केवल तिवारी
संस्कारों की खास महत्ता, बूटा-बूटा, पत्ता-पत्ता।
कण-कण में भगवान हमारे, नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे।
ऋत्विक का जनेऊ संस्कार, साथ मिला पूरा परिवार।
डगर जब चली उधर, अपने गांव में पग आए धर।
प्रिय भानजी रुचि और दामाद दीपेश का बहुत पहले फोन आ गया था कि बेटे रिशू (ऋत्विक) का जनेऊ यानी यज्ञोपवीत संस्कर है। मुख्य आयोजन 22 और 23 जनवरी को। बता दें कि उत्तराखंड में यज्ञोपवीत संस्कार भी वैवाहिक कार्यक्रम की तरह होता है। मैंने तैयारी कर ली। पत्नी भावना साथ जा नहीं सकती थी क्योंकि छोटे बेटे धवल के प्री बोर्ड चल रहे हैं। सब लोगों से मिलने का लालच और जब हल्द्वानी तक गए ही हैं तो क्यों न एक थोड़ी देर के लिए गांव भी हो लिया जाए। थोड़ी-बहुत पूजा-पाठ हो जाएगी और कुछ मिलना-जुलना। साथ में जन्मभूमि को प्रणाम। हालांकि बहुत शॉर्ट कार्यक्रम था, लेकिन रहा शानदार।
जरूरी हैं ऐसे आयोजन : मेरा मानना है कि हो सके तो ऐसे आयोजन कर लेने चाहिए। भव्यता या नव्यता अलग बात है, लेकिन परंपरागत गीत-संगीत, अपनों से मेल-मिलाप और नयी पीढ़ी के साथ पुरानी का संयोजन। हालांकि आजकल बच्चों की परीक्षाओं, नौकरी संबंधी कई दिक्कतों के चलते उन्हें शामिल करना मुश्किल भी हो रहा है, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये उनको जोड़ लेना चाहिए।
दीपेश-रुचि और उनका परिवार : दीपेश-रुचि को सैल्यूट है कि वह हर एक चीज का ध्यान रख रहे थे, मसलन- कब लोगों को चाय पूछना है, कब नवआगंतुक से हालचाल लेना है और कब विदाई के समय कुछ देना है। इस दौरान अस्वस्थ उनकी माताजी। बेशक शरीर से वह अस्वस्थ हैं, लेकिन मन से पूरी ऊर्जा है। हर आने-जाने वाले से ऐसे मिल रहीं थीं कि अगर सिर्फ बातचीत सुनी जाये यानी वीडियो रूप में न हो और सिर्फ ऑडियो हो तो लगे कि चलते-चलते दो लोग बात कर रहे हैं। इस सबसे इतर बटुक यानी रिशू के ताऊ-ताई सुबोध और तृप्ति का काम निभाना और मौका निकालकर नाच-गाने में शामिल हो जाना। दोनों ने समां बांध दिया। इस सबके बीच नन्हे ओम की नटखट शरारत दिल को छू लेती। कुछ फोटो और वीडियो साझा करूंगा, देखिएगा-सुनिएगा।
दीदीयों का जन्मदिन : इत्तेफाक रहा कि 22 तारीख को विमला दीदी का जन्मदिन था। कुछ ही दिन पहले शीला दीदी का था और दो दिन बाद प्रेमा दीदी का है। हम सबने मिलकर तीनों दीदीयों का जन्मदिन मनाया। सबसे बड़ी दीदी यानी रुचि की मम्मी सितारों के उस पार से हमें देख रही थी और आशीर्वाद दे रही थी। साथ थे हम सबके प्यारे दद्दू यानी दीपेश के पापा। हमने महसूस किया उनके आशीर्वाद को।
... और गांव की यात्रा : मेरा अपने गांव रानीखेत के पास डढूली में जाना लंबे समय से टल रहा था। एक बार लखनऊ दाज्यू लोगों से बात की, लेकिन समय का संयोजन हो न सका। इस बार मैंने ठान ली कि चलना है। मेरे जेठू यानी भावना के बीच वाले भाई साहब ने पूरा साथ दिया। उनकी कार से हम तीनों (साथ में मनोज पंडित जी) गांव होकर आये। लगा जैसे छूकर छूमंतर हुए। पहले अपने पुश्तैनी मकान पर गये। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुके घर की देहरी पर शीश नवाया। फिर आसपास विरादरों से मिले। वसंतदा घर पर नहीं थे, भाभी जी मिलीं। पनदा के यहां भाभी ने चाय बनायी। बाद में गोलथान में धूप बत्ती की। रोली, चंदन, अक्षत और फूल भाभी ने दे दिए। फिर गांव के लोगों से मिलते हुए पहुंचे धूनी यानी बंबईनाथ स्वामी के दर पर। यहां भी कुछ समय पूजा-अर्चना के बाद वापस आ गए।
वह 103 साल की चाची : तल बाखई नरदा की ईजा से हमेशा सबसे पहले मिलन होता है। हम उन्हें चाची कहते हैं। चाची अंदाजन 103 साल की हो गयी हैं। बताती हैं कि उन्होंने मेरी ईजा की भी शादी देखी है। उनके कान और आंख के साथ पाचन शक्ति भी सही है। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें।
कई यादों को सहेजे यह यात्रा भी सुखद रही। इन सबके बीच, काठगोदाम थोड़ी देर के लिए जाना, नेहा के हाथों चाय पीना, निर्माणाधीन घर को देखना, पहली रात उस घर से संबंधित लवली भाभी और सिद्धू के प्रयास से बने बेहतरीन और भावुक वीडियो देखना, सुरेश पांडेय जी और हेमंत पांडे एवं परिवार से मिलना वगैरह वगैरह यादें भी हैं। इस सफर की बातें तो बहुत सी हैं, लेकिन उन्हें कहानीनुमा अंदाज में अगले ब्लॉग में। कुछ फोटो और वीडियो।











2 comments:
बधाई
शानदार यात्रा, बेहतरीन विवरण
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