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Tuesday, December 30, 2025

बगिया को बुहारो तुम....

केवल तिवारी 

आंगन में खिले ये फूल 

इनको तनिक निहारो तुम

बगिया को बुहारो तुम

घर का उपवन तुमने संवारा

अपनी खुशियों को भी वारा

छोटी सी बात न पकड़े तूल

क्यों सोचना हमने ऊल-जुलूल

छोटी सोच को करो संपादन तुम

जीवन का करो रसास्वादन तुम

परिवार को गेंदा फूल बनाया

हम सबको भी खूब समझाया

अपने लिए अब जीयो भरपूर

हर्षोल्लास का भी चमके नूर

समझो हमारी भावना को तुम

केवल, कार्तिक और धवल हो तुम

आंगन में खिले ये फूल 

इनको तनिक निहारो तुम

बगिया को बुहारो तुम....

Wednesday, December 17, 2025

अब उम्दा भी चले गए... उस जहां में भी आनंदित रहना उमेश

केवल तिवारी

एक माह के भीतर ही फिर एक मनहूस खबर आई कि खिलगजार उमेश दा इस जहां को छोड़कर चले गए। मैं भी उमेश दा कहता था। बल्कि उम्दा कहता था। इसमें मुझे अच्छा भी लगता था। उम्दा मतलब बेहतरीन। यह अलग बात है कि रिश्ते में वह मेरे भतीजे लगते थे। उनका अभिवादन का तरीका होता था, 'चाचसैप नमस्कार।' मुझे याद है वह जब पहली बार गांव में प्रधान चुने गए थे तो इत्तेफाक से मैं भी उन दिनों लखनऊ से गांव गया था। उनका चुनाव चिन्ह संभवत: कुर्सी था। उन दिनों शायद एक ही ग्रामसभा थी हमारे गांव में। अब तो दो गयी हैं। सरना और मलोटा। हो सकता है इन बातों में कुछ तथ्यात्मक गलतियां हों क्योंकि बेशक हमारे रिश्ते चाचा-भतीजा वाले हों, लेकिन वह मुझसे लगभग 15 साल बड़े थे। करीब पांच साल पहले जब भतीजा प्रिय विपिन कोविड की लहर में काल कलवित हुआ तो उम्दा का फोन आया था, सांत्वना जताने। क्योंकि उम्दा से चाहे जितना पुराना संबंध हो, विपिन के साथ गांव आने-जाने के क्रम में यह मित्रता बढ़ गयी थी। हम खिलगजार उनके घर जरूर जाते थे। वैसे भाभी जी (उम्दा की माता जी) और दाज्यू (उम्दा के पिताजी) से हमारे स्नेहिल संबंध रहे। उनके घर में होने वाली कथा और अन्य पूजन कार्यक्रमों की मुझे बहुत याद है। उनका आदेश देना और अन्य बातों पर बातों को साझा करना अच्छा लगता। खैर इस वक्त बात उम्दा की। प्रधानी के समय के अलावा मुझे उम्दा की दूसरी बात याद है जब वह डाबर घट्टी में 'सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान' के प्रोपराइटर थे। हम कहीं से भी आते तो वह दुकान हमारा अड्डा होती। ज्यादा सामान हुआ तो उनके दुकान पर रख दिया और घर को चल दिए। मैं तो उन दिनों चाय नहीं पीता था, लेकिन अगर मेरे साथ कोई होता तो वह जरूर वहां चाय पीता। उम्दा की कई बातें जेहन में उमड़-घुमड़ रही हैं। इसी क्रम में उनकी एक कमी का भी जिक्र करना जरूरी है। वह बहुत जल्दबाज सरीखे थे। मानो संदेश दे रहे हों कि भागते रहे, भागना ही जिंदगी है। कभी मेरा मन करता कि उनसे कहूं कि भागना, नहीं चलना ही जिंदगी है, लेकिन चूंकि उम्र में बड़े थे, इसलिए कहते हुए संकोच होता।

बिना माइक राम की लीला का मंचन 

बचपन की उन स्मृतियों में भी उमदा हैं जब रामलीला मंचन में माइक नहीं होते थे। गैस लाइट का इंतजाम होता था। कलाकार की आवाज बुलंद होती थी। उमदा भी राम की भूमिका में आते और बुलंद आवाज होती। सब यादें हैं।

उम्दा संबंधी बातों का जिक्र होते-होते एक प्रकरण याद आ रहा है। करीब दो साल पहले हल्द्वानी में मैं और मेरी पत्नी पीली कोठी के लिए ऑटो में बैठे। उसी वक्त एक सुंदर युवक भी हमारे साथ बैठा। मैं और पत्नी कुछ बोल ही रहे थे कि उसने कहा कि आप लखनऊ वाले हो। मैंने कहा हां। वह बोला, मैं खिलगजार उमेश जी... अच्छा...अच्छा। मैंने समझा कि उनका कोई रिश्तेदार है। मैंने कहा, आपका नाम। वह बोला, विनोद तिवारी। भाजपा के किसी सम्मेलन की तैयारी में जुटा हूं। हमने नंबरों का आदान-प्रदान किया। उसके बाद विनोद कुछ प्रेस रिलीज और जानकारियों को भेजने लगा। अब जब पिछले दिनों उम्दा के निधन की खबर आई तो मैंने दिल्ली में अपने भतीजे प्रकाश से कहा कि उम्दा के बच्चों का नंबर दो। दो बोल सांत्वना के बोल दूंगा। उसने नंबर भेजा और कहा कि यह उनके बेटे का नंबर है। मैंने जैसे ही क्लिक किया, वह नंबर पहले से सेव था। तब पता चला कि जिसे मैंने भाजपा नेता के नाम पर सेव किया था, वह तो विनोद है, उम्दा का बेटा। असल में उम्दा के भाइयों हरीशदा, दीपदा या चचेरे भाइयों मदन, कृपाल एवं नवीन से तो बात होती रहती थी, लेकिन बच्चों से ज्यादा बातचीत का सिलसिला नहीं चल पाया। विनोद और पूरे परिवार को दिल से सांत्वना। दुख की इस घड़ी में मैं परिवार के साथ हूं। उम्दा अब तो आप चले ही गए हो, उस जहां में खुश रहना...।

Sunday, December 14, 2025

स्वाति चली ससुराल, कार्यक्रम में सब हुए निहाल

 केवल तिवारी 

परिवार मिलन का शुभ संदेशा आया, पांडेय जी ने सबको बुलाया। 

जाग्रत हो गयी खुशियों की 'चेतना', अब तो मनीष को है सबको देखना।

भाइयों ने शुरू की पुलकित तैयारी, बहनें गुफ्तगू करें बारी-बारी।

समधी-समधन, मौसी और बुआ, हर परिजन ने मांगी दुआ।

सदा खुश रहे स्वाति हमारी, मां-बाप की लाडली, दादी की दुलारी। 

विवाह समारोह की अब लिखता हूं पूरी बात, चलो करता हूं शुरुआत


एक अम्मा (दादी) हैं। अम्मा की एक पोती है। पोती की शादी है। उसका नाम स्वाति है। स्वाति का एक भैया है। दूर एक जगह ट्रेनिंग में व्यस्त होने से वह अनुपस्थित है। पारिवारिक भाइयों ने समा बांधा है। खुशनुमा माहौल में भावनाओं का उमड़-घुमड़ है। परिचय का दौर चलता है। हंसते-गाते कार्यक्रम संपन्न होते हैं। यह विशेष ब्लॉग हल्द्वानी में सुरेश पांडे जी (मेरे साढू भाई) की बेटी स्वाति के विवाह समारोह को लेकर है। जाहिर है साढू भाई हैं तो इनसे मुलाकात शादी के बाद होनी थी, यानी 24 सालों की मुलाकात। उसके बाद से इनको जितना समझ पाया हूं, वह यही कि पांडेय जी इंसान हैं। निश्छल। 'निंदा रस' में कोई रुचि नहीं। टू द पाइंट बात करने वाले। भविष्य में मेरे लिए 'घर' का इंतजाम करने वाले। हंसमुख और चरित्रवान। उतनी ही अच्छी इनकी पत्नी यानी मेरी पत्नी की दीदी। गुड़िया दीदी, नाम के अनुरूप ही हैं। यह निक नेम है। माता-पिता का दिया हुआ नाम और हम इसी नाम से उन्हें पुकारते हैं। इन्हें देखकर पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि जोड़ियां ऊपर ही बनती हैं। इनकी माता जी। जिन्हें मैं ईजा कहता हूं। संघर्षशील महिला। सबको आशीर्वाद देने वाली महिला। चौथी अवस्था में भी लाज का घूंघट रखने वाली महिला। सबको सम्मान देने वाली महिला। सबको आशीर्वाद देने वाली ईजा। परिवार का बाकी जिक्र इस ब्लॉग में आ ही जाएगा। 

पांडे जी से जब फोन पर बात हुई तो हमने कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया। चूंकि मैं और राजू (यह निक नेम है, असली नाम भास्कर, मेरी पत्नी भावना का जुड़वां भाई) चंडीगढ़ में ही रहते हैं, इसलिए दोनों परिवारों का कार्यक्रम साथ-साथ बना। राजू से भी रिश्ते से इतर दोस्ती है। एक-दूसरे से बिना 'मोल-भाव' के बातें शेयर करने वाली दोस्ती। राजू का बेटा भव्य और मेरा छोटा बेटा धवल अपनी बालसुलभ मस्ती के बीच तैयारी में जुट गए। अपनी-अपनी मम्मियों से कई बातें करने लगे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक का मन भी खूब था कार्यक्रम में पहुंचने का, लेकिन बेंगलौर में नयी-नयी नौकरी के चक्कर में छुट्टी का संकट था। दूरी भी एक प्रमुख कारण था, उसके न पहुंचने का। लेकिन वीडियो कॉल से हम उसे हर रस्म को दिखाते रहे। खैर... हम लोग बुधवार 10 दिसंबर को चल पड़े। ट्रेन अम्बाला से थी। सुबह दस बजे ट्रेन में बैठे। रास्ते भर अंताक्षरी खेलते हुए, कुछ बातें करते हुए हम लोग कब शाम करीब सात बजे पांडेजी के घर पहुंच गए पता ही नहीं चला। असल में बड़ी राहत मिली जब शेखर दा (स्वाति के दूसरे मामा, इस ब्लॉग में अब सारे रिश्ते इसी तरह से चलने चाहिए) कार लेकर लालकुआं आ गए। मैं और राजू बाद में कैब से चले गए, बाकी परिवार आराम से पहले पहुंच गया। हम दोनों को एक जगह सिद्धांत जोशी उर्फ सिद्धू (शेखर दा का बेटा) लेने आ गया। उस शाम कोई खास कार्यक्रम नहीं था, लेकिन हंसी-मजाक कुछ देर चली। अगले दिन हल्दी और मेहंदी का कार्यक्रम था। उस कार्यक्रम से पहले मैं और राजू एक चक्कर काठगोदाम (मेरा ससुराल) चले गए। वहां नंदू भाई (स्वाति के सबसे बड़े मामा) से मुलाकात हुई। उनके नये घर और शेखर दा के under constructio घर को देखा। सिद्धू भाई का डिजाइन बहुत पसंद आया। ऐसे मौके पर जो हंसी-मजाक होती है, वह भी हुआ और गंभीर discussion भी। खैर... स्वाति की हल्दी रस्म पर सुबह से ही चहल-पहल थी। इस चहल-पहल के बीच ज्योति (स्वाति की बड़ी दीदी) और उमाजी (स्वाति की बुआ) विशेष तौर पर व्यस्त नजर आ रही थीं। स्वाति की मम्मी की तो बात ही अलग थी। काम करते-करते वह कब चाय बनाकर ले आईं, पता ही नहीं चला। काम और तैयारी के बीच सामंजस्य बिठाना कोई उनसे सीखे। इसी तरह ज्योति भी। ज्योति के पति कपिल जी, उसके ससुरजी, सासू मां, ननद और उनके पति भी कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनसे परिचय हुआ। बिटिया के ससुर जी से कई बातें हुईं। ज्योति अपनी तैयारी के साथ-साथ अपने दोनों परिवार (ससुराल व माईके के परिजन का पूरा ध्यान रख रही थी)। विशेष अवसरों पर ज्योति का यह टैलेंट मैं उसके बचपन में भी देख चुका हैं। उसे सैल्यूट। खैर... हल्दी की रस्म बहुत शानदार और भव्य तरीके से संपन्न हुई। हल्दी कार्यक्रम के बीच में स्वाति की नजर सामने बैठी अम्मा पर गयी। उधर से अम्मा उठीं और इधर से स्वाति। दोनों गले मिलीं और रोने लग गयीं। आज के बेहद ज्यादा भौतिकवादी युग में यह दृश्य शुभ संकेत था इस बात का कि 'परिवार व्यवस्था अभी जिंदा है।' इस दृश्य पर मेरी और मेरे बगल में खड़े देवी दा (भावना की मामी के बेटे और ज्योति की ननदिया सास के पति के बेटे) की आंखों में भी आंसू आ गए। इसी रस्म के बीच स्वाति के भाई इशान जिसे प्यार से ईशू कहते हैं, से वीडियो कॉल करवाई गयी। वह इन दिनों धर्मशाला में इंटर्नशिप (होटल मैनेजमेंट कोर्स) कर रहा है। वह कार्यक्रम में नहीं आ पाया। इन दो चीजों से आप मेरे इस ब्लॉग के इंट्रो (किसी खबर या लेखन की शुरुआत, दोहा-कविता को छोड़कर, को इंट्रो कहा जाता है)। सभी कार्यक्रमों की कुछ फोटो ब्लॉग के अंत में शेयर करूंगा। हल्दी की रस्म के साथ-साथ दोपहर भोज के बाद तैयारी शुरू हो गयी मेहंदी कार्यक्रम की। इस कार्यक्रम में नाच-गाना हुआ। अनेक जानकारों से परिचय भी होता रहा। भोजन के बाद हम लोग (चंडीगढ़ ग्रुप) शेखरदा के यहां चले गए। मुख्य कार्यक्रम अगले दिन यानी 12 दिसंबर को थे। दिन में महिला संगीत। शाम को शादी। दोनों ही कार्यक्रमों में अनेक लोगों से मिला। कुछ को पहली बार में ही पहचान गया, कुछ से परिचय लेना पड़ा। अनेक लोगों ने कहा, कमजोर हो गये हो, कुछ ने कहा, पहले से ठीक लग रहे हो। मैं मजाक में किसी से कहता, 'क्या थे, क्या हुए और क्या होंगे अभी' लोग हंस पड़ते और किसी से कह देता, 'आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे, मेरे अपने, मेरे होने की निशानी मांगें।' मेरे इस अंदाज पर कोई बोल देता, अब तो यकीन हो गया कि आप, आप ही हो। खैर... महिला संगीत में खुशी और भव्यता के बीच, भावनाओं का उमड़-घुमड़ होता और चंद आंसू भी निकल आते। इस बीच, अल्मोड़ा वाली नानी जी (सिद्धू की नानी), लता दीदी, एक और गुड़िया दीदी, बैणी-वसंत और तिवारी जी, दिसि, निहित एवं अन्य लोगों से भी मुलाकात हुई। बातचीत में स्वास्थ्य, लाइफ स्टाइल भी मुद्दा रहा। एक माता जी से मुलाकात रह गई, जल्द मिलूंगा।

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यादगार रहा नेहा और ज्योति की अपनेपन की भागदौड़, मुनिया की एनर्जी 

इस संपूर्ण कार्यक्रम के दौरान अगर बच्चियों नेहा और ज्योति का जिक्र न किया जाए तो अन्याय होगा। नेहा स्वाति के मामा नंदाबल्लभ यानी नंदू भाई की बिटिया है। टीचर है। ज्योति का जिक्र पहले भी कर चुका हूं, स्वाति की दीदी। उधर, नेहा करीब एक माह से पहले अपनी बुआओं, चाचियों के बारे में सोच रही थी, चर्चा कर रही थी। यानी उनके शृंगार से लेकर गीतों के चयन को लेकर। साथ ही अन्य कार्यक्रमों के बारे में। नेहा नौकरी के साथ-साथ जिस तरह से बाकी काम भी संभाल रही थी, वह काबिले गौर और काबिले तारीफ था। ऐसा अपनापन और शिद्दत से जिम्मेदारी निर्वहन की ऐसी जद्दोजहद प्रेरित करती है। इधर, ज्योति का खाना खाते वक्त भी अपनी जिम्मेदारी निभाने और सबका ध्यान रखने का अंदाज अलग ही लेवल का था। प्राहिल की मम्मी नेहा और घर-परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही नेहा, दोनों को सैल्यूट। इस सबके बीच, हमारी योगाचार्य जिसे उसके शेखर मामा मुनिया कहते हैं और हम सब मुन्नू की एनर्जी देखने लायक थी। रातभर जगने के बाद भी तरोताजा लगी जो घर आते ही गहरी नींद में सो गयी। God bless her.

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etiquette वाले और बेहद आकर्षक मनीष

इस पूरे कार्यक्रम में हीरो का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। मनीष। दूल्हे राजा। फिलवक्त छत्तीसगढ़ में कार्यरत। मेरा पूर्व परिचय नहीं था, लेकिन जब मिला तो लगा ही नहीं कि हम अपरिचित हैं। बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी मनीष को शिष्टाचार का भी पता था। मैं देख रहा था कि दूल्हा-दुल्हन के लिए बने मंच पर बैठे मनीष जैसे ही किसी बड़े व्यक्ति को आते देखते, उठ जाते। कई बार उनसे बैठने के लिए भी कहा गया। बातचीत में भी सौम्यता। अभी ज्याता तारीफ नहीं करूंगा। भविष्य में मिलेंगे, लंबी बातचीत होगी तब बातें और लेखन जारी रहेगा। एक बात तो यहां बनती है कि सभी बाराती और मनीष के परिजन पहली मुलाकात में भा जाने वाले लगे। कुछ से मिल पाया, कुछ से नहीं। ऐसे कार्यक्रमों में ऐसा ही होता है। 

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तीन-तीन लड़कों की तिकड़ी, मचा दी धमाचौकड़ी

इस कार्यक्रम में जो अलग छाए रहे, वे थे तीन लड़के। सिद्धू, धवल और भव्य। इनका जिक्र ऊपर कर चुका हूं। इनके अलावा योग गुरु रोहित, चिन्मय और तन्मय। इन सबके लिए लड़का शब्द कहने पर कोई आपत्ति न करे, क्योंकि इनकी एनर्जी, काम निभाने का अंदाज और डांस आदि में गजब का जोश था। धवल और भव्य को सुपरवाइज कर तो रहे थे सिद्धांत जोशी, लेकिन इन्हें आदेश-निर्देश कोई भी दे रहा था। ये लोग बिना उफ्फ किए तन-मन से जुट जाते। बस विदाई के समय धवल बहुत रो गया और उसके अनेक सवालों ने मुझे भी हैरान कर दिया। उन सवालों का जिक्र फिर कभी। अब इस ब्लॉग के आखिर में यही कहूंगा कि सुरेश पांडे जी की बिटिया की इस शादी में परिवार, समाज और संसार में अपनेपन की भीनी खुशबू महसूस हुई। जय हो।

अब कुछ तस्वीरें 













Wednesday, December 10, 2025

निरंतर मेहनत और लगन से हासिल होती है उत्कृष्टता : नायब सैनी ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड’ में बोले हरियाणा के सीएम- सफल वही होते हैं, जो सपनों को धरातल पर उतारने का साहस रखते हैं

 



साभार : दैनिक ट्रिब्यून

केवल तिवारी/ट्रिन्यू

चंडीगढ़, 7 दिसंबर

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि निरंतर मेहनत और लगन से ही उत्कृष्टता हासिल होती है। उन्होंने कहा कि सफल वही लोग होते हैं, जो सपनों को धरातल पर उतारने का साहस रखते हैं। शनिवार शाम चंडीगढ़ के ‘द ताज’ होटल में आयोजित ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड्स’ में नायब सैनी बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे। उन्होंने कार्यक्रम में सम्मानित होने वाली प्रमुख हस्तियों को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप केवल सफल व्यक्ति नहीं हैं, आप समाज के प्रकाश स्तम्भ हैं, जो अंधेरे में भी रास्ता दिखाते हैं।’ कार्यक्रम में ‘द ट्रिब्यून’ के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी, गुरबचन जगत, परमजीत सिंह पटवालिया, ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ के महाप्रबंधक अमित शर्मा, ‘द ट्रिब्यून’ की एडिटर इन चीफ ज्योति मल्होत्रा, ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के संपादक नरेश कौशल, ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ की संपादक अरविंदर पाल कौर जौहल, अनेक उद्योगपति, समाजसेवी एवं लोक कलाकार मौजूद रहे।

दीप प्रज्वलन से शुरू हुए कार्यक्रम में लोक कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। इससे पहले, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी एवं सम्मानित होने वाले उद्यमियों, समाज सेवियों का स्वागत करते हुए ‘द ट्रिब्यून’ के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी ने ट्रिब्यून के समृद्ध एवं प्रतिष्ठित इतिहास को याद किया। उन्होंने कहा, ‘हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी से हमें बहुत गर्व महसूस हो रहा है। हरियाणा के लोगों के विकास और भलाई के लिए उनकी लीडरशिप और कमिटमेंट को सब मानते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ भविष्य में भी योग्यता को सम्मान देता रहे।’ उन्होंने याद किया कि दूरदर्शी समाजसेवी स्वर्गीय सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने ‘द ट्रिब्यून’ को शुरू किया था। इसका मकसद था- सच्चाई, आज़ादी और ईमानदारी के साथ समाज की सेवा करना। 144 से ज्यादा वर्षाें से ‘द ट्रिब्यून’ ने ‘दैनिक ट्रिब्यून’ और ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ के साथ मिलकर इस मिशन को पूरी लगन से निभाया है। उन्होंने कहा कि ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ आज के मीडिया माहौल में सबसे अलग है। यह गैर व्यावसायिक, नॉन-कॉर्पोरेट है और पूरी तरह से जनसेवा के लिए समर्पित है। पीढ़ियों से जाने-माने ट्रस्टियों के दिशा-निर्देश में यह ट्रस्ट निष्पक्षता, ज़िम्मेदारी और निडर पत्रकारिता के सिद्धांतों पर मजबूती से खड़ा है। यह विरासत सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, यह हमारे रोज के काम में


निरंतर मेहनत और लगन से हासिल होती है उत्कृष्टता : नायब सैनी


अपने संबोधन में मुख्यमंत्री नायब सैनी ने संविधान के शिल्पी भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर नमन करते हुए कहा कि समाज को कुछ देने की जिजीविषा हर सफल व्यक्ति को होती है। उन्होंने कहा कि यह बहुत हर्ष का विषय है कि स्थापना के समय से लेकर हमेशा से ही ‘ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह’ ने अपनी छवि, गरिमा और ऊंचे मानदंडों को बनाए रखा। ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड’ का जिक्र करते हुए सीएम सैनी ने कहा, ‘अचीवर शब्द अपने आप में ऊर्जा, संकल्प, परिश्रम और साहस की कहानी कहता है।’ उन्होंने कहा कि चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, विज्ञान हो, उद्यमिता हो, कला-संस्कृति हो, नवाचार हो, खेल हो, स्वास्थ्य क्षेत्र हो या सामाजिक सेवा, आप सभी की उपलब्धियां नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। ये हमें विश्वास दिलाती हैं कि भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। उन्होंने कहा कि आप जैसे ‘गेम चेंजर्स’ आगे आते हैं तो समाज भी तरक्की करता है। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि, सभी ट्रस्टियों, प्रतिभागियों का एवं मौजूद लोगों का धन्यवाद देते हुए ट्रिब्यून ट्रस्ट के महाप्रबंधक अमित शर्मा ने कहा कि यह कार्यक्रम बहुत सफल और यादगार रहा। दैनिक ट्रिब्यून के संपादक नरेश कौशल का विशेष धन्यवाद देते हुए उन्होंने सभी सहयोगियों को आभार व्यक्त किया।


देश को आगे ले जाने वालों के साथ है हरियाणा

सीएम सैनी ने कहा कि देश और समाज को सशक्त बनाने वालों के साथ हरियाणा सरकार है। सरकार के विभिन्न कदमों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमने हरियाणा सीएसआर एडवाइजरी बोर्ड का गठन किया है। इसका पोर्टल भी बनाया गया है। इस पर सेवा करने वाले लोग, कंपनियां, उद्यमी आदि अपना पंजीकरण करवाते हैं। उन्होंने ‘राज्य शिक्षक पुरस्कार’, ‘हरियाणा विज्ञान रत्न पुरस्कार’, ‘अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन पुरस्कार’, ‘कल्पना चावला हरियाणा सोलर अवार्ड’ एवं ‘सुषमा स्वराज अवार्ड आदि का जिक्र करते हुए कहा कि देश को आगे बढ़ाने में मददगारों के साथ हरियाणा सरकार है। उन्होंने कहा कि अच्छा काम करने वाले श्रमिकों को ‘मुख्यमंत्री श्रम पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाता है। इसी प्रकार, पद्म पुरस्कार विजेताओं को भी ‘हरियाणा गौरव सम्मान’ से विभूषित किया जाता है।


रंगारंग कार्यक्रम ने बांधा समां

अचीवर्स अवार्ड समारोह में रंगारंग कार्यक्रम ने भी समा बांधा। निर्माता निर्देशक हरविंदर मलिक के नेतृत्व में लोक कलाकार महावीर गुड्डू, नम्रता शांडिल्य एवं विधि देसवाल ने अलग-अलग प्रस्तुतियां दीं। विधि देसवाल एवं उनकी टीम ने जब ‘जगत में न कोई परमानेंट, काल सभी को खा जाएगा लेडी हो जेंट...’ गाया तो खचाखच भरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। इसके साथ ही गंगाजी के प्यार में..., ‘यो म्हारा हरियाणा’ आदि प्रस्तुतियों ने सभागार में मौजूद लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। सभी कलाकारों को भी कार्यक्रम में सम्मानित किया गया और बाद में सभी ने सीएम सैनी एवं ट्रस्टी पटवालिया के साथ फोटो खिंचवाई।


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