पशुओं की ब्रीडिंग का समय कब है। किसानों को कहां उचित मूल्य मिलेगा। दूध कितना शुद्ध है। ऐसी ही तमाम बातें अगर एप के जरिये मिल जाये या फिर कॉलेज से निकले बच्चे ये सब बताएं तो कैसा रहेगा। निश्चित रूप से यह एक नयी पहल होगी। ऐसा ही हरियाणा और पंजाब के कई इलाकों में हो रहा है और इसका विस्तार पहले हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड फिर अन्य राज्यों में होगा। इस संबंध में 8 राज्यों में 11 हजार बच्चों के जरिये उदय एवं मू फार्म कार्यक्रम चला रहे परम सिंह ने बताया कि राह में कई चुनौतियां हैं, लेकिन निकल पड़े हैं तो इसके सकारात्मक परिणाम निकल रहे हैं। केंद्र सरकार के स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत चला रहे इस कार्यक्रम के संबंध में परम बताते हैं कि वह 11 क्षेत्रों में ऐसे कार्यक्रम चला रहे हैं जिसमें 45 तरह की नौकरियों की संभावनाएं हैं। इनमें खेतीबाड़ी, दुग्ध उत्पाद एवं भवन निर्माण शामिल है। उन्होंने बताया कि पंजाब के संगरूर, मानसा आदि में डेयरी बिजनेस के तहत ऐसे कदम उठाये गए हैं जिससे किसानों की लागत में कमी आई है। मूलरूप से पंजाब निवासी और अब ऑस्ट्रेलिया में बस चुके परम ने चंडीगढ़ में बताया कि वह मूफार्म एप के जरिये पहले उन किसानों को जोड़ रहे हैं जिनके पास दो से पांच तक गायें हैं। अब वह जल्दी ही हरियाणा के कुरुक्षेत्र, सोनीपत, पानीपत आदि इलाकों में भी मंडी विपणन सहित कई कार्यक्रम चलाएंगे। उनका दावा है कि वर्ष 2020 तक वह अपने विभिन्न माध्यमों से दो लाख किसानों को प्रशिक्षित करेंगे। उनका कहना है कि दूध की शुद्धता नापने के लिए भी उन्होंने 'द कलर ऑफ मिल्क' अभियान चलाया है। इसके तहत वह दूध कितना सफेद यानी शुद्ध है के संबंध में प्रशिक्षण देंगे। परम का मानना है कि हमारे पशु स्वस्थ रहेंगे तो दूध अच्छा होगा। इसके लिए जानकारी के साथ-साथ साफ-सफाई पर ध्यान देने की जरूरत है। कब क्या खिलाना है, क्या ध्यान रखना है इसकी जानकारी किसानों को एप के जरिये मिल जाएगी।
Thursday, December 6, 2018
बॉलीवुड के खलनायकों का दस्तावेज, ‘मैं हूं खलनायक’
भारतीय सिनेमा के 100 साल से ज्यादा लंबे इतिहास में
सैंकड़ों अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने रुपहले परदे पर अनगिनत खल किरदार अदा किये
हैं, जिनसे हम
न केवल अपने आस-पास मौजूद बुरे चरित्रों को भलि-भांति पहचान सकते हैं,
बल्कि किसी संभावित खतरे से बच
भी सकते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार फजले गुफरान की यह किताब खलनायकी के उस दौर
को हमारे सामने लाती है, जब लोग खल चरित्र निभाने वाले
कलाकारों को असल जिंदगी में भी बुरा इंसान ही समझते थे। दूसरी तरफ यह किताब कई
कलाकारों से की गई एक मुकम्मल बातचीत का यादगार सफर है, जिसमें उनके अंदर से एक ऐसा इंसान बात
करता दिखता है, जिसे
शायद किसी ने सुनने की कभी जहमत ही नहीं उठाई। किताब में प्रसिद्ध अभिनेता रजा
मुराद की बातें हैरान कर देने वाली हैं, और सोनू सूद की बातों से उत्साह और
उम्मीदें झलकती हैं। दिग्गज अभिनेता प्रेम चोपड़ा अपने और मौजूदा दौर के खलनायकों
के बारे में बेबाकी से बात करते दिखते हैं, तो मुकेश ऋषि दिल से प्राण साहब,
अजित के बारे में बताते हैं।
आज के इस दौर में जब हम ये मान बैठे हैं कि इंटरनेट पर हर
तरह की जानकारी मौजूद है, यह किताब हिन्दी सिनेमा के खलनायकों
के बारे में चार कदम आगे की और एक्सक्लूसिव बातें करती है और सिने प्रेमियों के
साथ-साथ सिनेमा के छात्रों के लिए एक टेक्सटबुक का काम करती है,
क्योंकि इसमें एक ओर अलग-अलग
दौर के दिग्गज अभिनेताओं जैसे प्राण साहब, प्रेम चोपड़ा, अजीत, जीवन, प्रेम नाथ, मदन पुरी, अमरीश पुरी, अमजद खान, डैनी, अनुपम खेर, गुलशन ग्रोवर, शक्ति कपूर, कबीर बेदी और प्रकाश राज आदि के बारे
में रोचक जानकारियां दी गयी हैं और बातें की गयी हैं, तो दूसरी ओर के. एन. सिंह,
कन्हैयालाल,
बीएम व्यास,
कमल कपूर,
अनवर हुसैन के साथ-साथ नादिरा,
शशिकला, ललिता पंवार, हेलन और बिंदु जैसी खलनायिकाओं के भी
बेहद दिलचस्प ब्यौरे दिये गये हैं। आप हैरान हो जाते हैं, 1940 के दौर में आयी अभिनेत्री कुलदीप कौर
जैसी खलनायिका के बारे में पढ़कर, जिसे किसी ने कभी याद ही नहीं किया।
वह एक ऐसी दिलेर महिला थी जो बंटवारे के समय अकेले कार चलाकर दिल्ली होते हुए
लाहौर से बंबई आ गयी थी। पुस्तक ‘’मैं हूं खलनायक’’ यह एक दस्तावेज से कम नहीं। इसे
पन्नों में समेटना नामुमकिन सा है लेकिन लेखक फजले गुफरान ने 352 पन्नों में समेटने
की कोशिश की है। करीबन 150 से अधिक खलनायक और खल चरित्र निभाने कलाकारों के बारे
में जिक्र है। इस पुस्तक की कीमत 299 रूपए है जो फिलवक्त अमेजन पर उपलब्ध है।
फिल्म पत्रकारिता और मनोरंजन जगत से जुडे पाठकों के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक
साबित होगी ऐसी उम्मीद है।
Thursday, November 29, 2018
शिमला की वह यात्रा और चांद छूने की तमन्ना
हवा
में ठंडक, पर चुभने वाली नहीं। दूर-दूर तक एक अनोखा नजारा। मानो सीढ़ीनुमा
खेतों पर किसी ने दिवाली मनाई हो। अचानक नजर चांद पर गयी, अरे इतना विशाल
और इतने नजदीक। चांद की ओर देखने पर लगा मानो हमसे कह रहा हो, इस वक्त तो
मेरा सीना भी तन ही जाएगा सामने इतनी ऊंचाई पर तिरंगा जो फहरा रहा है। एक
तो समुद्र तल से 2076 फुट की ऊंचाई। उस पर 100 फुट का ऊंचा ध्वज प्रवर्तक
शिला और ऊपर शान से लहराता तिरंगा। वाकई नजारा बहुत मनमोहक था। यह था शिमला
का रिज मैदान। तारीख 22 नवंबर, 2018...इतना खूबसूरत नजारा और साथ में तीन
प्यारे भांजे, दीदी और जीजाजी। रिज के पास ही चर्च पर पड़ती रोशनी। देश और
विदेश से आये लोगों का जमघट। मन कर रहा था बस यूं ही वहां घूमते रहें।
बातें करते रहें। फोटो खींचने की बातें हुईं। कभी सब एक साथ खड़े होकर और
कभी अकेले-अकेले। लखनऊ से भांजा कुणाल, गौरव और बेंगलुरू से आया था सौरभ।
मुझसे कोई चार साल बड़ी शीला दीदी और जीजा जी (पूरन चंद्र जोशी) दो दिन
पहले ये सब लोग चंडीगढ़ पहुंचे थे। दिल्ली से घूमते हुए। इन दिनों मेरी पत्नी आराम कर रही हैं, आपरेशन के बाद। यानी कहीं सफर नहीं कर सकतीं। बच्चों की परीक्षाएं थीं, इसलिए उनका
शिमला आना तो नहीं हो पाया, अलबत्ता वे लोग एक दिन पहले और एक दिन बाद में
साथ रहे। लोकल ही कुछ देर साथ घूमे।
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रात के वक्त रिज पर खड़े तीनों भांजे |
टॉय ट्रेन का वह बेहतरीन सफर
21 तारीख
की शाम को ही कार्यक्रम बना कि शिमला टॉय ट्रेन से चलेंगे। इससे पहले
ज्वालाजी या चिंतपूर्णी जाने का कार्यक्रम बन रहा था। दीदी-जीजाजी और मैं
भी वहां जाना चाहते थे। लेकिन बच्चों का मन शिमला जाने और चिंतपूर्णी तक
जाने की प्रॉपर व्यवस्था न हो पाने के कारण यही तय हुआ कि शिमला चला जाये।
मैंने अपने संवाददाता ज्ञान ठाकुर जी को फोन किया। उन्होंने एक होटल में दो
कमरों की बुकिंग करा दी। कार्यक्रम तो बन गया, लेकिन मेरे मन में टॉय
ट्रेन को लेकर कई तरह की शंकाएं थीं। एक बार मेरे मित्र जैनेंद्र सोलंकी,
धीरज ढिल्लों सपरिवार आये थे। हम लोग तब भी टॉय ट्रेन से जाने के लिए कालका
तक गये भी, लेकिन ट्रेन में बिल्कुल जगह नहीं मिली। अंतत: सोलन तक गाड़ी
से जाकर लौट आये। ऐसी ही आशंका इस बार भी लगी। हालांकि तब पीक टूरिस्ट सीजन
था और इस बार वह सीजन शुरू होने में अभी काफी वक्त था। एक व्यक्ति से
चंडीगढ़ के पुराने एयरपोर्ट चौक से कालकाजी तक छोड़ने के लिए किसी मित्र के
जरिये पुछवाया तो उसने दो हजार की मांग की। हम लोगों ने तय किया कि ओला से
चलेंगे। खैर अगले दिन समय पर सब तैयार भी हो गये। देर से उठने के आदत वाले
मेरे दो भांजे भी समय पर उठ गये और ठीक आठ बजे मात्र आठ सौ रुपये में हम
सब लोग कालकाजी पहुंच गये। वहां टिकट लिया। ट्रेन मिल गयी। ट्रेन में बैठ
गये। पूरे रास्ते का सफर अद्भुत रहा। शुरुआत में मुझे अपनी मां की याद आयी।
करीब 14 साल पहले मैं, भावना (मेरी पत्नी) और बेटा कुक्कू (तब एक साल का
था आज दसवीं में पढ़ता है) टॉय ट्रेन से कुछ दूर तक गये थे फिर ज्वाला जी,
चामुंडा देवी, चिंपूर्णी आदि मंदिरों का दर्शन करते हुए वैष्णोदेवी की
यात्रा पर गये थे। थोड़ी देर बाद मैं भांजों और दीदी-जीजाजी के साथ पूरे
पर्यटक की मस्ती वाले अंदाज में आ गया। हम लाेगों ने सुरंग आने पर खूब शोर
किया। फोटो खींची, वीडियो बनाये। इस दौरान केजे फोटोज एवं वीडियोज खूब
चर्चित हुआ। (केजे का मतलब कुणाल जोशी से है। छोटा भांजा। अच्छी फोटोग्राफी
करता है।)
आ गया पड़ाव
शाम करीब चार बजे हम
लोग शिमला पहुंच गये। शिमला स्टेशन से हमारे होटल के बीच की दूरी करीब ढाई
किलोमीटर थी। हम लोग पैदल ही चल पड़े। इस बीच मैंने गौर किया कि दीदी की तो
वाकई हालत खराब हो चुकी है। उससे चला नहीं जा रहा था। मैं सोचने लगा कि
यही वह दीदी है जो करीब 08 किलोमीटर दूर कॉलेज जाया करती थी। खड़ी चढ़ाई।
पहाड़ी सफर। वहां से लौटने के बाद खेतों में भी जाती थी। पानी भरने के लिए
भी और भी कई काम। असल में कुछ समय पहले दीदी को चिकुनगुनिया हुआ और तब से
उसके पैरों में बहुत दिक्कत हो गयी है। खैर जैसे-तैसे यह सफर पूरा किया और
हम होटल पहुंचे। चाय-पानी पीने और थोड़ा सुस्ताने के बाद हम रिज पर आ गये।
रिज, मॉल रोड आदि इलाके में दो-तीन घंटे घूमे फिरे। कभी थके-थके से और कभी
प्रफुल्लित।
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जाखू मंदिर में स्थापित हनुमानजी की मूर्ति |
विशालकाय हनुमानजी और बंदरों का आतंक
अगले
रोज यानी 23 नवंबर की सुबह हम लोग शिमला घूमने के लिए फिर निकले। भांजों
का मन तो कुफरी भी घूमने का था, लेकिन कई कारणों से वहां जाना ठीक नहीं
लगा। हम लोगों ने पहली रात ही एक गाड़ी वाले ठाकुर साहब से बात कर ली थी।
वह मंडी के थे। उन्होंने कहा कि शिमला आसपास घुमाने और चंडीगढ़ तक छोड़ने
का .... इतना लूंगा। हमें वह रकम ठीक लगी। सुबह सबसे पहले हम जाखू मंदिर
गये। वहां हनुमानजी की विशालकाय मूर्ति स्थापित है। ठाकुर से पहले ही ताकीद
कर दी कि चश्मे को बचाकर रखना। दीदी ने तो अपना चश्मा पर्स में डाल लिया,
लेकिन सौरभ के लिए चश्मा उतारकर लगातार चलना कठिन था। किसी तरह हम लोगों ने
पूरे इलाके का भ्रमण किया। चारों ओर बंदरों की टोली थी। सभी ताक पर रहते
थे कि किसी के हाथ में कुछ दिखे और वे झपट्टा मारें। उसके बाद हम लोग
कालीबाड़ी मंदिर गये। कालीबाड़ी मंदिर से एक अपना नाता सा लगता है। एक तो
ऐसा ही मंदिर चंडीगढ़ में भी है, जिसके बगल में एक कुष्ठ आश्रम है। अपनी
माताजी की पुण्य तिथि और बच्चों के जन्मदिन पर मैं वहां जाता हूं। दूसरा
कालीबाड़ी मंदिर लखनऊ में भी है। जब भी दीदी के यहां जाता हूं तो एक चक्कर
वहां का लगाता हूं। इसके बाद हम लोग संकट मोचन मंदिर पहुंचे। वहां विदेशी
पर्यटक बहुतायत से दिखे। एक अंग्रेजन आंटी के साथ सौरभ ने फोटो भी खिंचवाई।
सचमुच पहाड़ों के मंदिरों की शांति और सफाई मन प्रसन्न कर देती है। मंदिर
जैसी ही फीलिंग आती है।
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रिज पर खड़े दीदी-जीजाजी |
वापसी का सफर और लेह-लद्दाख तक का रूट
शिमला
से वापसी सड़क मार्ग से हुई। पहाड़ी नजारों के अलावा कहीं-कहीं डरावने
नजारे भी दिखे। कहीं भयानक भूस्खलन। कहीं टूटती रोड। रास्ते में करीब
पांच-छह जगह सड़कों पर होता दिखा बहुत बड़ा काम। चंडीगढ़ आकर पता लगाया तो
पता चला कि हिमाचल प्रदेश के रास्ते लेह-लद्दाख के लिए ऐसा रूट बनाया जा
रहा है जो सालभर खुला रहेगा। सामान्यत: बर्फीले मौसम में लद्दाख जाना
मुश्किल होता है। इस प्रोजेक्ट पर बहुत तेजी से काम चल रहा है। कुल मिलाकर
यह सफर रहा बहुत मजेदार। लेकिन अगले ही दिन लगा जैसे क्या ये स्वप्न था।
कुक्कू की एक चोट
असल
में शिमला से लौटकर 24 नवंबर को शाम को मैं ऑफिस आ गया। दीदी, जीजाजी और
कुणाल सेक्टर 19 के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आ गये। सौरभ, गौरव अपनी मामी और
दोनों भाइयों कुक्कू, धवल के साथ घर पर ही थे। ऑफस आने के दो घंटे बाद ही
भावना का फोन आया कि फुटबॉल खेलते वक्त कुक्कू के पैर में चोट लग गयी है।
मैंने इसका जिक्र अपने समाचार संपादक जी से किया। उन्होंने तुरंत घर जाने
को कहा। घर आया। कुक्कू को डॉक्टर के पास ले गया। उन्होंने कहा कि पहली नजर
में यह मोच लग रही है। फिलहाल दवा दे रहा हूं। तब तक दीदी-जीजाजी और कुणाल
भी आ चुके थे। सबने कहा, परेशान मत होओ। हालांकि पैर में सूजन बढ़ रही थी।
इसी दौरान ऑफिस से मीनाक्षी मैडम का भी फोन आ गया। वह छुट्टी पर थीं,
लेकिन एक चाभी के चक्कर में उन्हें आना पड़ा था। उन्होंने भी पूरा मॉरल
सपोर्ट दिया और कहा कि ऑफिस आने की स्थिति न हो तो आप रहने दो, मैं रुक
जाती हूं। मैंने बताया कि स्थिति नियंत्रण में है और बस मैं पहुंच ही रहा
हूं। मैं फिर ऑफस आ गया। अगले दिन लखनऊ बड़े भाई साहब और भाभी जी को भी चोट
के बारे में पता चला। उन्होंने एक घरेलू नुस्खा बताया। चूने और शहद को
मिलाकर चोट वाली जगह लगायें और उसे पट्टी से बांध दें। वाकई यह बहुत कारगर
सिद्ध हुआ। कुक्कू दो दिन के इस उपचार से ठीक हो गया। दीदी-जीजाजी से अब
फोन पर बातें हो रही हैं। लग रहा है फोन पर ही तो हो रही थीं, क्या वे वाकई
आये थे। हां आये तो थे। तभी तो इतना कुछ लिख डाला है।
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और ये मैं हूं, पर शिमला में नहीं। |
Sunday, November 25, 2018
अपनेपन के साझीदार, मकान मालिक और किरायेदार
मिस्टर भाटिया पूरे तीन साल बाद आज अपने फ्लैट पर आये हैं। उनका फ्लैट
दिल्ली के द्वारका सेक्टर 15 में है। भाटिया साहब पहले दिल्ली में ही जॉब करते थे,
लेकिन पांच साल से बेंगलुरू में हैं। उनका जब ट्रांसफर हुआ तो पहले एक साल अकेले बेंगलुरू
में रहे, फिर बच्चों को भी ले गये। इधर, फ्लैट भुवनेश कुमार नामक व्यक्ति को किराये
पर दे गये। शुरू में छह-छह माह के अंतराल में आते रहे, लेकिन फिर आना-जाना कम होता
गया। भुवनेश ऑन लाइन किराया भाटियाजी के अकांउट में डाल देते हैं। समय पर बिजली का
बिल भी भर देते है। उधर, भाटिया जी स्वयं किराये के मकान में रह रहे हैं। उनके मकान
मालिक इन दिनों हैदराबाद में रहते है। आज भाटिया जी दिल्ली के अपने फ्लैट में इसलिए
आये हैं कि भुवनेश जी अब उनका मकान खाली कर रहे हैं। भुवनेश को अब मेरठ शिफ्ट होना
है। भाटिया जी बेहद भावुक हैं। भुवनेश से कभी कोई दिक्कत नहीं हुई, बल्कि उन्होंने
एक नये रिश्ते के बारे में नयी सीख दी। यह रिश्ता है मकान मालिक और किरायेदार का। अक्सर
इस रिश्ते को एक दूसरे की शिकायत के तौर पर ही देखा जाता है, लेकिन अगर कोशिश की जाये
तो इस रिश्ते से उपजता है विश्वास, अपनापन। तभी तो आज भाटिया जी भुवनेश से कह रहे हैं,
आपको कभी भी दिल्ली आना हो तो आप बता देना। यह घर पहले आप का है। जाहिर है दोनों परिवारों
के बीच एक नया रिश्ता बन गया है जो मकान मालिक और किरायेदार से इतर हैं। यह अलग बात
है है कि इस रिश्ते की पहचान मकान-मालिक और किरायेदार से ही है। जाहिर है भुवनेश जब
भी इस संबंध में चर्चा करेंगे तो यही कहेंगे कि भाटिया जी हमारे मकान मालिक थे। या
भाटिया जी कहेंगे भुवनेश जी हमारे किरायेदार थे। उधर, बेंगलुरू में जिस मकान में भाटिया
साहब गये हैं, वह डुपलेक्स है। पूरा मकान भाटिया जी के हवाले ही है। कभी कबार उनके
मकान मालिक आते हैं तो वहीं रहते हैं। उन्होंने एक कमरा अपने लिए अलग रखा है। वह आने
से पहले बता देते हैं। भाटिया जी उसमें साफ-सफाई करा देते हैं। आज हमारे-आपके बीच में
अनेक लोग ऐसे मिल जाते हैं जो एक ही घर में कई सालों से रह रहे होते हैं। कभी-कभी तो
यह भ्रम होता है कि वह किराये में रह रहे हैं या फिर वही मकान मालिक हैं। जाहिर है
उनके संबंध अच्छे हैं। एक-दूसरे का खयाल रख रहे हैं। कहा जाता है कि किरायेदार जब अपना
घर समझकर रहने लगे तो समस्याएं नहीं बढ़तीं, इसी तरह जब मकान मालिक किरायेदार को अपने
बराबर ही समझता है तो भी स्थिति नहीं बिगड़ती। विशेषज्ञ कहते हैं कि कई बार किरायेदारों
से आसपास के लोगों की इंटीमेसी इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वे देखते हैं कि कुछ दिन
रहने के बाद तो इन्हें चले जाना है। इसलिए भावनात्मक रिश्ता नहीं जुड़ पाता, लेकिन अगर
मामला दोनों तरफ से मिलने-जुलने और बातों के आदान-प्रदान का हो तो भावुकता बढ़ जाती
है। जिस किरायेदार को कोई मकान मालिक आर्थिक रूप से कमजोर समझ रहा था, हो सकता है वह
उससे ज्यादा धनाड्य हो, लेकिन नौकरी के कारण किराये पर रह रहा हो। या यह भी तो हो सकता
है कि जिस किरायेदार से दूरी बनाये रखने की कोशिश हो रही हो, वह उन्हीं के मूल गांव
के आसपास का ही रहने वाला हो। असल में बात इंसानियत की होती है। समझदारी दोनों पक्षों
से आनी होती है। अपनापन हो तो वाकई यह रिश्ता भी खूबसूरत हो जाता है। मकान मालिक-किरायेदार
भी सुख-दुख के साझीदार बन जाते हैं। इतने साझीदार कि मकान मालिक के घर कोई कार्यक्रम
हो तो किरायेदार को दिये कमरे भी काम आने लगते हैं और किरायेदार को कोई फंक्शन कराना
हो तो मकान मालिक का पूरा घर खुला होता है।
नोट : यह लेख दैनिक ट्रिब्यून के रिश्ते कॉलम में छप चुका है।
Sunday, October 14, 2018
भावना का ऑपरेशन और डॉक्टर पूजा की टीम
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dr pooja |
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dr sunita |
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dr nagendra |
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dr perminder |
चलिये ये तो हुई पुरानी बात। सेक्टर 32 में दो दिन भटकने के बाद मैं एक दिन किसी काम से प्रेस क्लब गया था। रास्ते में मुझे एक साबुन लेना था जो होमियोपैथ डॉक्टर का बताया था। मुझे वहीं एक क्लीनिक दिखा। डॉ बत्रा वहां बैठे मिले। मैंने उनसे साबुन पूछा तो उन्होंने अंदर एक लड़की को आवाज दी और उसने मुझे साबुन दे दिया। मैंने डॉक्टर से पत्नी भावना के ओवेरियन सिस्ट की बात की और पूछा कि क्या होमियोपैथ में इसका उपचार है। उन्होंने दो-चार बातें पूछीं फिर कहा कि आप तुरंत ऑपरेट करा लें। उसके बाद दवा आदि की बात हो सकती है ताकि दोबारा न बने, लेकिन अभी आप ऑपरेट ही कराओ। साइज बड़ा है। उन्होंने एक डाइग्राम बनाकर भी बताया। मैं उनसे बहुत इंप्रेस हुआ और परेशान होने लगा कि किया क्या जाये। इस बीच, शाम को दफ्तर में अपने न्यूज एडिटर हरेश वशिष्ठ जी और अन्य मित्रों के साथ कैंटीन में चर्चा करने लगा। इसी दौरान किसी ने कहा कि आपके पास तो मेडिक्लेम भी है आप क्यों नहीं उसका इस्तेमाल करते। तभी हमारे अखबार में डिजाइनर सूरज ने डॉक्टर पूजा का जिक्र किया और उनका नंबर दिया। मैंने अगले दिन उनसे बात की और डॉक्टर पूजा ने फोर्टिस बुला लिया। सारी रिपोर्ट देखने के बाद उन्होंने जरूरी फारमेलिटीज करने के लिए कहा। मैंने उनके कॉरपोरेट ऑफस जाकर अपने मेडिक्लेम की बात बताई। मुझे डॉक्टर पूजा कह चुकी थीं कि शनिवार यानी 22 सितंबर को ऑपरेशन करेंगे। उस दिन मुंबई से जाने-माने डॉक्टर नागेंद्र सरदेशपांडे भी आएंगे। इसे परीक्षा की घड़ी कहें या कुछ और कि शुक्रवार दोपहर से ही चंडीगढ़ और आसपास के इलाकों में जबरदस्त बारिश होने लगी। यहां एक बात का जिक्र करना जरूरी लग रहा है कि भावना इस सबसे पहले ही प्रेमा दीदी से आने के लिए कह चुकी थी। भांजे मनोज ने भी तुरंत हामी भरी और रविवार सुबह दीदी-जीजा जी आ गये। खैर अगली सुबह यानी शनिवार को अस्पताल जाने की चिंता भी थी। इस बीच, फरीदाबाद से भास्कर ने आने के लिए कह दिया था। हालांकि मुझे लग रहा था कि वे लोग दोपहर 12 बजे से पहले शायद ही पहुंच पाएं। लेकिन मेरे लिए यह बहुत अच्छी बात रही कि वे लोग करीब आठ बजे पहुंच गये। 9 बजे हम लोग घर से निकल गये। बच्चे प्रीति के हवाले करके। ठीक दस बजे अस्पताल पहुंचे। वहां कुछ फॉरमलटीज पूरी कर भावना को ऑपरेशन थियेटर में भेज दिया। करीब 12 बजे तक नंबर न आने पर भावना से बातचीत करने पहुंचा। उसे सांत्वना दी। दोपहर दो बजे डॉक्टर पूजा से फोन पर बात की। इस बीच, ऑफिस से कई लोगों के फोन आ रहे थे। डॉक्टर पूजा ने फोन उठाते ही कहा कि अगला नंबर भावना का ही है। तीन बजे करीब भावना का ऑपरेशन शुरू हुआ। साढ़े पांच बजे करीब मुझे ओटी में बुलाया गया और ऑपरेट कर निकाले गये सिस्ट को दिखाया। मैं दंग रह गया। साइज में वाकई बहुत बड़ा दिख रहा था। वहां मौजूद नर्स ने बताया कि इसे बायोप्सी के लिए भेजा जाएगा, रिपोर्ट एक हफ्ते में आएगी। करीब 6 बजे भावना को शेयरिंग वाले रूम नंबर 134 में शिफ्ट कर दिया गया। पूरे दिन मेरे साथ भास्कर रहा और बातचीत होती रही। इस दौरान पूरे परिवार वालों के फोन आते रहे। भावना अर्ध बेहोशी की हालत में थी। मैं उसके सूखे होंठों पर रुई से पानी लगा रहा था। पानी पिलाने के लिए मना किया गया था। रात में करीब 11 बजे डॉ पूजा उनकी टीम और डॉ नागेंद्र आये। मैंने डॉक्टर नागेंद्र साहब से कहा कि उनका बड़ा नाम सुना है। उस समय उनसे मिलकर वाकई अच्छा लगा। बेहद हम्बल। हंसमुख। डॉक्टर पूजा की टीम वहां पर मौजूद थी। इससे पहले भी उनकी टीम की डॉक्टर परमिंदर कौर, डॉक्टर सुनीता से बातचीत हो चुकी थी। मुझे पता चला कि ये लोग सुबह से पेशेंट को देखने ऑपरेशन करने में व्यस्त थे, रात 11 बजे फिर राउंड पर आये हैं। पड़ोस में ही भर्ती महिला के हसबैंड कुट्टी साहब ने भी बताया कि ये टीम बहुत अच्छी है। आश्चर्यजनक तो तब लगा जब अगली सुबह करीब 9 बजे फिर से डॉक्टरों की टीम मरीजों को देखने वार्ड में पहुंच गयी। इस दौरान भावना को कुछ-कुछ दिक्कत हो रही थी यूरिन पास करने में। डॉक्टरों ने पहले ड्रेन फिर कैथेटर लगा दिया। यह दिक्कत बाद में भी बनी रही। मैंने इस दौरान दिल्ली के जीबी पंत के एक डॉक्टर से बात कर ली उन्होंने मुझे डरा दिया कि हो सकता है कि ऑपरेशन में कुछ गड़बड़ी हो गयी हो। डॉक्टर वीडियो देखकर ही बता सकते हैं। मैं घबरा गया। हालांकि डॉक्टर मुझे पूरी तरह से आश्वस्त कर चुके थे। मैं शुक्रगुजार हूं डॉक्टर पूजा का डॉक्टर सुनीता का और उनकी टीम का जिन्होंने आधी रात, अलसुबह और हर वक्त मुझे समझाया और मेरी आशंका निर्मूल साबित हुई। डॉ पूजा खुद भावना के साथ वाशरूम में गयीं। मेडिकली ट्रीटमेंट के अलावा मैंटली भी सपोर्ट किया और डॉक्टर सुनीता ने भी नर्सिंग स्टॉफ से खास ध्यान रखने की हिदायत दी। डॉ पूजा आईवीएफ की विशेषज्ञ हैं। भावना के बहाने उनसे मिलना अच्छा रहा। बाद में जब मेरा बिल भी अस्पताल ने कुछ ज्यादा बढ़ा दिया तो डॉक्टर ने अपनी विजिटिंग फीस तक माफ करने के लिए अस्पताल स्टाफ से कह दिया। वह तो अजीब बात है कि उनकी फीस जोड़ी ही नहीं गयी थी। अस्पताल के कॉरपोरेट वाले पार्ट को छोड़ दें तो कुल मिलाकर मेरा अनुभव अच्छा रहा। भावना अब स्वास्थ्य लाभ ले रही है। उम्मीद है जल्दी ही वह पहले की तरह फिट हो जाएंगी। जैसा कि डॉक्टर पूजा ने शुरू में मुझे तब टोका था जब मैंने उनसे कहा कि भावना हमारे परिवार में सबसे फिट थी, उन्होंने कहा, ‘फिट थी नहीं बोलो, फिट हैं।’ डॉक्टरों की इस टीम को साधुवाद।
Saturday, September 15, 2018
इतने हुए करीब कि दूर हो गये
केवल तिवारी
मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार।
सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान।
मशहूर शायर निदा फाजली साहब की ये चार पंक्तियां बेशक बेहद आसान शब्दों में लिखी हुई गंभीर बातें हैं, लेकिन आज की पीढ़ी को शायद ही इतनी आसानी से समझ में आयें। सवाल उठ सकता है, तार क्या होता है? डाकिये का थैला जादू भरा कैसे हो सकता है। आज समय बदल गया है। तार व्यवस्था बंद हो चुकी है। चिट्ठियां सिमट चुकी हैं। बदलाव तो सृष्टि का नियम है और वह होकर रहेगा, लेकिन बदलाव के साथ भावनाओं का मरना, अपनेपन का खत्म होना, बेहद घातक है। आज व्हाट्सएप पर भावुक संदेशों की भरमार है। एक से बढ़कर एक वीडियो शेयर हो रहे हैं। अपनों से लाइव वीडियो चैटिंग हो रही है। लेकिन जिस स्पीड से चीजें बदली हैं, उसी स्पीड से अपनेपन में भी कमी आ रही है। दो मिनट पहले कूल रहने का मैसेज भेजने वाला ही मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। इसका असली कारण ही यही है कि उपभोक्तावाद और बाजारवाद के हावी होने के कारण ‘इमोशन’ तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक से बढ़कर एक महान मैसेज सर्कुलेट होने के बावजूद उसका दस प्रतिशत भी सही दिशा में नहीं जा रहा है।
या उस पर अमल नहीं हो रहा है। असल में जो संदेश इधर से उधर तैर रहे हैं, वे मौलिक न
हीं
हैं। उनकी सहज रचनात्मकता नहीं है। जो सहज नहीं, वह सरल कैसे हो सकता है।
सब ‘कट पेस्ट’ है। इसी ‘कट-पेस्ट’ ने सब गड़बड़ कर दिया है। गौर से देखें तो
भावुक मैसेज का अपना बड़ा बाजार है।
मैसेज बनाये जाते हैं, सर्कुलेट किये जाते हैं। क्षणिक तौर पर ‘दिल को छूने वाले संदेशों’ को अन्य लोगों को जारी कर दिया जाता है, लेकिन जल्दी ही भुला भी दिया जाता है।
पहुंचते ही चिट्ठी भेज देना
आप-हम कई लोग उस दौर के गवाह हैं जब घर से बाहर निकलते थे तो माता-पिता या घर के अन्य
बड़े-बुजुर्ग कहते थे, ‘पहुंचते ही चिट्ठी भेज देना।’ कहीं पहुंचना, वहां
जाकर अंतर्देशीय पत्र, पोस्टकार्ड या लिफाफे के जरिये चिट्ठी भेजना और
घरवालों तक एक हफ्ते में पहुंचने की सूचना मिलना। क्या आज के दौर में कोई
इसकी कल्पना कर सकता है कि कहीं पहुंचने की सूचना हफ्ते भर बाद मिलेगी। यही
नहीं, उस वक्त पत्र की शैली भी खास होती थी। पहले बड़ों को प्रणाम, छोटों
को आशीर्वाद फिर कुशल क्षेम, वगैरह-वगैरह। आज के एसएमएस या व्हाट्सएप
संदेशों से एकदम अलग। आज समय बदला है। अब घर से निकलते ही बात शुरू हो जाती
है। बस, ट्रेन में बैठ गये। सीट ठीक से मिल गयी। खाना खा लिया। कहां
पहुंचे। क्या कर रहे हो, वीडियो कॉल करो। आदि…आदि।
तार और घबराहट
एक समय तार आने का मतलब होता
था
कोई बुरी खबर। कई बार तो ऐसे भी किस्से सुनने को मिलते थे कि अंग्रेजी में
लिखे तार का मजमून डाकिया भी नहीं समझ पाया और गांव के तमाम लोगों से
पूछने के बाद ही संबंधित व्यक्ति तक तार पहुंचाने की हिम्मत जुटा पाया।
बेशक आज तार या टेलीग्राम बंद हो चुका है, लेकिन तार आने के पुराने किस्से
लोग अब भी सुनाते हैं।
फिल्मों में खूब छाया डाकिया
संचार का सशक्त माध्यम चिट्ठी होने से एक जमाने में डाकिया बेहद अहम भूमिका में होते थे। उनके साथ एक अलग रिश्ता होता था। कभी चिट्ठी लिखवाने और कभी पढ़वाने में उसकी मदद ली जाती। मनी ऑर्डर आने पर तो मिठाई भी खिलाई जाती। डाकिये के अहम रोल को देखते हुए ही शायद उस दौर में कई फिल्में बनीं जिनमें डाकिये की भूमिका को दर्शाया गया। कई गीत तो हिट हुए, मसलन-खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू, डाकिया डाक लाया, लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में, चिट्ठी आयी है, आयी है चिट्ठी आयी है। लाया डाक बाबू लाया रे संदेशवा मोरे पिया जी को भाये ना विदेशवा वगैरह-वगैरह।
चिट्ठी के इंतजार से वीडियो कॉल तक
एक दौर था जब चिट्ठी का इंतजार होता था। रोज डाकिये से पूछा जाता था। अब समय बदल गया और लाइव बात होती है, वीडियो कॉल के जरिये। अलग-अलग एप में अलग-अलग फीचर। आप कहीं भी हैं अपने करीबी के साथ लाइव वीडियो कॉलिंग या चैटिंग से बात कर सकते हैं।
तकनीकी तरक्की जबरदस्त है, लेकिन कभी इंटरनेट कनेक्शन हट जाने और कभी बीच-बीच में बातचीत के ब्रेक हो जाने से तनाव ही बढ़ता है। फिर इस चैटिंग को आप चिट्ठी की तरह लंबे समय तक संभालकर भी नहीं रख सकते।
क्या है संचार माध्यम और सूचना क्रांति
एक-दूसरे तक जानकारी पहुंचाना ही संचार माध्यम है। संचार माध्यम अंग्रेजी के ‘मीडिया’ (मीडियम का बहुवचन) है। इसका तात्पर्य होता है दो बिंदुओं को जोड़ने वाला। यानी संचार माध्यम के जरिये ही सूचना देने वाला और लेने वाला आपस में जुड़ता है। संचार को अंग्रेजी में कम्युनिकेशन कहा जाता है। कम्युनिकेशन लैटिन शब्द कम्युनिस से बना है। इसका अर्थ है सामान्य भागीदारी युक्त सूचना। जानकारों के मुताबिक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया ही संचार है। इसका रूप अलग-अलग रहा है। भारत में संचार सिद्धान्त काव्य परपंरा से जुड़ा है। अलग-अलग दौर में इसका रूप बदलता चला गया।
आधुनिक तकनीक में नहीं बनता कोई रिश्ता
एक समय था जब आप कहीं जाते थे, पता पूछते थे। धीरे-धीरे पता पूछने वाली यह स्थिति भी अब बदल रही है। अब या तो जीपीएस है या फिर गूगल मैप। आप पैदल जा रहे हों या फिर अपने वाहन से। जीपीएस आपको ले जा रहा है, सबसे छोटे रास्ते से। कभी-कभार आप लैंड मार्क पूछने के बजाय संबंधित व्यक्ति से ही लोकेशन का लिंक मंगा लेते हैं।
असल में आज अगर आप किसी से पता पूछते हैं तो पहली बात तो किसी को यह बताने की फुर्सत ही नहीं, रही-सही कसर नयी तकनीक ने पूरी कर दी। पूछना-बताना और दो अनजानों के बीच विश्वास कायम होना अब धीरे-धीरे बीते दिनों की बात होने लगी है।
बदलते गये गीत-संगीत और फिल्मी साधन
समय के साथ-साथ तकनीक बदली और बदले साधन। याद कीजिए ग्रामोफोन का वह दौर। उसके बाद रेडियो फिर टैप रिकॉर्डर। आज आप तमाम दुकानों में बैठे युवाओं से कैसेट के बारे में पूछकर देखिये, शायद ही कोई जानता होगा इनके बारे में, जबकि हकीकत है कि कैसेट का प्रचलन हाल ही में खत्म हुआ है। अनेक लोग होंगे जिनके पास तो अब भी कैसेट का भंडार होगा।
कैसेट की जगह पेन ड्राइव ने ले ली। अब तो व्हाट्सएप पर छोटे से क्लिप में हजारों गाने आपके पास मौजूद रहते हैं। रिकॉर्ड करने के लिए मोबाइल से लेकर विशेष रिकॉर्डर तक उपलब्ध हैं। जहां तक रेडियो की बात है वह फ्रीक्वेंसी मीटर्स (एफएम) के जरिये सजीव है। गीत-संगीत के अलावा आज भी रेडियो के कई कार्यक्रम हिट हो रहे हैं, हालांकि स्थिति तब जैसी नहीं है जब हम हवा महल का इंतजार करते थे, नाटकों को सुनते थे और संगीत माला के उस दौर को आज भी याद करते हैं। मनोरंजन के साधनों में एक दौर तब भी आया जब फिल्में देखने के लिए वीसीआर और कलर टेलीविजन किराये पर लिये जाते थे। आज हर घर में कलर टीवी है और सारा जहां आपके पास है। रिमोट लीजिये और अपनी पसंद के हिसाब से चैनल लगाइये। यही नहीं आपके मोबाइल में ही अब पूरी दुनिया है। बदलती तकनीक और बदलते समय में अभी संचार के माध्यम और कितने सशक्त बनेंगे यह देखने वाली बात है।
मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार।
सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान।
मशहूर शायर निदा फाजली साहब की ये चार पंक्तियां बेशक बेहद आसान शब्दों में लिखी हुई गंभीर बातें हैं, लेकिन आज की पीढ़ी को शायद ही इतनी आसानी से समझ में आयें। सवाल उठ सकता है, तार क्या होता है? डाकिये का थैला जादू भरा कैसे हो सकता है। आज समय बदल गया है। तार व्यवस्था बंद हो चुकी है। चिट्ठियां सिमट चुकी हैं। बदलाव तो सृष्टि का नियम है और वह होकर रहेगा, लेकिन बदलाव के साथ भावनाओं का मरना, अपनेपन का खत्म होना, बेहद घातक है। आज व्हाट्सएप पर भावुक संदेशों की भरमार है। एक से बढ़कर एक वीडियो शेयर हो रहे हैं। अपनों से लाइव वीडियो चैटिंग हो रही है। लेकिन जिस स्पीड से चीजें बदली हैं, उसी स्पीड से अपनेपन में भी कमी आ रही है। दो मिनट पहले कूल रहने का मैसेज भेजने वाला ही मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। इसका असली कारण ही यही है कि उपभोक्तावाद और बाजारवाद के हावी होने के कारण ‘इमोशन’ तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक से बढ़कर एक महान मैसेज सर्कुलेट होने के बावजूद उसका दस प्रतिशत भी सही दिशा में नहीं जा रहा है।
या उस पर अमल नहीं हो रहा है। असल में जो संदेश इधर से उधर तैर रहे हैं, वे मौलिक न

मैसेज बनाये जाते हैं, सर्कुलेट किये जाते हैं। क्षणिक तौर पर ‘दिल को छूने वाले संदेशों’ को अन्य लोगों को जारी कर दिया जाता है, लेकिन जल्दी ही भुला भी दिया जाता है।
पहुंचते ही चिट्ठी भेज देना
आप-हम कई लोग उस दौर के गवाह हैं जब घर से बाहर निकलते थे तो माता-पिता या घर के अन्य

तार और घबराहट
एक समय तार आने का मतलब होता

फिल्मों में खूब छाया डाकिया
संचार का सशक्त माध्यम चिट्ठी होने से एक जमाने में डाकिया बेहद अहम भूमिका में होते थे। उनके साथ एक अलग रिश्ता होता था। कभी चिट्ठी लिखवाने और कभी पढ़वाने में उसकी मदद ली जाती। मनी ऑर्डर आने पर तो मिठाई भी खिलाई जाती। डाकिये के अहम रोल को देखते हुए ही शायद उस दौर में कई फिल्में बनीं जिनमें डाकिये की भूमिका को दर्शाया गया। कई गीत तो हिट हुए, मसलन-खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू, डाकिया डाक लाया, लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में, चिट्ठी आयी है, आयी है चिट्ठी आयी है। लाया डाक बाबू लाया रे संदेशवा मोरे पिया जी को भाये ना विदेशवा वगैरह-वगैरह।

एक दौर था जब चिट्ठी का इंतजार होता था। रोज डाकिये से पूछा जाता था। अब समय बदल गया और लाइव बात होती है, वीडियो कॉल के जरिये। अलग-अलग एप में अलग-अलग फीचर। आप कहीं भी हैं अपने करीबी के साथ लाइव वीडियो कॉलिंग या चैटिंग से बात कर सकते हैं।
तकनीकी तरक्की जबरदस्त है, लेकिन कभी इंटरनेट कनेक्शन हट जाने और कभी बीच-बीच में बातचीत के ब्रेक हो जाने से तनाव ही बढ़ता है। फिर इस चैटिंग को आप चिट्ठी की तरह लंबे समय तक संभालकर भी नहीं रख सकते।
क्या है संचार माध्यम और सूचना क्रांति
एक-दूसरे तक जानकारी पहुंचाना ही संचार माध्यम है। संचार माध्यम अंग्रेजी के ‘मीडिया’ (मीडियम का बहुवचन) है। इसका तात्पर्य होता है दो बिंदुओं को जोड़ने वाला। यानी संचार माध्यम के जरिये ही सूचना देने वाला और लेने वाला आपस में जुड़ता है। संचार को अंग्रेजी में कम्युनिकेशन कहा जाता है। कम्युनिकेशन लैटिन शब्द कम्युनिस से बना है। इसका अर्थ है सामान्य भागीदारी युक्त सूचना। जानकारों के मुताबिक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया ही संचार है। इसका रूप अलग-अलग रहा है। भारत में संचार सिद्धान्त काव्य परपंरा से जुड़ा है। अलग-अलग दौर में इसका रूप बदलता चला गया।
आधुनिक तकनीक में नहीं बनता कोई रिश्ता
एक समय था जब आप कहीं जाते थे, पता पूछते थे। धीरे-धीरे पता पूछने वाली यह स्थिति भी अब बदल रही है। अब या तो जीपीएस है या फिर गूगल मैप। आप पैदल जा रहे हों या फिर अपने वाहन से। जीपीएस आपको ले जा रहा है, सबसे छोटे रास्ते से। कभी-कभार आप लैंड मार्क पूछने के बजाय संबंधित व्यक्ति से ही लोकेशन का लिंक मंगा लेते हैं।
असल में आज अगर आप किसी से पता पूछते हैं तो पहली बात तो किसी को यह बताने की फुर्सत ही नहीं, रही-सही कसर नयी तकनीक ने पूरी कर दी। पूछना-बताना और दो अनजानों के बीच विश्वास कायम होना अब धीरे-धीरे बीते दिनों की बात होने लगी है।

समय के साथ-साथ तकनीक बदली और बदले साधन। याद कीजिए ग्रामोफोन का वह दौर। उसके बाद रेडियो फिर टैप रिकॉर्डर। आज आप तमाम दुकानों में बैठे युवाओं से कैसेट के बारे में पूछकर देखिये, शायद ही कोई जानता होगा इनके बारे में, जबकि हकीकत है कि कैसेट का प्रचलन हाल ही में खत्म हुआ है। अनेक लोग होंगे जिनके पास तो अब भी कैसेट का भंडार होगा।
कैसेट की जगह पेन ड्राइव ने ले ली। अब तो व्हाट्सएप पर छोटे से क्लिप में हजारों गाने आपके पास मौजूद रहते हैं। रिकॉर्ड करने के लिए मोबाइल से लेकर विशेष रिकॉर्डर तक उपलब्ध हैं। जहां तक रेडियो की बात है वह फ्रीक्वेंसी मीटर्स (एफएम) के जरिये सजीव है। गीत-संगीत के अलावा आज भी रेडियो के कई कार्यक्रम हिट हो रहे हैं, हालांकि स्थिति तब जैसी नहीं है जब हम हवा महल का इंतजार करते थे, नाटकों को सुनते थे और संगीत माला के उस दौर को आज भी याद करते हैं। मनोरंजन के साधनों में एक दौर तब भी आया जब फिल्में देखने के लिए वीसीआर और कलर टेलीविजन किराये पर लिये जाते थे। आज हर घर में कलर टीवी है और सारा जहां आपके पास है। रिमोट लीजिये और अपनी पसंद के हिसाब से चैनल लगाइये। यही नहीं आपके मोबाइल में ही अब पूरी दुनिया है। बदलती तकनीक और बदलते समय में अभी संचार के माध्यम और कितने सशक्त बनेंगे यह देखने वाली बात है।
यह लेख दैनिक ट्रिब्यून के लहरें सप्लीमेंट की कवर स्टोरी के तौर पर छप चुका है।
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