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Sunday, September 27, 2026

सब्जी वाला राम... अब राम-राम ही बोल गया

केवल तिवारी

हर जगह की तरह हमारी कालोनी में भी फेरी वाले यानी सब्जी या अन्य सामान बेचने वाले अक्सर आते रहते हैं। इन्हीं में से कुछ के साथ व्यवहार और विश्वास के कारण अपनेपन का सा भाव आने लगता है। आपके पास दस-बीस रुपये कम हैं तो कोई बात नहीं, उसके पास खुले नहीं हैं तो भी नहीं। हालांकि यूपीआई वाली सुविधा के बाद ऐसी दिक्कत अब ज्यादा होती नहीं, लेकिन कुछ लोग यूपीआई नहीं चलाते। खैर जिन राम की बात कर रहा हूं, उनके पास यूपीआई, कैश सभी तरह की व्यवस्था थी। थी शब्द इसलिए कि सब्जी वाले इस राम ने करीब महीने भर इस दुनिया को ही राम-राम बोल दिया। राम हमेशा एक विशेष तरह की आवाज लगाता आता और हमारे घर के पास ही पेड़ की छांव में रुक जाता। कभी-कबार मुझसे या पत्नी से कहता, 'साहब अरबी के पत्ते बड़े हो गये क्या?' असल में मेरी छोटी सी खेती में अरबी, धनिया, पालक, मेथी अक्सर होती है। राम का आग्रह होता कि आपकी खेती की अरबी के पत्तों का स्वाद अच्छा है। राम से हम अक्सर सब्जी लेते। कभीब-कबार वह फल भी लाता तो विशेषतौर पर बताता कि आज फल अच्छे हैं। कई बार खुद ही कोई सब्जी नहीं लेने की ताकीद करता, कहता यह अच्छी नहीं। क्या करोगे खराब सब्जी का पूछने पर हंस देता, कहता यह सब ढाबों में बिक जाएगी। पिछले दिनों उसका आना बंद हो गया था। पता चला कि वह गांव गया है। फिर खबर आई कि उसके गॉल ब्लॉडर में पथरी थी, ऑपरेशन हुआ है। असल में राम का भाई और अनेक जानकार भी आसपास ही दिख जाते हैं। एक दिन खबर आई कि उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गयी है। चंडीगढ़ पीजीआई लाया जा रहा है। एक दिन हमने किसी से पूछा कि अब उसकी तबीयत कैसी है, पता चला वह तो दुनिया से ही चल दिया। बहुत दुख हुआ। पता चला कि कालोनी में अनेक लोगों ने उसके पैसे देने हैं। अब इन दिनों उसका बेटा जो अभी-अभी बारहवीं पास हुआ है, अपने मामा के साथ सब्जी बेचने आ रहा है। उससे भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा, फिलहाल वह मेहनत कर रहा है और कहता है पढूंगा। कुछ लोगों ने पैसे दे दिए हैं, शायद कुछ के अभी बाकी हैं। राम के जाने के बाद एक सूनापन सा अया है, मन कुछ दिनों तक खिन्न रहा, लेकिन ... इस लेकिन के आगे कुछ है ही नहीं... खुश रहना राम, उस जहां में भी। 

Monday, September 14, 2026

प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय का मीडिया सम्मेलन और माउंट आबू की मेरी यात्रा

केवल तिवारी
ओम शांति। इसी संबोधन से मिलना होता है ब्रह्माकुमारीज परिसर में। प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर माउंट आबू में पिछले दिनों राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन हुआ। सम्मेलन राष्ट्रीय था, मकसद विश्व शांति था। सम्मेलन का विषय था, 'Empowered Media for Building a Better World'यानी एक बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए सशक्त मीडिया। गत नौ से 13 सितंबर तक के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में मुझे भी अपने संपादक नरेश कौशल जी ने भाग लेने का मौका दिया। मैं नौ तारीख की रात पहुंचा और 13 तारीख की सुबह चंडीगढ़ पहुंच गया। ब्रह्माकुमारीज संस्थाओं के कार्यक्रमों में बतौर रिपोर्टर तो मैं बहुत गया हूं, लेकिन तीन-चार दिनों के लिए जाना और बतौर वक्ता भागीदारी करने का यह मेरा पहला कार्यक्रम था। मुझे जिस पर बोलना था, उसका विषय था, 'सत्य, विश्वास एवं पारदर्शिता : मीडिया उत्तरदायित्व की पुनर्परिभाषा।' अनेक विद्वानों के बीच मुझे भी बोलने का मौका मिला। मैंने जो कहा, उसे तो हू-ब-हू नीचे दूंगा, लेकिन उससे पहले अपने आध्यात्मिक अनुभव का थोड़ा सा विवरण।
जिस ट्रेन से मैं माउंट आबू गया वह करीब डेढ़ घंटा लेट थी। आबू रोड स्टेशन पर नौ सितंबर की रात 9:30 बजे मैं पहुंचा। वहां से संस्थान की ओर से आई कैब से मानसरोवर स्थित मुख्य कार्यक्रम स्थल की ओर चला। रास्ते में एक सज्जन को शांतिवन में उतरना था। वहां उतरते ही मुझे सचमुच एक आध्यात्मिक तेज सा महसूस हुआ। बचपन से जिस श्लोक को पढ़ते थे, उसका अर्थ लिखा था। वही श्लोक जिसमें कहा गया है, 'विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम। पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम।' हितोपदेश के इस श्लोक को बचपन से बोलते-सुनते आए हैं, अर्थ भी जानता हूं, लेकिन इस परिसर में पहुंचकर लगा जैसे मंथन करने के लिए कहा जा रहा है। करीब दस बजे जब मानसरोवर स्थित संस्थान के प्रांगण में पहुंचा तो एक नैसर्गिक आनंद की अनुभूति हो गयी। लगा थकान तो जैसे रही ही नहीं। बीके पूनम दीदी ने बीके राजेश भाई को जिम्मेदार दी थी मुझे सबकुछ समझाने के लिए। राजेश जी वहीं मिल गये। मुझे कमरा बताया। चौथी फ्लोर तक साथ गये और ताकीद की कि फ्रेश होकर भोजन के लिए आ जाइये। कमरे में पहुंचा तो सुखद संयोग रहा कि वहां श्रीगोपाल नारसन जी मिले। उनके साथ ही मुझे रूम शेयर करना था। रुड़की निवासी नारसन भाई एडवोकेट हैं, पत्रकार हैं और लेखक हैं। अगले दिन उनकी पुस्तक का विमोचन भी सेमिनार के दौरान होना था। बातों-बातों में उनसे काफी कुछ सीखने को मिला। सुखद संयोग यह रहा कि वह हमारे सहायक संपादक अरुण नैथानी जी के बहुत पुराने मित्र हैं और पिछले साल उनकी मुलाकात संपादक जी से भी ऐसे ही कार्यक्रम में हुई थी। मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि रूम शेयरिंग अच्छे व्यक्ति के साथ हो रही है। इस सेमिनार में जितने भी पत्रकार मित्र या शिक्षाविद आए थे धीरे-धीरे उनसे मिलना-जुलना होता रहा। इस बीच बीके रामअवतार शर्मा भाई, बीके संत भाई समेत अनेक लोगों से मुलाकात हुई। जाने-माने शिक्षाविद डॉ. संजय द्विवेदी, मधुकर द्विवेदी, राणा यशवंत जी, राजेश असनानी जी, अंकुर विजय वर्गीय जी, डॉ. सारिका जी, पत्रकार सुशील शर्मा जी, रेणु शर्मा जी, दैनिक ट्रिब्यून संवाददाता सतीश जोशी जी, मित्र सुनील सौरभ के अलावा ओडिशा से आए गोविंद चंद्र, नारायण बेहरा, लखनऊ से आए संभव सोनी, मुंबई से आए पीपी पांडे आदि अनेक लोगों से बातें हुईं, मुलाकातें हुईं। कुछ लोगों से व्हाट्सएप चैटिंग हो पाई, लेकिन आमने-सामने बातचीत का मौका नहीं मिल पाया। लेकिन इस कार्यक्रम के दौरान परिसर में रहने के दौरान गजब की आध्यात्मिक शांति, अनुशासित जीवन का एक अनूठा अनुभव रहा। बीच-बीच में गायक पवन भाई के गीत, कलाकारों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम और एक सत्र में अमेरिका से आईं ब्रह्माकुमारी की प्रशासनिक प्रमुख बीके मोहिनी दीदी के सुविचार से मन प्रफुल्लित हुआ। हर चेहरे पर मुस्कुराहट, शांत भाव सचमुच भाव विभोर कर देने वाला रहा। बीके शांतनु भाई और बीके पूनम बहन का बहुत-बहुत आभार। अखबार के लिए तो एक स्टोरी अलग से करूंगा ही, लेकिन निजी अनुभव को यहां साझा करना बहुत जरूरी था। अनुभव बहुत हैं। धीरे-धीरे किस्तों में चलेंगे। यादें लंबे तक संजोकर रखने की जरूरत है। यहां अपना मूल भाषण और कुछ फोटो साझा कर रहा हूं।

मेरा मूल भाषण
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के इस प्रांगण में आयोजित इस दिव्य समारोह में पहुंचकर नैसर्गिक प्रसन्नता हो रही है। यहां उपस्थित सभी प्रमुख लोगों को प्रणाम करता हूं। मैं केवल तिवारी चंडीगढ़ से आया हूं और दैनिक ट्रिब्यून में उप समाचार संपादक हूं। मैं अपने संपादक श्री नरेश कौशल जी की ओर से आप सभी को शुभकामनाएं देता हूं। इससे पहले के एक इसी तरह के कार्यक्रम में कौशल जी ने अपने संबोधन में कहा था कि शांति स्थापना में मीडिया की आध्यात्मिक दृष्टि मददगार है। उनके विस्तृत संबोधन में हर बात बेहद महत्वूर्ण थी। उस कार्यक्रम में हमारे संपादक ने कहा था- कलम उठे तो अमन की कहानी लिखी जाये, हर एक खबर में इंसानियत दिखी जाये। मीडिया अगर ठान ले दिलों को जोड़ना, तो धरती पर जन्नत की निशानी लिखी जाये।
आज मुझे इसी दिव्य संस्था की ओर से सत्य, विश्वास एवं पारदर्शिता : मीडिया उत्तरदायित्व की पुनर्परिभाषा विषय पर अपने विचार रखने के लिए कहा गया है। इसके लिए इस संस्थान और अपने संपादक जी का दिल से आभारी हूं।
असल में मीडिया हमेशा से जनता और सत्ता को दिशा देने का सशक्त माध्यम रहा है। पहले जहां यह जनता और सत्ता के बीच में सेतु का काम करता था, वहीं आज मीडिया बहुत विस्तारित हो चुका है। अगर कहा जाए कि हर व्यक्ति आज पत्रकार है तो यह बात सच के बेहद करीब है, लेकिन संपूर्ण नहीं है। खबरों के लिए दोनों पक्षों को कोट करना होता है, लेकिन खबर अब किसी के पास भी पहले पहुंच सकती है। एक समय था जब पत्रकार के जरिये खबर सबको मिलती थी, यहां तक कि अगर किसी स्थान विशेष के लिए खबर हो तो वहां के लोग भी यह देखने को उत्सुक होते थे कि खबर छपी या नहीं। आज खबर सबके पास है। खबर चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक। जब हर व्यक्ति पत्रकार के तौर पर मौजूद है तो जाहिर है उसके स्वभाव का असर दूर तलक जाएगा। जब असर दूरगामी है तो नैतिकता और विश्वसनीयता पर ध्यान देना सर्वोपरि हो जाता है। तो इस नैतिकता और विश्वसनीयता की पहली सीढ़ी सत्य है। सत्य से ही विश्वास बढ़ेगा और जब विश्वास बढ़ेगा तो पारदर्शिता आएगी। अब बात आती है कि आज मीडिया के उत्तरदायित्व को फिर से परिभाषित करने की। जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं कि मीडिया शब्द आज बहुत विस्तारित हो चुका है। लाइक, व्यूज, कमेंट और सबसे पहले की गलाकाट लड़ाई में ऊल-जुलूल चीजों की सोशल मीडिया पर भरमार तो है ही, विश्वास और सत्य भी आज कसौटी पर हैं। गनीमत है कि उस पर नियंत्रण रखे जाने की बात सामने आ रही है और ऐसी चीजों को न देखने और संबंधित मंच से संबंधित व्यक्ति को अनफॉलो करने का ऑप्शन हमारे पास है। जब नैतिकता का यह मामला मीडिया संस्थानों के संदर्भ में देखा जाएगा तो जाहिर है इसके असर का दायरा भी बड़ा होगा।
अब बात है सत्य की, विश्वास और पारदर्शिता की। इस मामले में सबसे पहले मैं प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय और इससे जुड़े सभी लोगों का धन्यवाद करता हूं कि वे इस तरह के सालाना कार्यक्रम कर जागरूकता का काम करते हैं। सत्य के संबंध में हर पत्रकार को हितोपदेश के उस श्लोक के मर्म को जरूर आत्मसात करना चाहिए, जिसमें कहा गया है,
सत्यं माता, पिता ज्ञानं, धर्मो भ्राता, दया सखा।शान्तिः पत्नी, क्षमा पुत्रः, षडेते मम बान्धवाः॥
इसका अर्थ है- सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, धर्म भाई है, दया मित्र है, शान्ति पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है- ये छह चीज ही ही मेरे सच्चे सगे-संबंधी हैं। जिस विषय पर मुझे बोलने का मौका मिला है, वह आज के दौर में सच में बहुत गंभीर है। चारों तरफ सच्ची-झूठी कहानियों का दौर है। परोसने का अंदाज निराला है। ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गयी है। मीडिया की पुनर्परिभाषा का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हमें इसकी आलोचना ही करनी है। लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि समय के हिसाब से अपनी भूमिका यानी खबरों को परोसते वक्त हमें ध्यान रखना होगा वास्तविकता का।
आज के मीडिया का जो भी स्वरूप हो, ऐसे में बात आती है आखिर व्यावहारिक रूप में नैतिकता, सत्यता आये कैसे? ऐसे में जरूरत है आध्यात्मिक सशक्तीकरण। इस काम के लिए ब्रह्माकुमारीज जैसी संस्थाएं साधुवाद की पात्र हैं। कई दिनों के इस बेहद खास कार्यक्रम का अगर तनिक भी असर पड़े तो यह सफल है। क्योंकि कहा भी गया है- बिंदु बिंदु से सिंधु बना है। हमारी विरादरी को यह ध्यान रखना चाहिए कि सच के साथ चलें और इस बात का ध्यान रखें जैसे की एक श्लोक में कहा गया है-
कावयशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम । व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।। अर्थात बुद्धिमान और ज्ञानी लोग अपना समय काव्य (साहित्य, कविता) और शास्त्रों (ज्ञान-विज्ञान, धर्मग्रंथों) के पठन-पाठन और चर्चा-विनोद में आनंदपूर्वक व्यतीत करते हैं। इसके उलट मूर्ख लोग अपना समय बुरे व्यसनों (नशा, बुरी आदतें), अत्यधिक सोने (घोर निद्रा) या फालतू के लड़ाई-झगड़े (कलह) में बर्बाद करते हैं।
टीआरपी, लाइक और व्यूज के इस गलाकाट लड़ाई में अगर पेशेवर मजबूरी के चलते शामिल होना भी पड़े तो तो सत्य को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आपकी रिपोर्टिंग से अगर किसी का भला होता है तो यह कितनी सुकून देने वाली बात है। अखबारों, चैनलों में डेस्क और रिपोर्टिंग दो भाग होते हैं। जिम्मेदार मीडिया घरानों में खबरों की सत्यता कई स्तरों पर जांची जाती है। लेकिन जो एकल मीडिया चल पड़ा है, उन्हें ज्यादा जिम्मेदार होने की जरूरत है। एकल मीडिया से मतलब 'स्वयंभू।' खुद का चैनल, खुद ही पत्रकार और खुद संपादक या मालिक।
सोचिए, अगर आप किसी बीमार और लाचार व्यक्ति की खबर को प्राथमिकता देते हैं तो आपकी खबर के जरिये उसके लिए मदद के कितने हाथ उठेंगे। किसी गरीब बच्चे की शिक्षा के लिए बात उठाते हैं तो कितने लोग मदद के लिए आएंगे, लेकिन सोचिए अगर ऐसी ही खबरें झूठ हों और फ्रॉड के जरिये कमाई करने के लिए हों तो समाज और आत्मिक नुकसान कितना होगा। आज जेन जी और जेन अल्फा की बातें हो रही हैं। इन्हीं बातों के साथ मानवीय मूल्य, संवेदनाओं और भावनाओं की बातें भी जरूर होनी चाहिए। नशे से दूर रहने की बातें होनी चाहिए। किसी भी मुद्दे पर तस्वीर हमेशा उतनी अच्छी भी नहीं होती जितनी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाती है और उतनी बुरी भी नहीं होती जितनी भयावह दिखाई जाती है। हाल ही में नेपाल में आयी भीषण बाढ़ के संबंध में कई खबरें आईं। ऐसी भी खबरें आईं कि लूटने की मंशा रखने वालों ने लाशों को भी नहीं छोड़ा। किसी ने किसी मृत महिला के जेवर निकाल लिए तो किसी ने किसी पुरुष की जेब साफ की। ऐसी दुखद खबरों के बीच ऐसी खबरें भी आईं कि रातों-रात लोगों ने दान के जरिये अरबों रुपये जमा कर दिए। अनेक संस्थाओं के स्वयंसेवकों ने अपनी सारी जमा पूंजी पीड़ितों की मदद में लगा दी। बातों का मुख्य तात्पर्य है कि शुरुआत स्वयं से करनी होगी। खासतौर से मीडिया से जुड़े लोगों को। अगर स्वयं सुधरने की या सीखने की ललक नहीं होगी तो बात आगे नहीं बढ़ेगी।
इसीलिए तो कहा जाता है- यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं। लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय मीडिया महासम्मेलन 2026 के इस कार्यक्रम में मुझे अपनी बातें रखने का मौका देने के लिए मैं संस्थान का दिल से आभार व्यक्त करता हूं और यहां से मिली सकारात्मक ऊर्जा निश्चित ही मेरी लेखनी में भी झलकेगी। यह अच्छा संयोग है कि मैं हमेशा से सकारात्मकता का पक्षधर रहा हूं और अनेक स्कूलों में सकारात्मकता पर व्याख्यान दिए हैं। एक बार फिर से आप सभी का धन्यवाद।
साभार दैनिक ट्रिब्यून 









जानी-अंजानी सबकी कहानी

केवल तिवारी

पिछले दिनों बॉलीवुड में लेखन-निर्देशन से जुड़े शैलेंद्र झा लिखित उपन्यास 'कंबोडिया कंपाउंड' पढ़ने को मिली। इस उपन्यास को शुरू किया ही था कि खत्म होने तक छोड़ा ही नहीं। कुछ जरूरी कारणों से बीच में थोड़ा ब्रेक लिया, फिर दो-तीन दिन में निपटा दी। लगातार पढ़ते रहने का कारण बेहतरीन शैली में लिखी गयी कहानी। सस्पेंस, थ्रिल और भी बहुत कुछ। हमारे अखबार दैनिक ट्रिब्यून के संपादकीय विभाग से मुझे यह किताब समीक्षार्थ मिली। उसी पर पूरी समीक्षा यहां पेश है-

साभार दैनिक ट्रिब्यून 


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रोमांस, थ्रिल, सस्पेंस और जिंदगी की जद्दोजहद। किसी धारावाहिक या फिल्म में यह सब हो तो आप उसे देखते रहते हैं, इस जिज्ञासा के साथ कि आगे क्या होगा? कभी आपकी कल्पना के अनुरूप और कभी कल्पनातीत होती है कहानी। ठीक उसी तरह जैसे उपन्यास 'कंबोडिया कंपाउंड' में है। लेखक हैं शैलेंद्र झा। पूरा उपन्यास एक चलचित्र की तरह लगता है।

कुछ स्थानों पर सेंसरशिप की कैंची जैसी बात अगर आ जाए तो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने जैसी फिल्म। सचमुच ऐसा उपन्यास जिसे आपने शुरू किया तो खत्म होने तक रहा नहीं जाएगा। और एक बेहतरीन लेखन की तरह कहानी के अंत में एक नयी शुरुआत सी लगती हुई। सामान्य परिवार की कहानी।मियां बीवी और चार बच्चे। हर किसी की जिंदगी अलग और सपना अलग। साथ चलते कुछ अन्य किरदार, जिनमें साइबर ठगों को अपनी पूरी जमा पूंजी लुटा देने वाला पत्रकार, एक बिल्डर, अपराध का भीषण नेटवर्क चलाने वाले कुछ लोग और भी कुछ अहम पात्र। कहानी कई पड़ावों पर रुकती, उतरती, चलती जाती है। पाठक के मन में सवाल उठता है आगे क्या? कभी आशंका से मन कांप उठता है और कभी उम्मीद से दिल भर जाता है, लेकिन होता कुछ और है। बेशक इस उपन्यास का अहम किरदार असीम सबकी नजरों में नाकारा होता है, लेकिन वह तो असली 'हीरो' साबित हुआ। मजबूरी में नौकरी कर रही राधिका मजबूत बहुत है। आनंद ऑटो चलकर गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, लेकिन उनकी छोटी बेटी तूलिका के सपने बहुत बड़े हैं। इसी में साइबर ठगों की एक अलग दुनिया है। नित नए शिकार को फंसाना, लूटना। अच्छा कमाने के लिए विदेश जाना कभी कबार कितना खौफनाक हो सकता है, यह अतुल की कहानी से साफ झलक जाता है। बेहतर यही होगा की समीक्षा में भी एक सस्पेंस बना रहे। शैलेंद्र झा की रचना सचमुच बहुत बेहतरीन है उसी तरह जैसे फिल्म लेखक और निर्देशक इम्तियाज अली का एक कोट किताब के कवर पृष्ठ पर लिखा गया है, 'यह उपन्यास आपको पन्ने पलटते रहने पर मजबूर करता है और फिर रात भर जगाए रहता है‌' भाषा शैली बिल्कुल आमजन की है क्योंकि कहानी ही आमजन की है।

Monday, September 7, 2026

मेरी नज़र में फिल्म हनुमान अंश

 केवल तिवारी 

शिक्षक दिवस यानी 5 सितंबर को मैं भी फिल्म 'हनुमान अंश' देख आया। यूं तो हॉल में जाकर फिल्म देखने का बहुत कम संयोग बन पाता है, हालांकि बड़ा बेटा कार्तिक अनेक बार कहता है कि चले जाया करो पर ... 

फोटो साभार सोशल मीडिया 


खैर इस बार छोटे बेटे धवल को एक पेपर देने जाना था, साथ में उसके मामा (भास्कर) के बेटे भव्य को भी। दोनों एक ही क्लास में हैं। सुबह 8:45 बजे से इनका पेपर था। उसके मामा ने पूछा 'हनुमान अंश' देखने चलें, फिल्म चर्चा में थी सो हामी भर दी और बच्चों को पेपर के लिए सेंटर भेजकर हम दो जोड़ी चल दिए फिल्म देखने। फिल्म देखने के बाद हम इस पर कुछ चर्चा करते, व्यस्तता बढ़ गई। कुछ फोन आ गये, फिर कहीं जाना हो गया, शाम को ऑफिस चला गया। पत्नी से भी इतना ही कह पाया कि नीम करौली बाबा का जिसने भूमिका निभाई है वह तुम्हारे मोनू यानी पंचायत सदस्य रहे नवीन पांडे की तरह दिख रहे थे। असल में मोनू जी काठगोदाम के ब्यूरा गांव के सरपंच रहे हैं। मेरी भी उनसे अच्छी बातचीत है। खैर...

शाम को ऑफिस में लोगों को बताया कि मैं 'हनुमान अंश' देख आया। लोगों ने टिप्पणी जाननी चाही। मैंने कहा कि सिर्फ आस्था के नजरिए से देखना होगा तभी आनंद आएगा। इसका दूसरा भाग भी आना तय है। असल में, मैं शुरू से ही उत्तराखंड के कैंची धाम को मन में रखकर सोच रहा था, लेकिन फिल्म की समाप्ति पर कैंची धाम आया। यानी तय है कि अगले भाग की शुरुआत कैंची धाम से होगी। फिल्म देखकर नीम करौली बाबा के बारे में बहुत कुछ जानने का मौका मिला। मैं पांचवीं पास कर अपने मूल गांव रानीखेत के पास स्थित डढूली से लखनऊ आ गया था, तब से हर साल दो या तीन बार गांव आना जाना होता ही है। कैंची धाम यानी नीम करौली बाबा के साधना स्थल पर जाना होता ही था। इक्का दुक्का लोग मिलते थे। अगर बस से गये तो बैठे बैठे हाथ जोड़ लेते, लेकिन कार से जाने पर आराम से मंदिर में जाते, हाथ जोड़कर कुछ देर ध्यान करते, गुड़ और चने का प्रसाद ग्रहण करते। बिल्कुल भी भीड़ नहीं होती। भीड़ सिर्फ 15 जून के आसपास होती, जब वहां मेला लगता। करीब एक दशक पहले तक ऐसा ही था, (ब्लॉग के अंत में कुछ पारिवारिक फोटो शेयर करूंगा जो सात-आठ साल पहले के हैं) लेकिन आज वहां तिल रखने की जगह नहीं। कुछ सेलिब्रिटी के जाने के बाद तो वहां जनसैलाब उमड़ने लगा है। अच्छा है अनेक लोगों को रोजगार मिला है। हालांकि मुझे अनेक ऐसे लोग भी मिले हैं जो करिअर की दहलीज पर खड़े हैं। उनके सपने उन सेलिब्रिटी की तरह हैं जो वहां जा चुके हैं। मेरा आग्रह है कि बाबा को मन में सुमिरन कर पहले करिअर पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जो सेलिब्रिटी वहां पहुंचे हैं, वे अपनी तरक्की के चरम पर पहुंचे हैं, बाकी श्रद्धा है।

फिल्म देखते हम चार


अब थोड़ी बात फिल्म पर। पता चला कि यह फिल्म मात्र दो करोड़ में बनी है। यह रकम भी अच्छी खासी है, लेकिन आजकल जिस तरह से हजारों करोड़ में फिल्में बन रही हैं, उसके मुकाबले कुछ नहीं। फिल्म में कोई मसाला नहीं। लेकिन बनी बहुत शानदार। रोचक है कि जहां हम लोग देखने गए थे, वहां जेनजी वर्ग के लोग भी बहुत थे। महिलाओं की टोली भी। यह फिल्म शुद्ध रूप से आस्था की कहानी है, जिसमें कोई भटकाव नहीं। देखना सिर्फ आस्था के चश्मे से होगा। इसीलिए उसमें एक गीत है, ये विषय नहीं शोध का, ये बात है आत्मबोध का। चमत्कार दिखाए गए हैं, लेकिन शुद्ध चमत्कार नहीं। एक बीमार बाबा के पास आता है तो बाबा आशीर्वाद देते हैं, उससे पहले कहते हैं कि वैद्य को दिखा देना। बाबा मुस्कुराते रहने की सीख देते हैं। सारा श्रेय हनुमान जी को देते हैं। बाबा घबराने के बजाय मुकाबला करने की सीख देते हैं। बाबा को जो भक्त चमत्कारी मानना चाहता है तो बाबा कहते हैं यह तुम्हारी दृष्टि है, तुम्हारे मन में शिव हैं, मैं तुमको वैसा दिख रहा हूं। जाकी रही भावना जैसी...भक्ति में कोई किंतु परंतु नहीं, संदेश साफ देते हैं। उनकी पूजा करने वालों से भी कहते हैं नासै रोग हरे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा। फिल्म की पूरी टीम बधाई की पात्र है। वह गीत तो जुबां पर चढ़ गया है जिसके बोल हैं, मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डार दई। जै हो नीम करौली बाबा।