Wednesday, November 3, 2021

साहित्यकार सत्यवीर नाहड़िया की पांच किताबों के इर्द-गिर्द

  केवल तिवारी

हिंदी की सतत साधना में लगे और कभी कटाक्षों से गुदगुदाते और कभी हकीकत का आईना दिखाते सत्यवीर नाहड़िया जी को मैं तो कम से कम एक दशक से जानता हूं। दैनिक ट्रिब्यून में आने से पहले से उनको पढ़ा है। इनकी चलती चाकी हमेशा पढ़ता रहता था। इस बीच, थोड़ी बातचीत हुई। इसी दौरान इनकी किताबें भी आती रहीं। किताबें देखीं तो पाया कि सत्यवरी नाहड़िया जी उम्र में मुझसे करीब डेढ़ साल बड़े हैं। लेखन में तो बहुत बड़े हैं, उसे मापा नहीं जा सकता। खैर... नाहड़िया जी पर चर्चा के बजाय आज उनकी कुछ किताबों पर बातचीत करने के लिए कीबोर्ड उठाया है। अब कलम उठाई है, कहां चलता है। पिछले दिनों साहित्य साधना और पुराने साहित्यकारों को याद रखने के क्रम में एक लेख में हरियाणा साहित्य अकादमी एवं उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ चंद्र त्रिखा जी ने सत्यवीर नाहड़िया जी का जिक्र किया था। उसे पढ़ा और सत्यवीर जी से बातचीत भी हुई। इसी बीच उन्होंने मुझे कुछ पुस्तकें भेजीं। यूं तो हर पुस्तक के बारे में लंबा-चौड़ा आख्यान लिखा जा सकता है, लेकिन मैंने तय किया कि इस बार किताब चर्चा का यह लेखन थोड़ा जुदा हो। मैंने पांचों किताबें एक-एक कर पढ़ीं। हर किताब में सबसे अच्छी लगी पंक्तियों को अंडरलाइन कर दिया। क्योंकि नाहड़िया जी की ये किताबें अब मेरी धरोहर हो चुकी हैं। किताबें पढ़ने में थोड़ा समय लगा, इसलिए किताब चर्चा भी थोड़ा विलंब से। लेकिन ये किताबें कोई ऐसी नहीं हैं कि आज पढ़ीं और खत्म...। इनमें लिखीं बातें तो शाश्वत हैं। बल्कि हर बात को मनन करते रहने की जरूरत है। उन्हें कोट करने की भी जरूरत है। मैं तो भविष्य के अपने लेखों में जरूर इन्हें कहीं न कहीं कोट करूंगा। 

तो चलिए हैं किताब चर्चा पर। एक-एक कर। सबसे पहले कर रहा हूं सत्यवीर नाहड़िया जी की किताब ‘दिवस खास त्योहार’ को। यह है तो बाल कविता संग्रह, लेकिन संदेश इसमें सबके लिए छिपा है। फिर कहते भी तो हैं ना कि बच्चों के लिए लिखना सबसे ज्यादा कठिन होता है। मैंने भी कभी-कभी इस कठिन कार्य को करने की कोशिश की है। इन दिनों में दैनिक ट्रिब्यून के फीचर विभाग में हूं। मेरे पास बच्चों के लिए ढेरों सामग्री आती है। उन्हें देखकर और कभी-कभी खुद लिखकर महसूस करता हूं कि बाल साहित्य सृजन जितनी जिम्मेदारी का काम है, उतना ही कठिन भी है। बहुत कठिनाई से गुजरते हुए आपको सरल, सहज और प्रवाहमयी शैली में बह जाना होता है। तो इस बात को समझते हुए कह सकता हूं कि नाहड़िया जी की शैली बहुत तरल है। यहां मैंने सरल नहीं, तरल ही लिखा है। पानी की मानिंद। जिसमें मिला दो लगे उस जैसा....। सबसे बड़ी खूबी तो यह है कि इस किताब में उन्होंने पूरे वर्ष को कविताओं में समेट दिया है। बिना भेदभाव के। नव वर्ष की खुशियां हैं, ईद का जश्न है। दिवाली की चमक है। क्रिसमस की धूम है। राष्ट्रीय पर्वों का गौरव है। कुछ पंक्तियों पर गौर कीजिए-



नये साल में नया करेंगे।

विपदाओं से नहीं डरेंगे।

दीन-दुखी की सेवा कर हम

मानवता के घाव भरेंगे।।


रखती सबका ध्यान बेटियां

लोकलाज की आन बेटियां

घर के आंगन की हैं कोयल

बड़ी सुरीली तान बेटियां।।


लहर-लहर झंडा लहराएं।

गीत शहादत के मिल गाएं।

आया है गणतंत्र दिवस रे 

आओ मिलकर इसे मनाएं।।


मां-वाणी का दिन है आया।

कुदरत ने भी रास रचाया

सरसों झूम रही खेतों में

वासंती यह न्यारी माया।। 


मानवता के मान डॉक्टर।

रोज बचाते जान डॉक्टर।

खूब मिला है दर्जा उनको

धरती के भगवान डॉक्टर।।


हरियाणा वीरों की माटी।

सैनिक बनना है परिपाटी।

दौर गुलामी में जेलें भी

इसके वीरों ने थी काटी।।


इस कविता में 62 पर्वों, त्योहारों और दिवसों पर कविताएं हैं। हर कविता में कम से कम तीन छंद हैं। बच्चे पढ़ें या बड़े, बहुत सहज भाव से इसे पढ़ेंगे। बाल साहित्य से स्नेह होने के नाते सबसे पहले मैंने इस किताब पर चर्चा की। 



अब चर्चा करता हूं ‘पंच तत्व की पीर’ पर। एकदम सामयिक। कोरोना काल में अपने पंचतत्वों की अनदेखी और कुदरत का जरूरत से ज्यादा दोहन के खिलाफ कवि सत्यवीर नाहड़िया ने चेताया है। शाकाहार पर जोर देते हुए नाहड़िया जी ने योग पर जोर रहने की जरूरत पर बल दिया है साथ ही ताकीद की है कि संभल जाओ नहीं तो जिस तरह से मौसम चक्र बदल रहा है, ग्लोबल वार्मिंग के खतरे बढ़ रहे हैं, वह भयावह रूप धर सकता है। जिस तरह भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए कहा था कि कण कण में मैं हूं... यानी कण-कण में ताकत है। जरूरत है इस ताकत को सहेजे रखने की। समेटने की और कुदरत के साथ तालमेल बनाए रखने की। इस किताब की हर पंक्ति की अच्छी खासी व्याख्या हो सकती है। कबीर-रहीम के दोहों की तरह। तो आइये इस किताब की भी चंद पंक्तियों पर गौर कीजिए-

मैं थोड़ा ही जानता, बस इतना है ज्ञान।

घट-घट में भगवान हैं, कण-कण में विज्ञान।।


जब से बोतलबंद का, रूप लिया है धार।

गया फैलता विश्व में, पानी का व्यापार।।


नीर धरोहर आप में, कुदरत की है आब।

जोहड़ फिर जिंदा करें, जिंदा फिर तालाब।।


जैसे अपनी देह का, सदा रखें सब ख्याल।

जांच कराओ खेत की, मिट्टी की हर साल।।


सूख गए झरने सभी, सूख गए हैं ताल।

पानी आंखों का मरा, कुदरत है बदहाल।।


नये दौर में हो रहा, न्यारा आज विकास।

अपना-अपना फायदा, कुदरत का उपहास।


कोरोना से वायरस, आएंगे अब और।

कुदरत से खिलवाड़ का, अगर रहा यह दौर।।

इस किताब में कवि सत्यवीर नाहड़िया ने बहुत कुछ संदेश देने की कोशिश की है। हर पंक्ति में एक सीख है, एक चेतावनी है और हकीकत है। इसे उन्होंने पर्यावरण बाल दोहावली कहा है, लेकिन यह सबके लिए सीखपकर पुस्तक है। चूंकि मैं किताबों की कोई समीक्षा नहीं कर रहा, इसलिए प्रकाशक, पुस्तक संख्या वगैरह-वगैरह का जिक्र करने का कोई मतलब नहीं। यह तो मेरी निजी राय है। सत्यवीर नाहड़िया जी ने किताबें भेजीं। पूरी पढ़ीं और जब पढ़ लीं तो फोन पर सारी बातें कहां संभव है। इसलिए लिखकर ही अपनी बात कह सकता हूं।



अब करते हैं तीसरी किताब की चर्चा। यह भी बाल दोहावली है। किताब का नाम है रचा नया इतिहास। योगेश्वर श्रीकृष्ण से लेकर मदर टेरेसा तक इसमें सभी पर एक-एक कविता है। 

एक जगह वह लिखते हैं-

उनके रूप अनूप हैं, उनके नाम हजार।

अर्जुन के बन सारथी, भव से करते पार।।

एक अन्य कविता में वह लिखते हैं-

जनता में ऐसे किए, अलग अनूठे काज

मुहावरा है बन गया, ‘रामराज’ यह आज।। 

ऐसी ही अनेक पंक्तियां जिसको पढ़कर आनंद तो आएगा ही, साथ ही खुद ही पता चलेगा कि लिखा किस पर है। हर कविता के शीर्ष पर संबंधित चित्र भी कविता के साथ-साथ किताब की गरिमा बढ़ाता है। इसके अलावा संबंधित तिथि जानकारी बढ़ाती है। कुछ पंक्तियों का आनंद लीजिए-

नानक दुखिया कह दिया, सारा ये संसार।

उनके वचनों में छिपा, जीव जगत का सार।।


क्षमा कहें मन से सदा, क्षमा करे इंसान।

वर्धमान के ज्ञान से, मिला क्षमा को मान।।


संन्यासी फिर देख के, ऐसे हुए निहाल।

यशोधरा के साथ ही, छोड़ दिया वो लाल।।


गिरधर नागर से जुड़ा, मन का जब विश्वास।

‘दरद न जाणै कोय’ से, दर्द बताया खास।।


खिचड़ी भाषा में कहीं, बातें सब अनमोल।

साधक थे वे शब्द के, कर्म-मर्म के तोल।।


याद करे मां भारती, रचे नये आयाम।

‘युवा दिवस’ पर आपको, कोटि-कोटि प्रणाम।।


इंकलाब के चाव से, नारे बोले खास।

हंसकर फांसी पर चढ़े, याद करे इतिहास।।

‘गरम’ धर्म अपना लिया, कर जीवन कुर्बान।

‘लोकमान्य’ के नाम से, मिला खूब सम्मान।।

इस किताब की रचनाओं की खूबी है कि कुछ ही पंक्तियों में महापुरुष के बारे में बता दिया। सार संक्षेप। लेखनी में सारगर्भित। सत्यवीर जी को साधुवाद।

... और चौथी किताब है चलती चाक्की। हरियाणवी कुंडलिया संग्रह। यह चाक्की लगातार चल रही है। दैनिक ट्रिब्यून में प्रतिदिन पाठक इन्हें पढ़कर आनंद लेते ही हैं। इनमें वह गुदगुदाते हैं। कटाक्ष करते हैं और आईना दिखाते हैं। कभी इनमें इतिहास की झलक होती है और कभी भविष्य के प्रति एक दर्शन। ठेठ हरियाणवी अंदाज में। जिस तरह का मौसम अब आ रहा है और किसानों को लेकर जो बातें हो रही हैं, उसी पर एक चाक्की देखिए और समझिए-



जाड्डा इब ठाड्डा हुया, काढण लाग्या ज्यान।

पाणी लावैं खेत म्हं, सारी रात किसान।

सारी रात किसान, ताण कै कोन्या सोता।

महंगाड़े की मार, गुजारा लग ना होत्ता।

छह रुत-बारा मास, कदे न चाल्ले आड्डा।

थर-थर काम्पै गात, कदै उतरैगा जाड्डा।

और इस चर्चा की अंतिम किताब। नाम है हिंदी पत्रकारिता के मसीहा-गुप्त जी, गुड़ियानी और गुमानी की पीर। शुरू में मैंने जो चर्चा की थी कि सत्यवीर नाहड़िया जी का डॉ त्रिखा जी के लेख में जिक्र था, वह इसी पर था। नाहड़िया जी जैसे लोगों ने उन लोगों को याद करने और उनकी राहों पर चलने के लिए प्रेरित करने का बीड़ा उठाया है, जिन्होंने पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में मिसाल कायम की, लेकिन काल के क्रूर चक्र में उनके योगदान को भुलाया जाने लगा। जैसा कि किताब की भूमिका में दैनिक ट्रिब्यून के संपादक राजकुमार सिंह जी ने इसे भगीरथ प्रयास बताया है, सचमुच यह भगीरथ प्रयास ही है। इसी के साथ हरियाणा साहित्य अकादमी एवं उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. चंद्र त्रिखा ने इसे शोधपरक विशिष्ट कृति बताया है। बड़ी-बड़ी विभूतियों के कथन से नाहड़िया जी के इस प्रयास और इस किताब की गंभीरता और महत्ता को समझा जा सकता है। सचमुच यह शोधपकर किताब है। बाबू बालमुकुंद गुप्त के जीवनवृत्त से लेकर उनके लेखन, पत्रकारिता और इनसे जुड़े विविध आयामों को समझाते हुए बीच-बीच में उनकी रचनाओं का जिक्र कर किताब को ‘संपूर्ण’ बनाया गया है। साहित्य या पत्रकारिता में रुचि रखने वाले लोगों को एक बार इसे पढ़ना जरूर चाहिए।



और अंत में यही कहूंगा कि बेशक संवाद कम हो पाता है, लेकिन सत्यवीर नाहड़िया की रचना को पढ़ता रहता हूं। कई नये विचार भी मन में आते हैं। जब भी उनसे मिलना होगा, निश्चित रूप से विस्तार से चर्चा होगी। आज पांच किताबों को पढ़ने के बाद इनके बारे में मैंने तो महज एक लेख में सबकुछ समेट दिया है, लेकिन ये इस लेख से कहीं बड़ा स्पेस रखते हैं। सत्यवीर नाहड़िया जी का लेखन जारी रहे। इसी अंदाज में, यही मेरी शुभकामनाएं हैं।

Friday, October 29, 2021

वह सफर और सफर के कितने हमसफ़र : काठगोदाम यात्रा

 केवल तिवारी

मैं लिखता जरूर हूं, तुम मत ढूंढ़ना किंतु-परंतु

आपका जिक्र न भी हो तो मानिए 'सर्वे संतु।'



जी हां, लिखता जरूर हूं, सो लिख रहा हूं। डायरी लेखन थोड़ा कम कर दिया है। एक तो डायरियों का ढेर लग गया है। दूसरे, बाद में उन्हें रद्दी ही तो होना है। मैं हर मंच पर कहता हूं कि डायरी लेखन मेरा ईश्वर से सीधा संवाद है, अब यह संवाद दिल ही दिल में ज्यादा होता है। डायरी लेखन बिल्कुल बंद नहीं हुआ। डायरी लेखन यानी ईश्वर संवाद 'positive' 'All type' जारी है, थोड़ा हौले-हौले। खैर छोड़िये अभी डायरी की बात। अभी आपको ले चलता हूं अपनी काठगोदाम तक की यात्रा पर। पहली बार इतनी लंबी ड्राइव। चंडीगढ़ से सीधे काठगोदाम। चूंकि किसी शायर ने ठीक ही कहा है-

हर मंजिल की एक पहचान होती है। और हर सफ़र की एक कहानी!

इस सफर की भी कहानियां हैं। जाते वक्त की भी और आते वक्त की भी। 3 अक्तूबर को बड़े बेटे कुक्कू का JEE Advance का पेपर था, 4 अक्तूबर की सुबह हम लोग निकल पड़े ‘आदरणीय गूगल चाचा’ के इशारों पर। कहां-कहां नहीं ले गये गूगल चाचा। हमने जो परेशानियां झेलीं, वह तो हम ही जानते हैं, लेकिन जब समय पर मंजिल पर पहुंच गए तो सभी ने कहा, नहीं सही रूट दिखाया होगा तभी तो इतनी जल्दी पहुंच गए। खैर छोड़िये सफर है तो परेशानियां आएंगी ही। आनंद भी तो आया। आत्मविश्वास भी तो जगा। फिर सबसे बड़ी बात अपनों से मुलाकात। घूमने-फिरने का बहुत शौकीन हूं। जब मौका मिलता है कहीं जाने का तो चला जाता हूं। काठगोदाम में जब हम भावना के चाचा सुरेश जोशी जी से मिला तो उनकी एक बात बहुत अच्छी लगी कि जब तक शरीर फुर्तीला है तब तक खूब घूमना चाहिए। वो सब बेकार की बातें हैं कि आराम से बुढ़ापे में घूम लेंगे। उन्होंने बताया कि वह बहुत पहले ही चार धाम यात्रा के अलावा देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों एवं पर्यटन स्थलों पर घूम चुके हैं। मैं उनकी बात से पूरी तरफ इत्तेफाक रखता हूं। शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर गालिब साहब कह गए-

सैर कर दुनिया की गालिब जिन्दगानी फिर कहां, 

जिन्दगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां!


चोरगलिया, यादों का मन और मनमोहक जीवा

4 अक्तूबर को तो थकान थी सो कहीं अन्यत्र नहीं गए। अगले दिन हम लोग चले गए सितारगंज रोड स्थित चोरगलिया नामक स्थान पर। प्रेमा दीदी के यहां। साथ में भावना की बड़ी भाभी भी। वहां दीदी-जीजाजी से मिला। दीदी खेतों में गई थी। जब पता चला मैं आया हूं तो दौड़ी चली आई और उससे गले मिला तो जैसे बचपन की दीदी और अपनी माताजी याद आ गईं। एक खास तरह की घास की खुशबू से मन पुराने दिनों की ओर ले गया। फिर तुरंत संयत हुआ। दीदी से कुछ बातें हुईं। तब तक भानजे मनोज की पत्नी तनु (रेनु) ने भोजन बना दिया था। इस दौरान सबसे रोचक प्रकरण रहा मनोज की बेटी जीवा से बातचीत का। वह ऐसे बोलती है जैसे कोई सुंदर गुड़िया सी बच्ची किसी टीवी शो की डबिंग में अपनी आवाज दे रही हो। जैसे- क्या आपको मेरी याद आती थी। क्या आप नींबू पानी पीना पसंद करोगे। उससे कोई भी बात पूछो तो वह ऐसे जवाब देती मानो पूरा वाक्य याद किया हो साथ में फुल स्टाप भी। मैंने पूछा आप हमें याद करते थे, उसका जवाब था बिल्कुल। भावना ने पूछा चंडीगढ़ आओगे, उसका जवाब आना तो पड़ेगा। आपको गिफ्ट कैसा लगा के जवाब में बोली-बहुत अच्छा लगा। ऐसी ही कई बातों में कब तीन घंटे गुजर गए पता भी नहीं चला। वहां अन्य दीदीयों (दीदी की देवरानियां और जीजाजी की दीदी, उनकी पोती) आदि से मिला। शाम को लौट आए। हल्द्वानी आकर पहले भानजी रेनू से मिले फिर साढू भाई यानी भावना के दीदी-जीजाजी (गुड़िया जी एवं सुरेश पांडे जी) के यहां गए। वहां भावना के दूसरे नंबर के भाई-भाभी एवं भतीजा यानी शेखरदा, लवली भाभी और सिद्धांत जोशी पहुंचे थो। वहां डिनर के हल्का-फुल्का वॉक के दौरान बना अगले दिन रिसार्ट में जाने का।

कोटाबाग का रिसॉर्ट और आसमान के तारे












मशहूर संवाद लेखक एवं शायर राही मासूम राजा का एक शेर है-

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई, 

हम न सोए रात थक कर सो गई।  

सचमुच ऐसा ही हुआ कोटाबाग के उस रिसॉर्ट में। असल में बुधवार की सुबह मैं, पांडे जी, उनका बेटा यीशू, मेरे बेटे कार्तिक और धवल एवं भावना के बड़े भाई नंदाबल्लभ जोशी (नंदू भाई जो उसी वक्त काठगोदाम से आए थे) निकल पड़े कोटाबाग के लिए। महिला मंडली नहीं आई, उन्हें कुछ खरीदारी करनी थी। हम लोग सबसे पहले वहां पांडे जी के मित्र के रिसॉर्ट ‘कॉर्बेट हिल्स रिसॉर्ट’ पहुंचे। बच्चे तो वहां का वातावरण और उस क्षेत्र की हरियाली में ही खो गए और फोटो सेशन में जुट गए। वहां चाय पीकर हम लोग दाबका नदी की ओर चल दिए। बेहतरीन लोकेशन और हमारे अलावा वहां कोई नहीं, फिर देर कहां लगनी थी और कपड़े उतारे और सभी घुस गए नदी में। एक घंटे पानी में पड़े रहे, फिर गीले-गीले में ही लंच किया (जो महिला मंडली घूमने नहीं आई थी, उन्होंने बेहतरीन लंच बनाकर पैक कर रख दिया था)। धीरे-धीरे ठंड सी लगने लगी। फिर वापसी का कार्यक्रम बना। शाम को उस इलाके में एकदम सन्नाटा। बच्चे बार-बार कहते ‘आसमान में देखिए क्या साफ तारे दिख रहे हैं।’ मुझे याद आया जब एक बार हिंदुस्तान में एक स्टोरी लाइट पर की थी। उस स्टोरी का लब्बोलुआब यही था कि बिजली की हैवी लाइट में तारे कहीं गुम हो गए हैं। वाकई आप शहरों में आसमान की तरफ देखिए आपको बहुत गौर करने से शायद तारे दिखेंगे। पर कोटाबाग के उस इलाके में तो मजा आ गया। अपने रूम से कुछ दूर आकर हमने रिसॉर्ट के ही कैफेटेरिया में डिनर किया। बच्चे रूम में चले गए और मैं, पांडेजी और नंदूभाई जी थोड़ा सैर करने निकल गए। वहां दूर-दूर इक्का-दुक्का घरों में जलती रोशनी एक अलग ही रुख दे रही थी। कुछ ही देर में आभास हुआ कि इतने बियाबान में ज्यादा दूर नहीं जाना चाहिए सो वापस लौट आए। बच्चे टीवी देख रहे थे, मोबाइल पर गेम भी खेल रहे थे। हम लोग बातें करते रहे। सोचा, ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं था, बल्कि चंडीगढ़ से तो यही सोचकर चले थे कि इस बार कोटाबाग कहां जाना होगा, लेकिन निदा फाजली साहब के शब्दों में कहूंगा-

अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं, 

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

इस शानदार छोटे से ट्रिप के लिए पांडेजी का बहुत-बहुत धन्यवाद। साथ में उनके मित्र का भी जिनके रिसॉर्ट में रुके और जिनका बनता हुआ रिसॉर्ट देखा। आंवले भी तोड़े उस दौरान।

नवीन परिवार, लता का घर, दद्दू से बातचीत, रुचि-दीपेश और रिशू से मुलाकात




बृहस्पतिवार से नवरात्र शुरू थी। सो सुबह भावना, नेहा एवं भाभीजी के साथ गांव के मंदिर गए। वहां भी देवीस्वरूपा एक बच्ची मिली। शांत सी। भावना के आसपास मंडराती सी। मंदिर में हाथ जोड़े। दोपहर बाद हम लोग हल्द्वानी आए। कुछ मंदिर और गए और शाम होते-होते रिश्ते में भानजे लेकिन अनुभवी एवं उम्र में मेरे से खूब बड़े नवीन पांडे (राजस्थान वाले) के घर गए। उनसे बहुत सारी बातें हुईं। कोरोना काल में अपनों के खोने की चर्चाएं हुईं। फिर उनका घर देखा और उनकी छत से दिख रहे नजारे भी। अगले दिन हम पहले मेरी सबसे बड़ी भानजी लता के यहां गए। उसके पति हरीश पंत जी भीमताल में आजकल पोस्टेड हैं, लेकिन अच्छा इत्तेफाक रहा कि वह उसी दिन आ गए। उनसे बातचीत हुई। फिर पहुंचे दूसरी भानजी रुचि के घर। रुचि ने लंच तैयार किया था। दीपेश आये और लंच किया फिर दीपेश से गुजारिश की कि दद्दू के यहां ले चलो। दद्दू अब रुचि के ससुर हैं, लेकिन उनको जानता बचपन से हूं। खरी बात कहने वाले। दद्दू के यहां गए। दीपेश की माताजी इन दिनों बेहद अस्वस्थ हैं। वहां दीपेश की बहन भारती और उनकी बेटी भी आई हुई थी। कुछ देर बातें हुईं। चाय पी और लौट आए। इसी दौरान मनोज भी बहुत दूर से बाइक से आकर मिलने आ गया, बहुत अच्छा लगा। इससे पहले चोरगलिया में पप्पू भाई, गुड्डू नेताजी से भी बहुत बातें हो चुकी थीं। बेशक बहुत भागादौड़ी वाला सफर रहा, लेकिन फिर निदा फाजली का एक शेर ऐसे मौकों के लिए-

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो, 

सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।

... और कालीचौड़ की भक्तिमय यात्रा




यूं तो शनिवार सुबह मेरा लौटने का कार्यक्रम था। मुझे हर हाल में रविवार को ऑफिस ज्वाइन करना था। क्योंकि-

जूते महंगे हैं अब, पर छोटा सा सफर है, 

एक तरफ ऑफिस, दूसरी तरफ घर है।

लेकिन तय हुआ कि रविवार अल्लसुबह निकल जाएंगे। शनिवार को काली चौड़ मंदिर चलते हैं। शेखरा को एक दिन पहले जरूरी काम से दिल्ली आना था। वे आए भी, लेकिन उनकी मीटिंग कैंसल हो गई इसलिए शुक्रवार देर रात वह आ चुके थे। बेशक वह दिल्ली गए और भागमभाग वापस आए और परेशान हुए, लेकिन हमारे लिए तो कालीचौड़ जाने का आनंद और बढ़ गया। सुबह पांडे जी अपनी माता जी, पत्नी एवं बेटी के साथ काठगोदाम पहुंच गए। यहां से शेखरदा का परिवार एवं नंदूभाई जी की बेटी नेहा तैयार हुई। हम चार तो थे ही। लंच का सामान यहां भी सुबह-सुबह तैयार हो गया। हम लोग गए। पहाड़ी मार्ग पर कार चलाने का थोड़ा सा अनुभव भी हुआ। यहां भी एक नदी मिली तो मैं, पांडेजी, सिद्धांत और धवल कूद गए। बाकी सब ने दूर से देखकर ही आनंद उठाया। दोपहर बाद आ गए और वापसी की तैयारी में जुट गए। जितना काठगोदाम जाने में दिक्कत हुई, उतना ही आनंद वापसी में आया। शेखरदा ने रूट सही समझा दिया। 





इसका फायदा यह हुआ कि हम हरिद्वार भी हो आए। गंगा मां के दर्शन हुए। गंगाजल भी ले आए। आकर ड्यूटी भी ज्वाइन कर ली। शानदार सफर के संबंध में कुछ और पंक्तियां कुछ नए अंदाज में पढ़िए-

रास्ते कहां खत्म होते हैं जिंदगी के सफर में, मंजिल तो वही है जहां ख्वाहिशें थम जाएं।

 

मुझे तो पता था तू कहीं और का मुसाफिर था,

हमारा शहर तो बस यूं ही तेरे रास्ते में आ गया।

 

थोड़ी सी मुस्कुराहट बरकरार रखना, 

सफर में अभी और भी किरदार निभाने हैं।

 

कुछ सपने पूरे करने हैं, कुछ मंजिलों से मिलना है

अभी सफर शुरू हुआ है, मुझे बहुत दूर तक चलना है!

 

घूमना है मुझे ये सारा जहां तुम्हे अपने साथ लेके

बनानी हैं बहुत सी यादें हाथों में तुम्हारा हाथ लेके!

पूरा पढ़ लिया हो तो धन्यवाद। न भी पढ़ा हो तो भी धन्यवाद। सबसे ज्यादा धन्यवाद उन सभी रिश्तेदारों, नातेदारों का जिनकी वजह से सफर यादगार रहा।

इम्युनिटी बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान की जरूरत'


कोरोना का खौफ कुछ कम हुआ तो अब जगह-जगह से डेंगू एवं तेज बुखार से लोगों के बीमार होने एवं कई लोगों की मौत की दुखद खबरें सुनने को मिल रही हैं। ऐसे में डॉक्टरों, विशेषज्ञों का कहना है कि हमें किसी खास सीजन में ही नहीं, बल्कि सालभर इम्युनिटी बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। इसके साथ ही जागरूकता अभियान भी चलाए जाने की जरूरत है। यह बात माउंटेन पीपुल फाउंडेशन (एमपीएफ) की अध्यक्ष सरोज पंत ने उस वक्त कही जब उन्होंने इस संबंध में यूपी के मुख्य सचिव एवं प्रधान सचिव (आयुष मंत्रालय) से मुलाकात की। उनके साथ ही संस्था से जुड़े एवं इम्युनिटी बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे उमेश पंत भी थे। जानकारों ने कहा कि एलोपैथी दवाओं से तात्कालिक फायदे के साथ ही होमियोपैथी एवं आयुर्वेदिक दवाओं या इम्युनिटी बूस्टर से भी हम अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा कर सकते हैं। संस्था ने होमियोपैथी और योग विज्ञान के द्वारा रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के विभिन्न प्रयोगों पर भी बल दिया। इस संबंध में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिये बताया गया कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव राजीव कुमार तिवारी तथा प्रिंसीपल सेक्रेटरी (आयुष विभाग) प्रशांत त्रिवेदी जी के साथ माउंटेन पीपुल फाउंडेशन की अध्यक्ष सरोज पंत तथा डॉ. उमेश चंद्र पंत ने होमियोपैथी के द्वारा रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने पर तथा होमियोपैथिक पद्धति के द्वारा  कोविड-19 एवं डेंगू के लिए प्रीवेंटिव व इम्यूनिटी बूस्टर दवा जिले और प्रदेश स्तर पर मुहैया कराने की मुहिम के बारे में चर्चा की।

जनसेवा में लगे हैं डॉ पंत
डॉ उमेश पंत एवं सरोज पंत लंबे समय से जनसेवा में लगे हैं। गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित सेक्टर पांच में वह लंबे समय से रह रहे हैं। शिक्षा पूरी करने के बाद उमेश ने यहीं होमियोपैथी पद्धति से इलाज करना सीखा और बाकायदा डिग्री ली। उधर, संस्था एमपीएफ को पिछले दिनों उत्कृष्ट कार्य के लिए भारत के उपराष्ट्रपति ने सम्मानित किया। डॉ पंत का कहना है, 'आज के दौर में हमें एक दूसरे की मदद के लिए आगे आना चाहिए। इसके साथ ही हर किसी को यह समझना होगा कि जान है तो जहान है। इसलिए स्वस्थ रहें। होमियोपैथी पद्धति से यदि किसी रोग का समय पर उपचार शुरू हो जाए तो उसके बहुत फायदे हैं।' उनके इस कार्य को काफी सराहना मिल रही है।

Friday, October 22, 2021

शिव कुमार जी का आहूं गांव, मेरे-आपके आसपास की रोचक चर्चा

केवल तिवारी

दाबड़ा पट्टी में पल्लेवाले जोहड़ के दक्षिण पश्चिम में स्थित यह मंदिर 1880 के आसपास बना था। यह भी संभव है कि मंदिर इससे पहले से गांव में हो और उस समय इसका जीर्णोद्धार हुआ हो...।

... उस समय नए गुरुद्वारे की जगह को चण्डीगढ़ और पुराने गुरुद्वारे को पुरानी दिल्ली कहा जाने लगा। जल्द ही सहमति हो गई कि गांव में एक ही गुरुद्वारा रहेगा। इसलिए नए गुरुद्वारे की बात आगे नहीं चली। तब से उस इलाके को चण्डीगढ़ कहा जाता है। ...

इस परिवार को बाद के पूर्वज 'अल्लाह दिया' के नाम पर 'लदिये के' कहा जाने लगा। मान्ना अल्लाह दिया से चार पीढ़ी पहले हुए थे। इस परिवार में 1885 में जैबा और सफिया की कोई संतान नहीं थी...।

1951 से पहले की जनगणना की रिपोर्टों से अकाल और महामारी इत्यादि के उन कारणों का पता चलता है जिनसे प्रभावित होकर लोग या तो गांव छोड़कर दूसरी जगह चले जाते थे या बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हो जाने के कारण आबादी घट जाती थी। ... 1951 से पहले की जनगणनाओं में अलग-अलग गांवों की आबादी और शिक्षा की सूचना उपलब्ध नहीं थी। पूरे पंजाब और करनाल जिले के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि सन 1881 से 1921 तक महिलाओं में सेशायद ही कोई पढ़ी-लिखी होती थी।

आजादी से पहले गांव में पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। गांव में मंदिर और मस्जिद दोनों थे, लेकिन उनमें भी पढ़ाई की कोई व्यवस्था रही हो ऐसा कोई प्रमाण नहीं है।

सन 1897 से 1918 तक के सालों में पंजाब में प्लेग फैला रहा। यह बीमारी जालंधर जिले से शुरू हुई और धीरे-धीरे पूरे पंजाब में फैल गई। आहूं और आसपास के इलाके में यह बीमारी संवत 1975 (सन 1918 ईस्वी) के कार्तिक महीने में पहुंची इसीलिए इसे कात्त्ग (कार्तिक) वाली बीमारी कहा जाता रहा है।

संवत 1840 (सन 1783) में भयंकर अकाल पड़ा था जिसे संवत के चालीसवे साल में होने के कारण चालीसा का अकाल कहा जाता था।

आहूं गांव का नाम अह्न (यह शब्द क्रमश: अ, ह् और न वर्णों से बना है, इसमें 'ह' हलंत और न पूर्ण अक्षर है) तीर्थ के नाम पर ही पड़ा है। अह्न के अशुद्ध उच्चारण (ह और न को आपस में बदलकर बोलने से) के कारण इसे अन्ह आन्ह और फिर आन्ध कहा जाने लगा...।’


उक्त कुछ पंक्तियां पुस्तक ‘आहूं गांव का इतिहास’ में से ली गई हैं। एक छोटी सी बानगी कि पुस्तक को कितने शोधपरक तरीके से लिखा गया है। असल में इस पुस्तक के लेखक शिव कुमार जी से इस पर चर्चा पहले हुई। फिर उन्होंने मुझे पीडीएफ फार्मेट में कुछ पढ़वाया। सच कहूं तो कभी-कभी मन में आता था कि हरियाणा के एक छोटे से गांव के बारे में कुछ लिखने या फिर पढ़ने की क्या रुचि हो सकती है? फिर खुद ही जवाब ढूंढ़ा कि लिखने की रुचि तो वहां का वाशिंदा होने के कारण शिव जी को हो गयी। फिर पढ़ने की? पढ़ने का मैं शौकीन हूं। इसी संबंध में अपने पूर्व के ब्लॉग में ऐसे ही एक गांव से संबंधित किताब का जिक्र कर चुका हूं।

खैर... इस बार शिव कुमार जी ने किताब भिजवा दी। लंबा समय हो गया। शायद दो माह से अधिक। पिछले दिनों उत्तराखंड की यात्रा के दौरान भी किताब साथ में रही। जब मौका मिला पढ़ता गया। उसी दौरान मुझे पता चला कि वहां सुदूर देभाल के रहने वाले मिश्रा लोगों ने भी अपनी एक वंशावली बनाई है। तभी एक सज्जन से बात हुई। उन्होंने मेरे सामने ही पुस्तक के कुछ जरूरी हिस्से पढ़ डाले। पढ़ते ही बोले, ‘काफी शोधपरक लगती है, आपने पढ़ ली क्या?’ मैं उनकी मंशा समझ गया। मैंने कहा, बस खत्म होने वाली है, आपको फिर भेजता हूं। वह मुस्कुरा दिए। असल में यह किताब वाकई शोधपरक है। आहूं गांव का नाम कैसे पड़ा। हरिद्वार में इस गांव के कौन पंडित हैं। जैसी जानकारी मुझे बड़ी रोचक लगी। मुझे याद आया कि करीब 25 साल पहले जब मैं जनेऊ कराने हरिद्वार गया था तो माताजी ने मुझसे कहा कि वहां काशीनाथ मुरलीधर के ठिकाने पर चले जाना। वह पूरी मदद करेंगे। सच में ऐसा ही हुआ। उन्होंने न केवल मदद की, बल्कि हमारे परिवार के कई पीढ़ियों के बारे में भी बता दिया। आहूं गांव के इतिहास को पढ़ते-पढ़ते वहां के वैद्यों का जिक्र (यहां बता दूं कि लेखक शिव कुमार के पिताजी स्वयं एक वैद्य रहे हैं उनका नाम है वैद्य धनीराम), पूजा स्थलों का जिक्र। इतिहास ही नहीं, इस किताब में वर्तमान भी है जो भविष्य के बारे में आईना सा दिखाता है। जगह-जगह वंशावली, आबादी, जमींदारी, शादी-व्याह जैसे शुभअवसरों पर गाये जाने वाले गीत, शिक्षा, खेती-बाड़ी जैसे तमाम पहलुओं की खूब पड़ताल की है लेखक शिव कुमार जी ने। ज्यादा विस्तार से नहीं लिखूंगा। यह जरूर कहूंगा कि यदि आप आहूं के गांव के आसपास के या हरियाणा के या पंजाब के हैं तो यह किताब तो आपको भाएगी ही, यदि आपका दूर-दूर तक इस गांव से किसी तरह का कोई नाता नहीं है तो भी यह किताब बेहद उपयोगी है। गांव के इतिहास लेखन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करती है किताब। बेहद सरल और सहज अंदाज में। पुराने दस्तेवेजों और विभिन्न चित्रों से पुस्तक की रोचकता और भी बढ़ गयी है। मौका लगे तो पढ़ डालिए। शिव कुमार जी को पुन: साधुवाद। ऐसा लेखन और भी वह करेंगे, ऐसी उम्मीद है। मेरी शुभकामनाएं।


Tuesday, October 19, 2021

पंडित दीनदयाल पर चर्चा, डॉ कुलदीप अग्निहोत्री और मोक्ष का अर्थ

 केवल तिवारी

काल करे सो आज कर...। कबीरदास जी सच में बहुत बड़ी बात कर गये थे। जीवन के तमाम उतार-चढ़ाओं के बीच अनेक काम हम टाल जाते हैं, उनका प्रतिफल कितना हमें प्रभावित करता है, इसे कभी समझ पाया और कभी नहीं, लेकिन लेखन के संबंध में यह समझ आया कि देर की तो सब गड्डमड्ड। वैसे जहां तक डायरी लेखन का सवाल है, मैंने अब उसे धीरे-धीरे न्यूनतम करने की शुरुआत कर दी है। उसके कई कारण हैं, सबसे पहला कारण कि डायरियों का बहुत बड़ा ढेर लग चुका है। यहां-वहां अटे पड़े हैं। बाद में उसे रद्दी ही होना है। हां ऑनलाइन लेखन यानी ब्लॉग लेखन और पत्र-पत्रिकाओं में लेखन जारी रखूंगा। डायरी लेखन वैसे मेरे लिए ईश्वर से सीधा संवाद जैसा है, इसलिए उसे बंद नहीं कर सकता, हां संवाद नियमित डायरी के माध्यम के बजाय दिल ही दिल में होता रहेगा। खैर... एक तो मैंने ऐसे ही देर कर दी, उस पर ज्यादा भूमिका के चक्कर में पड़ गया तो और देर हो जाएगी। देरी लेखन में इसलिए नहीं करनी चाहिए कि आपके दिमाग में जो तत्काल खयाल आते हैं, वह धीरे-धीरे बदल जाते हैं या फिर दिमाग उनको उस अंदाज में याद नहीं कर पाता। ऐसा ही हुआ इस लेखन के संबंध में। कार्यक्रम का मर्म, उद्देश्य और बातें तो कभी नहीं भूल सकता, लेकिन तत्काल लिखा होता तो शायद ज्यादा अच्छा होता। खैर... देर आयद दुरुस्त आयद।

असल में करीब एक महीना होने को आया, मेरा मन जिस विषय पर तत्काल लिखने को हो रहा था, वह नहीं लिख पाया। कारण गिनाना तो अपनी कमियों को छिपाना है। सीधे मुद्दे पर आता हूं। गत 25 सितंबर को वरिष्ठ पत्रकार एवं हमारे पूर्व समाचार संपादक हरेश जी के माध्यम से एक ऑनलाइन सेमिनार में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती पर उनके विचारों को लेकर परिचर्चा थी। इसमें मुख्य वक्ता थे डॉ कुलदीप अग्निहोत्री जी। संचालन संघ से जुड़े एवं अभी पांच राज्यों के प्रभारी अनिल जी कर रहे थे। इसमें मेरे मित्र एवं दिल्ली स्थित भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) में प्रोफेसर प्रमोद सैनी समेत अनेक लोग जुड़े। डॉ अग्निहोत्री हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के कुलपति हैं। उनका परिचय इतनाभर ही नहीं है। उन्होंने कई शोध कार्य किए हैं। कई महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए हैं। कई महत्वपूर्ण संस्थानों को संभाला है। उनका विस्तृत विवरण फिर कभी। सेमिनार में दीनदयाल जी के विचारों की प्रासंगकिता पर बात करते हुए डॉ अग्निहोत्री ने मोक्ष का अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि निरंतर जिज्ञासु बने रहना ही मोक्ष है। प्रकृति को समझना और उसके प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करना ही मोक्ष है। मोक्ष मतलब मौत के बाद का मंजर नहीं है। असल में मोक्ष की जो परिकल्पना हमारे धर्मशास्त्रों में की गयी है, उसकी समुचति व्याख्या शायद अभी नहीं हुई है। या फिर उसे ठीक से समझा नहीं गया। दीनदयाल जी की चर्चा में ही उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय एक कुशल संचारक और भारतीय संस्कृति के अनन्य उपासक थे। दीनदयाल जी ने सरलता, सहजता एवं सादगी द्वारा भारतीय जनता से संवाद स्थापित किया। डॉ अग्निहोत्री के अनुसार पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय दर्शन को आधार बनाकर आधुनिक भारत की नींव रखी और आज एकात्म मानववाद और अंत्योदय इसी नए भारत का महत्वपूर्ण अंग हैं। उनका मानना था कि गलत मार्ग से सही लक्ष्य की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। हमें भारत का विकास भारतीय दृष्टि से करना होगा। प्रो. अग्निहोत्री ने कहा कि दीनदयाल जी के विचारों द्वारा ही सबका विकास किया जा सकता है। एकात्म मानवदर्शन में संपूर्ण जीवन की एक रचनात्मक दृष्टि है। इसमें भारत का अपना जीवन दर्शन है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को टुकड़ों में नहीं, समग्रता में देखता है। इस कार्यक्रम में अन्य वक्ताओं ने पंडित दीनदयाल जी और उनके विचारों के बारे में उपलब्ध सामग्री का अन्य भाषाओं में अनुवाद कराए जाने की जरूरत पर भी बल दिया। कुछ लोगों ने अन्य मुद्दे भी उठाये। परिचर्चा सार्थक रही। बस मुझे थोड़ा पहले सेमिनार को ‘लीव’ करना पड़ा क्योंकि मनुष्य तो कर्म के अधीन है और इसी कर्म के तहत ऑफिस से फोन आ गया कि पेज पर विज्ञापन आया है कुछ मैटर हटाना पड़ेगा और कुछ एडिट करना पड़ेगा। विस्तृत बातें फिर होती रहेंगी।

Sunday, September 26, 2021

अनुभव की खान, घर की शान

 साभार : दैनिक ट्रिब्यून




अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस 1 अक्तूबर

 इनसे सीखिए। इनसे समझिए। इनके पास बैठिए। बीते कल के बारे में इनसे पूछिए और आज आए बदलावों के बारे में इनको बताइए। ये बुजुर्ग हैं। ये अनुभव की खान हैं। उम्र के आधार पर इन्हें खारिज मत कीजिए। बुजुर्ग की अहमियत उनसे पूछिए जिनके सिर से अपने बड़ों का साया उठ गया। अगर आपके घर में बुजुर्ग हैं तो यकीन मानिए, जीवन के सफर में अगर आप कहीं डगमगाएंगे तो कांपते हाथ-पैरों वाले बुजुर्ग अपने अनुभव की ताकत से आपको निकाल ले जाएंगे। इसलिए आइए बुजुर्गों का सम्मान करते हुए उनसे सीखने की सतत कोशिश करें।
अनुभव की खान घर की शान

केवल तिवारी

हमारे घर में फैसलों में देरी नहीं होती,
हमारे घर बुजुर्ग रहते हैं।
सचमुच जिस घर में बुजुर्ग रहते हैं और उन बुजुर्गों का पूर्ण सम्मान होता है, वह घर स्वर्ग से सुंदर ही होता है। ऐसा इसलिए भी कि बुजुर्गों का अनुभव पूरे परिवार के काम आता है। यह तो सब जानते हैं कि बुजुर्ग अनुभवों की खान होते हैं, लेकिन उस खान से कुछ हीरे-मोती सहेजने का माद्दा कुछ लोगों में ही होता है। कहीं बुजुर्गों को ‘बोझ’ समझा जाने लगता है तो कुछ घरों में यह उम्मीद की जाती है कि बुजुर्ग चुपाचाप रहें और अपने से मतलब रखें। कुछ घर ऐसे भी होते हैं जहां बुजुर्गों को परिवार के हर कदम की जानकारी दी जाती है और उनसे रायशुमारी की जाती है। यही नहीं, परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों में उन्हें ही आगे रखा जाता है। यह सब जानते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ कई तरह की दिक्कतें आती हैं। सबसे महत्वपूर्ण है स्वास्थ्य। शरीर में बेशक थोड़ी शिथिलता रहे, लेकिन अगर बुजुर्गों को अपनापन दिया जाये, उन्हें सम्मान दिया जाए तो वे घर के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होते हैं। उनका अनुभव तो काम आता ही है, उनकी दुआवों की भी हमें जरूरत होती है। मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने लिखा है-
अभी ज़िंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा।
मैं घर से निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है।
सभी जानते हैं कि बुजुर्गावस्था हर इंसान के जीवन में आनी है। उम्र का यह एक ऐसा पड़ाव होता है जब उन्हें प्यार, सम्मान और अपनेपन की सबसे ज्यादा दरकार होती है। कहा भी जाता है कि बुजुर्ग बच्चों की तरह हो जाते हैं। यानी अगर उम्र के इस मोड़ पर हमारे परिजन पहुंच गए हों कि वे शारीरिक रूप से शिथिल हो गये हैं तो पूरे सम्मान के साथ उनका ध्यान रखा जाना चाहिए। हमें सही राह दिखाने वाले बुजुर्गों के अनुभव और सीख से जीवन में किसी भी कठिनाई से हम पार पा सकते हैं। इसीलिए बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा का भाव तो आना ही नहीं चाहिए। कई बार तर्क दिया जाता है कि पारिवारिक सामंजस्य में बुजुर्गों को भी संभलकर चलना चाहिए, लेकिन जानकार कहते हैं कि उम्र बढ़ते-बढ़ते सहनशक्ति कम हो जाती है। ऐसे में युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे बुजुर्गों की बातों को नकारात्मक रूप में बिल्कुल न लें। क्योंकि उम्र के इस पड़ाव से सभी को गुजरना है। कहते भी तो हैं बूढ़े-बच्चे एक समान।
घर के कामों में भी भागीदार बनाएं
जानकार कहते हैं कि बुजुर्गों को घर के कामों में ‘इनवाल्व’ करना चाहिए। अनेक घरों में छोटे बच्चे अपने माता-पिता से ज्यादा अपने दादा-दादी या नाना-नानी से घुलमिल जाते हैं। ऐसे में बच्चों को स्कूल तक छोड़ने या लाने, पार्क में खेलने ले जाने जैसे कामों में उन्हें शामिल करना चाहिए। कई बुजुर्गों को घर के काम में हाथ बंटाना अच्छा लगता है, उन्हें ऐसा करने दीजिए। हो सकता है कई बार आपकी मंशा होती है कि बुजुर्ग व्यक्ति से काम नहीं कराना चाहिए। इस ‘नहीं’ में आपकी चिंता शामिल हो सकती है, लेकिन गौर करेंगे तो बुजुर्गों का यदि मन है काम करने का तो उन्हें काम में शामिल होने में आनंद ही आएगा। इसे दो उदाहरणों से समझ सकते हैं। एक बहू कहीं बाहर से आती है और अपनी सास से कहती है, ‘मांजी एक कड़क चाय पिला दीजिए, मजा आ जाएगा।’ सास तुरंत किचन में जाती है और थोड़ी देर में खुशी-खुशी चाय लेकर आ जाती है। वहीं, कोई अन्य घर में एक बहू भी चाहती है कि उसकी सास चाय पिला दे, लेकिन वह संकोचवश नहीं कहती। सास अगर किचन में जाती भी है तो उन्हें रोकती है। बेशक बहू की मंशा गलत नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे बुजुर्ग सास और ज्यादा बुजुर्गियत की ओर अग्रसर होंगी और हो सकता है धीरे-धीरे बिस्तर ही पकड़ लें। जानकार कहते हैं कि घर के कामों में बुजुर्गों को इनवाल्व करने में कोई नुकसान नहीं। हां, यह देखना जरूरी है कि काम उनकी सेहत और उम्र के अनुरूप हो। असल में ज्यादातर बुजुर्ग काम में इनवाल्व होकर अपने होने का मतलब साबित करना चाहते हैं। उन्हें बुजुर्ग कहकर एक कोने में बिठा देंगे तो वे खुद को ही बोझ समझने लगेंगे। मशहूर शायर बशीर बद्र साहब ने ठीक ही लिखा है-
कभी धूप दे, कभी बदलियां,
दिलोजान से दोनों कुबूल हैं,
मगर उस नगर में ना कैद कर,
जहां जिन्दगी की हवा ना हो।
हकीकत यही है कि जिंदगी की हवा अपने परिवार के साथ घुलमिलकर रहने में ही है। कुछ घरों में बुजुर्गों से उम्मीद की जाती है कि वे टीवी पर धार्मिक चैनल ही देखें या ज्यादातर समय पूजा-पाठ या इबादत में ही बिताएं। ऐसी उम्मीद रखना भी अच्छी बात नहीं है। टीवी पर कई शो आते हैं, उन्हें देखने दीजिए अपनी मर्जी का शो। यदि वे अपनी मित्र मंडली में व्यस्त रहते हैं तो रहने दीजिए। इसी तरह पूजा-पाठ, इबादत में उन्हें अपनी सुविधा से समय लगाने दीजिए। खाने में कभी उनकी पसंद पूछिए। कभी अपनी पसंद उन्हें बताइए। यही तो है बुजुर्ग का परिवार में रहने का सुखद अनुभव। कई घरों में बेटे-बहू दोनों नौकरी करते हैं, वहां बुजुर्गों की अहमियत समझी जाती है। इसलिए बुजुर्ग को बोझ न समझकर घर का महत्वपूर्ण सदस्य समझा जाये और उनके अनुभवों को समझने की कोशिश की जानी चाहिए। कभी-कभी उनके पुराने किस्सों को भी सुनना चाहिए।
अपनों से दूर रहने को मजबूर
आज ऐसे बुजुर्गों की संख्या बहुत है जो अपनों से दूर रहने को मजबूर हैं। यह मजबूरी कई कारणों से है। कोई वृद्धाश्रमों में जीवन की सांझ बिता रहा है तो कोई अपने ही घर में अपनों से दूर है। वृद्धाश्रम में रहने की मजबूरी हो या फिर अपने घर में अपनों के बगैर रहने की जद्दोजहद, इसके कई कारण हैं। उन कारणों में से मुख्य हैं चार। एक तो वे बुजुर्ग जिनके बच्चे विदेश में बस गए हैं और उन देशों के कानून के मुताबिक वहां बुजुर्गों को नहीं ले जा सकते। ऐसे बच्चे आज के आधुनिक संचार माध्यमों से उनसे जुड़े रहते हैं। दूसरे, ऐसे बुजुर्ग जिनकी कोई संतान नहीं हुई और उन्होंने किसी को गोद भी नहीं लिया। वे या तो वृद्धाश्रमों में रहते हैं या फिर घर में अकेले। तीसरे, ऐसे बुजुर्ग हैं जिनकी एक या दो लड़कियां हैं और उनकी शादी हो गयी। ये लड़कियों के घर नहीं रहना चाहते और चौथे और सबसे भयावह स्थिति उनकी है जिनकी संतानों ने उन्हें या तो जबरन वृद्धाश्रमों में डाल दिया है या फिर घर की कलह से तंग आकर वे खुद ही वहां रहने लगे। अपनों से दूर रहने को मजबूर इन बुजुर्गों की स्थिति सचमुच बहुत चिंताजनक होती है। बेशक आज कई संस्थाएं हैं जो एकाकी जीवन बिता रहे बुजुर्गों के लिए काम करते हैं, लेकिन अपनों का जो साथ है, उसकी भरपाई भला कौन कर सकता है। यह तो समय चक्र है। हर किसी को इस चक्र से गुजरना है। इसलिए कोशिश करें कि बुजुर्गों के साथ रहें। उनकी भावनाओं को समझें। मशहूर शायर बशीद बद्र का यह शेर सही है-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो।
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।
जरा बुजुर्गों के हिसाब से सोचिए। अगर हम उन्हें उपेक्षित रखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा। उनके मन में यह भाव आना लाजिमी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो ले रहा है और न ही उनकी ओर से दी गयी राय को महत्व दे रहा है। वृद्ध समाज को इस निराशा और संत्रास से छुटकारा दिलाना वर्तमान हालात में सबसे बड़ी जरूरत और चुनौती है। बेशक कई कदम उठाये जा रहे हैं लेकिन इस दिशा में सामाजिक जागरूकता जैसी पहल का किया जाना बेहद जरूरी है।
इस तरह शुरू हुआ अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस
विश्व के अनेक देशों से बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचारों, उनकी बिगड़ती सेहत की खबरें आती रहती हैं। इसी को ध्यान में रखकर यह महसूस किया गया कि बुजुर्गों के लिए सरकारों को कुछ करना चाहिए। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1990 से अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाने की शुरुआत हुई। तय किया गया कि हर वर्ष 1 अक्तूबर को अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाया जाएगा। इस दिवस के शुरू होने के कुछ सालों बाद 1999 को बुजुर्ग वर्ष के रूप में मनाया गया। असल में संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने एवं बुजुर्गों के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से 14 दिसंबर, 1990 को यह निर्णय लिया कि हर साल 1 अक्तूबर 'अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। इस तरह 1 अक्तूबर, 1991 को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाया गया। बताया जाता है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में सर्वप्रथम अर्जेंटीना ने विश्व का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। इससे पूर्व 1982 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘वृद्धावस्था को सुखी बनाइए’ जैसा नारा दिया और ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ का अभियान शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुए अभियान के फलस्वरूप अनेक देशों की पुलिस ने बुजुर्गों के लिए विशेष अभियान चलाया, मसलन-पुलिसकर्मी इलाके के एकाकी बुजुर्गों की पहचान कर उनसे मिलेगा और उनको हो रही दिक्कतों को दूर करवाने के लिए संबंधित विभाग को जानकारी देगा। अनेक देश वृद्धावस्था पेंशन भी देते हैं जिनमें भारत अग्रणी देश है। इसके अलावा अनेक सार्वजनिक स्थानों पर बुजुर्गों के लिए विशेष काउंटर बना होता है ताकि उन्हें कतार में न लगना पड़े। साथ ही समय-समय पर अपील की जाती है कि लोग स्वयं बुजुर्गों के लिए अपनी बारी को छोड़ दें। इन कवायदों का असर दिख भी रहा है। अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर बुजुर्गों के सम्मान में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इनमें स्वास्थ्य की जांच भी प्रमुख है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी गोष्ठियां एवं सभाएं होती हैं। बेशक अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस का एक दिन तय किया गया हो। यानी पहली अक्तूबर को यह दिन तय किया गया हो, लेकिन भारत में तो सदियों से यह परंपरा रही है कि अपने से बड़ों का सम्मान एवं आदर किया जाना चाहिए। कहा भी गया है-
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनं:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं।।
अर्थात बड़े-बुजुर्गों का अभिवादन, उनका सम्मान और सेवा करने वालों की 4 चीजें-आयु, विद्या, यश और बल हमेशा बढ़ती हैं। इसलिए हमेशा वृद्ध और स्वयं से बड़े लोगों की सेवा व सम्मान करना चाहिए।
हमारे बुजुर्गों ने दिखाया है युवाओं सा हौसला
इरादे मजबूत हों तो कभी उम्र आड़े नहीं आती। हमारे तो कई बुजुर्गों ने युवाओं सरीखा हौसला दिखाया है। कौन नहीं जानता उड़न सिख या फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह को। कोरोना के कारण गत जून में 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। जीवन के अंतिम समय तक वह सबके प्रेरणास्रोत बने रहे और युवाओं का हौसला बढ़ाते रहे। उनके नाम अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्री रिकॉर्ड दर्ज हैं। इसी तरह शूटर दादी के नाम से मशहूर चंद्रो तोमर। दुखद है कि उनका भी कोरोना काल में 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। बागपत की शूटर दादी ने उम्र के उस पड़ाव में शूटिंग शुरू की जब लोग बुढ़ापा कहकर बैठ जाते हैं। 60 साल की उम्र में प्रोफेशनल शूटिंग शुरू करने वाली चंद्रो तोमर काफी कम समय में देश की मशहूर निशानेबाज बन गईं थी। उन पर फिल्म भी बन चुकी है। इसी तरह अमेरिका में टेक्सास में रहने वाले भारतीय रामलिंगम सरमा ने अपने 100वें जन्मदिन पर सुंदरकांड का अंग्रेजी में अनुवाद पूरा किया। उन्होंने 35 साल की उम्र में तमिल भाषा में सुंदरकांड पढ़ा था। अपनी इच्छा के मुताबिक रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत में सुंदरकांड का अध्ययन किया। फिर उन्हें लगा कि इसका अंग्रेजी में अनुवाद होना चाहिए। उन्होंने 88 साल की उम्र में टाइपिंग सीखी। कुल 12 साल अनुवाद में लगे और जीवन के सौवें साल में इसे पूरा कर जनता को समर्पित किया। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने साहित्य, कला आदि तमाम विषयों में उम्र के उस पड़ाव में शिखर छुआ जिसे लोग जीवन की सांझ कहते हैं। आज कोई पीएचडी तो कोई कानून की डिग्री भी बुजुर्ग अवस्था में ले रहे हैं। इसलिए उम्र तो ऐसे जीवट लोगों के लिए महज अंकगणित रहा है। उनके जोश में कोई कमी नहीं दिखती। ऐसे लोग प्रेरणास्रोत हैं अन्य लोगों के लिए।
स्वास्थ्य पर रखें ध्यान
बुजुर्ग हों या बच्चे, दोनों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान रखे जाने की जरूरत है। इसलिए घर के बड़े लोगों को अपनी दिनचर्या ऐसी बनानी चाहिए कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें कम से कम हों। डॉक्टरों का कहना है कि बुजुर्गोँ का खान-पान हल्का होना चाहिए। सुबह-शाम जितना संभव हो उन्हें सैर करनी चाहिए। इसके अलावा बाथरूम आदि में बहुत संभलकर चलने की आवश्यकता है क्योंकि फिसलने से चोट लग सकती है और उम्र के इस पड़ाव में ठीक होने में काफी वक्त लग सकता है। साथ ही समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी कराते रहना चाहिए। यदि कोई दवा लेते हों तो वह नियमित हो, इसका ध्यान घरवालों को रखना चाहिए। जानकार की देखरेख में योग एवं प्राणायाम करना चाहिए।

Wednesday, September 22, 2021

विमर्श, चर्चा, सच और झूठ

केवल तिवारी
पिछले दिनों एक कार्यक्रम में जाना हुआ। कार्यक्रम में एक शब्द बार-बार गूंजा। वह शब्द था विमर्श। इस विमर्श पर चर्चा के बाद उन बिंदुओं पर चर्चा करूंगा जो मेरे लिए महत्वपूर्ण थे। तो पहले आते हैं विमर्श पर। विमर्श शब्द का अनेक बार मैं भी इस्तेमाल करता हूं। या कहूं कि प्रयोग करता हूं। मैं इसका प्रयोग विवेचन के तौर पर करता हूं। कोई मुद्दा-तात्कालिक या तत्कालीन। कोई विषयवस्तु। कभी-कभी किसी लेख के संदर्भ में। लेकिन इस कार्यक्रम में विमर्श का अर्थ जो मैंने समझा और कुछ विद्वानों से चर्चा के बाद स्थिति स्पष्ट हुई, वह था विमर्श मतलब परीक्षण। किसी मुद्दे का परीक्षण। वह मुद्दा इतिहास से छेड़छाड़ का हो या वह मुद्दा समाज में फैलाये जा रहे झूठ या भ्रम को लेकर हो। विमर्श मीडिया को लेकर हो या विमर्श देश, काल और परिस्थिति पर। 'विमर्श' के उस दौर में कई विषयों पर 'चर्चा' हुई। विवेचना भी हुई। फिर एक बात वही सामने आई कि सच उतना ही नहीं है, जितना हम जानते हैं या जितना हमने जाना। सच उससे कहीं ज्यादा या कम भी हो सकता है।
असल में हमारा मीडिया, खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या न्यू मीडिया अभी भी शैशव काल से ही गुजर रहा है। वहां जब बहस मुबाहिसें होती हैं तो दो दिक्कतें आती हैं। एक-या तो मुद्दा ही आधा-अधूरा उठता है, दूसरा-विमर्श कर रहे लोग येन-केन प्रकारेण अपनी ही बात को सही साबित करने में तुले होते हैं। यहीं पर विमर्श भटक जाता है। आप किसी भी खबर को उठा लीजिए। खबर एक ही होती है, लेकिन अपनी-अपनी सुविधानुसार उस खबर से एंगल निकाल लिया जाता है।


शब्दावली पर बहस
इस विमर्श कार्यक्रम में लेखन की बात हुई। चूंकि बातचीत का माध्यम हिंदी बनी तो यह लेखन की बात हिंदी पर आकर टिकी और अच्छे लेखन की अन्य भाषाओं में अनुवाद का भी सबने पुरजोर समर्थन किया। संयोग से मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला। मुझसे पहले कुछ विद्वान अपनी राय रख चुके थे। बात लगभग ठीक ही हो रही थीं। जैसे कि लेखन में विषयों का वर्गीकरण हो। कुछ तात्कालिक विषय हो जाते हैं और कुछ स्थायी। कभी-कभी तात्कालिक समझे जाने वाले विषय स्थायी से बनते नजर आते हैं और कभी-कभी स्थायी विषय तात्कालिक से हो जाते हैं। मैंने एक बात का विरोध किया। कुछ लोगों ने कहा कि हिंदी लेखन या बोलचाल में शुक्रिया जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। कुछ ने इसी तरह कुछ अन्य शब्द भी बताये। जब मेरी बारी आई तो सबसे पहले मैंने भाषा और शैली की शालीनता पर जोर दिया। मैंने पिछले दिनों समीक्षार्थ पढ़ी गई एक पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि पुस्तक बहुत अच्छी है, लेकिन उसमें शैली और भाषा की शालीनता नहीं है। अनेक महापुरुषों के लिए भी तू-तड़ाक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। मेरी बात का कुछ लोगों ने समर्थन किया। असल में बोलचाल की भाषा में तो कभी-कभी मानवीय स्वभाव के मुताबिक हमारी भाषा थोड़ी भटक सकती है, लेकिन जब बात डाक्यूमेंटेशन की आती है तो फिर इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए। फिर शुक्रिया जैसे शब्दों से परहेज़ क्यों? हिन्दी तो अनेक शब्दों को आत्मसात कर चुकी है। हिन्दी सबको साथ लेकर चलने वाली है, इसलिए हिन्दी कमजोर नहीं हो सकती।
भाषा की जब बात आती है और उसमें शब्दों के चयन की बात आती है तो मुझे जाने-माने लेखक कुबेरनाथ राय जी की एक पंक्ति याद आती है। उन्होंने अपने निबंध भाषा बहता नीर में कहा था, 'भाषा को अकारण दुरूह या कठिन नहीं बनाना चाहिए। परंतु सकारण ऐसा करने में कोई दोष नहीं।' यानी जहां जरूरत नहीं है, वहां भाषा को बहुत क्लिष्ट नहीं बनाया जाना चाहिए। हां इसके पीछे कोई कारण हो तो ऐसा करने में परेशानी भी नहीं।


मातृभाषा है तो सब है...
भाषा और शैली के साथ-साथ जब हम मातृभाषा की बात करते हैं तो यह ध्यान रखना चाहिए कि राष्ट्र की एक सर्वमान्य भाषा होनी चाहिए। भारत के संदर्भ में यह भाषा हिंदी ही हो सकती है। अपने समय के मशहूर पत्रकार और लेखक रहे गणेश शंकर विद्यार्थी ने 2 मार्च, 1930 को गोरखपुर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के 19वें अधिवेशन में कहा था-'भाषा-संबंधी सबसे आधुनिक लड़ाई आयरलैंड को लड़नी पड़ी थी। पराधीनता ने मौलिक भाषा का सर्वथा नाश कर दिया था। दुर्दशा यहां तक हुई कि इने-गिने मनुष्यों को छोड़कर किसी को भी गैलिक का ज्ञान न रहा था, आयरलैंड के समस्त लोग यह समझने लगे थे कि अंग्रेजी ही उनकी मातृभाषा है, और जिन्हें गैलिक आती भी थी, वे उसे बोलते लजाते थे और कभी किसी व्यक्ति के सामने उसके एक भी शब्द का उच्चारण नहीं करते थे। आत्म-विस्मृति के इस युग के पश्चात् जब आयरलैंड की सोती हुई आत्मा जागी तब उसने अनुभव किया कि उसने स्वाधीनता तो खो ही दी, किंतु उससे भी अधिक बहुमूल्य वस्तु उसने अपनी भाषा भी खो दी। गैलिक भाषा के पुनरुत्थान की कथा अत्यंत चमत्कारपूर्ण और उत्साहवर्धक है। उससे अपने भाव और भाषा को बिसरा देने वाले समस्त देशों को प्रोत्साहन और आत्मोद्वार का संदेश मिलता है। इस शताब्दी के आरंभ हो जाने के बहुत पीछे, गैलिक भाषा के पुनरुद्वार का प्रयत्न आरंभ हुआ। देखते-देखते वह आयरलैंड-भर पर छा गयी। देश की उन्नति चाहने वाला प्रत्येक व्यक्ति गैलिक पढ़ना और पढ़ाना अपना कर्तव्य समझने लगा। सौ वर्ष बूढ़े एक मोची से डी-वेलरा ने युवावस्था में गैलिक पढ़ी और इसलिए पढ़ी कि उनका स्पष्ट मत था कि यदि मेरे सामने एक ओर देश की स्वाधीनता रक्खी जाए और दूसरी ओर मातृभाषा, और मुझसे पूछा जाये कि इन दोनों में एक कौन-सी लोगे, तो एक क्षण के विलंब के बिना मैं मातृभाषा को ले लूंगा, क्योंकि इसके बल से मैं देश की स्वाधीनता भी प्राप्त कर लूंगा। ...' यानी हिंदी की सर्वमान्यता धीरे-धीरे और व्यापक हो इस पर भी हमें विमर्श करना चाहिए।


अनेक जानकार मिले
विमर्श वाले इस कार्यक्रम में मेरे अनेक जानकार मिले। मेरे लिए यही बड़ी उपलब्धि थी। एक-दो लोगों को मैं पहचान नहीं पाया, लेकिन जब पुरानी बातें होने लगीं तो फिर लंबे समय तक चर्चा चलती रही। यहां भी कुछ विषय विमर्श के लिए तैयार हो गये। खैर... यह यात्रा सुखद रही। इस यात्रा के दौरान कई बातें हुईं क्योंकि साथ में थे हमारे पूर्व समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ जी। बातों-बातों में पूरा दिन निकल गया और यादों के भंडार में एक दिन और जुड़ गया। उनको साधुवाद।

Monday, August 23, 2021

अपना फ्रेम और दूसरों की नजर

केवल तिवारी 
हम लोगों में ज्यादा का खुद को देखने का एक 'फिक्स फ्रेम' होता है। इसी के चलते हमारी यह इच्छा भी बलवती होती है कि इसी फ्रेम में लोग हमें देखें। यानी मेरे बात करने का अंदाज सबको पसंद आना चाहिए। मैं खुद की कल्पनाओं में जैसा हूं, वैसा मुझे लोग स्वीकारें और यह सत्य है कि अपने बारे में गहराई से शायद कोई नहीं सोचता। यदि अपने बारे में गहराई से सोचना शुरू कर दे और कमियों को व्यक्ति समझने लग जाये तो शायद मैं महान या 'अहं ब्रह्मास्मि' वाली बात रहेगी ही नहीं। जब यह बात नहीं रहेगी तो आपसी कलह का तो सवाल ही नहीं उठता। अक्सर हम कहते हुए सुनते हैं, 'मैं हिसाब-किताब नहीं लगाता।' लेकिन उनके मित्र जानते हैं कि वह कितना ज्यादा हिसाबी है। इसका दूसरा पहलू यह हुआ कि बहुत ज्यादा हिसाबी होना अच्छी बात नहीं। यानी हर व्यक्ति बिंदास रहना चाहता है, थोड़ा-बहुत हिसाब-किताब में क्यों उलझें। एक और पहलू भी है, शायद वह हिसाब लगाता है, लेकिन संकोचवश प्रकट नहीं करता। और कभी-कभी समाज स्थिति वाले व्यक्ति के सामने खर्च में आगे नहीं बढ़ता या हमेशा ऐसे आगे बढ़ता है कि बाकी लोग समझ लेते हैं, भुगतान तो यही करता है। बात फ्रेम की। अलग-अलग आदत होती है लोगों की। आदत बोलने के अंदाज की। आदत खाने की। आदत हंसने की। आदत रोने की... वगैरह-वगैरह। आदतों में दो बातें शामिल होती है-एक, आपके जीन में ऐसे गुण हैं। ये गुण आपकी सोच की शक्ति को भी प्रभावित करते हैं यानी आप चाहकर भी उन्हें नहीं बदल पाते। दूसरे, ऐसे गुण जो आप समाज, देश और समय को देखकर बदल लेते हैं। मान लीजिए आप बहुत कड़वे अंदाज में बोलते हैं। कई लोग इस अंदाज को खरा बोलना भी कह सकते हैं, लेकिन हो सकता है आपका यह अंदाज सामने वाले को पसंद न हो और यह भी कि आप कहते हों कि मैं परवाह नहीं करता, मैं तो ऐसा ही हूं। यह भाव थोड़ा अजीब किस्म का है। आप हो सकता है व्यंग्यात्मक लहजे में बात करते हों-कभी कभार यह अंदाज अच्छा लगता हो, लेकिन सोचिए आपने कभी सामने वाले से वक्त बेवक्त इसी लहजे में बात की हो तो कैसा लगेगा। यह उसी तरह है कि आप किसी की अंत्येष्टि में गए हैं और अचानक आपके मोबाइल पर कोई पॉप म्यूजिक बज जाये। रिंग टोन के रूप में या किसी अन्य रूप में। यही रिंगटोन अगर किसी पार्टी के माहौल में बजे तो हो सकता है आपसे लोग कहें, वाह माहौल के अनुकूल है ट्यून। यानी हमेशा एक अंदाज भी नहीं चल सकता। बिना फ्रेम के चलेंगे तो शायद प्रसन्न रहने का लंबा अवसर मिलेगा। फ्रेम फ्री होने पर आपको जो विविध विचारधारा या तौर-तरीके वाले लोग राह में मिलेंगे आप उसमें समाहित होते चले जाएंगे क्योंकि आपका कोई फ्रेम नहीं है। फिक्स फ्रेम या एक जैसी आदत के नुकसान भी होते हैं। इसे इस तरह समझ सकते हैं- मान लीजिए दो लोग हैं-ए और बी। ए बहुत चुपचाप रहने वाला। लोगों के तानों को भी हंसकर टाल देने वाला है और अपने काम में बहुत निपुण है। उसकी आदत का हर कोई फायदा उठाता है। उससे नीचे रैंक वाले भी और ऊपर वाले भी। अब दूसरा व्यक्ति है बी, काम उतना नहीं जानता जितना हल्ला करता है। बात-बात पर तुनकमिजाजी दिखाता है। झगड़ने लगता है। ऐसे में जब मिस्टर ए कभी जोर से बोल दे या किसी से काम के लिए इनकार कर दे तो वह सुर्खी बन जाती है। अरे इसे क्या हो गया। लगता है पर लग गये। ऐसे ही कई ताने लोग देने लगेंगे। लेकिन अगर मिस्टर बी ऐसा करेगा तो सभी कहेंगे यह तो ऐसा ही है। या उसे कोई काम सौंपेंगे ही नहीं। ऐसे में मिस्टर ए और मिस्टर बी दोनों के लिए जरूरी है कि वे खुद को फ्लैक्सिबल रखें। अति होने पर अपनी बात को मजबूती से रख सकें। खैर ज्ञान की बातें हैं। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में बहुत चलती हैं। थोड़ा बहुत भी परिवर्तन आ सके या इतना सोचने लग जाएं कि हमारी बात या आदत से सामने वाले को कोई परेशानी तो नहीं होगी तो इतना ही बहुत है। खुद में झांकने से बड़ी बात कोई है ही नहीं। कबीर दास जी तो कई सौ साल पहले ही कह गये- 
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, 
जोो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।

Friday, August 20, 2021

पुलिस, पीएम और हकीकत से सामना

केवल तिवारी
कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के ट्रेनी आईपीएस (IPS) अधिकारियों को संबोधित किया। अन्य बातों के अलावा उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि पुलिस को अपनी छवि सुधारने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) में भी पुलिसकर्मी ही होते हैं। वे लोग जब अपने काम से लौटते हैं तो उनका फूल मालाओं से सम्मान होता है। वे जी-जान लगाकर लोगों को बचाते हैं, लेकिन क्या कारण है कि यही पुलिसकर्मी जब पुलिस में (ट्रैफिक या कानून व्यवस्था) में कार्यरत होते हैं तो इनकी छवि कुछ और होती है। लोगों के मन में विश्वास क्यों नहीं जगता। बात सही है। इस बात को सुनकर मुझे कुछ वाकये याद आ रहे हैं। प्रधानमंत्री के भाषण की विस्तृत विवरण से उन्हें साझा करना चाहता हूं- करीब डेढ़ दशक पुरानी बात होगी। गाजियाबाद के वसुंधरा में तब मैं रहता था। वहां आसपास के इलाकों में चेन स्नैचिंग (chain snatching) यानी झपटमारी की वारदातें बहुत बढ़ गयी थीं। हम खबरें सुनते थे, खबरें बनाते थे और कभी-कबार आसपास हुई वारदात की चर्चा लोगों से सुनते थे। एकबार एक जानकार के साथ ऐसा हो गया। हम लोग थाने पहुंचे। पुलिस पहले तो फरियादी को ही डांटने लगी कि क्यों सोना पहनकर चलते हो, जानते हो इतनी वारदातें हो रही हैं। फिर जब एफआईआर दर्ज कराने की हम लोगों ने कोशिश की तो पुलिस अधिकारी तैयार नहीं हुए। काफी बहस-मुबाहिशों के बाद यह तय हुआ कि अभी पीड़ित सिर्फ एक शिकायत दे दे, एक हफ्ते बाद तक अगर कहीं सुराग नहीं लगा तो फिर एफआईआर दर्ज कर लेंगे। शुरू में सोचा पुलिस की मजबूरी होगी। आंकड़े अच्छे दिखाने होते हैं, लेकिन साथ ही यह विचार भी आया कि कोई जाने या न जाने झपटमारों को पता तो होगा ही कि पीड़ित की औकात तो एफआईआर दर्ज कराने की भी नहीं। ऐसा ही मामला एक मित्र के बाइक चोरी होने पर हुआ। पुलिस ने पचास सवाल पीड़ित से ही पूछ लिये। एफआईआर के लिए दस चक्कर लगवाये। आखिरकार एक पहचान निकालकर पुलिस पर प्रेशर डलवाकर एफआईआर करवाई गयी। हाल ही में चंडीगढ़ से दिल्ली जाना हुआ। नियंत्रित गति, ट्रैफिक रूल को मानते हुए मैं जा रहा था। एक जगह दिल्ली में और दूसरी जगह ग्रेटर नोएडा के पास मुझे ट्रैफिक पुलिस वालों ने रोका। दोनों जगह कहा गया कि बस कागज दिखा दो। मैं समझ गया, चंडीगढ़ नंबर की गाड़ी देखकर मुझे रोका गया है। मैं उतरा और विनम्रता से पूछा कि बताइये कौन से कागज देखने हैं। दिल्ली में तो पता नहीं क्या हुआ। साथ खड़े दूसरे ट्रैफिक पुलकसकर्मी ने इशारा करते हुए कहा, जाओ। फिर ग्रेटर नोएडा। यहां पुलिस वाले ने पहले कागज मांगे फिर कहा मैं खुद ही चेक कर लेता हूं। उन्होंने गाड़ी का नंबर अपने मोबाइल में किसी एप पर डाला और पूछा कि केवल तिवारी के नाम है गाड़ी। मैंने कहा जी मैं ही हूं केवल तिवारी। कुछ देर रुकने के बाद वह सज्जन बोले जी इसमें दिखा रहा है कि पॉल्यूशन (Pollution under control certificate) सर्टिफिकेट नहीं है। मैंने कहा, सरजी गौर से देखिये, ये सीएजनी गाड़ी है और अभी सालभर भी नहीं हुआ है। ऐसी गाड़ियों में पीयूसी सालभर बाद ही बनता है। उन्होंने मेरी ओर देखा और बिना कुछ कहे दूसरी तरफ को चल दिये। मैं भी कुछ बड़बड़ाता हुआ आ गया। कुछ दिन पहले बेटे को उसके परीक्षा केंद्र छोड़ने जा रहा था। वह बगल में बैठा था और बातें चल रही थीं। बातों बातों में मेरा मास्क नाक से थोड़ा नीचे आ गया। कालोनी नंबर चार के पास एक पुलिस कर्मी दौड़कर आया और मुझे रुकने का इशारा किया। मैंने अपनी बेल्ट और बेटे की बेल्ट पर ध्यान दिया, सब ठीक था। मैंने गाड़ी साइड की और रोककर शीशा खोला। मैंने कहा जी बताइये। उनका सवाल ये मास्क कैसे पहना है। मैंने क्षमा मांगते हुए कहा, थोड़ा नीचे हो गया। उन्हें मुझ पर तरस आ गया या जो भी कारण हो, चेतावन देकर छोड़ दिया। बेटे ने सवाल किया, पापा आसपास तो इतने लोग बिना मास्क के घूम रहे हैं, उन्हें तो ये कुछ नहीं कह रहे। मैंने कहा, बेटे ये सवाल मेरे मन में भी था, लेकिन वह कह सकते थे कि हमारी ड्यूटी गाड़ियों में बैठे लोगों को देखने की है। खैर थोड़ा सा मुस्कुराकर हम चल दिये। सहयोग भी किया है पुलिस से परेशान होने के कई किस्से हैं, लेकिन सहयोग के भी किस्से हैं। अनेक बार ऐसा हुआ है जब पुलिस ने खूब सहयोग किया है। हिंदुस्तान अखबार में जब काम करता था तो रात को लौटते समय कई बार सड़कों पर दुर्घटनाएं देखीं। उस दौरान पुलिस को फोन किया, पुलिस कर्मियों ने कई बार साथ दिया और चोटिल को अस्पताल पहुंचाने में मदद की। ऐसे ही कई बार रास्ता बताने में भी मदद की है। पानी में भीगते पुलिसकर्मी को ट्रैफिक नियंत्रित करते देखा है। ऐसे पुलिसकर्मी सम्मानित भी हुए हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में पुलिस का असहयोगात्मक रवैया दुखी करता है। अब बात पीएम के भाषण की उस दिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पीएम मोदी ने ट्रेनी अधिकारियों से कहा कि आप जैसे युवाओं पर बड़ी जिम्मेदारी है। महिला अफसरों की भूमिका भी अहम है। प्रधानमंत्री ने कहा कि अफसरों की पढ़ाई देश सेवा में काम आती है। उन्होंने कहा कि आपको हमेशा ये याद रखना है कि आप एक भारत, श्रेष्ठ भारत के भी ध्वजवाहक हैं, इसलिए आपकी हर गतिविधि में राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम की भावना झलकनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आपकी सेवाएं देश के अलग-अलग जिलों और शहरों में होगी। आपको एक मंत्र हमेशा याद रखना होगा कि फील्ड में रहते हुए आप जो भी फैसले लें, उसमें देशहित और राष्ट्रीय परिपेक्ष्य होना चाहिए। इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय भी मौजूद थे। मोदी ने कहा कि नए संकल्प के इरादे से आगे बढ़ना है। अपराध से निपटने के लिए नया प्रयोग जरूरी है। पीएम मोदी ने सत्याग्रह आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि गांधीजी ने सत्याग्रह के दम पर अंग्रोजों की नींव हिलाई थी। इसके अलावा भी पीएम साहब ने बहुत बातें कीं, वे सभी ने सुनी होंगी।

Monday, August 9, 2021

हमारे ओलंपिक सितारे

साभार : दैनिक ट्रिब्यून www.dainiktribuneonline.com हमारे ओलंपिक सितारे कोरोना महामारी के चलते एक साल बाद हुए ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि मुश्किल हालात भी उन्हें डिगा नहीं सकते। टोक्यो में खेलों के इस महाकुंभ के दौरान तिरंगा शान से लहराया। जीत की नयी इबारत लिखी गयी जो भविष्य के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी। ओलंपिक 2020 के इन महानायकों का लंबा सफर कई पड़ावों और विभिन्न तरह के अनुभवों से गुज़रा है। देश का नाम रोशन करने वाले इन बड़े खिलाड़ियों से परिचय करा रहे हैं केवल तिवारी नीरज चोपड़ा वज़न कम करने की जद्दोजहद में थाम लिया भाला किसान के बेटे हैं। संयुक्त परिवार है। हरियाणा के पानीपत स्थित खांद्रा गांव के मूल निवासी हैं। खेलों में मिली उपलब्धि के बाद राजपूताना राइफल्स में सूबेदार बने। टोक्यो ओलंपिक के इस गोल्डन बॉय नीरज चोपड़ा को आज पूरा देश सलाम कर रहा है। नीरज बचपन में बहुत मोटे थे। वज़न कम कराने के लिए परिवार के लोगों ने कई जतन किए। उन्हें खूब दौड़ाया जाता था। उनके चाचा भीम चोपड़ा उन्हें गांव से काफी दूर शिवाजी स्टेडियम लेकर गये। दौड़ने-भागने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रखने वाले नीरज को स्टेडियम में भाला फेंक का अभ्यास करते हुए खिलाड़ी दिखे तो बस उसी खेल में आगे बढ़ने की ठान ली। परिवार ने साथ दिया और आज नीरज ने इतिहास रच दिया। वह देश के लिए व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाले पहले ट्रैक एंड फील्ड एथलीट हैं। नीरज ने अपने दूसरे प्रयास में 87.58 मीटर की दूरी के साथ पहला स्थान हासिल कर गोल्ड अपने नाम किया। वह 2016 जूनियर विश्व चैंपियनशिप में 86.48 मीटर के अंडर -20 विश्व रिकॉर्ड के साथ ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतने के बाद से लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। वर्ष 2018 राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 2017 एशियाई चैंपियनशिप में शीर्ष स्थान हासिल किया था। बेटे की उपलब्धि पर पिता सतीश चोपड़ा कहते हैं, ‘खुशियों को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। हम चार भाई हैं। नीरज भाग्यशाली रहा कि उसे पूरे परिवार का समर्थन मिला।’ मां सरोज कहती हैं, ‘नीरज सभी की उम्मीदों पर खरा उतरा और भारत का गौरव बढ़ाया।’ चाचा भीम चोपड़ा कहते हैं, ‘खिलाड़ी की कड़ी मेहनत और मजबूत दृढ़ संकल्प के साथ परिवार का समर्थन और अच्छे संस्कार भी महत्वपूर्ण होते हैं। नीरज के पास ये सब हैं और वह सफल हुआ।’ मीराबाई चानू सपने तीरंदाजी के और बन गयीं वेट लिफ्टर मणिपुर की रहने वाली मीराबाई छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं और कद की भी छोटी हैं। इम्फाल से करीब 20 किलोमीटर दूर उनका गांव नोंगपोक काकजिंग है। पहाड़ी इलाकों के जीवन की तरह इनका बचपन भी कठिन परिस्थितियों वाला रहा। चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी काटना और भोजन बनाने एवं पीने के लिए दूर-दराज से पानी भरकर लाना ही इनकी दिनचर्या थी। हां दिली रुझान खेलों के प्रति था। वह तीरंदाज बनना चाहती थी, लेकिन वेट लिफ्टर कुंजरानी के बारे में सुना तो इसी में आगे बढ़ने की ठान ली। मेहनत रंग लाई और रविवार 8 अगस्त को अपना जन्मदिन एक शानदार जश्न के साथ मनाया। हालांकि यह सफर इतना आसान नहीं था। स्पोर्ट्स अकादमी घर से बहुत दूर थी। ट्रक में लिफ्ट लेकर वह जातीं, खूब पसीना बहातीं और वापस आकर घर के काम भी निपटातीं। तभी तो जब वह टोक्यो से लौटीं तो ट्रक ड्राइवर के लिए विशेष भोज का इंतजाम किया। बचपन से ही कड़ी मेहनत करने वाली चानू का जोश और जज्बा आखिरकार रंग लाया। टोक्यो ओलंपिक में पहले ही दिन पदक तालिका में भारत का नाम अंकित करा दिया था। उन्होंने 49 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीतकर भारोत्तोलन में पदक के 21 साल के सूखे को खत्म किया। इस 26 साल की खिलाड़ी ने कुल 202 किलो भार उठाया। वह ओलंपिक मेडल जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला भारोत्तोल्लक हैं। मीराबाई चानू के बारे में प्रसिद्ध है कि वह अपने बैग में हमेशा देश की मिट्टी रखती हैं। पीवी सिंधु 8 साल की उम्र से ही खेलने लगीं बैडमिंटन महज 8 साल की उम्र में बैडमिंटन थाम लिया था। शौकिया खेल की तरह नहीं, जूनून के साथ। जुनून तो होना ही था। आखिर परिवार में माहौल ही खेल और खिलाड़ी का था। स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु के पिता पीवी रमन्ना और मां पी विजया राष्ट्रीय स्तर पर वॉलीबॉल खेल चुके हैं। मां तो अर्जुन अवार्डी हैं। बैडमिंटन पर अपना अलग स्टाइल बना चुकीं पीवी सिंधु का जोश और जज्बा ही था कि ओलंपिक में इनके जाने पर ही पदक की उम्मीद बंध चुकी थी और हुआ भी वैसा ही। इस 26 साल की खिलाड़ी ने इससे पहले 2016 रियो ओलंपिक में रजत पदक जीता था। वह ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली देश की पहली महिला और कुल दूसरी खिलाड़ी हैं। हैदराबाद की इस खिलाड़ी ने 2014 में विश्व चैंपियनशिप, एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी। पूरी दुनिया में स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी के तौर पर ख्याति पा चुकीं पीवी सिंधु को अब तक कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। बचपन से ही बैडमिंटन खेल रहीं सिंधु ने तब और दृढ़ संकल्प ले लिया जब 2001 में पुलेला गोपीचंद ऑल इंग्लैंड चैम्पियनशिप का खिताब जीते। सिंधु ने अपनी पहली ट्रेनिंग सिकंदराबाद में महबूब खान की देखरेख में शुरू की थी। इसके बाद सिंधु गोपीचंद की अकादमी से जुड़कर बैडमिंटन के गुर सीखने लगीं। कई अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में देश का नाम रोशन कर चुकीं सिंधु प्रसन्न रहकर अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहने को ही सफलता की सही डगर मानती हैं। रवि दहिया पिता की मेहनत पर जड़ दी चांदी हरियाणा का एक और कामयाब छोरा। सोनीपत का गांव नाहरी, मूल निवास। किसान परिवार। पिता राकेश कुमार ने रवि कुमार दहिया को 12 साल की उम्र में ही दिल्ली स्थित छत्रसाल स्टेडियम भेज दिया। बेशक आर्थिक तंगी थी, लेकिन पिता ने रवि पर पूरी ताकत झोंक दी और खुद रोज 60 किलोमीटर की दूरी तय कर बेटे के लिए दूध, मक्खन आदि लेकर जाते। इधर, पिता बेटे को कामयाब देखना चाहते थे और उधर, बेटा भी जी-जान से लगा हुआ था पिता के सपनों को साकार करने में। इरादे पक्के हों तो फिर जीत से कौन रोक सकता है। यही हुआ। रवि कुमार दहिया ने पिता के उस निर्णय को सही साबित कर दिखाया जो उन्होंने बचपन में ही ले लिया था। यानी स्टेडियम भेजकर बच्चे को भविष्य का सफल खिलाड़ी बनाने का फैसला। पिता की मेहनत और रवि की कसरत काम आई और टोक्यो ओलंपिक में रवि ने पुरुषों के 57 किग्रा फ्रीस्टाइल कुश्ती में रजत पदक जीत कर अपनी ताकत और तकनीक का लोहा मनवाया। रवि कुमार दहिया ने वर्ष 2019 विश्व चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीतकर ओलंपिक का टिकट पक्का किया और फिर 2020 में दिल्ली में एशियाई चैम्पियनशिप जीती और अलमाटी में इस साल खिताब का बचाव किया। रवि ने 1982 के एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने वाले सतपाल सिंह से ट्रेनिंग ली है। रवि ने वर्ष 2015 जूनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैम्पियनशिप में 55 किलोग्राम कैटेगरी में रजत पदक जीता। वह सेमीफाइनल में चोटिल हो गये थे। उन्हें ठीक होने में करीब एक साल लग गया। फिर 2018 वर्ल्ड अंडर 23 रेसलिंग चैम्पियनशिप में 57 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीता। यही नहीं कोरोना महामारी से पहले उन्होंने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था। बजरंग पूनिया घुटने की चोट को भुलाया हरियाणा के झज्जर का पहलवान। पहलवानी विरासत में मिली। शादी में आठ फेरे लिए। एक फेरा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नाम। ये बजरंग हैं। बजरंग पूनिया। घुटने में चोट के बावजूद पूरी मुस्तैदी से मुकाबला किया। कांस्य पदक मिला। देश को इस पदक पर गर्व, लेकिन खुद संतुष्ट नहीं। बजरंग पूनिया का टोक्यो का सफर बहुत कठिन रहा। उन्हें स्वर्ण पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। बजरंग का कहना है कि वह कुछ दिन आराम करने के बाद एक बार फिर पूरे जोश के साथ भविष्य की प्रतियोगिताओं की तैयारी में खुद को झोंक देंगे। जुनूनी बजरंग ने महज सात साल की उम्र में कुश्ती शुरू कर दी थी। कभी-कभी तो आधी रात को ही उठकर प्रैक्टिस करने लगते। बजरंग का जुनून ही था कि 2008 में अपने से कई किलोग्राम ज्यादा वजनी पहलवान से भिड़ गये और उसे चित्त कर दिया। बचपन से ही बजरंग के पिता जहां उन्हें कुश्ती के दांव सिखाते वहीं आर्थिक तंगी आड़े न आए, इस सोच के साथ काम करते। वह बस का किराया बचाकर साइकिल से अपने काम पर जाते थे। साल 2015 में बजरंग का परिवार सोनीपत में शिफ्ट हो गया, ताकि वह भारतीय खेल प्राधिकरण के सेंटर में ट्रेनिंग कर सकें। असल में बजरंग अभ्यास के लिए रूस गए, जहां एक स्थानीय टूर्नामेंट में उनका घुटना चोटिल हो गया। मीडिया कर्मियों से बातचीत में बजरंग ने कहा, ‘मेरे कोच और फिजियो चाहते थे कि मैं कांस्य मुकाबले में घुटने पर पट्टी बांधकर उतरूं, लेकिन मैं सहज महसूस नहीं कर रहा था। मैंने उनसे कहा कि अगर चोट गंभीर हो जाए तो भी मैं बाद में आराम कर सकता हूं लेकिन अगर मैं अब पदक नहीं जीत पाया तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। इसलिए मैं बिना पट्टी के ही मैट पर उतरा था।’ बजरंग पूनिया ने अब तक कई खिताब जीते हैं। लवलीना बारगोहेन पहले कोरोना को हराया, फिर विश्व चैंपियन को पिता टिकेन बारगोहेन का अपना व्यवसाय। माता मामोनी बारगोहेन हाउस वाइफ। बच्ची ने बचपन में ही अपने इरादे स्पष्ट कर दिए। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। मां ने पूरा सपोर्ट किया। पिता ने पैसे की तंगी नहीं आने दी और इस जुनूनी लड़की लवलीना बोरगोहेन ने 23 साल की उम्र में अपने करिअर के पहले ही ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह विजेन्दर सिंह और मैरी कॉम के बाद मुक्केबाजी में पदक जीतने वाली तीसरी भारतीय खिलाड़ी हैं। असम के गोलाघाट जिले के बरो मुखिया गांव की लवलीना पहले ‘किक-बॉक्सर’ बनना चाहती थीं। लवलीना और उनकी दो बहनों ने पिता के लिए चाय बागान के व्यवसाय को आगे बढ़ाने में भी बहुत सपोर्ट किया। धीरे-धीरे पिता का व्यवसाय अच्छा जम गया और लवलीना के सपनों को पंख लगने लगे। उन्होंने अपने इरादे जाहिर किए और लग गयीं पूरी धुन से। टोक्यो ओलंपिक की तैयारी के लिए उन्हें यूरोप जाना था। कुल 52 दिनों का टूर था। लेकिन ऐन मौके पर कोरोना वायरस से संक्रमित हो गयीं। उन्होंने कोरोनो को मात दी और ऐसी शानदार वापसी की कि 69 किलोग्राम वर्ग में चीनी ताइपे की पूर्व विश्व चैम्पियन निएन-शिन चेन को मात दे दी। असम की इस लड़की के जीवन में भले ही आर्थिक तंगी कभी रोड़ा न बनी हो, लेकिन सामाजिक ताने-बाने से इन्हें कई बार दो-चार होना पड़ा। समाज में कई लोग लड़कियों को आगे बढ़ते नहीं देख सकते थे। लेकिन लवलीना को घरवालों का सपोर्ट मिला तो उन्होंने अपनी ट्रेनिंग शुरू कर दी। मैरीकॉम को अपना आदर्श मानने वाली लवलीना ने आखिरकार खूब मेहनत की और उन्हें आगे बढ़ने का मौका मिलता रहा। शुरुआत छोटी-मोटी प्रतियोगिताओं से हुई और देखते-देखते ओलंपिक तक का पदकीय सफर शानदार रहा। हॉकी हर खिलाड़ी की अपनी खासियत 41 वर्षों का सूखा खत्म किया। बेशक कांस्य ही लपक पाए, लेकिन जो जोश और जज्बा इस टीम ने दिखाया उससे हॉकी का स्वर्णिम भविष्य लिखा जाएगा। यह हॉकी की टीम इंडिया का ही तो कमाल था कि महामारी की उदासी के दौरान टीम का जज्बा सामने आया और हर खेल प्रेमी ने जश्न मनाया। जी हां, यह भारत की हॉकी टीम है। बहुत लंबे अंतराल के बाद हॉकी में भारत को पदक मिला। टीम के प्रत्येक सदस्य को कई राज्य सरकारों एवं संस्थाओं ने सम्मानित करने का फैसला किया है। यूं तो हर भारतीय ने दिल से टीम इंडिया का सम्मान किया है। इस टीम ने ग्रुप चरण के दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 1-7 से बुरी तरह हारने के बाद मनप्रीत सिंह की अगुवाई में शानदार वापसी की। एक बारगी थोड़ा नर्वस हो चुकी टीम ने फिर से हिम्मत बांधी और आगे बढ़ी। पहले सेमीफाइनल में बेल्जियम से हारने के बाद टीम ने कांस्य पदक प्ले ऑफ में जर्मनी को 5-4 से मात दी। यह मात बेहद ऐतिहासिक रही। टोक्यो ओलंपिक में हॉकी की टीम इंडिया ने अपना बेस्ट परफारमेंस दिया। पूरे टूर्नामेंट के दौरान मनप्रीत की प्रेरणादायक कप्तानी के साथ गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने शानदार प्रदर्शन किया। कप्तान ने जहां बेहतरीन रणनीति बनायी वहीं श्रीजेश ने विरोधी टीम की ओर से दागे जा रहे कई महत्वपूर्ण गोल को पहले ही रोककर जीत का रास्ता सुगम किया। इस जीत के साथ ही हॉकी टीम ने पूरे देश में जश्न का माहौल बना दिया। आइये संक्षेप में जानते हैं हॉकी टीम के बारे में- टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह 19 साल की उम्र में ही टीम इंडिया में आ गए थे। वह विरोधी टीम की डिफेंस में सेंध लगाने के लिए जाने जाते हैं। इसी तरह पीआर श्रीजेश गोलकीपर हैं और टीम के सबसे वरिष्ठ खिलाड़ी। उन्होंने पूरे मुकाबले में कई गोल रोके। हरमनप्रीत सिंह रियो ओलंपिक में भी टीम इंडिया के हिस्सा थे। उन्हें पेनाल्टी कॉर्नर एक्सपर्ट माना जाता है। रुपिंदर पाल सिंह की लंबी हाइट का टीम को लाभ मिलता है। हरियाणा के सुरेंद्र कुमार को टीम डिफेंस की रीढ़ माना जाता है। अमित रोहिदास लंबे वक्त तक टीम इंडिया से बाहर रहे, अब शानदार वापसी हुई और जोरदार तरीके से खेल रहे हैं। बिरेंदर लाकरा का यह दूसरा ओलंपिक है। ओडिशा के हैं और हॉकी के ऑल राउंडर माने जाते हैं। हार्दिक सिंह ने इस बार खास पहचान बना ली। प्री-क्वार्टरफाइनल में किया गया हार्दिक का गोल बहुत महत्वपूर्ण था। विवेक सिंह प्रसाद का सबसे कम उम्र में टीम में आने वाले खिलाड़ियों में नाम है। टोक्यो में उन्होंने फॉरवर्ड लाइन का जिम्मा संभाला और टीम का बखूबी साथ दिया। मणिपुर के नीलकांत शर्मा, हरियाणा के सुमित वाल्मीकि, पंजाब के शमशेर सिंह और पंजाब के ही दिलप्रीत सिंह के अलावा गुरजंट सिंह और मनदीप सिंह भी हॉकी टीम इंडिया के अहम खिलाड़ियों में से हैं।