केवल तिवारी
श्रीलाल शुक्ल जी की व्यंग्य रचना 'राग दरबारी' को लिखे करीब-करीब छह दशक होने को हैं, लेकिन आज भी वह उतनी ही लोकप्रिय है, जितनी अपने दौर में थी। सरकारी तंत्र और इस तंत्र का फायदा उठाने वालों पर करारी चोट करते इस व्यंग्य उपन्यास की एक-एक लाइन की व्याख्या हो सकती है। मुझे यह उपन्यास पढ़े करीब ढाई दशक हो गया। उस दौर में दो-तीन बार पढ़ डाली थी। फिर किसी ने मांगी, अपने किताबों के ढेर में इसे बहुत ढूंढ़ा, लेकिन मिल नहीं रही। ऐसी ही एक और किताब मनोहर श्याम जोशी की 'कसप' भी गायब है। खैर... पिछले दिनों खबर आई कि श्रीलाल शुक्ल जी की सौवीं जयंती मनाई जा रही है। तब अचानक फिर राग दरबारी की याद आई। कुछ मित्रों से इस उपन्यास की चर्चा करने लगा तो सबने अपने-अपने ढंग से इसकी कुछ पंक्तियों को याद किया। इस दौरान कई खबरें भी चलीं। फिर याद आने लगे पुराने दौर के व्यंग्य रचनाकारों की। हास्य कलाकारों की। किसी ने काका हाथरसी का नाम लिया तो किसी ने केपी सक्सेना का। कुछ ने गोपाल चतुर्वेदी को याद किया किसी ने शौकत थानवी, रघुवीर सहाय और मुद्राराक्षस का नाम लिया। चूंकि पढ़ाई-लिखाई लखनऊ में हुई तो उन दिनों वहां स्वतंत्र भारत छपता था। उसमें उपरोक्त लेखकों के अलवा उर्मिल कुमार थपलियाल के भी व्यंग्य छपते थे। इंदिरा नगर की ओर जाना होता था तो कुछ व्यंग्यकारों के घर देखकर ही खुश हो जाया करता था। अनेक लेखक ऐसे हैं जो बातें भले बड़ी-बड़ी करते हों, लेकिन मिलने-मिलाने के पीछे भी कारण ढूंढ़ते हैं, इसलिए मिलना कभी नहीं हो पाया। बाद में तो पत्रकारिता की ही लाइन में आया तो अनेक लेखकों से मिलना हुआ, छपना और छापना हुआ। खैर... आज बात महान व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल की।
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| साभार: इंटरनेट |
बातों के दौरान उनकी कुछ पंक्तियों की चर्चा देखिये- 'नहीं यह ट्रक सड़क से आधा बाहर नहीं है, यह आधा सड़क के अंदर है।' ऐसी ही कुछ पंक्तियां हैं
हर बड़े राजनीतिज्ञ की तरह वे राजनीति से नफ़रत करते थे और राजनीतिज्ञों का मज़ाक उड़ाते थे।
वैद्यजी के प्रभाव से वह किसी भी राह चलते आदमी पर कुत्ते की तरह भौंक सकता था, पर वैद्यजी के घर का कोई कुत्ता भी हो, तो उसके सामने वह अपनी दुम हिलाने लगता था। यह दूसरी बात है कि वैद्यजी के घर पर कुत्ता नहीं था और सनीचर के दुम नहीं थी।
यह हमारी गौरवपूर्ण परम्परा है कि असल बात दो–चार घंटे की बातचीत के बाद अंत में ही निकलती है।
इंसानियत का प्रयोग शिवपालगंज में उसी तरह चुस्ती और चालाकी का लक्षण माना जाता था जिस तरह राजनीति में नैतिकता का
लेक्चर का मज़ा तो तब है जब सुननेवाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूं।
श्रीलाल शुक्ल जी की सौवीं जयंती पर खबरों का भी दौर चला। उनकी जिस महान रचना का मैं ऊपर वर्णन कर चुका हूं, उसके कारण वे उपहास का भी पात्र बने। नेमीचंद जैन जैसे प्रमुख लेखकों और आलोचकों ने इसे 'असंतोष का शोर' बताया था और श्रीपत राय ने इसे 'महान बोरियत का महान उपन्यास' कहा था। लेकिन इन तमाम आलोचनाओं के बावजूद शुक्ल ने अगले साल 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता और यह तीखा व्यंग्य समय की कसौटी पर खरा उतरा। कहते हैं कि यह हिंदी साहित्य के सबसे ज्यादा पढ़े गए तथा अनुवादित उपन्यासों में से एक है। असल में 1968 में लिखी गई 'राग दरबारी' उनके नाम का पर्याय बन गयी है जिसे अब हिंदी व्यंग्य लेखन में एक मील का पत्थर माना जाता है। श्रीलाल शुक्ल का 2011 में निधन हुआ और अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने 25 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें 'मकान', 'सूनी घाटी का सूरज', 'पहला पड़ाव' और 'बिश्रामपुर का संत' शामिल हैं। 2005 में 'श्रीलाल शुक्ल: जीवन ही जीवन' शीर्षक से निबंधों के एक संग्रह में, उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज में जन्मे आईएएस अधिकारी शुक्ल ने याद किया कि किस तरह उपन्यास ने उन्हें लगभग छह साल तक 'बीमार रखा', जिससे वह एक बहिष्कृत व्यक्ति बन गए। उन्होंने लिखा था, 'उन गंवार किरदारों के साथ दिन-रात रहते-रहते मेरी ज़बान घिस गई। इज़्ज़तदार औरतें कभी-कभी खाने की मेज़ पर मेरी तरफ़ भौंहें चढ़ाकर देखती थीं, और मैंने अपने परिवार से तथा मेरे परिवार ने मुझसे दूर रहना शुरू कर दिया। मेरी समस्या यह थी कि किताब लिखने के लिए कोई जगह सही नहीं लग रही थी।' यहां बता दूं कि मोहनलाल गंज भी लखनऊ से लगा हुआ है और अक्सर यहां आना-जाना भी होता था। शिवपालगंज नाम के काल्पनिक गाँव पर आधारित 'राग दरबारी' ने भारतीय सत्ता संरचना की आलोचना की, जहां गांव एक ऐसे राष्ट्र का रूपक बन जाता है जो शासन और नैतिकता दोनों में विफल रहा है। भारत की सामाजिक-राजनीतिक संरचना की तीखी आलोचना को इसके किरदारों के ज़रिए यादगार बनाया गया, जिनमें नैतिक संतुलन की कमी है, जो 'सभ्यता' से रहित हैं, और एक ऐसे समाज का सामूहिक चित्र बनाते हैं जहां भ्रष्टाचार सामान्य है, आदर्श सिर्फ़ दिखावे के हैं, और अस्तित्व ईमानदारी के बजाय अनुकूलन पर निर्भर करता है। हिंदी साहित्य में शुक्ल के योगदान के बारे में कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने एक जगह कहा कि लेखक ने भारत में विकास के इर्द-गिर्द फैले मिथक को तोड़ दिया। उन्होंने 'राग दरबारी' में जो किया- यह दिखाना कि यह तथाकथित विकास विरोधाभासों, भ्रष्टाचार, देरी, लापरवाही, बेफिक्री और जड़ता से कैसे भरा हुआ था, और इसने लोगों के रोज़मर्रा के जीवन को कैसे प्रभावित किया- वह सच में महत्वपूर्ण था। अगर हम हिंदी साहित्य के पिछले 100 वर्षों को देखें, तो श्रीलाल शुक्ल निस्संदेह इसके महान दिग्गजों में से एक हैं। उन्होंने मुख्य रूप से गद्य लिखा और एक प्रमुख उपन्यासकार थे। चर्चा में कुछ लोगों ने व्यंग्य उपन्यास राग दरबारी को गांवों को परेशान करने वाली बदसूरती या विकृतियों को दिखाने वाली बताया। किसी ने इसे आज भी प्रासांगिक बताया। कई लोग इस बात से भी इत्तेफाक रखते हैं कि श्रीलाल शुक्ल को समझने के लिए सिर्फ राग दरबारी ही नहीं, शुक्ल के अन्य रचनाओं को भी पढ़ना पढ़ेगा। खैर शुक्ल जी की अनेक रचनाओं की चाहे जितनी बात हो, उन्हें पहचान तो राग दरबारी ने ही दिलाई। समय भले बदल गया हो, लेकिन उपन्यास में उल्लिखित किरदार हम-आपमें किसी न किसी रूप में मौजूद हैं ही।

