्थान दे। ऊं शांति