केवल तिवारी
एक फिल्मी गीत में एक-दो पंक्तियां बड़ी दार्शनिक सी हैं। इनके बोल हैं, 'छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी।' सच में, जिन महानुभाव का मैं यहां जिक्र कर रहा हूं, उनके संबंध में मेरे लिए छोटी सी घड़ी ही है याद करने की।
उनका नाम है तिलकराज कोचर और अब नाम के आगे स्वर्गीय जुड़ गया है। उम्र की सुई 94 पर पहुंचने ही वाली थी कि पिछले दिनों वे इस नश्वर संसार से विदा ले गये। मेरे लिए उनका तात्कालिक परिचय है कि वह हमारे संपादक नरेश कौशल जी के समधी थे। उनके बारे में लिखने का मुख्य कारण है उनका जिज्ञासु प्रवृत्ति का होना। दो-तीन साल पहले वह दैनिक ट्रिब्यून न्यूज रूम में पहुंचे थे। अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक्त भी वह 91 या 92 के होंगे। ठीकठाक उम्र। वह मेरे बगल में ही बैठे। संक्षिप्त परिचय के बाद अखबारी दुनिया यानी खबर आने से लेकर अखबार के छपने तक की प्रक्रिया को समझने लगे। पता चला कि वह मशीन सेक्शन भी देखने गए। कमाल है। मैं तो दंग रह गया और उन युवाओं पर लानत भेजने लगा जो हमेशा इस मुगालते में रहते हैं 'अहं ब्रह्मास्मि।' यानी मैं तो सबकुछ जानता हूं। सर्वज्ञ कौन होता है। इस बात को मानने वाले भी कितने होते हैं। बातों-बातों में पता चला कि तिलकराज जी अपने जमाने के इंजीनियर रहे हैं। एमईएस में उन्होंने लंबी सेवा दी है। जानकारी जुटाने के शौकीन हैं। अध्यात्म का उन्हें ज्ञान है। दवाओं की बड़ी जानकारी है। नित कई अखबार पढ़ते हैं। प्रथम पृष्ठ से लेकर संपादकी और ओपएड पेज से होते हुए अंतिम पृष्ठ तक। इतनी जानकारी रखने वाले व्यक्ति को जरा भी दंभ नहीं। वह एक बच्चे की तरह जानने की इच्छा रखते हैं। कोचर साहब के भोग कार्यक्रम में, मैं भी गया। उनकी बहू यानी संपादक जी की बेटी शैलजा कौशल का संदेश आया था। शैलजा हरियाणा सरकार में अधिकारी हैं। मेरे लिए उनका यह परिचय है कि वह लिखती हैं और उनकी एक रचना के पुरस्कृत होने के मौके पर उस कार्यक्रम को कवर करने का मुझे मौका मिला था। तिलकराज जी के पुत्र रिजु भी बेहद विनम्र व्यक्ति। विंग कमांडर से सेवानिवृत्त और वर्तमान में इंडिगो में पायलट बेहद मिलनसार हैं। पिता के जाने का दुख हम सब समझ सकते हैं, लेकिन एक 'भरपूर उम्र' में जाने के बाद शायद इसे विधि का विधान ही कहा जा सकता है, लेकिन उनकी इंटीमेसी कितनी रही होगी, यह उस दिन शांति पाठ के दौरान उनके शब्दों से पता चला। उसी दौरान शैलजा ने जब बोलना शुरू किया तो मेरी आंखें भी नम हो गयीं। मैं अपने आंखों की नमी छिपाने के दौरान इधर-उधर देखने लगा तो देखा कि वहां बैठे कई लोग रुमाल से आंसू पोछ रहे हैं। शैलजा ने बताया कि कैसे पिताजी का उनसे दोस्ताना संबंध था। वह ऑफिस में होती थीं तो पिताजी का फोन आता और कुछ मंगाते। अपनी भावनाओं को व्यक्त करते-करते उनका गला रुंध गया और साथ बैठे उनके पति रिजु भी सुबकने लगे। तिलकराज के भाई ने भी अपनी भावनाओं को व्यक्त किया।
प्रार्थनासभा और पंडितजी
प्रार्थना सभा में पंडित जी ने जहां ओम (ऊं) उच्चारण के लाभ गिनाए, वहीं सांसारिक जीवन में कर्मों के महत्व को समझाया। तिलकराज ही और उनकी पत्नी उषा से मिले ज्ञान को साझा किया। उन्होंने बताया कि उषा जी उन्हें किताबें पढ़ने को देती थीं। कुछ साल पूर्व उनका निधन हो गया। पंडित जी ने प्रार्थना के दौरान कबीर, रहीम और अनेक महान हस्तियों का हवाला देते हुए रामराज परिकल्पना का मतलब बताया। उन्होंने कहा-
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
बेहद मधुर वाणी में उद्गार व्यक्त करते हुए पंडितजी को हर किसी ने बहुत मनोयोग से सुना। सामने रखी तिलकराज की तस्वीर और वहां जल रहा दिया। ऐसा लग रहा था तिलकराज जी तो अपने परिवार के आसपास ही हैं। अदृश्य होकर वह आशीर्वाद दे रहे हैं। ऐसा लगा मानो मुस्कुराते हुए कह रहे हैं, "सिर्फ़ ज़िंदा रहने को ज़िंदगी नहीं कहते।" तिलकराज जी को नमन।
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