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Friday, January 30, 2026

छोटे से सफर के कई हमसफर और यादें उम्रभर की...

केवल तिवारी

हर अगला पल बीता हुआ हो जाएगा, कुछ यादों को ये मन गुनगुनाएगा
आपाधापी-भागादौड़ी से सुकून थोड़ा, यादों के तिनकों को

हमने जोड़ा
कुछ अपनी सुनाई, कुछ सबकी सुनी, इस सफर पर हमने कहानी बुनी
तरोताजा हुए दिल से निकली आवाज, वादियों में बजी जिंदगी की साज

तारीख 26/01/26, दिन सोमवार। अखबारी दुनिया में कुछ छुट्टियां होती हैं जिनमें सभी साथी एक साथ कहीं आ-जा सकते हैं। दिल्ली में था तो ऐसी छुट्टियां दो ही होती थीं। एक होली और दूसरी दिवाली। इन छुट्टियों में पारिवारिक दायित्व होते थे, लिहाजा दिनभर के लिए मित्र मंडली में गपशप नहीं हो सकती थी। चंडीगढ़ में ऐसी छुट्टियां चार होती हैं। उक्त दो में दो और... एक पंद्रह अगस्त और दूसरी 26 जनवरी। अपने (दैनिक ट्रिब्यून के) संपादक नरेश कौशल जी से हम कुछ लोगों ने आग्रह किया कि इस बार गणतंत्र दिवस पर कहीं चलते हैं। काम में पूरा समर्पण और फुर्सत के पलों में खूब हंसी-मजाक को तवज्जो देने वाले कौशल साहब ने हामी भर दी और कहा कि पूरे न्यूज रूम एवं उनके स्टाफ से बात कर लीजिए। ज्यादातर लोग राजी हो गए और कुछ को जरूरी काम से बाहर जाना था। हम 17-18 लोग सुबह नौ बजे के करीब एक बस से चल पड़े कसौली के लिए। कोई शिकवा-शिकायत नहीं। कोई इधर-उधर की नहीं। सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन। किसी ने गीत सुनाया तो किसी ने चुटकुला। कोई शेर-ओ-शायरी में सिद्धहस्त दिखा तो किसी ने रामचरित मानस की चौपाइयां सुनाईं। कसौली जाना, वहां कुछ घंटे रुकना फिर देर शाम तक घर लौट आना, सारा मंजर ऐसा लगा मानो अभी कोई सपना देख रहे थे और नींद खुल गयी। एक शायर की दो लाइनें याद आ रही हैं-
तुम पर क्या बीती हमको सुनाओ, ए जाते हुए लम्हों तुम लौट के आना
यह सफर बहुत यादगार रहा। इससे जुड़ी कुछ फोटो और वीडियो साझा कर रहा हूं। सफर संबंधी उस सदाबहार शेर के साथ
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ, ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां। 






 



Saturday, January 24, 2026

परिवार मिलन की एक और भोर... साथ ले चलें आओ गांव की ओर

केवल तिवारी

संस्कारों की खास महत्ता, बूटा-बूटा, पत्ता-पत्ता।

कण-कण में भगवान हमारे, नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे।

ऋत्विक का जनेऊ संस्कार, साथ मिला पूरा परिवार।

डगर जब चली उधर, अपने गांव में पग आए धर। 

प्रिय भानजी रुचि और दामाद दीपेश का बहुत पहले फोन आ गया था कि बेटे रिशू (ऋत्विक) का जनेऊ यानी यज्ञोपवीत संस्कर है। मुख्य आयोजन 22 और 23 जनवरी को। बता दें कि उत्तराखंड में यज्ञोपवीत संस्कार भी वैवाहिक कार्यक्रम की तरह होता है। मैंने तैयारी कर ली। पत्नी भावना साथ जा नहीं सकती थी क्योंकि छोटे बेटे धवल के प्री बोर्ड चल रहे हैं। सब लोगों से मिलने का लालच और जब हल्द्वानी तक गए ही हैं तो क्यों न एक थोड़ी देर के लिए गांव भी हो लिया जाए। थोड़ी-बहुत पूजा-पाठ हो जाएगी और कुछ मिलना-जुलना। साथ में जन्मभूमि को प्रणाम। हालांकि बहुत शॉर्ट कार्यक्रम था, लेकिन रहा शानदार। 

जरूरी हैं ऐसे आयोजन : मेरा मानना है कि हो सके तो ऐसे आयोजन कर लेने चाहिए। भव्यता या नव्यता अलग बात है, लेकिन परंपरागत गीत-संगीत, अपनों से मेल-मिलाप और नयी पीढ़ी के साथ पुरानी का संयोजन। हालांकि आजकल बच्चों की परीक्षाओं, नौकरी संबंधी कई दिक्कतों के चलते उन्हें शामिल करना मुश्किल भी हो रहा है, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये उनको जोड़ लेना चाहिए। 

दीपेश-रुचि और उनका परिवार : दीपेश-रुचि को सैल्यूट है कि वह हर एक चीज का ध्यान रख रहे थे, मसलन- कब लोगों को चाय पूछना है, कब नवआगंतुक से हालचाल लेना है और कब विदाई के समय कुछ देना है। इस दौरान अस्वस्थ उनकी माताजी। बेशक शरीर से वह अस्वस्थ हैं, लेकिन मन से पूरी ऊर्जा है। हर आने-जाने वाले से ऐसे मिल रहीं थीं कि अगर सिर्फ बातचीत सुनी जाये यानी वीडियो रूप में न हो और सिर्फ ऑडियो हो तो लगे कि चलते-चलते दो लोग बात कर रहे हैं। इस सबसे इतर बटुक यानी रिशू के ताऊ-ताई सुबोध और तृप्ति का काम निभाना और मौका निकालकर नाच-गाने में शामिल हो जाना। दोनों ने समां बांध दिया। इस सबके बीच नन्हे ओम की नटखट शरारत दिल को छू लेती। कुछ फोटो और वीडियो साझा करूंगा, देखिएगा-सुनिएगा। 

दीदीयों का जन्मदिन : इत्तेफाक रहा कि 22 तारीख को विमला दीदी का जन्मदिन था। कुछ ही दिन पहले शीला दीदी का था और दो दिन बाद प्रेमा दीदी का है। हम सबने मिलकर तीनों दीदीयों का जन्मदिन मनाया। सबसे बड़ी दीदी यानी रुचि की मम्मी सितारों के उस पार से हमें देख रही थी और आशीर्वाद दे रही थी। साथ थे हम सबके प्यारे दद्दू यानी दीपेश के पापा। हमने महसूस किया उनके आशीर्वाद को। 

... और गांव की यात्रा : मेरा अपने गांव रानीखेत के पास डढूली में जाना लंबे समय से टल रहा था। एक बार लखनऊ दाज्यू लोगों से बात की, लेकिन समय का संयोजन हो न सका। इस बार मैंने ठान ली कि चलना है। मेरे जेठू यानी भावना के बीच वाले भाई साहब ने पूरा साथ दिया। उनकी कार से हम तीनों (साथ में मनोज पंडित जी) गांव होकर आये। लगा जैसे छूकर छूमंतर हुए। पहले अपने पुश्तैनी मकान पर गये। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुके घर की देहरी पर शीश नवाया। फिर आसपास विरादरों से मिले। वसंतदा घर पर नहीं थे, भाभी जी मिलीं। पनदा के यहां भाभी ने चाय बनायी। बाद में गोलथान में धूप बत्ती की। रोली, चंदन, अक्षत और फूल भाभी ने दे दिए। फिर गांव के लोगों से मिलते हुए पहुंचे धूनी यानी बंबईनाथ स्वामी के दर पर। यहां भी कुछ समय पूजा-अर्चना के बाद वापस आ गए। 

वह 103 साल की चाची : तल बाखई नरदा की ईजा से हमेशा सबसे पहले मिलन होता है। हम उन्हें चाची कहते हैं। चाची अंदाजन 103 साल की हो गयी हैं। बताती हैं कि उन्होंने मेरी ईजा की भी शादी देखी है। उनके कान और आंख के साथ पाचन शक्ति भी सही है। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें। 

कई यादों को सहेजे यह यात्रा भी सुखद रही। इन सबके बीच, काठगोदाम थोड़ी देर के लिए जाना, नेहा के हाथों चाय पीना, निर्माणाधीन घर को देखना, पहली रात उस घर से संबंधित लवली भाभी और सिद्धू के प्रयास से बने बेहतरीन और भावुक वीडियो देखना, सुरेश पांडेय जी और हेमंत पांडे एवं परिवार से मिलना वगैरह वगैरह यादें भी हैं। इस सफर की बातें तो बहुत सी हैं, लेकिन उन्हें कहानीनुमा अंदाज में अगले ब्लॉग में। कुछ फोटो और वीडियो।












Tuesday, January 13, 2026

दूसरों को चेतावनी देते -देते खुद झांसे में आ गया, गनीमत है यह फ्रॉड नहीं था... फिर भी सावधान




केवल तिवारी 

मंगलवार की सुबह एक फोन आया। दूसरी ओर से एक मैडम ने कहा कि HDFC Bank से बोल रही हूं। आपका अकाउंट हमारे यहां है। कोई issue तो नहीं है। मैंने बताया कि पिछले दिनों मैंने एक छोटी सी online payment की, उसके 28 रुपए चार्ज काट लिया। मैडम ने hold करने के लिए कहा और बताया कि आपने यानी मैंने net banking से नहीं, कार्ड से पेमेंट किया है। विश्वास के लिए इतना पर्याप्त था। इससे पहले भी जब फोन आया तो Truecaller और Airtel की तरफ से कोई अलर्ट मैसेज नहीं आया। खैर बात होने लगी। कुछ विश्वास जमने पर मैडम ने कहा कि मेरे लिए credit card offer है। लाइफ टाइम फ्री। हालांकि इस फ़्री में कितना सत्य होता है, यह किसी से छिपा नहीं। एक दिन पहले भी HDFC Bank से फोन आया था, इसी बात के लिए, मैंने मना कर दिया था। लेकिन इस वक्त पता नहीं क्या हुआ कि मैं बात करता रहा और OTP बता दिया। पहले account releted फिर आधार संबंधी। मैंने तमाम आशंकाएं जताई, लेकिन मैडम ने कहा कि आप पिन genrate करने से पहले Bank आ जाना। Satisfaction के बाद ही कार्ड का इस्तेमाल करना। इसी दौरान कार्ड apply का मैसेज आ गया। बात खत्म होने के बाद मैंने 10 बार account check किया। हम लोवर मिडिल क्लास के खाते में होता ही कितना है, लेकिन जितना भी होता है, सबकुछ होता है। मुझे याद आया अपने पुराने पड़ोसी जोगिंदर लाल जी वाला किस्सा। वह गांव गये थे। उनके पास फोन आया एक व्यक्ति का। उसने अपने आप को पंजाब नेशनल बैंक का कर्मचारी बताया और कहा कि आपने जो कार्ड के लिए अप्लाई किया है, वह बन गया है। सीनियर सिटीजंस को हम लोग घर जाकर कार्ड दे रहे हैं इसलिए आपके पास एक ओटीपी आएगा वह बता देना। जोगिंदर लाल जी ने कहा कि जो फोन बैंक से लिंक है वह तो मेरी पत्नी के पास है। वह चंडीगढ़ में है। मैं गांव आया हूं। उस व्यक्ति ने जोगिंदर लाल जी को बातों में लगाया और उनकी श पत्नी का नंबर ले लिया। थोड़ी देर में उनकी पत्नी के पास भी एक फोन आ गया। उनसे भी उसने वही ओटीपी वाली बात कही। जोगिंदर लाल जी की पत्नी मेरे पास आ गईं। बोलीं देखिए एक बैंक से फोन आया है यह ओटीपी मांग रहे हैं। आप जरा बता देना। मैंने उनका मोबाइल देखा उससे बात की और वहीं पर मेरी पत्नी भी खड़ी थी। मैंने उस कथित बैंक वाले व्यक्ति से कहा। भैया क्यों किसी को बेवकूफ बना रहे हो। किसी की गाढ़ी कमाई क्यों लूटने की कोशिश कर रहे हो। उसने मुझे इतनी गंदी-गंदी गालियां दीं कि मेरी पत्नी और व जोगिंदर लाल जी की पत्नी थी, इसलिए मैं कुछ बोल नहीं पाया। उसने फोन काट दिया। यानी पूरी तरह फ्रॉड था। अगर ओटीपी दे दिया होता तो शायद उनका अकाउंट खाली हो गया होता। आज वही घटना मुझे याद आ गई और अभी भी वही बार-बार में सिहर रहा हूं कि मैंने ऐसा कैसे कर दिया कि थोड़ी देर की बातचीत के बाद मैंने पहले बैंक का ओटीपी फिर अपने आधार का ओटीपी दे दिया। इससे पहले अनेक बार मेरे पास fraud call आ चुकी हैं। हर बार मैं सतर्क रहा। आज ऐसा कैसे हो गया। गनीमत है कि मेरी किस्मत अच्छी है कि वह फ्रॉड कॉल नहीं थी। सही कॉल थी। मैडम बैंक अधिकारी ही थीं। लेकिन मैं सभी को आगाह करूंगा कि कभी भी कृपया फोन पर ओटीपी ना बताएं बैंक वाले भी खुद ऐसा ही कहते हैं। कोई ऐसी बात हो तो आप ब्रांच जाएं। भविष्य के लिए खुद भी प्रण लेता हूं कि ऐसा कुछ होगा तो ब्रांच में जाऊंगा, लेकिन कभी फोन पर ओटीपी नहीं बताऊंगा। अब क्रेडिट कार्ड को कितना भुगतना होगा, यह तो भविष्य बताएगा। इस घटनाक्रम का मैंने office में मित्र नरेंद्र और सूरज से भी किया। उन लोगों ने भी आश्चर्य जताया। एक मित्र वीरेंद्र सिंह बोले, अभी बना लो, देखना कभी बंद नहीं कर पाओगे। बैंक वाले क्रेडिट कार्ड बंद करवाने पर नाकों चने चबवा देते हैं। जय हो। 

पत्रकारिता का मूल कभी नहीं बदल सकता, पढ़ाई के तरीके में बदलाव की दरकार, विश्व संवाद केंद्र की कार्यशाला में अनेक राज्यों से आये युवाओं से बातचीत में निकली कई बातें




केवल तिवारी

न्यू मीडिया के उभरते दौर में पत्रकारिता की पढ़ाई के तरीके में बदलाव की दरकार महसूस की जा रही है। इस बात से अधिसंख्य इत्तेफाक रखते हैं कि पत्रकारिता की मूल भावना कभी बदल नहीं सकती, लेकिन इसे समझने और समझाने का तरीका बदल सकता है। यह भी हो सकता है कि सीधे लेक्चर देने, नोट्स तैयार कराने के बजाय चर्चा-परिचर्चा के तौर पर इसे किया जाये। यानी विचारों का आदान-प्रदान हो। असल में पत्रकारिता संबंधी कई मुद्दों पर पिछले दिनों चर्चा हुई। मौका था विश्व संवाद केंद्र की ओर से पंचकूला में विवेकानंद जयंती के मौके पर आयोजित 'राष्ट्र निर्माण में नागरिक पत्रकारिता की भूमिका' विषय पर आयोजित कार्यशाला का। मुझे भी कुछ बोलने का मौका मिला। मैं पहुंचा था तो खचाखच भरे हॉल में कुछ वरिष्ठ कुछ बच्चे बैठे थे। कुछ की निगाहें आपस में टकरा रही थीं, कुछ की मेरी ओर भी थी। इसीलिए मैंने शुरुआत ही कर दी बिहारी की दो पंक्तियों से, 'कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन मैं करत हैं, भौंवन ही सो बात॥' खैर पहले कहा गया था कि मुझे मोबाइल पत्रकारिता पर कुछ बोलना है। विषय थोड़ा विस्तारित और तकनीक संबंधी था, फिर भी मैंने MoJo Journalism पर कुछ तैयारी की। बाद में कार्यक्रम के मुख्य आयोजक उत्तर क्षेत्र के प्रचार प्रमुख अनिल कुमार जी ने कहा कि चूंकि आप ब्लॉग लिखते हैं, इसलिए कटेंट राइटिंग पर फोकस्ड रहिए। मुझे मन मांगी मुराद मिली। सभागार में पहुंचा तो वहां वरिष्ठ पत्रकार एवं दैनिक ट्रिब्यून में समाचार संपादक रहे हरेश वाशिष्ठ जी, राजेश शांडिल्य जी आदि अनेक लोग मिले। बाद में द ट्रिब्यून के वरिष्ठ पत्रकार साई वैद्यनाथन भी आ गए। मैंने पत्रकारिता की मूल भावना का जिक्र किया कि जो जैसा है, उसे सही और कोट के साथ परोसिये। कोशिश रहनी चाहिए कि आप जज न बनें। कुछ स्टूडेंट्स ने कहा कि समस्या यह है कि पत्रकारिता पढ़ाने वाले आते हैं, लेक्चर देते हैं और चले जाते हैं। मेरी इस बात पर ज्यादातर लोगों ने इत्तेफाकी रखी कि कटेंट की महानता कभी खत्म नहीं हो सकती। लाख एआई का जमाना आ जाये, जो मूल कटेंट है, वह जितना शानदार होगा, वही चमकेगा। आज के युग में हर व्यक्ति पत्रकार है। सबके हाथों में मोबाइल है। मैंने जोर देकर कहा कि जब आप कोई चीज सार्वजनिक करते हैं तो आपको जिम्मेदार नागरिक बनना चाहिए। सोमालिया की वीडियो को लोग पंचकूला या चंडीगढ़ की बताने लगते हैं। कभी भी फॉरवर्ड में जल्दबाजी न करें। अपने कंटेंट में दम रखें। बातें और भी कई हुईं, समयाभाव के कारण चर्चा कम हुई, लेकिन सार्थक हुई। 

वह भाषायी दिक्कत और हीन भावना

मेरी बात खत्म होते-होते एक विद्यार्थी ने कहा, सर अंग्रेजी हम बोल नहीं पाते, हिंदी हमसे लिखी नहीं जाती। उसकी बात पर सब हंस पड़े। मैंने कहा, अपनी कमी को ही अपनी ताकत बनाओ। मैंने याद दिलाया कि अपनी बात की शुरुआत में मैंने कैसे अपने पर ही एक मजाक बनाया। असल में, अपने ऑफिस में कई बार कहता हूं मैं कोई राजनीतिक पार्टी ज्वाइन कर लेता हूं। समय-समय पर खबर छपवा दिया करूंगा, केवल का कद बढ़ा। असल में हाइट को लेकर लंबे समय तक मैं भी हीन भावना से ग्रस्त रहा। मैंने उस युवक से कहा कि आजकल देसज बोली में वीडियो सुपर हिट चल रहे हैं। देसज बोली में बुलेटिन का जमाना है। खुद से प्यार कीजिए। सीखने की ललक रखिए और आगे बढ़िये। मुझे खुशी है कि वह मेरी बात से सहमत हो गया। यह तो कार्यशाला में मेरा अनुभव था अब उस कार्यक्रम की जो खबर चली उसे देखिए...

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उस कार्यक्रम की जो खबर बनी और चली, उसे हूबहू चला रहा हूं

अच्छे कंटेंट के लिए सही माध्यम का चयन आवश्यकःअनिल कुमार

-नागरिक पत्रकारिता लोकतंत्र की रीढ़ःहरेश वरिष्ठ

-पर्यावरण से जुड़े विषयों को उठाने के लिए आज अनेक तकनीकी साधन उपलब्धःसाईं वैद्यनाथन

-व्यूज, लाइक और शेयर की रेस से बाहर निकलेंः पंकज पम्मू 

-सूचना नहीं, सच्चाई की कमी है पत्रकारिता की असली चुनौतीःराजेश शांडिल्य

-विश्व संवाद केंद्र की कार्यशाला में पांच राज्यों के युवाओं की सहभागिता

पंचकूला। विश्व संवाद केंद्र द्वारा स्वामी विवेकानंद जयंती के उपलक्ष्य में नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यशाला का विषय “राष्ट्र निर्माण में नागरिक पत्रकारिता की भूमिका” रहा। पंचकूला सेक्टर चार माधव कुंज के कांफ्रेंस हाल में आयोजित कार्यक्रम में युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि पत्रकारिता अब केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में उभर रही है।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए उत्तर क्षेत्र के प्रचार प्रमुख अनिल कुमार ने कहा कि अच्छा और प्रभावी कंटेंट स्वतः नहीं मिलता, इसके लिए सही माध्यमों का चयन आवश्यक है। उन्होंने बताया कि कंटेंट लेखन में केवल सूचना नहीं, बल्कि उसका संदेश, दृष्टिकोण और सामाजिक प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने एक्सपोज करने वाले कंटेंट, आख्यान निर्माण (नैरेटिव बिल्डिंग) और तथ्यों को प्रस्तुत करने के तरीके पर उदाहरणों सहित बताया कि कैसे एक ही तथ्य अलग प्रस्तुति में अलग प्रभाव पैदा करता है।

अनिल कुमार ने स्वामी विवेकानंद के आदर्श विचारों का उल्लेख करते हुए जातिगत भेदभाव के उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन और “स्व” के भाव पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने भाषा, भूषा, भोजन और भ्रमण में स्वदेशी और आत्मबोध की भावना को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यशाला मॉड्यूल-वन का हिस्सा है, जिसके बाद मॉड्यूल-टू और मॉड्यूल-थ्री आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने नागरिक कर्तव्यों को समझने और उन्हें पत्रकारिता के माध्यम से समाज तक पहुंचाने पर जोर दिया।

दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ ने कहा कि नागरिक पत्रकारिता लोकतंत्र की रीढ़ है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत नागरिक पत्रकारिता आज लोकतंत्र के एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभर रही है। तकनीक के विकास के साथ पत्रकारिता आम नागरिक के हाथों तक पहुंच चुकी है और अब यह बड़े मीडिया घरानों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, विकास की अनदेखी जैसे मुद्दों पर नागरिक पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि कई बार परंपरागत मीडिया इन मुद्दों तक पहुंच नहीं पाता या उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं देता।

द ट्रिब्यून के मुख्य उप संपादक एवं साहित्यकार पी. साईं वैद्यनाथन ने पर्यावरण परिवर्तन के विषय पर युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली सनातन धर्म की मूल शिक्षा है। सनातन परंपरा में प्रकृति संरक्षण के अनेक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि नागरिक पत्रकारिता में पर्यावरण से जुड़े विषयों को उठाने के लिए आज अनेक तकनीकी साधन उपलब्ध हैं। इसके बाद सनातन धर्म और पर्यावरण पर आधारित एक रुचिकर प्रश्नोत्तर सत्र भी हुआ।

विख्यात आरजे एवं कथाकार पंकज पम्मू ने कहा कि आज मोबाइल फोन के चलते हर व्यक्ति खुद को पत्रकार समझने लगा है, लेकिन स्मार्ट सिटीजन होने के नाते यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम जो भी कंटेंट लिखें, रिकॉर्ड करें या साझा करें, वह जिम्मेदारी के साथ हो। उन्होंने युवाओं से व्यूज, लाइक और शेयर की रेस से बाहर निकलने का आह्वान करते हुए कहा कि बेहतर और सार्थक कंटेंट को देर-सवेर समाज की स्वीकृति अवश्य मिलती है। 

विश्व संवाद केंद्र हरियाणा के संपादक राजेश शांडिल्य ने कहा कि नागरिक पत्रकारिता केवल मोबाइल उठाकर खबरें परोसने तक सीमित नहीं, सच्चाई से जिम्मेदारी उठाने का काम है। आज सूचना की नहीं, बल्कि सच्चाई से पत्रकारिता करने वालों की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। निडरता, सत्यनिष्ठा और दायित्वबोध के बिना खबर समाज को दिशा नहीं, केवल शोर पैदा करेगी। पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्रहित के मुद्दे सामने लाना और समाज के समक्ष सच लाना होना चाहिए। ऐसी जिम्मेदार पत्रकारिता ही समाज में विश्वास कायम कर बेहतर और जागरूक समाज के निर्माण में अपनी प्रभावी भूमिका निभा सकती है।

कार्यशाला संयोजक एवं चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी पत्रकारिता विभाग के एसोसिएट प्रो. डा.विनोद सोनी ने कार्यक्रम आए हुए अतिथियों का आभार जताने के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक विद्यार्थियों के स्वर्णिम भविष्य की कामना की।इस अवसर विश्व संवाद केंद्र सचिव राजेश कुमार,पत्रकारिता विभाग के सहायक डा.तपेश किरण,चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा.रंजन वालिया, महाराजा अग्रसेन यूनिवर्सिटी बद्दी (हिमाचल) के सहायक प्रो.डा.रवि मिश्रा कार्यशाला में प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की और नागरिक पत्रकारिता को समाज व राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बनाने का संकल्प लिया।कार्यक्रम के समापन सत्र में कार्यशाला के प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरण किये गये।

Sunday, January 4, 2026

याद आया राग दरबारी... श्रीलाल शुक्ल के सौ साल

केवल तिवारी
श्रीलाल शुक्ल जी की व्यंग्य रचना 'राग दरबारी' को लिखे करीब-करीब छह दशक होने को हैं, लेकिन आज भी वह उतनी ही लोकप्रिय है, जितनी अपने दौर में थी। सरकारी तंत्र और इस तंत्र का फायदा उठाने वालों पर करारी चोट करते इस व्यंग्य उपन्यास की एक-एक लाइन की व्याख्या हो सकती है। मुझे यह उपन्यास पढ़े करीब ढाई दशक हो गया। उस दौर में दो-तीन बार पढ़ डाली थी। फिर किसी ने मांगी, अपने किताबों के ढेर में इसे बहुत ढूंढ़ा, लेकिन मिल नहीं रही। ऐसी ही एक और किताब मनोहर श्याम जोशी की 'कसप' भी गायब है। खैर... पिछले दिनों खबर आई कि श्रीलाल शुक्ल जी की सौवीं जयंती मनाई जा रही है। तब अचानक फिर राग दरबारी की याद आई। कुछ मित्रों से इस उपन्यास की चर्चा करने लगा तो सबने अपने-अपने ढंग से इसकी कुछ पंक्तियों को याद किया। इस दौरान कई खबरें भी चलीं। फिर याद आने लगे पुराने दौर के व्यंग्य रचनाकारों की। हास्य कलाकारों की। किसी ने काका हाथरसी का नाम लिया तो किसी ने केपी सक्सेना का। कुछ ने गोपाल चतुर्वेदी को याद किया किसी ने शौकत थानवी, रघुवीर सहाय और मुद्राराक्षस का नाम लिया। चूंकि पढ़ाई-लिखाई लखनऊ में हुई तो उन दिनों वहां स्वतंत्र भारत छपता था। उसमें उपरोक्त लेखकों के अलवा उर्मिल कुमार थपलियाल के भी व्यंग्य छपते थे। इंदिरा नगर की ओर जाना होता था तो कुछ व्यंग्यकारों के घर देखकर ही खुश हो जाया करता था। अनेक लेखक ऐसे हैं जो बातें भले बड़ी-बड़ी करते हों, लेकिन मिलने-मिलाने के पीछे भी कारण ढूंढ़ते हैं, इसलिए मिलना कभी नहीं हो पाया। बाद में तो पत्रकारिता की ही लाइन में आया तो अनेक लेखकों से मिलना हुआ, छपना और छापना हुआ। खैर... आज बात महान व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल की। 
साभार: इंटरनेट 


बातों के दौरान उनकी कुछ पंक्तियों की चर्चा देखिये- 'नहीं यह ट्रक सड़क से आधा बाहर नहीं है, यह आधा सड़क के अंदर है।' ऐसी ही कुछ पंक्तियां हैं
हर बड़े राजनीतिज्ञ की तरह वे राजनीति से नफ़रत करते थे और राजनीतिज्ञों का मज़ाक उड़ाते थे।
वैद्यजी के प्रभाव से वह किसी भी राह चलते आदमी पर कुत्ते की तरह भौंक सकता था, पर वैद्यजी के घर का कोई कुत्ता भी हो, तो उसके सामने वह अपनी दुम हिलाने लगता था। यह दूसरी बात है कि वैद्यजी के घर पर कुत्ता नहीं था और सनीचर के दुम नहीं थी।
यह हमारी गौरवपूर्ण परम्परा है कि असल बात दो–चार घंटे की बातचीत के बाद अंत में ही निकलती है।
इंसानियत का प्रयोग शिवपालगंज में उसी तरह चुस्ती और चालाकी का लक्षण माना जाता था जिस तरह राजनीति में नैतिकता का
लेक्चर का मज़ा तो तब है जब सुननेवाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूं।
श्रीलाल शुक्ल जी की सौवीं जयंती पर खबरों का भी दौर चला। उनकी जिस महान रचना का मैं ऊपर वर्णन कर चुका हूं, उसके कारण वे उपहास का भी पात्र बने। नेमीचंद जैन जैसे प्रमुख लेखकों और आलोचकों ने इसे 'असंतोष का शोर' बताया था और श्रीपत राय ने इसे 'महान बोरियत का महान उपन्यास' कहा था। लेकिन इन तमाम आलोचनाओं के बावजूद शुक्ल ने अगले साल 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता और यह तीखा व्यंग्य समय की कसौटी पर खरा उतरा। कहते हैं कि यह हिंदी साहित्य के सबसे ज्यादा पढ़े गए तथा अनुवादित उपन्यासों में से एक है। असल में 1968 में लिखी गई 'राग दरबारी' उनके नाम का पर्याय बन गयी है जिसे अब हिंदी व्यंग्य लेखन में एक मील का पत्थर माना जाता है। श्रीलाल शुक्ल का 2011 में निधन हुआ और अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने 25 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें 'मकान', 'सूनी घाटी का सूरज', 'पहला पड़ाव' और 'बिश्रामपुर का संत' शामिल हैं। 2005 में 'श्रीलाल शुक्ल: जीवन ही जीवन' शीर्षक से निबंधों के एक संग्रह में, उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज में जन्मे आईएएस अधिकारी शुक्ल ने याद किया कि किस तरह उपन्यास ने उन्हें लगभग छह साल तक 'बीमार रखा', जिससे वह एक बहिष्कृत व्यक्ति बन गए। उन्होंने लिखा था, 'उन गंवार किरदारों के साथ दिन-रात रहते-रहते मेरी ज़बान घिस गई। इज़्ज़तदार औरतें कभी-कभी खाने की मेज़ पर मेरी तरफ़ भौंहें चढ़ाकर देखती थीं, और मैंने अपने परिवार से तथा मेरे परिवार ने मुझसे दूर रहना शुरू कर दिया। मेरी समस्या यह थी कि किताब लिखने के लिए कोई जगह सही नहीं लग रही थी।' यहां बता दूं कि मोहनलाल गंज भी लखनऊ से लगा हुआ है और अक्सर यहां आना-जाना भी होता था। शिवपालगंज नाम के काल्पनिक गाँव पर आधारित 'राग दरबारी' ने भारतीय सत्ता संरचना की आलोचना की, जहां गांव एक ऐसे राष्ट्र का रूपक बन जाता है जो शासन और नैतिकता दोनों में विफल रहा है। भारत की सामाजिक-राजनीतिक संरचना की तीखी आलोचना को इसके किरदारों के ज़रिए यादगार बनाया गया, जिनमें नैतिक संतुलन की कमी है, जो 'सभ्यता' से रहित हैं, और एक ऐसे समाज का सामूहिक चित्र बनाते हैं जहां भ्रष्टाचार सामान्य है, आदर्श सिर्फ़ दिखावे के हैं, और अस्तित्व ईमानदारी के बजाय अनुकूलन पर निर्भर करता है। हिंदी साहित्य में शुक्ल के योगदान के बारे में कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने एक जगह कहा कि लेखक ने भारत में विकास के इर्द-गिर्द फैले मिथक को तोड़ दिया। उन्होंने 'राग दरबारी' में जो किया- यह दिखाना कि यह तथाकथित विकास विरोधाभासों, भ्रष्टाचार, देरी, लापरवाही, बेफिक्री और जड़ता से कैसे भरा हुआ था, और इसने लोगों के रोज़मर्रा के जीवन को कैसे प्रभावित किया- वह सच में महत्वपूर्ण था। अगर हम हिंदी साहित्य के पिछले 100 वर्षों को देखें, तो श्रीलाल शुक्ल निस्संदेह इसके महान दिग्गजों में से एक हैं। उन्होंने मुख्य रूप से गद्य लिखा और एक प्रमुख उपन्यासकार थे। चर्चा में कुछ लोगों ने व्यंग्य उपन्यास राग दरबारी को गांवों को परेशान करने वाली बदसूरती या विकृतियों को दिखाने वाली बताया। किसी ने इसे आज भी प्रासांगिक बताया। कई लोग इस बात से भी इत्तेफाक रखते हैं कि श्रीलाल शुक्ल को समझने के लिए सिर्फ राग दरबारी ही नहीं, शुक्ल के अन्य रचनाओं को भी पढ़ना पढ़ेगा। खैर शुक्ल जी की अनेक रचनाओं की चाहे जितनी बात हो, उन्हें पहचान तो राग दरबारी ने ही दिलाई। समय भले बदल गया हो, लेकिन उपन्यास में उल्लिखित किरदार हम-आपमें किसी न किसी रूप में मौजूद हैं ही।