Wednesday, July 25, 2012

मौत की जिंदगी
पंच-सात लोग थे। एक खोखला सा हो चुका अधेड़ उम्र का व्यक्ति। पास में लेटी एक महिला। महिला लेटी नहीं थी बल्कि लाश में तब्दील हो चुकी थी। कुछ लोगों ने उस कोठरीनुमा घर में झांका कुछ बुदबुदाए। कुछ रूक गए, दयाभाव की वहज से, मरने वाले के प्रति श्रद्धाभाव से या फिर किसी अनजाने डर से। अधेड़ सा व्यक्ति पहचान में न आने वाली एक अजीब सी आवाज में बोला, रोहताश नगर वालों को तो बता दो। ऐसा लगता था जैसे रोहताश नगर में ही सारा माजरा छिपा हो। तभी कुछ दूरी पर रहने वाले दो-चार और जानकार आ गए। मरने के बाद क्या-क्या होता है, इस पर बहस होने लगी। निगम बोध घाट किस तरह से पहुंचा जाए और उसके बाद की सारी बातें। गमगीन माहौल में चार-चार लोगों का झुंड इधर-उधर बना और कुछ कानाफूसी होने लगी। एक ओर मृत पड़ी महिला के अंतिम संस्कार की बात हो रही थी और तैयारियां चल रही थीं, दूसरी ओर कानाफूसी बंद होने के बजाय बढ़ती जा रही थी। परिवार के लोगों में से वे लोग तो आ गए जो पड़ोस में रह रहे थे, लेकिन रोहताश नगर से कोई अभी नहीं पहुंचा था। रिश्तेदारी में भी बताने में कुछ लोगों ने बड़ी सक्रियता दिखाई। किसी ने लखनउ फोन कर दिया तो किसी का संपर्क गोरखपुर हो गया। कोई दिल्ली के अन्य इलाकों में फोन करने लगा किसी ने आसपास के वरिष्ठों को बुलाने में भलाई समझी। कानाफूसी जारी थी। कोई कहता महिला के लिए आखिर कोई रो क्यों नहीं रहा। कोई कहता पति भी बातचीत में लगा है, अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है... वगैरह...वगैरह।
तैयारी पूरी हो गई। मोहल्ले की दो-तीन बुजुर्ग महिलाएं इस मर चुकी महिला को पर्दे की ओट में सजाने लगीं। जैसे दुल्हन को सजाते हैं। इन बुजुर्ग महिलाओं में से कोई अचानक फफक कर रोने भी लगता। इन महिलाओं को पता था कि जब कोई महिला पति के रहते मर जाती है तो उसका पूरा श्रृंगार किया जाता है। शव को उठाने का वक्त आया तो आखिर कानाफूसी का सुर तेज हो गया। कहीं से आवाज आई, इनके बेटे कहां हैं। कंधा कौन देगा। चारों तरफ निगाह दौड़ाई गई, लेकिन बेटों का पता नहीं चला। ऐसा नहीं कि महिला का देहांत अचानक हो गया और बेटों को पता नहीं चला होगा। असल में महिला तो जीबी पंत हाॅस्पिटल में डेढ़ माह से भर्ती थीं। ब्रेन ट्यूमर बताया था डाॅक्टरों ने। लोगों की मदद से कुछ इलाज भी हुआ लेकिन मर्ज हाथ से निकल चुका था। कहने को या दुनिया के दस्तूर के मुताबिक यह महिला किसी जमाने में खुशनसीब रही होगी। अच्छे घर में पली-बढ़ी और धूमधाम से व्याह दी गई। महिला के पति दिल्ली आकर कुछ करना चाहते थे। गांव के कई लोगों का उदाहरण था उनके सामने, जो दिल्ली आए, यहीं बस गए और उनके बच्चे अच्छी जगहों पर निकल गए। आज विधुर हो चुका यह अधेड़ तब युवा था। सपने थे। हालात शुरू में थोड़े प्रतिकूल रहे, लेकिन जैसे-तैसे परिवार का खर्च चलने लगा। नौकरी नहीं करके अच्छा व्यवसाय कर लेंगे। मन में ठानी और छोटा-मोटा काम शुरू किया। कभी पुलिस वालों के डंडे खाए और कभी पीने-खाने की आदत ने रास्ता दूसरा ही बना दिया। घर में नन्हे मेहमान आए। पहली बेटी हुई, बहुत सुंदर मानो चंद्रमा की चैदह कलाओं को साथ लेकर जन्मी हो। पढ़ने-लिखने में भी औसत से बेहतर। फिर एक के बाद एक दो बेटे हुए। कुछ दिनों के लिए लाश में तब्दील हो गई इस महिला को भी जो उस समय जवान थी बहुत अच्छा लगा। प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद लगा कि समय धीरे-धीरे अपने पक्ष में आ जाएगा। किसी के सरकारी मकान में एक कमरे में दिन गुजर बसर करने लगे। बेटी ने तो किसी तरह बारहवीं परीक्षा पास कर ली और कुछ ट्यूशन आदि पढ़ाने लगी, लेकिन किसी को शायद भनक भी नहीं लगी कि बेटे पढ़ाई के बजाय चोरी और जेबकतरी में डिग्री लेने की पूरी कोशिश में हैं। महिला अपने मायके से अच्छे खाते-पीते घर से ताल्लुकात रखती थी। तीन-चार भाइयों की इकलौती बहन। एक भाई भी दिल्ली में ही अच्छी नौकरी पर था। गाहे-बगाहे बहन की मदद करता रहता। लेकिन यह मदद उसके लिए जी का जंजाल बन गई। पति आलसी हो चले थे, बेटों की लाइन दूसरी हो गई थी और इस बीच बेटी को भी जवानी की दहलीज पर आते-आते हिन्दी फिल्मों की तरह इश्क-विश्क होने लगा था। इधर, जिस सरकारी मकान के एक कमरे में यह परिवार रह रहा था, वहां रहने वाले अन्य परिवार ने इनकी हरकतों के बारे में सबको बताया और इन्हें वहां छोड़कर किसी अनधिकृत कालोनी में दूर-दराज जाना पड़ा। बेटी के इश्क ने जोर मारा और बिना बिरादरी में किसी को बताए उसकी शादी कर दी गई। पर हाय री इस महिला की किस्मत कि कुछ दिनों बाद बेटी भी ज्यादातर मायके में ही रहने लगी। चारों तरफ से टूट चुकी महिला ने फिर कोशिश की परिवार को बनाने की। कुछ सिलाई का काम और घरों में चैका-बर्तन का काम कर उसने चाहा कि बेटे पढ़ें। लेकिन सब कोशिशें बेकार गईं। इधर आएदिन थाने से छुड़ाने के लिए गांव के ही बिरादरों की मदद लेनी पड़ती। बड़े बेटे ने पता नहीं कैसे एक आरटीवी बस में कंडक्टरी शुरू कर दी और छोटा बेटा करता तो कुछ नहीं था पर अपने घरवालों की स्थिति के सामने उसके पास पहनने को अच्छे कपड़े होते और पान-गुटखा, सिगरेट और शराब हर चीज का सेवन करता। घर का खाना भी कभी-कभी मजबूरी में खाता। नही ंतो उसे ढाबे का ही खाना पसंद था। लड़की भी अक्सर मायके आती और हजार-दो हजार लेकर कुछ दिनों के लिए फिर ससुराल चली जाती। अपने घर में नाजों से पली चार भाइयों की इकलौती बहन रही लाश बन चुकी इस महिला के तमाम सपने चूर-चूर हो गए। वह एकांत पसंद करने लगी। एकांत में पता नहीं कुछ सोचती थी या फिर कुछ नहीं सोचने का जतन करती थी। एक दिन सिर में तेज दर्द हुआ। पति डिस्प्रीन का एक पत्ता पकड़ाकर निश्चिंत हो गए। दर्द कम नहीं हुआ। एक हफ्ते बाद असहनीय दर्द हुआ तो बोली, जहर मिल जाता तो बहुत अच्छा होता। पति को लगा मुझपर कमेंट कर रही है। तुरंत पहुंच गए रोहताश नगर रिश्तेदारों के यहां। वहां से पहले तो दुत्कार मिली कि आखिर कब तक मदद करेंगे। फिर मानवता के नाते कुछ ने पैसे दिए और किसी ने जीबी पंत अस्पताल में पहचान के जरिए भर्ती करवा दिया। बेटों को भी पता चला कि करीब 30 हजार रिश्तेदारों ने दिए हैं। उसके बाद किसी को कुछ पता नहीं चला। और पता चला तो यह कि महिला अब इस दुनिया में नहीं रही।
लाश को कंधा तो मोहल्ले वालों ने दिया लेकिन निगम बोध घाट पर मुखाग्नि के लिए फिर बेटों की डिमांड हुई। तभी कोई परिचित आरटीवी गाड़ी में सो रहे उसके बड़े बेटे को उठाकर ले आए। मुंह से शराब की बदबू आ रही थी। पर उसने मुखाग्नि वैसे ही दी जैसे कोई होशवाला व्यक्ति देेता है। परिवार के लोगों ने सिर मुंडवाया। अब तेरहवीं की तैयारी हो रही है। महिला के पति ने इस बार रिश्तेदारों के पास दोनों बेटों से जाने को कहा है। अब पता नहीं महिला की किस्मत यहां काम करती है या नहीं। क्या उसकी तेरहवीं पर कोई भोज हो पाएगा या नहीं। लेकिन महिला को जानने वाला हर व्यक्ति यही कहता है मौत की जिंदगी जीने वाली यह महिला क्या कभी वाकई जी पाई होगी।

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