केवल तिवारी
Thursday, April 13, 2023
सावधानी जरूरी, पर ऐसा भी होता है तो मान लेने में क्या हर्ज OTP my airtel और पांच हजार रुपये
Wednesday, April 5, 2023
धवल की नयी किताबें और ईजा की याद
केवल तिवारी
स्कूली सफर, किताबों की दुनिया, सपनों का
धवल संसार
भावना का उमड़-घुमड़, थोड़ी चपलता, ढेर सारा प्यार।
क्लास बदली, डगर बढ़े, सपनों का ऊंचा हुआ आकाश
कुछ यादें आईं, कुछ बातें बनाईं जीवन पथ का सारांश।
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| नयी किताबों में मशगूल धवल |
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| नयी किताबों संग कक्षा आठ में धवल |
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| अपनी मम्मी के साथ जिल्द चढ़ाने में व्यस्त |
हर साल मार्च के अंत में बच्चों की नयी किताबें आती हैं। नोट बुक्स खरीदे जाते हैं। इस बार भी मार्च आया। इस बार ऐसा मार्च धवल का ही रहा। कार्तिक तो हॉस्टल में है और पिछले दो सालों से उसकी पढ़ाई की डगर अलग है, कॉपी किताबों का वह खुद ही खेवनहार है (@IIT ROPAR)। खैर पहले धवल का रिजल्ट आया फिर किताबें। हर बार की तरह इस बार भी मुझे ईजा की याद आई। यूं तो मेरे जीवन में भी ऐसे अवसर कम से कम 12 बार तो आए ही होंगे। यानी पहली से 12वीं कक्षा तक, लेकिन मुझे याद आता है चौथी क्लास का ही वह मंजर जब ईजा करीब 10 किलोमीटर पहाड़ी चढ़ाई पार कर किसी के घर गयीं। उनसे सेकेंड हैंड किताबें देने की अनुनय विनय की। यह भी कहा कि आधी कीमत दे देंगे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। ईजा को खाली हाथ देखकर मैं उदास हो गया। हमारी मां बहुत गंभीर थी। भावनाओं का उमड़-घुमड़ उसके मन में खूब था, लेकिन बाहर से सख्त लगती थी। शायद हालात ने ऐसा बना दिया होगा। रोते हुए मैंने उसे बहुत कम देखा। कभी-कभी देखा भी तो चुपचाप सिसकते हुए। खैर मेरी हालत देखकर उसने ढांढस बंधाया और अगले दिन फिर उसी व्यक्ति के घर गयी। इस बार वह व्यक्ति पसीज गए और उन्होंने किताबें दे दी। मुझे शौक था कि जैसे ही किताब आएगी मैं वह कविता पढूंगा जिसके शब्द थे, ‘उठो लाल अब आंखें खोलो, पानी लाई हूं मुंह धो लो।’ बच्चों को यह किस्सा कई बार सुना चुका हूं, लेकिन मेरे मन में इस किस्से की याद है।
किस्से अपने-अपने
जब मैं यह बात बच्चों को बताता हूं तो पत्नी भावना भी कहती है कि उनके लिए कंट्रोल से थोक में कॉपियां आती थीं। वे लोग भी जिल्द चढ़ाने में एक उत्सव जैसे माहौल को जीते थे। धवल ने इस बार भी कुछ सवाल अपनी मां से पूछे। एक दिन बातों बातों में बच्चों ने पूछ ही लिया कि बचपन की बातें बताओ, इसकी चर्चा अगले किसी ब्लॉग में फिलहाल कुछ शेर ओ शायरी के जरिये इन्हीं भावनाओं की बातें पेश हैं-
मां के संबंध में :
आप के बा'द हर घड़ी हम ने, आप के साथ ही गुज़ारी है
सब की यादों को लेकर-
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं, सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी।
इतनी सारी यादों के होते भी जब दिल में, वीरानी होती है तो हैरानी होती है।
Wednesday, March 29, 2023
भाजपा, बसपा, और सपा तो फिर आपा क्यों नहीं
केवल तिवारी
पिछले दिनों एक यात्रा के दौरान एक सज्जन ने राजनीतिक बहस छेड़ दी। हालांकि राजनीति पर बहस मुझे ज्यादा सुहाती नहीं, सिवा किसी खबर के संबंध में चर्चा के। लेकिन वह व्यक्ति कई लोगों से मुखातिब था, उनमें से मैं भी एक था। रोचक यह था कि उसकी चर्चा किसी की जीत हार को लेकर नहीं थी या पक्ष-विपक्ष पर भी नहीं। उसकी चर्चा थी आम आदमी पार्टी (आप) के नाम को लेकर। वह बोले, 'आप अखबार वाले (इशारा मेरी ओर था) जब भारतीय जनता पार्टी को भाजपा, बहुजन समाज पार्टी को बसपा और समाजवादी पार्टी को सपा लिखते हैं तो आम आदमी पार्टी को आप क्यों लिखते हैं, आपा क्यों नहीं।' मुझे उसकी बात में कुछ दम तो लगा, फिर मैंने कहा कि कई वरिष्ठ नेता भाजपा को भी कभी-कभी भाजप कह देते हैं। वह इस तर्क को नहीं माने, बोले कहने और लिखने की बात हो रही है। तभी कुछ लोग आम आदमी पार्टी को आप ही रहने देने के पक्ष में दिखे। बोले, 'अब जब आप नाम ही चलन में आ गया है तो उस पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए।' बहस इस कदर बढ़ी कि लोग शहरों, सड़कों के नामकरण की बातों पर बोलने लगे। कुछ का कहना था कि क्या जरूरत है नाम बदलने की, कुछ बोले- अगर कोई सड़क, शहर या रेलवे स्टेशन विदेशी आक्रमणकारियों के नाम पर है तो उसमें बदलाव में हर्ज ही क्या? बहस बढ़ते-बढ़ते जोर-जोर से चिल्लाने तक में भी बढ़ गयी। तभी मैं बोला, मुद्दा भटक गया है। राजनीतिक दल के नाम पर आइये। इसी दौरान मेरे उतरने का वक्त आ गया। उतरते-उतरते एक सज्जन मुस्कुराते हुए बोले, अब आप क्या लिखेंगे। मैं बोला आप बहस पूरी कर लो, फिर देखते हैं। वैसे आप लोग क्या कहते हैं। भाजपा, बसपा, सपा की तरह आपा या आप?Thursday, March 23, 2023
क्या कुछ लोगों की खुराक ही नकारात्मकता होती है
केवल तिवारी
Monday, March 13, 2023
नाटु-नाटु की लय हो, भारतीय गीत-संगीत की जय हो
केवल तिवारी
भारतीय फिल्म जगत आज कह रहा है 'नाचो नाचो' क्योंकि हमारे गीत संगीत के साथ विश्व ने भी सुर ताल मिलाया है और कहा है, 'जय हो।' ऑस्कर में जय तो पहले ही हो चुकी है। इस बार मूल गीत के लिए 'नाटु-नाटु' का चयन हुआ तो भारतीय फिल्म उद्योग और इसके कद्रदान झूम उठे, क्योंकि इस गीत के बोल का मतलब भी तो नाचो नाचो ही है। गौर हो कि इससे पहले 'अमेरिकी ब्रिटिश प्रोडक्शन' की फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर के 'जय हो' गीत को ऑस्कर मिल चुका है। इसे संगीतबद्ध किया था, एआर रहमान ने। अब निर्देशक एसएस राजामौली की फिल्म ‘आरआरआर' के इस गीत ‘नाटु नाटु' को मिल गया ऑस्कर। इसके संगीतकार एमएम कीरावानी हैं और गीतकार चंद्रबोस। इसे आवाज काल भैरव और राहुल सिप्लीगुंज ने दी है। यह गीत अभिनेता राम चरण और जूनियर एनटीआर पर फिल्माया गया है। जितना धमाकेदार गीत-संगीत, उतना ही जोरदार नृत्य। इस सम्मान से पहले ही यह गीत बुलंदियों को छू चुका था। पुरस्कार की घोषणा से पहले ‘नाटु नाटु' के गायक काल भैरव और राहुल सिप्लीगुंज ने जोरदार प्रस्तुति दी। सोने पर सुहागा यह रहा कि समारोह में भारतीय गायकों की प्रस्तुति की घोषणा बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने की।
खूब भाया है औपनिवेशिक कथानक
कमाल देखिए, आमिर खान की फिल्म लगान भी ऑस्कर के शिखर तक पहुंचते-पहुंचते रह गई थी। उसका कथानक ब्रिटिश कालीन था और नाटु-नाटु गीत की पृष्ठभूमि भी वैसी ही है। यानी औपनिवेशिक कालीन भारत के समय की कहानी। दो दोस्त इस गीत को गाकर अंग्रेजों का दंभ तोड़ते हैं।
भाषायी विवादों से परे हैं लोकधुन
गीत का कथानक या कहानी की पृष्ठभूमि चाहे कुछ भी हो, लेकिन भारत की खूबसूरत विविधता का ही प्रतिफल है कि यहां लोकधुन छा ही जाते हैं। बात चाहे 'बुल्ला की जाणा मैं कौन', की हो या 'सुंदर-मुंदरिये हो' लोकगीत की। 'बूमरो बूमरो, शाम रंग बूमरो' हो या 'निबुड़ा निबुड़ा' गीत। 'टोकरी पीतल की ढाणी तै मंगवाई' हो या फिर वह प्रयोग जिसने तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए थे और जिसके बोल थे 'व्हाई दिस कोलावेरी डी।' आज 'नाटु-नाटु' प्रयोग भी तो सबके सिर चढ़कर बोल रहा है, मानो कह रहा हो, 'सारे विवादों से परे होकर, नाचो-नाचो।'
Thursday, February 9, 2023
छोटी सी मुलाकात में सार्थक बात
केवल तिवारी
पढ़ाई के साथ-साथ अन्य करिकुलम एक्टिविटी दरअसल बच्चों को मशीन बनाना नहीं, यह तो आज के समय में बहुत जरूरी है ताकि बच्चा आगे चलकर बहुमुखी प्रतिभा का धनी बने। अजीब स्थिति यह है कि आज सबकुछ कंप्यूटर हो गया है। अब बहुत जल्दी दौर फाइनांस का आएगा। चिंताजनक बात तो आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) को लेकर है। इस तरह के विचार पिछले दिनों लिंग्याज यूनवर्सिटी, फरीदाबाद के कुलपति एमपी गुप्ता जी ने अनौपचारिक मुलाकात में रखे। गुप्ता साहब से घर-परिवार से लेकर और भी कई बातें हुईं।
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| M P Gupta ji |
दरअसल एमपी गुप्ता जी का जिक्र कई बार हमारे पड़ोस में रहने वाले राजीव जी कर चुके थे। राजीव जी अपने समय के अव्वल इंजीनियरिंग के बाद विभिन्न विभागों में रहते हुए इस वक्त एक स्कूल के सह संचालक हैं। इसके साथ ही वह हमारे काउंसलर हैं। बच्चों को लेकर उनसे चर्चा होती रहती है और बड़े बेटे के बारे में उनका अनुमान सटीक बैठा। रविवार, 5 फरवरी 2023 को आखिरकार गुप्ताजी के मनसा देवी कांप्लेक्स स्थित आवास पर जाने का कार्यक्रम बन ही गया। हम लोग करीब साढ़े दस बजे गुप्ता जी के घर पहुंच गए। वह आंगन में बैठकर धूप का आनंद ले रहे थे। मेरे मन में थोड़ी हिचक थी कि आखिर मैं बातें क्या करूंगा। वह तो अपने समय के टॉप इंजीनियर रहे हैं। कई संस्थानों के प्रमुख रहे हैं। राजीव जी भी उनके ही फील्ड के हैं। लेकिन जब बात घर-परिवार से शुरू हुई और उनकी पोती के पुस्तक प्रेम से जुड़ते हुए आधुनिक शिक्षा प्रणाली तक पहुंची तो आनंद आया। मैंने जब पूछा कि सर बच्चों पर एक्स्ट्रा करिकुलम का जो बोझ है, वह बच्चों को मशीन सरीखा नहीं बना रहा, वह बेबाकी से बोले, ‘बिल्कुल नहीं। इससे तो उनका चहुंमुखी विस्तार हो रहा है।’ फिर उन्होंने मेरे ही फील्ड यानी पत्रकारिता की चर्चा की। उन्होंने कहा देखिए जैसे कोई संपादक हैं, उनकी नियुक्ति का बड़ा आधार यह भी होगा कि वह वित्तीय जानकारी रखते हों, विज्ञापन से संबंधित जानकारी रखते हों। खबरों और लेखों से संबंधित उनकी विशेषज्ञता तो सबसे महत्वपूर्ण है ही। इसी तरह आज बच्चे बीटेक के बाद एमबीए भी कर रहे हैं। इसका भी यही आधार है कि अपने फील्ड के साथ-साथ वे प्रबंधन के भी गुर जानें। इस दौरान अन्य बातें भी होती रहीं। चाय-बिस्किट का दौर भी चला।
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| राजीव जी का सौजन्य। गुप्ता साहब के साथ तस्वीर का मोह मैं भी नहीं छोड़ पाया। |
बातों-बातों में उन्होंने कहा कि इस वक्त सबकुछ सिमटकर कंप्यूटर पर आ गया है। साथ ही यह भी कि पहले इंजीनियरिंग, डॉक्टरी पेशा ही प्रमुख था, बाद में इसमें सीए भी जुड़ा। आज तो विस्तार बहुत है। लेकिन जल्दी ही सारा जोर फाइनांस पर होगा। आने वाला समय कंप्यूटर के साथ-साथ वित्तीय प्रबंधन का है।
अब शिक्षा व्यवस्था नैरो से ब्रॉड
अपनी बात कि पहले इंजीनियरिंग, डॉक्टरी प्रमुख पेशेवर कोर्स थे। इसके बाद सीए इसमें जुड़ा को आगे बढ़ाते हुए गुप्ताजी ने कहा पहले उच्च शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते शिक्षण क्रम बहुत संकरा हो जाता था। आज संकरे ब्रॉड हो रहा है। आप जैसे-जैसे शिक्षण में रुचि दिखाते हैं आपको विस्तार पथ दिखता रहता है।
संपादक जी से फोन पर बात
हम लोग यानी मैं राजीव जी और गुप्ता जी बातें कर ही रहे थे, दैनिक ट्रिब्यून का जिक्र हुआ। एमपी गुप्ता साहब ने कहा कि आपके यहां एक संपादक हुआ करते थे, उन्होंने एक बार मेरे साथ मंच साझा किया था। उस वक्त गुप्ता जी हरियाणा टेक्निकल एजुकेशन के डाइरेक्टर थे। जब बात और समय को याद किया गया तो मैंने गर्व से कहा कि वही व्यक्ति पुन: संपादक बनकर दैनिक ट्रिब्यून में आए हैं। साथ ही यह भी बताया कि उन्होंने अखबार में नयी जान फूंकी है। उन्होंने बात करने की इच्छा जताई। मैंने दैनिक ट्रिब्यून के संपादक नरेश कौशल जी को फोन लगाया। फिर दोनों ने कुछ देर बातें की और पुरानी यादों को शेयर किया।
धन्यवाद राजीव जी
मुलाकात बेशक छोटी सी रही हो, लेकिन रही बहुत सार्थक। इस सार्थकता के लिए राजीव जी आपका धन्यवाद। यूं तो आपको बहुत सारे धन्यवाद हैं। आगे भी जारी रहेंगे। इस खास मुलाकात के लिए विशेष धन्यवाद। जारी रहे सफर।
Sunday, February 5, 2023
चलो कि अब नयी पारी करनी है शुरू… जीजाजी की सेवानिवृत्ति और कि सबकुछ लागे नया-नया
केवल तिवारी
वो ऑफिस का कारवां, वो कारवां से हटना
वो हंसते-हंसते मिलते हुए मिलने की बातें करना
वो अपनापन, वो प्यारी बातें और कुछ पकड़ना, कुछ छूटना
वो घर पहुंचने का सिलसिला और घर पर ही रुकना
ये जीवन की परियां हैं, इन्हें यूं ही खेलते रहना
चलते-चलते फिर यूं ही बनेगा एक नया कारवां।
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| सेवानिवृत्ति नहीं सम्मान समारोह। स्मृति चिन्ह संग जीजाजी। |
तारीख : 31 जनवरी, 2023। स्थान : लखनऊ। मुख्य कार्यक्रम : जीजा जी (पूरन चंद्र जोशी) की सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति। 30 जनवरी की रात ट्रेन में बैठा और लखनऊ के लिए निकल पड़ा। बार-बार दुआ कर रहा था कि ट्रेन लेट न हो। ट्रेन की देरी को लेकर कभी दुआएं कबूल हो जाती हैं और कभी नहीं होती। कभी लगता है दूसरी तरफ के उत्साह का भी असर पड़ता है। खैर जो भी हो, ट्रेन ज्यादा लेट नहीं हुई। शीला दीदी और भानजे- सौरभ, गौरव कुणाल एवं जीजाजी के दीदी-जीजाजी इंतजार कर रहे थे। घर में सुंरदरकांड का पाठ रखा था। घर पर सुंदरकांड करीब 12:30 बजे तक चला। इस बीच तेलीबाग से भाई साहब एवं भाभीजी (भुवन चंद्र तिवारी एवं राधा तिवारी) भी पहुंच गए। मिलजुलकर आरती की और फटाफट जीजाजी के साथ निकल गया केसरबाग स्थित राजस्व परिषद यानी बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के दफ्तर के लिए। सबसे पहले सेक्शन 10 गया। इस सेक्शन से मेरा भी पुराना नाता है। बेशक अब कार्यालय नये रंग-रूप में आ चुका था, लेकिन स्थान तो वही होता है। उस परिसर को देखकर और सुबह चारबाग से मुंशी पुलिया तक के सफर में कुछ यादों में खो सा गया। कभी यूनिवर्सिटी को देखकर कुछ याद आया और अब राजस्व परिषद के इस प्रांगण को देखकर बहुत कुछ याद आया। ऑफिस में पहुंचकर कुछ देर बातें हुईं और जीजाजी के साथ अनेक सेक्शनों में उनके वरिष्ठों, कनिष्ठों, साथियों से मिलने का सिलसिला चला। इसके बाद हुई सेक्शन में सम्मानित करने के कार्यक्रम की शुरुआत। बातें हुईं। दो मिनट मुझे भी मौका मिला। मैंने बस यही कहा, ‘सरकारी सेवा से निवृत्ति एक प्रक्रिया है, लेकिन कभी भी संबंधों से निवृत्ति नहीं होनी चाहिए।’
जीजाजी इस दौरान नये सूट में अलग ही अंदाज में लग रहे थे। मैंने मजाक में कहा कि जीजाजी को बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने भरी जवानी में रिटायर्ड कर दिया। बेशक रिटायरमेंट का समय पुराना होता है। यानी पुरानी होती जॉब में नयेपन की शुरुआत। लेकिन करीब सात लोगों की रिटायरमेंट का यह वक्त मानो कह रहा हो, ‘कि सब कुछ लागे नया-नया।’
मिथिलेश जी का साथ और बातों से निकली बात

मिथिलेश जी
जीजाजी के साथ जब केसरबाग स्थित उनके दफ्तर जा रहा था तो वह बोले, मेरे बॉस मिथिलेश जी बहुत अच्छे इंसान हैं। मैँ समझा कि जीजाजी खुद इतने नेकदिल हैं और इन्हें सभी अच्छे लगते हैं। वह कई बातें बताते रहे, लेकिन मैंने कोई ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। फिर दफ्तर में पहुंचने के बाद उन्होंने अपने सभी साथियों से मुलाकात कराई साथ ही मिलाया मिथिलेश जी से। दो-चार वाक्यों के आदान-प्रदान के बाद ही सचमुच लगा, मिथिलेश जी तो मिथलेश जी ही हैं। पहले वह बोले, जोशी जी के जाने के बाद दिक्कतें तो आएंगी ही। फिर हम अन्य बातों पर भी चर्चा करने लगे। कुछ ही देर की बातों से मुझे लगा कि ये भावुक हैं। भावुकता के साथ-साथ कवि हृदय व्यक्ति हैं। मेरा विचार सही निकला। वह तो गुनगुनाकर बहुत अच्छा बोलते हैं। उन्होंने पूरी एक कविता की रचना कर रखी है। जिसे आप यहां साझा की जा रही वीडियो क्लिप में सुन सकते हैं। इसके बाद शाम होने तक वह साथ रहे। यही नहीं, घर पर भी छोड़ने आए। घर पहुंचकर कुछ देर और साथ रहे। मैंने उनसे कहा कि अपने अनुभव लिखकर भेजूंगा। मिथलेश जी सचमुच आपसे मिलकर अच्छा लगा। जब भी लखनऊ आना होगा, आपसे मुलाकात करूंगा। आपका चंडीगढ़ में स्वागत है। आप आंखों की किसी समस्या से जूझ रहें, दुआ है कि जल्दी ठीक हो जायें। कुछ कविताएं मेरे ब्लॉग या यूट्यूब चैनल के लिए लिखना चाहें या पढ़ना चाहें तो स्वागत है। आपको यूट्यूब लिंक अलग से साझा कर दूंगा। विस्तार से ज्यादा कुछ नहीं लिख पाऊंगा। बस यही कहूंगा, ‘रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरा मोल।’ आप हीरा हैं।
कैसे भूल सकता हूं भानजों की वह संगत
सौरभ, गौरव और कुणाल। तुम तीनों के लिए यही कहूंगा, भगवान तुम लोगों को स्वस्थ रखे। तीनों में प्रेम बना रहे और मामा के लिए यह प्यार हमेशा बना रहे। सुबह उठकर अपने से बड़ों के पैर छूना, तीनों भाईयों का आपस में मशविरा करना, दिल को भा गया। मां की चिंता करना भी गजब था। गौरव की फक्कड़ी भी पसंद आई, लेकिन…। भूतनाथ मंदिर में गौरव का यह कहना कि अरे मामा आप खाइये, बिल आप क्यों देंगे। वह कचौड़ी का स्वाद अब भी मुंह में है। कुणाल का वीडियो कॉल के जरिये मामी को भूतनाथ मंदिर के दर्शन कराना। सौरभ से कई बातें करना, कुछ स्वाद लेना। क्या-क्या कहूं। दो लाइनों में कोशिश करता हूं बातों को समेटने की-
मेरे दिल में समाये हो, हर दिल अजीज हो। मेरे भानजो तुम्हें नहीं मालूम तुम चीज क्या हो।
कितनों से मिलना और कितनों को याद करना
सेवानिवृत्ति के मौके पर शाम को आयोजित प्रीतिभोज में अनेक लोग मिले। कुछ नये लोगों से मुलाकात हुई। कुछ ऐसे बच्चों से भी जो बड़े हो गए हैं। इस दौरान जीजाजी का मेरा परिचय बेटे कुक्कू के साथ जोड़कर कराना बहुत अच्छा लगा। कुछ लोगों की कमी भी खली। लेकिन सबकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं। रुद्रपुर से आए जीजाजी के दीदी-जीजाजी के साथ बातचीत भी सहेजने लायक है। लब्बोलुआब यही है कि कार्यक्रम बहुत अच्छा रहा। अंत में यही कहूंगा-
ना कोई राह आसान चाहिए, ना ही हमें कोई पहचान चाहिए,
एक ही चीज मांगते है रोज भगवान से, अपनों के चेहरे पर हर पल प्यारी से मुस्कान चाहिए…
Wednesday, January 25, 2023
जोशीमठ : विकास, विनाश, किंतु-परंतु और पलायन का दंश
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| फोटो साभार : इंटरनेट |
Saturday, January 14, 2023
नये गीत, पुराने गीत और बच्चे
केवल तिवारी
हंसना, रोना और गाना गुनगुनानासंभवत: हर व्यक्ति केसाथ होता है। कोई खुलकर हंसता है, कोई मुस्कुराता है और कोईदेश, काल और परिस्थिति केहिसाब से अपनी हंसीको बिखेरता है। इसी तरह रोने के भी अपने-अपने भाव और ताव हैं। कोई अकेले में रोता है। कोई मौके पर रोता है और कोई चुपके-चुपके रात-दिन…। हंसने और रोने के बाद अब बात करत हैं गाने की। गीत कोई भी हो, कैसा भी हो अपनी-अपनी पसंद के मुताबिक गुनगुनाता है हर कोई। कोई बाथरूम सिंगर होता है, कोई गाहे ब गाहे गुनगुनाता रहा है। बड़े गायकों की बात छोड़ दें तो कुछ लोग हमारी आपकी फरमाइश पर दो-चार लाइनें किसी गीत का सुना देता है। अब अगर बात पसंद या नापसंद की करें तो भंडार है गीतों का। इसीलिए कई सार्वजनिक जगहों पर गुजारिश की जाती है कि संगीत न बजाएं। ज्यादा शौक हो तो ईयरफोन या हेडफोन लगाकर सुनें। आज तो ऑनलाइन इतने एप हैं कि बैकक्राउंड में म्यूजिक बजता रहेगा और आप बोल अपने डाल दीजिए। आपने कैसा गाया, इसकी रैंकिंग भी तुरंत मौजूद।
खैर… भूमिका कुछ लंबी हो गयी। असल में बात निकली थी एक गीत के बोल से। गीत के बोल हैं तुझसे नाराज नहीं, जिंदगी हैरान हूं मैं…। इसी गीत के आगे एक मुखड़े में एक लाइन है मुस्कुराएं तो मुस्कुराने के कर्ज उतारने होंगे। छोटा बेटा धवल एक दिन अपनी मां से बोला, ‘आज मुझे इस लाइन का मतलब समझ में आ गया।’ कैसे, पूछने पर बोला, आज मैं स्कूल से आते वक्त बड़ा खुश था, लेकिन पैर में चोट लग गयी। हंस सकते ही नहीं, कुछ न कुछ हो जाता है। यह बात सुनकर मैं मुस्कुरा दिया। यूं तो पहले बड़ा बेटा कार्तिक (कुक्कू) भी मुझे कई गीतों को सुनने का आग्रह करता था, ज्यादातर गीत विदेशी होते थे। मैं अनमने भाव से सुनता था। लेकिन कुछ गीतों में मुझे रस आने लगा। वह तो अब पढ़ाई के लिए हॉस्टल में है। अब छोटा बेटा धवल भी कई बार उसी तरह के गीतों को यूट्यूब पर सुनने का आग्रह करता है। मुझे अच्छे भी लगते हैं। आजकल तो कई बार कतर में हुए फुटबॉल के थीम गीत को उसने सुनवाया। खैर उक्त गीत की पंक्ति के बारे में जब उससे पूछा कि उसने इसे कहां सुना, तो बोला आप लोग (मैं और भावना) से। असल में कई बार इस गीत को हम यूट्यूब चलाते हैं या कभी-कबार खुद ही गुनगुनाने लगते हैं। बच्चे ने इस गीत का अपने हिसाब से अर्थ लगाया। मेरे साथ भी ऐसा होता है, अगर मैंने कोई फिल्म न देखी हो और मैं उसके कुछ गीत गाता हूं या सुनता हूं तो उसका फिल्मांकन मेरे दिमाग में मेरे हिसाब से चलता है। ऐसे ही एक बार मैं एक गीत गुनगुना रहा था, ‘चिट्ठी ना कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश जहां तुम चल गए, कहां तुम चले गये।’ मैं इसे अपने किसी अन्य संदर्भ में जोड़कर सुनता या गुनगुनाता था, बाद में फिल्म की कहानी का पता चला तो कुछ और ही मतलब निकला। चलिए गुनगुनाने, गाने और रोने पर आज की बात बस इतनी, बाकी फिर कभी।
Wednesday, January 11, 2023
रहस्य-रोमांच, विश्वास-अविश्वास और....
केवल तिवारी
दैनिक ट्रिब्यून में मेरे वरिष्ठ सहयोगी पंडित अनिरुद्ध शर्मा जी का एक दिन फोन आया। उन्होंने कहा, दो पुस्तकों को पढ़ने की सलाह दे रहा हूं। बेहतर हो आप इन्हें खुद ही मंगवा लें। उन दिनों दो पुस्तकों को पहले से ही पढ़ रहा था। समीक्षार्थ। इसलिए करीब 15 दिनों बाद विश्वविद्यालय प्रकाशन को ईमेल किया।
पैसे भेजे और तीन या चार दिन में पुस्तकें आ गयीं। एक पुस्तक को तो जल्दी ही पढ़ गया। हालांकि उसमें कुछ क्लिष्ट शब्दों ने परेशान किया, लेकिन दूसरी पुस्तक को शुरू करने से पहले कई व्यवधान आए। खैर, आज 11 जनवरी, 2023 को दूसरी पुस्तक भी पढ़ डाली। ठंड के मौसम में कहीं जाने का कार्यक्रम था नहीं। पिछले तीन-चार दिनों से लगातार पढ़ रहा था और आज दोपहर उसे संपन्न कर लिया। साथ ही पुस्तक में दिए गए चित्रों को देखा और उनके कैप्शन पढ़े। पुस्तक में जगह-जगह चित्रों के माध्यम से यात्रा वर्णन के बारे में बताया गया है। पुस्तक में किशोर रिंचू के बारे में दी गयी बातें हों या फिर दुर्गम विषम परिस्थितियों का चित्रण, महज एक उबले आलू का सेवन हो या फिर सूक्ष्म शरीर से यात्रा का। एक मर चुके युवक से साक्षात्कार की बात हो या फिर महिला का विवाह संबंधी वर्णन साथ ही जगह-जगह प्रश्नोत्तरी... सचमुच यह सब वर्णन अनूठा है। दोनों पुस्तकों का नाम है, तिब्बत का रहस्यमयी योग व अलौकिक ज्ञानगंज और तिब्बत का अज्ञात गुप्त मठ। विवरण है श्रीमत् शंकर स्वामी की यात्रा वृतांत का। शंकर स्वामी को सिद्ध योगी माना जाता है। साथ ही कहा जाता है कि उन्होंने हिमालयी क्षेत्र के ऐसे दुर्गम स्थानों की यात्रा की है जहां सबके लिए जा पाना संभव नहीं होता। दावा तो यह भी किया जाता है कि आज भी उन दुर्गम स्थानों पर अगर कोई तप और योग के बल पर जाये तो उसे आलौकिक दर्शन होंगे। माजरा जो भी हो पुस्तक के कई अंश रोचक हैं, रोमांचकारी हैं। समीक्षात्मक टिप्पणी से पहले पुस्तक से ही लिए गए कुछ अंशों पर गौर फरमाइये जो यह संदेश भी देते हैं कि हिमालयी क्षेत्र महज पर्यटन और मौज मस्ती के लिए नहीं है। सिर्फ मौज मस्ती के दुष्परिणाम हमने देखे हैं- पढ़िए दोनों पुस्तकों से लिए गए कुछ अंश-
'विश्व विधाता की अपूर्व सृष्टि जगत को जिससने देखा ही नहीं, जाना ही नहीं उसके विधि-विधान को अनुभव भी नहीं किया, उसका विशाल विश्व का आयोजन भ्रमण पर्यटन का नाम दिया गया दो-चार मठ मंदिरों की परिक्रमा, होटलों में गले तक खाना पीना और उद्दंड हो हुल्लड़ करके आने को ही पर्यटन कहते हैं। बहुत घूमे। इस होटल की व्यवस्था अच्छी, इस रेस्टोरेंट का आहार रचना तृप्त उस गली में स्त्री पुरुषों के कपड़े सस्ते उस अंचल की स्थानीय युवतियां देखने में सुंदर। यह देखो वहां की कलाकृति, ... यह तो भ्रमण नहीं सिर्फ हुल्लड़ है। इस दलित मन में कहां पाएंगे वह मुक्ति। कौन देगा उन्हें आशा की किरण। जातियों की मानसिकता देख सुनकर अतिशय करो ना होती मोटरवाहन की सीट पर बैठकर दूर बहुत दूर दूसर पर्वत श्रेणियों के दृश्य में विविध भावनाओं में डूबा रहा बस में। अंत में अवतरण हुआ सीमांत जनपद धारचूला में।'
एक और वर्णन-
'अच्छी तरह से विशेष भाव से देखने पर मैं फिर चौंक उठा। देख रहा यह तो मेरा ही स्वरूप, मेरा ही प्रकाश, मैं ही उस में समाविष्ट, मेरा अस्तित्व, स्मृति बुद्धि आवेश उत्सव आस संवेदना उसी में स्पंदित एक लम्हे में न जाने क्या हुआ? मन की गति घूम गई अपने अंग आदि हस्त पर आदि के दर्शन कर रहा हूं। देखा मैं इंद्री अभी अशरीरी रक्त मांस हीन कंकाल का ढांचा मात्र फिर से गुहा स्थित ऋषि कंकाल में दृष्टिबाधित देख रहा है। यह कंकाल मेरे ही समान रूप रंग स्वरूप लेकर बैठा है और अपने शरीर को देखकर कंकाल का ढांचा यह क्या? यह कोई अघोरी तांत्रिक लीला लामा जी के संग में क्या फलीभूत हुआ मेरे रक्त मांस वरुण को खोलकर स्वरूप कंकाल ने स्वयं को आवृत किया इस कंकाल की हड्डियों के ढांचे को लेकर में जाऊंगा जीवन में एक बार नहीं कई बार स्वयं को देखा और प्रतीत कंकाल को देखा एक ही प्रकार प्रत्यय।'
एक और
'दुख में धैर्य धारण करने और सहने के लिए अभ्यस्त बनो। सुख-दुख समाहार दीप समूह अगर नहीं कोई शंका नहीं भाई रहो तथागत पर निर्भर। दुख जिस तरह वंचित नहीं सुख भी उसी तरह अभिलाष एक नहीं अनुराग। मनन चिंतन से विधि के विधान से पाऊं सुख और दुख स्वागत बंधु स्वागत निर्माण हो नम्र निवेदन करो ताकि जीवन जिज्ञासा सुख दुख आता जाता रहता है। ... कौन हो तुम और कौन यहां किसका!'
एक अन्य
'नेपाली छोकरा प्रीत शरीर लेकर मेरे पास काम कर रहा है उसने शिखर धाम में एक नए साधु की गुफा बनाई। लोहे की चादर से बने गेट पर एक जोड़ा ग्रिल पीठ पर लेकर वह मेरे साथ शिखर धाम से उत्तरकाशी में उतर आया। मरम्मत के बाद फिर से उन्हें वापस पहुंचाया अब तक समझ नहीं आया था कि वह एक नेपाली प्रेत काया है।'
और अंत में फिर एक
'संकीर्ण बुद्धि का मानव कहता है एक-दो तकनीक सिखा दो। यदि वे सैकड़ों तकनीक भी सीख लें तब भी अंतर्मन की गोपन वार्ता से अनभिज्ञ रह जाएंगे। हाय हाय बंधन में ही इनका आत्म सुख है। बंधन में ही इनका जीवन मरण त्याग उदारता के रस की मधुरिमा से वंचित है। नहीं जानते दूसरों की सेवा सहयोग के बिना हृदय प्रसारित नहीं होता। आत्म सुख भोग करते हुए घर पर बैठकर दो-चार तकनीक करने से परमात्मा का दर्शन कर लेंगे सोचते हैं। चतुराई कर आध्यात्मिक ज्ञान विवेक अर्जुन कर लेंगे, लेकिन इनसे कुछ भी नहीं होता जिनका मानव धर्म ही नहीं उनका आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश नहीं अधिकार ही नहीं...'
दोनों पुस्तकें रहस्य और रोमांच से भरपूर हैं, लेकिन शब्दावली कठिन है जिससे प्रवाह और वेग अटकता सा लगता है। कभी-कबार कुछ चीजों पर विश्वास सहज ही नहीं होता, लेकिन प्रामाणिक तरीके से चीजों को रखा गया है तो न मानने को भी मन नहीं मानता। दोनों पुस्तकें संग्रहणीय हैं। धन्यवाद अनिरुद्ध जी।
Monday, January 2, 2023
कृष्ण के बाल्यकाल स्थलों के दर्शन... साथ में कुछ बातें-वातें
केवल तिवारी




























