Wednesday, September 4, 2013

क्या चिट्ठी भी बंद होगी

बात ज्यादा पुरानी नहीं है। ब्लॉग पर लिखनी पहले चाहिए थी, लेकिन व्यस्तता के चलते अब लिख पा रहा हूं। रक्षा बंधन से कुछ दिन पहले दिल्ली गया था। पत्नी का आग्रह कि भाइयों के लिए राखी भेजनी है, साथ चलो और कूरियर करवाओ। मैंने कहा, खरीदकर ले आओ, घर में बैठकर चि_ी लिखना। लिफाफे में पैक करने के बाद कूरियर कर दूंगा। पत्नी बोली, एक या दो दिन के लिए आते हो, समय होता नहीं। साथ ही चलो, वहीं से कूरियर भी करवा आएंगे। मैंने पूछा, दुकान में ही चि_ी लिखोगी क्या। पत्नी बहुत सहज भाव से बोली, चि_ी की क्या जरूरत है। राखी कूरियर करते ही फोन कर देंगे। उनसे कह देंगे कि मिलते ही फोन कर देना। बात वाकई बहुत सामान्य थी, लेकिन मुझे लगी अजीब। मैंने मजाक किया अरे नहीं चि_ी जरूर लिखो। साथ ही यह भी लिख देना कि इनके चंडीगढ़ जाने के बाद घर के खर्च बढ़ गये हैं। यानी इशारा कर देना कि राखी का नेक इस बार थोड़ा बढ़ा दें। पत्नी भी हंसी और बोली, हां सारा खर्चा दे देंगे। तुरंत बोली चलो, बच्चों के स्कूल से आने से पहले कूरियर कर आते हैं। मैंने एक कागज निकाला और कहा, चार लाइन ही सही कुछ तो लिख लो। अजीब लगता है। मुझे याद आ गये कुछ पुराने दिन जब दीदी की, मां की या बड़े भाई की चि_ी आती थी। अगर चि_ी छोटी होती तो मुझे बहुत गुस्सा आता। दो या तीन पन्नों की चि_ी क्यों नहीं लिखी दीदी ने, मां ने या भैया ने। खैर पत्नी ने जैसे-तैसे चार लाइन लिखीं और हम लोग गए और कूरियर करके आ गये। इस दौरान मुझे याद आने लगे पुराने दिन। मैं बड़े भाई के साथ लखनऊ रहता था। मां और दीदी हमारे घर यानी रानीखेत के पास डढूली गांव में। मुझे चि_ी लिखने का शौक था। हमें परंपरागत तरीके से चि_ी लिखनी सिखायी जाती थी। जैसे शुरू करना है पूजनीय माताजी, दीदी को सादर चरण स्पर्श। या कहीं छोटे बच्चे हैं तो उन्हें सुभाशीष। कुछ सालों तक में इसी अंदाज में चि_ी लिखा करता था। शुरुआती औपचारिक नमस्कार के बाद कुशल क्षेम की लाइन होती थी, जैसे यहां आपके आशीर्वाद या ईश्वर की असीम अनुकंपा से सब ठीक चल रहा है, आपकी कुशलता की कामना करता हूं। बाद-बाद में भैया की चि_ी देखता था, वे अक्सर लिखते थे-
यहां कुशल सब भांति सुहाई, तहां कुशल राखे रघुराई
या फिर
अत्र कुशलं च तत्रास्तु
पुरानी यादों में खोया था कि मेरा बेटा स्कूल से आया। अभी पांचवी में पढ़ता है। मैंने उससे सबसे पहले पूछा बेटा आपके यहां पत्र लिखना सिखाया जाता है। बच्चे को यह सवाल अप्रत्याशित सा लगा। सामान्यत: मैं पूछता था, आज कोई टेस्ट हुआ, कितने माक्र्स आये, वगैरह-वगैरह। थोड़ा रुककर वो बोला हां पापा, अप्लीकेशन और लेटर राइटिंग। मैंने कहा हिन्दी में, उसका जवाब था हां हिन्दी में भी मित्र को पत्र, प्रधानाचार्य को प्रार्थनापत्र। मैंने कहा, तुम मुझे चि_ी लिखा करो। वह हंसते हुए बोला, पापा घरवाले कंप्यूटर में इंटरनेट लगवा दो, हम आपको ई-मेल किया करेंगे। उसकी बात सहज थी जिससे मैं असहज हुआ जा रहा था। क्या अब चि_ी भी तार की तरह गायब हो जायेगी। पता नहीं। तार से ही जुड़ा एक वाकया याद आया। दसवीं की परीक्षा के बाद मैं अपने गांव चला गया था। उसी दौरान बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया। वहां शाम तक अखबार पहुंच पाता था। मैं एक सज्जन के यहां अखबार देखने गया, लेकिन उसमें लखनऊ क्षेत्र के सकूलों का परिणाम नहीं था। फोन उस जमाने में बहुत बड़ी बात थी। हम लोग घर से जाते थे तो चि_ी मिलने के बाद ही मां को यह पता चल पाता था कि हम सकुशल पहुंच गये हैं। घर से विदा लेते समय एक वाक्य मां और दीदी जरूर कहती थी, जाते ही चि_ी लिख देना। कई बार तो दीदी पोस्टकार्ड दे देती थी। आदेश होता था, लखनऊ पहुंचते ही इसमें लिखकर इसे उसी दिन पोस्ट कर देना। यानी घर से निकलने के कम से कम एक हफ्ते बाद पता चलता था कि हम सकुशल पहुंच गये हैं। खैर बोर्ड परीक्षा परिणाम वाली बात पूरी करता हूं। मैं परेशान था कि रिजल्ट का कैसे पता करूं। उधर, भैया ने मेरा परिणाम अखबार में देखते ही खुशी में तार कर दिया था। केवल दसवीं में अव्वल नंबर से पास हो गया है। गांव में हमारा तार आया तो पोस्टमैन असमंजस में। चूंकि तार की भाषा अंग्रेजी में थी, केवल सक्सीड इन टेंथ विद वेरी गुड माक्र्स। पोस्टमैन साहब समझ नहीं पाये। फिर उन दिनों तार का मतलब होता था कोई बुरी खबर का आना। पोस्टमैन पूरे गांव घूमते रहे कि आखिर कैसे बतायें। अचानक उन्हें हमारे गांव के नीचे ही एक सुबेदार मेजर साहब मिल गये। उन्होंने तार वाली बात उनको बतायी। सुबेदार साहब ने तार का मजमूंन पढ़ा और हंसते हुए बोले, तुरंत तार लेकर उनके घर जाओ, तुम्हें मिठाई मिलेगी। फिर बता भी दिया कि तार में क्या लिखा है। पोस्टमैन साहब हमारे घर आये। मां और दीदी आंगन में ही थे। मैं अपने हमउम्र बच्चों के साथ आम के बगीचे में गया था। दीदी दौड़ी-दौड़ी आयी मुझे बुलाकर ले गयी। पूरी बात सुनकर मैं बहुत खुश हुआ। मां की आंखों में आंसू थे। वह दौर आज भी याद आता है। तरक्की होनी चाहिए। आज इलेक्ट्रानिक जमाना हो गया। अच्छी बात है। अपनों से जब चाहें बात हो सकती है। हो सकता है चि_ी का दौर खत्म भी हो जाये, पर बस यही कामना है, भावुकता और प्रेम संबंध कभी खत्म न हों। आज मेरी भतीजी भी ब्लॉग लिखती है। मुझसे बात करती है। वह भी पत्रकार है। भतीजा भी बड़ा हो गया है। दोनों बच्चों को बड़े होता देखा है। समय की जरूरत या फिर बदले हालात कि आज हम सब लोग दूर-दूर हैं। चि_ी तो कभी-कभी ही लिखी जाती है। लेकिन फोन पर सबसे बात होती है। आजकल के बच्चे जब कुछ समय बाद उन गीतों को सुनेंगे तो समझ तो जायेंगे न- जैसे कि
खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू
डाकिया डाक लाया, डाक लाया
चि_ी आयी है, वतन से चि_ी आयी है

2 comments:

पंडितनामा said...

केवल जी,
आप को याद हो या ना हो, मैंने आप को चिट्ठी लिखी है. पत्रकारिता के दौरान ही पत्र लिखा था. उन दिनों शायद आप जेवीजी टाइम्स या पर्वतीय टाइम्स में हुआ करते थे. पांडव नगर या लक्ष्मी नगर की तरफ रह रहे थे. उन दिनों मैं, जैनेन्द्र सोलंकी और हरीश चौधरी कोशाम्बी में हिमगिरी अपार्टमेंट के ही 308 में रहते थे. आप से बात नहीं हो पा रही थी. तब यह चिट्ठी लिखी थी. उसके एक हफ्ते बाद ही आप मिलने कौशाम्बी आए थे.
बहरहाल बात चिट्ठी की है तो वह •ाले ही कुशल-छेम पूछने के लिए न हो लेकिन मोदी की कुर्सी को हिलाने के लिए बंजारा की चिट्ठी तो हो ही सकती है?

kewal tiwari said...

bahut sunder jawab hai blog padhne ke liye dhanywaad aur chiththi ke taar is andaj mein jodne ke liye sadhuwaad