केवल तिवारी
शुरुआत बशीद बद्र साहब की शायरी से करता हूं, जिसके बोल इस तरह से हैं-
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।
यूं तो हम सब दुनिया में ही एक मुसाफिर हैं, फिर ऑफिसियल मसले की बात करें तो यहां तो मुसाफिर हैं ही। एक निश्चित अवधि के बाद हमें यहां से रुखसत होना ही होता है। ट्रिब्यून संस्थान की बहुत अच्छी बात है कि यहां पारिवारिक संबंध लोगों के बने होते हैं क्योंकि लंबे समय से सब साथ काम करते हैं। एक दशक से अधिक समय से मैं भी ट्रिब्यून में हूं और विभागीय, गैर विभागीय अनेक लोगों से अच्छे ताल्लुकात बने हैं। ऐसे ही एक अजीज राम कृष्ण भाटिया जी पिछले दिनों सेवानिवृत्त हुए। भाटिया जी उन चंद लोगों में से हैं जिनके साथ 'from first day' मेरी मित्रता हो गयी। फिर उनकी बिटिया मेरे बेटे की सीनियर रहीं, इससे बातचीत में और प्रगाढ़ता आई। कोविड काल के दौरान हालात जब थोड़े नकारात्मक होने लगे तो भाटिया जी से मैं पूछता था कि वो दिन... मेरे सवाल के बीच में ही वह कह डालते फिर आएंगे, फिर आएंगे। वाकई फिर माहौल सामान्य हुआ। आदरणीय नरेश कौशल जी दैनिक ट्रिब्यून के संपादक बनकर आए और ऑफिस के माहौल में नये उत्साह का संचार हुआ। इसी उत्साह और मिलनसार संपादकत्व का कमाल था कि भाटिया जी की रिटायरमेंट पार्टी में हम अनेक लोगों को जाने का मौका मिला और न्यूजरूम की अच्छी खासी भागीदारी रही। उनके विभाग के अनेक लोगों की प्रतिभाएं भी सामने आईं और सभी ने अपने उद्गार व्यक्त किए। मेरे दिल में कई तरह की बातें हैं, जिन्हें व्यक्त करना चाहता हूं, लेकिन कई बातें तस्वीरें भी कह देती हैं। यहां तस्वीरों को साझा कर रहा हूं, साथ ही कुछ शायरियां जो कम शब्दों में बहुत कुछ कह देती हैं। भाटिया जी को सेवानिवृत्ति की हार्दिक शुभकमानाएं। आप स्वस्थ रहें और मस्त रहें।
आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई
ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई
आज नागाह हम किसी से मिले
बा'द मुद्दत के ज़िंदगी से मिले
काफ़ी नहीं ख़ुतूत किसी बात के लिए
तशरीफ़ लाइएगा मुलाक़ात के लिए
हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले
ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना
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