Sunday, September 20, 2009

माँ बिन नवरात्र

में नवरात्र माना रहा हूँ। पर इस बार माँ के बगेर। नवरात्र के दौरान इस ब्लॉग को लिखना शुरू किया था और अब विजय दशमी के दिन बैठा हूँ पुरा करने की कोशिश में। पिछले साल हमारे घर में कोई त्यौहार नहीं मनाया गया। ऐसा नियम होगा लेकिन मैंने नियम्बध्ह होकर नहीं बल्कि अपने मन से ऐसा किया। करीब डेढ़ साल बीतने के बाद मुझे लगा त्यौहार मानना शुरू करुँ पहली बार ऐसी नवरात्र आयी जब मेरी मां नहीं है। फ़िर भी मैंने मंत्र पढ़ा कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति। यही नही मैंने अन्य मंत्र पढ़े आरती की थाल लेकर जब मां की फोटो के पास गया तो सचमुच मुझे लगा मां कह रही हो पूजा करने में संकोच क्यों। में हमेशा पूजा पाठ करता हूँ समय के हिसाब से। मन्दिर की विशेष जरूरत नही होती। अन्य मंदिरों में भी जाता हूँ। लेकिन कुछ ऐसे डोंगियों से सख्त नफरत है जो अपनी मां से भयानक किस्म से लड़ते हैं और मंदिरों में दिनभर जय माता दी के नारे लगते हैं। मैंने ख़ुद ऐसे कई लोगों को देखा है। ऐसे लोगों को भी देखा है पूजा पाठ नहीं करते पर मां से भी नहीं लड़ते या लड़ते हैं। असल में घर में किसी से लड़ना नहीं लड़ना यह सबकी व्यक्तिगत बातें हैं लेकिन ढोंग करना तो निश्चित रूप से ग़लत है। ऐसे लोग भी मैंने देखे हैं जो घर में अखंड रामायण का पाठ कराते हैं। ख़ुद एक शब्द नहीं पढ़ते। पढने के लिए आ रहे लोगों के लिए पान बीडी और चाय की व्यवस्था में लगे रहते हैं। यहाँ पर मुझे एक वाकया याद आ रहा है जब में ११ में पढता था और शाहजहांपुर में रहता था। मेरे एक रिश्तेदार का बेटा एन्गीनेइरिंग कर अच्छे ओहदे पर नौकरी पा चुका था। इश्वर में उसकी आस्था थी। उन लोगों ने घर में रामायण का पाठ किया। बिना माइक लगाये. मुझे पता लगा। में जाना चाहता था लेकिन इस हनक में नहीं गया की मुझे निमंत्रण क्यों नहीं दिया। दूसरे दिन वो प्रसाद देने आए। मैंने अपनी इच्छा और विरोध दोनों जाता दिया। निर्मल नाम के उन सज्जन ने मुझसे कहा, में ऐसी चीजें दो तरह से करता हूँ। एक माइक नहीं लगता। दूसरा किसी को आमंत्रित नहीं करता। में और परिवार के अन्य लोग पढ़ना शुरू कर देते हैं, लोग आते हैं और जुड़ना शुरू हो जाते हैं। में इस बात से बहुत प्रभावित हुआ। वाकई यही तो असली बात है। तब से मैंने ये निर्णय किया की बिना किसी ढकोसले के में इसी तारह पूजा करूंगा। हालाँकि ढोंग जैसी बात पहले भी नहीं करता था। मेरे घर में सुबह पूजा के बाद तिलक लगाया जाता था। में स्कूल जाते समय उसे मिटा देता था एकाध बार घर से दांत भी पड़ी। अब अजीब लगता है जब आज कई मित्र नवरात्र के दौरान कहते हैं अरे तिलक नहीं लगा रखा है। ऐसे मौसमी पंडितों से मैंने कहा भी हमारा यहाँ १२ माह तिलक लगता है। नियमपूर्वक पूजा होती है। में तिलक कभी नहीं लगता तो नहीं लगता। हाँ घर के विशेष कार्यक्रमों पर आग्रह ठुकराता भी नहीं हू। इस प्रसंग में मुझे खोसला का घोसला फ़िल्म की याद आती है जिसमें प्रोपर्टी डीलर कहता है सब माता रानी की कृपा है। हेर हफ्ते वैस्श्नों देवी जाता हूँ। फर्जी लोगों के प्रति जबरदस्त कटाक्ष। वैष्णों देवी मन्दिर भी गया था अपनी मां, बीवी और बच्चे के साथ। यादगार टूर रहा। ७० वर्षीया मेरी मां मानो हमारे लिए मानक बन गयी थी। पूरे सफर में थकन से उसकी वो हालत नहीं हुई या उसने चेहरे से जाहिर नहीं होने दी जो हम लोगों की हो गयी थी। एक बात और ki मेरी मां बहार कुछ खाती नही थी सिवा फल के। पाँच दिन के सफर में वो बस कुछ केले सेब और धर्मशाला वालों के आग्रह पर चाय पीकर रही। खैर वो सब इतिहास हो चुका है मां कहीं सितारों में खो गयी है। पर हमेशा कुछ कहती रहती है मुझसे जैसे नवरात्र मनाओ बिन मां के ही सही।

2 comments:

Manish Oli said...

kewal da pahli bar aapka blog padha. achha laga. kanw-kanw kuchh kam ho rahi h. jyada ho to achha lagega. is article main maa ki jagah IJA likha hota to maza hi aa jata. aur achhe lekho ke intajar main, aapka- mannu

dhiresh said...

`मन चंगा तो कठौती में गंगा`
आप तो खासा खामियाजा भुगत चुके हो, ढोंगियों के विरोध का.