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Thursday, September 21, 2017

लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा ऐ लखनऊ


इमामबाड़ा : चित्र साभार इंटरनेट


चारबाग स्टेशन : साभार इंटरनेट
केवल तिवारी
पहला नजारा : लखनऊ की एक गली में जाकर किसी से पूछा, रामअवतार मिश्रा जी के यहां जाना है। जिनसे पता पूछा था वह जनाब साथ हो लिये। कुछ दूर जाकर एक घर के बाहर आवाज लगायी, 'अरे मिसिर जी देखो आपके दोस्त आये हैं।' इन साहिबान ने पता बताया, साथ में एक कप चाय पी और चले गये। दूसरा नजारा : रिक्शेवाले भाई साहब हजरतगंज की तरफ मुंह करके खड़े हैं, आपको जाना बनारसी बाग है। पूछेंगे चलने के लिये, तो मना कर देंगे क्योंकि रिक्शे का मुंह जिधर को है, उसी तरफ जायेंगे। नवाबी ठसक जो ठहरी।
लखनऊ में अपनेपन के, लखनऊ की नफासत के और लखनऊ की नवाबी ठसक के हर दिन अनेक किस्से बनते हैं, कहे जाते हैं। समय के साथ भले यहां भी बहुत कुछ बदल गया हो, लेकिन आज भी सही मायनों में लखनऊ नफासत और नज़ाक़त का शहर है। ‘पहले आप’ की संस्कृति वाला यह शहर अगर बदल भी रहा है तो अपनी खूबियों को सहेजे हुए। यहां के बारे में सही ही कहा गया है-
ये रंग रूप का चमन, ये हुस्न--इश्क़ का वतन।
यही तो वो मुक़ाम है, जहां अवध की शाम है।
अवध की शाम वाकई होती बहुत निराली है। गोमती का किनारा हो या फिर चौक और नक्खाश की गलियां। अमीनाबाद की गड़बड़झाला हो या फिर नये बसे गोमती नगर का इलाका, यहां हर जगह वह जगमग नजर आयेगी जिसके लिये लखनऊ जाना जाता है। बस में बैठे तो कंडक्टर जनाब पूछ लेंगे, ‘कहां जाइएगा।’ ’10 रुपये दीजिये।’ ‘आप निश्चिंत रहिये, समय पर पहुंच जाइयेगा।एक अजनबी से भी अदब से पेश आने के इसी नजारे के बीच दो दोस्तों में भी कुछ यूं वार्ता चलती है, ‘अमा मियां अब बहुत हो गया।’ ‘देखो अबकी कउनू बहाना चली।’ ‘खुद को समझते का हो बे।आपसी बात सुन लीजिये, खाने-पीने के अड्डों पर चले जाइये या फिर यूं ही चहलकदमी कीजिये, आपको भी उन चंद लाइनों की याद हो आयेगी जिनमें इस शहर को कुछ इस तरह बयां किया गया है-
लखनऊ है तो महज़ गुम्बद- मीनार नहीं
सिर्फ एक शहर नहीं, कूचा बाज़ार नहीं
इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं
लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा लखनऊ

नवाबी शहर में गंज नाम की है भरमार
लखनऊ के विभिन्न इलाकों की सूची बनाने बैठेंगे तो आपको दर्जनों जगहों के नाम में गंज मिलेगा। यहां का हृदय स्थान हजरत गंज तो यहां की शान है ही, इसके अलावा उदय गंज, टूड़िया गंज, यहिया गंज, मेहंदी गंज, रकाब गंज, हुसैन गंज, सआदत गंज, मेहंदी गंज, नवाबगंज वगैरह-वगैरह। गंज के बाद अगर किसी नाम के आगे कोई शब्द ज्यादा प्रचुर है तो वह है बाग। मसलन बनारसी बाग, चारबाग, तेलीबाग, आलम बाग, केसर बाग, लालबाग वगैरह-वगैरह। नये बस रहे शहरों का नाम नगर से ज्यादा है। इनमें सबसे आधुनिकतम और विशाल है गोमती नगर।

कथक नृत्य का बड़ा घराना
उत्तर भारत की महान नृत्य शैली कथक का लखनऊ से घना नाता रहा है। वर्तमान समय में बिरजू महाराज इस घराने के बड़े नाम हैं। उनके पुत्र किशन जी महाराज भी कथक के बड़े शिक्षक हैं। अवध के नवाब के राजसभा में लखनऊ घराने का और वाराणसी के सभा में वाराणसी घराने का जन्म हुआ। लखनऊ स्थित भातखंडे में कथक सीखने वालों की आज लंबी कतार है।

आधुनकिता की रंगत में गुजिश्ता दौर से नातेदारी बरकरार
लखनऊ बदला है। बदल रहा है। लेकिन रोचक बात यह है कि आधुनिकता की रंगत में गुजिश्ता दौर से इसकी नातेदारी बरकरार है। किसी भी सभ्यता, समाज के लिये वाकई यह कठिन काम होता है। यह लखनऊ ही है जहां मॉल में पिजा, बर्गर खाने वाली पीढ़ी टुंडे के कबाब और बाजपेयी पूड़ी भंडार की पूड़ियां भी लंबी लाइन में लगकर खरीद रही है। रामआसरे की मिठाई, प्रकाश कुल्फी और सदर के बतासों की कहां नहीं चर्चा होती है। यही नहीं नक्खास का इतवारी बाजार हो या गोमतीनगर, जानकीपुरम, एल्डिको और आशियाना, हर जगह वैसी ही लखनवियत मिलेगी जैसी कश्मीरी मोहल्ले, शीश महल, राजा बाजार या सआदतगंज में

हर तरह का खाना
खान-पान के शौकीनों के लिये लखनऊ एक सलीके का दस्तरखान है। यहां पूड़ी-सब्जी, खस्ता-कचौड़ी, छोले-भटूरे, चाट, पानी के बताशे और बंद-मक्खन जैसे बेशुमार नज़राने हैं तो नॉनवेज का तो यह गढ़ ही है। टुण्डे कबाबी, रहीम की नहारी, नौशीजान और इदरीस की बिरयानी जैसी जगहों पर हर समय रंगत दिखती है।

गंगा-जमुनी तहजीब की नगरी
लखनऊ में गंगा-जमुनी तहजीब की बात समझनी हो तो कुछ दिन यहां रुककर कुछ जानकारियां जुटानी होंगी। शादाब के यहां मोहित की दावत। मोहित के घर शादाब की पार्टी। यही नहीं हर कोई याद करना चाहता है कि यहां झाऊ लाल का बनवाया इमामबाड़ा है, तो जनाबे आलिया का बनवाया हनुमान मंदिर भी हैपड़ाइन मस्जिद है, आसफुद्दौला का कल्याण गिरि मंदिर भी है। इसी शहर में मुसलमान बड़े मंगल पर हलवा-पूड़ी बंटवाते हैं, जमघट पर पतंग उड़ाते हैं, होली में रंग खेलते हैं, कृष्ण जी की बारात में शामिल होते हैंहिंदू मुहर्रम में अजादारी करते हैं, सबीले लगवातें हैं और रमज़ान में सहरी के लिए जगाते हैं, बल्कि इफ्तारी का इंतज़ाम भी करते हैं

इतिहास के आईने में
लखनऊ के बारे में फिरदौस ने लिखा है-
शहरे वफ़ा भी तू, शहरे निगार भी कहते हैं सब तुझे रश्के बहार भी
तू सरज़मीने इश्क, फिरदौसे हुस्न तू दुनिया में कहाँ दूसरा,तुझसा दयार भी
शाहे सुखन भी है, अहले ज़बान तू चढ़कर नहीं उतरता, तेरा खुमार भी
दुनिया में कम नहीं, तेरे चाहने वाले तेरी अदा के कायल,तुझपर निसार भी
शहरे लखनऊ, तुझको नहीं पता तुझ बिन नहीं संभलता,मेरा कल्बे ज़ार भी
लखनऊ को प्राचीन काल में लक्ष्मणपुर और लखनपुर के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि अयोध्या के राम ने लक्ष्मण को लखनऊ भेंट किया था। लखनऊ के वर्तमान स्वरूप की स्थापना नवाब आसफउद्दौला ने 1775 .में की थी। अवध के शासकों ने लखनऊ को अपनी राजधानी बनाकर इसे समृद्ध किया। लेकिन बाद के नवाब विलासी और निकम्मे साबित हुए। आगे चलकर लॉर्ड डलहौली ने अवध का अधिग्रहण कर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। 1850 में अवध के अन्तिम नवाब वाजिद अली शाह ने ब्रिटिश अधीनता स्वीकार कर ली। लखनऊ भले बहुत बदला हो, लेकिन हर दौर को इसने अपनेआप में समेटा है।

देखने लायक जगह
यूं तो लखनऊ में कदम-कदम पर देखने लायक स्थान हैं। कुछ हाल में बने तो कुछ ऐतिहासिक। इनमें से कुछ खास इस तरह से हैं- बड़ा इमामबाड़ा, घंटाघर, सआदत अली का मकबरा, रूमी दरवाजा, हुसैनाबाद इमामबाड़ा, रेज़ीडेंसी,  जामी मस्जिद, नारसी बाग, पिक्चर गैलरी, मोती महल
इमामबाड़े का निर्माण आसफउद्दौला ने 1784 में अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत करवाया था। यह विशाल गुम्बदनुमा हॉल 50 मीटर लंबा और 15 मीटर ऊंचा है। यहां एक अनोखी भूल भुलैया है। यहां भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है। यह घंटाघर 1887 . में बनवाया गया था। इसे ब्रिटिश वास्तुकला के सबसे बेहतरीन नमूनों में माना जाता है। बेगम हजरत महल पार्क के समीप सआदत अली खां और खुर्शीद जैदी का मकबरा है। यह मकबरा अवध वास्तुकला का शानदार उदाहरण हैं। बड़ा इमामबाड़ा की तर्ज पर ही रूमी दरवाजे का निर्माण भी अकाल राहत प्रोजेक्ट के अन्तर्गत किया गया है। हुसैनाबाद इमामबाड़ा मोहम्मद अली शाह की रचना है जिसका निर्माण 1837 . में किया गया था। इसे छोटा इमामबाड़ा भी कहा जाता है। लखनऊ रेजिडेन्सी के अवशेष ब्रिटिश शासन की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। सिपाही विद्रोह के समय यह रेजिडेन्सी ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजेन्ट का भवन था। यह ऐतिहासिक इमारत शहर के केन्द्र में स्थित हजरतगंज क्षेत्र के समीप है। यह रेजिडेन्सी अवध के नवाब सआदत अली खां द्वारा 1800 . में बनवाई गई थी। हुसैनाबाद इमामबाड़े के पश्चिम दिशा में जामी मस्जिद स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण मोहम्मद शाह ने शुरू किया था लेकिन 1840 . में उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने इसे पूरा करवाया। बनारसी बाग यहां का चिड़ियाघर है। स्थानीय लोग इस चिड़ियाघर को बनारसी बाग कहते हैं। हुसैनाबाद इमामबाड़े के घंटाघर के समीप 19वीं शताब्दी में बनी यह पिक्चर गैलरी है। यहां लखनऊ के लगभग सभी नवाबों की तस्वीरें देखी जा सकती हैं। गोमती नदी की सीमा पर बनी तीन इमारतों में मोती महल प्रमुख है। इसे सआदत अली खां ने बनवाया था।

Tuesday, August 22, 2017

जोशी जी की भावपूर्ण विदाई : सेवा से निवृत्ति है, रिश्तों से नहीं

अनुभवों को साझा करते हरीश जोशी (बाएं)। साथ में हैं संपादक राजकुमार सिंह (बीच में) एवं समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ
अपनी पत्नी के साथ भावुक जोशीजी।
इस ब्लॉग को लिखने में थोड़ा विलंब हो गया। कारण कई होते हैं। यहां भी रहे। लेकिन आज लिख रहा हूं। पिछले दिनों दैनिक ट्रिब्यून के वरिष्ठ पत्रकार हरीश जोशी सेवानिवृत्त हुए। बेहद सादगी भरा उनका विदाई कार्यक्रम अंत में सबको भावुक कर गया। जोशी जी संपादक राजकुमार सिंह जी के साथ न्यूज रूम में आये। कुछ बातें हुईं। इस बीच खाने-खिलाने का भी दौर चला। दो बार मिठाई। एक बार समोसे आदि। मन था कि लोग कुछ बोलें। शायद सबके मन में। लेकिन एक तो शाम का वक्त जो डेस्क कर्मियों के लिए बड़े तनावपूर्ण होते हैं, ऐसे में माहौल भावुक। इस बीच, हमारे समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ जी ने कुछ किस्से सुनाये। उन्हीं में से एक यह भी कि एक कोई उनके पुराने साथी रिटायरमेंट के समय पर गुरु मंत्र दे गये कि स्पॉट रिपोर्टिंग क्यों जरूरी होती है। उन्होंने इस संदर्भ में एक किस्सा भी सुनाया। जोशी जी कुछ बोले, कुछ बोलते-बोलते रह गये। कुछ बातें संपादक जी ने कहीं। उन्होंने एक वाक्य में भावुक बात कही, 'जोशी जी आप सेवा से निवृत्त हो रहे हैं, रिश्तों से नहीं।' रिश्ते वाकई ट्रिब्यून परिवार में बहुत अच्छे हैं। मुझे तो यहां आये अभी चार साल हुए हैं, लेकिन यहां लोगों का चार-चार दशकों से भी पुरानी दोस्ती है। स्वयं जोशी जी ने तीन दशकों तक ट्रिब्यून को अपनी सेवाएं दीं। जोशी के इस विदाई कार्यक्रम में भले मैं उस समय कुछ न बोल पाया, लेकिन मन में कुछ ऐसा भाव था-
पुरबा बता दे, कहां की हवा है। सागर से पूछो दरिया कहां है।
अंधेरे बहुत फैल जाएं तो समझो, उठो अब कि अपना सवेरा हुआ है।

वाकई यह मौका भी तो एक सवेरा ही होने जैसा है। कौन कहता है कि विदाई की घड़ी एक शाम जैसी होती है। बल्कि अब तो नयी जिम्मेदारियां, नए फलक पर आपको नये रूप से चलना है। हां, यह भी सत्य है कि दफ्तर के लिए आपके लिए एक शाम शुरू हो गयी है जैसे बशीर बद्र साहब ने लिखा है-
थके-थके पेडल के बीच चले सूरज, घर की तरफ लौटी दफ्तर की शाम।
जोशी जी! बेशक इस पूरी चर्चा, प्रकरण में मैं स्वयं सागर में एक कटोरा पानी जैसा हूं, लेकिन जितना वक्त भी आपके साथ गुजरा प्रेरणादायक रहा। इस पर मैं यही कह सकता हूं-
आपके आभार की लिपि में प्रकाशित
हर डगर के प्रश्न हैं मेरे लिए पठनीय
कौन सा पथ कठिन है...
मुझको बताओ
मैं चलूंगा।

असल में जोशी जी की विदाई का यह नजारा उस समय ज्यादा भावुक हो गया, जब हम सभी न्यूज रूम के साथी उन्हें छोड़ने गेट तक आये। वहां उनकी पत्नी, बेटी-बेटा इंतजार कर रहे थे। श्रीमती जोशी ने कहा, 'इन्हें फर्क पड़े न पड़े हमें तो बहुत पड़ने वाला है। ट्रिब्यून को लेकर एक बल मिलता था। एक गर्व का अहसास होता था कि जोशीजी ट्रिब्यून में सीनियर जर्नलिस्ट हैं।' उनके इस कथन पर सभी ने कहा अभी भी जोशी जी ट्रिब्यून से जुड़े रहेंगे। लेखन से। कुछ और काम से। लेकिन इस दौरान अब तक बहुत 'मजबूत' दिख रहे जोशी जी की आंखें छलक आयीं। उनका भावुक अंदाज मानो कह रहा हो-
मेरे गीत तुम्हारे पास सहरा पाने आएंगे, मेरे बाद तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आएंगे।
ये सच है कि पांवों ने बहुत कष्ट उठाये, पर पांव किसी तरह से राहों पे तो आये।
... फिरता हूं कई यादों को सीने से लगाये।

इसके बाद माहौल लगातार भावुक हुआ जा रहा था। सबने जोशी जी और उनके परिवार के लोगों को नमस्कार कहा। और साथ में यह भाव रखा जैसे कह रहे हों-
कभी दिन की धूप में झूम के, कभी शब्द के फूल को चूम के।
यूं ही साथ-साथ चलते रहें, कभी खत्म अपना सफर न हो।

Saturday, August 5, 2017

तो क्या मुंशी प्रेमचंद प्रोफेशन लेखक थे



‘लिव इन रिलेशन’, ‘देशभक्ति’, ‘जिहाद’ और ‘फैमिली प्लानिंग’ पर भी लिखा
मुंशी प्रेमचंद के बारे में आपके मन में कैसी छवि है। वह गरीब थे। उनकी कहानियों के पात्र बेहद दीन-हीन होते थे। समाज का दबा-कुचला तबका उनकी कहानियों के केंद्र में होता है। वह कुछ खास विषयों को ही उठाते थे। यदि ऐसे ही विचार हैं तो शायद यह पूरा सच नहीं है। प्रेमचंद अपने दौर के सबसे महंगे लेखकों में से थे। उनके पास अच्छी-खासी रकम भी थी। यही नहीं उन्होंने कई मुद्दों पर अपनी कलम चलायी। चाहे वह 'लिव इन रिलेशन' हो, देशभक्ति हो, सांप्रदायिकता हो या फिर कोई और मुद्दा। यह दावा मैं नहीं कर रहा हूं। दरअसल, मुंशी प्रेमचंद की जयंती के मौके पर हरियाणा साहित्य अकादमी के एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला। कार्यक्रम के अध्यक्ष थे प्रेमचंद पर आधिकारिक शोधकर्ता माने जाने वाले कमल किशोर गोयनका। अन्य वक्ता भी थे। कई लोगों ने विचार रखे, लेकन गोयनका साहब ने जो जानकारी दी, वह मेरे लिए नयी थीं। पहले तो यह कि प्रेमचंद गरीब नहीं थे। दूसरा यह कि वह कोई ट्रेंडी लेखक नहीं थे। उन्होंने हर तरह की कहानियां लिखीं और इतनी लिखीं कि सबके बारे में कोई नहीं जानता। दस हजार 200 पेजों के साहित्य के बारे में तो उनके बेटों को भी मालूम नहीं था। गोयनका जी का शोध के आधार पर दावा था कि सैकड़ों कहानियों का तो जिक्र ही नहीं किया जाता। यहां तक की उनके बेटे अमृतराय ने भी कई बातें छिपायीं। उन्होंने ऐसा क्यों किया यह किसी को नहीं पता।
मैं जो सवाल उठा रहा हूं कि क्या प्रेमचंद प्रोफेशनल लेखक थे, उसे उठाने के पीछे इसी कार्यक्रम से मिली जानकारी है। पहले बात करते हैं उन्हें अब तक गरीब घोषित करने की कोशिशें के बारे में। गोयनका साहब ने बताया कि प्रेमचंद जी की पहली नौकरी लगी तो उन्हें 20 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। इसका अंदाजा आजकल के लोग इस तरह से लगा सकते हैं कि तब सोना 10 रुपये प्रति तोला था। गोयनका जी के मुताबिक स्वयं एक जगह प्रेमचंद जी ने कहा, ‘मुझे इतनी तनख्वाह की उम्मीद नहीं थी।’ यही नहीं कई जगह इस बात का भी जिक्र है कि उन्हें एक कहानी का पारिश्रमिक 20 रुपये मिलता था। यह बात वर्ष 1920 की है। वर्ष 1921 में उन्होंने जब उन्होंने नौकरी छोड़ी तो उन्हें 100 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। जब वह माधुरी के संपादक बने तो उनका वेतन 150 रुपये महीना था। उसके बाद वह फिल्म लाइन में गये तो उनका वेतन 800 रुपये प्रतिमाह हो गया। वर्ष 1929 में उन्होंने बेटी की शादी में 7000 (सात हजार रुपये) खर्च किए। गोयनका जी का दावा है कि उनके बेटे श्रीपत राय ने भी यह माना कि प्रेमचंद जी ने शादी में सात हजार रुपये खर्च किए थे। असल में किसी का अमीर या गरीब होना कोई गुण या दोष नहीं है। बात है सबके सामने सच आने की। सच को स्वीकार कर लेने में हर्ज क्या है? उन्होंने और भी कई बातें बतायीं जिनके जरिये यह कहा जा सकता है कि सच नहीं कहा गया। मसलन उनके बेटे अमृत राय द्वारा लिखी गयी किताब ‘कलम का सिपाही’ में लिखा गया है कि प्रेमचंद की मौत के समय कोई साहित्यकार वहां नहीं आया। इसके उलट गोयनका जी का दावा है कि अनेक जाने-माने साहित्यकारों ने उस समय का चित्रण अपनी चिट्ठियों और डायरी में लिखा है। जाहिर है कि वे सब वहां मौजूद थे। खैर...। इन सब बातों को बताने का मकसद यही है कि सच को सच ही रहना देना चाहिए, उसी तरह जिस तरह मुंशी प्रेमचंद जी जैसा शायद ही आज तक किसी ने लिखा हो।
अब बात करें उनकी कुछ अनकही कहानियों की
गोयनका जी ने उक्त कार्यक्रम में प्रेमचंद जी की कुछ कहानियों का जिक्र किया।
आसूं : इस कहानी में एक व्यक्ति की अफगानिस्तान की प्रेमिका होती है। वह प्रेमी से कहती है कि दुनिया की अनमोल चीज मेरे लिए लेकर आओ। वह कई चीजें ले जाता है, लेकिन वह उन्हें अनमोल नहीं मानता। होते-करते वह जलिवाला बाग जाता है। वहां चारों ओर लाश पड़ी होती है। एक वीर जिसके हाथ कटे होते हैं, पूरे जोश से भारत माता की जै कहता है, उसके खून का एक बूंद टपकता है। वह व्यक्ति प्रेमिका के लिए वह बूंद ले जाता है। प्रेमिका का पूरा माजरा जानकर कहती है, हां यह है अनमोल चीज। खून का आखिरी कतरा भी जो देश के लिए कुर्बान कर दे वही महान है। ... इस कहानी के जरिये उन्होंने देशभक्ति का जोश भरा है।
कमल किशोर गोयनका
एक अन्य कहानी में एक व्यक्ति अमेरिका से भारत आता है। लंबे समय अमेरिका में रहने के बाद उसकी इच्छा होती है कि वह भारत में ही मरे। यहीं उसका अंतिम संस्कार हो। यहां आकर वह देखता है कहीं जुआ खेला जा रहा है, कहीं कुछ और निकृष्ट काम हो रहा है। वह कहता है यह तो मेरा देश नहीं। तभी वह गंगा किनारे जाता है। वहां एक गीत चल रहा होता है, प्रभुजी अवगुन चित न धरो। वह व्यक्ति गंगा में छलांग लगाते हुए कहता है, यही है मेरा देश।
जिहाद : यह कहानी आतंकवाद पर लिखी गयी है। इसमें 1924-25 के दौरान रावलपिंडी में हुए दंगों के जरिये आतंक के विस्तार पर चिंता व्यक्त की गयी है।
कैदी : इसमें एक व्यक्ति उस महिला से शादी करता है जो पहले से प्रेगनेंट होती है। उस व्यक्ति पर समाज ताने मारता है। कहानी के अंत में वह व्यक्ति कहता है, ‘अगर मैंने कोई खेत खरीदा हो जिसमें पहले से फसल बोई हो तो क्या वह खेत मेरा न हुआ।’ इसमें कहानी के जरिये समाज की रूढ़िवादिता के खिलाफ चोट की गयी है।
परिवार नियोजन पर प्रेमचंद जी की एक कहानी है। इसमें एक व्यक्ति कहलवाता है कि उसके यहां किसी की मौत हो गयी। लोगों के समझ में नहीं आता कि ऐसा कैसे हो गया। उसके यहां तो कोई बुजुर्ग भी नहीं है। सब उसके घर जाते हैं। वह कहता है मेरे घर में तीसरा बच्चा पैदा हुआ है। मैं पहले से ही जन्मे दो बच्चों की परवरिश नहीं कर पा रहा हूं तो इसे कैसे पालूं। इसका होना किसी के मरने जैसा ही हुआ। वह एक सांकेतिक पुतला बनाता है। उसे गंगा किनारे ले जाता है। मुर्दे की तरह उसका संस्कार करता है। कहानी का अंत प्रेमचंद इस तरह से करते हैं- वह व्यक्ति हाथ में गंगाजल लेकर सौगंध खाता है कि ‘अब ऐसी गलती नहीं करेगा।’
एक अन्य कहानी जो ‘लिव इन रिलेशन पर’ है। इसमें एक प्रोफेसर और एक डॉक्टर में प्यार हो जाता है। दोनों बिना शादी के साथ रहने लगते हैं। बाद में प्रोफेसर एक अन्य युवती के साथ विदेश भाग जाता है और डॉक्टर के पैसे भी ले जाता है। महिला प्रेगनेंट होती है। उसका बच्चा हो जाता है। एक दिन वह अपने घर की बालकनी में खड़ी होती है। परेशान होती है। तभी नीचे देखती है कि एक अंग्रेज जोड़ा बग्घी में अपने बच्चे को ले जा रहे हैं। कहानी यहीं खत्म हो जाती है। इस कहानी में प्रेमचंद ने पारिवारिक मूल्यों को बनाये रखने का संदेश दिया है। परिवार है तो सब है।
ऐसी ही कई कहानियों का जिक्र गोयनका जी ने किया। कार्यक्रम में अनेक अन्य लोग भी थे। प्रेमचंद जी के बारे में कई नयी बातें पता चलीं। हरियाणा साहित्य अकादमी और गोयनका जी का धन्यवाद। बस सवाल यही है कि प्रेमचंद जी को अच्छा मेहनताना मिलता था। हर विषय पर उन्होंने लिखा। तो क्या वे प्रोफेशनल लेखक थे।


Thursday, July 20, 2017

यह रहा देश के अब तक के राष्ट्रपतियों का कार्यकाल

रामनाथ कोविंद देश के 14 वें राष्ट्रपति के रूप में 25 जुलाई को कार्यभार ग्रहण करेंगे। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधानिक पद को सुशोभित करने वाले अब तक के 13 राष्ट्रपति का कार्यकाल इस प्रकार रहा है- देश के आजाद होने के बाद पहला राष्ट्रपति होने का गौरव डॉ राजेन्द्र प्रसाद को प्राप्त हुआ। वह 12 वर्ष तक इस पद रहे और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जो दो बार इस पद के लिए चुने गये। उन्होंने सबसे पहले 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला और वह 12 मई 1962 तक इस पद पर रहे। दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन ने 13 मई 1962 को यह पद ग्रहण किया और 12 मई 1967 तक वह इस पद पर रहे। तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक इस पद पर रहे। डा हुसैन का कार्यकाल के दौरान ही निधन हो गया था। इसके बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया। श्री गिरि 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में काम किया और फिर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिये इस्तीफा दे दिया। गिरि के इस्तीफा देने के बाद उस समय के मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्ला ने नया राष्ट्रपति निर्वाचित होने तक कार्यवाहक राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला। श्री गिरि चुनाव जीतने ने बाद 24 अगस्त 1969 से 23 अगस्त 1974 तक राष्ट्रपति रहे। पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद बने और उनकी भी कार्यकाल के दौरान ही मृत्यु हो गई, जिसके बाद उपराष्ट्रपति बसप्पा दानप्पा जत्ती 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे।  छठे राष्ट्रपति के तौर पर नीलम संजीव रेड्डी 25 जुलाई 1987 से 24 जुलाई 1982 तक इस पद पर रहे। ज्ञानी जैल सिंह ने 25 जुलाई 1982 से 24 जुलाई 1987 तक सातवें राष्ट्रपति के रूप में काम किया। इसके बाद रामास्वामी वेंकटरमन आठवें राष्ट्रपति बने और 25 जुलाई 1987 से 24 जुलाई 1992 तक इस पद पर रहे। नौवें राष्ट्रपति के तौर पर डॉ़ शंकर दयाल शर्मां का कार्यकाल 25 जुलाई 1992 से 24 जुलाई 1997 तक रहा। दसवें राष्ट्रपति केआर नारायण 25 जुलाई 1997 से 24 जुलाई 2002 तक रायसीना हिल्स में रहे। ग्यारहवें राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल 25 जुलाई 2002 से 24 जुलाई 2007 तक रहा। इसके बाद प्रतिभा पाटिल 12 वीं राष्ट्रपति बनीं और वह 25 जुलाई 2007 से 24 जुलाई 2012 तक इस पद पर रहीं। वह देश की पहली महिला राष्ट्रपति थीं। वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री के पद पर रहने के बाद 25 जुलाई 2017 को देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद संभाला। तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल 24 जुलाई 2017 को समाप्त हो रहा है।

Saturday, July 8, 2017

उत्तराखंड की यादगार यात्रा और मूड ऑफ का पुराना कनेक्शन



सीताबनी में भोजन के बाद एक ग्रूप फोटो


बारी लेडीज की : आदरणीय माताजी (पत्नी की दीदी की सास) के साथ जवां मंडली
 केवल तिवारी
ठंड लगे तो हंस जाओ : सीताबनी के ठंडे झरनों पर स्नान


आओ नदी में उतरें : रामनगर गर्जिया देवी के पास नदी में उतरीं साहसिक महिलाएं
ये हैं भास्कर जोशी : स्वभाव में शांत, गाड़ी चलाने और खर्च करने में उस्ताद
मुझे घूमना-फिरना अच्छा लगता है। बशर्ते कई लोग हों। मसलन अपना परिवार, रिश्तेदारों का परिवार या मित्र। जनवरी में चेन्नई-पुद्दुचेरी यात्रा की चर्चा अभी हमारे परिवार में चल ही रही थी कि तय हुआ इस बार गर्मियों में उत्तराखंड चला जाये। कार्यक्रम अपने मूल घर रानीखेत भी जाने का बना, लेकिन अचानक एक मौत की खबर आयी। रिश्ते में हमारी भाभी लगने वाली एक महिला का निधन हो गया। अंत समय में बेहद दुखद दिन देखने वाली यह महिला अपने जमाने में बेहद बिंदास थी। मैं उनके बच्चों की उम्र का हूं, रिश्ता हमारा देवर-भाभी वाला था। जैसी पारिवारिक और अन्य तकलीफों से वह गुजर रहीं थीं, उनका रुखसत होना ही परिणति थी। खैर... इस सूचना के बाद गांव जाने का कार्यक्रम तो मुल्तवी हो गया क्योंकि न तो पूजापाठ हो सकती थी और न ही घूमना-फिरना। बच्चे गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही चले गये थे। हल्द्वानी, काठगोदाम। आसपास दीदीयां रहती हैं। ससुराल भी वहीं हैं। इस बीच अन्य रिश्तेदार भी पहुंचे। बड़ा बेटा मामा संग अल्मोड़ा के कई इलाकों में घूमने गया। पत्नी छोटे बेटे संग आसपास रिश्तेदारों के यहां मिलने में व्यस्त रही। तय कार्यक्रम के अनुसार मैं भी 22 जून को पहुंच गया। तय किया कि एक दिन 'सात ताल' चला जाये। दो दिन 'गर्जिया देवी', 'कोटाबाग', 'जिम कार्बेट', 'सीताबनी' इलाकों में गुजारे जायें। एक दिन आराम के बाद फिर वापस अपनी-अपनी जगह। इसी बीच हल्द्वानी में हमारे मित्र दिनेश, ललित दा की मांता जी के निधन की खबर मिली। स्वस्थ हालत में करीब 85 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। उन्हें सब लोग ताईजी के नाम से पुकारते थे। वह मुझे बहुत प्यार करती थीं। कई बार उन्होंने अपनेपन से डांटा कि मिलने नहीं आता। और भी कई यादें उनसे जुड़ी हैं। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने में भी रानीबाग स्थित श्मशान घाट गया। खैर होनी को कौन टाले। अब फिर विचार हुआ कि कहां चला जाये। बहुत सी जगहों पर चर्चा हुई। पहले हम लोग सात ताल गये। मैं आसपास तो खूब घूमा हूं, लेकिन प्रॉपर सात ताल पहली बार गया। वहां बहुत अच्छा लगा। बीच ताल में नाव में बैठकर आड़ू खाने का अलग ही लुत्फ आया। अगले दिन हम लोगों ने निकलना था दो दिन के टूर पर। पहले कोटाबाग अपने साढू भाई को रिसॉर्ट बुक कराने को कहा, लेकिन कोई खाली नहीं था, फिर अपने भांजे मनोज के सुसर श्री कांडपाल जी से अनुरोध किया। उन्होंने पहले ही वाक्य में कहा, सब हो जायेगा। आप लोग बस आ जाओ। इस बार हम लोग फिर दो गाड़ियों में थे। मेरी दीदी-जीजा जी, बच्चों के मामा-मामी बाद में एक साढूभाई की माताजी भी साथ हो लीं। उनके भी कुछ रिश्तेदार। इस बार के सफर में बच्चों की बड़ी मामी उनकी बेटी और बेटा साथ नहीं चले। हम लोग सुबह गर्जिया देवी गये। वहां पूजा-अर्चना के बाद नदी में बच्चों ने काफी देर तक एंजॉय किया। उसके बाद कांडपाल जी को फोन लगाया। उन्होंने कहा रिसॉर्ट तो सब फुल चल रहे हैं, पर इंतजाम पूरा है। आप लोग आ जाओ। जायें कि नहीं, इस असमंजस में हम लोग चल दिये। बीच में गाड़ी वाले ने कुछ चालाकी दिखायी और पैसे लेकर चलता बना। हमने भी उससे चिकचिक करनी पसंद नहीं की। कुछ लोग कांडपाल जी के यहां रुक गये, कुछ चले गये कोटाबाग। भांजे मनोज का आग्रह और कांडपाल जी की प्यारी जिद ने मुझे भी वहीं रोक लिया। अगले दिन सुबह पास में ही छोटे से डैम में मैं, मेरा बेटा और जीजाजी नहाने चले गये। एक घंटा नदी में ही पड़े रहे। बेहद आनंद आया। उसके बाद गये रमणीक स्थल सीताबनी में। यहां जाने का रास्ता था जिम कार्बेट जंगल के बीच पथरीली राहों भरा। बच्चों के मामा भास्कर की गाड़ी में मैं बैठा था। दिल्ली में कार चलाने वाले भास्कर ने इतनी खूबसूरती से वहां गाड़ी ड्राइव की, मैं हतप्रभ रह गया। सीताबनी पहुंचे। ठंडे झरनों में स्नान किया। फिर पूजापाठ। उसके बाद वहीं चाय बनायी। वहीं खाना बनाया और खाया। जंगल से सूखी लकड़ियां लेकर खाना बनाने और साथ खाने का जो आनंद आया, वह अवर्णनीय है। इस सबमें अन्य लोगों के अलावा मेरे साढूभाई सुरेश पांडेय जी का सहयोग बेहद सराहनीय रहा। शाम को हम लोग कोटाबाग होते हुए काठगोदाम आ गये। यहां आकर फिर पता चला एक बच्चे (हम तो बच्चा ही कहते हैं हालांकि वह करीब 25 साल का हो गया है) ने अपनी मां पर हाथ उठाया है। असल में वह उत्तराखंड में फैले स्मैकियों के जाल में कुछ साल पहले फंस चुका है। उसको सुधारने के तमाम प्रयास बेकार साबित हुए। उसे नशा मुक्ति केंद्र में भी डाला गया। प्यार से समझाया भी गया। वह इतना ‘चालाक’ है कि हम जैसे दो दिन के मेहमानों के समझाने पर ऐसे रिएक्ट करता है, मानो वह सुधर गया, लेकिन ऐसा होता नहीं। उस वक्त थोड़ा गुस्सा किया। अगले दिन उसे कुछ समझाया। उसके चाचा तो अगले दिन अपने काम पर लौट गये, लेकिन मुझे दो दिन और रुकना था। उसे मैंने भी बहुत समझाया। वह बोला, अब पढ़ाई करूंगा, कंपटीशन दूंगा। यहां बता दूं कि वह दसवीं तक पढ़ने में बहुत अच्छा था। जब तक हम रुके वह सामान्य बना रहा, लेकिन फिर खबरें नकारात्मक आ रही हैं। पता नहीं क्या होगा उसका। लेकिन इस बीच हैरान करने वाली बात हुई। पुलिस के कुछ अधिकारियों से मैंने बात की। उनका कहना था कि स्मैकियों के नेटवर्क को तोड़ना बहुत मुश्किल है। पंजाब आदि जगहों की तो लोग चर्चा करते हैं, लेकिन उत्तराखंड में नशे का भयानक जाल फैला है। इस पर कोई चर्चा नहीं करता। मैंने एसएसपी आदि को अलग से मेल भी किया है। जगह-जगह स्मैक बिक रहा है। कई बच्चे इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं। हाल ही में वहां एक नशामुक्ति केंद्र तक में ये नशे के सौदागर पहुंच गये। खैर... उत्तराखंड का पूरा टूर अच्छा रहा, लेकिन इस बच्चे की वजह से सारा गड्डमड्ड हो गया। पता नहीं यह सुधरेगा भी या नहीं।

Sunday, June 18, 2017

हिमाचल के बद्दी की छोटी सी यात्रा



सफर के दौरान ही दिखा ईंट भट्टा

रासते में हरियाली ही हरियाली

सफर के बीच में पड़ा पंजाब का कुछ हिस्सा
पिछले दिनों अपने मित्र सुनील कपूर के साथ बद्दी जाने का कार्यक्रम अचानक बन गया। यूं इस यात्रा में उल्लेख करने लायक कुछ नहीं है, लेकिन चंडीगढ़ से बद्दी तक की सड़कें लाजवाब रहीं। गाड़ी फर्राटा भरती रही। रास्तेभर फल बेचने वालों की कतार लगी रही। यहीं से कुछ आम और आड़ू लिए। इस सीजन के पहले आम। रास्ते में ईंट के भट्ठे देखे। लखनऊ में जब रहता था तो ईंट भट्ठों के पास अक्सर जाया करते थे। घर से आलू और शकरकंदी ले गये। भट्ठे की गरम राख में दबा दिया। कुछ देर खेलकूद में मस्त फिर शकरकंदी और आलू निकालकर खाना। अब तो कहीं-कहीं ही भट्ठे दिखते हैं। लखनऊ में हमारे घर के आसपास जहां ये ईंट भट्ठे थे, वहां अब उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद की हाउसिंग स्कीम लॉन्च हो गयी है। बड़ी-बड़ी बस्तियां बस गयीं हैं। जहां खेत-खलिहान होते थे, वहां साइकिल से भी निकलना मुश्किल होता है। इसे विकास का असमान विस्तार कहा जाये या फिर कुछ फिलहाल बद्दी के मार्ग पर तो सड़कें भी चकाचक हैं और पेड़-पौधों के अलावा ईंट-भट्ठे भी दिखते हैं। रास्ते में कुछ देर सुस्ताने का मन हो तो उसके लिए भी कहीं-कहीं जगह दिख जाती है। वैसे विस्तार से घूमने का कार्यक्रम बनाऊंगा तो संभवत: और आनंद आयेगा। एक टोल भी पड़ा। कोई पर्ची नहीं, बस उसने 40 रुपये मांगे और जाने के लिए कह दिया।
-केवल तिवारी

Friday, June 16, 2017

पच्चीस नंबर



सजल ने अब चौथी बार रघु से सवाल पूछा कि इस बार कहां गये थे? रघु का वही जवाब '25 नंबर।' दोनों हंस पड़े। असल में पिछले चार-पांच दिनों से यही हो रहा था। रघु को हर बार 25 नंबर काउंटर पर जाना पड़ रहा था। अस्पताल में 25 नंबर का आलम यह था कि न तो वह 24 के करीब था और न ही 26 के आसपास। उसका निशान (साइन बोर्ड) जरूर कई जगह बने थे। दूसरी मंजिल से भी एक एरो बना हुआ था। वहां से अंदाजा लगाया जा सकता था कि 25 नंबर काउंटर है कहां? दूसरी मंजिल पर ही बने वार्ड में सजल भर्ती थे। दिक्कत यह थी कि 25 नंबर वार्ड वहां था ही नहीं, जहां उसे होना था। रघु चूंकि अब अभ्यस्त हो गया था। इसलिए ज्यादा परेशानी नहीं होती। लेकिन कई बार अगर रात 11 बजे बाद वहां जाना होता तो वह रास्ता भूल जाता। असल में जो रास्ता रघु को मालूम था, वह रात 10 बजे बंद हो जाता था। बाकी काउंटर जैसे 22, 23, 27 आदि एक ही फ्लोर पर थे, लेकिन 25 नंबर था तीसरी मंजिल पर। असल में 25 नंबर का वास्ता रघु का भी तभी से पड़ा जब से सजल यहां भर्ती थे। सजल एक बेहतरीन फोटोग्राफर माने जाते थे। फोटोग्राफी के प्रति उनके लगाव का आलम यह था कि वह अस्पताल के बेड पर पड़े वक्त भी एंगल की बात करते। कभी कहते, 'रघु सामने जो पेड़ है, उसको अगर तुम इस बिल्डिंग की छत पर जाकर कैमरे में कैप्चर करो तो एक अलग नजारा दिखेगा।' रघु बात से सहमत होते हुए सिर हिला देता। रघु भी था तो फोटोग्राफर, लेकिन एंगल और नयेपन का इतना जुनून उसमें नहीं था, जितना सजल साहब में। फिर सजल साहब रघु से तकरीबन 12 साल बड़े भी तो थे। फोटोग्राफी की कई बारीकियां तो रघु ने सजल साहब से ही सीखी थीं। यूं तो कई अन्य वरिष्ठ फोटोग्राफरों से रघु का वास्ता पड़ा, लेकिन सजल साहब के एंगल उसे एकदम अलग लगते। सजल की बातों को सुनने के बाद कई बार रघु का मन करता कि चलो छत पर चढ़कर एक फोटो इस पेड़ की ले ली जाये, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। सजल साहब का एंगल के प्रति जुनून का आलम यह था कि एक बार तो पता ही नहीं चला कि उन्होंने कब रघु की चाय पीते तस्वीर ले ली। वह तस्वीर इतनी खूबसूरत आयी कि लगा नहीं कि वह किसी अस्पताल के वार्ड में किसी मरीज का तीमारदार बना हुआ है। रघु को सजल साहब से खुलकर बात करने में भी संकोच होता था। लेकिन इन दिनों अस्पताल में थे तो लंबी खामोशी भी तो नहीं चल सकती थी। तीमारदारी के दौर में ही एक बार तो हिम्मत करके रघु ने पूछ ही लिया, 'सर ये आइडियाज कैसे आते हैं आपको।' सजल मुस्कुरा दिये और बोले आज घर जाते वक्त अमलताश के पेड़ों की कतार देखना और ऐसे ही क्लिक कर देना। वाकई गजब हो गया। रघु की वह तस्वीर उसके अखबार के पेज वन पर छप गयी। अगले दिन सुबह 11 बजे जब रघु अस्पताल पहुंचा तो सजल साहब मुस्कुराये। बोले, ‘देखा अच्छी बन गयी ना तस्वीर।’ फिर उन्होंने पूछा, ‘ये कैप्शन किसका है?’ 'मिलजुलकर बनाया है।' रघु का जवाब था। सजल साहब थोड़ा गुस्सा सा हुए। बोले, 'खुद नहीं बनाया है तो दूसरों को क्रेडिट देना सीखो।' ऐसे ही कई मौके होते थे जब सजल साहब प्रैक्टिकल बातें करते और कुछ अच्छी बातें भी समझाते। असल में सजल साहब पिछले कुछ दिनों से बहुत बीमार हो गये थे। वह तसवीरों के एंगल को लेकर बातें तो करते, लेकिन काम जैसे उन्होंने खुद करना लगभग बंद कर दिया था। रघु से कोई खास इंटीमेसी उनकी नहीं थी। हां जान-पहचान बहुत पुरानी थी। बल्कि वह तो रघु के कई बार बॉस भी बने रहे। सजल साहब के साथ एक अजीब बात थी कि वह हमेशा प्रोफेशनल बातें ही करते। तसवीर कैसी है। तसवीर का एंगल क्या हो। कैसे कोई फोटो बहुत अच्छी हो सकती है, वगैरह-वगैरह। रघु-सजल कई बार बॉस और मुलाजिम रहे। फिर अलग-अलग हो गये। पिछले कुछ सालों से दोनों का साथ हुआ। वह रघु से पता नहीं क्यों निजी बातें शेयर करने लगे थे। बेशक बच-बचकर। जैसे बेटे को एक ट्रॉफी मिली है। बिटिया ने बीटेक का कोर्स पूरा कर लिया है। जॉब सर्च कर रही है। वाइफ आने वाली हैं। आदि-आदि। सजल और रघु इन दिनों जयपुर में थे। दोनों दिल्ली से आये थे। रघु तो अपनी फैमिली साथ ले आया, लेकिन सजल साहब के बच्चों की पढ़ाई बीच में थी। बेटा हॉस्टल में, बेटी बीटेक की पढ़ाई कर रही थी। पत्नी भी स्कूल में पढ़ाती थीं। वह जयपुर में अकेले ही रहने लगे। अपने आदत के अनुसार वह फोटो के एंगल तो खूब तलाशते, लेकिन पता नहीं लगता जैसे जिंदगी का उन्होंने एक ही एंगल देखा। तन्हा रहना, किसी से कुछ शेयर न करना उनकी आदत सी थी। रघु और सजल की प्रोफेशनल बातें होतीं। कभी-कबार मुलाकात होती। लेकिन पिछले कुछ दिनों से जब सजल साहब बीमार पड़े तो उन्होंने पता नहीं क्यों रघु से इस बात को शेयर करना चाहा। रघु को कुछ-कुछ तो पता था, लेकिन सजल साहब की हमेशा इच्छा रहती थी कि बेचारगी, लाचारी भरे माहौल में न जीयें। वह यह भी पसंद नहीं करते थे कि बार-बार कोई उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछे। लेकिन इस बीच उन्होंने रघु और अपने ही साथ के एक-दो लोगों को घर बुलाकर बताया कि वह बेहद अस्वस्थ हैं। बीमारी है किडनी की। शायद ट्रांसप्लांट करनी पड़ जाये। रघु तो यह सुनकर ही सन्न रह गया। फिर खुद सजल साहब ने कहा कि घबराने की जरूरत नहीं। सब क्यूरेबल है। फिलहाल दवा चलेंगी। डायलिसिस होगी। जरूरत पड़ी तो बाद में ट्रांसप्लांट करा लेंगे। उन्होंने रघु से कहा कि संभव हो तो कुछ समय निकालकर मेरे साथ अस्पताल में रह जाना। क्योंकि उन्हें फिलहाल एक हफ्ते के लिए भर्ती होना है। रघु को इसमें कोई दिक्कत नहीं थी। दो-चार घंटे जाने के बाद वह थोड़ा काम कर आएगा और फिर तीमारदार की तरह अस्पताल चला जाएगा। लेकिन वह चाहता था कि सजल साहब इस वक्त पूरे परिवार को साथ बुला लें। उनके साथ रहने से बात दूसरी ही होगी। हालांकि यह बात रघु सीधे कह नहीं पाया। तय हुआ कि तीन दिन बाद अस्पताल जाना है। डॉक्टर से पहले ही टाइम ले लिया गया। डॉक्टर ने बताया कि एक दिन आईसीयू में रखेंगे फिर प्राइवेट रूम दिला देंगे। तीन दिन बाद सजल के साथ रघु एवं उनके दो मित्र अस्पताल चले गये। वहां उन्हें भर्ती करा दिया गया। इसी बीच सजल साहब की पत्नी का फोन रघु के पास आ गया। रघु को आश्चर्य हुआ कि उन्हें कैसे पता कि हम अस्पताल में हैं। तभी सजल साहब बोले, ‘मैं बता चुका हूं। वह शाम तक पहुंच जाएंगी।‘ दिनभर रघु वहीं रहा। इस बीच सजल साहब के कई सैंपल जांच के लिए रघु देकर आया। हर सैंपल के साथ डॉक्टर कहते कि पहले 25 नंबर में जाना वहां से पर्ची मिलेगी फिर 24 नंबर में या 20 नंबर में जमा करा आना। रघु को 25 नंबर ढूंढ़ने में बहुत वक्त लग गया। असल में 25 नंबर के लिए साइन बोर्ड तो जगह-जगह लगे थे, लेकिन उसे ढूंढ़ना बहुत आसान नहीं था। 25 नंबर काउंटर तीसरी मंजिल पर था। रघु को जब इस काउंटर पर पहुंचने का अच्छा अभ्यास हो गया तो वह सजल साहब के पास से उठकर अक्सर उस गलियारे में आ जाता जहां से लोग 25 नंबर गलियारे का रास्ता ढूंढ रहे होते। एक दिन तो उसने कम से कम 50 लोगों को इसका रास्ता बताया होगा। गलियारे में अक्सर अस्पताल से अनजान लोग ही भटकते रहते। गार्ड से पूछो तो वो ऐसे ही आगे को हाथ से इशारा कर देते। उनका काम तीमारदारों की भीड़ को हटाना ही ज्यादा होता। बड़ा सरकारी अस्पताल, तमाम तामझाम फिर भी कुछ बातें अधूरी-अधूरी सी।
एक दिन रात में सजल साहब ने रघु से रुक जाने का आग्रह किया। रघु ने सजल साहब को ऐसी लाचारगी वाले अंदाज में कभी नहीं देखा था। रघु ने तुरंत हां कर दी और घर पर फोन कर बता दिया कि वह कल शाम तक ही घर आएगा। इस बीच सजल साहब ने पत्नी से घर जाने को कह दिया। वह लगातार एक हफ्ते से उनके पास ही थीं। उन्हें भी थोड़ा आराम मिल जाएगा। चूंकि रघु का ऑफ था, इसलिए दफ्तर की भी बहुत चिंता नहीं थी। रात में सजल साहब बहुत देर तक रघु से बात करते रहे। बीच में दोनों ने दो बार कॉफी भी पी। ‘आपके लिए ज्यादा कॉफी नुकसानदायक तो नहीं‘ रघु ने सजल साहब से पूछा। ‘अरे नहीं डॉक्टर तो कहते हैं खूब कॉफी पीओ।’ सजल साहब कह देते। उस रात सजल साहब ने घर-परिवार की कई बातें रघु से कीं। रघु की बातें भी सुनीं। दूसरे दिन सुबह-सुबह सजल साहब ने अपने आईपैड पर कई मधुर गीत लगा दिये। कभी भूपेन हजारिका का ‘विस्तार है अपार’ गीत बजता तो कभी लता जी का ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा।’ सजल साहब ने देखा कि रघु को भी गीतों में आनंद आ रहा है। उन्होंने यहां भी एक एंगल जैसा तलाशा। बोले-‘रघु इन गीतों को सुनकर नहीं लगता जैसे शब्द बाहर निकलकर हवा में तैर रहे हों।’ रघु थोड़ी देर के लिए उनकी बातों पर गौर करता रहा। सचमुच यही तो लग रहा था कि जैसे शब्द तैर रहे हों। फिर उन्होंने हंसते हुए पूछा, ’25 नंबर कब से जाना नहीं हुआ।’ रघु मुस्करा दिया। फिर सजल साहब बोले, पता नहीं 25 नंबर से मुझे अपना नाता सा जुड़ता महसूस हो रहा है। जानते हो सजल यूं तो मैं कोई ज्योतिष आदि में विश्वास नहीं करता, लेकिन पता नहीं 7 नंबर से मेरा अनजाना सा नाता है। मेरे मोबाइल नंबर के अंत में 7 है। कार के नंबर में सात है। घर का नंबर सात है। जन्मतिथि सात और अगर इस 25 नंबर के दोनों अंकों को जोड़ो तो ये भी सात बनते हैं। क्या पता अंतिम दिन का भी योग सात बने। सजल बस सुनता रहा। फिर बोले, मुझे लगता है इस 25 नंबर से अब नाता टूट जाएगा। रघु ने कहा, ‘सर आप परेशान मत होइये। सब ठीक होगा। ऐसे भी अब कोई दिक्कत नहीं है। अब तो इस अस्पताल के किसी भी गेट से भेज दीजिए मैं 25 नंबर तक हो ही आऊंगा।’ वैसे वहीं फीस जमा क्यों होती है। सजल साहब ने पूछा। रघु ने कहा, ‘सर कुछ खास टेस्ट की फीस वहां जमा होती है और रिपोर्ट भी वहीं से मिलती है।‘ फिर रघु ने पूछ लिया, ‘सर आप किडनी ट्रांसप्लांट का प्रोसेस तो शुरू करवाइये। डोनर मिल जाते हैं।’ सजल साहब बोले, ‘डोनर की कोई समस्या नहीं है। मैं सोच रहा हूं अगर यूं ही यह जिंदगी चार-पांच साल चल जाए तो ज्यादा जीकर करना क्या है?’ उनके इस जवाब की रघु को उम्मीद नहीं थी। उसने कोई तर्क करना उचित नहीं समझा। अगले दिन शाम को सजल साहब ने कहा, ‘रघु तुम घर जाओ। कल से बच्चे अकेले होंगे।’ फिर वह धाराप्रवाह बोलते चले गये, ‘हमारे शहजादों को तो मैसेजभर की फुर्सत है। कभी आकर मुझे देख लें, इतनी फुर्सत उन्हें कहां।’ रघु ने जवाब दिया, ‘आप कहें तो रुक जाऊं। कल सुबह निकल जाऊंगा।’ सजल ने बात पलट दी और बोले, सामने देखो पेड़ों के बीच से गौर से चांद को देखो, ऐसा लग रहा है वह दो है और पेड़ की टहनी जैसे पांच। सजल समझ गया कि वह 25 नंबर कह रहे हैं। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिये। तभी सजल साहब की पत्नी भी पहुंच गयीं। उन्होंने भी रघु से घर जाने को कहा। जाते-जाते सजल साहब बोले, ‘रघु कभी-कभी तो मुझे लगता है कि 25 भी बजते हैं। रात को 12 बजे जिसे हम 24 बजे भी कह सकते हैं, उसके एक घंटे के समय को जब बिल्कुल सन्नाटा सा होता है उसे हम 25 बजे कह सकते हैं।’ रघु को लगा फोटो में एंगल तलाश करने वाले सजल साहब आज कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं। खैर रघु घर आ गया। घर पर बात की। वहां भी सजल साहब की बीमारी से सब परेशान थे। रघु की पत्नी ने पूछा, क्या लगता है? रघु ने कहा, ‘कल तक सब ठीक लग रहा था, आज अजीब-अजीब।’ खाना खाकर सब सो गये। रात एक बजे रघु के फोन पर घंटी बजी। फोन महेंद्र का था। रघु का दोस्त और सजल साहब का भी पुराना परिचित। रघु ने सवाल किया, ‘हां महेंद्र इतनी रात फोन कैसे।’ ‘अरे यार मैं अस्पताल में हूं।’ महेंद्र का जवाब था। ‘क्या हुआ।’ रघु ने पूछा। ‘सजल साहब सो सीरियस।’ बातचीत जारी रही-अरे मैं आऊं। नहीं सुबह आ जाना। जल्दी।
रघु को उसके बाद नींद नहीं आयी। कभी वह याद करता कि रात एक बजे भी 25 बजता है। कभी यह कि अब 25 नंबर से वास्ता टूट जाएगा। कभी यह कि मेरे जीवन में 7 नंबर अहम है। सोचते-सोचते उसे हल्की आंख लग गयी। सुबह 6 बजे रघु की पत्नी ने चाय लाकर दी। रघु ने कहा कि मैं तुरंत नहाकर निकलूंगा। रात फोन आया था। अजब इत्तेफाक था कि करीब सात बजे वह अस्पताल पहुंचा। सजल साहब को कई तरह की मशीनें लगी थीं। बेटा और बेटी भी पहुंच चुके थे। उनकी पत्नी से रघु ने पूछा अचानक सब लोग आ गये। सजल साहब की यकायक तबीयत कैसे बिगड़ गयी। वह सुबकने लगीं। बोलीं, आपके जाने के बाद इन्होंने ही सबको आ जाने के लिए कहा था। फ्लाइट से अभी-अभी सब पहुंचे हैं। ओह। रघु को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह डॉक्टर के पास गया। डॉक्टरों का वही जवाब, ‘वी आर डूइंग अवर बेस्ट।’ इधर-उधर दौड़ते-दौड़ते करीब 11 बज गये। आधे घंटे बाद डॉक्टर ने तीन-चार पर्चियां दी और एक लिक्विड सा देकर कहा, इसे 25 नंबर में जमा कराके आओ। रघु ने पर्चियां पकड़ीं और बाहर को निकला ही था कि डॉक्टर ने रोक दिया। पर्ची और लिक्विड वापस ले लिया। फिर डॉक्टर ने रघु की तरफ गौर से देखकर कहा, ‘आप इनके कौन हैं।’ मैं-मैं-मैं, रघु अपना कोई परिचय नहीं दे पाया। तभी महेंद्र बोला, 'उनके भाई हैं। मतलब पुराने साथी हैं।' डॉक्टर ने कहा, 'सबको संभालिये, अब 25 नंबर जाकर इन जांचों की जरूरत नहीं।' रघु ने देखा 12 बज चुके थे। क्या दिन में भी 25वां घंटा होता है। 12 बजे के बाद। रघु रुआसा सा होकर पीछे को पलटा। महेंद्र की तरफ देखकर बोला, आज तारीख कितनी हैं। महेंद्र ने कहा '16 तारीख।' 'ओह आज भी सात हैं।' रघु बुदबुदाया। महेंद्र ने कहा, 'क्या। सात नहीं सोलह। हां भाई सोलह।' रघु बुदबुदाता रहा। शायद अब न 25 नंबर होगा और न ही सात नंबर। थोड़ी देर बाद रोने-धोने की आवाज से अस्पताल परिसर गूंज उठा। दुनिया वैसे ही चल रही थी। सामने का पेड़ भी हवा में हिल रहा था। आसमान में बादलों का एक झुरमुट इस तरह से घूम रहा था जैसे उसकी आकृति 25 नंबर की बन रही होगी। रघु चुपचाप एक बार 25 नंबर काउंटर पर हो आया। वहां वैसी ही गहमागहमी थी। सीढ़ियों से उतरते वक्त उससे पांच लोगों ने 25 नंबर का रास्ता पूछा, आज वह सिर्फ हाथों से इशारा कर पाया।