Friday, January 23, 2009

मीडिया का संक्रमण काल

हवा चाहे जहाँ से चली है लेकिन तूफ़ान ऐसा चल निकला है की थमने का नाम नहीं ले रहा है। अमर उजाला ने चंडीगढ़ समेट कुछ को हटाया तो बस चल निकला सिलसिला-ऐ-कटोती। मेट्रो नो का बंद होना फ़िर अखबारों के पेज कम होना आदि आदि ऐसी घटनाएँ हैं जिससे मीडियाकर्मी और उनके परिवार वाले व्यथित हैं। अब हिंदुस्तान से अनेक लोगों को निकला जा रहा है। कुछ मित्रों से बात करने पर विचार सामने आए कि जो गए उनका ऐसा ही हस्र होना था। कोई बड़बोलेपन में माहिर तो किसी के लिए अखबार में काम करना सेकेंडरी काम था। इससे पहले भी किसी का प्र्पेर्टी देअलिंग का धंधा चल रहा था तो कोई पी आर एजेन्सी चला रहा था। अब नौकरी जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो मर्सिया पढ़ा जा रहा है। यही नहीं मंदी के बहने कंपनियों को भी कुछ लोगों को निपटाने का मौका मिल गया। जिसे चाहा पत्र थमाया और नमस्ते कर दिया। अब सवाल यह उठता है कि ऐसे हालत में इमानदार कौन रहे। क्या वो ठीक नहीं थे जिनका कुछ न कुछ धंधा चल रहा था। कम से कम तुंरत तो रोड इस्पेक्टर नहीं बने न। इस मसले पर कई पत्रकार बंधुओं ने यह भी कहा कि आख़िर मौके कि नजाकत को जो नहीं समझ पाये उनका क्या किया जाए। आज एक मित्र से बात हुई। उसने याद किए वो दिन जब हिन्दुस्तान में हम कुछ लोगों कि एंट्री हुई थी। एक पुराने सज्जन की टिपण्णी थी कि पता नहीं कहाँ से बंदर आ गए हैं फ़िर यह भी कि जितनी इनकी तनखा है उतना तो हमारे अखबार का बिल है आदि-आदि। खैर कुछ लोगों के लिए यह संक्रमण का दौर है। कहाँ कौन कितना ग़लत है अगर आप इस ब्लॉग को पढ़ें तो कृपया बताएं फ़िर चर्चा को लंबा खीचा जाए।

1 comment:

anupamakela said...

kevalji media men jo daur aya hai usme hindustan ki hi baat kare to voha kuchh log kam karne vale bhi nape gaye vohan andruni rajniti men apna goti nahi fit karne vale ko bahar ka rasta dikha diya gaya.bahut sare makkhanbaj abhi bhi system me bane hue hai. aise me system me bane rahne ke liye apni ranniti me change lani hogi.ek aur bat yeh ki kahi koi nikale isse pahle hi avser dekh chlte bano.jyada moh mat palo. insab ko dekhkar gaon men bujurgo ki bat bhi aksar yad aati hai private naukri aur road ki chhokri ka koi bharosa nahi. matlab ye ki dono hi dhokha dene vali hai.