केवल तिवारी
बशीर बद्र साहब को नमन। उनका जिक्र अपने कई ब्लॉग में भी मैंने पहले किया है। आज पुराना दौर याद आया। असल में वह दौर था जब हम अनेक मित्रों की बातें शेर-ओ-शायरी में होती थी। पुस्तक मेलों से उनकी रचनाओं की किताबें तो जरूर खरीदीं जातीं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निधन के बाद उनके एक शेर को अक्सर हम लोग कहते थे, जिसके बोले थे-
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नये मिजाज का शहर जरा फासले से मिला करो।
जब बातें होती थीं तो उनके एक इंटरव्यू का भी जिक्र होता था। एक जगह उन्होंने कहा था कि आज शोहरत और दौलत उम्र के ऐसे पड़ाव में मिली जब उसका बहुत ज्यादा आनंद नहीं लिया जा सकता है। बताया जाता है कि जब बद्र साहब 65 पार के हुए उसके बाद यकायक उनकी शेरो-शायरियां खूब प्रचलित होने लगीं।
इंटरने पर मिली जानकारी के अनुसार बद्र साहब का पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। कहा जाता है कि उर्दू में पढ़ाई करने वाले बशीर साहब की कई रचनाएं मेरठ दंगों में नष्ट हो गयीं। इस वाकये ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। वर्ष 1935 में जन्मे बद्र साहब को 1999 में भा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इसी साल उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। शायरियों में आम प्रचलन की भाषा के इस्तेमाल के लिए जाने जाने वाले बशीर साहब की गजलें युवाओं की जुबां पर होती थीं। वर्ष 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के दौरान उन्होंने दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हों जैसी कालजई पंक्तियां लिखी थीं। कहा जाता है कि मीर तकी मीर की गजलों की तरह बद्र की गजलों में भी अत्यधिक समकालीन उर्दू थी लेकिन उसे आसानी से समझा जा सकता था इसलिए लोग इसे सराहते भी थे। उनकी कुछ उत्कृष्ट कृतियों ने व्यथित प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में काम किया और जीवन के रहस्यों को भी व्यक्त किया। बशीर साहब की 69 गजलों का संग्रह 'आस' को उनकी चर्चित कृतियों में गिना जाता है। उनका एक अन्य संग्रह, जिसका शीर्षक 'कुल्लियते बशीर बद्र' है, पाकिस्तान में प्रकाशित हो चुका है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने सात साल की कम उम्र में कविता लिखना शुरू कर दिया था। बद्र साहब को समर्पित एक वेबसाइट के मुताबिक वह अपने कई गीतों में उर्दू की कोमलता को अंग्रेजी उच्चारण में घोल देने में अग्रणी थे। जानकारों के मुताबिक बशीर बद्र की गजलों में शब्द व संवेदना की सतह पर ताजगी, काव्यात्मकता और सौंदर्य हुआ करते थे, जो उन्हें दूसरे शायरों से अलग करती थी। उन्होंने उर्दू में सात से अधिक कविता संग्रह और हिंदी में एक कविता संग्रह प्रकाशित किया। उनके प्रमुख गजल संग्रहों में इकाई, इमेज, आमद, आस, आसमान और आहट शामिल हैं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनके चाहने वाले उन्हें अमेरिका, दुबई, कतर और पाकिस्तान सहित दुनिया भर के विभिन्न मुल्कों में आमंत्रित किया करते थे।
बशीर साहब की कुछ शायरियों का जिक्र तो अक्सर किया जाता है। उनमें से कुछ इस तरह से हैं-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो। न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों
न जी भर के देखा न कुछ बात की। बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
यहां लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं, मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे।
तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा। मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा।
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला। अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी। लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला। मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
मैं बोलता हूं तो इल्ज़ाम है बग़ावत का। मैं चुप रहूं तो बड़ी बेबसी सी होती है
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में। तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है। तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा
काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के। दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
शबनम के आंसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ। आंखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है। कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
बशीर बद्र साहब का बृहस्पतिवार 28 मई, 2026 को 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनको नमन।

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