साभार : दैनिक ट्रिब्यून
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| दैनिक ट्रिब्यून रविरंग में छपा लेख |
केवल तिवारी
ऊं आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात। ऊं आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन।
हमारे वेदों में उल्लिखित उक्त श्लोक भगवान सूर्य को समर्पित हैं। जिनका आध्यात्मिक और भौतिक अर्थ दोनों हैं। सार यही है कि ऊर्जा का संचार करने वाले अंधकार को हरने वाले सूर्यदेव को हम प्रणाम करते हैं। ऊर्जा के स्रोत को पूजने की यह बात भौतिक अर्थ में उसी तरह से है जैसे भगवान कृष्ण ने गीता ज्ञान के दौरान अर्जुन से कहा, ‘मैं कण-कण में समाया हूं।’ यानी एक तरफ तो अर्थ यह है कि हर कण में भगवान का वास है। दूसरी तरफ यह भी कि अदृश्य कण में संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा (परमाणु ऊर्जा) छिपी है। ऊर्जा के इन स्रोतों को वैज्ञानिकों ने समझा, शोध किया और बन गये सौर यंत्र यानी सोलर पैनल या फिर परमाणु ऊर्जा केंद्र। आज हम बात कर रहे हैं देश के सबसे बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र की जो स्थित है माउंट आबू में। ब्रह्मा कुमारीज संस्था के तत्वावधान में इसे ‘इंडिया वन सोलर थर्मल पावर प्लांट’ नाम दिया गया है। पिछले दिनों राजस्थान के आबू रोड स्थित मानसरोवर में राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन के दौरान इस संयंत्र को करीब से देखने और समझने का मौका मिला। अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित इस सौर ऊर्जा संयंत्र से ब्रह्मा कुमारीज संस्था की ओर से चलने वाले अनेक जनहितैषी परियोजनाओं और कार्यक्रमों में यहीं से बिजली मिलती है। अरावली पहाड़ियों की घाटी में सुरम्य वातावरण के बीच बने सोलर संयंत्र सचमुच विशालकाय और आकर्षक है। सूर्य की दिशा में स्वत: घूमते सैकड़ों पैनल उसी तरह लगते हैं जैसे सूरजमुखी का फूल अपनी दिशा बदलता है। इनका डिजाइन भी सूरजमुखी की तरह ही है। बिजली बनने के साथ-साथ इन पैनल से ऊर्जा के तौर पर भाप को संग्रहीत किया जाता है जो सीधे भोजन निर्माण में काम आता है।
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रोशनी और भोजन व्यवस्था का यही स्रोत
इस ऊर्जा संयत्र की बात करते हुए हमें बताया गया कि यहीं से पैदा हो रही बिजली ब्रह्मा कुमारीज संस्थान के सभी परिसरों में पहुंचती है। यानी वहां जल रहे बल्ब, ट्यूबलाइट, पंखे, एसी आदि सभी उपकरण इसी से जलते हैं। इसके साथ ही सुंदर अरावली पहाड़ियों के बीच शांतिवन परिसर में बना है दुनिया का एक सबसे बड़ा सोलर किचन। यहां रोज़ाना लगभग 50 हजार लोगों का खाना बनता है। इस किचन को भी सबसे बड़े किचन का दर्ज मिल चुका है। यहां खाना भी इसी सूरज की रोशनी से बनी ऊर्जा के जरिये बनता है। यानी पनबिजली या कोयला बिजली के प्रयोग के बिना ही। किचन में लगी रोटियां बनाने की बड़ी-बड़ी मशीन हों या फिर सौ-सौ लीटर के बड़े-बड़े कुकर। इनमें पकने वाली चपाती, चावल और दाल, चाय या कोई अन्य व्यंजन को बनाने के लिए ऊर्जा इसी संयंत्र से ही मिलती है। चारों ओर सुरम्य वातावरण, साथ में ऊर्जा का ऐसा स्रोत जिससे न तो प्रदूषण फैलता है और न ही किसी तरह का धुआं होता है। असल में बिजली उत्पादन के साथ ही एक अनूठे तरीके से भी भोजन पकाने की यहां व्यवस्था है। सोलर पैनल पर लगे विशाल आकार के गोल दर्पण लगाए गए हैं। इनके जरिये सूरज की गर्मी को इकट्ठा करके खास प्रकार के उपकरणों पर फोकस किया जाता है। ये उपकरण गर्मी को सोखकर पानी को भाप में बदल देते हैं। यानी हजारों किलो भाप को इंसुलेटेड हैडर पाइप्स के ज़रिए एक सेंट्रल स्टीम ड्रम में इकट्ठा किया जाता है। वहां से यह भाप बड़े-बड़े बर्तनों में भेजी जाती है और इस भाप से भी खाना पकाने में मदद मिलती है।
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विशाल सौर ऊर्जा संयंत्र का सफरनामा
सुरम्य प्राकृतिक वातावरण ‘मधुवन’ में बने इस सौर ऊर्जा संयंत्र के बारे में बातचीत करने के लिए हमें वहां मिले इंजीनियर पंकज, विनायक भाई, योगेंद्र भाई और प्रमोद भाई। संयंत्र को देखते हुए इनके साथ घूमते-घूमते अनेक बातें हुईं। सबसे पहले तो बताया गया कि पहले सोलर प्लांट एक लंबे क्षेत्र में उसी तरह लगाए गए जैसे हम आमतौर पर कहीं घरों या दफ्तरों की छतों पर देखते हैं। फिर एक लंबे भूभाग में सूरजमुखी के समान दर्पण युक्त विशाल प्लांट लगाए गए। इसे नाम दिया गया ‘इंडिया वन।’ हमारे साथ ही चल रहे और ब्रह्मा कुमारीज से लंबे समय से जुड़े श्रीगोपाल नारसन ने कहा कि इंडिया वन लगभग 20 वर्षों की गहन सोच का नतीजा है। इस दौरान बताया गया कि वर्ष 2013 से 2017 के बीच इंडिया-वन का निर्माण ब्रह्मा कुमारीज़ की सहयोगी संस्था वर्ल्ड रिन्यूअल स्पिरिचुअल ट्रस्ट (डब्ल्यूआरएसटी) के साथ साझेदारी में किया गया। इस दौरान 770 सोलर डिश तैयार की गईं, स्थानीय कार्यशालाओं में हज़ारों पुर्ज़े बनाए गए, और इस परियोजना के लिए 250 से अधिक लोगों को ट्रेनिंग दी गई। अंततः 2017 में इस प्लांट को सफलतापूर्वक चालू किया गया। सूर्य की दिशा में घूमते गोल सौर ऊर्जा छतरियां जहां आकर्षक लगती हैं, वहीं ऊर्जा को एकत्र करती हैं। कहा जाता है कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। इसी का परिणाम है यह सौर ऊर्जा संयंत्र। लगातार बढ़ रहे विद्यार्थियों और लोगों की संख्या के कारण परंपरागत ऊर्जा से आगे जाने की जरूरत थी। इस आवश्यकताओं को समझते हुए आगे बढ़ा गया और जर्मन इंजीनियर वोल्फगैंग शेफ़लर के साथ नयी प्रणाली पर काम शुरू किया गया। कई वर्षों के परीक्षण और प्रयोगों के बाद टीम ने एक ऐसी नयी डिज़ाइन विकसित की, जिसमें ऊष्मा को सीधे संग्रहीत किया जा सकता था। देखते-देखते आज इंडिया वन एक मेगावाट विद्युत क्षमता वाला सोलर थर्मल पावर प्लांट है। यहां लगे हर पैराबोलिक डिश में 760 शीशे लगे हैं और ये ड्यूल-एक्सिस ट्रैकिंग सिस्टम के माध्यम से पूरे दिन सूर्य का अनुसरण करते हैं। ये रिफ्लेक्टर सूर्य के किरणों को एकत्रित कर उसे केंद्रित करते हैं और उस ऊष्मा को एक विशाल थर्मल एनर्जी बैटरी में संग्रहित करते हैं। इस परियोजना को भारत सरकार के नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय तथा जर्मनी सरकार के कॉमसोलर पहल का साथ मिला है। दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण के अलावा क्षेत्र एवं सौंदर्य के लिहाज से इंडिया-वन विश्व के अग्रणी उदाहरणों में से एक है। पूरी परियोजना मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस, बेंगलुरु और सोलर एनर्जी विभाग, वर्ल्ड रिन्यूअल स्पिरिचुअल ट्रस्ट, माउंट आबू का मिलाजुला प्रयास है।
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ऊर्जा और हरियाली साथ-साथ
इस खास संयंत्र के चारों ओर तीन से चार हजार के बीच पेड़-पौधे लगाए गए हैं। साथ-साथ ऑर्गेनिक खेती भी होती है। हरियाली बनाए रखने के पीछे सुंदर सोच कि प्रकृति से अगर कुछ ले रहे हैं तो उसे कुछ लौटाने की भी कोशिश करें। वातावरण को प्रदूषण रहित बनाएं। इस संयंत्र से मिली ऊर्जा के कारण हर वर्ष लगभग 2,550 टन कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन कम होता है।
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कैसे काम करती है तकनीक
सीधे शब्दों में कहें तो सबसे पहले सूर्य की किरणें आईं उससे ऊष्मा मिली। इस ऊष्मा को जमा किया गया। इससे बिजली बनी और इस बिजली का उपयोग जरूरी चीजों में गैर पारंपरिक स्रोत के तौर पर किया गया। सूर्य की रोशनी से मिली ऊष्मा को सोलर कंसन्ट्रेशन पैराबोलिक डिश के जरिये जमा किया जाता है। ये डिश सूर्य की गति के अनुसार स्वयं को समायोजित करती है और सूर्य के प्रकाश को एक स्थिर-फोकस कास्ट-आयरन रिसीवर पर केंद्रित करती है। इस तरह विशेष तकनीक के जरिये ठोस लोहे के कोर के भीतर जमा ऊष्मा को बिजली में कनवर्ट किया जाता है। यह प्रक्रिया हीट बैटरी की तरह काम करती है। खास बात है कि पूरी प्रक्रिया में ज्यादातर उपकरण स्वदेशी हैं। स्टैटिक फोकस पैराबोलॉइड डिज़ाइन के बारे में दावा है कि यह विश्व में पहली बार प्रयोग में लाया गया है। इसके जरिये ऊष्मा को सीधे फोकल पाइंट पर जमा किया जाता है। इसी तरह स्वदेशी कास्ट-आयरन कैविटी रिसीवर्स भी है जो अत्यधिक तापमान को सहते हुए ऊष्मा भंडारण करता है। ऐसे ही रिसीवर के भीतर ही थर्मल स्टोरेज हैं।
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परिसर में ही वाटर ट्रीटमेंट प्लांट
ऊर्जा के स्रोत इस विशालकाय परिसर के आसपास ही है एक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट। ब्रह्मा कुमारीज संस्था के विभिन्न परिसरों में बने भवनों का प्रयोग हो चुका पानी यानी कि बाथरूम (नहाने और कपड़े धोने के बाद) और किचन (बर्तन एवं सब्जी, दाल-चावल धोने के बाद) से निकला गंदा पानी यहां साफ किया जाता है। पहले बड़े मोटरों के जरिये प्रयोग हो चुका पानी यहां पहुंचता है। फिर पहले फिल्टर में उस पानी में ऑक्सीजन छोड़ी जाती है खास बॉक्स छोड़े जाते हैं जहां बैक्टीरिया अपना घर बनाते हैं और गंदगी को निपटाते हैं। फिर दूसरे फिल्टर में रासायनिक तरीके से पानी को साफ किया जाता है। साफ हो चुके पानी का इस्तेमाल विभिन्न परिसरों में लगे पेड़-पौधों की सिंचाई के काम लाया जाता है। इसी पानी के जरिये पत्थरों वाले इस पहाड़ी इलाकों में हरियाली दिखती है मानो पत्थरों से जिंदगी झांक रही हो। इस पूरे प्लांट को भी बिजली सौर ऊर्जा संयंत्र से ही मिलती है।
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…. और मूर्तियों को गढ़ते कलाकार
इसी इलाके में एक जगह मूर्तियों को बनाने का काम भी चलता है। राजस्थान के स्थानीय निवासियों के अलावा महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के झांसी से आये कलाकार सुंदर मूर्तियों को आकार देते दिख जाते हैं। तीन से चार चरणों के बाद तैयार हुई मूर्तियों को ब्रह्मा कुमारीज के ही विभिन्न परिसरों में पहुंचाया जाता है।
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विशेषताएं
स्थान : ब्रह्मा कुमारीज शांतिवन परिसर, आबू रोड- राजस्थान
कुल डिश : 770 प्रत्येक 60 वर्ग मीटर का
थर्मल स्टोरेज क्षमता : 250 से 450 डिग्री सेल्सियस तक
क्षमता : एक मेगावाट बिजली
कुल क्षेत्र : 35 एकड़
निर्माण का वर्ष : 2017

