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Saturday, May 16, 2026

शिव कुमार का असमय जाना... इसी सत्य को कोई न जान पाया



कभी सोचा भी नहीं था कि शिव कुमार जी के बारे में ऐसा कोई मैसेज आएगा। पेजीनेशन सेक्शन में जाता हूं तो किनारे की उस सूनी सीट को देख मन उचाट सा हो जाता है। लगता है मानो कुछ देर बाद वही मुस्कुराता चेहरा एक बार फिर दिख जाएगा। बुधवार 6 मई की रात करीब साढ़े ग्यारह बजे रोज की तरह मैं घर जाते वक्त उनसे मिलकर गया। मेरा रुटीन है कि जाते वक्त एक बार पेजीनेशन सेक्शन के साथियों से पूछ लूं कि एडिशन सही से रिलीज हो गए या नहीं। कई बार कोई विज्ञापन अटका होता है। ऐसे विज्ञापन के न आ पाने पर कुछ बैकअप रखना पड़ता है। वहां से क्लीयरेंस लेकर ही घर की तरफ कदम बढ़ाता हूं। बुधवार की रात अक्सर एक मजाक होता था आज तो बुधवार है। असल में चंडीगढ़ प्रेस क्लब में बुधवार को डेस्क नाइट होती है। यानी देर रात तक खाना-पीना। उस दिन भी यही मजाक हुआ कि चलें आज तो बुधवार है। हंसी-मजाक के साथ ही यह बात तय हुई कि अगले बुधवार को तो चलना ही है। लेकिन शिव कुमार जी के लिए अगला बुधवार आया ही नहीं। सात मई की सुबह सलिल जी के मैसेज से पता चला कि उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हो गया है। सलिल जी ने अपने स्टाफ से छुट्टी कैंसल करने का आग्रह किया और खुद भी वह छुट्टी पर चल रहे थे और दो दिन पहले एमरजेंसी में लौटकर आए। शिव कुमार जी के छोटे भाई से साथी सूरज के फोन से बात की तो उन्होंने बताया कि हालत नाजुक है। फोन पर शिव जी का बेटा साहिल रोने लगा। हालात यहां तक पहुंच गए कि उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया। डॉक्टर लगे थे। मैं इधर प्रार्थना कर रहा था कि भगवान कोई तो चमत्कार करो। मेरी पत्नी भी उनसे परिचित थी, वह बहुत दुखी हुई। साथ में प्रार्थना करने लगी। तीसरे दिन मैं सुबह-सुबह अस्पताल पहुंचा, इस उम्मीद में कि शायद कोई कहेगा कि थोड़ा सा सुधार हुआ है, लेकिन वहां तो अनहोनी हो चुकी थी। उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल था। व्याकुल साहिल हाथ में एक कागज लिए इधर-उधर घूमते हुए बस रोए जा रहा था। क्या कहता मैं? फिर भी कोशिश की कुछ समझाने की। साहित के कंधे पर हाथ रखा। उससे कहा कि संभाले खुद को। उधर शिव जी के भाई अरविंद पुरजोर कोशिश के बावजूद अपने आसुओं को नहीं रोक पा रहे थे। ऐसे मंजर में, मेरा क्या हाल होता। मेरे भी आंसू निकल आए। पास में सीढ़ियों में ऑफिस के कुछ लोग खड़े थे। थोड़ी देर में मित्र सलिल और नरेंद्र भी आ गए। उधर, शिव कुमार जी की पत्नी बेहोशी जैसी हालत में पहुंच गयीं। एक व्यक्ति उन्हें सांत्वना दे रहे थे। मैंने पूछा आप कौन हैं, बोले- मैं इनका भतीजा हूं। फिर हम लोगों ने कहा कि आप इन्हें घर ले जाएं। थोड़ी देर में शिव कुमार जी की बेटी मुंबई से पहुंच गयी। छोटी सी बच्ची को लेकर। हृदय विदारक दृश्य था वह। बिटिया को आईसीयू में पिता का मुंह देखने जाना था। छोटी सी बच्ची रो रही थी। उसे मामा यानी साहिल ने पकड़ा और उसे चुप कराते-कराते वह खुद भी रो पड़ा। हे ईश्वर... 
बड़ी यादें हैं शिव कुमार जी के साथ। वर्ष 2013 में जब मैंने ट्रिब्यून ज्वाइन किया तो वह भी उन कुछ लोगों में शामिल थे जिनसे अपनापन मिला। दो-चार बार घर भी आना-जाना हुआ। अभी कुछ साल पहले ही उनके माता-पिता का निधन हुआ था। साहिल को अपने दादा-दादी से बड़ा स्नेह था। वह बहुत रोया था। शिव कुमार जी ने मेरे लिए नये इस संस्थान के बारे में बहुत कुछ बताया। पेजीनेशन के दौरान कभी-कबार बहस-मुबाहिसें भी हुईं। हम लोगों की घनिष्ठता थी और भविष्य को लेकर बड़ी बातें करते थे। कभी यह भी कि एक-दूसरे के गांव जाएंगे। सारी बातें रह गयीं। शिव कुमार जी आपने बहुत जल्दी कर दी जाने की। उस जहां में खुश रहना। अपने परिवार के लिए पितर बन चुके हो, उन पर आशीर्वाद बनाए रखना...

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