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Sunday, February 23, 2025

जी गये कोचर साहब... छोटी-छोटी बातों की है यादें बड़ी

केवल तिवारी

एक फिल्मी गीत में एक-दो पंक्तियां बड़ी दार्शनिक सी हैं। इनके बोल हैं, 'छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी।' सच में, जिन महानुभाव का मैं यहां जिक्र कर रहा हूं, उनके संबंध में मेरे लिए छोटी सी घड़ी ही है याद करने की। 


उनका नाम है तिलकराज कोचर और अब नाम के आगे स्वर्गीय जुड़ गया है। उम्र की सुई 94 पर पहुंचने ही वाली थी कि पिछले दिनों वे इस नश्वर संसार से विदा ले गये। मेरे लिए उनका तात्कालिक परिचय है कि वह हमारे संपादक नरेश कौशल जी के समधी थे। उनके बारे में लिखने का मुख्य कारण है उनका जिज्ञासु प्रवृत्ति का होना। दो-तीन साल पहले वह दैनिक ट्रिब्यून न्यूज रूम में पहुंचे थे। अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक्त भी वह 91 या 92 के होंगे। ठीकठाक उम्र। वह मेरे बगल में ही बैठे। संक्षिप्त परिचय के बाद अखबारी दुनिया यानी खबर आने से लेकर अखबार के छपने तक की प्रक्रिया को समझने लगे। पता चला कि वह मशीन सेक्शन भी देखने गए। कमाल है। मैं तो दंग रह गया और उन युवाओं पर लानत भेजने लगा जो हमेशा इस मुगालते में रहते हैं 'अहं ब्रह्मास्मि।' यानी मैं तो सबकुछ जानता हूं। सर्वज्ञ कौन होता है। इस बात को मानने वाले भी कितने होते हैं। बातों-बातों में पता चला कि तिलकराज जी अपने जमाने के इंजीनियर रहे हैं। एमईएस में उन्होंने लंबी सेवा दी है। जानकारी जुटाने के शौकीन हैं। अध्यात्म का उन्हें ज्ञान है। दवाओं की बड़ी जानकारी है। नित कई अखबार पढ़ते हैं। प्रथम पृष्ठ से लेकर संपादकी और ओपएड पेज से होते हुए अंतिम पृष्ठ तक। इतनी जानकारी रखने वाले व्यक्ति को जरा भी दंभ नहीं। वह एक बच्चे की तरह जानने की इच्छा रखते हैं। कोचर साहब के भोग कार्यक्रम में, मैं भी गया। उनकी बहू यानी संपादक जी की बेटी शैलजा कौशल का संदेश आया था। शैलजा हरियाणा सरकार में अधिकारी हैं। मेरे लिए उनका यह परिचय है कि वह लिखती हैं और उनकी एक रचना के पुरस्कृत होने के मौके पर उस कार्यक्रम को कवर करने का मुझे मौका मिला था। तिलकराज जी के पुत्र रिजु भी बेहद विनम्र व्यक्ति। विंग कमांडर से सेवानिवृत्त और वर्तमान में इंडिगो में पायलट बेहद मिलनसार हैं। पिता के जाने का दुख हम सब समझ सकते हैं, लेकिन एक 'भरपूर उम्र' में जाने के बाद शायद इसे विधि का विधान ही कहा जा सकता है, लेकिन उनकी इंटीमेसी कितनी रही होगी, यह उस दिन शांति पाठ के दौरान उनके शब्दों से पता चला। उसी दौरान शैलजा ने जब बोलना शुरू किया तो मेरी आंखें भी नम हो गयीं। मैं अपने आंखों की नमी छिपाने के दौरान इधर-उधर देखने लगा तो देखा कि वहां बैठे कई लोग रुमाल से आंसू पोछ रहे हैं। शैलजा ने बताया कि कैसे पिताजी का उनसे दोस्ताना संबंध था। वह ऑफिस में होती थीं तो पिताजी का फोन आता और कुछ मंगाते। अपनी भावनाओं को व्यक्त करते-करते उनका गला रुंध गया और साथ बैठे उनके पति रिजु भी सुबकने लगे। तिलकराज के भाई ने भी अपनी भावनाओं को व्यक्त किया।

प्रार्थनासभा और पंडितजी
प्रार्थना सभा में पंडित जी ने जहां ओम (ऊं) उच्चारण के लाभ गिनाए, वहीं सांसारिक जीवन में कर्मों के महत्व को समझाया। तिलकराज ही और उनकी पत्नी उषा से मिले ज्ञान को साझा किया। उन्होंने बताया कि उषा जी उन्हें किताबें पढ़ने को देती थीं। कुछ साल पूर्व उनका निधन हो गया। पंडित जी ने प्रार्थना के दौरान कबीर, रहीम और अनेक महान हस्तियों का हवाला देते हुए रामराज परिकल्पना का मतलब बताया। उन्होंने कहा-
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
बेहद मधुर वाणी में उद्गार व्यक्त करते हुए पंडितजी को हर किसी ने बहुत मनोयोग से सुना। सामने रखी तिलकराज की तस्वीर और वहां जल रहा दिया। ऐसा लग रहा था तिलकराज जी तो अपने परिवार के आसपास ही हैं। अदृश्य होकर वह आशीर्वाद दे रहे हैं। ऐसा लगा मानो मुस्कुराते हुए कह रहे हैं, "सिर्फ़ ज़िंदा रहने को ज़िंदगी नहीं कहते।" तिलकराज जी को नमन।

Monday, February 10, 2025

एक महाकुंभ पुस्तकों का... मैंने भी लगाई डुबकी

 


केवल तिवारी

प्रयागराज महाकुंभ की चहुंओर हो रही चर्चा के बीच, पिछले दिनों पुस्तकों के एक महाकुंभ में मैंने भी डुबकी लगाई। नयी दिल्ली स्थिति प्रगति मैदान में बने भारत मंडपम में 25वें विश्व पुस्तक मेले में जाने का मौका मिला। दिल्ली में एक-दो काम थे, साथ ही इंदौर निवासी वरिष्ठ पत्रकार हेमंत पाल जी का भी आग्रह था कि पुस्तक मेला जाना हो तो मेरी पुस्तक 'फ्लैश बैक' भी देखना। पुस्तक मेले में गया तो खुश होने के कई कारण थे। एक तो किताबों के प्रति हर वर्ग के लोगों का अनुराग, दूसरे अनेक विद्वानों से मुलाकात और सार्थक चर्चा। कुछ भावुक बातें और कुछ यादों का भी दौर चला। सिलसिलेवार करता हूं चर्चा।

चंडीगढ़ से जब दोपहर के करीब भारत मंडपम के पास गया तो



















लंबी कतार लगी थी पुस्तक मेले में जाने के लिए। बेशक वह वर्किंग डे यानी कार्यदिवस था फिर भी लोग उमड़ रहे थे। मैं भी लग गया कतार में और पहुंच गया भारत मंडपम में। सबसे पहले मैं हॉल नंबर दस में गया। कुछ किताबें देखीं, फिर हॉल नंबर दो की तरफ चल दिया। वहां कुछ स्टॉल्स से किताबें खरीदीं और वहां आए लोगों से बातचीत करने लगा। घूमते-घूमते जब एक किताब 'उड़न छूं गांव' की खोज में इधर-उधर घूम रहा था तो एक आवाज आई। देखा तो बड़े भाई समान एवं वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार चारू तिवारी जी मुझे बुला रहे थे। उन्होंने 'दुदबोली' पत्रिका भेंट की और गैरोला जी से मुलाकात करवाई। साथ ही कुछ और साहित्यानुरागी मिले। इसके बाद कुछ देर हम लोगों ने वहीं बैठकर चर्चा की और चल दिए पुस्तक मेले का एक और दौरा लगाने। इस बीच कई प्रकाशकों के स्टॉल्स पर हम लोग गये। तभी एक जगह वरिष्ठ साहित्यकार रामशरण जोशी जी मिल गये। चारू जी के जरिये हमारी मुलाकात हुई। आजकल हर हाथ में मोबाइल रूपी कैमरा है तो कुछ फोटो भी खींचे। फिर हम चले गए आगे की ओर। बातों-बातों में मैंने पंकज बिष्ट जी का जिक्र किया। पंकज जी के अनेक उपन्यास पढ़े हैं। उनकी रचनाओं पर अनेक लोगों से चर्चा भी की है। वह लंबे समय से 'समयांतर' पत्रिका निकाल रहे हैं। गैर व्यावसायिक, लेकिन सारगर्भित। उनके साथ कुछ देर बात हुई। मैंने उनके स्वास्थ्य का हालचाल जाना तो उनकी एक पंक्ति में उत्तर देना अच्छा लगा कि जब तक पत्रिका चल रही है, तब तक हम भी चल रहे हैं। यानी लिखने-पढ़ने वालों की यही तो खुराक है। इसी दौरान चारू जी से विभिन्न मुद्दों पर बात होती रही है। चारू जी ने क्षेत्रीय पत्रकारिता के साथ ही उत्तराखंड के विभिन्न विषयों और रचनाधर्मियों पर शोध कार्य किया है। एक तरह से उन्हें उत्तराखंड का इनसाइक्लोपीडिया कहा जा सकता है। अपनी शोध प्रवृत्ति के कारण ही उन्होंने मुख्य धारा की पत्रकारिता जिसे बतौर रोजी-रोटी वह चला रहे थे, उससे किनारा कर लिया। खैर... बातों-बातों में हम लोग अनेक स्टॉल्स पर गये। इसी दौरान वरिष्ठ पत्रकार अनिल तिवारी जी मिले और साथ थीं उनकी बेटी गौरा। बाद में पता चला कि गौरा अच्छा लिखती हैं और एक-दो किताबों से उनको रॉयल्टी भी मिली है। पुस्तकों की इस खरीदारी के बाद मैं राजेश की बताई दो पुस्तकों की खोज में निकला। एक मिल गयी, दूसरी नहीं। समय तेजी से निकलता गया और अंतत: चारूजी से विदा लेकर मैं बाहर निकल आया। पुस्तकों के इस महाकुंभ में थोड़ी सी डुबकी लगाने की इस यात्रा को दिल में सहेजकर मैं लौट आया।

बेटे को किया फोन और वह भावुक पल

पुस्तक मेले में कुछ देर भ्रमण के बाद मैं थोड़ी देर के लिए भारत मंडपम परिसर के लॉन में आकर बैठ गया। तब तक खरीदी हुई पुस्तकों को बैग में ठीक से रखने लगा। इसी दौरान बड़े बेटे कार्तिक से पूछा कि कोई किताब तो नहीं लानी है। वह भी पढ़ने का शौकीन है। हालांकि कहीं भी जाता है तो अपने लिए खुद ही किताबें ले आता है। कई बार कुछ पुस्तकों के कथानक को लेकर मुझसे भी चर्चा करता है। एक-दो किताबें मुझे भी दी हैं। उसने कहा कि अभी फोन पर तो क्या बताऊं। लेकिन साथ ही एक भावुक बात भी की। उसने कहा, 'पापा आपको याद है कि जब बचपन में आप मुझे लाए थे तो मैंने एक मॉडल खरीदवाया था जिसके टुकड़ों को जोड़कर हमने अलग-अलग मॉडल बनाए थे।' (असल में जब वह चौथी या पांचवी में था, मैं उसे लेकर पुस्तक मेले में आया था। यहां बच्चों के एक स्टॉल पर उसे एक क्राफ्ट पीस पसंद आया जिसके टुकड़ों को जोड़कर चांद, बिल्डिंग, नाव आदि बनाई जा सकती थीं। वह कई साल तक उसके साथ प्रयोग भी करता रहा और मैंने उसे कुछ किताबें भी दिलवाईं।) मैं भावुक हो गया और उससे कहा कि हां मुझे याद है। उसने कहा कि देखना वैसा ही कुछ मिले तो धवल (उसका छोटा भाई यानी मेरा छोटा बेटा) के लिए ले लेना। मैं फिर अंदर गया। भरा बैग पीठ पर लदा हुआ था, लेकिन वैसा कुछ इस बार नहीं मिला। पर पुरानी बातों को याद कर मैं कब मेट्रो स्टेशन तक पहुंच गया पता नहीं चला और बैग के भार से कंधे दुखने का भी असर तब महसूस हुआ जब मैं मेट्रो में बैठ गया।

पुस्तक मेला और पैदल चलने के दौरान की कुछ तस्वीरें यहां साझा कर रहा हूं।


Wednesday, February 5, 2025

हम सब तो मिलते रहेंगे... भाटिया जी का साथ

केवल तिवारी

शुरुआत बशीद बद्र साहब की शायरी से करता हूं, जिसके बोल इस तरह से हैं-
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।






यूं तो हम सब दुनिया में ही एक मुसाफिर हैं, फिर ऑफिसियल मसले की बात करें तो यहां तो मुसाफिर हैं ही। एक निश्चित अवधि के बाद हमें यहां से रुखसत होना ही होता है। ट्रिब्यून संस्थान की बहुत अच्छी बात है कि यहां पारिवारिक संबंध लोगों के बने होते हैं क्योंकि लंबे समय से सब साथ काम करते हैं। एक दशक से अधिक समय से मैं भी ट्रिब्यून में हूं और विभागीय, गैर विभागीय अनेक लोगों से अच्छे ताल्लुकात बने हैं। ऐसे ही एक अजीज राम कृष्ण भाटिया जी पिछले दिनों सेवानिवृत्त हुए। भाटिया जी उन चंद लोगों में से हैं जिनके साथ 'from first day' मेरी मित्रता हो गयी। फिर उनकी बिटिया मेरे बेटे की सीनियर रहीं, इससे बातचीत में और प्रगाढ़ता आई। कोविड काल के दौरान हालात जब थोड़े नकारात्मक होने लगे तो भाटिया जी से मैं पूछता था कि वो दिन... मेरे सवाल के बीच में ही वह कह डालते फिर आएंगे, फिर आएंगे। वाकई फिर माहौल सामान्य हुआ। आदरणीय नरेश कौशल जी दैनिक ट्रिब्यून के संपादक बनकर आए और ऑफिस के माहौल में नये उत्साह का संचार हुआ। इसी उत्साह और मिलनसार संपादकत्व का कमाल था कि भाटिया जी की रिटायरमेंट पार्टी में हम अनेक लोगों को जाने का मौका मिला और न्यूजरूम की अच्छी खासी भागीदारी रही। उनके विभाग के अनेक लोगों की प्रतिभाएं भी सामने आईं और सभी ने अपने उद्गार व्यक्त किए। मेरे दिल में कई तरह की बातें हैं, जिन्हें व्यक्त करना चाहता हूं, लेकिन कई बातें तस्वीरें भी कह देती हैं। यहां तस्वीरों को साझा कर रहा हूं, साथ ही कुछ शायरियां जो कम शब्दों में बहुत कुछ कह देती हैं। भाटिया जी को सेवानिवृत्ति की हार्दिक शुभकमानाएं। आप स्वस्थ रहें और मस्त रहें।
आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई
ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई

आज नागाह हम किसी से मिले
बा'द मुद्दत के ज़िंदगी से मिले

काफ़ी नहीं ख़ुतूत किसी बात के लिए
तशरीफ़ लाइएगा मुलाक़ात के लिए

हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले
ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना