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Sunday, June 20, 2010

कहानी बचपन

कहानी बचपन

शेखर वर्मा अपनी वर्तमान स्थिति से इस अर्थ में संतुष्ट है कि नौकरी अच्छी है। एक बच्चा है। बीवी भी घर पर ट्यूशन पढ़ाती है। लेकिन नौकरी की व्यस्तता और शाम बच्चों को न दे पाने की कसक उसके मन में जरूर रहती। मात्र तीसरी में पढ़ने वाला उसका बच्चा रुद्र कई बार सवाल कर बैठता, पापा हमारे साथ घूमने-फिरने के लिए आपके पास कभी वक्त नहीं होता है। इतनी नन्ही सी जान और ऐसे बोल ले रहा है, शेखर को आश्चर्य होता और खुशी भी कि आजकल के हिसाब से लगता है बच्चा ठीक है। तेज है। फर्राटेदार बोलता है। स्कूल से भी कंप्लेन नहीं आती। शेखर अपने बचपन के दिनों को याद करने लगता, जब पापा के सामने ज्यादा बोलने की हिम्मत भी नहीं होती थी। बोलना तो छोड़ो, सामने पड़ने से भी कतराते थे। कुछ कहना होता तो मां को माध्यम बनाया जाता। या फिर छोटी बहन को। खैर अब जमाना बदल रहा है। बाप-बेटों का वैसा रिश्ता नहीं रहा, यह सोचकर शेखर रुद्र की बातों पर हंस देता और आने वाले ऑफ के दिन कहीं ले चलने का वादा करता। घर में वक्त नहीं देने की शिकायत पत्नी रीमा भी करती थीं, कुछ समय पहले तक। लेकिन अब जो भी शिकायत होती वह रुद्र की ही ओर से होती। सीधे भी और अप्रत्यक्ष रूप से भी। जैसे कभी अगर रुद्र ने कुछ नहीं कहा होता तो रीमा बोल देती, रुद्र कह रहा था पापा मॉल कब ले चलेंगे। इस बार हम लोग नाना जी के जाएंगे तो पापा कितने दिन हमारे साथ रहेंगे आदि...आदि। कभी-कभी शेखर को लगता है कि रीमा ही रुद्र से ऐसा कहने के लिए कहती होगी। आखिर तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे के जेहन में इतने सारे सवाल कैसे आ सकते हैं। वह इतनी फरमाइशें कैसे कर सकता है। फिर पापा साथ हैं या नहीं, इससे बच्चे को क्या। उसके लिए हर चीज तो घर पर आ ही जाती है। इन सब बातों को सोचते-सोचते शेखर अपने बचपन की यादों में खो गया। उसे लगा कि अभी ही वह कौन सा बूढ़ा हुआ है। अभी आठ-नौ साल पहले की ही तो बात है वह कैसे बचपना करता था, अपने मित्रों के साथ। आज भी तो वैसा ही है। पिताजी को अगाध स्नेह करता है, लेकिन पता नहीं क्यों सामने जाने से कतराता है। आज रुद्र को उसके पापा कितना प्यार से खिलाते हैं। बल्कि कभी-कबार शेखर अपनी मां से मजाक में सवाल पूछ ही बैठता है, मां देखो पापा रुद्र को कितना प्यार करते हैं। कभी मुझे भी ऐसे लाड़ किया है। मां के ऐसे सवालों के दो ही उत्तर होते। या तो वह हंस देती और बताने लगती कि कितना प्यार करते थे, उससे। बस बिगड़ जाने के डर से जब से स्कूल भेजा, सामने कभी कुछ नहीं कहा। दूसरा उत्तर कभी-कभी मां का यह होता कि नहीं, तुझे कभी प्यार नहीं किया। तू बिना प्यार किए ही इतना बड़ा हो गया है। फिर सब हंस पड़ते। शेखर के साथ कुछ दिक्कतें हैं। जैसे पहली तो यह कि ऑफिस में छुट्टी का बड़ा संकट। बड़ी मिन्न्त के बाद मिलती भी तो एकाध दिन की। ऑफ भी रेगुलर नहीं मिल पाता। जिस दिन मिला तो दोस्त यार घेर लेते। क्या कर रहा है शाम को। घर में आधे घंटे की मोहलत लेकर निकला शेखर कभी चार घंटे में लौटता और कभी देर रात। दोस्त वही होते। जिनके साथ कुछ साल पहले तक उसकी ऐसे ही शाम कटा करती थीं। अब किसी की नौकरी अच्छी लगी हैै। सप्ताह में दो दिन छुट्टी होती है। किसी ने व्यवसाय शुरू कर लिया है। ऐसे दोस्त अक्सर शेखर से पूछते कहां है, एक ही जवाब होता, ऑफिस में। सबको मालूम था कि कभी-कबार शेखर रविवार को घर पर रहता है। उस दिन सब चाहने वाले यार-दोस्त पकड़ ही लेते। रीमा का यही तर्क होता कि सब घरवालों को इतना समय देते हैं। शाम बच्चों के संग रहते हैं। घूमने-फिरने भी जाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे रुद्र के होने के बाद उसने शिकायतें करनीं कम कर दीं। बल्कि उसने अब कहना बिल्कुल बंद कर दिया था। बस रुद्र ही यदा-कदा वैसी शिकायतें करता, जैसा कुछ साल पहले रीमा करा करती थीं। इसीलिए शेखर को लगता कि हो न हो अब रीमा रुद्र के जरिये अपनी बात करती है। एक दिन तो हद हो गई। रुद्र ने अपने पड़ोस में रहने वाले रोहित शर्मा के बारे में पूछ लिया। पापा, अन्न्ू के पापा (रोहित शर्मा) क्या नौकरी करते हैं। क्यों बेटा, शेखर ने सवाल पूछा। पापा वो रोज शाम को घर आ जाते हैं। अन्न्ू के साथ घूमने जाते हैं। सनडे को भी घर पर रहते हैं। बेटा वो बैंक में हैं। बैंक की नौकरी दिन की होती है। रुद्र सपाट बोलता, पापा आप भी बैंक में नौकरी कर लो। अब उसे कौन समझाए कि नौकरी अपने मन से नहीं मिलती। वह रुद्र को समझाने की कोशिश करता, बेटा हमारे बीच जितने लोग हैं सब एक जैसी नौकरी नहीं कर सकते। कोई फैक्टरी में काम करता है, कोई बैक में करता है और कोई दूसरी कंपनियों में काम करता है। रुद्र की समझ में कुछ नहीं आए तो बोलता लेकिन पापा आपको हमारे लिए समय निकालना चाहिए। शेखर को लगता कि कम से कम ऑफ के दिन तो अब बच्चों के साथ रहना ही पड़ेगा। वह दोस्तों के साथ पार्टी-शार्टी कभी-कबार देर रात कर लेता। यार राजन आज में 10 बजे छूट जाऊंगा फिर बैठते हैं यार। सनडे को कुछ काम है। एक दिन तो हद हो गई। उसके दोस्त ने फोन किया, कहां है। शेखर ने झूठ बोल दिया कि वह ऑफिस में है। दोस्त को उसकी बात झूठ लगी। उसने ऑफिस में फोन लगा दिया। पता लगा, वह ऑफ पर है। फिर वह शेखर के घर आ धमका। उसे ले गया अपने साथ। क्योंकि दो-तीन दोस्त बैंगलुरू से आए थे। थोड़ी सी लगाने के बाद शेखर ने अपना दुखड़ा सबको सुना दिया। सभी ने कहा, चलो यार अब बैठकी कम किया करेंगे।
एक दिन रविवार को शेखर ने ठान ली कि आज सिर्फ परिवार के बीच रहना है। दिन में बिस्तर पर लेटे-लेटे वह अखबार के पन्न्े पलट रहा था। रुद्र वहीं पर अपने पड़ोस के एक दोस्त तिजिल के साथ खेल रहा था। शेखर अपने बचपन के दिनों की याद करने लगा। पापा शाम को ऑफिस से आ जाते थे। कुछ न कुछ खाने के लिए लाते लेकिन कभी अपने हाथ से कुछ नहीं देते थे। मां ही सबको साथ बिठाकर देती। पापा के पास फटकनेभर से उसे डर लगता था। कभी चले भी गए तो सीधे पढ़ाई की बात होती। जिस दिन पापा की छुट्टी होती, घर में स्पेशल खाना बनता इस बात की खुशी होती थी, लेकिन वह दिन जाता बहुत सूना-सूना। हां गर्मियों की छुट्टियों में जब गांव जाते तो आजादी ज्यादा मिल जाती। वहां कभी दुकानदार का खेल खेलते। गत्ते से तराजू बनाते। कच्चे आम को बेचने का खेल खेलते। कागज के टुकड़ों को रुपए बनाते। कभी-कभी पापा बनकर ऑफिस जाने का भी खेल खेलते और कभी स्कूल-स्कूल का। ऐसा ही मौका तब भी मिलता जब किसी रिश्तेदारी में शादी व्याह में जाते। उस दौरान भी अपेक्षाकृत आजादी ज्यादा मिल जाती। पापा का रुख अन्य दिनों के मुकाबले बदला-बदला होता। थोड़ा बड़े हुए तो पापा जेब खर्च के लिए कुछ पैसे दे देते, लेकिन सीधे नहीं मां की मार्फत।। दोस्त-यार घर पर आते तो पापा उनसे हंसकर अच्छे से बोलते। ऐसा ही माहौल हमें अपने दोस्तों के घर पर भी मिलता। बल्कि एक-दो दोस्त तो ऐसे भी थे, जिनके पापा खूब मजाकिया थे। इधर शेखर अपने बचपन के दिनों में खोया था और उधर रुद्र अपने दोस्त तिजिल के साथ खेल रहा था। शेखर ने देखा रुद्र अपने दोस्त से कह रहा है चलो वायरलेस टू पर तुरंत मैसेज करो। दोस्त ने प्लास्टिक का एक खिलौना उठाया और बोला, हेलो...कहां हो ओवर। शेखर हैरत से उन दोनों को देख रहा था। फिर रुद्र बोला, तिजिल तुमने उस रोबोट पर खास चिप लगाई थी कि नहीं। तिजिल बोला, जी चिप तो मैंने लगाई थी, वह इस कैमरे में भी दिख रही है। फिर अचानक रुद्र बोला कि तुमसे कहा था कि इनविजिबल चिप लगाना। आइंदा ध्यान रखना। चलो अपनी स्पेशल बाइक को तैयार करो, हमें जाना होगा। उनकी बातें चल ही रहीं थीं कि किचन से रीमा की आवाज आई, रुद्र पापा के लिए चाय ले जाओ। रुद्र का ध्यान टूटा। शेखर बोला, तुम लोग खेलो मैं ही ले आता हूं। किचन में जाकर शेखर रुद्र के खेल के बारे में रीमा को बताने लगा। रीमा बोलीं, इन लोगों का दिनभर ऐसा ही रहता है। सब कार्टून का असर है। शेखर बोला रीमा मैं समझता था कि मेरी छुट्टी को लेकर तुम इसे भरती हो, लेकिन आज देखकर लगता है मैं गलत हूं। रीमा हंस दी, बोली ये आजकल के बच्चे हैं, इनके बचपन में कुछ और भरा ही नहीं जा सकता है ये पहले से भरे हैं। शेखर अपने और अपने बेटे के बचपन के बीच तुलना करने में मगन हो गया। रुद्र की तकनीकी भाषा में खेल-खेल जारी था।

केवल तिवारी

Sunday, June 6, 2010

कहानी : नई सुबह लेकर आई वह शाम

निशा के पैर तो जैसे जमीं पर पड़ ही नहीं रहे थे। आखिर पड़ते भी तो कैसे! उसके घर में नन्हा मेहमान जो आया था। शादी को पांच साल होने को आए थे। वह मां बनने को तरस गई थी। मंदिर-मजार कहां मत्था नहीं टेका उसने। उसीने क्यों, उसकी मां ने भी कितनी मन्न्तें मांगीं। आखिर बात क्या है! शुरू-शुरू में सबने यही समझा कि अभी नई शादी है। आजकल के बच्चे हैं। एकाध साल में बच्चा हो जाएगा। पर बात यह नहीं थी। वे लोग बच्चा चाह रहे थे, लेकिन हो नहीं रहा था। एक ओर पति की व्यस्तता। महीने में 15 दिन बाहर। दूसरे, शहरों का एकाकी जीवन। निशा को हमेशा बोरियत होती रहती। बच्चे की कामना तो उसे और उसके पति निखिल को शादी के ही साल से हो गई थी। इसलिए उन्होंने कोई प्रीकॉशन भी नहीं लिया था। लेकिन उन लोगों की मुराद तब पूरी नहीं हुई, उलटे निशा को महिला संबंधी कुछ परेशानियां होने लगीं। निखिल इलाज के नाम पर उससे यह कह देता कि तुम पढ़ी-लिखी लड़की हो। इतना दौड़भाग तो खुद ही कर सकती हो। उसने दो चार अस्पताल गिना दिए। कभी फुर्सत मिली तो साथ चला गया, नहीं तो निशा खुद ही डॉक्टर के पास जाती। कुछ दिनों के लिए उसने अपनी मां को बुला लिया। लेकिन मां भी कब तक रहती। मां के घर का भी तो अजब हाल था। दोनों बेटियों निशा और शालिनी की शादी हो गई थी। एक बेटा नौकरी के चक्कर में बैंगलोर जा बसा था। अब निशा के पापा की देखभाल कौन करे। उसने मां से कहा कि वह पापा को लेकर आ जाए और दोनों साथ यहीं रहें, लेकिन मां को यह गवारा नहीं था कि दोनों पति-पत्नी आकर बेटी के घर में जम जाएं। निशा के सास-ससुर अपने दूसरे बेटे के साथ कोलकाता जा बसे थे। निखिल के कहने पर एकाध बार आए भी पर पता नहीं क्यों उन लोगों को यहां अच्छा ही नहीं लगता था।
खैर होते-करते निशा और निखिल की शादी को पांच साल बीत गए। परिवार में कड़ुवाहट बढ़ती, निशा का एकाकीपन बढ़ता, निशा चिड़चिड़ी हो जाती इससे पहले निशा को सारे जहां की खुशियां मिल गईं। उसका बेटा यश जिसे वह प्यार से यश्शु कहती, उसके लिए तमाम खुशियां बटोर कर ले आया। उसके रोने में, उसकी नटखट हरकतों में, उसके मुस्कुराने में और उसकी हर गतिविधि निशा के रोम-रोम पुलकित कर देती। पर परेशानियां कब पीछा छोड़ती हैं। निशा को यश्शु के रूप में तमाम खुशियां तो मिल गईं, निखिल की नौकरी भी अब उतनी टफ नहीं थी, लेकिन पता नहीं क्यों दोनों बीमार से रहने लगे। कभी जुकाम लगा तो हफ्तों ठीक नहीं होता। थकान लगती तो घर े कामों में मन नहीं लगता। निखिल तो आफिस पहुंचकर दिनभर वहां दोस्तों में व्यस्त रहता और अपनी बीमारी को जैसे भूलने का यत्न करता रहता, लेकिन निशा को दिक्कत बढ़ने लगी। इसी के चलते वह कई बार यश्शु की वैसी देखभाल नहीं कर पाती, जैसा वह चाहती। कभी-कभी तो उसके साथ अजीब वाकया होता, वह चिड़चिड़ेपन के कारण यश्शु को चपत भी लगा देती। बाद में खुद को ही कोसती कि मैंने कैसे नन्ही सी जान को थ्ाप्पड़ मार दिया। आखिर उस बच्चे का क्या दोष है! वह शरारत नहीं करेगा, उलटेगा-पलटेगा नहीं। एक बार निशा को बुखार आया तो वह महीनेभर तक खिंच गया। ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, शुगर टेस्ट न जाने क्या-क्या टेस्ट करा डाले, पर कहीं कुछ नहीं निकला। वह पेरशान रहने लगी कि आखिर ऐसा क्या हो गया। वह बुखार से पीड़ित तो थी ही कि यश्शु की एक हरकत ने उसमें जान डाल दी। हुआ यूं कि वह दोपहर में किचन में जूठे बर्तनों को साफकर यश्शु के देखने कमरे में आई तो देखा कि यश्शु लड़खड़ाते हुए चल रहा है। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह सारा काम छोड़कर और अपनी बीमारी भूलकर यश्शु को बार-बार अपनी तरफ बुलाती, यश्शु गिरता-पड़ता आता और जैसे ही लड़खड़ाकर गिरने को होता, निशा उसे संभाल लेती। शाम को जैसे ही निखिल घर आया, निशा चहकते हुए बोली-पता है, यश्शु चलने लगा है। निखिल की प्रतिक्रिया जाने बगैर यश्शु को पलंग से उठाकर नीचे खड़ा कर दिया और पुचकारने लगी आ..जा....आ...आ बेटा। लेकिन यश्शु चलने के बजाय नीचे बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। निखिल थोड़ा डांटने के अंदाज में बोल उठा, मैं देख लूंगा उसे चलते हुए। मुझे सांस तो लेने दो। फिर देखा मेरी किस्मत ही खराब है, वह भी अभी चलने से इनकार कर रहा है। निखिल ने बात तो कोई बड़ी नहीं कही थी, लेकिन उसकी टोन से निशा को बुरा लग गया। वह कुछ बोली नहीं। किचन से एक गिलास पानी लाकर टेबल पर रख गई। थोड़ी देर में एक कप चाय बनाकर टेबल पर रख गई और दूसरे कमरे में चली गई। यश्शु तो बच्चा था और बच्चे का क्या! वह तो अबोध है। अपनी मर्जी का मालिक। वह अपने खेलने में मशगूल हो गया। कभी ताली बजाना, कभी पापा के कपड़े खींचना वगैरा-वगैरा...। निखिल ने कपड़े बदले और हाथ-मुंह धोकर चाय पीने लगा और टीवी खोल लिया। टीवी खुलते ही यश्शु का ध्यान उधर ही चला गया। अचानक यश्शु उठा और टीवी की तरफ लड़खड़ाते हुए चलने लगा। निखिल चिल्लाया, निशा देखो यश्शु चल रहा है। निशा पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वह अंदर ही रही। अचानक यश्शु मुंह के बल गिर पड़ा और उसकी नाक से खून आने लगा। यश्शु के रोते ही निशा भागकर आई। उसको चोट लगी और निशा व निखिल के बीच कलह शुरू हो गई। खैर दोनों पढ़े-लिखे थे और समझदार भी। निखिल ने शुरुआत की बात को सुलझाने की। बोला-निशा आज दिनभर ऑफिस में परेशान रहा अपनी तबीयत को लेकर। मन कर रहा है बस सोया रहूं। निशा से भी रहा नहीं गया वह सुबकने लगी। वह भी बोली, हालत मेरी भी ऐसी ही है, लेकिन यश्शु की हरकतों से मन लगा रहता है। आखिर हम दोनों को क्या हो गया है। हमें किसकी नजर लग गई है, निखिल लगभग भर्राते हुए स्वर में बोला। निशा बोली, मेरी भी समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर हुआ क्या है। निखिल बोला कल में छुट्टी लेता हूं और डॉक्टर मितेश दयाल के पास चलते हैं, वे अच्छे जानकार हैं। दोनों अगली सुबह डॉ. दयाल के पास पहुंच गए। डॉक्टर साहब को उन दोनों ने बताया कि वे लोग अक्सर कोई न कोई बीमारी से रोगग्रस्त हो जाते हैं। रोग है कि ठीक होने का नाम ही नहीं लेता है। उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट भी दिखाई। डॉक्टर दयाल रिपोर्ट देखने के बाद कुछ देर चुप रहे, फिर निखिल की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, निखिल एक जांच के लिए मैं कहूंगा, लेकिन परेशान नहीं होना। निखिल ने लगभग कुछ न समझने के अंदाज में डॉक्टर साहब के चेहरे को देखा। फिर डॉक्टर साहब निशा की तरफ देखते हुए बोले, टेस्ट दोनों को कराना होगा। अब निखिल बोल ही पड़ा, डॉक्टर साहब कौन सा टेस्ट है। डॉ. दयाल सपाट बोल पड़े, एचआईवी का। एचआईवी का नाम सुनते ही दोनों पति-पत्नी सन्न् रह गए। उनकी चुप्पी की परवाह किए बगैर डॉक्टर दयाल ने एक सवाल दागा-आप लोगों ने बच्चे के होने से पहले यह टेस्ट नहीं कराया था। निखिल याद करने की मुद्रा में बैठ गया। निशा बोली-नहीं डॉक्टर साहब बच्चे के होने से करीब पांच माह पूर्व मैं मां के पास चली गई थी। वहीं हमारा यश्शु हुआ। अब निखिल भी बोल उठा, डॉक्टर साहब कुछ टेस्ट तो हुए थे, लेकिन शायद यह टेस्ट नहीं हुआ था। फिर कांपती आवाज में बोला, डॉक्टर साहब लेकिन आप यह आशंका क्यों जता रहे हैं। डॉक्टर साहब स्थिति को स्पष्ट करते हुए बोले, मैं आशंका नहीं जता रहा हूं, लेकिन टेस्ट कराने में हर्ज कैसा। उस दिन वे दोनों एचआईवी टेस्ट के लिए ब्लड सेंपल देकर घर आ गए। अभी उनकी ब्लड रिपोर्ट नहीं आई थी, लेकिन दोनों इस पर बहस करने लगे कि आखिर यह बीमारी आ कैसे गई। दोनों लगभग झगड़ने के अंदाज में थे। निखिल का कहना था कि यश्शु के होने से पहले तुम मां के पास चली गई थीं, पता नहीं वहां कैसे इंजेक्शन लगे। उधर, पता नहीं क्यों निशा को अपने पति के चरित्र पर शक होने लगा था। हालांकि इस शक की सुई उठने के बाद वह खुद को मन ही मन कोसती भी कि नहीं कुछ भी हो निखिल ऐसा नहीं हो सकता। तीन दिन बाद निखिल हिम्मत जुटाकर रिपोर्ट लेने गया। डॉक्टर दयाल ने क्लीनिक में थे नहीं। उन्होंने मैसेज छोड़ रखा था कि वह रिपोर्ट खुद देंगे। और दोनों को शाम को बुलवा लिया। शाम को जब निशा और निखिल वहां पहुंचे तो डॉक्टर दयाल ने कहना शुरू किया, देखो निखिल अब एक टेस्ट बच्चे का भी कराना होगा। भगवान न करे कि इसमें भी यह लक्षण दिखें। इतना सुनते ही निखिल कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। डॉक्टर साहब क्या बात करते हैं! फिर वह निशा की ओर देखने लगा। निशा फफक कर रोने लगी। डॉक्टर साहब कुर्सी से उठे और निखिल को बिठाते हुए बोले, देखिए अभी इनीशियल स्टेज में यह बीमारी आप लोगों में है। एक टेस्ट और होगा, लेकिन उससे पहले बच्चे का ब्लड सैंपल हमें लेना होगा। दोनों पति-पत्नी बच्चे का ब्लड सैंपल देकर घर आ गए। उस दिन तो दोनों कुछ भी नहीं बोल रहे थे, लेकिन लग रहा था जैसे घर में कोहराम मचा हुआ है। घर में सन्न्ाटा था, मरघट जैसी खामोशी थी। यश्शु कभी खेलता, कभी रोने लगता। लेकिन उसकी ओर किसी का कोई ध्यान नहीं था। निखिल उसके लिए दूध बनाकर लाया। दोनों ने उस रात कुछ खाया नहीं। सुबह निखिल ऑफिस भी नहीं गया। आस-पड़ोस के लोगों ने उनके चेहरे देख कुछ पूछा भी तो उन्होंने तबीयत ठीक नहीं होने की बात कहकर उन्हें टरकाया। पड़ोस की सीमा भाभी उनके घर आई। घर में सन्न्ाटा देख उन्होंने अंदाजा लगाया कि पति-पत्नी में कोई झगड़ा हुआ होगा। वह दोनों के लिए चाय-नाश्ता बनाकर ले आई और यश्शु को अपने घर लेकर चली गईं। करीब 11 बजे डॉक्टर दयाल खुद उनके घर आए। इस वक्त डॉक्टर दयाल निशा और निखिल को किसी खतरनाक सूचना देने वाले व्यक्ति केक रूप में दिख रहे थे। लेकिन इस बार सूचना अच्छी थी और वह यह कि यश्शु की ब्लड रिपोर्ट में ऐसा कोई सिमटम नहीं था। डॉक्टर साहब ने यह बात दोनों को बताई और यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब एचआईवी उन दोनों को यश्शु के होने के बाद हुआ है। अब निशा का शक निखिल के प्रति गहराने लगा। निखिल ने उसे लाख समझाने की कोशिश की, लेकिन वह बस रोती रही। अंतत: निखिल ने एक बार 15 दिन तक घर न आने का राज बताया। उसने डॉक्टर उयाल से कहा, डाक्टर साहब मैं एक बार दो निद के लिए टूर पर गया था। लेकिन आया 17 दिन बाद। निशा रोज फोन करती, मैं कहता थोड़ा काम फंसा है, बस आने वाला हूं। निखिल जैसे-जैसे यह बात कह रहा था, वैसे-वैसे निशा के मन में किसी भयानक खबर को सुनने का अंदेशा पलता जा रहा था। निशा को लगा कि अब निखिल कहेगा कि वह किसी के साथ हम बिस्तर हो रहा था। उसकी कोई पे्रमिका है। वह आज भी वहीं रहती है। निखिल अक्सर वहां जाता है....। लेकिन बात ऐसी कुछ भी नहीं थी। निखिल अपनी बात पूरी करने से पहलू सूटकेस से कुछ कागजात निकाल लाया। डॉक्टर साहब की ओर कागजात बढ़ाते हुए उसने कहा, डॉक्टर साहब मैं हैदराबाद में भयानक रूप से बीमार पड़ गया था। निशा प्रेगनेंट थी, मैं इसे परेशान नहीं करना चाहता था। होते-करते मुझे करीब 14 दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। मुझे आशंका है कि यह बीमारी मुझे वहीं से लगी और निशा को मुझसे। निशा अपनी बीमारी से जितनी परेशान थी, इस वक्त निखिल की बातें सुनकर उसे उससे अधिक सुकून मिल रहा था। डॉक्टर दयाल ने दोनों को अपने सामने बिठाया और कहा कि परेशान मत होओ, आगे का प्लान करो। बच्चे की देखभाल का इंतजाम करो। मैं आप लोगों को कुछ दवा दे रहा हूं, नियमित लेते रहें। परेशानी और रोना-धोना मामले को और गंभीर बनाएगा। इतना कहते ही डॉक्टर साहब जाने को हुए तो निशा ने उन्हें रोक लिया और बोली डॉक्टर साहब मैं चाय बनाती हूं, आप नाश्ता हमारे साथ करेंगे। डॉक्टर दयाल आग्रह मानकर वहीं धमक गए। सबसे पहले निशा पड़ोस से यश्शु को ले आई। फिर उसने चाय-पराठे बनाए। शाम को निखिल और यश्शु संग निशा पार्क में गई। वहां बहुत देर तक उन लोगों ने यश्शु को खिलाया और तय किया कि अब वे दूसरा बच्चा नहीं करेंगे। यश्शु की परवरिश पर खास ध्यान देंगे। दवा नियमित लेने और नियमति जांच का वादा एक दूसरे से करने के बाद दोनों ने नारियल पानी पीया और घर का रुख किया। पार्क में बिताई वह शाम उन लोगों के लिए नई सुबह जैसी थी।
केवल तिवारी

Wednesday, June 2, 2010

गौरैया का पंख

story कहानी (sparrow)
गर्मियां शुरू होने पर दो बातें हमेशा कुछ परेशान सा करती हैं। मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी और बच्चे को। एक समस्या को पत्नी अपने हिसाब से कम ज्यादा मान बैठती है, दूसरी शाश्वत समस्या है। इन समस्याओं में एक तो कूलर अपने मन से शुरू न कर पाने का दंश और दूसरा बच्चे के स्कूल से मिला भारी-भरकम होमवर्क। कूलर हम कई बार इसलिए अपने मन से नहीं खोल पाते क्योंकि अक्सर हमारा कूलर कबूतरों के लिए 'मैटरनिटी सेंटर" बन जाता है। कूलर खोलते ही कभी वहां कबूतरनी अंडों को सेती हुई दिखती है और कभी छोटे-छोटे बच्चों के मुंह में खाने का कुछ सामान ठूंसती हुई सी। कबूतरों का मेरे कूलर के प्रति प्रेम कई वर्षों से है। जब मेरी मां जीवित थी, कहा करती थी घर में चिड़ियों का घौंसला बनाना बहुत शुभ होता है। किराए के एक मकान में एक बार कबूतर ने हमारे घर में घौसला बनाया, अंडे दिए और उसके बच्चे हमारे सामने उड़े। उसके कुछ माह बाद मेरे घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। घौंसला बनाना और उसमें बच्चे होना शुभ होता है, यह बात मेरी पत्नी के दिमाग में घर कर गई है। लेकिन कबूतरों के प्रति मेरे मन में स्नेह कभी नहीं पनप पाया। उल्टे एक बार चोरी-छिपे मैंने उसके घौंसेले को तोड़ दिया था। असल में उसका घौंसला अभी बन ही रहा था कि गर्मियों ने ऐसा तेवर दिखाना शुरू कर दिया कि कूलर की जरूरत महसूस होने लगी। मेरी पत्नी ने ताकीद की कि कूलर की सफाई करने में मेरी मदद करो। मैंने तुरंत हां कर दी और काम की शुरुआत पहले मैं ही करने को इसलिए राजी हो गया क्योंकि मुझे पूरी आशंका थी कि घौंसला देखते ही वह कूलर वाली खिड़की के किवाड़ बंद कर देगी। और न जाने दिन ये किवाड़ बंद कर देंगे। हो सकता पूरी गर्मी भर। इस आशंका को भांपते हुए मैंने पत्नी को चाय बनाने भेजा और कूलर वाली खिड़की खोलने लगा, देखा कबूतरों का एक जोड़ा अपना घर बनाने में मशगूल है। खिड़की खोलते ही जोड़ा तो उड़ गया, लेकिन आशियाना लगभग तैयार था। मैंने सबसे पहले उसे उठाकर नीचे फेंक दिया। असल में हमारे पूरे मोहल्ले में इतने अधिक कबूतर हैं कि हर समय वही चारों तरफ दिखते हैं। जहां बैठे तुरंत गंदगी कर देते हैं। बालकनी को दिनभर साफ करते रहो। कपड़े तार में डाले नहीं कि तुरंत गंदा कर दिया। आलम तो यह था कि इधर कूलर अंदर खिसकाने की आवाज सुनते ही पत्नी आई और बोली कोई घौंसला तो नहीं बनाया है न कबूतरों ने। मैंने कहा नहीं। उसने अच्छा इतनी जोर से कहा, जैसे आश्चर्य और खुशी दोनों बातें उसमें मिली हुईं थी। खैर वह गर्मी हमारी ठीक कटी। कूलर चलने के बाद जब तक वह रोज खुलता, बंद होता कोई पक्षी वहां अपना आशियाना बसाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उन्होंने आसपास अपना ठौर ढूंढ़ लिया। वह वर्ष बच्चे के स्कूल का पहला साल था, इसलिए होमवर्क भी बहुत नहीं मिला था और वह गर्मी हमारे लिए बहुत अच्छी बीती।
इस साल भी गर्मी भयानक पड़ी और गर्मी शुरू होने से पहले से ही कबूतरों का खौफ मेरे मन में था। माताजी वाले कमरे का कूलर हमने अंदर ही निकाल रखा था। क्योंकि मां अब इस दुनिया में रही नहीं, वह कमरा अमूमन खाली भी रहता है। कभी कोई मेहमान आ गया तो ठीक। या फिर टीवी देखना हो या खाना खाना हो तो हम उस कमरे का इस्तेमाल करते हैं। उस कमरे के कूलर को पहले से इसलिए अंदर निकालकर रख दिया गया कि कहीं दूसरे कूलर के पास अंडे-बच्चे हो गए तो इस कूलर का इस्तेमाल किया जा सकेगा। दूसरे कमरे के कूलर के आसपास भी मैं कबूतरों को फटकने नहीं दे रहा था। होते-करते कबूतर मुक्त कूलर की खिड़की हमें मिल गई, लेकिन उनका अड्डा बालकनी और अन्य स्थानों पर होने लगा। उनकी संख्या लगातार इस कदर बढ़ रही थी कभी-कबार पत्नी भी झल्ला जाती। खासतौर पर तब जब उसे धुले कपड़े दोबारा धोने पड़ते। इस गर्मी में कूलर तो गर्मी शुरू होते ही चल निकला, लेकिन बच्चे को होमवर्क अच्छा-खासा मिल गया। खैर यह होम वर्क तो मिलना ही था, इसलिए यह मान लिया गया कि कोई बात नहीं, किसी तरह से कराएंगे। बच्चा अपनी मां के साथ लखनऊ एक विवाह समारोह में चला गया और योजना बनी कि कुछ दिन वहां मेरे बड़े भाई के घर रहा जाए। बच्चा अपने ताऊ और ताई के साथ रहना और मौज-मस्ती करना बहुत पसंद करता है। इधर छोटे से बच्चे को भी अपने होमवर्क की बहुत चिंता थी। मैंने भरोसा दिलाया कि कुछ काम लखनऊ में पूरा हो जाएगा। मेरी दीदी का छोटा बेटा कुछ करा देगा और कूुछ काम मैं पूरा करा दूंगा। उसको मिले तमाम कामों में एक यह भी शामिल था, जिसमें पांच प्रकार की चिड़ियों के पंखों को एकत्र करना था। मैंने इस काम को पूरा करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। घर में अकेला था। एक दिन सुबह देर से उठा, बालकनी का दरवाजा खुला तो देखा वहां गौरैया इधर-उधर घूम रही है। कबूतरों से नफरत करने वाला मैं गौरैया को देखते ही बहुत खुश हो गया। मुझे इस बात का दुख हुआ कि मेरे पास कैमरा नहीं है। एक पुराना कैमरा है भी तो रील वाला, उसमें रील नहीं है। मेरे बालकनी में जाने से वह भाग नहीं जाए, इस आशंका से मैं अंदर आ गया। जिज्ञासावश थोड़ी देर बाद मैं फिर बालकनी मैं गया। मैंने चारों तरफ देखा मुझे गौरैया नहीं दिखी। मुझे तमाम उन खबरों की जानकारी थी, जिसमें कहा जा रहा था कि गौरैया अब कहीं नहीं दिखती। उनकी प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है। मुझेे लगा हो न हो मेरा भ्रम रहा होगा। वह पंछी गौरैया तो नहीं रही होगी। तभी मैंने देखा फुर्र से उड़ती हुई बालकनी की छत से गौरैया सामने की छत की तरफ उड़ गई। मैंने जिज्ञासावश बालकनी की छत की ओर देखा। वहां पंखा लगाने के लिए बने बिजली के बड़े छेदनुमा गोले में कुछ घासफूस लटकती दिखाई दी। गौरैया मेरे घर में घौंसला बना रही है। मैं इतना खुश हो गया मानो मुझे कोई खजाना मिल गया हो। मैंने बालकनी में कुछ चावल के दाने बिखेर दिए और बालकनी बंद कर कमरे में आ गया। अब मैं दरवाजे के छेद से देख रहा था, गौरैया बार-बार उन दानों को उठाती। फिर कहीं से तिनका लाती और बालकनी की छत में अपने आशियाना बनाने में मशगूल हो जाती। मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ कि चलो शायद गौरैया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि विलुप्त होने वाली है अब कुछ बच्चों को यहां जनेगी। अब मेरी जिज्ञासा रोज बढ़ती। सुबह उठकर मेरा पहला काम उस घौंसले की तरफ देखना होता था। नीचे रखे गमले में मैं कुछ पानी भर देता। शायद इसमें से वह पानी पी लेगी। एक दिन तो मेरी खुशी सातवें आसमान पर थी। मैंने देखा गौरैया का छोटा सा बच्चा मुंह खोलकर चूं-चूं कर रहा है और उसकी मां इधर-उधर से कुछ लाकर उसके मुंह में डाल रही है। कई बार टुकड़ा बड़ा होता तो नीचे गिर जाता। गौरैया फट से नीचे आती उस गिरे टुकड़े को उठाकर ले जाती और अपने बच्चे के मुंह में डाल देती। इस बार आश्चर्यजनक यह था कि मेरे वहां खड़े होने पर भी गौरैया डर के मारे भाग नहीं रही थी। मैं यह देखकर कुछ चावल के दाने और ले आया। मेरे सामने ही गौरैया उन दानों पर टूट पड़ी। मैंने फिर बालकनी का दरवाजा बंद किया और अपने काम में मगन हो गया। मन किया कि लखनऊ फोन करके बताऊं कि गौरैया ने एक घौंसला बनाया है। बालकनी की छत पर। उसका बच्चा भी हो गया है। शायद मेरी पत्नी बहुत प्रसन्न् हो। इसलिए कि अक्सर कबूतरों को भगाने और उन्हें घौसला नहीं बनाने देने को आतुर एक चिड़िया का घौंसला देखकर कितना खुश हो रहा है। लेकिन एक हफ्ते बाद वे लोग आ ही जाएंगे, फिर उन्हें सारा नजारा दिखाऊंगा, यह सोचकर मैंने फोन नहीं किया। लेकिन कैमरा नहीं होने का दुख मुझे सालता रहा। मैं बालकनी बंद कर घर में आ गया और नहाने के बाद ऑफिस के निकल गया। ऑफिस के रास्ते में अनेक मित्र मिले, मैंने सबसे गौरैया के घौंसले की बात बताई। किसी ने कहा, वाह कितनी अच्छी बात है। ज्यादातर ने यह कहा कि गौरैया का घौंसला बनाना तो बहुत शुभ होता है। इधर बच्चे के होमवर्क के लिए चिड़ियों के पंख एकत्र करने की बात मुझे याद आई। कबूतरों के तो अनगिनत पंख मेरे इर्द-गिर्द रहते हैं, कभी-कबार देसी मैना भी दिख जाती है। मैंने कहा, पंख एकत्र हो ही जाएंगे। मेरे मन में इन दिनों रोज-रोज बढ़ते गौरैया के बच्चे को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी। मैं कल्पना करता काश! यहीं गौरैया अपना स्थायी निवास बना ले। यह बच्चा हो, इसके बच्चे हों। कभी दूसरी गौरैया आए। इस तरह के तमाम खयाल मेरे मन में आते। गौरैया परिवार की चर्चा भी अक्सर अपने मित्रों से करता। खैर एक दिन गौरैया के बच्चे को अपनी मां के मुंह से रोटी का छोटा सा टुकड़ा खाता देख मैं ऑफिस चला गया। अगले दिन मैं किसी मित्र के यहां रात में रुक गया। उसकी अगली दोपहर घर पहुंचा तो सबसे पहले बालकनी में पहुंचा। बालकनी में बच्चा जो धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था उल्टा लटका हुआ था। वह अक्सर तब भी ऐसे ही लटकता दिखता था जब उसकी मां उसे खाना खिलाती थी। मैं दो-चार मिनट तक उसे लगातार देखता रहा। मेरा दिल धक कर रहा था। उसमें कोई हरकत नहीं दिख रही थी। उसकी मां भी कहीं नहीं दिखरही थी। एक दिन पहले वहां डाले चावल के दानों में से कुछ किनारे पर पड़े हुए थे। मैं कुछ समझ नहीं पाया। मैंने कुर्सी लगाकर जोरदार तरीके से ताली बजाई। लेकिन बच्चे में कोई हरकत नहीं हुई। वह बस उसी अंदाज में उल्टा लटका हुआ था। मैंने गौर से देखा कि बच्चा मर चुका था। उसकी मां गायब थी। मैं अंदर आकर धम से बैठ गया। मन बहुत खिन्न् हो गया। कभी इधर जाता, कभी इधर। पानी पीने को भी मेरा मन नहीं हुआ। फिर बालकनी में गया, मरे हुए बच्चे का एक पंख नीचे गिर गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस पंख को अपने बच्चे के होमवर्क के लिए सहेज कर रख लूं या उड़ जाने दूं।

केवल तिवारी

Sunday, September 20, 2009

माँ बिन नवरात्र

में नवरात्र माना रहा हूँ। पर इस बार माँ के बगेर। नवरात्र के दौरान इस ब्लॉग को लिखना शुरू किया था और अब विजय दशमी के दिन बैठा हूँ पुरा करने की कोशिश में। पिछले साल हमारे घर में कोई त्यौहार नहीं मनाया गया। ऐसा नियम होगा लेकिन मैंने नियम्बध्ह होकर नहीं बल्कि अपने मन से ऐसा किया। करीब डेढ़ साल बीतने के बाद मुझे लगा त्यौहार मानना शुरू करुँ पहली बार ऐसी नवरात्र आयी जब मेरी मां नहीं है। फ़िर भी मैंने मंत्र पढ़ा कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति। यही नही मैंने अन्य मंत्र पढ़े आरती की थाल लेकर जब मां की फोटो के पास गया तो सचमुच मुझे लगा मां कह रही हो पूजा करने में संकोच क्यों। में हमेशा पूजा पाठ करता हूँ समय के हिसाब से। मन्दिर की विशेष जरूरत नही होती। अन्य मंदिरों में भी जाता हूँ। लेकिन कुछ ऐसे डोंगियों से सख्त नफरत है जो अपनी मां से भयानक किस्म से लड़ते हैं और मंदिरों में दिनभर जय माता दी के नारे लगते हैं। मैंने ख़ुद ऐसे कई लोगों को देखा है। ऐसे लोगों को भी देखा है पूजा पाठ नहीं करते पर मां से भी नहीं लड़ते या लड़ते हैं। असल में घर में किसी से लड़ना नहीं लड़ना यह सबकी व्यक्तिगत बातें हैं लेकिन ढोंग करना तो निश्चित रूप से ग़लत है। ऐसे लोग भी मैंने देखे हैं जो घर में अखंड रामायण का पाठ कराते हैं। ख़ुद एक शब्द नहीं पढ़ते। पढने के लिए आ रहे लोगों के लिए पान बीडी और चाय की व्यवस्था में लगे रहते हैं। यहाँ पर मुझे एक वाकया याद आ रहा है जब में ११ में पढता था और शाहजहांपुर में रहता था। मेरे एक रिश्तेदार का बेटा एन्गीनेइरिंग कर अच्छे ओहदे पर नौकरी पा चुका था। इश्वर में उसकी आस्था थी। उन लोगों ने घर में रामायण का पाठ किया। बिना माइक लगाये. मुझे पता लगा। में जाना चाहता था लेकिन इस हनक में नहीं गया की मुझे निमंत्रण क्यों नहीं दिया। दूसरे दिन वो प्रसाद देने आए। मैंने अपनी इच्छा और विरोध दोनों जाता दिया। निर्मल नाम के उन सज्जन ने मुझसे कहा, में ऐसी चीजें दो तरह से करता हूँ। एक माइक नहीं लगता। दूसरा किसी को आमंत्रित नहीं करता। में और परिवार के अन्य लोग पढ़ना शुरू कर देते हैं, लोग आते हैं और जुड़ना शुरू हो जाते हैं। में इस बात से बहुत प्रभावित हुआ। वाकई यही तो असली बात है। तब से मैंने ये निर्णय किया की बिना किसी ढकोसले के में इसी तारह पूजा करूंगा। हालाँकि ढोंग जैसी बात पहले भी नहीं करता था। मेरे घर में सुबह पूजा के बाद तिलक लगाया जाता था। में स्कूल जाते समय उसे मिटा देता था एकाध बार घर से दांत भी पड़ी। अब अजीब लगता है जब आज कई मित्र नवरात्र के दौरान कहते हैं अरे तिलक नहीं लगा रखा है। ऐसे मौसमी पंडितों से मैंने कहा भी हमारा यहाँ १२ माह तिलक लगता है। नियमपूर्वक पूजा होती है। में तिलक कभी नहीं लगता तो नहीं लगता। हाँ घर के विशेष कार्यक्रमों पर आग्रह ठुकराता भी नहीं हू। इस प्रसंग में मुझे खोसला का घोसला फ़िल्म की याद आती है जिसमें प्रोपर्टी डीलर कहता है सब माता रानी की कृपा है। हेर हफ्ते वैस्श्नों देवी जाता हूँ। फर्जी लोगों के प्रति जबरदस्त कटाक्ष। वैष्णों देवी मन्दिर भी गया था अपनी मां, बीवी और बच्चे के साथ। यादगार टूर रहा। ७० वर्षीया मेरी मां मानो हमारे लिए मानक बन गयी थी। पूरे सफर में थकन से उसकी वो हालत नहीं हुई या उसने चेहरे से जाहिर नहीं होने दी जो हम लोगों की हो गयी थी। एक बात और ki मेरी मां बहार कुछ खाती नही थी सिवा फल के। पाँच दिन के सफर में वो बस कुछ केले सेब और धर्मशाला वालों के आग्रह पर चाय पीकर रही। खैर वो सब इतिहास हो चुका है मां कहीं सितारों में खो गयी है। पर हमेशा कुछ कहती रहती है मुझसे जैसे नवरात्र मनाओ बिन मां के ही सही।

Saturday, September 5, 2009

गुदडी के लाल और प्रतियोगिता

पिछले दिनों एक स्कूल में दो प्रतियोगिताओं में निर्णायक mandal में मुझे भी बुलाया गया। पहले दिन भाषण प्रतियोगिता थी। दो वर्गों की। तमाम स्कूलों के बच्चे थे। सरकारी स्कूल के भी। आत्मविश्वास से लबरेज पब्लिक स्कूल के बच्चों के सामने सरकारी स्कूल के बच्चे कुछ सहमे-सहमे नजर आ रहे थे। कुछ के चेहरे से गरीबी साफ़ झलक रही थी। एक एक कर जब मंच पर बच्चे आने शुरू हुए तो में आश्चर्य चकित हो गया। बच्चों की तयारी तो अच्छी थी ही गुदडी के लाल भी चमक रहे थे चहक रहे थे। दो जगह मेरा मन बेईमानी करने को हुआ एक तो सीनियर वर्ग के एक बच्चे को देखकर। वो गरीब तो लग ही रहा था। कुछ और दिक्कत भी उसे थी। मसलन आंखों का भेंगापन कपड़े फटे हुए से और पुनर्वास कालोनी का लेबल। उससे पहले अनेक बच्चे अपनी योग्यता का परिचय दे चुके थे। दो जगह ऐसा मौका आया की बच्चे दो-चार लाइन बोलने के बाद अटकने लगे में उन्हें बोलने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था लेकिन इस कार्य को निपटाने के लिए आए तमाम लोग मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे में इन्हें बोलने का वक्त देकर कुसूर कर रहा हूँ। उनकी नोकरी को लंबा खींच रहा हूँ। खैर दो-तीन घंटे में प्रतियोगिता खत्म हो गयी। परिणाम आया तो वो सरकारी स्कूल का छात्र सीनियर वर्ग में थर्ड आया। मेरे पक्षपात के कारण या अन्य जजों की इमानदारी के कारन यह में नहीं जान पाया।
करीब एक हफ्ते बाद फ़िर एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में मुझे इसी भूमिका में बुलावा आया। दो वर्ग। यहाँ या तो हिम्मत न होने की वजह से या रूचि न लेने की वजह से सरकारी स्कूल की भागीदारी न के बराबर रही। प्रतियोगिता टक्कर की थी। कोई अपने को कम नहीं समझ रहा था। बल्कि एक दूसरे से ख़ुद को बड़ा समझ रहा था। तयारी अच्छी थी। बदकिस्मती से दो तीन बच्चियां सरकारी स्कूल से आयी थीं लेकिन उनमें यदि पक्ष वाली ठीक से तर्क देतीं तो विपक्ष कमजोर पड़ जाता। विपक्ष तगड़ा रहता तो पक्ष की कमजोरी उसे खा जाती। रिजल्ट आने के बाद ११ कक्षा की एक बछि रोने लगी। वाकई वो अच्छा बोली थी लेकिन यहाँ निर्णायक मंडल की एक मजबूरी ये थी की नम्बर ग्रुप में ही देने थे।
कुछ सुझाव में बिना मांगे इन स्थानों पर दे आया हूँ। मसलन वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में पक्ष विपक्ष को अलग जीत या हार का खिताब दिया जाए और सरकारी और पब्लिक स्कूल की प्रतियोगिता अलग अलग कराकर फ़िर कोम्बिनेद प्रतियागिता कराई जाए। निपटाने के अंदाज में ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन न किया जाए। ya
to इन सुझाओं को अमल में लाने के लिए हो सकता है कोई कागज पत्तर आगे चलें या फ़िर हो सकता है आगे से मुझे निर्णायक मंडल में बुलाया ही न जाए। पर मुझे उम्मीद है कुछ न कुछ होगा जरूर।

Saturday, June 6, 2009

आधुनिक बनने का ये क्या मतलब

इन दिनों व्यापक स्टार पर देखा जा रहा है कि yउवा नेट कि दुनिया में खोया पड़ा है। इन्टरनेट से रू-ब-रू होना बहुत अच्छा है। लेकिन मैंने ख़ुद अपने ही जानकारों के बीच यह पाया कि वे फर्जी नाम से मेल बनाकर या ऑरकुट पर अपने बारे में ग़लत जानकारी दे रहे हैं। इसके पीछे के कुछ भाव स्पष्ट हैं। पिछले दिनों मेरे ऑरकुट पर एक स्क्रैप आया। मेरी उम्र पूछी गयी और ख़ुद ही जवाब दिया गया कि आपका संदेश बुजुर्गों जैसा है। असल में मैंने उसमें लिखा है कि रात को घर जाने के बाद में आसमान में देखता हूँ। एक तारे के पीछे से मुझे अपनी मान दिखती है मानो पूछ रही हो बेटा आ गया। इस संदेश में पुरानापन क्या है में नहीं समझ पाया। ऑरकुट कि दुनिया में मैंने देखा लोग अपनी फर्जी तस्वीर लगाकर उल्टे सीधे संदेश लिखकर पता नहीं किस फंतासी में जीने कि कोशिश करते हैं। मुझे एक छोटी सी घटना याद आ रही है, में हिंदुस्तान अखबार में था मेरी निघत ड्यूटी थी। रात को करीब १ बजे में घर के लिए दफ्तर कि गाड़ी से गया। ड्राईवर स्मार्ट सा था। उससे एकाध बार पहले भी मुलाकात हुई थी और उसके लक्षण कई मामलों में ठीक नहीं लगते थे। खैर में गाड़ी में बैठा और उसने गाड़ी के साथ फम स्टार्ट कर दिया। उसमें एक मधुर सा गाना बज रहा था। उसने चेनल बदल दिया। आधे रस्ते तक वो ऐसा करता रहा। मैंने उससे एक जगह टोका कि अच्छा गाना आ रहा है चलने दो। उसने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया और एक फूहर किस्म कि सीडी चला दी। मैंने उससे गाना बंद करने को कहा। उसने गाड़ी में लाइट जलाई और बोला आपकी क्या उम्र हो गयी। इसको फ़िर पूरा करूंगा इस समय १२.३० बजे हैं और द्रोप्पिंग कि गाड़ी में चलने का बुलावा आ गया है। इस समय में नईदुनिया अख़बार में हूँ और यहाँ के जितने ड्राईवर मिले अभी तक सब अच्छे हैं एक के लिए तो मैंने पंगा तक लिया। खैर बात पूरी कर लूँ। उस ड्राईवर ने जैसे ही मेरी उम्र पूछी मैंने उसे कसकर झाड़ पिलाई। मैंने कहा क्या मतलब तुम्हारा वो थोड़ा सहमा और बोला सर आपको पुराने गाने अच्छे लग रहे हैं न इसलिए। मैं उसकी इस बात का जवाब देने के काबिल अपने आप को नहीं समझ पा रहा था। मैंने उससे गाने बंद करदेने को कहा और घर पहुँचने तक चुपचाप बैठा रहा। दो दिन बाद पता चला की उस ड्राईवर को निकल दिया गया है। कारण पूछने पर पता चला कि हिंदुस्तान टाईम्स कि किसी वर्कर से बदतमीजी करने के चक्कर में निकला गया है। वह एक लड़की के बारे में कहता तो था कुछकुछ ऐसा लोगों ने बताया। उसको लगता था कि कोई अगर हंसकर बात कर रही है तो वह लाइन मार रही है। यह तो एक प्रसंग्भर है। आज बहुत से ऐसे युवा मुझे दिख जाते हैं जो अपने आप को आधुनिक साबित करने के लिए उल जुलूल हरकतें करते दिख जाते हैं।
इसी सन्दर्भ में एक बात और कहना चाहता हूँ इन दिनों हमारे यहाँ कई छात्र छात्राएं पत्रकारिता वाले प्रशिक्षण के लिए आ रहे हैं। ज्यादातर का कहना है कि जो भी गेस्ट लेक्टुरेर उन्हें पढ़ने आ रहे है ज्यादातर यही कहते हैं कि भूल जाओ आदर्शवाद, समाज सुधर और भी बहुत कुछ। मैंने उन्हें समझाया एकदम से ऐसा अंधेर नहीं है। उन्हें पढ़ने वाले हो सकता बहुत पक चुकने के बाद ऐसा कहने को उद्वेलित हुए हों या यह भी हो सकता है कि किसी नामी अखबार में नोकरी होने कि वजह से उन्हें वक्त से पहले इतनी महत्वपूर्ण जिमेदारी कुछ पत्रकारिता संस्थानों ने दे दी हो। में मानता हूँ कि हकीकत थोडी सी जुदा है लेकिन जो लोग अभी पत्रकारिता के मैदान में ककहरा पढने को उतर रहे हैं उनका मन मस्तिष्क ऐसा कर दिया जन चाहिए। शायद नहीं।

आधुनिक बनने का ये क्या मतलब

Wednesday, March 18, 2009

दोस्त का दुःख

दोस्त का दुःख। यहाँ पर एक मित्र के बारे में कुछ लिखना चाहता हूँ। मित्र ऐसा की अभी मीटिंग के लिए कॉल आ गयी है। फ़िर पूरा करूंगा इस लेख को.

Monday, February 23, 2009

--- पर केवल आगे कैसे बढोगे

मुझे एक पुरानी बात याद आ रही है। अगर यह ब्लॉग वो पढ़ें तो संभवतः समझ जायेंगे। मुझसे एक पुराने बॉस ने कहा था केवल तुम बहुत योग्य, अच्छी समझ रखते हो, लेकिन तुममें आगे बढ़ने के सब गुण नहीं हैं। मैंने इन सब बातों का अपने हिसाब से अंदाजा लगा लिया। कुछ मूड ख़राब होने जैसा और कुछ वास्तविकता से ख़ुद को करीब रखने जैसा। आज में उस वाकये को याद कर रहा हूँ। बल्कि उसी वाकये को नहीं बल्कि एक और बहुत सीनियर व्यक्ति की बात याद कर रहा हूँ। उन्होंने मुझसे कहा था मुझे लगता है तुम्हारी तरक्की में तुम्हारा व्यक्तित्व आड़े आ जाता है। यहाँ मैंने जो समझा और उन्होंने जो समझाया दोनों एक ही बात थी। उनका मतलब था की में सबकुछ ठीक हूँ लेकिन शारीरिक बनावट और मेरी ड्रेसिंग लचर रहती है। फेस वेलू पर रियल वेलू पर हावी हो जाती है। जीवन चक्र में कुछ बातें समझ में आने लगती हैं और धीरे धीरे आपको अपनी गलती का भी अहसास भी होने लगता है। बस बहुत देर न हो जाए इस बात का ध्यान रखना पड़ता है। इन अनुभवों पर में किताब लिखूंगा। में यह भी जनता हूँ की मेरी कोई ओकात नहीं है लेकिन अपनी बात कहने और रखने का एक प्राकृतिक हक़ के साथ में कुछ लिखूंगा और कहूँगा। खैर जीवन चक्र पर यह भी नहीं भूलना चाहिए की जिन लोगों ने हमारी सुनी, हमें समझा और उसी हिसाब से सम्मान दिया उनको याद करना चाहिए। उन्हें भी जिनकी वजह से यह सब लिखने को प्रेरित हुआ। चूंकि में भाग्यवादी भी हूँ तो क्यों न भाग्य पर भरोसा करते हुए जीवन पथ पर बढ़ते जाऊं

Saturday, January 31, 2009

जब माइक पकड़ने वाला बना इंटरव्यू लेने वाला

आज वसंत पंचमी के अवसर पर होने वाले एक कार्यक्रम में गया। एक म्यूजिक स्कूल था। वहां माइक से एक सज्जन उद्घोसना कर रहे थे। लोगों को जल्दी थी। इन्तजार भी था की उनके बच्चों का नम्बर आए और वो चलें घर को। हालाँकि बच्चों के कार्यक्रम देखने का मन भी था। मगर जिन सज्जन के हाथ में माइक था वो लगे थे अभिभावकों का इंटरव्यू लेने में कार्यक्रम शुरू होते ही वो सवाल पूछने में मशगूल हो गए भूल ही गए की लोग आपका ज्ञान समझन नहीं कार्यक्रम में आनंद उठाने ए हैं। खैर किसी तरह वो सरस्स्वती वंदना के लिए कुछ बच्चों को उठा पाए। बच्चों बहुत लाय्बद्छ होकर माँ सरस्वती की वंदना की। फ़िर बच्चों का कत्थक नृत्य का कार्याक्रम था। ये जनाब फ़िर शुरू हो गए। पहला सवाल था आप लोगों में से कितने लोग बिरजू महाराज को जानते हैं हाथ खड़े करें। कितने नहीं जानते हैं वो हाथ खड़ा करें। अब बताएं बिरजू महाराज कहाँ के रहने वाले हैं। कत्थक क्या होता है। एक महिला जिसकी बच्ची का शायद कार्यक्रिम था कुछ कुछ बताने लगी तो इन्हें फ़िर पता नहीं क्या हुआ बोले में व्यक्तिगत रूप से बिरजू महाराज को जनता हूँ। मेरे बगल में बैठे एक सज्जन को सवाल पूछने का यह अंदाज नागवार गुजर रहा था। वो मुझसे कुछ बोले। में बोला शांत रहिये कोई बात नही। थोडी देर में एक सांवला और दिखने में औसत बच्चे ने एक कार्यक्रिम किया उसके जानते ही माइक मैन बोले यह बच्चा बहुत खूबसूरत है। धन्यवाद इसके माँ बाप को आदि आदि। मेरे साथ बैठे सज्जन तो अब लगभग भड़क गाये मैंने फ़िर उन्हें शांत किया। माइक मैंन फ़िर बोले अभी जिस गीत पर बच्चों ने नृत्य किया उसके बोल बताइए। मेरे बगल में बैठे सज्जन बोले इनसे कोई यह पूछे कि यह माँ बाप का इंटरव्यू ले रहे हैं या बाच्चों का कार्यक्रम पेश कर रहे हैं। बगल वाले सज्जन बोले एक तमिल गाना था अगदम बदम आदि आदि। वोही गीत बाद में इस तरह आया जिया जले जान जले नैनूं टेल धुना। खैर अभी यह जारी है क्योंकि रात के १२ बज चुके हैं और घरजाने का वक्त हो चुका है यूँ ही चलती रहेगी जिन्दगी.