Sunday, June 6, 2010

कहानी : नई सुबह लेकर आई वह शाम

निशा के पैर तो जैसे जमीं पर पड़ ही नहीं रहे थे। आखिर पड़ते भी तो कैसे! उसके घर में नन्हा मेहमान जो आया था। शादी को पांच साल होने को आए थे। वह मां बनने को तरस गई थी। मंदिर-मजार कहां मत्था नहीं टेका उसने। उसीने क्यों, उसकी मां ने भी कितनी मन्न्तें मांगीं। आखिर बात क्या है! शुरू-शुरू में सबने यही समझा कि अभी नई शादी है। आजकल के बच्चे हैं। एकाध साल में बच्चा हो जाएगा। पर बात यह नहीं थी। वे लोग बच्चा चाह रहे थे, लेकिन हो नहीं रहा था। एक ओर पति की व्यस्तता। महीने में 15 दिन बाहर। दूसरे, शहरों का एकाकी जीवन। निशा को हमेशा बोरियत होती रहती। बच्चे की कामना तो उसे और उसके पति निखिल को शादी के ही साल से हो गई थी। इसलिए उन्होंने कोई प्रीकॉशन भी नहीं लिया था। लेकिन उन लोगों की मुराद तब पूरी नहीं हुई, उलटे निशा को महिला संबंधी कुछ परेशानियां होने लगीं। निखिल इलाज के नाम पर उससे यह कह देता कि तुम पढ़ी-लिखी लड़की हो। इतना दौड़भाग तो खुद ही कर सकती हो। उसने दो चार अस्पताल गिना दिए। कभी फुर्सत मिली तो साथ चला गया, नहीं तो निशा खुद ही डॉक्टर के पास जाती। कुछ दिनों के लिए उसने अपनी मां को बुला लिया। लेकिन मां भी कब तक रहती। मां के घर का भी तो अजब हाल था। दोनों बेटियों निशा और शालिनी की शादी हो गई थी। एक बेटा नौकरी के चक्कर में बैंगलोर जा बसा था। अब निशा के पापा की देखभाल कौन करे। उसने मां से कहा कि वह पापा को लेकर आ जाए और दोनों साथ यहीं रहें, लेकिन मां को यह गवारा नहीं था कि दोनों पति-पत्नी आकर बेटी के घर में जम जाएं। निशा के सास-ससुर अपने दूसरे बेटे के साथ कोलकाता जा बसे थे। निखिल के कहने पर एकाध बार आए भी पर पता नहीं क्यों उन लोगों को यहां अच्छा ही नहीं लगता था।
खैर होते-करते निशा और निखिल की शादी को पांच साल बीत गए। परिवार में कड़ुवाहट बढ़ती, निशा का एकाकीपन बढ़ता, निशा चिड़चिड़ी हो जाती इससे पहले निशा को सारे जहां की खुशियां मिल गईं। उसका बेटा यश जिसे वह प्यार से यश्शु कहती, उसके लिए तमाम खुशियां बटोर कर ले आया। उसके रोने में, उसकी नटखट हरकतों में, उसके मुस्कुराने में और उसकी हर गतिविधि निशा के रोम-रोम पुलकित कर देती। पर परेशानियां कब पीछा छोड़ती हैं। निशा को यश्शु के रूप में तमाम खुशियां तो मिल गईं, निखिल की नौकरी भी अब उतनी टफ नहीं थी, लेकिन पता नहीं क्यों दोनों बीमार से रहने लगे। कभी जुकाम लगा तो हफ्तों ठीक नहीं होता। थकान लगती तो घर े कामों में मन नहीं लगता। निखिल तो आफिस पहुंचकर दिनभर वहां दोस्तों में व्यस्त रहता और अपनी बीमारी को जैसे भूलने का यत्न करता रहता, लेकिन निशा को दिक्कत बढ़ने लगी। इसी के चलते वह कई बार यश्शु की वैसी देखभाल नहीं कर पाती, जैसा वह चाहती। कभी-कभी तो उसके साथ अजीब वाकया होता, वह चिड़चिड़ेपन के कारण यश्शु को चपत भी लगा देती। बाद में खुद को ही कोसती कि मैंने कैसे नन्ही सी जान को थ्ाप्पड़ मार दिया। आखिर उस बच्चे का क्या दोष है! वह शरारत नहीं करेगा, उलटेगा-पलटेगा नहीं। एक बार निशा को बुखार आया तो वह महीनेभर तक खिंच गया। ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, शुगर टेस्ट न जाने क्या-क्या टेस्ट करा डाले, पर कहीं कुछ नहीं निकला। वह पेरशान रहने लगी कि आखिर ऐसा क्या हो गया। वह बुखार से पीड़ित तो थी ही कि यश्शु की एक हरकत ने उसमें जान डाल दी। हुआ यूं कि वह दोपहर में किचन में जूठे बर्तनों को साफकर यश्शु के देखने कमरे में आई तो देखा कि यश्शु लड़खड़ाते हुए चल रहा है। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह सारा काम छोड़कर और अपनी बीमारी भूलकर यश्शु को बार-बार अपनी तरफ बुलाती, यश्शु गिरता-पड़ता आता और जैसे ही लड़खड़ाकर गिरने को होता, निशा उसे संभाल लेती। शाम को जैसे ही निखिल घर आया, निशा चहकते हुए बोली-पता है, यश्शु चलने लगा है। निखिल की प्रतिक्रिया जाने बगैर यश्शु को पलंग से उठाकर नीचे खड़ा कर दिया और पुचकारने लगी आ..जा....आ...आ बेटा। लेकिन यश्शु चलने के बजाय नीचे बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। निखिल थोड़ा डांटने के अंदाज में बोल उठा, मैं देख लूंगा उसे चलते हुए। मुझे सांस तो लेने दो। फिर देखा मेरी किस्मत ही खराब है, वह भी अभी चलने से इनकार कर रहा है। निखिल ने बात तो कोई बड़ी नहीं कही थी, लेकिन उसकी टोन से निशा को बुरा लग गया। वह कुछ बोली नहीं। किचन से एक गिलास पानी लाकर टेबल पर रख गई। थोड़ी देर में एक कप चाय बनाकर टेबल पर रख गई और दूसरे कमरे में चली गई। यश्शु तो बच्चा था और बच्चे का क्या! वह तो अबोध है। अपनी मर्जी का मालिक। वह अपने खेलने में मशगूल हो गया। कभी ताली बजाना, कभी पापा के कपड़े खींचना वगैरा-वगैरा...। निखिल ने कपड़े बदले और हाथ-मुंह धोकर चाय पीने लगा और टीवी खोल लिया। टीवी खुलते ही यश्शु का ध्यान उधर ही चला गया। अचानक यश्शु उठा और टीवी की तरफ लड़खड़ाते हुए चलने लगा। निखिल चिल्लाया, निशा देखो यश्शु चल रहा है। निशा पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वह अंदर ही रही। अचानक यश्शु मुंह के बल गिर पड़ा और उसकी नाक से खून आने लगा। यश्शु के रोते ही निशा भागकर आई। उसको चोट लगी और निशा व निखिल के बीच कलह शुरू हो गई। खैर दोनों पढ़े-लिखे थे और समझदार भी। निखिल ने शुरुआत की बात को सुलझाने की। बोला-निशा आज दिनभर ऑफिस में परेशान रहा अपनी तबीयत को लेकर। मन कर रहा है बस सोया रहूं। निशा से भी रहा नहीं गया वह सुबकने लगी। वह भी बोली, हालत मेरी भी ऐसी ही है, लेकिन यश्शु की हरकतों से मन लगा रहता है। आखिर हम दोनों को क्या हो गया है। हमें किसकी नजर लग गई है, निखिल लगभग भर्राते हुए स्वर में बोला। निशा बोली, मेरी भी समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर हुआ क्या है। निखिल बोला कल में छुट्टी लेता हूं और डॉक्टर मितेश दयाल के पास चलते हैं, वे अच्छे जानकार हैं। दोनों अगली सुबह डॉ. दयाल के पास पहुंच गए। डॉक्टर साहब को उन दोनों ने बताया कि वे लोग अक्सर कोई न कोई बीमारी से रोगग्रस्त हो जाते हैं। रोग है कि ठीक होने का नाम ही नहीं लेता है। उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट भी दिखाई। डॉक्टर दयाल रिपोर्ट देखने के बाद कुछ देर चुप रहे, फिर निखिल की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, निखिल एक जांच के लिए मैं कहूंगा, लेकिन परेशान नहीं होना। निखिल ने लगभग कुछ न समझने के अंदाज में डॉक्टर साहब के चेहरे को देखा। फिर डॉक्टर साहब निशा की तरफ देखते हुए बोले, टेस्ट दोनों को कराना होगा। अब निखिल बोल ही पड़ा, डॉक्टर साहब कौन सा टेस्ट है। डॉ. दयाल सपाट बोल पड़े, एचआईवी का। एचआईवी का नाम सुनते ही दोनों पति-पत्नी सन्न् रह गए। उनकी चुप्पी की परवाह किए बगैर डॉक्टर दयाल ने एक सवाल दागा-आप लोगों ने बच्चे के होने से पहले यह टेस्ट नहीं कराया था। निखिल याद करने की मुद्रा में बैठ गया। निशा बोली-नहीं डॉक्टर साहब बच्चे के होने से करीब पांच माह पूर्व मैं मां के पास चली गई थी। वहीं हमारा यश्शु हुआ। अब निखिल भी बोल उठा, डॉक्टर साहब कुछ टेस्ट तो हुए थे, लेकिन शायद यह टेस्ट नहीं हुआ था। फिर कांपती आवाज में बोला, डॉक्टर साहब लेकिन आप यह आशंका क्यों जता रहे हैं। डॉक्टर साहब स्थिति को स्पष्ट करते हुए बोले, मैं आशंका नहीं जता रहा हूं, लेकिन टेस्ट कराने में हर्ज कैसा। उस दिन वे दोनों एचआईवी टेस्ट के लिए ब्लड सेंपल देकर घर आ गए। अभी उनकी ब्लड रिपोर्ट नहीं आई थी, लेकिन दोनों इस पर बहस करने लगे कि आखिर यह बीमारी आ कैसे गई। दोनों लगभग झगड़ने के अंदाज में थे। निखिल का कहना था कि यश्शु के होने से पहले तुम मां के पास चली गई थीं, पता नहीं वहां कैसे इंजेक्शन लगे। उधर, पता नहीं क्यों निशा को अपने पति के चरित्र पर शक होने लगा था। हालांकि इस शक की सुई उठने के बाद वह खुद को मन ही मन कोसती भी कि नहीं कुछ भी हो निखिल ऐसा नहीं हो सकता। तीन दिन बाद निखिल हिम्मत जुटाकर रिपोर्ट लेने गया। डॉक्टर दयाल ने क्लीनिक में थे नहीं। उन्होंने मैसेज छोड़ रखा था कि वह रिपोर्ट खुद देंगे। और दोनों को शाम को बुलवा लिया। शाम को जब निशा और निखिल वहां पहुंचे तो डॉक्टर दयाल ने कहना शुरू किया, देखो निखिल अब एक टेस्ट बच्चे का भी कराना होगा। भगवान न करे कि इसमें भी यह लक्षण दिखें। इतना सुनते ही निखिल कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। डॉक्टर साहब क्या बात करते हैं! फिर वह निशा की ओर देखने लगा। निशा फफक कर रोने लगी। डॉक्टर साहब कुर्सी से उठे और निखिल को बिठाते हुए बोले, देखिए अभी इनीशियल स्टेज में यह बीमारी आप लोगों में है। एक टेस्ट और होगा, लेकिन उससे पहले बच्चे का ब्लड सैंपल हमें लेना होगा। दोनों पति-पत्नी बच्चे का ब्लड सैंपल देकर घर आ गए। उस दिन तो दोनों कुछ भी नहीं बोल रहे थे, लेकिन लग रहा था जैसे घर में कोहराम मचा हुआ है। घर में सन्न्ाटा था, मरघट जैसी खामोशी थी। यश्शु कभी खेलता, कभी रोने लगता। लेकिन उसकी ओर किसी का कोई ध्यान नहीं था। निखिल उसके लिए दूध बनाकर लाया। दोनों ने उस रात कुछ खाया नहीं। सुबह निखिल ऑफिस भी नहीं गया। आस-पड़ोस के लोगों ने उनके चेहरे देख कुछ पूछा भी तो उन्होंने तबीयत ठीक नहीं होने की बात कहकर उन्हें टरकाया। पड़ोस की सीमा भाभी उनके घर आई। घर में सन्न्ाटा देख उन्होंने अंदाजा लगाया कि पति-पत्नी में कोई झगड़ा हुआ होगा। वह दोनों के लिए चाय-नाश्ता बनाकर ले आई और यश्शु को अपने घर लेकर चली गईं। करीब 11 बजे डॉक्टर दयाल खुद उनके घर आए। इस वक्त डॉक्टर दयाल निशा और निखिल को किसी खतरनाक सूचना देने वाले व्यक्ति केक रूप में दिख रहे थे। लेकिन इस बार सूचना अच्छी थी और वह यह कि यश्शु की ब्लड रिपोर्ट में ऐसा कोई सिमटम नहीं था। डॉक्टर साहब ने यह बात दोनों को बताई और यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब एचआईवी उन दोनों को यश्शु के होने के बाद हुआ है। अब निशा का शक निखिल के प्रति गहराने लगा। निखिल ने उसे लाख समझाने की कोशिश की, लेकिन वह बस रोती रही। अंतत: निखिल ने एक बार 15 दिन तक घर न आने का राज बताया। उसने डॉक्टर उयाल से कहा, डाक्टर साहब मैं एक बार दो निद के लिए टूर पर गया था। लेकिन आया 17 दिन बाद। निशा रोज फोन करती, मैं कहता थोड़ा काम फंसा है, बस आने वाला हूं। निखिल जैसे-जैसे यह बात कह रहा था, वैसे-वैसे निशा के मन में किसी भयानक खबर को सुनने का अंदेशा पलता जा रहा था। निशा को लगा कि अब निखिल कहेगा कि वह किसी के साथ हम बिस्तर हो रहा था। उसकी कोई पे्रमिका है। वह आज भी वहीं रहती है। निखिल अक्सर वहां जाता है....। लेकिन बात ऐसी कुछ भी नहीं थी। निखिल अपनी बात पूरी करने से पहलू सूटकेस से कुछ कागजात निकाल लाया। डॉक्टर साहब की ओर कागजात बढ़ाते हुए उसने कहा, डॉक्टर साहब मैं हैदराबाद में भयानक रूप से बीमार पड़ गया था। निशा प्रेगनेंट थी, मैं इसे परेशान नहीं करना चाहता था। होते-करते मुझे करीब 14 दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। मुझे आशंका है कि यह बीमारी मुझे वहीं से लगी और निशा को मुझसे। निशा अपनी बीमारी से जितनी परेशान थी, इस वक्त निखिल की बातें सुनकर उसे उससे अधिक सुकून मिल रहा था। डॉक्टर दयाल ने दोनों को अपने सामने बिठाया और कहा कि परेशान मत होओ, आगे का प्लान करो। बच्चे की देखभाल का इंतजाम करो। मैं आप लोगों को कुछ दवा दे रहा हूं, नियमित लेते रहें। परेशानी और रोना-धोना मामले को और गंभीर बनाएगा। इतना कहते ही डॉक्टर साहब जाने को हुए तो निशा ने उन्हें रोक लिया और बोली डॉक्टर साहब मैं चाय बनाती हूं, आप नाश्ता हमारे साथ करेंगे। डॉक्टर दयाल आग्रह मानकर वहीं धमक गए। सबसे पहले निशा पड़ोस से यश्शु को ले आई। फिर उसने चाय-पराठे बनाए। शाम को निखिल और यश्शु संग निशा पार्क में गई। वहां बहुत देर तक उन लोगों ने यश्शु को खिलाया और तय किया कि अब वे दूसरा बच्चा नहीं करेंगे। यश्शु की परवरिश पर खास ध्यान देंगे। दवा नियमित लेने और नियमति जांच का वादा एक दूसरे से करने के बाद दोनों ने नारियल पानी पीया और घर का रुख किया। पार्क में बिताई वह शाम उन लोगों के लिए नई सुबह जैसी थी।
केवल तिवारी

2 comments:

सुधीर said...

achchi kahani hai. vadhai. Mahanagron ka jivan esa hi ho chala hai.

vandana said...

kahani ke suru me nikhil ek selfcentered admi dikh raha tha jo kahani ke age bke badne ke sath aur bhi selfcentered diktha h par akhir main apni bimari ka raaz pata chalne se toda badla sa lgta h, achanak hua ye badlav uske charitr se mail nahi khata Vase kahani nikhil ke point of view se h aur achi h