Monday, January 17, 2011

कहानी : पलंग के नीचे

मेरी जिंदगी तो बस इसी पलंग के नीचे ही खप लेगी, विकास अपने कपड़े झाड़ते-पोछते चिल्लाया। बस हो गए परेशान, मैं दिनभर न जाने कितनी बार इस पलंग के नीचे घुसती हूं, चोट खाती हूं। तुम्हें एक बार क्या जाना पड़ा कि बस उठा लिया पूरे घर को अपने सिर पर। मीनाक्षी ने विकास को झड़पा। विकास बोला तुमने पलंग पर जो ये सिरहाना लगवाया है न, सारी फसाद की जड़ ही यही है। यह अगर न होता तो हमेशा काम आसान रहता। हां मैं तो जो करती हूं, गलत ही करती हूं। सारी अच्छाइयां तो तुम्हारे ही नाम दर्ज हैं, मीनाक्षी का जवाब आया। उनकी जुबानी जंग के बीच दूर खड़ा उनका बेटा आर्यन चुपचाप दोनों का चेहरे देखे जा रहा था। अबकी विकास कुछ बोला नहीं और ब्रश पर मंजन लगाकर दांत साफ करते हुए बालकनी की ओर जाने लगा। मीनाक्षी फिर बोली, खराब ही लग रहा है तो इस सिरहाने को कटवा दो। विकास मुंह में बने झाग को थूककर आया और लगभग चिल्लाने के अंदाज में बोला, अब बस करो। अब तक चुप रहा आर्यन बोला, मम्मा-पापा आप झगड़ते क्यों रहते हो। विकास कुछ बोले बिना फिर बालकनी की ओर बढ़ा, मीनाक्षी किचन में चली गई। तभी उनकी एक साल की बेटी शिप्रा उठ गई। वह अन्य बच्चों की तरह उठते ही रोती नहीं है। आज भी वह उठी और पास ही रखे सुई के डिब्बे की तरफ लपक गई। आर्यन ने देख लिया। वह चिल्लाते हुए आया मम्मा शिप्रा ने सुई का डिब्बा खोल दिया है। मीनाक्षी किचन से बाहर को भागी और विकास मंजन घिसना छोड़ मुंह में ब्रश दबाए अंदर को आया। फिर देखो अपनी हरकत, विकास बोला तुम्हें पता है शिप्रा कभी भी उठ जाएगी, यहां सुई के डिब्बे को रखने की ऐसी इमरजेंसी क्या आन पड़ी। इस बार मीनाक्षी ने कोई जवाब नहीं दिया। शिप्रा के बिखेरे हुए बटन, धागों की रील को ठीक करने लगी। शिप्रा विकास की गोद में थी। बेटा आर्यन एक बॉल के साथ खेलने लगा। बेटा शिप्रा को खेल लगाओ, मैं जरा कुल्ला कर लूं। विकास ने आर्यन की तरफ देखते हुए कहा। नहीं पापा, ये इधर-उधर तार छूने लगती है कहकर आर्यन फिर बॉल में किक मारने लगा। बॉल इस बार किचन की तरफ जा रही मीनाक्षी के सिर पर लगा। मीनाक्षी ने बॉल को अंदर के कमरे की तरफ फेंका और दो चपत आर्यन को लगा दिए। आर्यन सुबकता हुआ बाहर के कमरे में बैठ गया। विकास ने शिप्रा को नीचे चटाई में बिठाया, वॉश बेसिन में जाकर कुल्ला किया और मीनाक्षी पर गुर्राया, क्या हो गया है आज तुम्हें। मीनाक्षी भी लगी रोने, रोज मुझे ही होता है। तुम सब लोग तो ठीक हो। विकास की समझ में कुछ नहीं आया। वह बोला, कूल हो जाओ मीनाक्षी। आर्यन की छुट्टी है थोड़ी देर खेलेगा नहीं तो क्या करेगा। यह खेलने के लिए बाहर क्यों नहीं जाता। दिनभर इसकी खटपट झेलो, शिप्रा को देखो, खाना बनाओ, झाड़ू पोछा करो, मैं क्या-क्या करूं । तुम फिलहाल एक कप कॉफी बना लो, विकास हंसते हुए बोला। फिर आर्यन की तरफ देखते हुए बोला, बेटा बॉल निकालो हम लोग कैच-कैच खेलते हैं। आर्यन आंसू पोछता हुआ आया और बोला पापा बॉल तो आपको निकालनी पड़ेगी। वह पलंग के नीचे चली गई। यह कहते-कहते बच्चे को हंसी आ गई। उसको हंसता देख मीनाक्षी और विकास भी हंसने लगे। मीनाक्षी बोली मैं सीरियसली कह रही हूं या तो पलंग के चारों ओर लकड़ी का तख्ता लगवा दो या फिर इस सिरहाने को कटवा दो। विकास बोला या तो हमने गृहस्थी जल्दी बसा ली या फिर यह पलंग जल्दी बन गया। क्यों न पलंग को ही बेच दें। उस दिन देखो, शुक्ला जी आए तो भाभी के हाथ से चाबी नीचे गिर गई। पूरा आधा घंटा लगा चाभी निकालने में। पलंग खिसकाने में जो कमर दर्द हुआ वह अब तक है। शिप्रा रोज कुछ न कुछ नीचे फेंक देती है। क्यों न पलंग बेच दें। इसकी जगह दो खाट लगा लेते हैं। हां ऐसे ही घर में न सोफा है और न मेज। एक डबल बेड है तो उसे भी तुम बेच दो। इतने सारे कपड़े, सामान जो इसके बॉक्स में रखा है उसे कहां फेंकोगे। आर्यन बोला, पापा हम बंग्लो ले लें। विकास हंसा बोला, बेटा बंग्लो ऐसे ही नहीं मिल जाता है। अच्छा पापा ऐसा करो पलंग के पैरों को कटवा दो, फिर कोई सामान नीचे नहीं जाएगा और आपको उसे निकालने के लिए परेशान भी नहीं होना पड़ेगा। इससे पहले कि विकास कुछ बोलता, मीनाक्षी बोली चुप कर। अपनी सलाह अपने पास रख और चल किताब निकाल कल तेरा युनिट टेस्ट है। विकास बोला, मीनाक्षी तुम कॉफी बनाकर लाओ। फिर आर्यन की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, बेटा आर्यन क्यों न ऐसा करें कि तुम खुद पलंग के नीचे से सामान निकालने की प्रैक्टिस करो। जब सामान गिरे तो तुम बालकनी से डंडा उठाकर लाना और उसे निकाल लेना। नहीं पापा मैं यह कैसे कर पाऊंगा। बेटा कोशिश तो करो। उनका संवाद चल ही रहा था कि विकास के मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी। उसने चारों तरफ देखा, उसे सिर्फ घंटी सुनाई पड़ रही थी मोबाइल कहीं नहीं दिख रहा था। तभी उसने गौर किया कि घंटी पलंग के नीचे से सुनाई दे रही है। हे भगवान! यह यहां कैसे पहुंच गया। कहीं बॉस का फोन न हो। बेटा डंडा लाओ। आर्यन डंडा लेने भागा। विकास भी झाड़ू उठाकर लाया। तब तक घंटी बंद हो चुकी थी। विकास बोला, आर्यन लाइट जलाना। आर्यन के हाथ में बड़ा डंडा था, जैसे ही उसने स्विच ऑन किया, उसका डंडा नाइट बल्ब पर लगा। पहले से ही ढीला चल रहा बल्ब नीचे आ गिरा। विकास चिल्लाया, आर्यन। मीनाक्षी शांत होकर बोली, तुम कॉफी का प्याला उठाओ बाहर टेबल पर रखा है। विकास की गोद में रो रही शिप्रा को भी उसने उठा लिया। फिर आर्यन के हाथों से डंडा लेकर बोली, आर्यन तुम मेरे मोबाइल से पापा के नंबर पर घंटी मारो। डरा-डरा आर्यन मम्मा का फोन उठाकर लाया और कॉल करने लगा। तब तक विकास भी कॉफी की घूंट भरता आ गया। मीनाक्षी ने मोबाइल उसके हाथ में दिया और बोली, ये लो तुम्हारा मोबाइल। विकास चहकते हुए बोला, अरे इतनी जल्दी कैसे निकाल दिया। मीनाक्षी कुछ नहीं बोली, बल्ब के टुकड़ों को समेटने लगी। शिप्रा को उसने एक डिब्बा देकर खेल लगा दिया था। कांच के टुकड़ों को डस्टबिन में डालती हुई बोली, तुम आर्यन को अपने साथ नहला दोगे विकास। विकास बोला, हां हम दोनों साथ नहाएंगे। इतने में फिर फोन की घंटी बजी। इस बार वाकई विकास के बॉस का फोन था। बॉस का फोन है कहकर वह बालकनी की तरफ गया। वापस लौटा तो बोला, मीनाक्षी मैं नहा नहीं रहा हूं। ऑफिस में मीटिंग है। खाना भी वहीं खा लूंगा। आर्यन का चेहरा लटक गया। पापा के बॉस भी न........। मुंह भींचते हुए वह अंदर की तरफ चला गया। मीनाक्षी बोली, कम से कम बच्चों की छुट्टी के दिन तो ऑफिस आराम से चले जाया करो। रात में तो देर से ही आते हो। नौकरी है यह मीनाक्षी, कहते हुए विकास हाथ-मुंह धाने चला गया। लौटा तो देखा आर्यन शिप्रा को खेल लगा रहा था। मीनाक्षी फटाफट आटा गूंथने में लगी थी। विकास बोला, क्या कर रही हो, तुम लोग आराम से खाना बना लेना। मीनाक्षी बोली, जब तक तुम कपड़े पहनो मैं दो पराठे सेक देती हूं। विकास कपड़े पहन ही रहा था कि आर्यन चिल्लाया मम्मा.....। क्या हुआ विकास और मीनाक्षी एक साथ वहां पहुंचे, शिप्रा ने अपना सिर पलंग के नीचे फंसा लियाहै, आर्यन बोला। इस बार बेचारे आर्यन को फिर थप्पड़ पड़ी। कैसे देख रहा था, बहन को। विकास कुछ समझ नहीं पा रहा था। पलंग उठाने में बहुत भारी था, फिर भी वह जोर लगा रहा था। बड़ी मुश्किल से पलंग कुछ उठा तो शिप्रा की गर्दन बाहर निकल पाई। वह लगी जोर-जोर से रोने। मीनाक्षी भी ध्म्म से वहीं बैठ गई। बोली, विकास तुम ऑफिस जाओ। पलंग का कोई खरीदार मिले तो बात कर लेना...। शिप्रा की गर्दन ही नहीं हमारी जिंदगी फंस गई है इस पलंग के नीचे।
केवल तिवारी

Sunday, December 26, 2010

इन 'पुत्रों" की लंबी उम्र नहीं चाहते लोग

इस बार भी 'बेटा" ही हो गया। चार दिन से ज्यादा नहीं बचेगा। उसे दूध ही नहीं दिया जाएगा। दूध पिलाएंगे भी क्यों। इतनी मतलबी दुनिया में जब ये किसी काम ही नहीं आएंगे फिर इन्हें पालकर क्या होगा। ज्यादा पुरानी बात नहीं कुछ साल पहले की ही बात है, कुछ काम तो ये आ जाते थे। हल जोतने के या फिर सामान ढोने के। लेकिन अब तो ये बेटे उस लायक भी नहीं रहे। जी हां! यही हो रहा है। इन बच्चों को तड़पाकर मारा जा रहा है। यह अलग बात है कि इनके मरने पर कोई रोने वाला नहीं। इनकी मां थोड़ी खटपट करेगी भी तो उसे भी डंडे के जोर पर जुल्म ढाकर ठंडा कर दिया जाएगा।
मैं बात कर रहा हूं। पशुओं के बेटों की। यानी गाय-भैंसों के बच्चों की। दिल्ली-एनसीआर में हाल बुरा है। एक तो जमीन कम हो गई है। उस पर मुआवजे का पैसा लोगों को मिला है। दूध के लिए गाय-भैंसें लोगों ने पाली हैं। यदि बछिया या पड़वा हो गया तो ठीक है, लेकिन बछड़ा या कटरा हो गया तो खैर नहीं। अब न तो कोई उन्हें खरीदता है और न ही वे सामान ढोने के कार आ रहे हैं। लोगों के पास महंगी गाड़ियां हो गई हैं। ट्रैक्टर हो गए हैं। रहट अब चलता नहीं। खेती-बाड़ी के काम में जानवरों को इस्तेमाल नहीं होता। गाय-भैसों को मशीन से गाभिन कर दिया जाता है। ऐसे में दूध के लिए गाय-भैंस पालने वाले ऐसी व्यवस्था कर देते हैं कि यह जानवरों का बेटा बस दो-चार दिन देख ले इस दुनिया को फिर नमस्ते। एक तरफ इनसान खुद का बेटा होने के लिए मन्न्तें मांगता है। भू्रण हत्या करने से भी बाज नहीं आता दूसरी तरफ ये जानवरों की दुर्दशा है। सब दुनियादारी है, हमारी-आपकी बनाई हुई। कोई ऐसा जानवर बच भी गया तो जल्दी ही कसाईयों के हवाले हो जाता है। दुनिया महान, दुनियादारी महान।

Friday, December 10, 2010

फिर एक अपराध बोध

शायद और लोगों के साथ भी ऐसा होता हो, पर मेरे साथ यदा-कदा ऐसा होता है जब मुझे अपराध बोध होता है। हालिया घटना एक अजीबोगरीब है। मैं ऑफिस की सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था और मुझे मंडी हाउस जाने की जल्दबाजी थी। वहां मेरी दीदी आई हुई थी। कुछ देर वहां रुककर मुझे तुरंत ऑफिस वापस भी आना था। मेट्रो की भीड़ और शाम छह बजे की नजाकत (उल्लेखनीय है शाम का यह समय हम जैसे कथित पत्रकारों यानी डेस्क पर काम करने वालों के लिए बहुत ही व्यस्तता वाला होता है।) उस पर एक मीटिंग का होगी या नहीं होगी का झंझट। अंतिम सीढ़िी के पास एक किशोर एक महिला के साथ वहां खड़े थे। वह महिला शायद उस किशोर की मां होगी। किशोर मेरी तरफ मुखातिब होकर बोला, सर यहां टॉयलेट कहां है। क्या बताता....., कनॉट प्लेस में सार्वजनिक टॉयलेट तो कहीं नजर आते ही नहीं। फिर हमारी बिल्डिंग के नीचे जो एक विश्वविद्यालय का फें्रचाइजी दफ्तर है, का एक टॉयलेट वहां पर था जहां उस समय तक ताला लग चुका था। शाम हो गई थी, उस दफ्तर के लोग घर जा चुके थे। मैंने वहां एक नजर दौड़ाई फिर कहा, यहां तो कहीं नहीं है। फिर उनकी तरफ देखे बगैर मैं भागने लगा। मैं दौड़ता हुआ राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ए ब्लॉक से नीचे उतर गया। साथी पत्रकार से मेट्रो स्मार्ट कार्ड मांगकर ले गया था, दनादन अंदर चला गया। मेट्रो में चढ़ने ही वाला था कि ऑफिस से कॉल आ गई तुरंत आओ मीटिंग होगी। वापस आया। मेट्रो के नियमानुसार कार्ड में से छह रुपए कट गए। ऑफिस के नीचे आकर उस युवक और महिला को इधर- उधर देखा। वे नहीं थे। चुपचाप आकर मीटिंग में बैठ गया। अपने काम के लिए जिस तेजी से भागा। फिर ऑफिस के लिए जिस तेजी से आया। इस बीच यही सोचता रहा काश मैं उस किशोर या महिला के लिए दो मिनट और खर्च कर लेता। मैं उन्हें अपने ऑफिस का टॉयलेट दिखा देता। वह बहुत परेशानी में थे। काश! ऐसा किया होता। उनके लिए महज दो मिनट खर्च न कर पाने के अफसोस के पीछे भी शायद मेरा ही स्वार्थ था कि यदि में इतना और रुक गया होता तो भागदौड़ बचती और जो बेवजह आठ रुपए स्मार्ट कार्ड से कट गए वह भी बच जाते। सही में हम लोग कितना आत्ममुखी, आत्मसुखी और स्वार्थी हो गए हैं।