Friday, August 2, 2013

लग रहा है ब्लॉग पर अब नियमित रूप से लिखने लगूंगा। इसके दो कारण हैं। एक तो इसी से मिलता-जुलता एक काम मिला है, दूसरा अजनबी शहर में अकेला हूं। लिखने-पढऩे और गाना सुनने के अलावा कोई काम ही नहीं बचा है। कभी-कभी यह हिम्मत भी कर लेता हूं कि मित्रों से फोनबाजी या एसएमएसबाजी कर लेता हूं। लेकिन ये काम कम ही हो पाते हैं। अभी मेरा फोन पोस्टपेड हो नहीं पाया है।
खैर.. बात अब शुरू करता हूं। तमाम किंतु-परंतु, सवाल-जवाब और भी न जाने क्या-क्या होने हवाने और सोचने बतलाने के बाद आखिरकार मैं इन दिनों चंडीगढ़ आ गया हूं। दिल्ली से चंडीगढ़ आने तक के सफर और यहां रहने तक के बारे में उतना मैंने नहीं सोचा जितना मेरे शुभचिंतकों ने सोच लिया। सोचने का काम उनका था और लिखने का मेरा है। शहर अजनबी है। लोग अजनबी हैं। लेकिन एक बड़ा फर्क (तेरह साल पहले हिन्दुस्तान अखबार में नौकरी करने गया था उसकी तुलना में)और अच्छापन यह देखा कि यहां के हर व्यक्ति (पत्रकार, गैर पत्रकार) ने कहा, चिंता न करें हम सब लोग हैं। आपको परेशानी नहीं होगी। हर दूसरे दिन बाद यह भी पूछा कि शहर में मन लगा कि नहीं। पूछने का यह सिलसिला जारी है। दो दिन बाद ही यहां के लोगों ने किराये के घर के लिए पूरा जोर लगाया उन लोगों की मेहनत और मेरी किस्मत से घर अच्छा मिल गया। मकान मालिक ट्रिब्यून से ही रिटायर्ड हैं। भले मानुष हैं। दो कमरों का घर लिया है, लेकिन दूसरे को अब तक नहीं खोल पाया। कारण अकेले हूं। हां एक मित्र ने कहा है कुछ दिन बाद वह भी साथ रहने लगेगा। देखते हैं क्या होता है नये शहर में मेरे नवीनीकरण के तहत।
दोस्तो असली बात मैं अब चंडीगढ़ आ गया हूं। दैनिक ट्रिब्यून अखबार में। फिलहाल खबरों में घुसा हुआ पत्रकार नहीं, री-लांच के लिए योजना बनाने वाला व्यक्ति। आप सब लोगों की शुभकामनाएं चाहिए। पढऩा लिखना मेरा बहुत तेज हो जाए, दुआ कीजिए।
नमस्कार
केवल तिवारी

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