रामनाथ कोविंद देश के 14 वें राष्ट्रपति के रूप में 25 जुलाई को कार्यभार ग्रहण करेंगे। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधानिक पद को सुशोभित करने वाले अब तक के 13 राष्ट्रपति का कार्यकाल इस प्रकार रहा है- देश के आजाद होने के बाद पहला राष्ट्रपति होने का गौरव डॉ राजेन्द्र प्रसाद को प्राप्त हुआ। वह 12 वर्ष तक इस पद रहे और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जो दो बार इस पद के लिए चुने गये। उन्होंने सबसे पहले 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला और वह 12 मई 1962 तक इस पद पर रहे। दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन ने 13 मई 1962 को यह पद ग्रहण किया और 12 मई 1967 तक वह इस पद पर रहे। तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक इस पद पर रहे। डा हुसैन का कार्यकाल के दौरान ही निधन हो गया था। इसके बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया। श्री गिरि 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में काम किया और फिर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिये इस्तीफा दे दिया। गिरि के इस्तीफा देने के बाद उस समय के मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्ला ने नया राष्ट्रपति निर्वाचित होने तक कार्यवाहक राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला। श्री गिरि चुनाव जीतने ने बाद 24 अगस्त 1969 से 23 अगस्त 1974 तक राष्ट्रपति रहे। पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद बने और उनकी भी कार्यकाल के दौरान ही मृत्यु हो गई, जिसके बाद उपराष्ट्रपति बसप्पा दानप्पा जत्ती 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे। छठे राष्ट्रपति के तौर पर नीलम संजीव रेड्डी 25 जुलाई 1987 से 24 जुलाई 1982 तक इस पद पर रहे। ज्ञानी जैल सिंह ने 25 जुलाई 1982 से 24 जुलाई 1987 तक सातवें राष्ट्रपति के रूप में काम किया। इसके बाद रामास्वामी वेंकटरमन आठवें राष्ट्रपति बने और 25 जुलाई 1987 से 24 जुलाई 1992 तक इस पद पर रहे। नौवें राष्ट्रपति के तौर पर डॉ़ शंकर दयाल शर्मां का कार्यकाल 25 जुलाई 1992 से 24 जुलाई 1997 तक रहा। दसवें राष्ट्रपति केआर नारायण 25 जुलाई 1997 से 24 जुलाई 2002 तक रायसीना हिल्स में रहे। ग्यारहवें राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का कार्यकाल 25 जुलाई 2002 से 24 जुलाई 2007 तक रहा। इसके बाद प्रतिभा पाटिल 12 वीं राष्ट्रपति बनीं और वह 25 जुलाई 2007 से 24 जुलाई 2012 तक इस पद पर रहीं। वह देश की पहली महिला राष्ट्रपति थीं। वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री के पद पर रहने के बाद 25 जुलाई 2017 को देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद संभाला। तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल 24 जुलाई 2017 को समाप्त हो रहा है।
Thursday, July 20, 2017
Saturday, July 8, 2017
उत्तराखंड की यादगार यात्रा और मूड ऑफ का पुराना कनेक्शन
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| सीताबनी में भोजन के बाद एक ग्रूप फोटो |
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| बारी लेडीज की : आदरणीय माताजी (पत्नी की दीदी की सास) के साथ जवां मंडली |
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| ठंड लगे तो हंस जाओ : सीताबनी के ठंडे झरनों पर स्नान |
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| आओ नदी में उतरें : रामनगर गर्जिया देवी के पास नदी में उतरीं साहसिक महिलाएं |
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| ये हैं भास्कर जोशी : स्वभाव में शांत, गाड़ी चलाने और खर्च करने में उस्ताद |
मुझे घूमना-फिरना
अच्छा लगता है। बशर्ते कई लोग हों। मसलन अपना परिवार, रिश्तेदारों का परिवार या मित्र।
जनवरी में चेन्नई-पुद्दुचेरी यात्रा की चर्चा अभी हमारे परिवार में चल ही रही थी कि
तय हुआ इस बार गर्मियों में उत्तराखंड चला जाये। कार्यक्रम अपने मूल घर रानीखेत भी
जाने का बना, लेकिन अचानक एक मौत की खबर आयी। रिश्ते में हमारी भाभी लगने वाली एक महिला
का निधन हो गया। अंत समय में बेहद दुखद दिन देखने वाली यह महिला अपने जमाने में
बेहद बिंदास थी। मैं उनके बच्चों की उम्र का हूं, रिश्ता हमारा देवर-भाभी वाला था।
जैसी पारिवारिक और अन्य तकलीफों से वह गुजर रहीं थीं, उनका रुखसत होना ही परिणति थी।
खैर... इस सूचना के बाद गांव जाने का कार्यक्रम तो मुल्तवी हो गया क्योंकि न तो पूजापाठ
हो सकती थी और न ही घूमना-फिरना। बच्चे गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही चले गये
थे। हल्द्वानी, काठगोदाम। आसपास दीदीयां रहती हैं। ससुराल भी वहीं हैं। इस बीच अन्य
रिश्तेदार भी पहुंचे। बड़ा बेटा मामा संग अल्मोड़ा के कई इलाकों में घूमने गया। पत्नी
छोटे बेटे संग आसपास रिश्तेदारों के यहां मिलने में व्यस्त रही। तय कार्यक्रम के अनुसार
मैं भी 22 जून को पहुंच गया। तय किया कि एक दिन 'सात ताल' चला जाये। दो दिन 'गर्जिया देवी',
'कोटाबाग', 'जिम कार्बेट', 'सीताबनी' इलाकों में गुजारे जायें। एक दिन आराम के बाद फिर वापस
अपनी-अपनी जगह। इसी बीच हल्द्वानी में हमारे मित्र दिनेश, ललित दा की मांता जी के निधन
की खबर मिली। स्वस्थ हालत में करीब 85 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। उन्हें सब लोग
ताईजी के नाम से पुकारते थे। वह मुझे बहुत प्यार करती थीं। कई बार उन्होंने अपनेपन
से डांटा कि मिलने नहीं आता। और भी कई यादें उनसे जुड़ी हैं। उनके अंतिम संस्कार में
शामिल होने में भी रानीबाग स्थित श्मशान घाट गया। खैर होनी को कौन टाले। अब फिर विचार
हुआ कि कहां चला जाये। बहुत सी जगहों पर चर्चा हुई। पहले हम लोग सात ताल गये। मैं आसपास
तो खूब घूमा हूं, लेकिन प्रॉपर सात ताल पहली बार गया। वहां बहुत अच्छा लगा। बीच ताल
में नाव में बैठकर आड़ू खाने का अलग ही लुत्फ आया। अगले दिन हम लोगों ने निकलना था
दो दिन के टूर पर। पहले कोटाबाग अपने साढू भाई को रिसॉर्ट बुक कराने को कहा, लेकिन
कोई खाली नहीं था, फिर अपने भांजे मनोज के सुसर श्री कांडपाल जी से अनुरोध किया। उन्होंने
पहले ही वाक्य में कहा, सब हो जायेगा। आप लोग बस आ जाओ। इस बार हम लोग फिर दो गाड़ियों
में थे। मेरी दीदी-जीजा जी, बच्चों के मामा-मामी बाद में एक साढूभाई की माताजी भी साथ
हो लीं। उनके भी कुछ रिश्तेदार। इस बार के सफर में बच्चों की बड़ी मामी उनकी बेटी और
बेटा साथ नहीं चले। हम लोग सुबह गर्जिया देवी गये। वहां पूजा-अर्चना के बाद नदी में
बच्चों ने काफी देर तक एंजॉय किया। उसके बाद कांडपाल जी को फोन लगाया। उन्होंने कहा
रिसॉर्ट तो सब फुल चल रहे हैं, पर इंतजाम पूरा है। आप लोग आ जाओ। जायें कि नहीं, इस
असमंजस में हम लोग चल दिये। बीच में गाड़ी वाले ने कुछ चालाकी दिखायी और पैसे लेकर
चलता बना। हमने भी उससे चिकचिक करनी पसंद नहीं की। कुछ लोग कांडपाल जी के यहां रुक
गये, कुछ चले गये कोटाबाग। भांजे मनोज का आग्रह और कांडपाल जी की प्यारी जिद ने मुझे भी वहीं रोक लिया। अगले दिन सुबह पास में ही छोटे से डैम में मैं, मेरा बेटा
और जीजाजी नहाने चले गये। एक घंटा नदी में ही पड़े रहे। बेहद आनंद आया। उसके बाद गये
रमणीक स्थल सीताबनी में। यहां जाने का रास्ता था जिम कार्बेट जंगल के बीच पथरीली राहों
भरा। बच्चों के मामा भास्कर की गाड़ी में मैं बैठा था। दिल्ली में कार चलाने वाले भास्कर
ने इतनी खूबसूरती से वहां गाड़ी ड्राइव की, मैं हतप्रभ रह गया। सीताबनी पहुंचे। ठंडे
झरनों में स्नान किया। फिर पूजापाठ। उसके बाद वहीं चाय बनायी। वहीं खाना बनाया और खाया।
जंगल से सूखी लकड़ियां लेकर खाना बनाने और साथ खाने का जो आनंद आया, वह अवर्णनीय है।
इस सबमें अन्य लोगों के अलावा मेरे साढूभाई सुरेश पांडेय जी का सहयोग बेहद सराहनीय
रहा। शाम को हम लोग कोटाबाग होते हुए काठगोदाम आ गये। यहां आकर फिर पता चला एक बच्चे
(हम तो बच्चा ही कहते हैं हालांकि वह करीब 25 साल का हो गया है) ने अपनी मां पर हाथ
उठाया है। असल में वह उत्तराखंड में फैले स्मैकियों के जाल में कुछ साल पहले फंस चुका
है। उसको सुधारने के तमाम प्रयास बेकार साबित हुए। उसे नशा मुक्ति केंद्र में भी डाला
गया। प्यार से समझाया भी गया। वह इतना ‘चालाक’ है कि हम जैसे दो दिन के मेहमानों के
समझाने पर ऐसे रिएक्ट करता है, मानो वह सुधर गया, लेकिन ऐसा होता नहीं। उस वक्त थोड़ा
गुस्सा किया। अगले दिन उसे कुछ समझाया। उसके चाचा तो अगले दिन अपने काम पर लौट गये,
लेकिन मुझे दो दिन और रुकना था। उसे मैंने भी बहुत समझाया। वह बोला, अब पढ़ाई करूंगा,
कंपटीशन दूंगा। यहां बता दूं कि वह दसवीं तक पढ़ने में बहुत अच्छा था। जब तक हम रुके
वह सामान्य बना रहा, लेकिन फिर खबरें नकारात्मक आ रही हैं। पता नहीं क्या होगा उसका।
लेकिन इस बीच हैरान करने वाली बात हुई। पुलिस के कुछ अधिकारियों से मैंने बात की। उनका
कहना था कि स्मैकियों के नेटवर्क को तोड़ना बहुत मुश्किल है। पंजाब आदि जगहों की तो
लोग चर्चा करते हैं, लेकिन उत्तराखंड में नशे का भयानक जाल फैला है। इस पर कोई चर्चा
नहीं करता। मैंने एसएसपी आदि को अलग से मेल भी किया है। जगह-जगह स्मैक बिक रहा है।
कई बच्चे इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं। हाल ही में वहां एक नशामुक्ति केंद्र तक में
ये नशे के सौदागर पहुंच गये। खैर... उत्तराखंड का पूरा टूर अच्छा रहा, लेकिन इस बच्चे
की वजह से सारा गड्डमड्ड हो गया। पता नहीं यह सुधरेगा भी या नहीं।
Sunday, June 18, 2017
हिमाचल के बद्दी की छोटी सी यात्रा
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| सफर के दौरान ही दिखा ईंट भट्टा |
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| रासते में हरियाली ही हरियाली |
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| सफर के बीच में पड़ा पंजाब का कुछ हिस्सा |
-केवल तिवारी
Friday, June 16, 2017
पच्चीस नंबर
सजल ने अब चौथी बार रघु से सवाल पूछा कि इस बार कहां
गये थे? रघु का वही जवाब '25 नंबर।' दोनों हंस पड़े। असल में पिछले चार-पांच दिनों
से यही हो रहा था। रघु को हर बार 25 नंबर काउंटर पर जाना पड़ रहा था। अस्पताल में
25 नंबर का आलम यह था कि न तो वह 24 के करीब था और न ही 26 के आसपास। उसका निशान (साइन
बोर्ड) जरूर कई जगह बने थे। दूसरी मंजिल से भी एक एरो बना हुआ था। वहां से अंदाजा लगाया
जा सकता था कि 25 नंबर काउंटर है कहां? दूसरी मंजिल पर ही बने वार्ड में सजल भर्ती
थे। दिक्कत यह थी कि 25 नंबर वार्ड वहां था ही नहीं, जहां उसे होना था। रघु चूंकि अब
अभ्यस्त हो गया था। इसलिए ज्यादा परेशानी नहीं होती। लेकिन कई बार अगर रात 11 बजे बाद
वहां जाना होता तो वह रास्ता भूल जाता। असल में जो रास्ता रघु को मालूम था, वह रात
10 बजे बंद हो जाता था। बाकी काउंटर जैसे 22, 23, 27 आदि एक ही फ्लोर पर थे, लेकिन
25 नंबर था तीसरी मंजिल पर। असल में 25 नंबर का वास्ता रघु का भी तभी से पड़ा जब से सजल
यहां भर्ती थे। सजल एक बेहतरीन फोटोग्राफर माने जाते थे। फोटोग्राफी के प्रति उनके
लगाव का आलम यह था कि वह अस्पताल के बेड पर पड़े वक्त भी एंगल की बात करते। कभी कहते,
'रघु सामने जो पेड़ है, उसको अगर तुम इस बिल्डिंग की छत पर जाकर कैमरे में कैप्चर करो
तो एक अलग नजारा दिखेगा।' रघु बात से सहमत होते हुए सिर हिला देता। रघु भी
था तो फोटोग्राफर, लेकिन एंगल और नयेपन का इतना जुनून उसमें नहीं था, जितना सजल साहब
में। फिर सजल साहब रघु से तकरीबन 12 साल बड़े भी तो थे। फोटोग्राफी की कई बारीकियां
तो रघु ने सजल साहब से ही सीखी थीं। यूं तो कई अन्य वरिष्ठ फोटोग्राफरों से रघु का
वास्ता पड़ा, लेकिन सजल साहब के एंगल उसे एकदम अलग लगते। सजल की बातों को सुनने के बाद कई बार रघु
का मन करता कि चलो छत पर चढ़कर एक फोटो इस पेड़ की ले ली जाये, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।
सजल साहब का एंगल के प्रति जुनून का आलम यह था कि एक बार तो पता ही नहीं चला कि उन्होंने
कब रघु की चाय पीते तस्वीर ले ली। वह तस्वीर इतनी खूबसूरत आयी कि लगा नहीं कि वह किसी
अस्पताल के वार्ड में किसी मरीज का तीमारदार बना हुआ है। रघु को सजल साहब से खुलकर
बात करने में भी संकोच होता था। लेकिन इन दिनों अस्पताल में थे तो लंबी खामोशी भी तो नहीं चल सकती थी। तीमारदारी के दौर में ही एक बार तो हिम्मत करके रघु ने पूछ ही लिया, 'सर ये आइडियाज
कैसे आते हैं आपको।' सजल मुस्कुरा दिये और बोले आज घर जाते वक्त अमलताश के पेड़ों की
कतार देखना और ऐसे ही क्लिक कर देना। वाकई गजब हो गया। रघु की वह तस्वीर उसके अखबार
के पेज वन पर छप गयी। अगले दिन सुबह 11 बजे जब रघु अस्पताल पहुंचा तो सजल साहब मुस्कुराये।
बोले, ‘देखा अच्छी बन गयी ना तस्वीर।’ फिर उन्होंने पूछा, ‘ये कैप्शन किसका है?’ 'मिलजुलकर
बनाया है।' रघु का जवाब था। सजल साहब थोड़ा गुस्सा सा हुए। बोले, 'खुद नहीं बनाया है
तो दूसरों को क्रेडिट देना सीखो।' ऐसे ही कई मौके होते थे जब सजल साहब प्रैक्टिकल बातें
करते और कुछ अच्छी बातें भी समझाते। असल में सजल साहब पिछले कुछ दिनों से बहुत बीमार
हो गये थे। वह तसवीरों के एंगल को लेकर बातें तो करते, लेकिन काम जैसे उन्होंने खुद
करना लगभग बंद कर दिया था। रघु से कोई खास इंटीमेसी उनकी नहीं थी। हां जान-पहचान बहुत
पुरानी थी। बल्कि वह तो रघु के कई बार बॉस भी बने रहे। सजल साहब के साथ एक अजीब बात
थी कि वह हमेशा प्रोफेशनल बातें ही करते। तसवीर कैसी है। तसवीर का एंगल क्या हो। कैसे
कोई फोटो बहुत अच्छी हो सकती है, वगैरह-वगैरह। रघु-सजल कई बार बॉस और मुलाजिम रहे।
फिर अलग-अलग हो गये। पिछले कुछ सालों से दोनों का साथ हुआ। वह रघु से पता नहीं क्यों
निजी बातें शेयर करने लगे थे। बेशक बच-बचकर। जैसे बेटे को एक ट्रॉफी मिली है। बिटिया
ने बीटेक का कोर्स पूरा कर लिया है। जॉब सर्च कर रही है। वाइफ आने वाली हैं। आदि-आदि।
सजल और रघु इन दिनों जयपुर में थे। दोनों दिल्ली से आये थे। रघु तो अपनी फैमिली साथ
ले आया, लेकिन सजल साहब के बच्चों की पढ़ाई बीच में थी। बेटा हॉस्टल में, बेटी बीटेक
की पढ़ाई कर रही थी। पत्नी भी स्कूल में पढ़ाती थीं। वह जयपुर में अकेले ही रहने लगे।
अपने आदत के अनुसार वह फोटो के एंगल तो खूब तलाशते, लेकिन पता नहीं लगता जैसे जिंदगी
का उन्होंने एक ही एंगल देखा। तन्हा रहना, किसी से कुछ शेयर न करना उनकी आदत सी थी।
रघु और सजल की प्रोफेशनल बातें होतीं। कभी-कबार मुलाकात होती। लेकिन पिछले कुछ दिनों
से जब सजल साहब बीमार पड़े तो उन्होंने पता नहीं क्यों रघु से इस बात को शेयर करना
चाहा। रघु को कुछ-कुछ तो पता था, लेकिन सजल साहब की हमेशा इच्छा रहती थी कि बेचारगी,
लाचारी भरे माहौल में न जीयें। वह यह भी पसंद नहीं करते थे कि बार-बार कोई उनसे उनके
स्वास्थ्य के बारे में पूछे। लेकिन इस बीच उन्होंने रघु और अपने ही साथ के एक-दो लोगों
को घर बुलाकर बताया कि वह बेहद अस्वस्थ हैं। बीमारी है किडनी की। शायद ट्रांसप्लांट
करनी पड़ जाये। रघु तो यह सुनकर ही सन्न रह गया। फिर खुद सजल साहब ने कहा कि घबराने
की जरूरत नहीं। सब क्यूरेबल है। फिलहाल दवा चलेंगी। डायलिसिस होगी। जरूरत पड़ी तो बाद
में ट्रांसप्लांट करा लेंगे। उन्होंने रघु से कहा कि संभव हो तो कुछ समय निकालकर मेरे
साथ अस्पताल में रह जाना। क्योंकि उन्हें फिलहाल एक हफ्ते के लिए भर्ती होना है। रघु
को इसमें कोई दिक्कत नहीं थी। दो-चार घंटे जाने के बाद वह थोड़ा काम कर आएगा और फिर
तीमारदार की तरह अस्पताल चला जाएगा। लेकिन वह चाहता था कि सजल साहब इस वक्त पूरे परिवार
को साथ बुला लें। उनके साथ रहने से बात दूसरी ही होगी। हालांकि यह बात रघु सीधे कह
नहीं पाया। तय हुआ कि तीन दिन बाद अस्पताल जाना है। डॉक्टर से पहले ही टाइम ले लिया
गया। डॉक्टर ने बताया कि एक दिन आईसीयू में रखेंगे फिर प्राइवेट रूम दिला देंगे। तीन
दिन बाद सजल के साथ रघु एवं उनके दो मित्र अस्पताल चले गये। वहां उन्हें भर्ती करा
दिया गया। इसी बीच सजल साहब की पत्नी का फोन रघु के पास आ गया। रघु को आश्चर्य हुआ
कि उन्हें कैसे पता कि हम अस्पताल में हैं। तभी सजल साहब बोले, ‘मैं बता चुका हूं।
वह शाम तक पहुंच जाएंगी।‘ दिनभर रघु वहीं रहा। इस बीच सजल साहब के कई सैंपल जांच के
लिए रघु देकर आया। हर सैंपल के साथ डॉक्टर कहते कि पहले 25 नंबर में जाना वहां से पर्ची
मिलेगी फिर 24 नंबर में या 20 नंबर में जमा करा आना। रघु को 25 नंबर ढूंढ़ने में बहुत
वक्त लग गया। असल में 25 नंबर के लिए साइन बोर्ड तो जगह-जगह लगे थे, लेकिन उसे ढूंढ़ना
बहुत आसान नहीं था। 25 नंबर काउंटर तीसरी मंजिल पर था। रघु को जब इस काउंटर पर पहुंचने
का अच्छा अभ्यास हो गया तो वह सजल साहब के पास से उठकर अक्सर उस गलियारे में आ जाता
जहां से लोग 25 नंबर गलियारे का रास्ता ढूंढ रहे होते। एक दिन तो उसने कम से कम 50
लोगों को इसका रास्ता बताया होगा। गलियारे में अक्सर अस्पताल से अनजान लोग ही भटकते
रहते। गार्ड से पूछो तो वो ऐसे ही आगे को हाथ से इशारा कर देते। उनका काम तीमारदारों
की भीड़ को हटाना ही ज्यादा होता। बड़ा सरकारी अस्पताल, तमाम तामझाम फिर भी कुछ बातें
अधूरी-अधूरी सी।
एक दिन रात में सजल साहब ने रघु से रुक जाने का आग्रह
किया। रघु ने सजल साहब को ऐसी लाचारगी वाले अंदाज में कभी नहीं देखा था। रघु ने तुरंत
हां कर दी और घर पर फोन कर बता दिया कि वह कल शाम तक ही घर आएगा। इस बीच सजल साहब ने
पत्नी से घर जाने को कह दिया। वह लगातार एक हफ्ते से उनके पास ही थीं। उन्हें भी थोड़ा
आराम मिल जाएगा। चूंकि रघु का ऑफ था, इसलिए दफ्तर की भी बहुत चिंता नहीं थी। रात में
सजल साहब बहुत देर तक रघु से बात करते रहे। बीच में दोनों ने दो बार कॉफी भी पी। ‘आपके
लिए ज्यादा कॉफी नुकसानदायक तो नहीं‘ रघु ने सजल साहब से पूछा। ‘अरे नहीं डॉक्टर तो
कहते हैं खूब कॉफी पीओ।’ सजल साहब कह देते। उस रात सजल साहब ने घर-परिवार की कई बातें
रघु से कीं। रघु की बातें भी सुनीं। दूसरे दिन सुबह-सुबह सजल साहब ने अपने आईपैड पर
कई मधुर गीत लगा दिये। कभी भूपेन हजारिका का ‘विस्तार है अपार’ गीत बजता तो कभी लता
जी का ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा।’ सजल साहब ने देखा कि रघु को भी गीतों
में आनंद आ रहा है। उन्होंने यहां भी एक एंगल जैसा तलाशा। बोले-‘रघु इन गीतों को सुनकर
नहीं लगता जैसे शब्द बाहर निकलकर हवा में तैर रहे हों।’ रघु थोड़ी देर के लिए उनकी
बातों पर गौर करता रहा। सचमुच यही तो लग रहा था कि जैसे शब्द तैर रहे हों। फिर उन्होंने
हंसते हुए पूछा, ’25 नंबर कब से जाना नहीं हुआ।’ रघु मुस्करा दिया। फिर सजल साहब बोले,
पता नहीं 25 नंबर से मुझे अपना नाता सा जुड़ता महसूस हो रहा है। जानते हो सजल यूं तो
मैं कोई ज्योतिष आदि में विश्वास नहीं करता, लेकिन पता नहीं 7 नंबर से मेरा अनजाना
सा नाता है। मेरे मोबाइल नंबर के अंत में 7 है। कार के नंबर में सात है। घर का नंबर
सात है। जन्मतिथि सात और अगर इस 25 नंबर के दोनों अंकों को जोड़ो तो ये भी सात बनते
हैं। क्या पता अंतिम दिन का भी योग सात बने। सजल बस सुनता रहा। फिर बोले, मुझे लगता
है इस 25 नंबर से अब नाता टूट जाएगा। रघु ने कहा, ‘सर आप परेशान मत होइये। सब ठीक होगा। ऐसे भी अब कोई दिक्कत नहीं है। अब तो
इस अस्पताल के किसी भी गेट से भेज दीजिए मैं 25 नंबर तक हो ही आऊंगा।’ वैसे वहीं फीस
जमा क्यों होती है। सजल साहब ने पूछा। रघु ने कहा, ‘सर कुछ खास टेस्ट की फीस वहां जमा
होती है और रिपोर्ट भी वहीं से मिलती है।‘ फिर रघु ने पूछ लिया, ‘सर आप किडनी ट्रांसप्लांट
का प्रोसेस तो शुरू करवाइये। डोनर मिल जाते हैं।’ सजल साहब बोले, ‘डोनर की कोई समस्या
नहीं है। मैं सोच रहा हूं अगर यूं ही यह जिंदगी चार-पांच साल चल जाए तो ज्यादा जीकर
करना क्या है?’ उनके इस जवाब की रघु को उम्मीद नहीं थी। उसने कोई तर्क करना उचित नहीं
समझा। अगले दिन शाम को सजल साहब ने कहा, ‘रघु तुम घर जाओ। कल से बच्चे अकेले होंगे।’
फिर वह धाराप्रवाह बोलते चले गये, ‘हमारे शहजादों को तो मैसेजभर की फुर्सत है। कभी
आकर मुझे देख लें, इतनी फुर्सत उन्हें कहां।’ रघु ने जवाब दिया, ‘आप कहें तो रुक जाऊं।
कल सुबह निकल जाऊंगा।’ सजल ने बात पलट दी और बोले, सामने देखो पेड़ों के बीच से गौर
से चांद को देखो, ऐसा लग रहा है वह दो है और पेड़ की टहनी जैसे पांच। सजल समझ गया कि
वह 25 नंबर कह रहे हैं। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिये। तभी सजल साहब की पत्नी भी पहुंच
गयीं। उन्होंने भी रघु से घर जाने को कहा। जाते-जाते सजल साहब बोले, ‘रघु कभी-कभी तो
मुझे लगता है कि 25 भी बजते हैं। रात को 12 बजे जिसे हम 24 बजे भी कह सकते हैं, उसके
एक घंटे के समय को जब बिल्कुल सन्नाटा सा होता है उसे हम 25 बजे कह सकते हैं।’ रघु
को लगा फोटो में एंगल तलाश करने वाले सजल साहब आज कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं। खैर
रघु घर आ गया। घर पर बात की। वहां भी सजल साहब की बीमारी से सब परेशान थे। रघु
की पत्नी ने पूछा, क्या लगता है? रघु ने कहा, ‘कल तक सब ठीक लग रहा था, आज अजीब-अजीब।’
खाना खाकर सब सो गये। रात एक बजे रघु के फोन पर घंटी बजी। फोन महेंद्र का था। रघु का
दोस्त और सजल साहब का भी पुराना परिचित। रघु ने सवाल किया, ‘हां महेंद्र इतनी रात फोन
कैसे।’ ‘अरे यार मैं अस्पताल में हूं।’ महेंद्र का जवाब था। ‘क्या हुआ।’ रघु ने पूछा।
‘सजल साहब सो सीरियस।’ बातचीत जारी रही-अरे मैं आऊं। नहीं सुबह आ जाना। जल्दी।
रघु को उसके बाद नींद नहीं आयी। कभी वह याद करता कि रात
एक बजे भी 25 बजता है। कभी यह कि अब 25 नंबर से वास्ता टूट जाएगा। कभी यह कि मेरे जीवन
में 7 नंबर अहम है। सोचते-सोचते उसे हल्की आंख लग गयी। सुबह 6 बजे रघु की पत्नी ने
चाय लाकर दी। रघु ने कहा कि मैं तुरंत नहाकर निकलूंगा। रात फोन आया था। अजब इत्तेफाक
था कि करीब सात बजे वह अस्पताल पहुंचा। सजल साहब को कई तरह की मशीनें लगी थीं। बेटा
और बेटी भी पहुंच चुके थे। उनकी पत्नी से रघु ने पूछा अचानक सब लोग आ गये। सजल साहब
की यकायक तबीयत कैसे बिगड़ गयी। वह सुबकने लगीं। बोलीं, आपके जाने के बाद इन्होंने
ही सबको आ जाने के लिए कहा था। फ्लाइट से अभी-अभी सब पहुंचे हैं। ओह। रघु को कुछ समझ
में नहीं आ रहा था। वह डॉक्टर के पास गया। डॉक्टरों का वही जवाब, ‘वी आर डूइंग अवर
बेस्ट।’ इधर-उधर दौड़ते-दौड़ते करीब 11 बज गये। आधे घंटे बाद डॉक्टर ने तीन-चार पर्चियां
दी और एक लिक्विड सा देकर कहा, इसे 25 नंबर में जमा कराके आओ। रघु ने पर्चियां पकड़ीं
और बाहर को निकला ही था कि डॉक्टर ने रोक दिया। पर्ची और लिक्विड वापस ले लिया। फिर
डॉक्टर ने रघु की तरफ गौर से देखकर कहा, ‘आप इनके कौन हैं।’ मैं-मैं-मैं, रघु अपना
कोई परिचय नहीं दे पाया। तभी महेंद्र बोला, 'उनके भाई हैं। मतलब पुराने साथी हैं।' डॉक्टर
ने कहा, 'सबको संभालिये, अब 25 नंबर जाकर इन जांचों की जरूरत नहीं।' रघु ने देखा 12 बज
चुके थे। क्या दिन में भी 25वां घंटा होता है। 12 बजे के बाद। रघु रुआसा सा होकर पीछे
को पलटा। महेंद्र की तरफ देखकर बोला, आज तारीख कितनी हैं। महेंद्र ने कहा '16 तारीख।' 'ओह
आज भी सात हैं।' रघु बुदबुदाया। महेंद्र ने कहा, 'क्या। सात नहीं सोलह। हां भाई सोलह।' रघु बुदबुदाता रहा। शायद अब न 25 नंबर
होगा और न ही सात नंबर। थोड़ी देर बाद रोने-धोने की आवाज से अस्पताल परिसर गूंज उठा।
दुनिया वैसे ही चल रही थी। सामने का पेड़ भी हवा में हिल रहा था। आसमान में बादलों
का एक झुरमुट इस तरह से घूम रहा था जैसे उसकी आकृति 25 नंबर की बन रही होगी। रघु चुपचाप
एक बार 25 नंबर काउंटर पर हो आया। वहां वैसी ही गहमागहमी थी। सीढ़ियों से उतरते वक्त
उससे पांच लोगों ने 25 नंबर का रास्ता पूछा, आज वह सिर्फ हाथों से इशारा कर पाया।
Wednesday, March 22, 2017
कद्दू, पेठा और घीया या लौकी
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| लौकी का ही एक रूप |
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| लौकी जिसे घीया भी कहते हैं |
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| पेठा जिसकी मिठाई बनती है |
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| पेठा से बनती है यह मिठाई |
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| और यह है फसाद का जड़ कद्दू |
Tuesday, March 14, 2017
अब तो सब हो गये स्मार्ट
कौस्तुब के हाथ में जब स्मार्ट फोन आया तो उसे लगा जैसे
अपने परिवार में सबसे पहले उसी के हाथ में एक ऐसी वस्तु आ गयी है जिसमें फेसबुक है,
जिसमें व्हट्सएप है और जिसके जरिये अब वह हर समय ऑन लाइन रह सकता है। कुछ पल के लिये
वह ऑफिस का तनाव भी भूल गया। असल में ऑफिस में भी उससे कई बार कहा गया कि स्मार्ट फोन
ले लो, अर्जेंट मेल देखने के लिये ठीक रहता है। वीडियो, ऑडियो, टैक्ट्स मैटर सबकुछ
तो अब उसकी तुरंत प्रभाव से पहुंच में था। इस बीच जिन लोगों को पता चला उन्होंने व्हटसएप
मैसेज भेजने शुरू कर दिये। वह खुश होकर घर में कभी बच्चों को तो कभी पत्नी को बताता
देखो फलां ने मैसेज भेजा है। उसे कैसे पता चल गया, यह सवाल उठता? इससे पहले कि वह कोई
जवाब देता बच्चे ही बोल पड़ते, अरे मम्मा आजकल पता चल जाता है कि किसके पास स्मार्ट
फोन है और किसके पास नहीं। इस बीच मोबाइल कंपनियों के भी फोन आये कि आप 3 जी ले लो,
4जी ले लो। ये स्कीम है वगैरह-वगैरह। मित्र लोग तो कौस्तुब को कब से ताकीद कर रहे थे,
जल्दी से स्मार्ट फोन ले लो फिर हम लोग अपना ग्रूप बनायेंगे। देखते-देखते कई ग्रूप
बन गये। कुछ को तो वह जानता भी नहीं था। लोगों ने कहा जानकार नहीं हैं तो ग्रूप से
एग्जिट हो जाओ। अब तक तो ग्रूप बनाने में जैसे कौस्तुभ खुद को माहिर मानने लगा।
उसके मन में आया कि वह भी एक ग्रूप बनाये। इस बीच उसे
पता चल चुका था कि उसके तो परिवार में ही कई लोग स्मार्ट फोन वाले हैं। कई लोग व्हट्सएप
इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे पहले कौस्तुब को कई बार तब ग्लानि होती थी जब बच्चे के स्कूल
में टीचर्स कहते कि आप व्हट्सएप पर हैं। इसमें ये जानकारी शेयर कर देंगे, वो जानकारी
शेयर कर देंगे वगैरह-वगैरह। लेकिन तब स्मार्ट फोन उसके पास था ही नहीं। बहुत जरूरत
भी महसूस नहीं हुई। अब स्मार्ट फोन आने पर कौस्तुभ ने अपने परिवार के लोगों में उन
लोगों की सूची बनायी जिनके पास स्मार्ट फोन था और जो व्हट्सएप इस्तेमाल कर रहे थे।
इसमें उसने नजदीकी या दूरी जैसा कोई पैमाना नहीं बनाया। व्हट्सएप ग्रूप का नाम उसने
रखा ‘मेरा परिवार।’ इसमें वह अपने सगे संबंधियों को धड़ाधड़ जोड़ने लगा। कुछ लोगों
को यह पहल बहुत अच्छी लगी। किसी ने लोगो भेजकर सुझाव दिया कि इसे प्रोफाइल पिक्चर बना
लो तो किसी ने इसे बेहतरीन पहल बताया। कुछ लोग सुस्त भी लगे। कोई रेस्पांस नहीं। धीरे-धीरे
इसके सदस्यों का दायरा बढ़ता गया। इसमें कौस्तुभ के ससुराल के लोग थे, कौस्तुभ के भतीजे-भतीजी
थे, भांजे-भांजी थे। ससुराल के रिश्तेदारों के रिश्तेदार थे, तो भाई के रिश्तेदारों
के रिश्तेदार भी। बस ग्रूप में जोड़ते वक्त वह यही देखता कि उनके पास स्मार्ट फोन है
कि नहीं। इन्हीं में से किसी ने अपने भाई का नंबर दिया जोड़ने के लिये तो कुछ ने अपनी
पत्नी का। फेसबुक पर लाइक, कमेंट के रोग की तरह ही अब कौस्तुभ एक दिन में कई बार अपना
परिवार ग्रूप में नजर दौड़ाता। कोई भी मैसेज, वीडियो या टैक्स्ट आता तो वह तुरंत घरवालों
को बताता। देखो-देखो फलां ने यह मैसेज भेजा है। अरे देखो ललित ने आज अपने प्रोफाइल
में चिंटू की फोटो डाली है। अरे मुन्ना जी तो आज बड़े स्मार्ट लग रहे हैं। नितिन ने
देखो समुद्र किनारे की फोटो डाली है। घर में रोजमर्रा की चर्चाओं में अब मेरा परिवार
की ग्रूप की बातें होना भी शामिल हो गयी। कभी-कभी तो बच्चे भी कहते पापा आज ये फोटो
परिवार ग्रूप में डाल दो। कभी छोटा बच्चा कोई डांस करता तो उसकी वीडियो बनाकर डाल देता।
धीरे-धीरे एक अजीब सा परिवर्तन आने लगा ग्रूप में। इस ग्रूप में ही जैसे ग्रूपबाजी
होने लगी। एक दिन कौस्तुभ की पत्नी ने उसे बहुत उदास सा देखा। ऐसा तब भी होता जब कभी
ऑफिस के मामले में कौस्तुभ का मूड उखड़ा होता। उस दिन कौस्तुभ से पत्नी ने पूछ ही लिया,
क्या बात है। पहले वह टालता रहा फिर बोला आज दो लोगों ने ग्रूप छोड़ दिया। पत्नी बहुत
तेज हंसी। ये भी कोई बात है उदास होने की। हो सकता है फोन खराब हो। हो सकता है कोई
डिस्टरबेंस महसूस हो रहा हो। चलो एक-एक कप चाय पीते हैं, अपना वो प्रोजेक्ट पूरा कर
लो। पत्नी की बात सुनने के बाद कौस्तुभ अपना डेस्कटॉप खोलकर कुछ काम करने लगा। लेकिन
अंदर की एक उदासी उसे छोड़ न सकी। हालांकि ग्रूप छोड़ने वाले लोगों में से ज्यादातर
वे थे जो मिलने पर तो खूब अपनापन दिखाते थे, शायद कौस्तुभ का एडमिन होना और उसके द्वारा
बनाया गये ग्रूप से वे खुद को नहीं जोड़ना चाहते थे। कुछ दिन शायद ऐसे ही बने रहे,
फिर उससे अलग हो गये। तमाम तरह के तर्क-वितर्कों से खुद को संयत कर धीरे-धीरे कौस्तुभ
सामान्य हो गया। अब फिर से ग्रूप में परिवार के अन्य लोगों की बातें शुरू होने लगीं।
कभी कौस्तुभ को ही तारीफ मिलने लगती। कभी उसको छोटों का प्रणाम और बड़ों का आशीर्वाद
मिलने लगता। इस बीच एक वाकया और हुआ कि कुछ लोगों ने आपसी बातें भी उसी में शुरू कर
दीं। कुछ ऐसी बातें जो अपने-अपने निजी व्हट्सएप पर भी हो सकती थीं। ये बातें लगभग वे
ही लोग कर रहे थे जो उम्र में न भी सही तो रिश्ते में कौस्तुभ से छोटे थे। एक दिन कौस्तुभ
ने खुद को बड़ा समझते हुए ऐसी अपील कर डाली कि उसके रिएक्शन का उसे भी गुमान नहीं था।
उसकी अपील थी, ‘यह ग्रूप परिवार का है। निजी बातों के बजाय हम लोग सामूहिक चीजों को
उठायें। प्रहसन भेजें। आरोप-प्रत्यारोप के लिये और भी फोरम हैं। उम्मीद है सब ध्यान
रखेंगे कि परिवार के लोग रोचक चीजों का आदान-प्रदान करेंगे। नेगेटिव चीजों से बचेंगे।’
कौस्तुभ के इस बयान पर कई प्रतिक्रियाएं आयीं। किसी ने इस तरह का निशान पोस्ट किया
जिससे लगा कि उन्होंने सहमति जताई है। कुछ ने कोई रेस्पांस नहीं दिया और कुछ तो आक्रामक
मुद्रा में आ गये। जिनको कौस्तुभ अपना बेहद करीबी मानता था, जिनसे वह कोई ऐसे किसी
जवाब की उम्मीद नहीं रखता था, जिनको लेकर वह अक्सर दंभ भरता था, उन्होंने ही बड़ी प्रतिक्रिया
दी। एक का जवाब ऐसा आया जिसका लब्बोलुआब था कि ग्रूप है तो ऐसा होगा ही। बेहतर हो दो
ग्रूप बन जायें। फिर कुछ लोगों ने आपस में तय किया कि इसमें अब कोई पोस्ट नहीं भेजनी
है, कोई रेस्पांस नहीं देना है। कौस्तुभ कभी सोचता शायद सभी व्यस्त होंगे, इसलिये कोई
मैसेज नहीं आ रहे हैं। शायद ये, शायद वो। धीरे-धीरे कौस्तुभ का मन भी पक्का हो चला।
वह उन दो-तीन लोगों की तारीफ करता जो तुरंत रिएक्शन नहीं करते थे। कभी-कभी उनके मैसेज
आते, लेकिन वह नेगेटिव या पॉजिटिव पर कोई जोर नहीं देते। जैसे उधो न माधो। कौस्तुभ
अपने काम में रहता। व्हट्सएप के इस अनुभव से उसे अब अच्छा-अच्छा सा लगने लगा। रहीम
के उस दोहे की तरह – रहिमन रहिला की भली जो थोड़े दिन होय, हित अनहित या जगत में जान
परत सब कोय। अब तो बस वह देखना चाहता था कि इस ग्रूप में आखिर उसके साथ रह कितने जाते
हैं। किसी की बात किसी से खराब लगे, असहमति हो सकती है, लेकिन इस ग्रूप का सारा दारोमदार
तो कौस्तुभ खुद पर समझता था। शायद था भी। बल्कि कभी-कभी उसे परिवार के बहुत छोटे से
सदस्य का वह मैसेज बहुत अच्छा लगता जिसमें लिखा होता-चाय वाला पीएम बन गया, दसवीं फेल
सीएम बन रहे हैं और एमबीए पास व्हट्सएप ग्रूप एडमिन बनकर सोच रहे हैं जैसे बहुत बड़ा
तीर मार लिया। कौस्तुभ की यही इच्छा रहती कि उसके ग्रूप में इसी तरह के प्रहसन हों।
उसे लेकर भी हों। लेकिन उसके साथ कभी भी कहां हुआ ऐसा। इस ग्रूप की बातों के बहाने
वह अपनी बातें रखना चाहता, दूसरों की सुनना चाहता। इस ग्रूप के कई ग्रूप बन गये। कुछ
पर गुजारिश काम आई कि अब इसमें मैसेज मत भेजा करो। कुछ पर किसी के करीबी होने के बावजूद
कोई असर नहीं रहा। वह लगातार इसके संपर्क में बने रहते। कभी गुड मार्निंग तो कभ गुड
नाइट और कभी-कभी कोई जोक। बीच-बीच में कुछ अतिवादी मैसेज आ जाते। कौस्तुभ का मन करता
कि ऐसे लोगों को टोके, लेकिन ‘नाकवालों’ की चिंता उसे होती। बुरा न मान जायें। फिर
भी वह कभी-कभी अपनी बात कह जाता। ‘अतिवादी मैसेज न भेजें, यह तो प्रहसन का मंच है।’
इस तरह के मैसेज वह फारवर्ड कर देता। धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह ही इसका क्रेज भी
कम होता चला गया। जरूरी मैसेज पर वह नजर डालता। परिवार ग्रूप में मैसेज आते, जानकारी
आती। कौस्तुभ भी कभी-कभी अपने मैसेज या कभी कोई खास लिंक भेज देता। अब रुटीन का दुखी
होना उसने छोड़ दिया। कोई ग्रूप छोड़ रहा है, कोई जोड़ने के लिए कह रहा है। किसी ने
बातचीत बिल्कुल बंद कर दी है। इन सब बातों का अब कौस्तुभ पर असर नहीं पड़ रहा था। वह
तो अब इस आभासी दुनिया से अलग हकीकत की दुनिया में लोगों के सही बने रहने की दुआ करने
लगता। क्योंकि व्हट्सएप पर ज्ञान की जितनी बातें होतीं, वह पढ़ने में लगतीं तो अच्छी,
लेकिन कई लोगों ने ज्ञान की बातों का उलटा ही किया। अब वह हकीकत की दुनिया में जी रहा
है। ग्रूप में आये मैसेज को पढ़ लेता। कभी खुश होता है तो एकाध मैसेज खुद भी डाल देता
कभी उदास होता तो दूसरे लोगों के भेजे जोक्स को पढ़ लेता। वह समझ गया था कि एक आभासी
दुनिया के ग्रूप से वह परिवार को पूरी तरह तो नहीं जोड़ सकता। किसी पर जोर जबरजस्ती
भी कैसे करे, अब तो सब सयाने हो गये हैं, बिल्कुल फोन की तरह स्मार्ट।
-केवल तिवारी
Sunday, February 26, 2017
हरियाणा घूमने की शुरुआत एक विवाह समारोह से
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| सेल्फी पूरी नहीं आ पायी। अनाड़ी |
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| हुक्का गुड़गुड़ाते ताऊ |
हम लोग सुबह 8 बजे के करीब एयरपोर्ट चौक रायपुर खुर्द लालबत्ती के पास मिले और शुरू हो गया सफर। असल में हमें जाना था कुरुक्षेत्र से आगे, कैथल के पास बटेठी गांव। मुझ कुछ चीजों का अलग अनुभव हुआ, जिसके लिए मैं अपने ब्लॉग में उन्हें साझा करने को आतुर हो गया। एक तो दीपक जी ने सुनाया फोटो वाला किस्सा। किस्सा कुछ यूं था कि जिस 'जीत्ते' (दीपक जी लोग इसी नाम से पुकार रहे थे) के बेटे और बेटी की शादी में हम लोग जा रहे थे उनकी शादी के दौरान फोटोग्राफी का चलन नहीं था। लेकिन मिस्टर जीत्ते की इच्छा हुई कि फोटोग्राफर को बुलाया जाए। जिम्मेदारी दीपक जी को दी गयी। इन्होंने एक फोटोग्राफर को बुक कर दिया। लेकिन वह बटेढी और बटेठी गांव में अंतर नहीं कर पाया और दूसरी जगह पहुंच गया। दोनों गांवों के बीच तकरीबन 15 किलोमीटर का फर्क होगा। खैर किसी तरह वह फोटोग्राफर थकाहारा शादी में पहुंचा। फेरे चल रहे रहे थे। उसने फटाफट कैमरा तैयार किया और क्लिक करने लगा। तभी कुछ लोग आये और उसे पीटते हुए बाहर लाये। तब पता चला कि फोटो तो खींच ही नहीं सकते। पूरा माजरा सबके सामने स्पष्ट होने से पहले वह बेचारा पिट चुका था। अब समय बदल गया। इस दिन जब हम वहां पहुंचे तो जगह-जगह फोटो खिंचवाने के लिए लोग समूह में खड़े हो रहे थे।
एक बात मुझे वहां पहुंचकर अच्छी लगी कि किसी ने भी यह अहसास नहीं होने दिया कि मैं 'बिन बुलाया मेहमान हूं।' अनजान भी दुआ-सलाम करते रहे। एक जगह तो मैं कुछ देर अकेला बैठा रहा (असल में दीपक जी की कार के पीछे एक और कार खड़ी हो गयी, जब चलने लगे तो उनका पता नहीं था, उसी को ढूंढने दीपकजी चले गये) वहां दो-चार बुजुर्ग आये। सबने राम-राम की। हालचाल लिया। कई बातें होने के बाद यह पूछताछ हुई कि मैं कौन हूं? उसके बाद एक बुजुर्ग हुक्का भरकर लाये और मेरी तरफ खिसका दिया। मैं मुस्कुरा दिया। मैंने कहा, 'हुक्का आप पीयो मैं आपकी फोटो खींचता हूं।' वैसे पहले वाले किस्से के बाद मैं थोड़ा घबरा रहा था, लेकिन 'ताऊ' तुरंत फोटो खिंचवाने को तैयार हो गये और उन्होंने कैमरे की तरफ देखते ही गुड़गुड़ शुरू कर दी।
इससे पहले एक और वाकया हुआ, जिसका जिक्र करना चाहता हूं। कुछ बुजुर्ग हमारे साथ बैठे थे। मैं और दीपक जी अपने कुछ दोस्तों के बारे में बात कर रहे थे। ऐसे दोस्त जो 'प्रयोगधर्मी' बहुत हैं। कुछ उसमें से सफल नहीं हो पाये। तभी बुजुर्ग महोदय बोले, 'पूरा बाणिया बणणा पड़ै सै तब जाकर बिजनेस हुआ करै।' मैंने उनकी बात से इत्तेफाक जताते हुए सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपनी बात बतायी कि उनके पास 35 भैंसे हैं। अच्छा धंधा चल रहा है। उन्होंने कहा कुछ झोटे (भैंसा) हैं। एक नाम 'आसाराम' है। हम मुस्कुराये बिना रह नहीं पाये।
हरियाणा की सदाबहार मिठाई को कैसे नजरअंदाज कर दें। जिस शादी में हम लोग गये थे वहां अन्य चीजों के अलावा सबसे बड़ा स्टॉल मिठाई का था। मजे की बात यह थी कि लोग मिठाई भी भोजन की तरह थाली में परोसकर ले रहे थे। मुझे इस मौके पर हरियाणा के मिठाई के कई किस्से याद आए। एक वह भी कि एक जगह एक हरियाणवी बहुत देरी से पहुंचे। खाना खत्म हो चुका था। मिठाई भी। किसी बुजुर्ग ने सलाह दी कि चीनी पीसकर (खांड) उसमें घी मिलाकर फटाफट लड्डू बना दो। लड्डू तैयार कर ताऊ को दिये गये। पूछा गया मिठाई कैसी थी, वह सज्जन बोले, 'सब ठीक था बस थोड़ा मीट्ठा कम रह गया।'
एक दुखद वाकया भी हुआ। जिस शादी में हम गये वहां कोई धूम-धड़ाका नहीं था। पता लगा ढाई लाख में बुक किया गया डीजे कैंसल कराया गया। इसकी वजह थी शादी की पिछली रात पास के ही एक युवक का सड़क हादसे में मारा जाना। लोग उस वाकये को लेकर दुखी भी थे। सड़क हादसों पर कब नियंत्रण लगेगा। कभी हमारी गलती से होते हैं, कभी दूसरों की और कभी सड़क निर्माण की गलतियों की वजह से। लापरवाही का कॉकटेल अक्सर जानलेवा हो जाती है।
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