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Monday, May 11, 2026

बच्चे, परीक्षाएं, दबाव की बात और पैरेंटिंग

केवल तिवारी

पिछले दिनों सीबीएसई, आईसीएसई समेत कई बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आये। सीबीएसई के परिणाम के बारे में इस बार कहा जा रहा है कि नंबर बहुत उदारता से दिये गये। ऐसा दिखा भी। पास प्रतिशत तो अच्छा रहा ही, 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वालों की संख्या भी खूब रही। मेरा छोटा बेटा भी दसवीं में था। उसकी मेहनत को देखकर लग रहा था कि वह नंबर ठीकठाक ले आएगा। वह मुझसे कहता था कि 96 प्रतिशत तक हर हाल में आ जाएंगे। लगभग इतने ही नंबर उसके बड़े भाई के भी करीब 6 साल पहले आए थे। मैंने तो अंकों की इस बात को ज्यादा प्रचारित नहीं किया, लेकिन चूंकि बाजार की महिमा निराली है इसलिए परिवार के लोगों से घूमते हुए मामला प्रचारित हो ही गया। बेटा इससे प्रसन्न नहीं था। बच्चा है, इसलिए भी शायद बधाइयां स्वीकार करने में संकोच कर रहा था। एक दिन तो कहने लगा, पापा कुछ ज्यादा ही नहीं हो रहा है। खैर...। मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी बात थी। मन को संतोष था कि हमने कभी बच्चों पर कोई प्रेशर नहीं डाला। दोनों बच्चों ने अच्छा ही किया है। बड़ा आईआईटीयन है, छोटा भी मेहनत खूब कर रहा है बाकी किस्मत की बात। इस बीच मित्र राजेश डोबरियाल की फेसबुक पोस्ट में एक कमेंट लिखते-लिखते धवल की बात लिख ही बैठा। चूंकि उसकी बातें ज्यादातर समय मजाकिया या व्यंग्यात्मक ही होती हैं। उसने मेरे कमेंट के जवाब में लिखा कि तुम्हें गुस्सा नहीं आया कि 6 नंबर कम क्यों आये। इससे पहले भी उसने एक बार मयूर पब्लिक स्कूल में जब कुक्कू ने बहुत बेहतरीन प्रदर्शन किया था तो पूछा था कि तुम स्कूल की कवरेज करते हो, इसका प्रतिफल तो नहीं दिया जा रहा है। मैं मुस्कुराकर रह गया। इस बार भी मैंने जवाब में लिखा कि नहीं, गुस्सा नहीं हुआ। राहत मिली कि बेटे की 12-12 घंटे की मेहनत रंग लाई। सच में वह कई घंटे तक पढ़ता था। उसके अलवा स्कूल और कोचिंग। साथ में सैंपल पेपर। सैंपल पेपर हल करने के बाद सीबीएसई की आंसर शीट निकालकर मुझे दे देता और कहता चेक करो। 

इन बातों में एक महत्वपूर्ण बात

सच में नंबर का यह खेल है बहुत अजीबोगरीब। इतने भर-भर के नंबर कहां आते हैं। लेकिन मैंने देखा है कि सीबीएसई या कुछ अन्य बोर्ड भी प्रश्नपत्र का पैटर्न ऐसा बनाते हैं कि ठीकठाक पढ़ाई करने वाले से लेकर औसत स्तर तक के बच्चे पास हो ही जाते हैं। एकदम गये गुजरे बच्चे रह जाते हैं। गये गुजरे से मेरा तात्पर्य पढ़ाई में थोड़ा कम। कुछ बच्चे खेलों में बहुत अच्छे होते हैं। कुछ किसी अन्य चीज में। लेकिन मेरा अनुभव और आंखों देखा मंजर कहता है कि वाकई कुछ बच्चे तो कुछ भी नहीं करते। दिन-रात घूमना, अड्डेबाजी में रहना। कई बार ऐसे बच्चे धवल को भी बुलाते थे, लेकिन हमारे घर से परमिशन कुछ समय के लिए थी। शाम को एक-दो घंटे। यह अनुशासन भावना का होता था। मैं तो शाम को ऑफिस में ही होता हूं। इसी बीच, मुझे याद आया द ट्रिब्यून स्कूल में एक बार अभिभावकों के लिए चले सेशन का। वहां स्कूल कमेटी चेयरपर्सन चांद नेहरू ने कहा कि बच्चों के लालन पालन में तीन बातों का ध्यान रखना जरूरी है। लाडवत, दंडवत और मित्रवत एक उम्र तक यानी पांच-सात साल की उम्र तक बच्चों से खूब लाड़-प्यार करना चाहिए। फिर थोड़ा डांटना-डपटना जरूरी है उसके बाद जब वह बड़ा हो जाये तो उसके साथ मित्रवत रहना जरूरी है। अब बच्चों पर दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए की जो थ्योरी है, वह मुझे ठीक से समझ नहीं आती। दबाव नहीं बनाने का मतलब यह है कि बच्चा जो करे, जहां जाये, उसे करने देना चाहिए। या यह है कि वह पढ़ाई के मामले में अपनी च्वाइस बता रहा है, उस पर अपनी पसंद-नापसंद नहीं थोपनी चाहिए। दूसरी वाली बात तो बिल्कुल ठीक है। लेकिन उसे छूट देनी चाहिए वाली बात मेरी समझ से परे है। किशोरावस्था की उम्र ऐसी है कि बच्चों के साथ प्यार और डांट के मिले-जुले रूप से पेश आना चाहिए। आज तो बच्चों के लिए बहुत सारे करिअर ऑप्शन हैं। वह उनमें से चुनाव कर सकता है। अच्छे संस्कार देना और अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। पिछले दिनों एक मित्र ने सही बात कही कि पैरेंटिंग आज के जमाने में ज्यादा टफ हो गयी है। पहले तो एकतरफा होता था। एकतरफा से याद आया कि बच्चों में इस गुण को भी विकसित करने की जरूरत है कि वह सुनना सीखें। तुरंत जवाब देने की आदत अच्छी नहीं। जीवन पथ में तो अभी कितनी परीक्षाएं देनी हैं बच्चो। सातवीं आठवीं तक तो खूब खेलना-कूदना भी जरूरी है। उसके बाद थोड़ा समय कम मिलता है और धीरे-धीरे तो फिर करिअर पथ पर निकलना पड़ता है। इसलिए बच्चो, अपने लिए लक्ष्य तो निर्धारित करो ही, उसके अनुसार मेहनत करो, उसके बाद की चिंता जरूरी नहीं। कुछ न कुछ तो हासिल होगा ही क्योंकि इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं। 

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और ट्रिब्यून स्कूल में मिले सम्मान

आलस कह लीजिए या काम का ऐसा प्रेशर कि इस ब्लॉग को थोड़ा-थोड़ा लिख ही रहा था कि एक दिन धवल के स्कूल (The Tribune School)से फोन आया कि 9 मई की शाम यानी Mother's Day की पूर्व संध्या पर आपने स्कूल आना है। STAR EXCELLENCE समारोह है। आप विशिष्ठ अतिथि हैं और आपने थोड़ा बोलना भी है। मुख्य अतिथि The Tribune Trust के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी होंगे, साथ में चांद नेहरू मैडम, The Tribune की प्रधान संपादक ज्योति मल्होत्रा आदि। मैंने खुशी-खुशी सहमति दी। हम लोग गये। धवल को भी उनकी मैडम ने अलग से कहा था कि वह भी कुछ बोलने के लिए तैयार करे। उसने बेहतरीन पीस तैयार कर लिया। मैं तैयार करके तो कुछ नहीं ले गया। हां, थोड़ा-बहुत बोल गया। कार्यक्रम अच्छा लगा। प्रिंसिपल रानी पोद्दार मैडम का आभारी हूं। उन्होंने इतना सम्मान मिला। कुछ वर्ष पहले बड़े बेटे कार्तिक की वजह से स्कूल में खूब जाना गया और अब धवल की वजह से। दोनों बच्चे स्कूल में हेड बॉय रहे। ईश्वर इन्हें खुश रखे। चूंकि यह ब्लॉग अंकों पर था। इसलिए मैंने अपने भाषण में भी इसी पर फोकस रखा। कहा कि जिनके कम नंबर आये हैं, वे निराश कतई न हों। जहां और भी हैं नंबर के सिवा। कोई खेलों में तरक्की करे और कोई किसी अन्य में। यह बात सभी को पसंद आई। वहीं हमारे ट्रस्टी साहिबान सोढी साहब, उनकी पत्नी बोनी सोढी जी, चांद नेहरू जी, दीपक जी के अलावा हमारी एडिटर इन चीफ ने भी बधाई दी। अच्छा लगा। कार्यक्रम की एक-दो फोटो और उसकी कवरेज साझा कर रहा हूं।







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