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Sunday, February 28, 2016

हर सवाल का जवाब-'हम क्या करें'
अराजक तत्वों के हाथों में फंसे हरियाणा का सबसे बुरा असर उन लोगों पर पड़ा, जिन्हें हर हाल में यहां की सड़कों से होकर अपने गंतव्य तक जाना था। मैं इसका भुक्तभोगी हूं, चश्मदीद भी। पारिवारिक कार्यक्रम में लखनऊ गया था। शनिवार शाम चंडीगढ़ वापसी का टिकट था। पता चला 'जाट आंदोलन' के चलते ट्रेन रद्द है। कुछ रिश्तेदारों को फरक्का एक्सप्रेस से दिल्ली आना था। वेटिंग टिकट लेकर उनकी सीट साझा कर दिल्ली आया। तमाम ट्रेनों के लेट होने, रूट बदले जाने के असर इस ट्रेन पर भी पड़ा। पांच घंटे देरी से ट्रेन दिल्ली पहुंची। दिल्ली जंक्शन से सीधे कश्मीरी गेट बस अड्डा आया। पूरा बस अड्डा बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं से अटा पड़ा था। ऐसा नजारा आज तक नहीं देखा। इनमें से किसी को चंडीगढ़, किसी को हरियाणा के विभिन्न इलाकों और कुछ हिमाचल या पंजाब जाना था। परेशान लोग विभिन्न राज्यों के रोडवेज पूछताछ  केंद्र से किसी से भी अपनी समस्या बताते तो जवाब मिलता, 'हम क्या करें।' सवालों की बौछार ज्यादा होने लगी तो पूछताछ काउंटर बंद कर वहां तैनात कर्मचारी 'गायब' हो गये। इधर से उधर भटकते-भटकते दोपहर तीन बज गये। इस बीच चंडीगढ़ आने वाले कई लोग 'साथी' बन गये। हम लोगों ने फैसला किया कि टैक्सी से चलते हैं। एक इनोवा वाले से बात की। उसने पहले तो चार हजार रुपये प्रति व्यक्ति किराया बताया। बहुत देर माथापच्ची के बाद वह आधे दामों पर आ गया। 9 लोगों को बिठाने की शर्त रखी। बैठते ही उसके सहयोगी ने पहले किराया देने को कहा। दो हजार निकालकर तुरंत देने को कोई राजी नहीं हुआ। अंत में बोला-'दो-दो सौ रुपये दे दो-तेल डलवा लूंगा।' इसमें किसी को आपत्ति नहीं हुई। उस इनोवा में बैठकर हम लोग नरेला बार्डर तक पहुंचे ही थे कि पता चला आगे जा ही नहीं सकते। इनोवा वाला वापस ले आया। फिर कश्मीरी गेट बस अड्डे आ गये। दो-दो सौ रुपये प्रति व्यक्ति गये। अब तक शाम हो गयी थी। दिल्ली में जिसके जानकार रहते थे, उन्होंने उनके पास जाने का फैसला किया। कोई बताने वाला नहीं था कि अब क्या होगा। इस बीच बार-बार घरवालों के फोन आते रहे। आलम यह हुआ कि बैट्री भी खत्म। रविवार होने के नाते कश्मीरी गेट बस अड्डे पर सभी ऑफिस बंद हो चुके थे। मैं भी अपने भतीजे के यहां गुलाबी बाग चला गया। सब जगह चर्चा थी कि पानी की किल्लत शुरू हो चुकी है।
देर रात टेलीविजन चैनल पर समाचार सुना कि रूट खुल गये हैं। एक बार मन किया इसी समय बस अड्डे पहुंचूं और चंडीगढ़ के लिये बस देख लूं। एक जानकार को फोन किया तो उन्होंने कहा-'मेरी सलाह है, आज मत चलो। कल निकलना' अगले दिन यानी सोमवार की सुबह पांच बजे बस अड्डे पर पहुंच गया कि शायद सुबह-सुबह रूट खाली हो और बसें चल पड़ें। मेरी उम्मीद बेकार साबित हुई। दोपहर हो गयी। घरवालों से मुझे सख्ती से कहना पड़ा कि अब मेरा हाल लेने तब तक फोन मत करना जब तक मैं खुद फोन कर न बताऊं। बैट्री खत्म होने का डर था। किसी तरह बस अड्डे की तीसरी मंजिल स्थित हरियाणा रोडवेज के दफ्तर पहुंचा। वहां जानकारी लेनी चाही, हर कोई एक ही बात करता-'हम क्या करें।' एक सज्जन बोले-'भाई कोई उम्मीद नहीं है।' उसी वक्त वहां मुरादाबाद से आये राजेन्द्र पहुंचे। उनका भाई बीमार था। उन्हें चंडीगढ़ पीजीआई आना था। तीन दिन हो गये बस अड्डे पर। कोई भी सही जानकारी नहीं दे रहा। वहां हरियाणा रोडवेज की अधिकारी रेणु शर्मा ने हम सबसे कहा-'हमारी तो चंडीगढ़ के लिये हर छह मिनट में सर्विस है। हम परेशानी समझ रहे हैं। लेकिन हम करें क्या।' तभी मैंने रेलवे में कार्यरत अपने एक जानकार को फोन किया। उन्होंने बताया कि यहां से आनंद विहार चले जाओ कोई स्पेशल ट्रेन चार बजे है। एक मित्र के साथ आनंद विहार आया। वहां पता चला स्पेशल ट्रेन चंडीगढ़ से दिल्ली के लिये चली है, यहां से नहीं है। फिर स्टेशन मास्टर से मिले उन्होंने बताया कि गाजियाबाद जाकर हम साढ़े चार बजे वाली 'शालीमार एक्सप्रेस' पकड़कर अंबाला तक जा सकते हैं। किसी तरह लोकल ट्रेन पकड़कर गाजियाबाद गये। वहां पूछताछ काउंटर के पास देवेंद्र सिंह से बातचीत की। उन्होंने कहा, 'जब तक ट्रेन आ नहीं जाती, हम कुछ नहीं कर सकते। आप टिकट लेकर इंतजार करो।' वहां से जनरल टिकट लेकर भागे। तभी शालीमार एक्सप्रेस आ गयी। हम लोग घुस गये रिजर्वेशन वाले डिब्बे में। पूरी गाड़ी फुल थी। एसी कोच में भी लोग घुस गये। इस बीच टीटी साहब आ गये। उनको समस्या बतायी, लेकिन वे बोले-'हम क्या करें। आपको मुआवजा भरना होगा।' कुछ लोग लड़ते-भिड़ते रहे। कुछ मिन्नतें करते रहे। कुछ ने चुपचाप जुर्माना भरा। ट्रेन टॉयलेट के पास मेरे बगल में खड़े यूपी पुलिस के हवलदार वीर सिंह ने कहा कि उन्हें एक केस के सिलसिले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट कल सुबह हाजिर होना है। रात दस बजे किसी तरह अंबाला पहुंच ही गये। यहां पहुंचकर थोड़ी राहत मिली। वहां मिनी बस वाले सौ रुपये प्रति सवारी के हिसाब से यात्रियों को चंडीगढ़ लेकर आये। पूरे सफर में परेशान लोग गुस्से में अपनी बात भी करते और यह सवाल भी करते आखिर सही जवाब देगा कौन। जिससे पूछो वह यही कहता है, 'हम क्या करें।'

Sunday, April 6, 2014

फ्लैट बिरादर

फ्लैट कल्चर वाले शहरी जीवन, खासतौर पर मेट‏्रो शहरों और उसके आसपास के इलाकों के बारे में आमतौर पर कहा जाता है कि यहां एक नया संसार बस जाता है, जिसमें मतलब ज्यादा झलकता है। नफा-नुकसान का गणित आंककर दोस्ती बनायी और बिगाड़ी जाती है। इसके घर ज्यादा आना-जाना शुरू करो, शायद काम आ जाये। वहां जाने से क्या फायदा। इससे बात करो, उससे नहीं। वगैर-वगैरह...। लेकिन मुझे ये तमाम बातें गलत लगीं। यह भी लगा कि सचमुच ऐसी धारणा बनाना एकदम गलत है। मुझे एक खूबसूरत और भावुक अहसास हुआ हाल ही में गाजियाबाद से चंडीगढ़ शिफ्ट करने के दौरान। ट‏्रक में मेरी गृहस्थी लद चुकी थी। बीवी-बच्चों सहित मैं भी तीसरे फ्लोर स्थित अपने फ्लैट से नीचे उतर आया था। एक तरफ मैं पैकर्स वालों की बनाई लिस्ट से सामान गिन रहा था, दूसरी तरफ आने-जाने वालों का सवाला। थोड़ी देर में बीवी और उसके साथ करीब 20 औरतें फ्लैट से नीचे उतर रही थीं, सभी महिलाएं रो रही थीं। मैंने हंसते हुए कहा, अरे माहौल को इतना इमोशनल मत बनाओ। लेकिन माहौल था कि इमोशनल होता चला रहा था। कुछ देर पहले तक जिन मित्रों के साथ में हंस-बोल रहा था, उनके चेहरे पर भी एक अजीब उदासी छलक रही थी। शहरी जीवन के जिन लोगों को बहुत फ्लैट कहा जाता है, वाकई वे तो बहुत भावुक होते हैं, कई बार अपनों से भी ज्यादा। अपने सगे बिरादरों से भी ज्यादा। चाहे उन्हें हम फ्लैट बिरादर ही क्यों न कहें।
असल में, मैं जुलाई में ही चंडीगढ़ आ चुका हूं। दैनिक टि‏‏्रब्यून में। तब से मैं यहां अकेले रह रहा था और परिवार गाजियाबाद में। अभी 29 मार्च की शाम पूरा सामान समेटकर हम सब लोग चंडीगढ़ को आ गये। गाजियाबाद के वसुंधरा में मेरा फ्लैट है। कुछ मित्रों की मदद और सलाह काम आई और वर्ष 2004 में मैंने वहां एक छोटा सा फ्लैट ले लिया था। उसके बाद नौकरी और जीवन के तमात उतार-चढ़ाव देखे। मेरी मां भी यहीं मेरे साथ रहती थी। मां ने वर्ष 2008 के मध्य में लखनऊ बड़े भाई साहब के यहां जाने की जिद की और वहीं 5 जनवरी 2009 का उनका निधन हो गया। उनको कैंसर था। लेकिन कभी भी हमने उन्हें यह बात नहीं बताई थी। निधन से एक माह पूर्व उनकी स्थिति कुछ बिगड़ गयी और भाई साहब ने हमें सूचना दी तो मेरी पत्नी वहां एक महीने उनके साथ रही। यह अलग बात है कि मां को बहुत प्यार करने का दावा करने और दंभ भरने वाला मैं था और मैंने उनका मरा हुआ चेहरा ही देखा। गाजियाबाद के जिस फ्लैट को खालीकर हम चंडीगढ़ आये हैं, उसमें मेरी मां की बहुत यादें हैं। उन्होंने अपने हाथों से सिलकर हमारे बच्चों के लिए बिस्तर बनाये थे, जिसे में अपने साथ चंडीगढ़ ही ले आया हूं।
खैर मैं बात कर रहा था फ्लैट बिरादर की। ट‏्रक पर जब पूरा सामान चढ़ चुका था तो उसकी रवानगी और हमारी जाने की तैयारी के बीच एक मित्र ने चाय का आग‎्रह किया। आदतन उन्होंने पूछा मुझसे और बनवा डाली करीब 20 कप चाय। महिलाओं में से ज्यादा ने चाय पीने से इनकार कर दिया। हम मित्र लोग हंस भी रहे थे और चाय के घूंट भी भ‎र रहे थे। इसी बीच कुछ लोग उस भावुक पलों के गवाह बन गये। आसपास के मेरे मित्र, मेरी बीवी के जानकार और मेरे बेटे के दोस्त और उनके अभिभावक। जब फाइनल चलने की बात आई तो एक मित्र ने कहा, चलो बाहर तक चलते हैं, इन लोगों को आने दो फिर चल पडऩा। लेकिन इधर वाकई रोना-धोना ऐसे चलने लगा मानो कोई लडक़ी अपने मायके से विदा हो रही हो। बाहर दुकान तक चलने का आग‎्र्रह करने वाले मेरे मित्र भी अपने को रोक नहीं पाये और उन्होंने मुझे उस कार में बिठा दिया जिसके जरिये मुझे पहले फरीदाबाद फिर चंडीगढ़ के लिए आना था। वह मित्र गले मिले और बहुत भावुक हो गये। सभी मित्रों से मिलकर मैंने अपने पड़ोसियों से हाथ जोड़े और कहा, यदि कभी कोई गलती हुई तो माफी चाहता हूं। मेरा इतना कहना था कि सब बोले, ऐसा कहकर हम सब लोगों को और न रुलाएं। इसी बीच हमारे पड़ोस की एक भाभी ने कहा, आप किसी को बाय मत बोलिये। आप जा रहे हैं, आपका फ्लैट यहीं है और आपको यहां आते-जाते रहना है। फिर चंडीगढ़ के पते और फोन नंबर का पता वे लोग भी पूछने लगे जो राह चलते कभी-कबार मिलते थे। वाकई फ्लैट संस्कृति के बारे में भले कुछ कहा जाये, लेकिन लोग तो यहां भी वही हैं जो गांव की माटी की सुगंध और भावनाएं को बटोरे आर्थिक कारणों से सुदूर आ बसे हैं। यहां उनका अपना एक नया संसार है।
केवल तिवारी

Tuesday, February 18, 2014

सडक़ और पलायन का रिश्ता

करीब पांच सालों बाद अपने गांव रानीखेत जाने का मौका लगा। पहले राम नगर गए। वहां से ताड़ीखेत फिर वहां से जीप में बैठकर गांव की ओर। यह रास्ता पिछले सात-आठ सालों से वहां के लिए बना है, नहीं दो आठ-दस किलोमीटर पैदल जाना ही होता था। जीप में कुछ बातें चल रही थीं। इसी बीच एक सज्जन ने मेरा नाम और पता पूछा। उसके बाद वह जोर से हंसे और बोले पांच साल पहले आपने मुझे पहचाना और पांच साल बाद मैं आपको पहले पहचान रहा हूं। असल में यह सज्जन मेरे बचपन के दोस्त राम सिंह रौतेला के बड़े भाई हैं। राम सिंह फौज में है और अभी असम में पोस्टेड है। मैं और राम सिंह पांचवीं क्लास तक साथ पढ़े हैं। उसके बाद हमारी मुलाकात नहीं हुई। भाई-बहनों के जरिये कुशल क्षेम पूछते रहते हैं। इस यात्रा के दौरान राम सिंह के बड़े भाई पान सिंह मिले। पांच साल बाद मैंने उन्हें पहचान लिया। पता नहीं कैसे। राम सिंह की शक्ल भी उनकी तरह होगी, ऐसा मेरा अनुमान है। पान सिंह जी की पत्नी अभी ग्राम सभापति हैं। आजकल चुनाव चल रहे हैं। अब वह सीट महिला से बदलकर जनरल हो गई है। इसलिए पानसिंह जी चुनावी तैयारी में हैं। हमारे गांव में भी मेरे बचपन के दोस्त की पत्नी ग्राम सभापति थीं, अब खुद वह दोस्त दिनेश इसके लिए कोशिश कर रहा है। जीप में बैठे-बैठे बातों का सिलसिला जारी था। इस बीच मैंने पूछा, अरे यह सडक़ डामर की कब हो गई। जीप में बैठे सब लोग मेरी तरफ विस्मित नजरों से देखने लगे। पान सिंह ने कहा, कच्ची सडक़ को पक्की हुए तो तीन साल से ज्यादा समय हो गया है। मैंने कहा, अरे मैं तो पांच सालों बाद आ रहा हूं। तभी पान सिंह ने चर्चा छेड़ी पलायन की। बोले, अब तो पलायन इस हद तक हो चुका है कि गांव के गांव वीरान हैं। यदि यह सडक़ 20 साल पहले आ गई होती तो निश्चित रूप से पलायन का यह रूप समझ में नहीं आता। पहले मुझे सडक़ से पलायन के इस रिश्ते की बात समझ में नहीं आई। हालांकि हमारा परिवार भी गांव में नहीं रहता। मेरे ताऊजी का परिवार दिल्ली में 60 साल पहले आकर बस गया था। मेरे भाई साहब 1975 में लखनऊ आ गए थे। 1980 में मैं भी लखनऊ आ गया था। नौ साल पहले माताजी के निधन के बाद अब गांव आने का सिलसिला भी हम लोगों का बहुत कम हो गया है। मैंने पूछा कि ऐसा क्यों। सडक़ से पलायन का क्या ताल्लुक। पान सिंह ने स्पष्ट किया कि कुछ लोग बहुत पहले चले गए, उनकी बात छोड़ दीजिए। हालांकि रिटायर होने के बाद यहां कई लोगों ने बसना चाहा पर पैदल चलने के डर से यहां कोई आ नहीं पाया। उसके बाद कुछ युवाओं ने अपना रोजगार शुरू करने की कोशिश की तो सडक़ न होने से उन्हें दिक्कतें हुईं। उन्होंने करीब दर्जनभर ऐसे उदाहरण बताए जिनमें हमारे गांव के ही युवा महज 10 या 20 किलोमीटर दूर जाकर या तो कोई व्यवसाय चला रहे हैं या फिर नौकरी कर रहे हैं। स्वयं पान सिंह का परिवार ताड़ीखेत में शिफ्ट हो गया है। मैंने इस बात पर मंथन किया। वाकई सडक़ का भी पलायन से ताल्लुक है। यदि सडक़ें अच्छी हों तो काम और अच्छे हो सकते हैं। सडक़ का पलायन से उतना ही गहरा नाता है जितना आंदोलनों का सडक़ से।
केवल तिवारी

Tuesday, October 1, 2013

पता न पूछो शहर में


पहली अक्टूबर को कुछ काम के सिलसिले में चंडीगढ़ के कुछ सेक्टरों का भ्रमण किया। खराब आदत कह लें या फिर मजबूरी। जेब में 20 रुपये थे, वही लेकर चल दिया। वेतन आ चुका था। जेब में एटीम कार्ड था, सोचा लंच के समय पैसा भी निकाल लूंगा और ऑफिस आ जाऊंगा। चूंकि अब तक मेरा वास्ता अपने दफ्तर दैनिक ट्रिब्यून (सेक्टर 29 सी) से और अपनी रिहाइश ट्रिब्यून कांप्लेक्स रायपुर खुर्द (एयरपोर्ट चौक-पंजाब बॉर्डर) तक आने-जाने का ही रहा है। यहां सामान्यत: ऑटो में एक तरफ का किराया 10 रुपये लगता है। मैंने यही सोचकर घर से निकलते ही एटीएम का रुख नहीं किया कि अगर काम नहीं भी बना तो ऑफिस तो पहुंच ही जाऊंगा। ऑफिस कैंपस में एटीम है। मैं एयरपोर्ट चौक से सेक्टर 34 के लिए ऑटो में बैठा (कुछ लोगों ने कहा कि एयरटेल का दफ्तर वहीं पड़ेगा)। मुझे काम एयरटेल दफ्तर में ही था। सेक्टर 34 उतरा तो ऑटो वाले को 10 रुपये दिये। उसने कहा यहां तक के 15 रुपये पड़ते हैं। 10 रुपये तो पीछे सेक्टर 32 तक के हैं। मैंने दूसरा दस का नोट भी दिया। उसके पास मात्र चार रुपये थे। मैंने उसी में संतोष कर लिया। जेब में रखे और मार्केट तलाशने लगा, जहां दफ्तर बताया गया था। सामने मार्केट भी दिख गयी। चारों तरफ नजर दौड़ाई, कहीं भी एयरटेल का दफ्तर नहीं मिला। किससे पूछूं। सडक़ किनारे एक जूस वाला दिखा, लपककर उसके पास तक गया, लेकिन उसने कान पर मोबाइल लगा रखा था और वह किसी से बात कर रहा था। मैंने सोचा इसकी बात खत्म हो जाने देता हूं, लेकिन उसने एक सेकेंड होल्ड कर मुझसे पूछा कितने वाला बनाऊं। बड़ा तीस का, छोटा बीस का। वह अपनी बात एक सांस में कह गया। मैंने कुछ नहीं कहा, आगे खिसक लिया। अगर उससे पता पूछने लगता तो शायद वह गुस्से में आता। नहीं बताता। या गलत भी बता देता। मार्केट के दूसरे छोर पर मैं पहुंच गया। वहां एटीएम मिल गया। मैं खुश। मैंने सोचा सारा काम छोडक़र पहले पैसे निकाल लेता हूं। लेकिन एटीएम पर पर्ची लगी थी ‘आउट ऑफ सर्विस।’ अब क्या किया जाये। कुछ युवा दिखे, लेकिन सब अपने साथियों के साथ बातें करते हुए तेज-तेज चल रहे थे। सामने से एक बुजुर्ग दिखे, मुझे लगा इन्हीं से पूछना ठीक रहेगा। उनके करीब पहुंचा तो देखा वह भी मोबाइल पर लगे थे। उनकी तरफ आशाभरी नजरों से मैंने देखा, उन्होंने फोन होल्ड किया। मैंने पूछा, सर ये एयरटेल का ऑफिस कहां है, उन्होंने पूछा किस सेक्टर में, मैंने कहा सेक्टर 34। फिर वे बोले, पता नहीं और फोन पर बतियाते हुए आगे बढ़ गये। मुझे अजीब भी लगा और हंसी भी आयी। क्योंकि हम लोग अक्सर इस तरह के चुटकुले सुनाते रहत हैं आपस में। उसके बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं किसी से पता पूछूं। कई महिलाएं दिखीं। लेकिन गाजियाबाद (जहां मेरा फ्लैट है) में मैंने कई ऐसे केस पढ़े-सुने कि पता पूछने के बहाने चेन झपट ली। महिलाओं को ताकीद की गयी थी कि कोई पता पूछे तो उससे बात नहीं करनी है। मुझे डर लगी कि कोई मुझे चेन झपटमार ही न समझ ले। हालांकि झपटमारों की तरह न तो मैं बाइक पर था और न ही शरीर में ऐसी फुर्ती। पर चोर या शरीफ माथे पर तो नहीं लिखा होता। तमाम उहापोह के बावजूद मैंने एक महिला से पता पूछने की हिम्मत जुटाई। जैसे ही मैंने कहा मैडम, ये एयरटेल... उनके फोन की घंटी बज गयी। उन्होंने फोन निकाला और बात करती हुईं आगे बढ़ गयीं। अब बस...। मैंने अपने ऑफिस में उन सज्जन को फोन लगाया जो एक बार मुझे अपनी कार में बिठाकर वहां ले गये थे। उनको फोन जैसे ही लगाया। वहां से बिजी टोन आई। मैं इंतजार करने लगा। दस मिनट बाद फिर फोन लगाया अब भी बिजी टोन। मैं यूं ही घूमने लगा शायद कहीं एटीएम मिल जाये। तभी उन सज्जन का फोन आ गया। मैंने पूछा भाई साहब वह एयटेल का दफ्तर नहीं मिल रहा, सेक्टर 34 की पूरी मार्केट छान ली। वो बोले, अरे जनाब सेक्टर 34 नहीं, 32 की मेन मार्केट है। 32 इससे पहले पड़ेगा ना, मेरा सवाल था। हां आप सीधे चले जाओ। कट से रिक्शा या ऑटो ले लो। 20-30 रुपये लेगा। ठीक है, धन्यवाद। मैंने फोन काट दिया। सोचने लगा कि उन्होंने कहा सीधे चले जाओ, किस साइड को सीधे। उन्होंने मुझे देखा थोड़ी मैं कहां खड़ा हूं। मैं अंदाजा लगाकर चलने लगा। एक कोठी के बाहर कपड़ों पर प्रेस कर रहे एक सज्जन से पूछा, सेक्टर 32, उन्होंने बोलना उचित नहीं समझा और हाथ से इशारा कर दिया। मैं उनके इशारे की दिशा में चल दिया। भूख भी लग रही थी। पर सिर्फ चार रुपये थे जेब में। अब मैंने ठान ली कि सेक्टर 32 का नहीं, पहले किसी एटीएम का पता पूछूंगा। मैं पैदल चल ही रहा था कि बाइक पर दो युवक आये। भाई साहब सेक्टर 33 में 348 नंबर मकान कहां पड़ेगा। मैंने तुक्के में कहा, यही तो है सेक्टर 33, बाइक पर पीछे बैठा युवक बोला, वह तो हमें पता है। हम पहले भी आये हैं, पर आज नहीं मिल रहा 348 नंबर। मैंने सामने निगाह दौड़ाई। मैंने कहा, सामने 322 है, इसके पीछे की गली में होगा। मैं भी यार एटीएम ढूढ़ रहा हूं। वह युवक बोला सीधे जाकर लेफ्ट हो जाना, सेक्टर 32 की मार्केट में है। मुझे पता लग गया। सेक्टर 32 में जाकर पहले एटीएम में गया। पर वहां से हजार का नोट निकला। एयरटेल दफ्तर गया। वहां से अजीब जवाब मिला। यानी काम नहीं हुआ। वहां से पैदल ऑफिस आया। ऑफिस आकर कैंटीन में खाना खाया। लस्सी पी और अब ब्लॉग खत्म कर रहा हूं। वाकई शहरों में पता पूछना अब कठिन काम हो गया है।
केवल

Sunday, September 29, 2013

पंछियों और हरियाली के जानी दुश्मन बंदर

शाम के वक्त खबरों को पढऩे के दौरान एक खबर की अंतिम पंक्ति पर मेरी नजर पड़ी। उसमें लिखा था बंदरों के उत्पात की वजह से पंछियों की संख्या कम हो रही है। बंदर घौसलों को तोड़ देते हैं। इसी में अगली लाइन यह भी थी कि गमले और पेड़-पौधों को भी बंदर तोड़ रहे हैं। मैं देख रहा हूं कि बंदरों के आतंक की खबरें पिछले 10-15 सालों से आ रही हैं। इधर पांच-सात सालों से स्थिति ज्यादा भयावह हो गयी है। एक बार खबर आई कि मध्य प्रदेश के बंदरों को उत्तराखंड के जंगलों में छोड़ा जायेगा। ऐसी ही खबर कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान भी आयी कि कोई राज्य तैयार नहीं है दिल्ली के बंदरों को लेने के लिए।
खैर खबर की यह अंतिम पंक्ति मैंने पढ़ी तो मुझे लगा खबर तो यहीं है। खबर संबंधी जो औपचारिकताएं, बातें हो सकती थीं, हुईं। अगले दिन छपी भी। लेकिन मुझे एक पुरानी कहानी याद आ गयी। कहानी कुछ इस तरह थी-
एक बंदर जाड़े में ठिठुर रहा था। उसे ठिठुरते देख पास में ही अपने घौंसले में बैठी एक चिडिय़ा ने कहा, तुम हमारे घौंसले की ही तरह अपने लिए कहीं घर क्यों नहीं बना लेते हो। बंदर को चिडिय़ा का यह सुझाव नहीं सुहाया। उसने तुरंत उस चिडिय़ा के घौंसले को भी तोड़ दिया। कहानी तो यह सीख देने के लिए थी कि मूर्खों को उपदेश देने से कोई फायदा नहीं।
लेकिन कहानी को इससे आगे जोड़ा जाये तो दूसरी बात सामने आयेगी। बंदरों के उत्पात को देखकर चिडिय़ा इंसानों की बस्ती में चली आयी। यहां उसने घरों की छतों पर, पेड़ों पर घौंसले बनाये। पर अफसोस बंदर भी इनसानों की बस्ती में चले आये। यहां फिर उसने घौंसलों पर हमला बोला। अब इस तरह की खबरें आने लगीं कि चिडिय़ों की संख्या कम होने लगी। गौरैया नामक चिडिय़ा की कम होती संख्या के बारे में हम अक्सर सुनते पढ़ते रहते हैं। यहीं पर मेरे जेहन में एक बात और आती है कि ये बंदर कबूतरों के घौंसलों पर धावा क्यों नहीं बोलते। आज तमाम कालोनियों में कबूतरों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। अब बात चाहे जो हो इस खबर में अगली लाइन थी हरियाली के भी दुश्मन बन रहे हैं बंदर। घरों के बाहर रखे गमलों को तोड़ रहे हैं। फलदार पेड़ों के भी जानी दुश्मन बन रहे हैं। बात एक खबर छपने भर की नहीं है। बात वाकई गंभीर है। उस खबर में अन्य बातें भी थीं, मसलन छोटे बच्चों को उठाकर ले जाते हैं। कई लोगों की जान तक जा चुकी है वगैरह-वगैरह। बंदरों के इस आतंक पर गंभीर रूप से सोचने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो रासायनिक हमलों की तरह कोई किसी इलाके में या देश पर बंदर हमला न करवा दे या फिर बंदर दंगा...।

Tuesday, September 10, 2013

हंसाने के बाद संदेश देती रचनाएं

दैनिक ट्रिब्यून में पुस्तक समीक्षा का काम यदा-कदा मिलता रहता है। हाल ही में व्यंग्यकार लाज ठाकुर की तीन पुस्तकें दे दी गयीं। तीनों की समीक्षा अब दो दिन पहले छप चुकी हैं। समीक्षा जो मैंने लिखी-

हंसाने के बाद संदेश देती रचनाएं
केवल तिवारी
व्यंग्य रचना गुदगुदाने के अलावा अंत में भावुक भी कर दे तो उसे क्या कहेंगे। भावुक बातें ऐसी जैसे कोई संदेश सी छोड़ती प्रतीत हों। कभी-कभी ऐसा भी लगे कि जैसे फिल्मी गीत छोटी-छोटी बातों की है यादें बड़ी वाली पंक्ति वाकई बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती थी। हर रचना के बाद पाठक कुछ पल के लिये सोचे, कि सच में कभी-कभी कैसे जरा सी बात का बतंगड़ बन जाता है और सोच-सोचकर वह खुद ही हंसता भी जाये। जब रचना बहुत अच्छी हो और बीच-बीच में शब्दों का दोहराव या कुछ गलतियां आ जायें तो खलता है। लगता है जैसे बेहतरीन दाल में एकाध कंकड़ आ गया है। प्रूफ की कुछ गलतियां अनेक रचनाएं एक साथ लिखने के कारण आये या फिर ध्यान न जाने कारण वह रह गईं, लेकिन हर रचना में ऐसा नहीं है। व्यंग्य लेखक लाज ठाकुर की तीन किताबों क्रमश: ढाई लाख पति, मैं डैमफूल और अटके मटके झटके की ज्यादातर रचनाएं गुदगुदातीं, शब्दों के वाण छोड़तीं हुई अंत में एक संदेश देती सी प्रतीत होती हैं।
संदेश अंधविश्वास से दूर रहने के, संदेश जल्दी संदेह न करने के और संदेश सामाजिक ताने-बाने के। तीनों किताबों की इन व्यंग्य रचनाओं में कहीं आडंबर नहीं दिखता। सामान्य शैली में एकदम मध्यवर्गीय पाठक की समझ में आ जाने वाली और उसे गुदगुदाने वाली। बात जो भी कही गई हो लगता है जैसे आम लोगों की अपनी किसी बात से मेल खाती हुई हो। यानी हमारे-आपके जीवन में या हमसे जुड़े लोगों के जीवन में जो होता हुआ दिखता-महसूसा जाता है। जिस तरह रचनाओं की सामान्य शैली है उसी तरह किसी भी पुस्तक में न तो भूमिका लिखी गयी है और न ही लेखक की ओर से कहे जाने वाले दो शब्द। जैसे कि कई किताबों में दो शब्द शीर्षक से चार-पांच पन्ने तक भरे होते हैं। ढाई लाख पति शीर्षक से उनकी रचना में कुल 21 व्यंग्य रचनाएं हैं। हर किसी रचना में या तो संदेश छिपा है या फिर ऐसा कि पाठक भावुक हो जाये।
उनकी दूसरी पुस्तक मैं डैमफूल पारिवारिक ताने-बाने और घर में होने वाली छोटी-छोटी बात कैसे बड़ी बन जाती है, जैसे मुद्दों पर ज्यादातर में बहुत ही सहज भाव से लिखा गया है। इस पुस्तक में कुछ 20 रचनाएं हैं। व्यंग्यकार लाज ठाकुर की तीसरी पुस्तक अटके मटके झटके में 17 रचनाएं हैं। इस पुस्तक में कुछ रचनाओं में शब्दों का दोहराव दिखता है। तीनों ही पुस्तक में शुरू से ही ररचनाएं शुरू हो जाती हैं। यानी कहीं भी कोई भूमिका नहीं है। हर पुस्तक के अंत में उनकी चार किताबों तीन तो उपर्युक्त और एक अन्य होली के लटके के कवर पेज को छापा गया है। कुल मिलाकर लेखक लाज ठाकुर की इन तीनों किताबों में व्यंग्य के माध्यम से लोगों को कई मसलों पर समझाया गया है कि कैसे जरा सी बात बड़ी बन जाती है और कैसे अंधविश्वास के चक्कर में पडक़र हम लोग अपना ही नुकसान करा उठते हैं।
पुस्तक 1. ढाई लाख पति 2. मैं डैमफूल 3. अटके मटके झटके
प्रकाशक : यूनिस्टार बुक्स प्रा.लि., सेक्टर 34 ए, चंडीगढ़, मूल्य क्रमश: 200, 250 और 200 रुपये
पृष्ठ संख्या क्रमश: 155, 175 और 160



Saturday, September 7, 2013

पुस्तक परम विद्रोही

चंडीगढ़ मैं दैनिक ट्रिब्यून ज्वाइन करने के कुछ दिनों बाद काम के सिलसिले में मेरी मुलाकात कुलदीप धीमान जी से हुई। बाद में पता चला कि वह डॉ. कुलदीप धीमान हैं। इससे भी बड़ी बात कि उन्होंने ओशो पर शोध किया है। शोधग्रंथ किताब के रूप में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में है। उन्होंने एक प्रति मुझे भी दी। हिन्दी की। नाम है परम विद्रोही। कुछ दिनों में पूरी पुस्तक पढ़ डाली और प्रतिक्रिया शब्द चंद शब्द उनको लिखकर दिये। यह मेरा वादा था कि मैं जुबानी ज्यादा चर्चा नहीं करूंगा। पुस्तक परम विद्रोही के बारे में मैंने जो समझा, महसूस किया और जो डॉ. धीमान को लिखकर दिया उसकी हू-ब-हू प्रति यहां पोस्ट कर रहा हूं। साथ में पुस्तक का कवर पेज भी है।
-केवल तिवारी




आदरणीय डॉक्टर कुलदीप कुमार धीमान जी,
बिना किसी पत्रीय औपचारिकता के अपनी बात शुरू कर रहा हूं।
आपके द्वारा लिखी गयी शोधपरक पुस्तक परम विद्रोही पूरी पढ़ डाली। आपसे वादा था कि लिखकर अपनी बात रखूंगा। वही कर रहा हूं। लेकिन थोड़ी सी देरी से। लेकिन इससे बहुत ज्यादा फर्क पडऩा नहीं चाहिए। ध्येय पूरा होना चाहिए।
असल में ओशो के जीवन को अमूमन हम लोग एक ही पक्ष में देख पाते हैं। एक संत या फिर एक खतरनाक आदमी। उनके विचारों को हम उसी तरह पढ़ या समझ पाते हैं जैसे हमने एक लेखक का नाम सुन लिया कहीं समाज में बैठे चर्चा चली तो हम भी बिना ज्ञान के बोल पड़े और हमारी खिल्ली उड़ गयी। यह बात इसलिए लिख रहा हूं कि वाकई लगभग पौने तीन सौ पृष्ठों में ओशो के विचार, उनके मायने, ओशो का दृष्टिकोण और समाज से उठती-गिरती चर्चाओं और परिचर्चाओं को आपने बहुत ही सहज ढंग से पुस्तक में खिला है। सबसे पहले ऐसी सुंदर रचना और इतनी सहज भाषा के लिए आपको साधुवाद। अब बात करता हूं पुस्तक के कुछ अंशों के लिए जो मुझे बेहद अच्छे लगे। यूं तो पूरी पुस्तक ही पठनीय है और भाषा में कहीं भी भटकाव नहीं है। गांधी जी और ओशो : इन मुद्दों पर अलग-अलग खंडों में आपने बहुत ही जानकारी दी है। इसमें कम्युनिस्टों का असमंजस ओशो की मूल बात आदि पर बातें रोचक हैं। ओशो को समझने के लिए एक कदम और आगे की तरफ भी। मृत्यु और जिज्ञासा के संबंध में आपने जो शोधपरक बातें लिखी हैं उसे अगर सही से मंथन कर लें तो शायद निराशा घर न करे। नैतिक कर्म या मौलिक कर्म में आडंबर, हकीकत के बीच तानेबाने को अलग करके जिस तरह ओशो के विचारों से उसमें बातों को अलग-अलग किया है, वह रोचक है। फिर महिला-पुरुष संबंधों में मिथक और हकीकत के बारे में बहुत स्पष्ट और वैज्ञानिक तथ्यों के साथ पुस्तक में लिखा गया है। यूं तो बातें बहुत सारी हैं जिन पर मैं चर्चा कर सकता हूं। लिख सकता हूं। लेकिन एक अदने से पाठक के नाते अंत में यही कहूंगा कि पुस्तक बहुत अच्छी है और बीच में जो जगह-जगह बॉक्स दिये गये हैं, उनमें से बहुत कुछ पुस्तक का निचोड़ निकलकर आता है।
आपकी पुस्तक का पाठक
केवल तिवारी

अब मुझे डॉ. धीमान के अगले शोध ग्रंथ योग वशिष्ठ का इंतजार है

Wednesday, September 4, 2013

क्या चिट्ठी भी बंद होगी

बात ज्यादा पुरानी नहीं है। ब्लॉग पर लिखनी पहले चाहिए थी, लेकिन व्यस्तता के चलते अब लिख पा रहा हूं। रक्षा बंधन से कुछ दिन पहले दिल्ली गया था। पत्नी का आग्रह कि भाइयों के लिए राखी भेजनी है, साथ चलो और कूरियर करवाओ। मैंने कहा, खरीदकर ले आओ, घर में बैठकर चि_ी लिखना। लिफाफे में पैक करने के बाद कूरियर कर दूंगा। पत्नी बोली, एक या दो दिन के लिए आते हो, समय होता नहीं। साथ ही चलो, वहीं से कूरियर भी करवा आएंगे। मैंने पूछा, दुकान में ही चि_ी लिखोगी क्या। पत्नी बहुत सहज भाव से बोली, चि_ी की क्या जरूरत है। राखी कूरियर करते ही फोन कर देंगे। उनसे कह देंगे कि मिलते ही फोन कर देना। बात वाकई बहुत सामान्य थी, लेकिन मुझे लगी अजीब। मैंने मजाक किया अरे नहीं चि_ी जरूर लिखो। साथ ही यह भी लिख देना कि इनके चंडीगढ़ जाने के बाद घर के खर्च बढ़ गये हैं। यानी इशारा कर देना कि राखी का नेक इस बार थोड़ा बढ़ा दें। पत्नी भी हंसी और बोली, हां सारा खर्चा दे देंगे। तुरंत बोली चलो, बच्चों के स्कूल से आने से पहले कूरियर कर आते हैं। मैंने एक कागज निकाला और कहा, चार लाइन ही सही कुछ तो लिख लो। अजीब लगता है। मुझे याद आ गये कुछ पुराने दिन जब दीदी की, मां की या बड़े भाई की चि_ी आती थी। अगर चि_ी छोटी होती तो मुझे बहुत गुस्सा आता। दो या तीन पन्नों की चि_ी क्यों नहीं लिखी दीदी ने, मां ने या भैया ने। खैर पत्नी ने जैसे-तैसे चार लाइन लिखीं और हम लोग गए और कूरियर करके आ गये। इस दौरान मुझे याद आने लगे पुराने दिन। मैं बड़े भाई के साथ लखनऊ रहता था। मां और दीदी हमारे घर यानी रानीखेत के पास डढूली गांव में। मुझे चि_ी लिखने का शौक था। हमें परंपरागत तरीके से चि_ी लिखनी सिखायी जाती थी। जैसे शुरू करना है पूजनीय माताजी, दीदी को सादर चरण स्पर्श। या कहीं छोटे बच्चे हैं तो उन्हें सुभाशीष। कुछ सालों तक में इसी अंदाज में चि_ी लिखा करता था। शुरुआती औपचारिक नमस्कार के बाद कुशल क्षेम की लाइन होती थी, जैसे यहां आपके आशीर्वाद या ईश्वर की असीम अनुकंपा से सब ठीक चल रहा है, आपकी कुशलता की कामना करता हूं। बाद-बाद में भैया की चि_ी देखता था, वे अक्सर लिखते थे-
यहां कुशल सब भांति सुहाई, तहां कुशल राखे रघुराई
या फिर
अत्र कुशलं च तत्रास्तु
पुरानी यादों में खोया था कि मेरा बेटा स्कूल से आया। अभी पांचवी में पढ़ता है। मैंने उससे सबसे पहले पूछा बेटा आपके यहां पत्र लिखना सिखाया जाता है। बच्चे को यह सवाल अप्रत्याशित सा लगा। सामान्यत: मैं पूछता था, आज कोई टेस्ट हुआ, कितने माक्र्स आये, वगैरह-वगैरह। थोड़ा रुककर वो बोला हां पापा, अप्लीकेशन और लेटर राइटिंग। मैंने कहा हिन्दी में, उसका जवाब था हां हिन्दी में भी मित्र को पत्र, प्रधानाचार्य को प्रार्थनापत्र। मैंने कहा, तुम मुझे चि_ी लिखा करो। वह हंसते हुए बोला, पापा घरवाले कंप्यूटर में इंटरनेट लगवा दो, हम आपको ई-मेल किया करेंगे। उसकी बात सहज थी जिससे मैं असहज हुआ जा रहा था। क्या अब चि_ी भी तार की तरह गायब हो जायेगी। पता नहीं। तार से ही जुड़ा एक वाकया याद आया। दसवीं की परीक्षा के बाद मैं अपने गांव चला गया था। उसी दौरान बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया। वहां शाम तक अखबार पहुंच पाता था। मैं एक सज्जन के यहां अखबार देखने गया, लेकिन उसमें लखनऊ क्षेत्र के सकूलों का परिणाम नहीं था। फोन उस जमाने में बहुत बड़ी बात थी। हम लोग घर से जाते थे तो चि_ी मिलने के बाद ही मां को यह पता चल पाता था कि हम सकुशल पहुंच गये हैं। घर से विदा लेते समय एक वाक्य मां और दीदी जरूर कहती थी, जाते ही चि_ी लिख देना। कई बार तो दीदी पोस्टकार्ड दे देती थी। आदेश होता था, लखनऊ पहुंचते ही इसमें लिखकर इसे उसी दिन पोस्ट कर देना। यानी घर से निकलने के कम से कम एक हफ्ते बाद पता चलता था कि हम सकुशल पहुंच गये हैं। खैर बोर्ड परीक्षा परिणाम वाली बात पूरी करता हूं। मैं परेशान था कि रिजल्ट का कैसे पता करूं। उधर, भैया ने मेरा परिणाम अखबार में देखते ही खुशी में तार कर दिया था। केवल दसवीं में अव्वल नंबर से पास हो गया है। गांव में हमारा तार आया तो पोस्टमैन असमंजस में। चूंकि तार की भाषा अंग्रेजी में थी, केवल सक्सीड इन टेंथ विद वेरी गुड माक्र्स। पोस्टमैन साहब समझ नहीं पाये। फिर उन दिनों तार का मतलब होता था कोई बुरी खबर का आना। पोस्टमैन पूरे गांव घूमते रहे कि आखिर कैसे बतायें। अचानक उन्हें हमारे गांव के नीचे ही एक सुबेदार मेजर साहब मिल गये। उन्होंने तार वाली बात उनको बतायी। सुबेदार साहब ने तार का मजमूंन पढ़ा और हंसते हुए बोले, तुरंत तार लेकर उनके घर जाओ, तुम्हें मिठाई मिलेगी। फिर बता भी दिया कि तार में क्या लिखा है। पोस्टमैन साहब हमारे घर आये। मां और दीदी आंगन में ही थे। मैं अपने हमउम्र बच्चों के साथ आम के बगीचे में गया था। दीदी दौड़ी-दौड़ी आयी मुझे बुलाकर ले गयी। पूरी बात सुनकर मैं बहुत खुश हुआ। मां की आंखों में आंसू थे। वह दौर आज भी याद आता है। तरक्की होनी चाहिए। आज इलेक्ट्रानिक जमाना हो गया। अच्छी बात है। अपनों से जब चाहें बात हो सकती है। हो सकता है चि_ी का दौर खत्म भी हो जाये, पर बस यही कामना है, भावुकता और प्रेम संबंध कभी खत्म न हों। आज मेरी भतीजी भी ब्लॉग लिखती है। मुझसे बात करती है। वह भी पत्रकार है। भतीजा भी बड़ा हो गया है। दोनों बच्चों को बड़े होता देखा है। समय की जरूरत या फिर बदले हालात कि आज हम सब लोग दूर-दूर हैं। चि_ी तो कभी-कभी ही लिखी जाती है। लेकिन फोन पर सबसे बात होती है। आजकल के बच्चे जब कुछ समय बाद उन गीतों को सुनेंगे तो समझ तो जायेंगे न- जैसे कि
खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू
डाकिया डाक लाया, डाक लाया
चि_ी आयी है, वतन से चि_ी आयी है

Saturday, August 24, 2013

तान्या जब बन गयी निशा

जिन लोगों ने मेरी कहानी एक थी तान्या पढ़ी है, उन्हें यह कहानी अच्छी तरह समझ में आ जाएगी। वैसे जो लोग उसे नहीं पढ़ पाये थे, वे भी इस कहानी को लेकर कुछ तो जुड़ाव महसूस करेंगे, यह मेरी उम्मीद है।

तान्या के बारे में जब खबर लग गयी कि उसका बचना मुश्किल है तो कोई भी कंप्यूटर स्क्रीन पर उसके ऑनलाइन होने का इंतजार नहीं करता। न मोहित बाबू, न जोगेन्द्र और न ही उनका टीम लीडर रोहित। आईटी विभाग में हैं ये लोग। शिफ्ट बदलती रहती है। ज्यादातर की जनरल शिफ्ट रहती है। पहले सबको शाम होते-होते तान्या का इंतजार होने लगता था। तान्य, अनदेखी लडक़ी। खुद को एक पत्रकार बताने वाली। जीमेल पर दोस्त बनी। सबसे बात करती। चैटिंग के जरिये। न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन की तरह। जानते सब थे कि तान्या से चैटिंग पर हर कोई लगा रहता है, लेकिन छिपाते भी सब थे एक दूसरे से। और जब खबर लगी कि उसका एक्सीडेंट हो गया है। बुरी तरह से चोटिल है। अस्पताल में भर्ती है। किसी ने फिर कुछ भी जानने की जहमत नहीं उठाई। कोई उसके ऑनलाइन होने का इंतजार भी नहीं करता। कुछ लोगों ने चैटिंग बॉक्स में जाकर उससे हुई चैटिंग टैक्स्ट को ही डिलीट कर दिया है। अब क्या याद रखना।
अब तो हालत यह रही कि कुछ लोगों के पास शाम के चार से छह बजे तक जैसे कोई काम ही नहीं बचता था। पहले तान्या से चैटिंग में बिजी रहते। अब बस घर जाने के लिए ड्रॉपिंग वाली गाड़ी का इंतजार करते। लेकिन यह क्या धीरे-धीरे लोगों ने फिर से अपने कंप्यूटर स्क्रीन को छिपाना शुरू कर दिया है। जोगेन्द्र बाबू ने स्क्रीन को तिरछा कर लिया है और थोड़ा झुका भी लिया है। क्या फिर से तान्या आ गई है। पहले तो स्क्रीन को छिपा-छिपाकर चैटिंग का यह कार्यक्रम शाम के वक्त ही होता था, लेकिन अब हर समय होता है। आखिर हुआ क्या है। मोहित जी सोचते, अगर तान्या ठीक होकर आ गई होती तो हमारे जी मेल पर भी तो ऑन लाइन दिखती। टीम लीडर रोहित जी का पता लगाया जाये। आखिर उन्होंने ही तो तान्या की पूरी खोजबीन कर ली थी। उसका बायोडाटा तक मंगवा लिया था। फोन नंबर पता कर लिया था। यह भी पता लग गया था कि वह जालंधर में है। सब लोग जब उसके ऑन लाइन न होने से दुखी थे तब रोहितजी ने ही तो सारा माजरा पता लगवाया था। लेकिन रोहित जी के हावभाव देखकर नहीं लगता कि तान्या फिर से ऑन लाइन हो गयी है।
तान्या के एक्सीडेंट की खबर सुनकर सब परेशान तो थे, लेकिन सिर्फ इस बात से कि अब चैटिंग किससे होगी। आज अगर कुछ लोग उत्साहित हैं तो सिर्फ यह जानने के लिए कि क्या तान्या ऑन लाइन हो गयी है। उसे कितनी चोट लगी, अब वह कैसी है। जिंदा है भी या नहीं। इन बातों से किसी को कोई मतलब नहीं था। उन्हें तो बस शाम का कुछ वक्त चाहिए था चैटिंग के लिए। बस एक महिला होनी चाहिए, जबकि किसी को यह भी मालूम नहीं था कि तान्या वाकई कोई लडक़ी थी भी या कोई काल्पनिक महिला थी। ऐसा तो नहीं कि उन्हीं के बीच का कोई बंदा हो जो उन्हें तान्या बनकर मजे ले रहा हो। लेकिन कौन हो सकता है। हर कोई तो तान्या के चैटिंग प्रेम का दीवाना था। इन सबमें जवान लोगों के साथ-साथ तीन-चार बच्चों के बाप तक शामिल थे। ऑफिस का शायद ही कोई मर्द होगा जो तान्या के फ्रेंडलिस्ट में न हो। यानी तान्या सही में कोई थी। ऐसा न होता तो उसका बायोडाटा कैसे दस मिनट की चैटिंग में ही रोहित बाबू के पास आ गया। पूरी जानकारी के साथ। इतनी जल्दी कोई इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कैसे कर सकता था। फिर कई बातें मेल खाती हैं, इस बात को सिद्ध करने के लिए तान्या कोई जीती-जागती युवती थी। पत्रकार थी। दोस्त बनाना शायद उसका शौक था। चैटिंग भी सबसे करती थी। किसी को निराश नहीं करती थी। अब तो वह गई। पता नहीं इस दुनिया से या फिर इस बनावटी दुनिया यानी चैट वाली दुनिया से उसने नाता तोड़ लिया। किसी को इस बात से मतलब भी नहीं था। किसी ने ज्यादा जानने की कोशिश भी नहीं की। कोशिश सिर्फ इस बात की हुई थी कि वह अब चैटिंग पर क्यों नहीं आती और उसी कोशिश में उसके एक्सीडेंट वाली बात सबको पता चली।
अब तान्या नहीं है तो फिर यह जोगेन्द्र आखिर कंप्यूटर स्क्रीन को घुमाकर किससे चैट कर रहे हैं। कोई बात तो है। मोहित बाबू भी परेशान थे। रोहित तक भी बात पहुंची। एक-दो फिर तीन-चार दिन। धीरे-धीरे सब व्यस्त रहने लगे। यानी लगता है इन कुंठित लोगों की जमात को फिर कोई मिल गयी है चैटिंग के लिए। अब तो सभी के चेहरे पर मुस्कान दिखने लगी और कंप्यूटर मॉनीटर की गर्दन भी तोड़ी-मरोड़ी जाने लगी। अरे यह क्या पूरे ऑफिस में फिर वही चहल-पहल। कुछ लोग उस ऑफिस से जरूर इधर-उधर चले गये हैं। किसी ने नौकरी बदल ली है, किसी का ट्रांसफर हो गया है। लेकिन पुराने लोगों में जो दो-चार थे, उनके चेहरे पर वही पुरानी वाली चमक लौट आई है। तान्या का तो नियत समय था ऑन लाइन होने का। लेकिन लगता है उनकी नयी फ्रेंड कभी भी ऑन लाइन हो जाती है। बस फर्क यह है कि नयी बनी यह दोस्त फेसबुक पर ऑन लाइन है। इसके बारे में भी शायद लोग जानना चाहते हैं। कौन है। क्या करती है। कहां रहती है। इसी टीम में एक दो लोगों के पास फेस बुक खोलने की परमिशन नहीं। बड़ी मिन्नत करके उन्होंने भी अपना फेसबुक अकाउंट खोल लिया। एक दिन तिरछी निगाह से जोगेन्द्र बाबू ने मोहित के कंप्यूटर पर देख लिया। निशा से चैटिंग चल रही है। वह मुस्कुराये। पकड़ में आते देख मोहित धीरे से उठे और जोगेन्द्र बाबू के कंधे में हाथ रखते हुए ऊपर के फ्लोर की तरफ बढ़े। धीरे से बोले, तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में भी तो है निशा। निशा रोहतगी। वाल पर लिखा है निशा रोहतगी, गोरखपुर। जोगेन्द्र बाबू हंसे। अरे सभी की फ्रेंड बन गयी है निशा। मोहित और जोगेन्द्र एक साथ हंस दिये।
धीरे-धीरे सब समझ गये कि निशा से अब चैटिंग शुरू होने लगी है। मन में यह भी था कि क्या निशा भी तान्या की तरह एक दिन चली जायेगी। क्या कभी निशा से बात हो पायेगी। क्या निशा का नंबर मिल जायेगा। एक दिन शाम को चाय के वक्त जोगेन्द्र बाबू ने मोहित से कहा, यार इसका भी बायोडाटा मंगवा लेते हैं। रोहित जी को ही यह जिम्मेदार दी जाये। वह लड़कियों से अच्छी तरह बात कर लेते हैं और लड़कियां उनकी बातों में आती भी जल्दी हैं। मोहित ने कुछ जवाब नहीं दिया। क्या हुआ बॉस। जोगेन्द्र ने सवाल किया। मोहित ने कहा, यार एक बात बताऊं किसी को बताओगे तो नहीं। जोगेन्द्र ने कहा, अरे किसी से क्यों बताऊंगा, बोलो ना। मोहित ने चहकते हुए कहा, मेरे पास निशा का फोन नंबर है। जोगेन्द्र बाबू ने सवाल किया, कभी बात की है। नहीं। फिर दोनों बिना एक दूसरे से बात किये चाय पीने लगे। खामोशी को मोहित ने ही तोड़ा, यार किसी को बताना मत। जोगेन्द्र बाबू ने कहा, बताना तो तुम भी मत भाई। नंबर तो मेरे पास भी है। अरे वाह, मोहित ने सवाल किया, तुमने बात की है क्या कभी। जोगेन्द्र ने कहा, यार बात तो नहीं की है, पर एक बात मैं भी बताऊंगा, प्लीज किसी से कहना मत। अब क्या बात हो सकती है। कहीं वही तो नहीं जो मोहित छिपा रहे थे। हो न हो, वही बात होगी। मोहित ने कहा, नहीं कतई नहीं, तुम बताओ तो सही। जोगेन्द्र बाबू कुछ देर चुप रहे, फिर बोले सही बताओ कभी बात नहीं हुई। मोहित ने कहा, कसम से। मोहित को लगने लगा हो न हो, जोगेन्द्र बाबू की बात भी हो चुकी है। वह बोले, यार लगता है तुम्हारी बात हो चुकी है। सही बताओ न। तुम्हें कसम है। जोगेन्द्र बाबू ने चाय का गिलास दुकान के सामने रखते हुए मोहित से थोड़ा दूर आने के लिए कहा। करीब दस कदम किनारे जाकर बोले, यार बात तो नहीं हुई है हां एसएमएस जरूर करते हैं एक दूसरे को। अच्छा फेस बुक पर चैटिंग से दो कदम आगे, तुम तो एसएमएस भी करते हो। अपना नंबर देते हुए डर नहीं लगा। जोगेन्द्र ने कहा, डर? फिर तुम्हारे मोबाइल में उसका नंबर कैसे फीड है। अरे वो तो उसने चैटिंग के दौरान ही दे दिया था। मैंने सेव कर लिया। बस इसके आगे कुछ नहीं। मोहित ने अपनी सफाई में कहा। कभी उसको फोन मिलाने की कोशिश नहीं की। जोगेन्द्र ने पूछा। नहीं। हिम्मत नहीं हुई।
मोहित बात का तारतम्य तोडक़र दो कदम आगे और तीन कदम पीछे चलते हुए चहलकदमी करने लगे। जोगेन्द्र ने कहा, क्या हुआ? कुछ नहीं यार मोहित ने मरे मन से जवाब दिया। अरे बताओ तो सही। जोगेन्द्र ने मोहित के कंधे को पकडक़र हिलाया। चलो कैंटीन से बाहर चलते हैं, मोहित ने कहा। अब जोगेन्द्र को लगने लगा कि मोहित कुछ छिपा रहा है। इनकी बात होती जरूर होगी। सीढिय़ों से नीचे उतरकर दोनों ऑफिस के बाहर लॉन में आ गये। जोगेन्द्र की व्याकुलता जैसे बढ़ रही थी। उन्होंने ही बात शुरू की, बताओ यार बात क्या है? यार तुम प्लीज मेरी बात पर हंसना मत। मोहित ने बड़ी मासूमियत से कहा। कतई नहीं। जोगेन्द्र ने आश्वासन दिया। असल में यार मेरी निशा से बात तो नहीं हुई है, पर मैं उसका फोन तीन बार रिचार्ज करा चुका हूं। उसने बहुत रिक्वेस्ट की। एक बार दो सौ रुपये में और दो बार सौ-सौ रुपये में। मोहित ने एक सांस में अपनी बात खत्म की। जोगेन्द्र की कोई प्रतिक्रिया न देख, मोहित ने उसकी तरफ देखा, जैसे कुछ तो बोले। जोगेन्द्र इस बार भी चुप रहा। मोहित ने कहा, यार चुप क्यों हो। अबकी जोगेन्द्र ने लंबी सांस ली और कहा, ठीक ऐसा ही मेरे साथ भी हो चुका है। दोनों अब फिर खामोश हो गये। मोहित ने ही कहा, यार हम लोग ये क्या कर रहे हैं। किसी अनजान का मोबाइल रिचार्ज करा रहे हैं। तुम उसको एसएमएस करते हो। क्या यह ठीक है। यार ठीक नहीं ठीक अलग बात है। कोई दोस्त बन गया तो उसमें क्या किया जाये। जोगेन्द्र जैसे अपनी बात को जोर लगाकर सही ठहराने की कोशिश कर रहा हो। दोनों आफिस में आ गये और अपनी-अपनी सीट पर बैठ गये।
दो-तीन दिन बाद पता चला कि सभी निशा के फ्रेंड बन गये। ठीक उसी तरह जैसे तान्या के फ्रेंड बने थे सब। टीम लीडर रोहित के साथ भी निशा ने वही किया। दो दिन की चैटिंग के बाद तीसरे दिन अपना मोबाइल नंबर दे दिया। रोहित से चैट पर उसने यह भी लिखा कि वह उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानती है। रोहित को यह बात मालूम पड़ चुकी थी कि सभी लोग निशा से चैट करते हैं। शाम को ड्रॉपिंग की गाड़ी में निशा की चर्चा छिड़ गयी। बात हो ही रही थी कि रोहित ने निशा के दिये हुए नंबर पर कॉल कर दिया। स्पीकर ऑन करने के बाद। हेलो। एक मर्दाना आवाज आई उधर से। रोहित ने कहा, मैं रोहित बोल रहा हूं, क्या यह निशा का नंबर नहीं है। उस व्यक्ति की आवाज में तुरंत नरमी आ गयी और उसने एक सेकेंड कहने के बाद फोन किसी और को पकड़ा दिया। उधर से अब एक महिला की आवाज थी, हेलो। रोहित ने कहा निशा। जी बहुत मधुर आवाज में उसने जवाब दिया। पहले किसने फोन उठाया था, वो मेरे पति। नहीं मेरा दोस्त। दो बातें एक साथ निशा कहने वाली लडक़ी बोल पड़ी। रोहित ने कहा, तुम मुझे कैसे पहचानती हो। वह बाद में बताऊंगी। पहले आप मेरा फोन रिचार्ज करा दो। अभी यह रोमिंग में है, ज्यादा देर बात नहीं हो पायेगी। रोहित ने कहा, ठीक है देखता हूं। फिर फोन काट दिया। सब लोग अजीब सी खामोशी के बीच कुछ-कुछ बोल रहे थे। रोहित ने अपने बाकी चार साथियों से चाय पीने की इच्छा जताई। ड्राइवर से कहा गया और चारों एक ढाबे पर उतर गये। ड्राइवर से कहा कि तुम भी चाय ले लेना बस 15 मिनट में चलते हैं। रोहित बोला, मुझे ड्राइवर की मौजूदगी में बातें करना अच्छा नहीं लग रहा था। अबकी सभी ने बताया कि निशा का नंबर सबके पास है। सबने नंबर बताये तो सारे नंबर अलग-अलग थे। यानी हर व्यक्ति से अलग नंबर रिचार्ज कराया जाता था। इस बार जोगेन्द्र से कहा गया कि वह फोन लगाये। जोगेन्द्र ने अपने मोबाइल से फोन लगाया तो महिला की आवाज आई हेलो। निशा बोल रही हैं, हां। मैं जोगेन्द्र बोल रहा हूं। अरे हां जोगेन्द्र कैसे हो। आपको पता है मैं आपको बहुत करीब से जानती हूं आप भी मुझे अच्छे से जानते हो। घबराओ मत मैं तुम्हारी दोस्त ही हूं। अच्छा एक काम करो प्लीज अभी मेरा फोन रिचार्ज करा दो। जोगेन्द्र ने भी वही जवाब दिया कि थोड़ी देर में देखता हूं। जिनके पास भी अलग-अलग नंबर थे, सबके साथ यही हुआ। रोहित ने कहा कोई बड़ा फ्रॉड है। कोई किसी का नंबर रिचार्ज मत कराना। मोहित बाबू और जोगेन्द्र एक दूसरे का मुंह देखने लगे। जोगेन्द्र ने मोहित से चुप रहने का इशारा किया। सबने चाय पी और घर चले गये।
अगले दिन चारों के नंबर पर निशा नाम की लडक़ी के नाम से सेव नंबर से कई बार मिसकॉल आयी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। धीरे-धीरे कई दिन बीत गये। निशा अब फेसबुक पर भी ऑन लाइन नहीं रहती। मोहित और जोगेन्द्र बाबू जब भी आमने-सामने पड़ते हैं तो दोनों की हंसी छूट जाती है। लोग उनकी इस हंसी का राज ढूंढऩे में व्यस्त हैं। कंप्यूटर मॉनीटर पर न तो किसी से चैट चल रही होती है और न ही मॉनिटर का स्क्रीन टेढ़ा होता है। फिर ये दोनों मिलते ही हंसते क्यों हैं। ये तो यही जानें। 

Sunday, August 18, 2013

ऑटो वाला नहीं मिला
चंडीगढ़ आये हुए मुझे लगभग सवा महीना हो गया है। इस बीच तीन बार दिल्ली हो आया हूं। इस बात से कई मित्रों को आश्चर्यजनक खुशी हुई, कुछको अखरा कि मैं उनसे नहीं मिल पाया और कई लोगों को कुढऩ भी कि वाह भई ये तो बार-बार आ रहे हैं। ये कैसी नौकरी है। पर इन सबसे इतर इस बार 15 अगस्त के मौके पर दिल्ली गया था। हमारी सोसायटी में ध्वजारोहण समारोह हुआ। साहिबाबाद विधानसभा के वसुंधरा क्षेत्र में मेरा घर है। वहां से बसपा विधायक अमरपाल शर्मा मुख्य अतिथि थे। अन्य कार्यक्रमों की ही तरह माइक संभालने का जिम्मा मुझे दिया गया। जैसा भी बोल सकता था मैंने बोला। विधायक जी आये। जैसा कि होता है। सत्ता के गलियारे के लोग बहुत व्यस्त होते हैं। खैर वे नियत समय पर आये, ध्वजारोहण, पौधारोपण किया और चले गये। कई अन्य कार्यक्रम भी हुए। इस बार मुझे जो बात अब तक सालती रही, वह यह कि मैं रहा तो तीन दिन दिल्ली में, लेकिन अपने परिवार के साथ मिलबैठकर बमुश्किल दो घंटे बातें की होंगी। एक दिन अभिनेता शाहरुख खान के साथ बातचीत के असाइनमेंट में बीत गया। एक दिन अपने जरूरी कामों को निपटाने में और एक दिन पहले पंद्रह अगस्त के कार्यक्रम फिर एक छोटी फिल्म लेवल की शूटिंग में बीत गया। खैर अब चंडीगढ़ वापस आ गया हूं। यहां दैनिक ट्रिब्यून के रीलांच की तैयारी जोरों पर है। चूंकि बातें अभी ऑफ दि रिकार्ड हैं, इसलिए सारा खुलासा नहीं कर सकता, लेकिन यकीनन आने वाले नये सप्लीमेंट और अखबार का कलेवर और तेवर जुदा होगा। लोगों को पसंद आयेगा।
चंडीगढ़ की बातों के बारे में अभी मैं इसलिए कुछ नहीं लिख पाऊंगा कि मुझसे ज्यादा और लोग जानते हैं। यहां आने के करीब आठ दिन बाद मैं पहली बार दिल्ली पहुंचा तो मेरे बेटे ने पूछा जो अभी पांचवी कक्षा में है, पापा सुखना लेक देखी, मैं दंग रह गया। नाम भी नहीं सुना था। मैंने कहा नहीं। तुम मुझे चंडीगढ़ की खास जगहों के बारे में बताओ अबकी देखूंगा, हालांकि वह संभव नहीं है अभ तत्काल। यहां हरियाली बहुत अच्छी है। यहां कहीं अवैध निर्माण नहीं दिखता। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार ने दुखी किया। शायद भांप जाते हैं कि बाहर का है।
लेकिन इन सबसे अलग एक ऑटो वाले का व्यवहार आश्चर्यजनक लगा। जहां मैंने किराये पर घर लिया है, वहां से ऑफिस आने तक ऑटो का किराया दस रुपया है। एक दिन मैंने ऑटो लिया और बैठते ही कह दिया भाई सौ का नोट है आज खुला नहीं है। उसने बैठने का इशारा किया। रास्ते में दो तीन महिलाएं भी बैठीं। ट्रिब्यून चौक पर उतरकर मैंने सौ का नोट दिया। उसने सवाल किया खुले नहीं हैं। मैंने कहा, बैठते ही बता दिया था। हां बता तो दिया था। वह बोला। मैंने पीछे बैठी महिलाओं से कहा, आप लोग इसे किराया दे दें तो यह लौटा देगा। एक महिला बोली, हमने दे दिये हैं। क्योंकि इस बीच मैं खुला कराने एक दुकान के पास गया था, शायद उन्होंने तीस रुपये दे दिये थे। खुले नहीं मिले। ऑटो वाले ने कहा, चलो फिर दे देना। मैंने बताया भाई यही मेरा ऑफिस है। मैं रात को लगभग नौ बजे निकलता हूं। तब से आज तक वह ऑटो वाला मुझे नहीं मिला। यह किस्सा मैंने आफिस में भी बताया, कुछ को विश्वास हुआ कुछ को नहीं। ट्रिब्यून में आते ही लिखना पढऩा तेज किया है। दो-तीन किताबों की समीक्षा भी की है जो छपी है। एक मित्र ने ब्लाग भी रेगुलर लिखने के लिए कहा है। पूरी कोशिश है। अब निजी किस्से कहानियां कम कुछ रचनात्मकता वाले लेख लिखूंगा। आज इतना ही।
नमस्कार

Monday, August 5, 2013

दैनिक ट्रिब्यून की री लांचिंग प्रक्रिया तेज हो गई है। अलग से परिशिष्ट और नियमित पेजों का रंग-रूप और तेवर बदलने की तैयारी है। डॉ उपेन्द्र पांडे जी ने भी ज्वाइन कर लिया है। इधर डिजाइनिंग में मदद कर रहे डॉ कुलदीप धीमान जी एक दिन अपना कैमरा ले आए। मैं और चंडीगढ़ से हमारे रिपोटर दिनेश भारद्वाज बैठे थे कुछ नई योजनाओं के सिलसिले में। श्री अरुण नैथानी जी भी साथ में लगे हैं। लेकिन उनका रुटीन काम भी बहुत है। डॉ धीमान साहब कैमरा लाने वाले हैं, ऐसा पता होता तो निश्चित रूप से में दाढ़ी बनाकर आता। खैर इससे क्या फर्क पड़ता है। मैं जैसा हूं वैसा ही दिखूंगा बस बेहतरीन पेज की तरह दाढ़ी बनी होती तो फाइन ट्यून हो जाता। चलिए लिखने का यह सिलसिला जारी रहेगा। अभी शाम के सात बजे हैं। थोड़ी देर बाद संपादक श्री संतोष तिवारी जी के साथ बैठक होगी। संभवत: आज री लांच को लेकर अहम उच्च स्तरीय बैठक होने वाली है।