केवल तिवारी
28 फरवरी, 2026 को दैनिक ट्रिब्यून प्रूफ सेक्शन से पंडित अनिरुद्ध शर्मा जी सेवानिवृत्त हो गये। उनके लिए एक गेट टू गेदर के लिए हम दैनिक ट्रिब्यून न्यूजरूम के लोग कुछ योजना बना ही रहे थे कि पता चला कि खुद पंडित जी ने 27 तारीख की शाम को चाय-पानी की व्यवस्था अपनी ओर से की है। जब उन्होंने खुद ही चाय-पानी की व्यवस्था की तो फिर क्या कहना था। यह तो विदाई संबंधी बात का समापन था।
असल में बात की अब शुरुआत करता हूं उस वाकये से जो उन्होंने 27 फरवरी की रात करीब साढ़े दस बजे किया। असल में सेवानिवृत्ति के एक दिन पहले भी उन्होंने पूरी नौकरी की और साथ ही संपादक नरेश कौशल जी के सामने ही सभी टीम से कहा कि अब भी कभी मेरे लायक जरूरत पड़ी तो नि:शुल्क हाजिर रहूंगा। पंडित अनिरुद्ध जी को हम लोग ऑफिस के मुख्य गेट तक छोड़ने गये। उन्होंने गेट पर अंदर की ओर मुंह करके ट्रिब्यून जैसे महान संस्थान को दंडवत प्रणाम किया। इसके मुख्य दरवाजे पर शीश नवाया। मैं बात करूं पंडित जी के साथ अपने संबंधों की तो उनके साथ दो तरह से मिलना होता था। एक तो ऑफिस में हम साथ-साथ। इसके अलावा ट्रिब्यून स्कूल में उनकी बिटिया और मेरा बेटा एक ही क्लास में पढ़ते थे। अनेक बार पीटीएम में उनसे मुलाकात होती। इसके अलावा उनके बेटे का नाम कार्तिक और मेरे भी बेटे का नाम। वह जीरकपुर की तरफ से चंडीगढ़ के प्रवेश द्वार के करीब स्थित ट्रिब्यून सोसायटी कांप्लेक्स में पहले रहे। बाद में भी उसी घर के सामने दस साल मैं भी वहीं रहा। यानी उनकी बातें अक्सर होती रहतीं। जहां से भी सुनता, उनके बारे में यही कहा जाता कि वह धार्मिक व्यक्ति हैं। अच्छा संदेश देते हैं। बातों ही बातों में यहां बताना जरूरी समझता हूं कि एक दिन वह मुझे ऑफिस की कैंटीन में मिले और मुझसे कुछ बातें कहीं। साथ ही कहा कि आप खुलकर जीयें। बहुत परवाह क्यों करनी। मैं मान गया उनको। असल में, मेरी अजीब सी आदत है, छोटी-छोटी बातों को भी बहुत सोचता हूं। उनकी उस बात पर भी मैंने एक ब्लॉग लिखा था (https://ktkikanw-kanw.blogspot.com/2022/08/blog-post_19.html)खैर... पंडित जी की सहृदयता की चर्चा के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण बात है कि वह किसी की भलाई के लिए दो कदम आगे बढ़कर चलने वाले हैं। एक बार हमारे एक साथी पर संकट आ गया। साथी ही क्या, संस्थान पर ही संकट सा आ गया। उन्होंने कहीं इसके बारे में पूछा (पूछा से तात्पर्य है धार्मिक स्थिति से एक ऐसे व्यक्ति से पूछताछ जो सच्चे मन से कुछ करने के लिए कहते हैं)। अनिरुद्ध जी का मेरे पास फोन आया। कहा, 'एक उपाय है, करके देख लेते हैं, लेकिन 11 बजे तक अनवरत आना पड़ेगा। खान-पान सात्विक करना होगा।' मैंने तुरंत हामी भर दी। उसके बाद हम दो-चार लोग 11 दिनों तक विशेष पूजा में सुबह करीब दो घंटे लगाते। अंतिम दिन हम लोगों ने पारायण किया। हनुमान ध्वज लगाया। ईश्वर की कृपा और पंडित जी की शुभकामना रही कि तात्कालिक संकट टल गया। इसके बाद हम पंडित जी के गांव भी गये। उन व्यक्ति से भी मिले जिन्होंने यह उपाय बताया था। ऐसे अनेक किस्से हैं जब बातों-बातों में पंडित अनिरुद्ध जी का जिक्र आ जाता है। एक बार उन्होंने गुरुवानंद जी के किसी कार्यक्रम में बुलाया। डीएवी स्कूल में। उसके बाद एक अन्य कार्यक्रम में जो कलाग्राम में हुआ थ। अब अनेक लोग मिलते हैं तो आपस में जय गुरुदेव कहते हैं। अनेक लोगों की गलत आदतों को उन्होंने छुड़वा दिया। एक बार पंडित जी ने गृह प्रवेश में डेराबस्सी बुलाया। वहां भी अनेक लोग मिले। अभी हाल ही में, गत 11 मार्च को पंडित जी के सुपुत्र कार्तिक के विवाह समारोह में जाना हुआ तो वहां अनेक पुराने जानकार मिले। चर्चाएं हुईं। अच्छा लगा। पंडित जी बेशक ऑफिस से सेवानिवृत्त हुए हैं, लेकिन उनसे सलाह मशविरा जारी रहेगा। कुछ काम भी हैं जो उनसे मिलकर पूरे होंगे। पंडित आप स्वस्थ रहें यही कामना है। ईश्वर की, गुरुदेव की कृपा आप पर बनी रहे।






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