केवल तिवारी
शिक्षक दिवस यानी 5 सितंबर को मैं भी फिल्म 'हनुमान अंश' देख आया। यूं तो हॉल में जाकर फिल्म देखने का बहुत कम संयोग बन पाता है, हालांकि बड़ा बेटा कार्तिक अनेक बार कहता है कि चले जाया करो पर ...
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| फोटो साभार सोशल मीडिया |
खैर इस बार छोटे बेटे धवल को एक पेपर देने जाना था, साथ में उसके मामा (भास्कर) के बेटे भव्य को भी। दोनों एक ही क्लास में हैं। सुबह 8:45 बजे से इनका पेपर था। उसके मामा ने पूछा 'हनुमान अंश' देखने चलें, फिल्म चर्चा में थी सो हामी भर दी और बच्चों को पेपर के लिए सेंटर भेजकर हम दो जोड़ी चल दिए फिल्म देखने। फिल्म देखने के बाद हम इस पर कुछ चर्चा करते, व्यस्तता बढ़ गई। कुछ फोन आ गये, फिर कहीं जाना हो गया, शाम को ऑफिस चला गया। पत्नी से भी इतना ही कह पाया कि नीम करौली बाबा का जिसने भूमिका निभाई है वह तुम्हारे मोनू यानी पंचायत सदस्य रहे नवीन पांडे की तरह दिख रहे थे। असल में मोनू जी काठगोदाम के ब्यूरा गांव के सरपंच रहे हैं। मेरी भी उनसे अच्छी बातचीत है। खैर...
शाम को ऑफिस में लोगों को बताया कि मैं 'हनुमान अंश' देख आया। लोगों ने टिप्पणी जाननी चाही। मैंने कहा कि सिर्फ आस्था के नजरिए से देखना होगा तभी आनंद आएगा। इसका दूसरा भाग भी आना तय है। असल में, मैं शुरू से ही उत्तराखंड के कैंची धाम को मन में रखकर सोच रहा था, लेकिन फिल्म की समाप्ति पर कैंची धाम आया। यानी तय है कि अगले भाग की शुरुआत कैंची धाम से होगी। फिल्म देखकर नीम करौली बाबा के बारे में बहुत कुछ जानने का मौका मिला। मैं पांचवीं पास कर अपने मूल गांव रानीखेत के पास स्थित डढूली से लखनऊ आ गया था, तब से हर साल दो या तीन बार गांव आना जाना होता ही है। कैंची धाम यानी नीम करौली बाबा के साधना स्थल पर जाना होता ही था। इक्का दुक्का लोग मिलते थे। अगर बस से गये तो बैठे बैठे हाथ जोड़ लेते, लेकिन कार से जाने पर आराम से मंदिर में जाते, हाथ जोड़कर कुछ देर ध्यान करते, गुड़ और चने का प्रसाद ग्रहण करते। बिल्कुल भी भीड़ नहीं होती। भीड़ सिर्फ 15 जून के आसपास होती, जब वहां मेला लगता। करीब एक दशक पहले तक ऐसा ही था, (ब्लॉग के अंत में कुछ पारिवारिक फोटो शेयर करूंगा जो सात-आठ साल पहले के हैं) लेकिन आज वहां तिल रखने की जगह नहीं। कुछ सेलिब्रिटी के जाने के बाद तो वहां जनसैलाब उमड़ने लगा है। अच्छा है अनेक लोगों को रोजगार मिला है। हालांकि मुझे अनेक ऐसे लोग भी मिले हैं जो करिअर की दहलीज पर खड़े हैं। उनके सपने उन सेलिब्रिटी की तरह हैं जो वहां जा चुके हैं। मेरा आग्रह है कि बाबा को मन में सुमिरन कर पहले करिअर पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जो सेलिब्रिटी वहां पहुंचे हैं, वे अपनी तरक्की के चरम पर पहुंचे हैं, बाकी श्रद्धा है।
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| फिल्म देखते हम चार |
अब थोड़ी बात फिल्म पर। पता चला कि यह फिल्म मात्र दो करोड़ में बनी है। यह रकम भी अच्छी खासी है, लेकिन आजकल जिस तरह से हजारों करोड़ में फिल्में बन रही हैं, उसके मुकाबले कुछ नहीं। फिल्म में कोई मसाला नहीं। लेकिन बनी बहुत शानदार। रोचक है कि जहां हम लोग देखने गए थे, वहां जेनजी वर्ग के लोग भी बहुत थे। महिलाओं की टोली भी। यह फिल्म शुद्ध रूप से आस्था की कहानी है, जिसमें कोई भटकाव नहीं। देखना सिर्फ आस्था के चश्मे से होगा। इसीलिए उसमें एक गीत है, ये विषय नहीं शोध का, ये बात है आत्मबोध का। चमत्कार दिखाए गए हैं, लेकिन शुद्ध चमत्कार नहीं। एक बीमार बाबा के पास आता है तो बाबा आशीर्वाद देते हैं, उससे पहले कहते हैं कि वैद्य को दिखा देना। बाबा मुस्कुराते रहने की सीख देते हैं। सारा श्रेय हनुमान जी को देते हैं। बाबा घबराने के बजाय मुकाबला करने की सीख देते हैं। बाबा को जो भक्त चमत्कारी मानना चाहता है तो बाबा कहते हैं यह तुम्हारी दृष्टि है, तुम्हारे मन में शिव हैं, मैं तुमको वैसा दिख रहा हूं। जाकी रही भावना जैसी...भक्ति में कोई किंतु परंतु नहीं, संदेश साफ देते हैं। उनकी पूजा करने वालों से भी कहते हैं नासै रोग हरे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा। फिल्म की पूरी टीम बधाई की पात्र है। वह गीत तो जुबां पर चढ़ गया है जिसके बोल हैं, मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डार दई। जै हो नीम करौली बाबा।





