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Thursday, September 21, 2017

लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा ऐ लखनऊ


इमामबाड़ा : चित्र साभार इंटरनेट


चारबाग स्टेशन : साभार इंटरनेट
केवल तिवारी
पहला नजारा : लखनऊ की एक गली में जाकर किसी से पूछा, रामअवतार मिश्रा जी के यहां जाना है। जिनसे पता पूछा था वह जनाब साथ हो लिये। कुछ दूर जाकर एक घर के बाहर आवाज लगायी, 'अरे मिसिर जी देखो आपके दोस्त आये हैं।' इन साहिबान ने पता बताया, साथ में एक कप चाय पी और चले गये। दूसरा नजारा : रिक्शेवाले भाई साहब हजरतगंज की तरफ मुंह करके खड़े हैं, आपको जाना बनारसी बाग है। पूछेंगे चलने के लिये, तो मना कर देंगे क्योंकि रिक्शे का मुंह जिधर को है, उसी तरफ जायेंगे। नवाबी ठसक जो ठहरी।
लखनऊ में अपनेपन के, लखनऊ की नफासत के और लखनऊ की नवाबी ठसक के हर दिन अनेक किस्से बनते हैं, कहे जाते हैं। समय के साथ भले यहां भी बहुत कुछ बदल गया हो, लेकिन आज भी सही मायनों में लखनऊ नफासत और नज़ाक़त का शहर है। ‘पहले आप’ की संस्कृति वाला यह शहर अगर बदल भी रहा है तो अपनी खूबियों को सहेजे हुए। यहां के बारे में सही ही कहा गया है-
ये रंग रूप का चमन, ये हुस्न--इश्क़ का वतन।
यही तो वो मुक़ाम है, जहां अवध की शाम है।
अवध की शाम वाकई होती बहुत निराली है। गोमती का किनारा हो या फिर चौक और नक्खाश की गलियां। अमीनाबाद की गड़बड़झाला हो या फिर नये बसे गोमती नगर का इलाका, यहां हर जगह वह जगमग नजर आयेगी जिसके लिये लखनऊ जाना जाता है। बस में बैठे तो कंडक्टर जनाब पूछ लेंगे, ‘कहां जाइएगा।’ ’10 रुपये दीजिये।’ ‘आप निश्चिंत रहिये, समय पर पहुंच जाइयेगा।एक अजनबी से भी अदब से पेश आने के इसी नजारे के बीच दो दोस्तों में भी कुछ यूं वार्ता चलती है, ‘अमा मियां अब बहुत हो गया।’ ‘देखो अबकी कउनू बहाना चली।’ ‘खुद को समझते का हो बे।आपसी बात सुन लीजिये, खाने-पीने के अड्डों पर चले जाइये या फिर यूं ही चहलकदमी कीजिये, आपको भी उन चंद लाइनों की याद हो आयेगी जिनमें इस शहर को कुछ इस तरह बयां किया गया है-
लखनऊ है तो महज़ गुम्बद- मीनार नहीं
सिर्फ एक शहर नहीं, कूचा बाज़ार नहीं
इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं
लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा लखनऊ

नवाबी शहर में गंज नाम की है भरमार
लखनऊ के विभिन्न इलाकों की सूची बनाने बैठेंगे तो आपको दर्जनों जगहों के नाम में गंज मिलेगा। यहां का हृदय स्थान हजरत गंज तो यहां की शान है ही, इसके अलावा उदय गंज, टूड़िया गंज, यहिया गंज, मेहंदी गंज, रकाब गंज, हुसैन गंज, सआदत गंज, मेहंदी गंज, नवाबगंज वगैरह-वगैरह। गंज के बाद अगर किसी नाम के आगे कोई शब्द ज्यादा प्रचुर है तो वह है बाग। मसलन बनारसी बाग, चारबाग, तेलीबाग, आलम बाग, केसर बाग, लालबाग वगैरह-वगैरह। नये बस रहे शहरों का नाम नगर से ज्यादा है। इनमें सबसे आधुनिकतम और विशाल है गोमती नगर।

कथक नृत्य का बड़ा घराना
उत्तर भारत की महान नृत्य शैली कथक का लखनऊ से घना नाता रहा है। वर्तमान समय में बिरजू महाराज इस घराने के बड़े नाम हैं। उनके पुत्र किशन जी महाराज भी कथक के बड़े शिक्षक हैं। अवध के नवाब के राजसभा में लखनऊ घराने का और वाराणसी के सभा में वाराणसी घराने का जन्म हुआ। लखनऊ स्थित भातखंडे में कथक सीखने वालों की आज लंबी कतार है।

आधुनकिता की रंगत में गुजिश्ता दौर से नातेदारी बरकरार
लखनऊ बदला है। बदल रहा है। लेकिन रोचक बात यह है कि आधुनिकता की रंगत में गुजिश्ता दौर से इसकी नातेदारी बरकरार है। किसी भी सभ्यता, समाज के लिये वाकई यह कठिन काम होता है। यह लखनऊ ही है जहां मॉल में पिजा, बर्गर खाने वाली पीढ़ी टुंडे के कबाब और बाजपेयी पूड़ी भंडार की पूड़ियां भी लंबी लाइन में लगकर खरीद रही है। रामआसरे की मिठाई, प्रकाश कुल्फी और सदर के बतासों की कहां नहीं चर्चा होती है। यही नहीं नक्खास का इतवारी बाजार हो या गोमतीनगर, जानकीपुरम, एल्डिको और आशियाना, हर जगह वैसी ही लखनवियत मिलेगी जैसी कश्मीरी मोहल्ले, शीश महल, राजा बाजार या सआदतगंज में

हर तरह का खाना
खान-पान के शौकीनों के लिये लखनऊ एक सलीके का दस्तरखान है। यहां पूड़ी-सब्जी, खस्ता-कचौड़ी, छोले-भटूरे, चाट, पानी के बताशे और बंद-मक्खन जैसे बेशुमार नज़राने हैं तो नॉनवेज का तो यह गढ़ ही है। टुण्डे कबाबी, रहीम की नहारी, नौशीजान और इदरीस की बिरयानी जैसी जगहों पर हर समय रंगत दिखती है।

गंगा-जमुनी तहजीब की नगरी
लखनऊ में गंगा-जमुनी तहजीब की बात समझनी हो तो कुछ दिन यहां रुककर कुछ जानकारियां जुटानी होंगी। शादाब के यहां मोहित की दावत। मोहित के घर शादाब की पार्टी। यही नहीं हर कोई याद करना चाहता है कि यहां झाऊ लाल का बनवाया इमामबाड़ा है, तो जनाबे आलिया का बनवाया हनुमान मंदिर भी हैपड़ाइन मस्जिद है, आसफुद्दौला का कल्याण गिरि मंदिर भी है। इसी शहर में मुसलमान बड़े मंगल पर हलवा-पूड़ी बंटवाते हैं, जमघट पर पतंग उड़ाते हैं, होली में रंग खेलते हैं, कृष्ण जी की बारात में शामिल होते हैंहिंदू मुहर्रम में अजादारी करते हैं, सबीले लगवातें हैं और रमज़ान में सहरी के लिए जगाते हैं, बल्कि इफ्तारी का इंतज़ाम भी करते हैं

इतिहास के आईने में
लखनऊ के बारे में फिरदौस ने लिखा है-
शहरे वफ़ा भी तू, शहरे निगार भी कहते हैं सब तुझे रश्के बहार भी
तू सरज़मीने इश्क, फिरदौसे हुस्न तू दुनिया में कहाँ दूसरा,तुझसा दयार भी
शाहे सुखन भी है, अहले ज़बान तू चढ़कर नहीं उतरता, तेरा खुमार भी
दुनिया में कम नहीं, तेरे चाहने वाले तेरी अदा के कायल,तुझपर निसार भी
शहरे लखनऊ, तुझको नहीं पता तुझ बिन नहीं संभलता,मेरा कल्बे ज़ार भी
लखनऊ को प्राचीन काल में लक्ष्मणपुर और लखनपुर के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि अयोध्या के राम ने लक्ष्मण को लखनऊ भेंट किया था। लखनऊ के वर्तमान स्वरूप की स्थापना नवाब आसफउद्दौला ने 1775 .में की थी। अवध के शासकों ने लखनऊ को अपनी राजधानी बनाकर इसे समृद्ध किया। लेकिन बाद के नवाब विलासी और निकम्मे साबित हुए। आगे चलकर लॉर्ड डलहौली ने अवध का अधिग्रहण कर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। 1850 में अवध के अन्तिम नवाब वाजिद अली शाह ने ब्रिटिश अधीनता स्वीकार कर ली। लखनऊ भले बहुत बदला हो, लेकिन हर दौर को इसने अपनेआप में समेटा है।

देखने लायक जगह
यूं तो लखनऊ में कदम-कदम पर देखने लायक स्थान हैं। कुछ हाल में बने तो कुछ ऐतिहासिक। इनमें से कुछ खास इस तरह से हैं- बड़ा इमामबाड़ा, घंटाघर, सआदत अली का मकबरा, रूमी दरवाजा, हुसैनाबाद इमामबाड़ा, रेज़ीडेंसी,  जामी मस्जिद, नारसी बाग, पिक्चर गैलरी, मोती महल
इमामबाड़े का निर्माण आसफउद्दौला ने 1784 में अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत करवाया था। यह विशाल गुम्बदनुमा हॉल 50 मीटर लंबा और 15 मीटर ऊंचा है। यहां एक अनोखी भूल भुलैया है। यहां भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है। यह घंटाघर 1887 . में बनवाया गया था। इसे ब्रिटिश वास्तुकला के सबसे बेहतरीन नमूनों में माना जाता है। बेगम हजरत महल पार्क के समीप सआदत अली खां और खुर्शीद जैदी का मकबरा है। यह मकबरा अवध वास्तुकला का शानदार उदाहरण हैं। बड़ा इमामबाड़ा की तर्ज पर ही रूमी दरवाजे का निर्माण भी अकाल राहत प्रोजेक्ट के अन्तर्गत किया गया है। हुसैनाबाद इमामबाड़ा मोहम्मद अली शाह की रचना है जिसका निर्माण 1837 . में किया गया था। इसे छोटा इमामबाड़ा भी कहा जाता है। लखनऊ रेजिडेन्सी के अवशेष ब्रिटिश शासन की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। सिपाही विद्रोह के समय यह रेजिडेन्सी ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजेन्ट का भवन था। यह ऐतिहासिक इमारत शहर के केन्द्र में स्थित हजरतगंज क्षेत्र के समीप है। यह रेजिडेन्सी अवध के नवाब सआदत अली खां द्वारा 1800 . में बनवाई गई थी। हुसैनाबाद इमामबाड़े के पश्चिम दिशा में जामी मस्जिद स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण मोहम्मद शाह ने शुरू किया था लेकिन 1840 . में उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने इसे पूरा करवाया। बनारसी बाग यहां का चिड़ियाघर है। स्थानीय लोग इस चिड़ियाघर को बनारसी बाग कहते हैं। हुसैनाबाद इमामबाड़े के घंटाघर के समीप 19वीं शताब्दी में बनी यह पिक्चर गैलरी है। यहां लखनऊ के लगभग सभी नवाबों की तस्वीरें देखी जा सकती हैं। गोमती नदी की सीमा पर बनी तीन इमारतों में मोती महल प्रमुख है। इसे सआदत अली खां ने बनवाया था।

Tuesday, August 22, 2017

जोशी जी की भावपूर्ण विदाई : सेवा से निवृत्ति है, रिश्तों से नहीं

अनुभवों को साझा करते हरीश जोशी (बाएं)। साथ में हैं संपादक राजकुमार सिंह (बीच में) एवं समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ
अपनी पत्नी के साथ भावुक जोशीजी।
इस ब्लॉग को लिखने में थोड़ा विलंब हो गया। कारण कई होते हैं। यहां भी रहे। लेकिन आज लिख रहा हूं। पिछले दिनों दैनिक ट्रिब्यून के वरिष्ठ पत्रकार हरीश जोशी सेवानिवृत्त हुए। बेहद सादगी भरा उनका विदाई कार्यक्रम अंत में सबको भावुक कर गया। जोशी जी संपादक राजकुमार सिंह जी के साथ न्यूज रूम में आये। कुछ बातें हुईं। इस बीच खाने-खिलाने का भी दौर चला। दो बार मिठाई। एक बार समोसे आदि। मन था कि लोग कुछ बोलें। शायद सबके मन में। लेकिन एक तो शाम का वक्त जो डेस्क कर्मियों के लिए बड़े तनावपूर्ण होते हैं, ऐसे में माहौल भावुक। इस बीच, हमारे समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ जी ने कुछ किस्से सुनाये। उन्हीं में से एक यह भी कि एक कोई उनके पुराने साथी रिटायरमेंट के समय पर गुरु मंत्र दे गये कि स्पॉट रिपोर्टिंग क्यों जरूरी होती है। उन्होंने इस संदर्भ में एक किस्सा भी सुनाया। जोशी जी कुछ बोले, कुछ बोलते-बोलते रह गये। कुछ बातें संपादक जी ने कहीं। उन्होंने एक वाक्य में भावुक बात कही, 'जोशी जी आप सेवा से निवृत्त हो रहे हैं, रिश्तों से नहीं।' रिश्ते वाकई ट्रिब्यून परिवार में बहुत अच्छे हैं। मुझे तो यहां आये अभी चार साल हुए हैं, लेकिन यहां लोगों का चार-चार दशकों से भी पुरानी दोस्ती है। स्वयं जोशी जी ने तीन दशकों तक ट्रिब्यून को अपनी सेवाएं दीं। जोशी के इस विदाई कार्यक्रम में भले मैं उस समय कुछ न बोल पाया, लेकिन मन में कुछ ऐसा भाव था-
पुरबा बता दे, कहां की हवा है। सागर से पूछो दरिया कहां है।
अंधेरे बहुत फैल जाएं तो समझो, उठो अब कि अपना सवेरा हुआ है।

वाकई यह मौका भी तो एक सवेरा ही होने जैसा है। कौन कहता है कि विदाई की घड़ी एक शाम जैसी होती है। बल्कि अब तो नयी जिम्मेदारियां, नए फलक पर आपको नये रूप से चलना है। हां, यह भी सत्य है कि दफ्तर के लिए आपके लिए एक शाम शुरू हो गयी है जैसे बशीर बद्र साहब ने लिखा है-
थके-थके पेडल के बीच चले सूरज, घर की तरफ लौटी दफ्तर की शाम।
जोशी जी! बेशक इस पूरी चर्चा, प्रकरण में मैं स्वयं सागर में एक कटोरा पानी जैसा हूं, लेकिन जितना वक्त भी आपके साथ गुजरा प्रेरणादायक रहा। इस पर मैं यही कह सकता हूं-
आपके आभार की लिपि में प्रकाशित
हर डगर के प्रश्न हैं मेरे लिए पठनीय
कौन सा पथ कठिन है...
मुझको बताओ
मैं चलूंगा।

असल में जोशी जी की विदाई का यह नजारा उस समय ज्यादा भावुक हो गया, जब हम सभी न्यूज रूम के साथी उन्हें छोड़ने गेट तक आये। वहां उनकी पत्नी, बेटी-बेटा इंतजार कर रहे थे। श्रीमती जोशी ने कहा, 'इन्हें फर्क पड़े न पड़े हमें तो बहुत पड़ने वाला है। ट्रिब्यून को लेकर एक बल मिलता था। एक गर्व का अहसास होता था कि जोशीजी ट्रिब्यून में सीनियर जर्नलिस्ट हैं।' उनके इस कथन पर सभी ने कहा अभी भी जोशी जी ट्रिब्यून से जुड़े रहेंगे। लेखन से। कुछ और काम से। लेकिन इस दौरान अब तक बहुत 'मजबूत' दिख रहे जोशी जी की आंखें छलक आयीं। उनका भावुक अंदाज मानो कह रहा हो-
मेरे गीत तुम्हारे पास सहरा पाने आएंगे, मेरे बाद तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आएंगे।
ये सच है कि पांवों ने बहुत कष्ट उठाये, पर पांव किसी तरह से राहों पे तो आये।
... फिरता हूं कई यादों को सीने से लगाये।

इसके बाद माहौल लगातार भावुक हुआ जा रहा था। सबने जोशी जी और उनके परिवार के लोगों को नमस्कार कहा। और साथ में यह भाव रखा जैसे कह रहे हों-
कभी दिन की धूप में झूम के, कभी शब्द के फूल को चूम के।
यूं ही साथ-साथ चलते रहें, कभी खत्म अपना सफर न हो।

Saturday, August 5, 2017

तो क्या मुंशी प्रेमचंद प्रोफेशन लेखक थे



‘लिव इन रिलेशन’, ‘देशभक्ति’, ‘जिहाद’ और ‘फैमिली प्लानिंग’ पर भी लिखा
मुंशी प्रेमचंद के बारे में आपके मन में कैसी छवि है। वह गरीब थे। उनकी कहानियों के पात्र बेहद दीन-हीन होते थे। समाज का दबा-कुचला तबका उनकी कहानियों के केंद्र में होता है। वह कुछ खास विषयों को ही उठाते थे। यदि ऐसे ही विचार हैं तो शायद यह पूरा सच नहीं है। प्रेमचंद अपने दौर के सबसे महंगे लेखकों में से थे। उनके पास अच्छी-खासी रकम भी थी। यही नहीं उन्होंने कई मुद्दों पर अपनी कलम चलायी। चाहे वह 'लिव इन रिलेशन' हो, देशभक्ति हो, सांप्रदायिकता हो या फिर कोई और मुद्दा। यह दावा मैं नहीं कर रहा हूं। दरअसल, मुंशी प्रेमचंद की जयंती के मौके पर हरियाणा साहित्य अकादमी के एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला। कार्यक्रम के अध्यक्ष थे प्रेमचंद पर आधिकारिक शोधकर्ता माने जाने वाले कमल किशोर गोयनका। अन्य वक्ता भी थे। कई लोगों ने विचार रखे, लेकन गोयनका साहब ने जो जानकारी दी, वह मेरे लिए नयी थीं। पहले तो यह कि प्रेमचंद गरीब नहीं थे। दूसरा यह कि वह कोई ट्रेंडी लेखक नहीं थे। उन्होंने हर तरह की कहानियां लिखीं और इतनी लिखीं कि सबके बारे में कोई नहीं जानता। दस हजार 200 पेजों के साहित्य के बारे में तो उनके बेटों को भी मालूम नहीं था। गोयनका जी का शोध के आधार पर दावा था कि सैकड़ों कहानियों का तो जिक्र ही नहीं किया जाता। यहां तक की उनके बेटे अमृतराय ने भी कई बातें छिपायीं। उन्होंने ऐसा क्यों किया यह किसी को नहीं पता।
मैं जो सवाल उठा रहा हूं कि क्या प्रेमचंद प्रोफेशनल लेखक थे, उसे उठाने के पीछे इसी कार्यक्रम से मिली जानकारी है। पहले बात करते हैं उन्हें अब तक गरीब घोषित करने की कोशिशें के बारे में। गोयनका साहब ने बताया कि प्रेमचंद जी की पहली नौकरी लगी तो उन्हें 20 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। इसका अंदाजा आजकल के लोग इस तरह से लगा सकते हैं कि तब सोना 10 रुपये प्रति तोला था। गोयनका जी के मुताबिक स्वयं एक जगह प्रेमचंद जी ने कहा, ‘मुझे इतनी तनख्वाह की उम्मीद नहीं थी।’ यही नहीं कई जगह इस बात का भी जिक्र है कि उन्हें एक कहानी का पारिश्रमिक 20 रुपये मिलता था। यह बात वर्ष 1920 की है। वर्ष 1921 में उन्होंने जब उन्होंने नौकरी छोड़ी तो उन्हें 100 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। जब वह माधुरी के संपादक बने तो उनका वेतन 150 रुपये महीना था। उसके बाद वह फिल्म लाइन में गये तो उनका वेतन 800 रुपये प्रतिमाह हो गया। वर्ष 1929 में उन्होंने बेटी की शादी में 7000 (सात हजार रुपये) खर्च किए। गोयनका जी का दावा है कि उनके बेटे श्रीपत राय ने भी यह माना कि प्रेमचंद जी ने शादी में सात हजार रुपये खर्च किए थे। असल में किसी का अमीर या गरीब होना कोई गुण या दोष नहीं है। बात है सबके सामने सच आने की। सच को स्वीकार कर लेने में हर्ज क्या है? उन्होंने और भी कई बातें बतायीं जिनके जरिये यह कहा जा सकता है कि सच नहीं कहा गया। मसलन उनके बेटे अमृत राय द्वारा लिखी गयी किताब ‘कलम का सिपाही’ में लिखा गया है कि प्रेमचंद की मौत के समय कोई साहित्यकार वहां नहीं आया। इसके उलट गोयनका जी का दावा है कि अनेक जाने-माने साहित्यकारों ने उस समय का चित्रण अपनी चिट्ठियों और डायरी में लिखा है। जाहिर है कि वे सब वहां मौजूद थे। खैर...। इन सब बातों को बताने का मकसद यही है कि सच को सच ही रहना देना चाहिए, उसी तरह जिस तरह मुंशी प्रेमचंद जी जैसा शायद ही आज तक किसी ने लिखा हो।
अब बात करें उनकी कुछ अनकही कहानियों की
गोयनका जी ने उक्त कार्यक्रम में प्रेमचंद जी की कुछ कहानियों का जिक्र किया।
आसूं : इस कहानी में एक व्यक्ति की अफगानिस्तान की प्रेमिका होती है। वह प्रेमी से कहती है कि दुनिया की अनमोल चीज मेरे लिए लेकर आओ। वह कई चीजें ले जाता है, लेकिन वह उन्हें अनमोल नहीं मानता। होते-करते वह जलिवाला बाग जाता है। वहां चारों ओर लाश पड़ी होती है। एक वीर जिसके हाथ कटे होते हैं, पूरे जोश से भारत माता की जै कहता है, उसके खून का एक बूंद टपकता है। वह व्यक्ति प्रेमिका के लिए वह बूंद ले जाता है। प्रेमिका का पूरा माजरा जानकर कहती है, हां यह है अनमोल चीज। खून का आखिरी कतरा भी जो देश के लिए कुर्बान कर दे वही महान है। ... इस कहानी के जरिये उन्होंने देशभक्ति का जोश भरा है।
कमल किशोर गोयनका
एक अन्य कहानी में एक व्यक्ति अमेरिका से भारत आता है। लंबे समय अमेरिका में रहने के बाद उसकी इच्छा होती है कि वह भारत में ही मरे। यहीं उसका अंतिम संस्कार हो। यहां आकर वह देखता है कहीं जुआ खेला जा रहा है, कहीं कुछ और निकृष्ट काम हो रहा है। वह कहता है यह तो मेरा देश नहीं। तभी वह गंगा किनारे जाता है। वहां एक गीत चल रहा होता है, प्रभुजी अवगुन चित न धरो। वह व्यक्ति गंगा में छलांग लगाते हुए कहता है, यही है मेरा देश।
जिहाद : यह कहानी आतंकवाद पर लिखी गयी है। इसमें 1924-25 के दौरान रावलपिंडी में हुए दंगों के जरिये आतंक के विस्तार पर चिंता व्यक्त की गयी है।
कैदी : इसमें एक व्यक्ति उस महिला से शादी करता है जो पहले से प्रेगनेंट होती है। उस व्यक्ति पर समाज ताने मारता है। कहानी के अंत में वह व्यक्ति कहता है, ‘अगर मैंने कोई खेत खरीदा हो जिसमें पहले से फसल बोई हो तो क्या वह खेत मेरा न हुआ।’ इसमें कहानी के जरिये समाज की रूढ़िवादिता के खिलाफ चोट की गयी है।
परिवार नियोजन पर प्रेमचंद जी की एक कहानी है। इसमें एक व्यक्ति कहलवाता है कि उसके यहां किसी की मौत हो गयी। लोगों के समझ में नहीं आता कि ऐसा कैसे हो गया। उसके यहां तो कोई बुजुर्ग भी नहीं है। सब उसके घर जाते हैं। वह कहता है मेरे घर में तीसरा बच्चा पैदा हुआ है। मैं पहले से ही जन्मे दो बच्चों की परवरिश नहीं कर पा रहा हूं तो इसे कैसे पालूं। इसका होना किसी के मरने जैसा ही हुआ। वह एक सांकेतिक पुतला बनाता है। उसे गंगा किनारे ले जाता है। मुर्दे की तरह उसका संस्कार करता है। कहानी का अंत प्रेमचंद इस तरह से करते हैं- वह व्यक्ति हाथ में गंगाजल लेकर सौगंध खाता है कि ‘अब ऐसी गलती नहीं करेगा।’
एक अन्य कहानी जो ‘लिव इन रिलेशन पर’ है। इसमें एक प्रोफेसर और एक डॉक्टर में प्यार हो जाता है। दोनों बिना शादी के साथ रहने लगते हैं। बाद में प्रोफेसर एक अन्य युवती के साथ विदेश भाग जाता है और डॉक्टर के पैसे भी ले जाता है। महिला प्रेगनेंट होती है। उसका बच्चा हो जाता है। एक दिन वह अपने घर की बालकनी में खड़ी होती है। परेशान होती है। तभी नीचे देखती है कि एक अंग्रेज जोड़ा बग्घी में अपने बच्चे को ले जा रहे हैं। कहानी यहीं खत्म हो जाती है। इस कहानी में प्रेमचंद ने पारिवारिक मूल्यों को बनाये रखने का संदेश दिया है। परिवार है तो सब है।
ऐसी ही कई कहानियों का जिक्र गोयनका जी ने किया। कार्यक्रम में अनेक अन्य लोग भी थे। प्रेमचंद जी के बारे में कई नयी बातें पता चलीं। हरियाणा साहित्य अकादमी और गोयनका जी का धन्यवाद। बस सवाल यही है कि प्रेमचंद जी को अच्छा मेहनताना मिलता था। हर विषय पर उन्होंने लिखा। तो क्या वे प्रोफेशनल लेखक थे।