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Saturday, August 24, 2013

तान्या जब बन गयी निशा

जिन लोगों ने मेरी कहानी एक थी तान्या पढ़ी है, उन्हें यह कहानी अच्छी तरह समझ में आ जाएगी। वैसे जो लोग उसे नहीं पढ़ पाये थे, वे भी इस कहानी को लेकर कुछ तो जुड़ाव महसूस करेंगे, यह मेरी उम्मीद है।

तान्या के बारे में जब खबर लग गयी कि उसका बचना मुश्किल है तो कोई भी कंप्यूटर स्क्रीन पर उसके ऑनलाइन होने का इंतजार नहीं करता। न मोहित बाबू, न जोगेन्द्र और न ही उनका टीम लीडर रोहित। आईटी विभाग में हैं ये लोग। शिफ्ट बदलती रहती है। ज्यादातर की जनरल शिफ्ट रहती है। पहले सबको शाम होते-होते तान्या का इंतजार होने लगता था। तान्य, अनदेखी लडक़ी। खुद को एक पत्रकार बताने वाली। जीमेल पर दोस्त बनी। सबसे बात करती। चैटिंग के जरिये। न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन की तरह। जानते सब थे कि तान्या से चैटिंग पर हर कोई लगा रहता है, लेकिन छिपाते भी सब थे एक दूसरे से। और जब खबर लगी कि उसका एक्सीडेंट हो गया है। बुरी तरह से चोटिल है। अस्पताल में भर्ती है। किसी ने फिर कुछ भी जानने की जहमत नहीं उठाई। कोई उसके ऑनलाइन होने का इंतजार भी नहीं करता। कुछ लोगों ने चैटिंग बॉक्स में जाकर उससे हुई चैटिंग टैक्स्ट को ही डिलीट कर दिया है। अब क्या याद रखना।
अब तो हालत यह रही कि कुछ लोगों के पास शाम के चार से छह बजे तक जैसे कोई काम ही नहीं बचता था। पहले तान्या से चैटिंग में बिजी रहते। अब बस घर जाने के लिए ड्रॉपिंग वाली गाड़ी का इंतजार करते। लेकिन यह क्या धीरे-धीरे लोगों ने फिर से अपने कंप्यूटर स्क्रीन को छिपाना शुरू कर दिया है। जोगेन्द्र बाबू ने स्क्रीन को तिरछा कर लिया है और थोड़ा झुका भी लिया है। क्या फिर से तान्या आ गई है। पहले तो स्क्रीन को छिपा-छिपाकर चैटिंग का यह कार्यक्रम शाम के वक्त ही होता था, लेकिन अब हर समय होता है। आखिर हुआ क्या है। मोहित जी सोचते, अगर तान्या ठीक होकर आ गई होती तो हमारे जी मेल पर भी तो ऑन लाइन दिखती। टीम लीडर रोहित जी का पता लगाया जाये। आखिर उन्होंने ही तो तान्या की पूरी खोजबीन कर ली थी। उसका बायोडाटा तक मंगवा लिया था। फोन नंबर पता कर लिया था। यह भी पता लग गया था कि वह जालंधर में है। सब लोग जब उसके ऑन लाइन न होने से दुखी थे तब रोहितजी ने ही तो सारा माजरा पता लगवाया था। लेकिन रोहित जी के हावभाव देखकर नहीं लगता कि तान्या फिर से ऑन लाइन हो गयी है।
तान्या के एक्सीडेंट की खबर सुनकर सब परेशान तो थे, लेकिन सिर्फ इस बात से कि अब चैटिंग किससे होगी। आज अगर कुछ लोग उत्साहित हैं तो सिर्फ यह जानने के लिए कि क्या तान्या ऑन लाइन हो गयी है। उसे कितनी चोट लगी, अब वह कैसी है। जिंदा है भी या नहीं। इन बातों से किसी को कोई मतलब नहीं था। उन्हें तो बस शाम का कुछ वक्त चाहिए था चैटिंग के लिए। बस एक महिला होनी चाहिए, जबकि किसी को यह भी मालूम नहीं था कि तान्या वाकई कोई लडक़ी थी भी या कोई काल्पनिक महिला थी। ऐसा तो नहीं कि उन्हीं के बीच का कोई बंदा हो जो उन्हें तान्या बनकर मजे ले रहा हो। लेकिन कौन हो सकता है। हर कोई तो तान्या के चैटिंग प्रेम का दीवाना था। इन सबमें जवान लोगों के साथ-साथ तीन-चार बच्चों के बाप तक शामिल थे। ऑफिस का शायद ही कोई मर्द होगा जो तान्या के फ्रेंडलिस्ट में न हो। यानी तान्या सही में कोई थी। ऐसा न होता तो उसका बायोडाटा कैसे दस मिनट की चैटिंग में ही रोहित बाबू के पास आ गया। पूरी जानकारी के साथ। इतनी जल्दी कोई इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कैसे कर सकता था। फिर कई बातें मेल खाती हैं, इस बात को सिद्ध करने के लिए तान्या कोई जीती-जागती युवती थी। पत्रकार थी। दोस्त बनाना शायद उसका शौक था। चैटिंग भी सबसे करती थी। किसी को निराश नहीं करती थी। अब तो वह गई। पता नहीं इस दुनिया से या फिर इस बनावटी दुनिया यानी चैट वाली दुनिया से उसने नाता तोड़ लिया। किसी को इस बात से मतलब भी नहीं था। किसी ने ज्यादा जानने की कोशिश भी नहीं की। कोशिश सिर्फ इस बात की हुई थी कि वह अब चैटिंग पर क्यों नहीं आती और उसी कोशिश में उसके एक्सीडेंट वाली बात सबको पता चली।
अब तान्या नहीं है तो फिर यह जोगेन्द्र आखिर कंप्यूटर स्क्रीन को घुमाकर किससे चैट कर रहे हैं। कोई बात तो है। मोहित बाबू भी परेशान थे। रोहित तक भी बात पहुंची। एक-दो फिर तीन-चार दिन। धीरे-धीरे सब व्यस्त रहने लगे। यानी लगता है इन कुंठित लोगों की जमात को फिर कोई मिल गयी है चैटिंग के लिए। अब तो सभी के चेहरे पर मुस्कान दिखने लगी और कंप्यूटर मॉनीटर की गर्दन भी तोड़ी-मरोड़ी जाने लगी। अरे यह क्या पूरे ऑफिस में फिर वही चहल-पहल। कुछ लोग उस ऑफिस से जरूर इधर-उधर चले गये हैं। किसी ने नौकरी बदल ली है, किसी का ट्रांसफर हो गया है। लेकिन पुराने लोगों में जो दो-चार थे, उनके चेहरे पर वही पुरानी वाली चमक लौट आई है। तान्या का तो नियत समय था ऑन लाइन होने का। लेकिन लगता है उनकी नयी फ्रेंड कभी भी ऑन लाइन हो जाती है। बस फर्क यह है कि नयी बनी यह दोस्त फेसबुक पर ऑन लाइन है। इसके बारे में भी शायद लोग जानना चाहते हैं। कौन है। क्या करती है। कहां रहती है। इसी टीम में एक दो लोगों के पास फेस बुक खोलने की परमिशन नहीं। बड़ी मिन्नत करके उन्होंने भी अपना फेसबुक अकाउंट खोल लिया। एक दिन तिरछी निगाह से जोगेन्द्र बाबू ने मोहित के कंप्यूटर पर देख लिया। निशा से चैटिंग चल रही है। वह मुस्कुराये। पकड़ में आते देख मोहित धीरे से उठे और जोगेन्द्र बाबू के कंधे में हाथ रखते हुए ऊपर के फ्लोर की तरफ बढ़े। धीरे से बोले, तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में भी तो है निशा। निशा रोहतगी। वाल पर लिखा है निशा रोहतगी, गोरखपुर। जोगेन्द्र बाबू हंसे। अरे सभी की फ्रेंड बन गयी है निशा। मोहित और जोगेन्द्र एक साथ हंस दिये।
धीरे-धीरे सब समझ गये कि निशा से अब चैटिंग शुरू होने लगी है। मन में यह भी था कि क्या निशा भी तान्या की तरह एक दिन चली जायेगी। क्या कभी निशा से बात हो पायेगी। क्या निशा का नंबर मिल जायेगा। एक दिन शाम को चाय के वक्त जोगेन्द्र बाबू ने मोहित से कहा, यार इसका भी बायोडाटा मंगवा लेते हैं। रोहित जी को ही यह जिम्मेदार दी जाये। वह लड़कियों से अच्छी तरह बात कर लेते हैं और लड़कियां उनकी बातों में आती भी जल्दी हैं। मोहित ने कुछ जवाब नहीं दिया। क्या हुआ बॉस। जोगेन्द्र ने सवाल किया। मोहित ने कहा, यार एक बात बताऊं किसी को बताओगे तो नहीं। जोगेन्द्र ने कहा, अरे किसी से क्यों बताऊंगा, बोलो ना। मोहित ने चहकते हुए कहा, मेरे पास निशा का फोन नंबर है। जोगेन्द्र बाबू ने सवाल किया, कभी बात की है। नहीं। फिर दोनों बिना एक दूसरे से बात किये चाय पीने लगे। खामोशी को मोहित ने ही तोड़ा, यार किसी को बताना मत। जोगेन्द्र बाबू ने कहा, बताना तो तुम भी मत भाई। नंबर तो मेरे पास भी है। अरे वाह, मोहित ने सवाल किया, तुमने बात की है क्या कभी। जोगेन्द्र ने कहा, यार बात तो नहीं की है, पर एक बात मैं भी बताऊंगा, प्लीज किसी से कहना मत। अब क्या बात हो सकती है। कहीं वही तो नहीं जो मोहित छिपा रहे थे। हो न हो, वही बात होगी। मोहित ने कहा, नहीं कतई नहीं, तुम बताओ तो सही। जोगेन्द्र बाबू कुछ देर चुप रहे, फिर बोले सही बताओ कभी बात नहीं हुई। मोहित ने कहा, कसम से। मोहित को लगने लगा हो न हो, जोगेन्द्र बाबू की बात भी हो चुकी है। वह बोले, यार लगता है तुम्हारी बात हो चुकी है। सही बताओ न। तुम्हें कसम है। जोगेन्द्र बाबू ने चाय का गिलास दुकान के सामने रखते हुए मोहित से थोड़ा दूर आने के लिए कहा। करीब दस कदम किनारे जाकर बोले, यार बात तो नहीं हुई है हां एसएमएस जरूर करते हैं एक दूसरे को। अच्छा फेस बुक पर चैटिंग से दो कदम आगे, तुम तो एसएमएस भी करते हो। अपना नंबर देते हुए डर नहीं लगा। जोगेन्द्र ने कहा, डर? फिर तुम्हारे मोबाइल में उसका नंबर कैसे फीड है। अरे वो तो उसने चैटिंग के दौरान ही दे दिया था। मैंने सेव कर लिया। बस इसके आगे कुछ नहीं। मोहित ने अपनी सफाई में कहा। कभी उसको फोन मिलाने की कोशिश नहीं की। जोगेन्द्र ने पूछा। नहीं। हिम्मत नहीं हुई।
मोहित बात का तारतम्य तोडक़र दो कदम आगे और तीन कदम पीछे चलते हुए चहलकदमी करने लगे। जोगेन्द्र ने कहा, क्या हुआ? कुछ नहीं यार मोहित ने मरे मन से जवाब दिया। अरे बताओ तो सही। जोगेन्द्र ने मोहित के कंधे को पकडक़र हिलाया। चलो कैंटीन से बाहर चलते हैं, मोहित ने कहा। अब जोगेन्द्र को लगने लगा कि मोहित कुछ छिपा रहा है। इनकी बात होती जरूर होगी। सीढिय़ों से नीचे उतरकर दोनों ऑफिस के बाहर लॉन में आ गये। जोगेन्द्र की व्याकुलता जैसे बढ़ रही थी। उन्होंने ही बात शुरू की, बताओ यार बात क्या है? यार तुम प्लीज मेरी बात पर हंसना मत। मोहित ने बड़ी मासूमियत से कहा। कतई नहीं। जोगेन्द्र ने आश्वासन दिया। असल में यार मेरी निशा से बात तो नहीं हुई है, पर मैं उसका फोन तीन बार रिचार्ज करा चुका हूं। उसने बहुत रिक्वेस्ट की। एक बार दो सौ रुपये में और दो बार सौ-सौ रुपये में। मोहित ने एक सांस में अपनी बात खत्म की। जोगेन्द्र की कोई प्रतिक्रिया न देख, मोहित ने उसकी तरफ देखा, जैसे कुछ तो बोले। जोगेन्द्र इस बार भी चुप रहा। मोहित ने कहा, यार चुप क्यों हो। अबकी जोगेन्द्र ने लंबी सांस ली और कहा, ठीक ऐसा ही मेरे साथ भी हो चुका है। दोनों अब फिर खामोश हो गये। मोहित ने ही कहा, यार हम लोग ये क्या कर रहे हैं। किसी अनजान का मोबाइल रिचार्ज करा रहे हैं। तुम उसको एसएमएस करते हो। क्या यह ठीक है। यार ठीक नहीं ठीक अलग बात है। कोई दोस्त बन गया तो उसमें क्या किया जाये। जोगेन्द्र जैसे अपनी बात को जोर लगाकर सही ठहराने की कोशिश कर रहा हो। दोनों आफिस में आ गये और अपनी-अपनी सीट पर बैठ गये।
दो-तीन दिन बाद पता चला कि सभी निशा के फ्रेंड बन गये। ठीक उसी तरह जैसे तान्या के फ्रेंड बने थे सब। टीम लीडर रोहित के साथ भी निशा ने वही किया। दो दिन की चैटिंग के बाद तीसरे दिन अपना मोबाइल नंबर दे दिया। रोहित से चैट पर उसने यह भी लिखा कि वह उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानती है। रोहित को यह बात मालूम पड़ चुकी थी कि सभी लोग निशा से चैट करते हैं। शाम को ड्रॉपिंग की गाड़ी में निशा की चर्चा छिड़ गयी। बात हो ही रही थी कि रोहित ने निशा के दिये हुए नंबर पर कॉल कर दिया। स्पीकर ऑन करने के बाद। हेलो। एक मर्दाना आवाज आई उधर से। रोहित ने कहा, मैं रोहित बोल रहा हूं, क्या यह निशा का नंबर नहीं है। उस व्यक्ति की आवाज में तुरंत नरमी आ गयी और उसने एक सेकेंड कहने के बाद फोन किसी और को पकड़ा दिया। उधर से अब एक महिला की आवाज थी, हेलो। रोहित ने कहा निशा। जी बहुत मधुर आवाज में उसने जवाब दिया। पहले किसने फोन उठाया था, वो मेरे पति। नहीं मेरा दोस्त। दो बातें एक साथ निशा कहने वाली लडक़ी बोल पड़ी। रोहित ने कहा, तुम मुझे कैसे पहचानती हो। वह बाद में बताऊंगी। पहले आप मेरा फोन रिचार्ज करा दो। अभी यह रोमिंग में है, ज्यादा देर बात नहीं हो पायेगी। रोहित ने कहा, ठीक है देखता हूं। फिर फोन काट दिया। सब लोग अजीब सी खामोशी के बीच कुछ-कुछ बोल रहे थे। रोहित ने अपने बाकी चार साथियों से चाय पीने की इच्छा जताई। ड्राइवर से कहा गया और चारों एक ढाबे पर उतर गये। ड्राइवर से कहा कि तुम भी चाय ले लेना बस 15 मिनट में चलते हैं। रोहित बोला, मुझे ड्राइवर की मौजूदगी में बातें करना अच्छा नहीं लग रहा था। अबकी सभी ने बताया कि निशा का नंबर सबके पास है। सबने नंबर बताये तो सारे नंबर अलग-अलग थे। यानी हर व्यक्ति से अलग नंबर रिचार्ज कराया जाता था। इस बार जोगेन्द्र से कहा गया कि वह फोन लगाये। जोगेन्द्र ने अपने मोबाइल से फोन लगाया तो महिला की आवाज आई हेलो। निशा बोल रही हैं, हां। मैं जोगेन्द्र बोल रहा हूं। अरे हां जोगेन्द्र कैसे हो। आपको पता है मैं आपको बहुत करीब से जानती हूं आप भी मुझे अच्छे से जानते हो। घबराओ मत मैं तुम्हारी दोस्त ही हूं। अच्छा एक काम करो प्लीज अभी मेरा फोन रिचार्ज करा दो। जोगेन्द्र ने भी वही जवाब दिया कि थोड़ी देर में देखता हूं। जिनके पास भी अलग-अलग नंबर थे, सबके साथ यही हुआ। रोहित ने कहा कोई बड़ा फ्रॉड है। कोई किसी का नंबर रिचार्ज मत कराना। मोहित बाबू और जोगेन्द्र एक दूसरे का मुंह देखने लगे। जोगेन्द्र ने मोहित से चुप रहने का इशारा किया। सबने चाय पी और घर चले गये।
अगले दिन चारों के नंबर पर निशा नाम की लडक़ी के नाम से सेव नंबर से कई बार मिसकॉल आयी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। धीरे-धीरे कई दिन बीत गये। निशा अब फेसबुक पर भी ऑन लाइन नहीं रहती। मोहित और जोगेन्द्र बाबू जब भी आमने-सामने पड़ते हैं तो दोनों की हंसी छूट जाती है। लोग उनकी इस हंसी का राज ढूंढऩे में व्यस्त हैं। कंप्यूटर मॉनीटर पर न तो किसी से चैट चल रही होती है और न ही मॉनिटर का स्क्रीन टेढ़ा होता है। फिर ये दोनों मिलते ही हंसते क्यों हैं। ये तो यही जानें। 

Sunday, August 18, 2013

ऑटो वाला नहीं मिला
चंडीगढ़ आये हुए मुझे लगभग सवा महीना हो गया है। इस बीच तीन बार दिल्ली हो आया हूं। इस बात से कई मित्रों को आश्चर्यजनक खुशी हुई, कुछको अखरा कि मैं उनसे नहीं मिल पाया और कई लोगों को कुढऩ भी कि वाह भई ये तो बार-बार आ रहे हैं। ये कैसी नौकरी है। पर इन सबसे इतर इस बार 15 अगस्त के मौके पर दिल्ली गया था। हमारी सोसायटी में ध्वजारोहण समारोह हुआ। साहिबाबाद विधानसभा के वसुंधरा क्षेत्र में मेरा घर है। वहां से बसपा विधायक अमरपाल शर्मा मुख्य अतिथि थे। अन्य कार्यक्रमों की ही तरह माइक संभालने का जिम्मा मुझे दिया गया। जैसा भी बोल सकता था मैंने बोला। विधायक जी आये। जैसा कि होता है। सत्ता के गलियारे के लोग बहुत व्यस्त होते हैं। खैर वे नियत समय पर आये, ध्वजारोहण, पौधारोपण किया और चले गये। कई अन्य कार्यक्रम भी हुए। इस बार मुझे जो बात अब तक सालती रही, वह यह कि मैं रहा तो तीन दिन दिल्ली में, लेकिन अपने परिवार के साथ मिलबैठकर बमुश्किल दो घंटे बातें की होंगी। एक दिन अभिनेता शाहरुख खान के साथ बातचीत के असाइनमेंट में बीत गया। एक दिन अपने जरूरी कामों को निपटाने में और एक दिन पहले पंद्रह अगस्त के कार्यक्रम फिर एक छोटी फिल्म लेवल की शूटिंग में बीत गया। खैर अब चंडीगढ़ वापस आ गया हूं। यहां दैनिक ट्रिब्यून के रीलांच की तैयारी जोरों पर है। चूंकि बातें अभी ऑफ दि रिकार्ड हैं, इसलिए सारा खुलासा नहीं कर सकता, लेकिन यकीनन आने वाले नये सप्लीमेंट और अखबार का कलेवर और तेवर जुदा होगा। लोगों को पसंद आयेगा।
चंडीगढ़ की बातों के बारे में अभी मैं इसलिए कुछ नहीं लिख पाऊंगा कि मुझसे ज्यादा और लोग जानते हैं। यहां आने के करीब आठ दिन बाद मैं पहली बार दिल्ली पहुंचा तो मेरे बेटे ने पूछा जो अभी पांचवी कक्षा में है, पापा सुखना लेक देखी, मैं दंग रह गया। नाम भी नहीं सुना था। मैंने कहा नहीं। तुम मुझे चंडीगढ़ की खास जगहों के बारे में बताओ अबकी देखूंगा, हालांकि वह संभव नहीं है अभ तत्काल। यहां हरियाली बहुत अच्छी है। यहां कहीं अवैध निर्माण नहीं दिखता। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार ने दुखी किया। शायद भांप जाते हैं कि बाहर का है।
लेकिन इन सबसे अलग एक ऑटो वाले का व्यवहार आश्चर्यजनक लगा। जहां मैंने किराये पर घर लिया है, वहां से ऑफिस आने तक ऑटो का किराया दस रुपया है। एक दिन मैंने ऑटो लिया और बैठते ही कह दिया भाई सौ का नोट है आज खुला नहीं है। उसने बैठने का इशारा किया। रास्ते में दो तीन महिलाएं भी बैठीं। ट्रिब्यून चौक पर उतरकर मैंने सौ का नोट दिया। उसने सवाल किया खुले नहीं हैं। मैंने कहा, बैठते ही बता दिया था। हां बता तो दिया था। वह बोला। मैंने पीछे बैठी महिलाओं से कहा, आप लोग इसे किराया दे दें तो यह लौटा देगा। एक महिला बोली, हमने दे दिये हैं। क्योंकि इस बीच मैं खुला कराने एक दुकान के पास गया था, शायद उन्होंने तीस रुपये दे दिये थे। खुले नहीं मिले। ऑटो वाले ने कहा, चलो फिर दे देना। मैंने बताया भाई यही मेरा ऑफिस है। मैं रात को लगभग नौ बजे निकलता हूं। तब से आज तक वह ऑटो वाला मुझे नहीं मिला। यह किस्सा मैंने आफिस में भी बताया, कुछ को विश्वास हुआ कुछ को नहीं। ट्रिब्यून में आते ही लिखना पढऩा तेज किया है। दो-तीन किताबों की समीक्षा भी की है जो छपी है। एक मित्र ने ब्लाग भी रेगुलर लिखने के लिए कहा है। पूरी कोशिश है। अब निजी किस्से कहानियां कम कुछ रचनात्मकता वाले लेख लिखूंगा। आज इतना ही।
नमस्कार

Monday, August 5, 2013

दैनिक ट्रिब्यून की री लांचिंग प्रक्रिया तेज हो गई है। अलग से परिशिष्ट और नियमित पेजों का रंग-रूप और तेवर बदलने की तैयारी है। डॉ उपेन्द्र पांडे जी ने भी ज्वाइन कर लिया है। इधर डिजाइनिंग में मदद कर रहे डॉ कुलदीप धीमान जी एक दिन अपना कैमरा ले आए। मैं और चंडीगढ़ से हमारे रिपोटर दिनेश भारद्वाज बैठे थे कुछ नई योजनाओं के सिलसिले में। श्री अरुण नैथानी जी भी साथ में लगे हैं। लेकिन उनका रुटीन काम भी बहुत है। डॉ धीमान साहब कैमरा लाने वाले हैं, ऐसा पता होता तो निश्चित रूप से में दाढ़ी बनाकर आता। खैर इससे क्या फर्क पड़ता है। मैं जैसा हूं वैसा ही दिखूंगा बस बेहतरीन पेज की तरह दाढ़ी बनी होती तो फाइन ट्यून हो जाता। चलिए लिखने का यह सिलसिला जारी रहेगा। अभी शाम के सात बजे हैं। थोड़ी देर बाद संपादक श्री संतोष तिवारी जी के साथ बैठक होगी। संभवत: आज री लांच को लेकर अहम उच्च स्तरीय बैठक होने वाली है।



Friday, August 2, 2013

लग रहा है ब्लॉग पर अब नियमित रूप से लिखने लगूंगा। इसके दो कारण हैं। एक तो इसी से मिलता-जुलता एक काम मिला है, दूसरा अजनबी शहर में अकेला हूं। लिखने-पढऩे और गाना सुनने के अलावा कोई काम ही नहीं बचा है। कभी-कभी यह हिम्मत भी कर लेता हूं कि मित्रों से फोनबाजी या एसएमएसबाजी कर लेता हूं। लेकिन ये काम कम ही हो पाते हैं। अभी मेरा फोन पोस्टपेड हो नहीं पाया है।
खैर.. बात अब शुरू करता हूं। तमाम किंतु-परंतु, सवाल-जवाब और भी न जाने क्या-क्या होने हवाने और सोचने बतलाने के बाद आखिरकार मैं इन दिनों चंडीगढ़ आ गया हूं। दिल्ली से चंडीगढ़ आने तक के सफर और यहां रहने तक के बारे में उतना मैंने नहीं सोचा जितना मेरे शुभचिंतकों ने सोच लिया। सोचने का काम उनका था और लिखने का मेरा है। शहर अजनबी है। लोग अजनबी हैं। लेकिन एक बड़ा फर्क (तेरह साल पहले हिन्दुस्तान अखबार में नौकरी करने गया था उसकी तुलना में)और अच्छापन यह देखा कि यहां के हर व्यक्ति (पत्रकार, गैर पत्रकार) ने कहा, चिंता न करें हम सब लोग हैं। आपको परेशानी नहीं होगी। हर दूसरे दिन बाद यह भी पूछा कि शहर में मन लगा कि नहीं। पूछने का यह सिलसिला जारी है। दो दिन बाद ही यहां के लोगों ने किराये के घर के लिए पूरा जोर लगाया उन लोगों की मेहनत और मेरी किस्मत से घर अच्छा मिल गया। मकान मालिक ट्रिब्यून से ही रिटायर्ड हैं। भले मानुष हैं। दो कमरों का घर लिया है, लेकिन दूसरे को अब तक नहीं खोल पाया। कारण अकेले हूं। हां एक मित्र ने कहा है कुछ दिन बाद वह भी साथ रहने लगेगा। देखते हैं क्या होता है नये शहर में मेरे नवीनीकरण के तहत।
दोस्तो असली बात मैं अब चंडीगढ़ आ गया हूं। दैनिक ट्रिब्यून अखबार में। फिलहाल खबरों में घुसा हुआ पत्रकार नहीं, री-लांच के लिए योजना बनाने वाला व्यक्ति। आप सब लोगों की शुभकामनाएं चाहिए। पढऩा लिखना मेरा बहुत तेज हो जाए, दुआ कीजिए।
नमस्कार
केवल तिवारी

Wednesday, July 25, 2012

मौत की जिंदगी

केवल तिवारी
पंच-सात लोग थे। एक खोखला सा हो चुका अधेड़ उम्र का व्यक्ति। पास में लेटी एक महिला। महिला लेटी नहीं थी बल्कि लाश में तब्दील हो चुकी थी। कुछ लोगों ने उस कोठरीनुमा घर में झांका कुछ बुदबुदाए। कुछ रूक गए, दयाभाव की वहज से, मरने वाले के प्रति श्रद्धाभाव से या फिर किसी अनजाने डर से। अधेड़ सा व्यक्ति पहचान में न आने वाली एक अजीब सी आवाज में बोला, रोहताश नगर वालों को तो बता दो। ऐसा लगता था जैसे रोहताश नगर में ही सारा माजरा छिपा हो। तभी कुछ दूरी पर रहने वाले दो-चार और जानकार आ गए। मरने के बाद क्या-क्या होता है, इस पर बहस होने लगी। निगम बोध घाट किस तरह से पहुंचा जाए और उसके बाद की सारी बातें। गमगीन माहौल में चार-चार लोगों का झुंड इधर-उधर बना और कुछ कानाफूसी होने लगी। एक ओर मृत पड़ी महिला के अंतिम संस्कार की बात हो रही थी और तैयारियां चल रही थीं, दूसरी ओर कानाफूसी बंद होने के बजाय बढ़ती जा रही थी। परिवार के लोगों में से वे लोग तो आ गए जो पड़ोस में रह रहे थे, लेकिन रोहताश नगर से कोई अभी नहीं पहुंचा था। रिश्तेदारी में भी बताने में कुछ लोगों ने बड़ी सक्रियता दिखाई। किसी ने लखनउ फोन कर दिया तो किसी का संपर्क गोरखपुर हो गया। कोई दिल्ली के अन्य इलाकों में फोन करने लगा किसी ने आसपास के वरिष्ठों को बुलाने में भलाई समझी। कानाफूसी जारी थी। कोई कहता महिला के लिए आखिर कोई रो क्यों नहीं रहा। कोई कहता पति भी बातचीत में लगा है, अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है... वगैरह...वगैरह।
तैयारी पूरी हो गई। मोहल्ले की दो-तीन बुजुर्ग महिलाएं इस मर चुकी महिला को पर्दे की ओट में सजाने लगीं। जैसे दुल्हन को सजाते हैं। इन बुजुर्ग महिलाओं में से कोई अचानक फफक कर रोने भी लगता। इन महिलाओं को पता था कि जब कोई महिला पति के रहते मर जाती है तो उसका पूरा श्रृंगार किया जाता है। शव को उठाने का वक्त आया तो आखिर कानाफूसी का सुर तेज हो गया। कहीं से आवाज आई, इनके बेटे कहां हैं। कंधा कौन देगा। चारों तरफ निगाह दौड़ाई गई, लेकिन बेटों का पता नहीं चला। ऐसा नहीं कि महिला का देहांत अचानक हो गया और बेटों को पता नहीं चला होगा। असल में महिला तो जीबी पंत हाॅस्पिटल में डेढ़ माह से भर्ती थीं। ब्रेन ट्यूमर बताया था डाॅक्टरों ने। लोगों की मदद से कुछ इलाज भी हुआ लेकिन मर्ज हाथ से निकल चुका था। कहने को या दुनिया के दस्तूर के मुताबिक यह महिला किसी जमाने में खुशनसीब रही होगी। अच्छे घर में पली-बढ़ी और धूमधाम से व्याह दी गई। महिला के पति दिल्ली आकर कुछ करना चाहते थे। गांव के कई लोगों का उदाहरण था उनके सामने, जो दिल्ली आए, यहीं बस गए और उनके बच्चे अच्छी जगहों पर निकल गए। आज विधुर हो चुका यह अधेड़ तब युवा था। सपने थे। हालात शुरू में थोड़े प्रतिकूल रहे, लेकिन जैसे-तैसे परिवार का खर्च चलने लगा। नौकरी नहीं करके अच्छा व्यवसाय कर लेंगे। मन में ठानी और छोटा-मोटा काम शुरू किया। कभी पुलिस वालों के डंडे खाए और कभी पीने-खाने की आदत ने रास्ता दूसरा ही बना दिया। घर में नन्हे मेहमान आए। पहली बेटी हुई, बहुत सुंदर मानो चंद्रमा की चैदह कलाओं को साथ लेकर जन्मी हो। पढ़ने-लिखने में भी औसत से बेहतर। फिर एक के बाद एक दो बेटे हुए। कुछ दिनों के लिए लाश में तब्दील हो गई इस महिला को भी जो उस समय जवान थी बहुत अच्छा लगा। प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद लगा कि समय धीरे-धीरे अपने पक्ष में आ जाएगा। किसी के सरकारी मकान में एक कमरे में दिन गुजर बसर करने लगे। बेटी ने तो किसी तरह बारहवीं परीक्षा पास कर ली और कुछ ट्यूशन आदि पढ़ाने लगी, लेकिन किसी को शायद भनक भी नहीं लगी कि बेटे पढ़ाई के बजाय चोरी और जेबकतरी में डिग्री लेने की पूरी कोशिश में हैं। महिला अपने मायके से अच्छे खाते-पीते घर से ताल्लुकात रखती थी। तीन-चार भाइयों की इकलौती बहन। एक भाई भी दिल्ली में ही अच्छी नौकरी पर था। गाहे-बगाहे बहन की मदद करता रहता। लेकिन यह मदद उसके लिए जी का जंजाल बन गई। पति आलसी हो चले थे, बेटों की लाइन दूसरी हो गई थी और इस बीच बेटी को भी जवानी की दहलीज पर आते-आते हिन्दी फिल्मों की तरह इश्क-विश्क होने लगा था। इधर, जिस सरकारी मकान के एक कमरे में यह परिवार रह रहा था, वहां रहने वाले अन्य परिवार ने इनकी हरकतों के बारे में सबको बताया और इन्हें वहां छोड़कर किसी अनधिकृत कालोनी में दूर-दराज जाना पड़ा। बेटी के इश्क ने जोर मारा और बिना बिरादरी में किसी को बताए उसकी शादी कर दी गई। पर हाय री इस महिला की किस्मत कि कुछ दिनों बाद बेटी भी ज्यादातर मायके में ही रहने लगी। चारों तरफ से टूट चुकी महिला ने फिर कोशिश की परिवार को बनाने की। कुछ सिलाई का काम और घरों में चैका-बर्तन का काम कर उसने चाहा कि बेटे पढ़ें। लेकिन सब कोशिशें बेकार गईं। इधर आएदिन थाने से छुड़ाने के लिए गांव के ही बिरादरों की मदद लेनी पड़ती। बड़े बेटे ने पता नहीं कैसे एक आरटीवी बस में कंडक्टरी शुरू कर दी और छोटा बेटा करता तो कुछ नहीं था पर अपने घरवालों की स्थिति के सामने उसके पास पहनने को अच्छे कपड़े होते और पान-गुटखा, सिगरेट और शराब हर चीज का सेवन करता। घर का खाना भी कभी-कभी मजबूरी में खाता। नही ंतो उसे ढाबे का ही खाना पसंद था। लड़की भी अक्सर मायके आती और हजार-दो हजार लेकर कुछ दिनों के लिए फिर ससुराल चली जाती। अपने घर में नाजों से पली चार भाइयों की इकलौती बहन रही लाश बन चुकी इस महिला के तमाम सपने चूर-चूर हो गए। वह एकांत पसंद करने लगी। एकांत में पता नहीं कुछ सोचती थी या फिर कुछ नहीं सोचने का जतन करती थी। एक दिन सिर में तेज दर्द हुआ। पति डिस्प्रीन का एक पत्ता पकड़ाकर निश्चिंत हो गए। दर्द कम नहीं हुआ। एक हफ्ते बाद असहनीय दर्द हुआ तो बोली, जहर मिल जाता तो बहुत अच्छा होता। पति को लगा मुझपर कमेंट कर रही है। तुरंत पहुंच गए रोहताश नगर रिश्तेदारों के यहां। वहां से पहले तो दुत्कार मिली कि आखिर कब तक मदद करेंगे। फिर मानवता के नाते कुछ ने पैसे दिए और किसी ने जीबी पंत अस्पताल में पहचान के जरिए भर्ती करवा दिया। बेटों को भी पता चला कि करीब 30 हजार रिश्तेदारों ने दिए हैं। उसके बाद किसी को कुछ पता नहीं चला। और पता चला तो यह कि महिला अब इस दुनिया में नहीं रही।
लाश को कंधा तो मोहल्ले वालों ने दिया लेकिन निगम बोध घाट पर मुखाग्नि के लिए फिर बेटों की डिमांड हुई। तभी कोई परिचित आरटीवी गाड़ी में सो रहे उसके बड़े बेटे को उठाकर ले आए। मुंह से शराब की बदबू आ रही थी। पर उसने मुखाग्नि वैसे ही दी जैसे कोई होशवाला व्यक्ति देेता है। परिवार के लोगों ने सिर मुंडवाया। अब तेरहवीं की तैयारी हो रही है। महिला के पति ने इस बार रिश्तेदारों के पास दोनों बेटों से जाने को कहा है। अब पता नहीं महिला की किस्मत यहां काम करती है या नहीं। क्या उसकी तेरहवीं पर कोई भोज हो पाएगा या नहीं। लेकिन महिला को जानने वाला हर व्यक्ति यही कहता है मौत की जिंदगी जीने वाली यह महिला क्या कभी वाकई जी पाई होगी।

Monday, January 17, 2011

कहानी : पलंग के नीचे

केवल तिवारी
मेरी जिंदगी तो बस इसी पलंग के नीचे ही खप लेगी, विकास अपने कपड़े झाड़ते-पोछते चिल्लाया। बस हो गए परेशान, मैं दिनभर न जाने कितनी बार इस पलंग के नीचे घुसती हूं, चोट खाती हूं। तुम्हें एक बार क्या जाना पड़ा कि बस उठा लिया पूरे घर को अपने सिर पर। मीनाक्षी ने विकास को झड़पा। विकास बोला तुमने पलंग पर जो ये सिरहाना लगवाया है न, सारी फसाद की जड़ ही यही है। यह अगर न होता तो हमेशा काम आसान रहता। हां मैं तो जो करती हूं, गलत ही करती हूं। सारी अच्छाइयां तो तुम्हारे ही नाम दर्ज हैं, मीनाक्षी का जवाब आया। उनकी जुबानी जंग के बीच दूर खड़ा उनका बेटा आर्यन चुपचाप दोनों का चेहरे देखे जा रहा था। अबकी विकास कुछ बोला नहीं और ब्रश पर मंजन लगाकर दांत साफ करते हुए बालकनी की ओर जाने लगा। मीनाक्षी फिर बोली, खराब ही लग रहा है तो इस सिरहाने को कटवा दो। विकास मुंह में बने झाग को थूककर आया और लगभग चिल्लाने के अंदाज में बोला, अब बस करो। अब तक चुप रहा आर्यन बोला, मम्मा-पापा आप झगड़ते क्यों रहते हो। विकास कुछ बोले बिना फिर बालकनी की ओर बढ़ा, मीनाक्षी किचन में चली गई। तभी उनकी एक साल की बेटी शिप्रा उठ गई। वह अन्य बच्चों की तरह उठते ही रोती नहीं है। आज भी वह उठी और पास ही रखे सुई के डिब्बे की तरफ लपक गई। आर्यन ने देख लिया। वह चिल्लाते हुए आया मम्मा शिप्रा ने सुई का डिब्बा खोल दिया है। मीनाक्षी किचन से बाहर को भागी और विकास मंजन घिसना छोड़ मुंह में ब्रश दबाए अंदर को आया। फिर देखो अपनी हरकत, विकास बोला तुम्हें पता है शिप्रा कभी भी उठ जाएगी, यहां सुई के डिब्बे को रखने की ऐसी इमरजेंसी क्या आन पड़ी। इस बार मीनाक्षी ने कोई जवाब नहीं दिया। शिप्रा के बिखेरे हुए बटन, धागों की रील को ठीक करने लगी। शिप्रा विकास की गोद में थी। बेटा आर्यन एक बॉल के साथ खेलने लगा। बेटा शिप्रा को खेल लगाओ, मैं जरा कुल्ला कर लूं। विकास ने आर्यन की तरफ देखते हुए कहा। नहीं पापा, ये इधर-उधर तार छूने लगती है कहकर आर्यन फिर बॉल में किक मारने लगा। बॉल इस बार किचन की तरफ जा रही मीनाक्षी के सिर पर लगा। मीनाक्षी ने बॉल को अंदर के कमरे की तरफ फेंका और दो चपत आर्यन को लगा दिए। आर्यन सुबकता हुआ बाहर के कमरे में बैठ गया। विकास ने शिप्रा को नीचे चटाई में बिठाया, वॉश बेसिन में जाकर कुल्ला किया और मीनाक्षी पर गुर्राया, क्या हो गया है आज तुम्हें। मीनाक्षी भी लगी रोने, रोज मुझे ही होता है। तुम सब लोग तो ठीक हो। विकास की समझ में कुछ नहीं आया। वह बोला, कूल हो जाओ मीनाक्षी। आर्यन की छुट्टी है थोड़ी देर खेलेगा नहीं तो क्या करेगा। यह खेलने के लिए बाहर क्यों नहीं जाता। दिनभर इसकी खटपट झेलो, शिप्रा को देखो, खाना बनाओ, झाड़ू पोछा करो, मैं क्या-क्या करूं । तुम फिलहाल एक कप कॉफी बना लो, विकास हंसते हुए बोला। फिर आर्यन की तरफ देखते हुए बोला, बेटा बॉल निकालो हम लोग कैच-कैच खेलते हैं। आर्यन आंसू पोछता हुआ आया और बोला पापा बॉल तो आपको निकालनी पड़ेगी। वह पलंग के नीचे चली गई। यह कहते-कहते बच्चे को हंसी आ गई। उसको हंसता देख मीनाक्षी और विकास भी हंसने लगे। मीनाक्षी बोली मैं सीरियसली कह रही हूं या तो पलंग के चारों ओर लकड़ी का तख्ता लगवा दो या फिर इस सिरहाने को कटवा दो। विकास बोला या तो हमने गृहस्थी जल्दी बसा ली या फिर यह पलंग जल्दी बन गया। क्यों न पलंग को ही बेच दें। उस दिन देखो, शुक्ला जी आए तो भाभी के हाथ से चाबी नीचे गिर गई। पूरा आधा घंटा लगा चाभी निकालने में। पलंग खिसकाने में जो कमर दर्द हुआ वह अब तक है। शिप्रा रोज कुछ न कुछ नीचे फेंक देती है। क्यों न पलंग बेच दें। इसकी जगह दो खाट लगा लेते हैं। हां ऐसे ही घर में न सोफा है और न मेज। एक डबल बेड है तो उसे भी तुम बेच दो। इतने सारे कपड़े, सामान जो इसके बॉक्स में रखा है उसे कहां फेंकोगे। आर्यन बोला, पापा हम बंग्लो ले लें। विकास हंसा बोला, बेटा बंग्लो ऐसे ही नहीं मिल जाता है। अच्छा पापा ऐसा करो पलंग के पैरों को कटवा दो, फिर कोई सामान नीचे नहीं जाएगा और आपको उसे निकालने के लिए परेशान भी नहीं होना पड़ेगा। इससे पहले कि विकास कुछ बोलता, मीनाक्षी बोली चुप कर। अपनी सलाह अपने पास रख और चल किताब निकाल कल तेरा युनिट टेस्ट है। विकास बोला, मीनाक्षी तुम कॉफी बनाकर लाओ। फिर आर्यन की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, बेटा आर्यन क्यों न ऐसा करें कि तुम खुद पलंग के नीचे से सामान निकालने की प्रैक्टिस करो। जब सामान गिरे तो तुम बालकनी से डंडा उठाकर लाना और उसे निकाल लेना। नहीं पापा मैं यह कैसे कर पाऊंगा। बेटा कोशिश तो करो। उनका संवाद चल ही रहा था कि विकास के मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी। उसने चारों तरफ देखा, उसे सिर्फ घंटी सुनाई पड़ रही थी मोबाइल कहीं नहीं दिख रहा था। तभी उसने गौर किया कि घंटी पलंग के नीचे से सुनाई दे रही है। हे भगवान! यह यहां कैसे पहुंच गया। कहीं बॉस का फोन न हो। बेटा डंडा लाओ। आर्यन डंडा लेने भागा। विकास भी झाड़ू उठाकर लाया। तब तक घंटी बंद हो चुकी थी। विकास बोला, आर्यन लाइट जलाना। आर्यन के हाथ में बड़ा डंडा था, जैसे ही उसने स्विच ऑन किया, उसका डंडा नाइट बल्ब पर लगा। पहले से ही ढीला चल रहा बल्ब नीचे आ गिरा। विकास चिल्लाया, आर्यन। मीनाक्षी शांत होकर बोली, तुम कॉफी का प्याला उठाओ बाहर टेबल पर रखा है। विकास की गोद में रो रही शिप्रा को भी उसने उठा लिया। फिर आर्यन के हाथों से डंडा लेकर बोली, आर्यन तुम मेरे मोबाइल से पापा के नंबर पर घंटी मारो। डरा-डरा आर्यन मम्मा का फोन उठाकर लाया और कॉल करने लगा। तब तक विकास भी कॉफी की घूंट भरता आ गया। मीनाक्षी ने मोबाइल उसके हाथ में दिया और बोली, ये लो तुम्हारा मोबाइल। विकास चहकते हुए बोला, अरे इतनी जल्दी कैसे निकाल दिया। मीनाक्षी कुछ नहीं बोली, बल्ब के टुकड़ों को समेटने लगी। शिप्रा को उसने एक डिब्बा देकर खेल लगा दिया था। कांच के टुकड़ों को डस्टबिन में डालती हुई बोली, तुम आर्यन को अपने साथ नहला दोगे विकास। विकास बोला, हां हम दोनों साथ नहाएंगे। इतने में फिर फोन की घंटी बजी। इस बार वाकई विकास के बॉस का फोन था। बॉस का फोन है कहकर वह बालकनी की तरफ गया। वापस लौटा तो बोला, मीनाक्षी मैं नहा नहीं रहा हूं। ऑफिस में मीटिंग है। खाना भी वहीं खा लूंगा। आर्यन का चेहरा लटक गया। पापा के बॉस भी न........। मुंह भींचते हुए वह अंदर की तरफ चला गया। मीनाक्षी बोली, कम से कम बच्चों की छुट्टी के दिन तो ऑफिस आराम से चले जाया करो। रात में तो देर से ही आते हो। नौकरी है यह मीनाक्षी, कहते हुए विकास हाथ-मुंह धाने चला गया। लौटा तो देखा आर्यन शिप्रा को खेल लगा रहा था। मीनाक्षी फटाफट आटा गूंथने में लगी थी। विकास बोला, क्या कर रही हो, तुम लोग आराम से खाना बना लेना। मीनाक्षी बोली, जब तक तुम कपड़े पहनो मैं दो पराठे सेक देती हूं। विकास कपड़े पहन ही रहा था कि आर्यन चिल्लाया मम्मा.....। क्या हुआ विकास और मीनाक्षी एक साथ वहां पहुंचे, शिप्रा ने अपना सिर पलंग के नीचे फंसा लियाहै, आर्यन बोला। इस बार बेचारे आर्यन को फिर थप्पड़ पड़ी। कैसे देख रहा था, बहन को। विकास कुछ समझ नहीं पा रहा था। पलंग उठाने में बहुत भारी था, फिर भी वह जोर लगा रहा था। बड़ी मुश्किल से पलंग कुछ उठा तो शिप्रा की गर्दन बाहर निकल पाई। वह लगी जोर-जोर से रोने। मीनाक्षी भी ध्म्म से वहीं बैठ गई। बोली, विकास तुम ऑफिस जाओ। पलंग का कोई खरीदार मिले तो बात कर लेना...। शिप्रा की गर्दन ही नहीं हमारी जिंदगी फंस गई है इस पलंग के नीचे। केवल तिवारी

Sunday, December 26, 2010

इन 'पुत्रों" की लंबी उम्र नहीं चाहते लोग

इस बार भी 'बेटा" ही हो गया। चार दिन से ज्यादा नहीं बचेगा। उसे दूध ही नहीं दिया जाएगा। दूध पिलाएंगे भी क्यों। इतनी मतलबी दुनिया में जब ये किसी काम ही नहीं आएंगे फिर इन्हें पालकर क्या होगा। ज्यादा पुरानी बात नहीं कुछ साल पहले की ही बात है, कुछ काम तो ये आ जाते थे। हल जोतने के या फिर सामान ढोने के। लेकिन अब तो ये बेटे उस लायक भी नहीं रहे। जी हां! यही हो रहा है। इन बच्चों को तड़पाकर मारा जा रहा है। यह अलग बात है कि इनके मरने पर कोई रोने वाला नहीं। इनकी मां थोड़ी खटपट करेगी भी तो उसे भी डंडे के जोर पर जुल्म ढाकर ठंडा कर दिया जाएगा।
मैं बात कर रहा हूं। पशुओं के बेटों की। यानी गाय-भैंसों के बच्चों की। दिल्ली-एनसीआर में हाल बुरा है। एक तो जमीन कम हो गई है। उस पर मुआवजे का पैसा लोगों को मिला है। दूध के लिए गाय-भैंसें लोगों ने पाली हैं। यदि बछिया या पड़वा हो गया तो ठीक है, लेकिन बछड़ा या कटरा हो गया तो खैर नहीं। अब न तो कोई उन्हें खरीदता है और न ही वे सामान ढोने के कार आ रहे हैं। लोगों के पास महंगी गाड़ियां हो गई हैं। ट्रैक्टर हो गए हैं। रहट अब चलता नहीं। खेती-बाड़ी के काम में जानवरों को इस्तेमाल नहीं होता। गाय-भैसों को मशीन से गाभिन कर दिया जाता है। ऐसे में दूध के लिए गाय-भैंस पालने वाले ऐसी व्यवस्था कर देते हैं कि यह जानवरों का बेटा बस दो-चार दिन देख ले इस दुनिया को फिर नमस्ते। एक तरफ इनसान खुद का बेटा होने के लिए मन्न्तें मांगता है। भू्रण हत्या करने से भी बाज नहीं आता दूसरी तरफ ये जानवरों की दुर्दशा है। सब दुनियादारी है, हमारी-आपकी बनाई हुई। कोई ऐसा जानवर बच भी गया तो जल्दी ही कसाईयों के हवाले हो जाता है। दुनिया महान, दुनियादारी महान।

Friday, December 10, 2010

करीब सात साल पुराना एक ब्लॉ : फिर एक अपराध बोध

शायद और लोगों के साथ भी ऐसा होता हो, पर मेरे साथ यदा-कदा ऐसा होता है जब मुझे अपराध बोध होता है। हालिया घटना एक अजीबोगरीब है। मैं ऑफिस की सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था और मुझे मंडी हाउस जाने की जल्दबाजी थी। वहां मेरी दीदी आई हुई थी। कुछ देर वहां रुककर मुझे तुरंत ऑफिस वापस भी आना था। मेट्रो की भीड़ और शाम छह बजे की नजाकत (उल्लेखनीय है शाम का यह समय हम जैसे कथित पत्रकारों यानी डेस्क पर काम करने वालों के लिए बहुत ही व्यस्तता वाला होता है।) उस पर एक मीटिंग का, होगी या नहीं होगी का झंझट। अंतिम सीढ़ी के पास एक किशोर एक महिला के साथ वहां खड़े थे। वह महिला शायद उस किशोर की मां होगी। किशोर मेरी तरफ मुखातिब होकर बोला, सर यहां टॉयलेट कहां है। क्या बताता....., कनॉट प्लेस में सार्वजनिक टॉयलेट तो कहीं नजर आते ही नहीं। फिर हमारी बिल्डिंग के नीचे जो एक विश्वविद्यालय का फ्रेंचाइजी दफ्तर है, का एक टॉयलेट वहां पर था जहां उस समय तक ताला लग चुका था। शाम हो गई थी, उस दफ्तर के लोग घर जा चुके थे। मैंने वहां एक नजर दौड़ाई फिर कहा, यहां तो कहीं नहीं है। फिर उनकी तरफ देखे बगैर मैं भागने लगा। मैं दौड़ता हुआ राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ए ब्लॉक से नीचे उतर गया। साथी पत्रकार से मेट्रो स्मार्ट कार्ड मांगकर ले गया था, दनादन अंदर चला गया। मेट्रो में चढ़ने ही वाला था कि ऑफिस से कॉल आ गई तुरंत आओ मीटिंग होगी। वापस आया। मेट्रो के नियमानुसार कार्ड में से छह रुपए कट गए। ऑफिस के नीचे आकर उस युवक और महिला को इधर- उधर देखा। वे नहीं थे। चुपचाप आकर मीटिंग में बैठ गया। अपने काम के लिए जिस तेजी से भागा। फिर ऑफिस के लिए जिस तेजी से आया। इस बीच यही सोचता रहा काश मैं उस किशोर या महिला के लिए दो मिनट और खर्च कर लेता। मैं उन्हें अपने ऑफिस का टॉयलेट दिखा देता। वह बहुत परेशानी में थे। काश! ऐसा किया होता। उनके लिए महज दो मिनट खर्च न कर पाने के अफसोस के पीछे भी शायद मेरा ही स्वार्थ था कि यदि में इतना और रुक गया होता तो भागदौड़ बचती और जो बेवजह आठ रुपए स्मार्ट कार्ड से कट गए वह भी बच जाते। सही में हम लोग कितना आत्ममुखी, आत्मसुखी और स्वार्थी हो गए हैं।

Sunday, October 24, 2010

दायें या बायें नैनीताल फिल्म समारोह में भी

दीपक डोबरियाल अभिनीत फिल्म दायें या बायें को नैनीताल फिल्म समारोह में भी प्रदर्शित किया जाएगा।
एजेंसी वार्ता से जारी फिल्म के प्रदर्शन और अन्य जानकारियों के बारे में खबर
प्रतिरोध के सिनेमा का नैनीताल फिल्म समारोह 29 से
नई दिल्ली . 24 अक्टूबर . वार्ता . । प्रतिरोध के सिनेमा को परदा
मुहैया कराने वाला दूसरा नैनीताल फिल्म समारोह 29 से 3। अक्टूबर
तक आयोजित किया जाएगा ।
आयोजकों ने आज यहाँ बताया कि नैनीताल क्लब के शैले हाल में
आयोजित इस तीन दिवसीय समारोह में कुल तीन फीचर और लगभग
।5 डाक्यूमेंटरी फिल्में प्रदर्शित की जाएंगी । किसी प्रायोजक के
सहयोग के बिना आयोजित इस समारोह में हिस्सा लेने के लिए टिकट
या पास की जरूरत नहीं होगी ।
यह जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह . द ग्रुप . प्रतिरोध के सिनेमा का
।5 वां समारोह होगा । इससे पहले ए समारोह गोरखपुर में पांच .
लखनऊ में तीन . भिलाई में दो और इलाहाबाद . पटना . बरेली और
नैनीताल में एक बार आयोजित किए जा चुके हैं ।
गिर्दा और निर्मल पांडे की याद में आयोजित इस समारोह में दिखाई
जाने वाली फीचर फिल्में बेला नेगी की दाएं या बाएं . परेश कामदार की
खरगोश और संकल्प मेश्राम की छुटकन की महाभारत होगी ।
समारोह में वसुधा जोशी की तीन डाक्यूमेंटरी फिल्मों अल्मोडियाना .
फार माया और वायसेस फ्राम बलियापाल का प्रदर्शन किया जाएगा ।
इसके अलावा गिर्दा और निर्मल पांडे पर प्रदीप पांडे . मोहन जोशी और
प्रदीप दास की लघु फिल्में भी दिखाई जाएंगी ।
इसमें दिखाई जाने वाली अन्य डाक्यूमेंटरी फिल्में होंगी संजय
काक की जश्ने आजादी . अजय भारद्वाज की कित्ते मिल वे माही .
देवरंजन सारंगी की हिन्दू टू हिंदुत्व . अनुपमा श्रीनिवासन की आई
वंडर और अजय टी जी की अंधेरे से पहले ।
फिल्मकारों के साथ सीधे संवाद के अलावा इस समारोह में उत्तराखंड
में हाल में हुई प्राकृतिक आपदा पर फोटो पत्रकार जयमित्र बिष्ट की
तस्वीरों की प्रदर्शनी भी लगाई

Friday, October 22, 2010

फिल्म दाएं या बाएं से दीपक की जोरदार एंट्री


मित्र राजेश के मार्फत मित्र बने दीपक डोबरियाल की एक और फिल्म आ रही है दाएं या बाएं। वह इसमें मुख्य किरदार की भूमिका निभा रहे हैं। 29 अक्टूबर को रिलीज हो रही है। संभव हो तो देख लें


जनकवि एवं समाजसेवी स्व. गिरदा ने भी निभाया किरदार
छोटे बजट की सशक्त फिल्म साबित होने का दावा
अगले हफ्ते रिलीज होने वाली कम बजट की फिल्म दाएं या बाएं से कई लोगों की उम्मीदें जगी हैं। बेला नेगी निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है ओमकारा, 1971, दिल्ली-6, शौर्य, 13बी, गुलाल, मुंबई कटिंग, तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दीपक डोबरियाल ने। फिल्म का निर्माण्ा और लेखन भी किया है बेला नेगी ने। इसमें जाने माने समाजसेवी एवं जनकवि गिरीश तिवारी उर्फ गिरदा ने एक स्कूल प्रधानाचार्य की भूमिका निभाई है।
नईदुनिया से फोन पर बातचीत करते हुए मुख्य किरदार निभा रहे दीपक डोबरियाल और बेला नेगी ने कहा कि फिल्म कम बजट की जरूर है लेकिन इसमें संदेश बहुत सशक्त है। फिल्म में दीपक शहरों में पढ़ा-लिखा एक युवक है। वह पहाड़ के अपने गांव में आकर वहां अध्यापक लगता है। उसकी दिली इच्छा है कई तरह के परिवर्तन की। उसके रास्ते में आने वाली अड़चनों और अंतत: उनसे पार पाने को बहुत ही अच्छे ढंग से फिल्माया गया है। हिंदी भाषा में बनी इस फिल्म के सभी दृश्य पहाड़ी इलाकों की है। फिल्म में वहां के जन-जीवन को और उनसे जुड़ी अन्य बातों को भी बहुत सशक्त तरीके से दिखाया गया है। दीपक और गिरदा के अलावा फिल्म में मानव कौल, बदरुल इस्लाम, भारती भट्ट, प्रत्यूष डोकलन आदि हैं। फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि यह फिल्म अपने सशक्त पटकथा और पहाड़ों की पृष्ठभूमि को सशक्त माध्यम से उठाने के लिए तो चर्चित रहेगी ही महान आंदोलनकारी एवं कवि गिरीश तिवारी गिरदा, जिनका हाल ही में निधन हुआ था, को भी श्रद्धांजलि होगी।
केवल तिवारी

Tuesday, October 19, 2010

महाश्वेता देवी से बहुत प्रभावित हैं नुजहत हसन

करीब सालभर पूर्व नेश्ानल बुक ट्रस्ट की निदेशक नुजहत हसन (वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी) नईदुनिया दफ्तर में आईं थीं। उनके पति भी आईपीएस अफसर हैं। पुलिस प्रशासन में भी काम करने का उनका लंबा अनुभव है। उनसे नईदुनिया की मेट्रो टीम ने विस्तार से बातचीत की और मैंने बाद में उस बातचीत को खबर के रूप में लिखा। पेश है ब्लॉग पढ़ने वालों के लिए वह स्टोरी:
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन से बातचीत

सारे मनुष्य बुनियादी तौर पर एक जैसे हैं
काम कोई भी हो रमने पर अच्छा लगता है
पुलिस की वर्दी और नए काम से कुछ सीखा ही है
किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए
पुलिस अफसर से किताबों की दुनिया में बैठने का काम तो एकदम अलग है, लेकिन इससे बहुत कुछ नया सीखने को मिला है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक आईपीएस अधिकारी नुजहत हसन का मानना है कि चीजें बदलने से अनुभव ही मिलता है। नईदुनिया दफ्तर में आईं श्रीमती हसन ने अपने पुलिस सेवा के अनुभवों और निजी जीवन के बारे में विस्तार से बात की। पेश है बातचीत के कुछ अंश

कुछ मामले आर्थिक पहलुओं के चलते रुक जाते हैं और कुछ पर योजनाएं कारगर नहीं हो पाती। लेकिन आशाजनक यह है कि पुस्तक संस्कृति बेहतर तरीके से विकसित हो रही है। अच्छे विषयवस्तु के साथ तमाम भाषाओं में पुस्तकों के प्रकाशन से हमें बेहद खुशी है और एकदम बदले परिवेश में काम करने का अनुभव भी अच्छा मिल रहा है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक नुजहत हसन का कहना है कि किताबों की दुनिया में आकर बहुत कुछ नया सीखने को मिला। यहां आकर ही मैं महाश्वेता देवी के करीब आई और उनसे बहुत प्रभावित हुई।
बातचीत के दौरान पुरानी यादों को कुरेदने का जब सिलसिला शुरू हुआ तो तमाम यादों को उन्होंने बांटा। कोई यादगार लम्हे के बारे में पूछने पर श्रीमती हसन ने बताया कि एक छोटी सी घटना है, लेकिन है बहुत रोचक। उन्होंने बताया कि घटना तब की है जब वह पूर्वी दिल्ली में पुलिस उपायुक्त थीं। किसी इलाके में चोरी हो गई। घटना का विस्तृत विवरण लिखा जा रहा था, तभी एक किशोर बोला कि मेरे नए जूते खो गए हैं। जूते बहुत अच्छे थे। उस समय पुलिस ने इसे बहुत सामान्य अंदाज में लिया। असली मकसद चोरों का भांडा फोड़ना था। लेकिन बाद में जब रिकवरी हुई तो वे जूते भी बरामद हो गए। सामान जब सौंपा गया तो उस बच्चे की खुशी देखने लायक थी। हमें तब बेहद सुकून मिला।
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन ने कहा कि एक अजीब सा यह अनुभव भी रहा कि लोग पूरी जानकारी के बगैर आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। उन्होंने कहा कि एक बार बच्चा खोने की एक घटना में लोग पुलिस पर आरोप लगा रहे थे कि जांच ठीक नहीं हो रही। मुझसे लोगों ने लिखित शिकायत की। मैंने जब अपने स्तर पर मामले को देखा तो जांच सही दिशा में चल रही थी। कुछ दिनों बाद बच्चे को मुक्त भी करा लिया गया।
फिलहाल वर्दी का रौब छूट गया है, अजीब नहीं लगता, पूछने पर उन्होंने कहा कि किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। आज वर्दी है, कल नहीं भी हो सकती है। फिर एक जैसे काम से बोरियत भी तो हो जाती है। हां एनबीटी में आने पर शुरू में अजीब थोड़ा इसलिए लगा कि इस ढांचे को ठीक से जानती नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। उन्होंने कहा कि बुनियादी तौर पर मनुष्य एक जैसा होता है। श्रीमती हसन ने कहा कि वह कई बार खुद से ही सवाल करती हैं। यदि कोई अपने काम को ही ठीक से आंक ले तो सबकुछ ठीक हो जाता है।
खुद आईपीएस अधिकारी और जीवन साथी भी आईपीएस हैं, कैसे निभती है पूछने पर श्रीमती हसन बोलीं, मैं कुछ भी होती, लेकिन शादी पुलिस अफसर से ही करती। क्यों? नुजहत कहती हैं कि जो व्यक्ति इतने सारे पुलिसिया महकमे को देख रहा है, वह निश्चित रूप से पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी संतुलन बनाए रखेगा। पुलिस अधिकारियों का घर में भी समान रौब चलता है, पूछने पर श्रीमती हसन ने कहा कि दरवाजे तक पुलिस की वर्दी होती है, अंदर हर कोई आम इंसान होता है। बातों बातों में पुलिस और हिंदी फिल्मों की बात छिड़ गई। एक सवाल के जवाब में श्रीमती हसन ने कहा कि पुलिस की छवि का नुकसान जितना ज्यादा हिंदी ने किया है, उतना किसी ने नहीं। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि उनकी रुचि खुद फिल्मों के निर्माण की है, लेकिन कई बार आदमी चीजों को सिर्फ सोच ही पाता है। पुलिस सेवा में फिर कब से लौट रही हैं, सवाल पर पहले श्रीमती हसन हंसती हैं फिर कहती हैं आना तो है ही। जब हुक्म आ जाए।