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Thursday, June 11, 2026

विरोधाभास के चक्रव्यू में बचत मंत्र

 साभार : दैनिक ट्रिब्यून 



केवल तिवारी

बचत करने की अर्थव्यवस्था हम भारतीयों के मूल में है। देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग तरीके की 'गुल्लक संस्कृति' है। कभी बच्चों के शादी-ब्याह के नाम पर आय का एक हिस्सा बचाकर रखना तो कभी घर बनाने के लिए बचत। छोटी-छोटी बचत अनेक बार बड़ी काम आती है। बचाने की इस प्रवृत्ति के कारण ही अनेक बार मंदी के दौर में उतना बड़ा झटका आम लोगों को नहीं लगा जितनी आशंका जताई गयी थी। नोटबंदी के दौरान गुल्लक संस्कृति काम आई। बड़े नोट बंद हुए, लेकिन छोटी-छोटी बचत वालों ने उस दौर में अपने इन छोटे नोटों से ही काम चलताया। इस बचत की संस्कृति को समझते हुए अनेक सरकारों ने भी समय-समय पर कई योजनाएं शुरू कीं। मसलन- किसान विकास पत्र, सुकन्या समृद्धि योजना, लाडो लक्ष्मी, कन्या सुमंगल, महिला सम्मान बचत वगैरह-वगैरह। 

लेकिन आज, बदले वैश्विक परिदृश्य में सत्ता के शिखर से बचत का एक अन्य मंत्र दिया जा रहा है। विदेश यात्राओं से परहेज करें। अभी आभूषण नहीं खरीदें। ईंधन बचाएं। अघोषित तरीके से सीधा संदेश यह भी है कि बचत करें। आज की युवा पीढ़ी विरोधाभास के चक्रव्यूह में फंसी है। वह घूमने-फिरने की शौकीन है। वह नये-नये कपड़े खरीदने, खानपान के नये अड्डों में जाने और आभूषणों को खरीदने की शौकीन है। यह पीढ़ी क्रेडिट कार्ड संस्कृति वाली है। जितना है, उतना तो खर्च करना ही है, उससे भी ज्यादा खर्च करने में विश्वास। यानी इस पीढ़ी को बचत की बहुत ज्यादा फिक्र नहीं है। पहले से ही खुलकर खर्च करने वाली इस पीढ़ी को लेकर रही-सही कसर आयकर प्रणाली की नयी व्यवस्था ने पूरी कर दी है। करीब 12 लाख रुपये तक कोई कर नहीं, उसके बाद बचत का कोई फायदा नहीं। पुरानी व्यवस्था में कर (टैक्स) बचाने के नाम पर ही सही, नौकरी-पेशा व्यक्ति एक सीमा तक बचत करने की कोशिश करता था। शायद इसी बहाने कुछ बच जाये। अब, चूंकि बचत योजनाओं से ज्यादा फायदा होना ही नहीं है तो उस ओर सोचना ही क्या? प्रोविडेंट फंड योजना में अभी बेसिक वेतन का 12 प्रतिशत जमा होने का प्रावधान है। इसे 30 प्रतिशत तक बढ़ा भी सकते हैं। आमतौर पर इसे सेवानिवृत्ति के लिए बचाया गया धन माना जाता है। इस बचत से पैसा निकालना कठिन होता था। अभी तक भी ऐसा ही है, लेकिन अब इसमें भी नयी व्यवस्था पर काम लगभग पूरा हो चुका है। इस बचत को भी अब सेविंग अकाउंट की तरह बनाने की कवायद चल रही है। यादी एटीएम की तरह इसमें से पैसे निकाले जा सकते हैं। नयी व्यवस्था के मुताबिक कर्मचारी को अपने नियोक्ता से मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। गौर हो कि पहले पीएफ राशि निकालना बहुत आसान नहीं था। अब नयी व्यवस्था में अपने कुल पीएफ राशि का पचास से 75 फीसदी तक सीधे निकाला जा सकता है। हालांकि बदले नियमों के तहत खाते में हर समय कुल योगदान का न्यूनतम 25 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित रखना अनिवार्य है। 

एक तरफ बचत की बात और दूसरी ओर खर्च करने के लिए इतनी छूट। आज का युवा वर्ग बचत के इस मंत्र में विरोधाभास के चक्रव्यूह में फंस गया है। चक्रव्यूह का पहला द्वार तो वे खुद ही हैं। खाओ-पीओ, घूमो-फिरो और ऐश करो की नीति। इस द्वार को किसी तरह पार कर भी लें या यूं कहें कि अपनी आदतों पर किसी तरह काबू पा भी लें तो दूसरा द्वार आयकर में अब बचत प्रावधान करीब-करीब खत्म। टैक्स स्लैब में फायदा मिलना ही नहीं है या टैक्स कटना ही है तो कोई अतिरिक्त बचत करके फायदा क्या? इसे भी पार पाने की जुगत कर ले। या बचत जरूरी है मानकर कुछ बचा भी ले तो अब पीएफ से निकासी की नयी व्यवस्था। यह तो सर्वमान्य सत्य है कि घर-गृहस्थी में रुपयों की जरूरत आयेदिन रहती है। अपनी कमाई से भी अधिक की जरूरत होती है। इस पर साधारण सा मनोवज्ञान है कि लोन आदि लेने से पहले व्यक्ति अपनी ही बचत पर नजर डालता है। ऐसे में उसे अब सबसे पहले पीएफ ही नजर आएगा। वैसे जानकार कहते हैं कि बेशक आज का युवा इससे पहले की पीढ़ी के लोगों से जरा हटकर है, लेकिन वह शेयर मार्केट, म्यूचुअल फंड और एसआईपी (सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) में दूसरी तरह से बचत करता है। हालांकि ये सब 'सब्जेक्ट टू मार्केट रिस्क' हैं, लेकिन वह जोखिम ले लेता है। इसमें कुछ पार पा लेते हैं, कुछ गंवा बैठते हैं। 'जनरेशन गैप' के तथ्यों से इतर वह भविष्य की योजनाएं भी करता है, उसका स्वरूप दूसरा होता है। उसके फोन में बचत विशेष के कई एप हैं। बदलते दौर में यह तो मानकर चलना पड़ेगा कि बेसक बचत मंत्र में विरोधाभास हो, लेकिन नयी पीढ़ी विरोधाभास के चक्रव्यूह से निकल ही जाएगी। फिर नियम भी बदलते रहते हैं, समय चक्र की तरह। विरोधाभास के इस चक्रव्यूह को तोड़ने की जरूरत पड़ी तो 'अभिमन्यु' बनकर वह बाहर आने की कोशिश कर लेगा। हां, ध्यान रखना होगा कि कहीं बाहर निकलने की तेज आपाधापी में वह अंतिम पायदान पर कहीं घिर न जाये। क्योंकि बड़ी-बड़ी कंपनियों की चकाचौंध में 'हायर एंड फायर' का ऐसा प्रावधान भी छिपा है जो पलभर में अर्श से फर्श पर ले आता है।

https://www.dainiktribuneonline.com/news/comment/a-generation-trapped-in-a-paradoxical-cycle-of-savings/

Friday, June 5, 2026

सुहागन दादी

 केवल तिवारी

रितेश और मनीष। नामों से दोनों युवा लगते हैं, लेकिन बुढ़ापे की दहलीज पर हैं। रिटायरमेंट की कगार पर। आजकल समीर के घर आए हैं। समीर इन दोनों के रिश्तेदार हैं। इन दोनों से भी उम्र में बड़े। व्यवहार मित्रवत। तीनों जब बातों का सिलसिला शुरू करते हैं तो रिश्तेदारी भूल जाते हैं और हंसी-मजाक से लेकर गंभीर मुद्दों तक खिंचती चली जाती है वार्तालाप। बीच-बीच में समीर की माताजी की भी चर्चा। रीता देवी नाम है अम्मा का। सब उन्हें अम्मा ही तो कहते आए हैं। पिछले दिनों परिवार के अनेक लोग जुटे। किसी पारिवारिक समारोह में। खूब जमीं महफिलें। इन्हीं में से कुछ साहित्य प्रेमी भी। महफिल जमी हो और साहित्य से लगाव हो और पुराने हो चले लोग हों तो महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की चर्चा होनी ही थी। उनकी रचनाओं पर चर्चा होने लगी। बीच-बीच में रितेश उन रचनाओं से किसी एक किरदार को पकड़ लेते। ईदगाह कहानी में हामिद महान है या उसकी दादी। गोदान में कौन सा पात्र सुहाता है- होरी, रायसाहब, अमरपाल सिंह,. प्रोफ़ेसर मेहता, गोबर या मालती। कभी-कभी मनीष खीझ जाता, यार इतनी गहराई से पात्रों पर क्यों जाते हो? कथानक देखो ना। बातों-बातों में सब हंस पड़ते। 

इन महफिलों के बीच-बीच में इनके आसपास के रिश्तेदारों की भी एंट्री होती। कोई अपनी कहानी सुनाता तो किसी को शेरो-शायरी से लगाव। कोई कहता, क्या यार तुम लोग कथा-कहानी में फंसे हो। पुराने गीत सुनते हैं। कभी-कबार पुराने गीतों का भी दौर चलता। इसी बीच कोई कहता कि यूट्यूब या स्पोर्टीफाई चलाने से क्या फायदा। स्टार मेकर लगाओ हम लोग खुद अपनी-अपनी पसंद के गीत गाएंगे। ऐसा नहीं कि हर बार ये चर्चाएं तभी होतीं जब सब मिल-बैठते। इन बातों का सिलसिला कभी लंबी यात्रा पर निकले हों तो भी होती या फिर कभी भी जब कुछ देर के लिए भी कहीं साथ हों। हालांकि फोन पर इन लोगों की बातचीत औपचारिकता तक ही सिमटी रहती। 

पिछले दिनों एक दिन ऐसी ही एक चर्चा में आ गया प्रेमचंद जी का महान उपन्यास गबन। रमानाथ, जालपा, रतन, जोहरा, देवीदीन, मुंशी दयानाथ, रामेश्वरी देवी, मुंशी दीनदयाल और रमेश बाबू जैसे किरदार। यहां कहानी होती अजीब है और जैसा कि कहानियों का अंत होता है, सुखांत और वही होता है। लेकिन इस चर्चा में आज समीर बहुत गंभीर होकर बैठे थे। उन्होंने एक-दो सवाल पूछे- मसलन रामनाथ आखिरकार लौट आता है न। इस कहानी की चर्चा के दौरान आज अम्मा पर वार्तालाप छिड़ जाती है। थोड़ी-थोड़ी जालपा जैसी। लेकिन अम्मा के नायक की कहानी थोड़ी उलट थी। बातों-बातों में पता चला कि अम्मा के पति भी कई दशकों से लापता हैं। उन पर गबन का आरोप लगा। आरोप सच में आरोप ही थे, हकीकत में दूर-दूर तक ऐसा नहीं था। सच्चरित्र व्यक्ति। अम्मा भी इतनी भली महिला कि आज के दौर में ऐसी महिला कल्पनातीत ही हैं। सबसे स्नेह रखने वाली। एक चलती-फिरती कहानी। चौथी अवस्था में अम्मा को अब अपने उनकी याद आने लगी है। बातों-बातों में वह फोटो की ओर देखती हैं। रितेश उन्हें कुरेदता है। वह धीरे से बोलती हैं, शायद वह जोगी बन गए हैं। हरिद्वार में होंगे। अम्मा अब कैसे पहचानोगी, रितेश तो मजाक के मूड में होता है, लेकिन अम्मा हंस-बोल लेगी, बातें करेगी, लेकिन पतिदेव के मामले में मजाक उन्हें बर्दाश्त नहीं। महान है हमारी यह धार्मिक प्रवृत्ति। हाड़तोड़ मेहनत से बच्चों को बड़ा किया। खूब संघर्ष किया। शायद कोई और महिला हो तो हर बात पर अपने पति को कोसे। लेकिन अम्मा ऐसी नहीं। वह तो चाहतीं कि वह संघर्ष और कच्ची गृहस्थी के उस दौर में चले गए थे, वह भी झूठे आरोपों पर। काश वह अब चले आएं। देखें कि उनके बच्चे कितने बड़े हो गये हैं। बच्चे ही नहीं, बच्चों के बच्चे भी बड़े हो गए हैं। घर में उत्सव सरीखा माहौल है। असल में हर कोई अपने-अपने काम और घर-परिवार में व्यस्त हैं। अम्मा का भी पूरा खयाल रखा जा रहा है, लेकिन अम्मा के अंदर एक कसक है। कोई कहता क्या पता दादाजी कहीं.... नहीं, नहीं... ऐसी बात तो बोलना भी गुनाह है। वह तो जीवित हैं। इसीलिए तो ये दादी सुहागन रहती हैं। बिंदी लगाती हैं, चूड़ी-कंगन पहनती हैं। अब तो वह बड़े आत्मविश्वास से कहती हैं कि वह उन्हें ढूंढ़ लेंगी। उनकी बातें लोगों को काल्पनिक लगतीं। हां, उनके प्रति सहानुभूति सबको होती। इन दिनों उत्सव सरीखे माहौल में यह दादी यानी अम्मा बीमार सी रहने लगी हैं। पता नहीं क्या हुआ है? लोगों से पूछती हैं, क्या मैं ठीक हो जाऊंगी। घर में कुछ दिनों बाद एक सामूहिक पूजा का कार्यक्रम है। सभी रिश्तेदारों को बुलाया है। कुछ तो आने भी लगे हैं। अम्मा कुछ खा नहीं पा रही है, लेकिन हौसले में कोई कमी नहीं है। सबसे हंस-बोलकर बातें करना। फिर धीरे से किसी-किसी से पूछना, क्या मैं ठीक हो जाऊंगी। अम्मा जीवट हैं। सभी कहते कि उनकी जीवटता ही उनको लंबी आयु देगी, नहीं तो डॉक्टर तो कह चुके हैं कि वह कुछ ही दिनों की मेहमान हैं। जब ऐसी बातें होती हैं तो फिर बीमारी का नाम क्या लेना। घर में सलाह-मशविरा हुआ और सामूहिक पूजा का कार्यक्रम कुछ ही दिनों बाद तय कर दिया गया। अम्मा को कहा गया कि बाद में रिश्तेदारों के बच्चों की परीक्षाएं हैं। सरल और सहज स्वभाव की अम्मा इस बात को मान गयीं। चहल-पहल देखकर वह बहुत खुश होती हैं। अपनी बहू यानी समीर की पत्नी से भी बेटी जैसा नाता रखती हैं। बहू भी ऐसी कि अम्मा की हालत पर बार-बार आंसू निकाल दे। सब समझाते, इलाज तो करा ही रहे हैं। बाकी ईश्वर को जो मंजूर हो। वह भरसक प्रयास से अम्मा के साथ मुस्कुरातीं, लेकिन उनकी हालत पर किसी भी रिश्तेदार के सामने रो देतीं। ननद के साथ तो अक्सर रोना-धोना हो जाता। ननद भी तो मां की तबीयत के कारण पुणे से एक महीने में चार बार आ चुकी हैं। आज पूजा-पाठ संपन्न हो गयी। सब अपने-अपने घरों को चले गये। समीर के आसपास के रिश्तेदार अब लगभग रोज आने लगे। अम्मा का हालचाल लेने। हालांकि कोशिश रहती कि उन्हें कुछ न बताया जाये। समय-समय पर दवा देते रहते और कहते कि सब ठीक होगा। हालांकि अम्मा अब कुछ-कुछ समझ रही हैं। हर कोई क्यों आ रहा है। मेरे पास इतनी देर क्यों बैठ रहा है। फिर खुद ही तसल्ली देतीं कि अच्छा तो है। इन सबके साथ हमने कितना समय बिताया। इन दिनों यह अम्मा यानी सुहागन दादी, दादाजी के बारे में कुछ ज्यादा ही रट लगाने लगी हैं। इस बात के कई अर्थ लगाए जा रहे हैं। अब रिश्तेदारों की बातचीत में साहित्य कम और अम्मा की कहानी ज्यादा होने लगी है। 

आज... आज... ओह... वही हुआ जिसकी आशंका थी, लेकिन हर कोई यकीन नहीं कर रहा था...। मुस्कुराती दिखने वाली दादी शांत। आंखें मूंद ली। सदा के लिए। हमेशा के लिए।  दादी की आंखें बंद होते वक्त पूरा परिवार साथ था। वही नहीं थे जो अक्सर उनसे उनकी पुरानी बातों की यादों को ताजा कर दिया करते थे। दादी की विदाई की तैयारी हो गयी। अंतिम विदाई। कैसे विदा करें? सुहागन के रूप में। वह तो हमेशा से खुद को सुहागन ही मानती रही हैं। पूरा शृंगार। 'सुहागन दादी' को ले जाया गया। इस बार डोली कहां... पता नहीं दादाजी वहीं इंतजार कर रहे हैं या बाद में जाएंगे। रिश्तेदारों के बीच चर्चाएं तो अब भी हैं, लेकिन अब खिलखिलाहट कम है। कभी-कबार दादी की पुरानी बातें याद करते हैं तो कुछ हंसी आ जाती है। वह दादी रुलाने वाली थोड़ी थीं, वह तो हंसमुख थी। 'सुहागन दादी' को प्रणाम। क्या पता उनको दादाजी भी मिल ही गये हों।