Friday, June 16, 2017

पच्चीस नंबर



सजल ने अब चौथी बार रघु से सवाल पूछा कि इस बार कहां गये थे? रघु का वही जवाब '25 नंबर।' दोनों हंस पड़े। असल में पिछले चार-पांच दिनों से यही हो रहा था। रघु को हर बार 25 नंबर काउंटर पर जाना पड़ रहा था। अस्पताल में 25 नंबर का आलम यह था कि न तो वह 24 के करीब था और न ही 26 के आसपास। उसका निशान (साइन बोर्ड) जरूर कई जगह बने थे। दूसरी मंजिल से भी एक एरो बना हुआ था। वहां से अंदाजा लगाया जा सकता था कि 25 नंबर काउंटर है कहां? दूसरी मंजिल पर ही बने वार्ड में सजल भर्ती थे। दिक्कत यह थी कि 25 नंबर वार्ड वहां था ही नहीं, जहां उसे होना था। रघु चूंकि अब अभ्यस्त हो गया था। इसलिए ज्यादा परेशानी नहीं होती। लेकिन कई बार अगर रात 11 बजे बाद वहां जाना होता तो वह रास्ता भूल जाता। असल में जो रास्ता रघु को मालूम था, वह रात 10 बजे बंद हो जाता था। बाकी काउंटर जैसे 22, 23, 27 आदि एक ही फ्लोर पर थे, लेकिन 25 नंबर था तीसरी मंजिल पर। असल में 25 नंबर का वास्ता रघु का भी तभी से पड़ा जब से सजल यहां भर्ती थे। सजल एक बेहतरीन फोटोग्राफर माने जाते थे। फोटोग्राफी के प्रति उनके लगाव का आलम यह था कि वह अस्पताल के बेड पर पड़े वक्त भी एंगल की बात करते। कभी कहते, 'रघु सामने जो पेड़ है, उसको अगर तुम इस बिल्डिंग की छत पर जाकर कैमरे में कैप्चर करो तो एक अलग नजारा दिखेगा।' रघु बात से सहमत होते हुए सिर हिला देता। रघु भी था तो फोटोग्राफर, लेकिन एंगल और नयेपन का इतना जुनून उसमें नहीं था, जितना सजल साहब में। फिर सजल साहब रघु से तकरीबन 12 साल बड़े भी तो थे। फोटोग्राफी की कई बारीकियां तो रघु ने सजल साहब से ही सीखी थीं। यूं तो कई अन्य वरिष्ठ फोटोग्राफरों से रघु का वास्ता पड़ा, लेकिन सजल साहब के एंगल उसे एकदम अलग लगते। सजल की बातों को सुनने के बाद कई बार रघु का मन करता कि चलो छत पर चढ़कर एक फोटो इस पेड़ की ले ली जाये, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। सजल साहब का एंगल के प्रति जुनून का आलम यह था कि एक बार तो पता ही नहीं चला कि उन्होंने कब रघु की चाय पीते तस्वीर ले ली। वह तस्वीर इतनी खूबसूरत आयी कि लगा नहीं कि वह किसी अस्पताल के वार्ड में किसी मरीज का तीमारदार बना हुआ है। रघु को सजल साहब से खुलकर बात करने में भी संकोच होता था। लेकिन इन दिनों अस्पताल में थे तो लंबी खामोशी भी तो नहीं चल सकती थी। तीमारदारी के दौर में ही एक बार तो हिम्मत करके रघु ने पूछ ही लिया, 'सर ये आइडियाज कैसे आते हैं आपको।' सजल मुस्कुरा दिये और बोले आज घर जाते वक्त अमलताश के पेड़ों की कतार देखना और ऐसे ही क्लिक कर देना। वाकई गजब हो गया। रघु की वह तस्वीर उसके अखबार के पेज वन पर छप गयी। अगले दिन सुबह 11 बजे जब रघु अस्पताल पहुंचा तो सजल साहब मुस्कुराये। बोले, ‘देखा अच्छी बन गयी ना तस्वीर।’ फिर उन्होंने पूछा, ‘ये कैप्शन किसका है?’ 'मिलजुलकर बनाया है।' रघु का जवाब था। सजल साहब थोड़ा गुस्सा सा हुए। बोले, 'खुद नहीं बनाया है तो दूसरों को क्रेडिट देना सीखो।' ऐसे ही कई मौके होते थे जब सजल साहब प्रैक्टिकल बातें करते और कुछ अच्छी बातें भी समझाते। असल में सजल साहब पिछले कुछ दिनों से बहुत बीमार हो गये थे। वह तसवीरों के एंगल को लेकर बातें तो करते, लेकिन काम जैसे उन्होंने खुद करना लगभग बंद कर दिया था। रघु से कोई खास इंटीमेसी उनकी नहीं थी। हां जान-पहचान बहुत पुरानी थी। बल्कि वह तो रघु के कई बार बॉस भी बने रहे। सजल साहब के साथ एक अजीब बात थी कि वह हमेशा प्रोफेशनल बातें ही करते। तसवीर कैसी है। तसवीर का एंगल क्या हो। कैसे कोई फोटो बहुत अच्छी हो सकती है, वगैरह-वगैरह। रघु-सजल कई बार बॉस और मुलाजिम रहे। फिर अलग-अलग हो गये। पिछले कुछ सालों से दोनों का साथ हुआ। वह रघु से पता नहीं क्यों निजी बातें शेयर करने लगे थे। बेशक बच-बचकर। जैसे बेटे को एक ट्रॉफी मिली है। बिटिया ने बीटेक का कोर्स पूरा कर लिया है। जॉब सर्च कर रही है। वाइफ आने वाली हैं। आदि-आदि। सजल और रघु इन दिनों जयपुर में थे। दोनों दिल्ली से आये थे। रघु तो अपनी फैमिली साथ ले आया, लेकिन सजल साहब के बच्चों की पढ़ाई बीच में थी। बेटा हॉस्टल में, बेटी बीटेक की पढ़ाई कर रही थी। पत्नी भी स्कूल में पढ़ाती थीं। वह जयपुर में अकेले ही रहने लगे। अपने आदत के अनुसार वह फोटो के एंगल तो खूब तलाशते, लेकिन पता नहीं लगता जैसे जिंदगी का उन्होंने एक ही एंगल देखा। तन्हा रहना, किसी से कुछ शेयर न करना उनकी आदत सी थी। रघु और सजल की प्रोफेशनल बातें होतीं। कभी-कबार मुलाकात होती। लेकिन पिछले कुछ दिनों से जब सजल साहब बीमार पड़े तो उन्होंने पता नहीं क्यों रघु से इस बात को शेयर करना चाहा। रघु को कुछ-कुछ तो पता था, लेकिन सजल साहब की हमेशा इच्छा रहती थी कि बेचारगी, लाचारी भरे माहौल में न जीयें। वह यह भी पसंद नहीं करते थे कि बार-बार कोई उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछे। लेकिन इस बीच उन्होंने रघु और अपने ही साथ के एक-दो लोगों को घर बुलाकर बताया कि वह बेहद अस्वस्थ हैं। बीमारी है किडनी की। शायद ट्रांसप्लांट करनी पड़ जाये। रघु तो यह सुनकर ही सन्न रह गया। फिर खुद सजल साहब ने कहा कि घबराने की जरूरत नहीं। सब क्यूरेबल है। फिलहाल दवा चलेंगी। डायलिसिस होगी। जरूरत पड़ी तो बाद में ट्रांसप्लांट करा लेंगे। उन्होंने रघु से कहा कि संभव हो तो कुछ समय निकालकर मेरे साथ अस्पताल में रह जाना। क्योंकि उन्हें फिलहाल एक हफ्ते के लिए भर्ती होना है। रघु को इसमें कोई दिक्कत नहीं थी। दो-चार घंटे जाने के बाद वह थोड़ा काम कर आएगा और फिर तीमारदार की तरह अस्पताल चला जाएगा। लेकिन वह चाहता था कि सजल साहब इस वक्त पूरे परिवार को साथ बुला लें। उनके साथ रहने से बात दूसरी ही होगी। हालांकि यह बात रघु सीधे कह नहीं पाया। तय हुआ कि तीन दिन बाद अस्पताल जाना है। डॉक्टर से पहले ही टाइम ले लिया गया। डॉक्टर ने बताया कि एक दिन आईसीयू में रखेंगे फिर प्राइवेट रूम दिला देंगे। तीन दिन बाद सजल के साथ रघु एवं उनके दो मित्र अस्पताल चले गये। वहां उन्हें भर्ती करा दिया गया। इसी बीच सजल साहब की पत्नी का फोन रघु के पास आ गया। रघु को आश्चर्य हुआ कि उन्हें कैसे पता कि हम अस्पताल में हैं। तभी सजल साहब बोले, ‘मैं बता चुका हूं। वह शाम तक पहुंच जाएंगी।‘ दिनभर रघु वहीं रहा। इस बीच सजल साहब के कई सैंपल जांच के लिए रघु देकर आया। हर सैंपल के साथ डॉक्टर कहते कि पहले 25 नंबर में जाना वहां से पर्ची मिलेगी फिर 24 नंबर में या 20 नंबर में जमा करा आना। रघु को 25 नंबर ढूंढ़ने में बहुत वक्त लग गया। असल में 25 नंबर के लिए साइन बोर्ड तो जगह-जगह लगे थे, लेकिन उसे ढूंढ़ना बहुत आसान नहीं था। 25 नंबर काउंटर तीसरी मंजिल पर था। रघु को जब इस काउंटर पर पहुंचने का अच्छा अभ्यास हो गया तो वह सजल साहब के पास से उठकर अक्सर उस गलियारे में आ जाता जहां से लोग 25 नंबर गलियारे का रास्ता ढूंढ रहे होते। एक दिन तो उसने कम से कम 50 लोगों को इसका रास्ता बताया होगा। गलियारे में अक्सर अस्पताल से अनजान लोग ही भटकते रहते। गार्ड से पूछो तो वो ऐसे ही आगे को हाथ से इशारा कर देते। उनका काम तीमारदारों की भीड़ को हटाना ही ज्यादा होता। बड़ा सरकारी अस्पताल, तमाम तामझाम फिर भी कुछ बातें अधूरी-अधूरी सी।
एक दिन रात में सजल साहब ने रघु से रुक जाने का आग्रह किया। रघु ने सजल साहब को ऐसी लाचारगी वाले अंदाज में कभी नहीं देखा था। रघु ने तुरंत हां कर दी और घर पर फोन कर बता दिया कि वह कल शाम तक ही घर आएगा। इस बीच सजल साहब ने पत्नी से घर जाने को कह दिया। वह लगातार एक हफ्ते से उनके पास ही थीं। उन्हें भी थोड़ा आराम मिल जाएगा। चूंकि रघु का ऑफ था, इसलिए दफ्तर की भी बहुत चिंता नहीं थी। रात में सजल साहब बहुत देर तक रघु से बात करते रहे। बीच में दोनों ने दो बार कॉफी भी पी। ‘आपके लिए ज्यादा कॉफी नुकसानदायक तो नहीं‘ रघु ने सजल साहब से पूछा। ‘अरे नहीं डॉक्टर तो कहते हैं खूब कॉफी पीओ।’ सजल साहब कह देते। उस रात सजल साहब ने घर-परिवार की कई बातें रघु से कीं। रघु की बातें भी सुनीं। दूसरे दिन सुबह-सुबह सजल साहब ने अपने आईपैड पर कई मधुर गीत लगा दिये। कभी भूपेन हजारिका का ‘विस्तार है अपार’ गीत बजता तो कभी लता जी का ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा।’ सजल साहब ने देखा कि रघु को भी गीतों में आनंद आ रहा है। उन्होंने यहां भी एक एंगल जैसा तलाशा। बोले-‘रघु इन गीतों को सुनकर नहीं लगता जैसे शब्द बाहर निकलकर हवा में तैर रहे हों।’ रघु थोड़ी देर के लिए उनकी बातों पर गौर करता रहा। सचमुच यही तो लग रहा था कि जैसे शब्द तैर रहे हों। फिर उन्होंने हंसते हुए पूछा, ’25 नंबर कब से जाना नहीं हुआ।’ रघु मुस्करा दिया। फिर सजल साहब बोले, पता नहीं 25 नंबर से मुझे अपना नाता सा जुड़ता महसूस हो रहा है। जानते हो सजल यूं तो मैं कोई ज्योतिष आदि में विश्वास नहीं करता, लेकिन पता नहीं 7 नंबर से मेरा अनजाना सा नाता है। मेरे मोबाइल नंबर के अंत में 7 है। कार के नंबर में सात है। घर का नंबर सात है। जन्मतिथि सात और अगर इस 25 नंबर के दोनों अंकों को जोड़ो तो ये भी सात बनते हैं। क्या पता अंतिम दिन का भी योग सात बने। सजल बस सुनता रहा। फिर बोले, मुझे लगता है इस 25 नंबर से अब नाता टूट जाएगा। रघु ने कहा, ‘सर आप परेशान मत होइये। सब ठीक होगा। ऐसे भी अब कोई दिक्कत नहीं है। अब तो इस अस्पताल के किसी भी गेट से भेज दीजिए मैं 25 नंबर तक हो ही आऊंगा।’ वैसे वहीं फीस जमा क्यों होती है। सजल साहब ने पूछा। रघु ने कहा, ‘सर कुछ खास टेस्ट की फीस वहां जमा होती है और रिपोर्ट भी वहीं से मिलती है।‘ फिर रघु ने पूछ लिया, ‘सर आप किडनी ट्रांसप्लांट का प्रोसेस तो शुरू करवाइये। डोनर मिल जाते हैं।’ सजल साहब बोले, ‘डोनर की कोई समस्या नहीं है। मैं सोच रहा हूं अगर यूं ही यह जिंदगी चार-पांच साल चल जाए तो ज्यादा जीकर करना क्या है?’ उनके इस जवाब की रघु को उम्मीद नहीं थी। उसने कोई तर्क करना उचित नहीं समझा। अगले दिन शाम को सजल साहब ने कहा, ‘रघु तुम घर जाओ। कल से बच्चे अकेले होंगे।’ फिर वह धाराप्रवाह बोलते चले गये, ‘हमारे शहजादों को तो मैसेजभर की फुर्सत है। कभी आकर मुझे देख लें, इतनी फुर्सत उन्हें कहां।’ रघु ने जवाब दिया, ‘आप कहें तो रुक जाऊं। कल सुबह निकल जाऊंगा।’ सजल ने बात पलट दी और बोले, सामने देखो पेड़ों के बीच से गौर से चांद को देखो, ऐसा लग रहा है वह दो है और पेड़ की टहनी जैसे पांच। सजल समझ गया कि वह 25 नंबर कह रहे हैं। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिये। तभी सजल साहब की पत्नी भी पहुंच गयीं। उन्होंने भी रघु से घर जाने को कहा। जाते-जाते सजल साहब बोले, ‘रघु कभी-कभी तो मुझे लगता है कि 25 भी बजते हैं। रात को 12 बजे जिसे हम 24 बजे भी कह सकते हैं, उसके एक घंटे के समय को जब बिल्कुल सन्नाटा सा होता है उसे हम 25 बजे कह सकते हैं।’ रघु को लगा फोटो में एंगल तलाश करने वाले सजल साहब आज कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं। खैर रघु घर आ गया। घर पर बात की। वहां भी सजल साहब की बीमारी से सब परेशान थे। रघु की पत्नी ने पूछा, क्या लगता है? रघु ने कहा, ‘कल तक सब ठीक लग रहा था, आज अजीब-अजीब।’ खाना खाकर सब सो गये। रात एक बजे रघु के फोन पर घंटी बजी। फोन महेंद्र का था। रघु का दोस्त और सजल साहब का भी पुराना परिचित। रघु ने सवाल किया, ‘हां महेंद्र इतनी रात फोन कैसे।’ ‘अरे यार मैं अस्पताल में हूं।’ महेंद्र का जवाब था। ‘क्या हुआ।’ रघु ने पूछा। ‘सजल साहब सो सीरियस।’ बातचीत जारी रही-अरे मैं आऊं। नहीं सुबह आ जाना। जल्दी।
रघु को उसके बाद नींद नहीं आयी। कभी वह याद करता कि रात एक बजे भी 25 बजता है। कभी यह कि अब 25 नंबर से वास्ता टूट जाएगा। कभी यह कि मेरे जीवन में 7 नंबर अहम है। सोचते-सोचते उसे हल्की आंख लग गयी। सुबह 6 बजे रघु की पत्नी ने चाय लाकर दी। रघु ने कहा कि मैं तुरंत नहाकर निकलूंगा। रात फोन आया था। अजब इत्तेफाक था कि करीब सात बजे वह अस्पताल पहुंचा। सजल साहब को कई तरह की मशीनें लगी थीं। बेटा और बेटी भी पहुंच चुके थे। उनकी पत्नी से रघु ने पूछा अचानक सब लोग आ गये। सजल साहब की यकायक तबीयत कैसे बिगड़ गयी। वह सुबकने लगीं। बोलीं, आपके जाने के बाद इन्होंने ही सबको आ जाने के लिए कहा था। फ्लाइट से अभी-अभी सब पहुंचे हैं। ओह। रघु को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह डॉक्टर के पास गया। डॉक्टरों का वही जवाब, ‘वी आर डूइंग अवर बेस्ट।’ इधर-उधर दौड़ते-दौड़ते करीब 11 बज गये। आधे घंटे बाद डॉक्टर ने तीन-चार पर्चियां दी और एक लिक्विड सा देकर कहा, इसे 25 नंबर में जमा कराके आओ। रघु ने पर्चियां पकड़ीं और बाहर को निकला ही था कि डॉक्टर ने रोक दिया। पर्ची और लिक्विड वापस ले लिया। फिर डॉक्टर ने रघु की तरफ गौर से देखकर कहा, ‘आप इनके कौन हैं।’ मैं-मैं-मैं, रघु अपना कोई परिचय नहीं दे पाया। तभी महेंद्र बोला, 'उनके भाई हैं। मतलब पुराने साथी हैं।' डॉक्टर ने कहा, 'सबको संभालिये, अब 25 नंबर जाकर इन जांचों की जरूरत नहीं।' रघु ने देखा 12 बज चुके थे। क्या दिन में भी 25वां घंटा होता है। 12 बजे के बाद। रघु रुआसा सा होकर पीछे को पलटा। महेंद्र की तरफ देखकर बोला, आज तारीख कितनी हैं। महेंद्र ने कहा '16 तारीख।' 'ओह आज भी सात हैं।' रघु बुदबुदाया। महेंद्र ने कहा, 'क्या। सात नहीं सोलह। हां भाई सोलह।' रघु बुदबुदाता रहा। शायद अब न 25 नंबर होगा और न ही सात नंबर। थोड़ी देर बाद रोने-धोने की आवाज से अस्पताल परिसर गूंज उठा। दुनिया वैसे ही चल रही थी। सामने का पेड़ भी हवा में हिल रहा था। आसमान में बादलों का एक झुरमुट इस तरह से घूम रहा था जैसे उसकी आकृति 25 नंबर की बन रही होगी। रघु चुपचाप एक बार 25 नंबर काउंटर पर हो आया। वहां वैसी ही गहमागहमी थी। सीढ़ियों से उतरते वक्त उससे पांच लोगों ने 25 नंबर का रास्ता पूछा, आज वह सिर्फ हाथों से इशारा कर पाया।