indiantopbligs.com

top hindi blogs

Wednesday, September 20, 2023

गणपति का साथ, आशा, निराशा और जीवन की बात

 केवल तिवारी

प्रथम पूज्य गणेश भगवान की पूजा, अर्चना के इस विशेष पर्व यानी गणेश चतुर्थी के मौके पर मन में अनेक प्रकार की उमड़ घुमड़ हुई। घर के रुटीन काम की निवृत्ति के बाद मन कुछ अशांत अशांत सा रहा। फिर अपने ही अंदर से आवाज आई, उठो और सकारात्मक सोच रखो। फिर ईश्वर संवाद में आगे बढ़ा। डायरी लेखन, बेहद छोटा सा संवाद, मानो गणपति कह रहे हों, जीवन आशा और निराशा का संगम है। इसी में विष और इसी में अमृत है। मंथन करो, ढूंढ़ो और सफर पर चल निकलो। यही उत्साह का संचार ही तो है गणेशोत्सव। 



लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने लोगों को एकजुट कर उत्साही बनाने के लिए ही तो शुरू किया था। उत्साह कितने समय तक? उठा मेरे मन में यह सवाल। कुछ लिखने, व्यक्त करने के दौरान ही फिर कुछ कुछ निराशा सी। किसी की हरकत से, किसी के कमेंट से, आर्थिक हालात से, स्वास्थ्य की दृष्टि से, जिम्मेदारी की फेहरिस्त से... ऐसे ही अनगिनत कारणों से। गणपति समझाते हैं, हमारे मन में बैठकर, भूलकर भी किसी का बुरा न सोचो, बुरा करना तो फिर अकल्पनीय ही हो, मत उम्मीद रखो, अपनी वाणी को मधुर ही बनाए रखो। फिर मानव मन हावी, इतना सबकुछ कैसे संभव? आखिर इंसान ही तो हैं। इसीलिए तो इस इंसानी फितरत को बनाए रखो। कुछ समय बाद उनसे मिलना है, उसकी तैयारी। चर्चा। खरीदारी। लेकिन सबकुछ आपके मन मुताबिक होगा, यह उम्मीद ठीक नहीं। आप अपने मन मुताबिक करो। संकल्प आया कि नकारात्मक बातों में खुद को ज्यादा मत उलझाओ। सार्थक चर्चा के बीच, जिम्मेदारी का अहसास भी हो। फिर ये, फिर वो चलता ही रहेगा। 

गजब संयोग है कि गणेशोत्सव के इस आत्मसंवाद के दौरान ही मित्र मनोज भल्ला का ईश्वर के प्रति आस्था और अनास्था का द्वंद्व भरा मैसेज आया। इतना सामान्यीकरण कैसे हो सकता है। मैं आस्तिक हूं, पर अंधविश्वासी नहीं। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं ही सही हूं, लेकिन बिना किसी को कष्ट पहुंचाए मैं अपनी श्रद्धा से जी रहा हूं। चंडीगढ़ में एक दशक तक जिस घर में रहा उसके ठीक सामने शिव मंदिर है। मैं रोज घर के मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद एक लोटा जल मंदिर में भी चढ़ाया करता था, लेकिन सावन के महीने में नहीं जाता। ठीक ठाक भीड़ होती थी, मेरे जाने से शायद किसी का नंबर कट जाता, यही भाव मन‌ में रहता। सामान्य दिनों में भी अगर कोई देवी या सज्जन मंदिर में ध्यानमग्न होता तो मैं लौट आता। आखिर जो व्यक्ति पूजा कर रहा है, वह भी तो सर्वे भवन्तु सुखिन: ही कहता होगा। ऐसे ही जब मैं मित्रों के साथ रहता था, मुझे पूजा के लिए मंदिर की जरूरत नहीं होती थी। समय-समय की बात होती है। कुछ समय के हिसाब से बदल जाते हैं, कुछ गजब का राग द्वेष पाले रहते हैं, जबकि सब जानते हैं कि यह किसी को नहीं पता कि अगले पल क्या होने वाला है। जब हमारा शरीर एक जैसा नहीं रहता तो हमारी आदतें शाश्वत कैसे हो सकती हैं। मेरा मानना है कि पूजा पाठ, आस्तिक या नास्तिक नितांत निजी मामला है। आप ईश्वर के अस्तित्व को मानते हैं तो नहीं मानने वालों को मानने के लिए फोर्स मत कीजिए। नहीं मानने वाले हैं तो मानने वालों की खिल्ली मत उड़ाईये। नितांत पारिवारिक मसलों पर यह नियम थोड़ा लचीला हो सकता है। आप बच्चों से कहते हैं ऐसा करना चाहिए, ऐसा नहीं। बहुत व्यापक विषय है यह। गणपति बप्पा के संदेश को समझिए, यह मैं अपने लिए कह रहा हूं... आशा, निराशा ईश्वर का साथ, आपकी बातों के साथ अपनी बात। .... जारी है चर्चा।

Friday, September 1, 2023

बदल गया है लखनऊ.... पर इस नगरी को ट्रैफिक की तहजीब भी चाहिए, एक छोटी सी यात्रा के बड़े सबब

 केवल तिवारी

मेट्रो की सीढ़ियों से ली गई तस्वीर। नीचे तो सब अतिक्रमण

तहजीब की नगरी कहलाने वाले लखनऊ की एक छोटी सी यात्रा पिछले दिनों संपन्न हुई। उत्तर प्रदेश की राजधानी का यह शहर सचमुच बहुत बदल गया है। यहां मेट्रो आ गयी है। यहां ई रिक्शा हैं। यहां जगह-जगह मॉल हैं। यहां हाईराइज बिल्डिंगें नजर आने लगी हैं। फ्लैट कल्चर डेवलप हो गया है। कारों की चकाचौंध है। अस्पतालों की भरमार है। जगह-जगह मॉल हैं। इन सब बदलाव के बीच कुछ बदलाव मन को कचोटती हैं। यहां भाषायी मधुरता खत्म होती सी लग रही है। यहां ट्रैफिक सेंस की शून्यता से दिल को ठेस पहुंचती है। और भी कई चीजों का अनुभव हुआ जो अच्छे सेंस में तो कतई नहीं है। बस यही कहूंगा कि इस ब्लॉग में जो फोटो मैं शेयर कर रहा हूं, वह खूबसूरत हैं और उनसे लखनऊ की पहचान है। मेट्रो स्टेशन से चारबाग स्टेशन की हैं। इसी के नीचे के नजारा देखेंगे तो आपका दम घुटेगा। सड़क पर अतिक्रमण। जगह-जगह सिगरेट का धुआं उड़ाते युवा वगैरह-वगैरह। कैसा दुर्योग है कि लखनऊ जाने का कार्यक्रम ट्रैफिक शून्यता की दो घटनाओं के चलते ही हुआ। बाइक पर सवार भाई साहब का चोटिल होना और एक पुलिसकर्मी द्वारा रेड लाइट जंप कर भाभी को चोटिल कर देना। गनीमत है कि भाई साहब ने हेलमेट पहना था और गनीमत है कि भाभी ने काफी हद तक खुद को संभाल लिया था, नहीं तो स्थिति और ज्यादा खराब होती। अभी भी उनकी स्थिति परेशान करने वाली तो है ही। इसी ट्रैफिक की राष्ट्रीय स्तर पर बात करूं तो वह भी दुखदायी सी ही रहती है। एक माह पहले जाने का कार्यक्रम था, लेकिन ट्रेन रद्द हो गयी। रेलवे का भी अजब कमाल देखिए कि जो ट्रेन रद्द हुई उसका तो पैसा वापस आ गया, लेकिन लखनऊ से वापसी की ट्रेन टिकट का पैसा काट लिया। यानी आप गए या नहीं, इससे क्या मतलब आपको आना तो होगा ही। यानी बिना जाए आना होगा। खैर... इस बार ट्रेन रद्द होने से खौफजदा होकर मैंने अंबाला से हिमगिरि एक्सप्रेस में टिकट ले लिया। ट्रेन पांच घंटे विलंब से आई। ट्रेन टिकट कराने की आपाधापी में एक गलती भी हो गयी। खैर 'लखनऊ हम पर फिदा, हम फिदा ए लखनऊ' की बात को हमेशा कहने वाला मैं, लखनऊ गया और उसे नए तरीके से महसूस किया। पहले जो लखनऊ को जीया और महसूस किया उससे जुदा। उस लखनऊ का जिक्र मैं अपने पूर्व ब्लॉग (https://ktkikanw-kanw.blogspot.com/2017/09/blog-post.html) पर साझा कर चुका हूं। इसमें कुछ शेर ओ शायदी इधर-उधर से टीपी हैं। मसलन- लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ मीनार नहीं

सिर्फ एक शहर नहीं, कूचा ओ बाज़ार नहीं

इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं

इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं

लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा ऐ लखनऊ

या फिर

दुनिया में कम नहीं, तेरे चाहने वाले तेरी अदा के कायल,तुझपर निसार भी

ए शहरे लखनऊ, तुझको नहीं पता तुझ बिन नहीं संभलता,मेरा कल्बे ज़ार भी

आज का लखनऊ रफ्तार में है। समय के हिसाब से यह रफ्तार जरूरी भी है, लेकिन इस रफ्तार में तहजीब ही बदल जाए, ये बात कुछ हजम नहीं होती। अबे, तबे की भाषा पहले बहुत ही गहरे दोस्तों के बीच होती थी, आज बस या ऑटो में साफ सुनाई पड़ता है, कहां जाओगे, बैठो। एक दशक तक पहले यह भाषा इस तरह होती थी, 'कहां जाइएगा, बैठिए।' मजाक में कहते थे कि लखनऊ वाले गाली भी तहजीब से देते हैं। बदलाव अवश्यंभावी है, लेकिन हर तरफ ट्रैफिक रूल तोड़ते हुए बेतरतीब तरीके से चलना, हॉर्न पर हॉर्न बजाना, लालबत्ती की परवाह न करना, पैदल वालों को महत्व न देना सच में ऐसा लगता है कि यह लखनऊ है या फिर कोई 'बदतमीज शहर।' अतिक्रमण पर, ट्रैफिक व्यवस्था पर अगर अब ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले कुछ वर्षों में स्थिति और विकट हो सकती है। इसलिए लखनऊ को लखनऊ बने रहने दीजिए। बनाए रखिए। हम-आप भी और सरकार भी। सभी से है दिली गुजारिश।

पशुओं में भी गजब की मानवता, और उन बिल्लियों के प्यारे बच्चों की अठखेलियां

पांच घंटे लेट ट्रेन के उबाऊ सफर के बाद लखनऊ तेलीबाग स्थित अपने घर पहुंचा तो भाई साहब, भाभी जी इंतजार कर रहे थे। वहीं बैठी थी लाल रंग की बिल्ली अपने तीन बच्चों के साथ। मुझे देखते ही अलर्ट हो गयी। बच्चों को अपने पास समेट लिया। एक आवाज दी म्याऊं। यह इशारा था कि बच्चो अंदर चलो। अगली सुबह से लेकर दोपहर तक उस बिल्ली का बच्चों को अनुशासित रखने, उनके खाने-पीने और बाहर जाने तक के सिस्टम को देखकर दंग रह गया। सच में पशुओं में गजब की 'मानवता' होती है। वह आंगन (हरियाली के लिए छोड़ी जगह) में बच्चों को ले जाती। फिर अंदर चलने के लिए कहती। दूध पीने का समय हो गया तो उसका भी इशारा हो जाता। बॉल से खेलते बच्चे बहुत अच्छे लग रहे थे, लेकिन उनकी मां को यह शैतानी लगती और समय-समय पर वह म्याऊं-म्याऊं बोलकर आगाह करती। एक-दो बार मैंने उन बच्चों को गोद में लिया तो ऐसे गुर्राई मानो ताकीद कर रही हो कि बच्चे हैं, इन्हें कोई नुकसान पहुंचाया तो खैर नहीं। कुल मिलाकर उस बिल्ली की ममता और बच्चों की शैतानी देखते ही बनती थी। (छोटी सी वीडियो देखिए) 




 लजीज पकवान और लखनऊ की याद

देर रात जब लखनऊ पहुंचा तो आर्गेनिक खेती के केलों के कटलेट और कोफ्ते खाने को मिले। चोटिल भाभी जी और भाई साहब ने स्वादिष्ट व्यंजन बनाया था। सामान्यत: लखनऊ लजीज खाने के लिए जाना जाता है। अगली सुबह पकौड़ों का नाश्ता दिन में कढ़ी, चावल और टपकी का लुत्फ उठाया। प्रसंगवश बता दूं कि मंगलवार शाम बाहर टहलने के लिए निकला। राम भरोसे स्कूल के पास उस गोलगप्पे वाले को ढूंढता रहा जहां कभी कन्नू ले जाया करती थी। वह कहीं नहीं दिखाई दिया। कुछ साल पहले तक मियां बीवी वहां रेहड़ी लगाते थे। फिर मन को तसल्ली दी कि शूगर वालों को कंट्रोल करना जरूरी है, वैसे ही जैसे मैंने रुटीन खान-पान में कर दिया है। एक किलोमीटर वाक के बाद घर आ गया। भोजन, बातचीत और तेजी से निकल गया दिन। सुबह बगल में तिवारी जी के यहां गया। मन था कि कुछ और लोगों से मिल आऊं, लेकिन किंतु परंतु हावी हो गया। अब कभी हफ्तेभर के लिए जाऊंगा और सबसे मिलकर आऊंगा। अगले दिन शीला दीदी के यहां गया, वहां दही भल्ले, छोले और पूड़ी खाने को मिली। दीदी और जीजाजी का व्रत था। मैं और भानजा गौरव ही थे खाने वाले। खानपान के शहर लखनऊ में वक्त बहुत तेजी से निकल गया। आलम यह रहा कि वापसी में भानजे गौरव ने भूतनाथ मंदिर के बाहर से ही दर्शन कराए। फटाफट मेट्रो में बैठकर चारबाग पहुंचा। ट्रेन प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। आपाधापी ऐसी रही कि भावना ने पहली बार रेवड़ी लाने को कहा और नहीं ला पाया। अलबत्ता धवल के लिए तो कुछ आ ही गया था। भागादौड़ी वाला सफर ठीक ही रहा क्योंकि अपनों से मिलने में परेशानियों की क्या बिसात, क्योंकि अपने तो अपने होते हैं। और अंत में दो शेर

जाते हो ख़ुदा-हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है 

जब याद हम आ जाएँ मिलने की दुआ करना

मुझे भी लम्हा-ए-हिजरत ने कर दिया तक़्सीम 

निगाह घर की तरफ़ है क़दम सफ़र की तरफ़

अंबाला स्टेशन पर ट्रेन के इंतजार में


Friday, July 14, 2023

बाढ़-बरसात का झमेला, गधेरे और हरेला

 केवल तिवारी 


इस ब्लॉग को पूरा पढ़ने से पहले उक्त शब्दावलियों का मतलब समझ लीजिए। हो सकता है आप में से अनेक लोग जानते भी हों। असल में बाढ़-बरसात तो कॉमन है और आजकल हर कोई इससे दो-चार हो रहा है, लेकिन गधेरे और हरेला अनेक लोगों के लिए नये शब्द हो सकते हैं। गधेरा शब्द उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का है, इसे गध्यार भी कहा जाता है। गढ़वाल क्षेत्र में भी इसी तरह का शब्द है। गधेरे या गध्यार असल में सहायक नदियां होती हैं। इन्हें बरसाती नदियां भी हा जा सकता है। असल में अमूमन ये गधेरे सूखे रहते हैं, लेकिन जब ज्यादा बारिश होती है तो अपने इन रास्तों से वे नदियों में जाकर मिल जाते हैं। हरेला एक त्योहार है जो सावन की शुरुआत में मनाया जाता है।  

आज इन तीनों की एक साथ बात करने का कारण है हाल में आई भारी बारिश और उसके बाद बनी बाढ़ की स्थिति। इस बार हिमाचल प्रदेश में अनेक जगह वैसे ही हालात बने जैसे करीब दस साल पहले उत्तराखंड में बन गए थे। पर्यावरणविद इस आपदा का जो मुख्य कारण बताते हैं वह है नदियों की सहायक नदियों यानी बरसाती नदियों में अतिक्रमण। ऐसा ही तो हुआ है। मुझे याद है कि उत्तराखंड में हमारे बड़े बुजुर्ग कहा करते थे कि कभी गधेरों के आसपास मत जाना। कहा जाता था वहां भूत-प्रेत रहते हैं। यह बात अंधविश्वास हो सकती है, लेकिन भूत-प्रेत का डर दिखाना आज प्रासंगिक लगता है। जहां जानेभर से डराया जाता था, उसके आसपास कोई निर्माण करने की हिम्मत कैसे करे? हां, आज नदियों के किनारे दूर-दूर तक निर्माण हो चुके हैं। उन बरसाती नदियों के किनारे जो अमूमन सूखी दिखती हैं। ऐसे ही मैदानी इलाकों में यमुना के खादर क्षेत्र में ऐसा हुआ है। तो समझिये इशारा और नदियों की जमीन पर कब्जा मत कीजिए। 

मेरे घर में हरेला

अब बात हरेला की। असल में प्रकृति से जुड़े रहने का संदेश है हरेला। हरेला उगाना, सुख-समृद्धि की कामना के साथ सिर पर रखना। डिकारे बनाना। कई रीति-रिवाज हैं। डिकारे शिव-पार्वती के मिट्टी से निर्मित मूर्तियों को कहा जाता है। हम सब जानते हैं कि मानव और पर्यावरण का अनूठा संबंध है। हमारे रीति-रिवाज इस संबंध को बनाये रखने का संकेत देते हैं, लेकिन हम कई बार उसे भुला देते हैं। संबंध बनाए रखेंगे तो उसके अनेक लाभ हैं। हरेले के त्योहार यानी सावन की शुरुआत से करीब दस दिन पहले सात अनाजों को छोटी-छोटी टोकरियों में बोया जाता है। सावन की शुरुआत पर इसे काटा जाता है फिर आशीर्वाद स्वरूप सिर पर रखा जाता है। सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। आमतौर पर घर की महिलाएं हरेले को अन्य सदस्यों को आशीर्वाद स्वरूप उनके सिर में रखती हैं। सामान्यत: बेटियां ऐसा करती हैं। असल में बेटियां ही तो उत्सव सरीखी होती हैं। इसी उत्सवधर्मिता को बनाये रखने के लिए त्योहारों पर बेटियों को विशेष तवज्जो दी जाती है। प्रकृति, मानव का संबंध और अन्य रीति रिवाजों पर आगे बात होती रहेगी।

Tuesday, June 20, 2023

जिक्र करना तो बनता है, आखिर यात्रा थी हमारी

केवल तिवारी 

घूम आए, मिल आए। इधर गए, उधर गए और लौट आए। पहाड़ घूमने के सपने संजोए। कार्यक्रम कुछ बना और हुआ कुछ। असल में हमारे-आपके हाथ में कहां कुछ होता है। हम तो चलते हैं और ऊपर वाला हमें चलाता रहता है। खैर अंत भला तो सब भला। सिलसिलेवार संक्षेप में कुछ कह डालता हूं। 

पत्नी भावना के मूल मायके (उत्तराखंड के द्वाराहाट में सग्नेटी) में पारिवारिक पूजा का कार्यक्रम पिछले लंबे समय से बन रहा था और मुल्तवी हो रहा था। यूं तो हमारी ओर से किसी के शामिल होने की कोई वाध्यता नहीं थी, लेकिन ऐसा संयोग बना कि भावना और छोटा बेटा धवल 29 मई को काठगोदाम पहुंच गए और उसके एक-दो दिन बाद द्वाराहाट। मैं चंडीगढ़ से बड़े बेटे कार्तिक के साथ गाजियाबाद से होते हुए पहुंचे पांच जून को। गाजियाबाद से हमारे साथ बेंगलुरू से आए विनोद पांडे जी भी हो लिए। पूरा सफर बहुत आनंददायक रहा। काठगोदाम से धवल और भावना को लिया और सीधे चोरगलिया प्रेमा दीदी के पास। वह डेढ़ साल से घर में ही है। जीजाजी की बहुत याद आई। वह दसियों बार तो फोन कर पूछ चुके होते और घर पहुंचने से पहले ही सड़क पर खड़े होते। सम्मान, पूछताछ में कहीं कोई कमी आज भी नहीं रही, लेकिन उनकी जगह कौन भर सकता है।खैर... मनोज और दीदी इंतजार में बैठे थे। मनोज की पत्नी, दोनों बच्चियों से भी संवाद हुए। थोड़ी-बहुत घर-परिवार की बात हुई। बेटी जीवा के पैर में चोट ने परेशान किया।अगले दिन दीदी और छुटकी तनिष्का को लेकर नानकमत्ता चले गए। भयंकर गर्मी और नानक सागर डैम के सूखे होने से कोई खास आनंद नहीं आया। हां, गुरुद्वारे में जाकर आध्यात्मिक शांति मिली। वहीं लंगर छका और लौट आए।कार्यक्रम था दीदी को साथ लेकर दो-चार दिन कहीं घूमने का, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। यहां वही बात फिर कि कार्यक्रम हम कहां बनाते हैं। काठगोदाम में शेखरदा के ससुर यानी सिद्धू के नानाजी अस्वस्थ थे। उनके परिवार के साथ ही कहीं जाना था। शेखरदा कुछ नौकरीगत व्यस्तताओं में घिरे थे। लिहाजा विशेष टूर की कोई योजना नहीं बन सकी। हमारा हाल उसी तरह हो गया जिसे किसी शायर ने इस तरह पेश किया है- 

न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं, अजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं। 

सबसे पहले चोरगलिया। फिर नानकमत्ता। फाइनली कोटाबाग वाले सुरेश पांडे जी यानी मेरे साढू भाई ही काम आए। पहले पहल तो उन्होंने भी कहा कि उनकी कुछ व्यस्तताएं हैं, लेकिन फिर मेरा आग्रह नहीं टाल पाए और हम करीब 11 लोग निकल पड़े। दिन में पांडेजी के मित्र जोशी जी के यहां। हमारे लिए नितांत अनजान व्यक्ति, लेकिन आवभगत ऐसी कि जैसे वर्षों बाद कोई बिटिया मायके आई हो। शब्द नहीं हैं उनके अपनेपन को बयां करने के लिए। वापसी में बहुत सारा सामान भी रख दिया गाड़ी में। उनकी बिटिया पायल भी हमारे साथ अगले दिन के सफर में गयी। बेटा पारस हनुमान धाम तक। ऐसा इत्तेफाक बना कि उनकी सभी दीदीयों, बहनों से भी मुलाकात हो गयी। फिर भानजे मनोज के ससुर के रिसॉर्ट में रुके। उन्होंने लीज पर दिया है। जाहिर है वहां टिकने खाने का भुगतान देना है, लेकिन कांडपाल जी पल-पल हमारी खैर-ख्वाह लेते रहे और नाश्ते, लंच और डिनर की विशेष व्यवस्था करवा दी। पहले भी उनके साथ मिलना हुआ। इस बार मिले तो जीजा जी यानी मिश्रा जी को बहुत याद किया। पांडे जी भी कहते रह गये कि कभी मिश्रा जी से मिलने चोरगलिया जाएंगे। क्या कर सकते हैं नियति को यही मंजूर। मैंने प्रिय ईशू यानी इशान पांडेय यानी पांडेय जी के सुपुत्र को उन जगहों का नाम लिखकर भेजने को कहा था, जहां-जहां हम घूमे, लेकिन शायद वह भूल गया। इस बार वह 10वीं पास कर 11वीं में गया है और करिअर के अहम पड़ाव में है। हम पांडेजी के घर कोटाबाग ईजा से भी मिलकर आये। उनका अपार स्नेह मिला। यह सफर हल्द्वानी, कोटाबाग, रामनगर, गैबुआ के इर्द-गिर्द घूमता रहा। आते वक्त हरिद्वार में गंगा स्नान फिर ऋषिकेश का कार्यक्रम बन गया। ऋषिकेश में मित्र अनुराग ढौंडियाल जी ने एक धर्मशाला में व्यवस्था कर दी। वहां गंगा आरती देखने का भी अलग आनंद आया। इस सफर में नदी-नाले, धारे, झरने और भी बहुत कुछ। कुछ बातें तस्वीरें कहेंगी। तस्वीर साभार : नेहा जोशी, मुन्नू या शायद साक्षी पांडे, ईशू, धवल और कार्तिक। इस सफर के रोचक दोस्त प्रहील को कैसे भूल सकते हैं। ज्योति का बेटा हमारे साथ तो नहीं गया, लेकिन जितनी देर उसका सान्निध्य रहा बस मजा आ गया। अभी बहुत छोटा है, फुर्तीला है। आनंददायक है। जब जिक्र करने की बात आई तो भानजी रुचि, दामाद दीपेश और प्यारा बच्चा रीषू यानी ऋषि पंत की बात कैसे रह जाए। परेशान रहते हुए भी रुचि हमेशा स्वादिष्ट भोजन कराती है। रिशू तो कमाल है। नानू-नानी कहते हुए उसका मन करता है कि जो मेहमान आए हैं, वे यहीं रह जाएं। इस सफर के सभी हमसफरों का दिल से शुक्रिया। सफर से संबंधित कुछ शेर हमेशा की तरह इधर-उधर से टीपकर यहां लिख रहा हूं- 

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर 

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया  

किसी को घर से निकलतेही मिल गई मंज़िल  

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा 

आए ठहरे और रवाना हो गए,  

ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है 

चले थे जिस की तरफ़ वो निशान ख़त्म हुआ,  

सफ़र अधूरा रहा आसमान ख़त्म हुआ
















Saturday, May 27, 2023

दो ऐतिहासिक स्थल, अलग अनुभूति : यादें... बातें और मुलाकातें

केवल तिवारी 

नौकरी पेशा जीवन के दौरान और चलने फिरने वाली उम्र रहते ही जितना संभव हो यात्राएं वात्राएं कर लेनी चाहिए। ये चाहे धार्मिक हों या पर्यटन संबंधी। वैसे धार्मिक यात्रा भी एक तरह का पर्यटन ही तो है। पर्यटन की बात अगर की जाये तो पिछले दिनों मैं एक रिसर्च पढ़ रहा था। उसमें लिखा था कि अगर कहीं जाकर हम फोटो या सेल्फी लेने में ही व्यस्त हो जायें तो उस स्थान विशेष की यादें हमारे मन मस्तिष्क में टिक नहीं पाती। इसके उलट हम अगर एक-दो स्पॉट पर फोटो खींचकर मोबाइल एवं कैमरा को बंद कर लें तो यादें ज्यादा दिनों तक बनी रहती हैं और हम उसकी चर्चा भी अक्सर करते हैं। मुझे इस रिसर्च में दम भी नजर आया। अक्सर देखने में आता है कि घूमने के लिए कहीं जाने पर लोग ज्यादातर समय फोटो खींचने या सेल्फी लेने में बिता देते हैं। ऐसे में हम उस स्थान विशेष के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं जुटा पाते और इसी वजह से वहां की यादों को अपने मन-मस्तिष्क में नहीं बिठा पाते। खैर यह तो हो गयी यादों-वादों की बातें। मैं बात कर रहा हूं कुछ समय पूर्व की अमृतसर यात्रा एवं दिल्ली की संक्षिप्त यात्रा की। 







यूं तो इन यात्राओं को संपन्न हुए दो से तीन महीने हो गए, लेकिन इनके बारे में लिखना अब हो रहा है। चूंकि पहले अमृतसर गया था इसलिए वहां की बातें पहले। फिर दिल्ली की। वैसे दिल्ली-एनसीआर में इससे पहले मैं 1996 से 2013 तक रहा। लेकिन उस दौर में ज्यादा घूमना नहीं हुआ, जबकि अब दिल्ली से दूर आ गया हूं तो लगता है दिल्ली दूर नहीं।  

अब चलते हैं अमृतसर। अचानक घूमने का यह कार्यक्रम बना मार्च अंत में। उस वक्त खालिस्ताान समर्थक अमृतपाल का मुद्दा छाया हुआ था। कुछ पारिवारिक लोग भी जाने को तैयार हुए, लेकिन ऐन मौके पर उनका आना रद्द हो गया। चूंकि रिजर्वेशन साथ ही कर रखा था, मेरा मन भी थोड़ा डिगा। फिर परिवार में चर्चा के बाद तय हुआ कि हम लोग तो चलते ही हैं। क्योंकि बेटे धवल की सालाना परीक्षा हो चुकी थीं और कुछ दिन की छुट्टियां चल रही थीं। मुझे भी ऑफिस से आसानी से छुट्टी मिल गयी। हालांकि बड़ा बेटा कार्तिक फ्री नहीं था। खैर फाइनली हम तीन निकल पड़े। चंडीगढ़ से सुबह 6 बजे की ट्रेन थी। वहां पत्नी को कोई जानकार मिले और उन्होंने हमारे कदम पर सवालिया निशान उठाये और कहा कि इस वक्त क्यों जा रहे हैं। अमृतपाल का केस चरम पर है। मैंने इस मुद्दे को इग्नोर करने के लिए कहा। मित्र नरेंद्र कुमार के जरिये विक्रम जी से बातचीत हुई। उन्होंने स्वर्ण मंदिर परिसर में ही रहने का इंतजाम करवा दिया।  

सुबह हो या शाम, स्वर्ण मंदिर की आभा में खो से गये हम सब 

जिस दिन अमूतसर पहुंचे उसी शाम को हम तीनों सबसे पहले गुरु घर में माथा टेकने पहुंचे। पहले शाम को परिक्रमा कर गुरु ग्रंथ साहिब के दर्शन किए। शीश नवाया। उसके बाद बाहर शनि मंदिर गये। फिर सराय में आकर थोड़ा विश्राम किया और तय किया कि लंगर छकने से पहले गुरुद्वारे की स्वर्णिम आभा को निहारा जाये। हम लोगों ने पीछे वाले दरवाजे से ही प्रवेश किया और जल तरंगों में इठलाती गुरुघर की स्वर्णिम आभा को बस देखते ही रह गये। फिर हम परिक्रमा करते हुए फ्रंट गेट की तरफ पहुंचे। लोगों का हुजूम मंदिर में मौजूद था। घूमकर हम लोग लंगर घर में आये और प्रसाद छका। साथ ही इस पर भी चर्चा की कि सचमुच धार्मिक उद्देश्य यही होना चाहिए कि हर किसी को भोजन मिले। इसके साथ ही कुछ लोगों के प्रति गुस्सा भी आया जब उनके जेब में गुटखा एवं पान मसाला मिला और उन्हें समझाना पड़ा। बुरी आदतों को छोड़ना चाहिए। कम से कम ऐसे पवित्र स्थलों पर तो तन, मन से शुद्ध होकर जाना चाहिए। कहा भी तो गया है कि मनसा, वाचा और कर्मणा हमें शुद्ध रहना चाहिए।  

अटारी-वाघा बॉर्डर और दिल्ली का कर्त्तव्य पथ 








चूंकि इस ब्लॉग को लिखने में बहुत विलंब हो गया है इसलिए अटारी-वाघा बॉर्डर एवं दिल्ली के कर्त्तव्य पथ की चर्चा साथ-साथ। असल में अमृतसर यात्रा के कुछ दिनों बाद ही हमारा दिल्ली जाना हुआ और वहां नव निर्मित कर्त्तव्य पथ एवं शहीद स्मारक को देखा। पहले बाद अटारी बॉर्डर की। हम लोगों ने सुबह ही एक ऑटो वाले से बात कर ली। उसने एडवांस में पैसे लिए और करीब दो बजे हम लोग अटारी बॉर्डर के लिए निकले। वहां जाने से पहले डिप्टी कमांडेंट विजय कुमार जी के सहयोग से रामजी लाल ने सीटों की व्यवस्था कर दी। देशभक्ति का ऐसा ओजस्वी नजारा पहले कभी नहीं देखा। मैं तो एक बार पहले भी यहां आ चुका था, लेकिन इस बार आनंद कुछ ज्यादा बढ़ गया। पाकिस्तानी पाले में महज 20-30 लोगों को देखकर तरस सा आया और हमारे बीच चर्चा होने लगी कि यहां का उत्साह देखकर तो उनका मन भी यही करता होगा कि वे भी इसी तरफ आ जायें। सचमुच अवाम तो सब समान ही होती है, सियासत सब गड्डमड्ड करती है। खैर जोश के उस वातावरण को हमने नये तरीके से जीया। इसके कुछ समय बाद हम लोग दिल्ली के कर्त्तव्य पथ पर गये। यहां वह परिवार भी साथ रहा जिनके साथ हमने अमृतसर जाना था और वे लोग किन्हीं कारणों से आ नहीं सके। लेकिन भास्कर को जरूरी काम आ गया, हां अपने साथी भव्य को साथ लेकर धवल प्रसन्न रहा और प्रीति को लेकर भावना। मैं उस वक्त अकेला था, लेकन रात में भास्कर का साथ पाकर मुझे भी आनंद आ ही गया। कर्त्तव्य का नया रंग-रूप सचमुच उत्साहजनक है। साफ-सफाई तो देखते ही बनती है। खाने-पीने के स्टॉल एक ही जगह पर नियत करने से खूबसूरती और बढ़ गयी है। स्मारक के पास जवानों के साथ बच्चों ने फोटो खिंचवाये। कुछ देर पैदल चलने में थकान की अनुभूति करायी। चिल्ड्रन पार्क में झूलों का आनंद लिया। इंडिया गेट परिसर में कुछ और समय निकालकर कभी दिन के वक्त भी जाना जरूरी है। मौसम गुलाबी होगा तो फिर एक बार यहां की यात्रा करने की कोशिश होगी। बातों की इन बातों पर बता दूं कि इसी बीच, गाजियाबाद में हमारे पड़ोसी और हमारे लोकल गार्जन कहलाने वाले शर्मा जी एवं भाभी जी पहुंचे। उनकी बिटिया सोनाली और दामाद एवं बिटिया की बिटिया से मुलाकात हुई। एक दिन की संक्षिप्त यात्रा पर आए इन लोगों से काफी विस्तार से चर्चा हुई। ऐसे मेल-मिलापों का दौर चलता रहना चाहिए।  

Friday, April 28, 2023

दुबई यात्रा : बातें-वातें और कल्पनाओं के पंख

 केवल तिवारी 


दुबई की एक शाम, भांजों के नाम।


यहां लोगों में ट्रैफिक सेंस गजब का। पैदल चलने वाला कोई व्यक्ति सड़क पार कर रहा हो तो बड़ी-बड़ी गाड़ियां भी रुक जाती हैं। शाम का नजारा एकदम अलग ही होता है। भारत और पाकिस्तान के लोग बहुतायत में हैं। भाषा और भोजन जैसी दिक्कत नहीं आती। और भी बहुत कुछ है, जानने, समझने और आनंद लेने के लिए। ये बातों मैं अपनी स्मरण शक्ति के आधार पर कर रहा हूं। दुबई के बारे में सबसे पहले भानजे सौरभ ने किया था। वह करीब चार सालों से वहां जॉब कर रहा है। उसके बाद दीदी-जीजाजी वहां गये। उन्होंने कई बातें बताईं। जीजाजी द्वारा कहे गए लूलू मॉल के बारे में बच्चे बहुत आनंद लेते हैं। उनको पहले यह नाम अजीब लगता था, लेकिन जब से इसी मॉल की एक शाखा लखनऊ में खुल गई है, तब से उन्हें विश्वास हो गया है कि हां यह बहुत प्रसिद्ध मॉल है। खैर… आते हैं दुबई पर। यह ब्लॉग आज इसलिए कि पिछले दिनों दो भांजे गौरव और कुणाल भी दुबई से लौटे हैं। ये दोनों अपने बड़े भाई यानी सौरभ के निमंत्रण पर वहां गये। वहां जाकर भी मुझसे व्हाट्सएप के जरिये बातचीत होती रही। वीडियो कॉल जैसी भी आजकल सुविधाएं हो चुकी हैं। दोनों ने जो बातें की उससे अंदाजा लगा कि दुबई महंगा तो है, लेकिन अनुशासित है। अनुशासन बहुत जरूरी है। खासतौर पर ट्रैफिक सेंस तो बहुत जरूरी। हमारे देश के कुछ राज्यों को छोड़ दें तो ज्यादातर जगह ट्रैफिक का बेड़ा गर्क है। कुछ इलाकों में तो इसी घटिया ट्रैफिक सेंस की वजह से जाम लगता है और एक्सीडेंट होते हैं। वैसे यात्रा वृतांत में दीदी ने बताया था कि वहां चोरियां भी नहीं होती। घर के बाहर भी अगर कोई डिलीवरी बॉय सामान रख जाये तो उसे कोई नहीं लेता। सख्त कानून का असर है शायद यह। भानजों ने बताया कि मौसम भी वहां सामान्य रहता है। 





सचमुच दुबई एक प्रकार से इमारतों की नगरी है। रेतीला इलाका है, लेकिन वहां लोगों ने मेहनत और इच्छाशक्ति के जरिये इतनी हरियाली कर दी है कि आज वह औरों के लिए मिसाल बन गयी है। यात्रा करती रहनी चाहिए और यात्रा वृतांत भी लिखते-सुनाते रहने चाहिए। आज दुबई की बस इतनी सी बात। विस्तार से फिर कभी। बस यहां पर एक मशूहर शेर याद आ रहा है 

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ, ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ। 

अपने सफर के साथ ऑन लाइन माध्यम से मुझे हमसफर बनाने के लिए भानजों, दीदी और जीजाजी का दिल से धन्यवाद

Tuesday, April 25, 2023

योगवासिष्ठ महारामायणम : जीवन दर्शन पर शोधपरक सामग्री

केवल तिवारी

आज एक किताब की संक्षिप्त चर्चा करूंगा। किताब का नाम है, ‘योगवासिष्ठ महारामायणम।’ लेखक हैं डॉ. कुलदीप धीमान। किताब से पहले लेखक पर बातचीत जरूरी। 

असल में 10 वर्ष पहले जब मैंने दैनिक ट्रिब्यून ज्वाइन किया तो कुलदीप साहब से अखबार के काम के सिलसिले में मुलाकात हुई। कई दिनों तक बात होती रही। फिर हम लोग ऑफिसियल काम से इतर भी बातचीत करने लगे। बातों बातों में पता चला कि डॉ. कुलदीप की अध्यययन और लेखन में भी गहरी रुचि है। उन्होंने अपनी एक पुस्तक ‘परम विद्रोही’ की चर्चा की और एक प्रति मुझे भी दी। यह किताब ओशो रजनीश और उनकी बातों पर आधारित है। इस किताब को पढ़ने के बाद भी मैंने अपनी प्रतिक्रिया अपने इसी ब्लॉग पर लिखी, जिसका लिंक इस लेख के अंत में डाल दूंगा। खैर… अब आते हैं आलोच्य पुस्तक पर। असल में इस किताब को मैं तब भी पढ़ चुका हूं, जब यह आकार ले रही थी। लेकिन उस वक्त पढ़ने का मकसद कुछ प्रूफ संबंधी गलतियों को मार्क करना था। वह एक काम जैसा था। बाद में कुलदीप जी से मेरी बातचीत लगभग नहीं के बराबर ही हुई। कुछ समय पहले अचानक उनका फोन आया और उन्होंने बताया कि किताब आ चुकी है। मेरी जिज्ञासा पुस्तक को देखने की थी। मैं उन दिनों चंडीगढ़ से बाहर गया हुआ था। तभी धीमान साहब ने बताया कि वह एक प्रति मेरे लिए ऑफिस में छोड़ गए हैं। कुछ दिन पुस्तक यूं ही रखी रही। बाद में मैंने इसे पढ़ना शुरू किया। समीक्षार्थ मिलीं हों या मैंने शौकिया खरीदी हों, करीब हजार पुस्तकें अब तक पढ़ चुका हूं। आदतन भूमिका और अन्य लेखकों की राय और लेखक के बारे में भी जरूर पढ़ता हूं। कई बार प्रकाशक की ओर से की गयी टिप्पणी भी। यही मैंने इस किताब के संदर्भ में भी किया। पढ़ते-पढ़ते देखा कि भूमिका में डॉ. कुलदीप जी ने मेरे नाम का भी जिक्र किया है। मैंने फोन पर धन्यवाद देने के साथ-साथ यह भी कहा कि मेरा तो ऐसा कोई योगदान ही नहीं था। फिर उनसे कुछ अन्य बातें हुईं। मैंने कहा कि पुस्तक पूरी पढ़ने के बाद अपनी राय दूंगा। कुलदीप जी बोले, आपने तो पढ़ ही रखी थी, मैंने कहा, लेकिन मजा अब आ रहा है। सचमुच दूसरी बार किताब पढ़ते-पढ़ते जीवन के कई पहलू समझ में आए। योगवासिष्ठ में भगवान राम के जरिये संवाद की बात हो या फिर ब्रह्म भाव, जीवन दर्शन की एक अलग मीमांसा इस किताब में नजर आती है। डॉ. धीमान द्वारा शोध के जरिये लिखी गयीं कुछ पंक्तियों पर गौर फरमाइये- राम संवेदनशील हैं। स्वयं उनके पास सब कुछ है, पर वे दूसरों के दुःखों के प्रति अन्धे नहीं हैं। उनके पास सब होते हुए भी वैराग्य हुआ है। यह उनकी परिपक्वता की निशानी है। इसीलिये भगवद्गीता तो युद्धक्षेत्र में कही गई, पर योगवासिष्ठ राजदरवार की शान के बीच कहा गया। युद्धक्षेत्र में वैराग्य उठना बड़ी बात है, पर राजदरबार के धन वैभव के बीच अगर किसी को वैराग्य उठे तो यह और भी बड़ी बात है। यह उसकी संवेदनशीलता का प्रमाण है। यह उत्तम वैराग्य है। 

वसिष्ठ कहते हैं कि कल्पना शक्ति या विरक्ति भाव ब्रह्म का स्वभाव ही है। संसार ब्रह्म से ऐसे उत्पन्न होता है जैसे पुष्प से गन्ध। यह मन में स्वप्न की तरह उत्पन्न होता है। सपने में हम कितना कुछ देखते हैं। सब जोन और सत्य लगता है। स्वप्रजगत् का हम क्या कारण बता सकते हैं कि कब बना, क्यों बना? कहना ही है तो इतना ही कहा जा सकता है कि स्वप्न का कारण है हमारी नींद (अज्ञान)। 

संसार के चार बीज 

वासिष्ठ के अनुसार संवेदनम्, भावनम्, वासना, और कल्पना चार बीज हैं जिनसे यह संसार बनता है। जो इन्द्रियों से भोगा जाता है उसे 'संवेदनम्' कहा है। भोग्य वस्तुएं जय नहीं होतीं तो उनके बारे में निरन्तर सोचते रहने को 'भावनम्' कहा है। बार-बार सोचने पर जब मन उनपर स्थिर हो जाता है उसे 'वासना' कहा है। 

कार्य-कारण का रहस्य 

कार्य-कारण सिद्धान्त की विचित्रता है कि आप जो भी ही बात को चरम तक ले जाये तो आप को अपना ही सिद्धान्त भारी पड़ जाता है। अधिकतर तो हम चरम तक जाने का साहस ही नहीं उठा पाते, जब लगने लगता है कि सिद्धान्त डगमगा रहा है, हम रुक जाते हैं। 

आदि शङ्कराचार्य के गुरु गोविन्दाचार्य के भी गुरु ने यह साहस जुटाया और सिद्ध किया कि कार्य कारण व्यावहारिक जीवन के लिये उपयोगी है, पर अगर इसे गहराई से देखा जाये तो यह अर्थ सिद्ध होता है। गौडपाद की बात यहां इसलिये की जा रही है कि की तरह वे भी मानते हैं कि जगत् का कोई कारण नहीं है, इसलिये यह ह संगत नहीं है कि जगत् को किसने बनाया। जगत् को किसी ने नहीं बनाया वह नित्य है, 'अज' अर्थात् अजन्मा (इटर्नल) है। इसीलिये इस मत को 'अजातिवाद' कहते हैं, जिसकी थोड़ी-बहुत चर्चा हम प्रस्तावना में कर चुके हैं। 

जिन्हें समाज अच्छे कर्म मानता है, उनके लिये वह हमें सम्मान देता है, और जिन्हें बुरे कर्म समझता है उनके लिये दण्ड देता है। ऐसा न हो हो अराजकता फैलती है। 

योग, संक्षिप्त चर्चा का कारण 

अब हम योग की चर्चा संक्षिप्त में करेंगे क्योंकि वसिष्ठजी इसे बहुत अधिक महत्त्व नहीं देते। उनके विचार में योगमार्ग ज्ञानमार्ग से अधिक कठिन है। यह वात विचित्र लगेगी क्योंकि साधारणतः तो ज्ञानमार्ग को कठिन माना जाता है क्योंकि उसमें तर्क, भाषा, सिद्धान्त आदि का सहारा लिया जाता है। 

'आत्मा-अनात्मा', 'कार्य-कारण', 'विषय-विषयी' आदि शब्द सुन कर बहुत से लोग घबरा जाते हैं। वे तो चाहते हैं कि उन्हें योग की कुछ मुद्राएं बता दी जायें, या कोई मन्त्र दे दिया जाये जिसे वे जपते रहें, पर ऐसी बात न करनी पड़े जिसमें अधिक सोचना पड़ता हो। सच तो यह है कि ध्यान -और मन्त्र मन को सोचने से रोकने के लिये ही विकसित किये गये हैं। 1 ज्ञानमार्ग के समर्थक मानते हैं कि योगमार्ग कठिन है क्योंकि उसमें कुछ करने पर बल दिया जाता है। स्वयं को जानने के लिये किस प्रकार के कर्म करने की आवश्यकता… 

वसिष्ठजी से राम पूछते हैं कि ज्ञानी समाज में कैसा व्यवहार करते हैं, उनके लक्षण क्या हैं? वसिष्ठ कहते हैं कि मोक्ष के बाद ज्ञानी का कैसा व्यवहार होगा इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ जीवन के कर्तव्य करते रहते हैं, कुछ समाज को त्याग देते हैं, और कुछ संसार के भोगों का आनन्द लेते हैं। ज्ञानी न तो कुछ करने का बहुत आग्रह करते हैं, न ही न करने का। जो सहजता हो जाये वही करते हैं। 

वसिष्ठ कहते हैं कि बोध ही वास्तविक त्याग है, कर्म का त्याग करना त्याग नहीं है। जो योगी कर्मफल में आसक्ति त्याग कर सब कर्म करता रहता है, वह कर्मफल के अच्छे या बुरे परिणाम से अछूता रहता है। उसीको जीवन्मुक्त कहते हैं। 


असल में ऊपर दी गयीं कुछ पंक्तियां तो वानगी भर हैं। हकीकत में यह किताब बहुत शोध के आधार पर बनाई गयी है और जीवन के सही दर्शन को दिखा रही है। इससे भी बड़ी बात है कि इसकी शैली प्रवाहमयी है। बहुत ही सरल और सहज अंदाज में इसमें जीवन के तमाम किंत-परंतु पर व्याख्या की गयी है। राम को समझने की कोशिश में यह किताब हमें विचारशीलता के शिखर पर ले जाती है। इस पुस्तक के बारे में विवरण नीचे दे रहा हूं। इसे मंगवाकर पढ़ा जा सकता है। कुलदीप जी आपका धन्यवाद और आपको साधुवाद। एक लिंक आपकी पुरानी पुस्तक ‘परम विद्रोही’ को लेकर मेरी टिप्पणी का। 

सादर 

https://ktkikanw-kanw.blogspot.com/2013/09/blog-post_7.html 

Thursday, April 20, 2023

जिंदगी को समझने का प्रयास, चले चलो

मोहम्मद अम्मार



क्या जिंदगी है। चलते चलते सांस उखड़ जाती है। चलते चलते सांस निकल जाती है। यह बना लूं, वो बना लूं, यह कर लूं वो कर लूं। घर में करोड़ों लगा दिए। खुद रहा नहीं। बच्चे बड़े हुए तो बने बनाए को बेचकर चले गए। मेरा मानना है कि हर इंसान बस इतना सोचकर जिंदगी जी ले कि बस कभी भी बुलावा आ सकता है मरना है। चिता पर लेटना है और कब्र में जाना है। तो 95 फीसद फसाद अपने आप समाप्त हो जाएं। हिंदू मुस्लिम, जात बिरादरी, मुकदमा बाजी, जमीन कब्जे। बस इंसान की जिंदगी इनके इर्द गिर्द घूम रही है। अंत में हासिल वसूल कुछ नहीं। खामखा की नफरतें और लड़ाइयां हैं। बड़े से बड़े सुरमा आज राख में उड़ गए या मिट्टी में तब्दील हो गए।

अंत में बस एक खबर आती है कि फलां इंसान नहीं रहा। ऐसे ऐसे यह हो गया और मौत हो गई। बस इंसान जीता ऐसे है जैसे इसे कभी मरना ही नहीं। और मर ऐसे जाता है जैसे कभी जिया ही नहीं। मोहब्बतें बांटते चलिए, नफरतें पहले ही बहुत हैं। सौ बातों की एक बात यह है कि हर दिन गुजरने के साथ आप अपनी मौत के करीब हो रहे हैं। हम सब अपने जिंदगी के सफर में ट्रेन में बैठे हैं। और अपनी मंजिल की तरफ बहुत तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। जिन लोगों की मौत की खबर आ रही है। समझ लें  कि उनका स्टेशन आ गया। कुछ देर या दिनों बाद हमारा भी स्टेशन आ जायेगा, फिर किस बात की लड़ाइयां। सोचिए....

दो दिन पहले इस मैसेज पर दी थी बधाई



6 महीने पहले दैनिक जागरण हेड ऑफिस ज्वॉइन किया था। अप्रैल में पूरे उत्तर प्रदेश के टॉप 10 ऑथर की लिस्ट निकली है। मोहम्मद अम्मार खान का नाम ऊपर आया है। जरूरी नहीं हमेशा ऊपर रहे। कभी नीचे भी आएगा। लेकिन देखकर खुशी तो होती ही है। बारहवीं क्लास में था तो अंग्रेजी के सर कहते थे जिंदगी में मुंगफुली भी बेचो तो ऐसे बेचना की तुम्हारे ठेले की मुंगफूली सबसे अच्छी हो। इस कामयाबी में आप सभी की हिस्सेदारी ही। आप सभी के प्यार के लिए दिल से शुक्रिया। इसे पढ़ने के लिए भी शुक्रिया।😊*

----------------------------------------------------

लेखक के बारे में : वरिष्ठ पत्रकार हैं। कुछ समय चंडीगढ़ में दैनिक ट्रिब्यून में भी अपनी सेवाएं दीं। फिलहाल दैनिक जागरण में हैं। केटी की कांव-कांव के प्रोपराइटर से दैनिक ट्रिब्यून में ही मुलाकात हुई। उस वक्त से यदा-कदा सोशल मीडिया मंचों या अन्य माध्यमों से मुलाकात या बातचीत हो जाती है। उन्होंने Whatsapp पर पहले अपनी एक उपलब्धि की जानकारी भेजी (फोटो साझा कर रहा हूं) फिर अगली सुबह उक्त मैसेज। अच्छा लगा तो उनकी परमिशन पर इसे हू ब हू यहां प्रकाशित कर रहा हूं। अम्मार आप खूब तरक्की करो। यही दुआ है। - केवल तिवारी

Thursday, April 13, 2023

सावधानी जरूरी, पर ऐसा भी होता है तो मान लेने में क्या हर्ज OTP my airtel और पांच हजार रुपये

केवल तिवारी

किस्सा बेहद रोचक है। रोचक किस्से से पहले बता दूं कि ये जो मोबाइल कंपनियां होती हैं, इनके छोटे-छोटे अक्षरों में लिखी शर्तें सब इनके मुताबिक होती हैं। आप में से अनेक लोगों को याद होगा कि ये लोग एक समय ये लोग सिम देते वक्त कहते थे 'life time free' यानी कॉल हमेशा आएंगी। बाद में पता चला कि अगर आपने रीचार्ज नहीं कराया तो आपके पास एसएमएस तक नहीं आएगा। एक बार तो ये कंपनियां मिस कॉल देने पर चार्ज लगाने वाले थे, वह तो भला हो कि कुछ कंपनियां आने से कंपटीशन बढ़ा। हालांकि फिर दो-एक कंपनियों ने मोनोपली की ओर कदम बढ़ाए हैं ताकि कंपनियां कम होंगी तो ग्राहक को आराम से लूटा जा सकेगा। कंपनियों में कंपटीशन होगा तो फायदा ग्राहक का होगा। खैर यह तो है मेरी इस बात की पृष्ठभूमि। मुद्दे पर आता हूं। दो माह पहले मेरा ड्राइविंग लाइसेंस की समयावधि खत्म हो रही थी। इसे दिल्ली से बनवाया था। मैंने मित्र सुरेंद्र पंडित को यह बात बताई। पंडित ने कहा कि मैं कहीं बाहर हूं, अमित से बात कर लो। अमित भी पत्रकार हैं और कई बार मददगार साबित होते हैं। मैंने फोन किया तो उन्होंने डिटेल मांगा, डाक्यूमेंट मांगे। मैंने व्हाट्सएप कर दिया। फिर अमित ने पूछा कि ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी में मेरा जो मोबाइल नंबर रजिस्टर्ड है, उस पर ओटीपी OTP आएगा। मुझे ध्यान आया कि तब तो मेरे पास दिल्ली वाला नंबर था 9810 वाला (पूरा नंबर किसी की निजता का ध्यान रखते हुए नहीं दे रहा हूं) मैंने कहा वह नंबर तो रीचार्ज नहीं है और सिम भी कुछ दिन पहले निकाल रखा है। उन्होंने कहा नहीं उसे रीचार्ज कर लो। मैंने पत्नी की मदद से सिम तो ढूंढ़ लिया, लेकिन सही है या नहीं इसका पता कैसे लगे। मैंने online recharge करने के लिए नंबर डाला तो पता लगा कि इसका बिल तो पहले से भुगतान किया गया है। अगला बिलिंग साइकल अभी अगले महीने है। मुझे कुछ सूझा नहीं। फिर मैंने अपने मोबाइल पर उस नंबर को my airtel के नाम से सेव कर लिया। नंबर सेव करते ही व्हाट्सएप देखा तो उसमें  DP किसी बच्चे की लगी थी। मैंने उस नंबर पर कॉल किया तो किसी बिमल नाम के व्यक्ति ने उठाया। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया और जल्दीबाजी में मैंने ओटीपी वाली बात भी बताई। जाहिर है आजकल फ्रॉड भी खूब चलता है। कोई व्यक्ति कैसे बता देगा कि ओटीपी आया है। फिर मैंने उन्हें तसल्ली दी और पूछा भी कि हो सकता है इस नंबर पर मेरे नाम से कॉल आते होंगे। उन्होंने बताया कि हां एयरटेल ने मुझे यह नंबर दिया है और आपके नाम से कई कॉल आते हैं। आखिरकार वह ओटीपी बताने के लिए राजी हो गये। यह दीगर है कि इसकी जरूरत नहीं पड़ी और लाइसेंस बन गया। इसी बीच, एक शाम मेरे फोन पर घंटी बजी। मैं उस दिन अमृतसर में था। देखा तो मेरे उसी पुराने नंबर से कॉल आ रही है। मैंने बातची की तो उन्होंने पूछा, 'क्या आपका बैंक ऑफ बड़ौदा में अकाउंट है', 'हां', 'सर मेरे पांच हजार आपके अकाउंट में आ गए हैं।' मैंने बताया कि वह अकाउंट बहुत पुराना है। मैं चंडीगढ़ लौटकर खाता चेक कर लूंगा, आए होंगे तो लौटा दूंगा। उन्होंने प्लीज कहकर फोन रख दिया। इसके बाद उन्होंने मेरे बैंक की डिटेल भी भेज दी कि कहां अकाउंट है, वगैरह-वगैरह। असल में मेरे पास पैसे आने का कोई एसएमएस नहीं आया था। अगले दिन उनका फिर फोन आया। मैंने कहा बस मुझे एक घंटे का समय दीजिए। देखिए कम से कम ओटीपी के बहाने आपसे बात हुई थी जो इस वक्त काम आ गयी, वरना आप परेशानी में पड़ जाते। वह बोले मुझे बच्चे की फीस जमा करानी है। मैं तुरंत बैंक गया, बैंक मेरी कालोनी के बाहर ही है। पता लगा कि पांच हजार रुपये आए हैं। मैंने उस व्यक्ति से कोई दूसरा नंबर मांगा जिस पर पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हों। पहले दस रुपये भेजकर ताकीद की फिर शेष राशि उन्हें लौटा दी।
इस कहानी में मैंने कोई महान कार्य नहीं किया। या विस्तार से यह बताने का यह भी ध्येय नहीं कि मैं अपना गुणगान कर रहा हूं। असल में कई बार इस तरह के मसले सामने आएं तो हमें माधुर्य से बात कर लेनी चाहिए। वैसे फ्रॉड भी खूब होते हैं, चलिए यह किस्सा था मजेदार। इसलिए शेयर कर दिया।

Wednesday, April 5, 2023

धवल की नयी किताबें और ईजा की याद

 केवल तिवारी 

स्कूली सफर, किताबों की दुनिया, सपनों का 

धवल संसार 

भावना का उमड़-घुमड़, थोड़ी चपलता, ढेर सारा प्यार। 

क्लास बदली, डगर बढ़े, सपनों का ऊंचा हुआ आकाश 

कुछ यादें आईं, कुछ बातें बनाईं जीवन पथ का सारांश।   

नयी किताबों में मशगूल धवल

नयी किताबों संग कक्षा आठ में धवल

अपनी मम्मी के साथ जिल्द चढ़ाने में व्यस्त


हर साल मार्च के अंत में बच्चों की नयी किताबें आती हैं। नोट बुक्स खरीदे जाते हैं। इस बार भी मार्च आया। इस बार ऐसा मार्च धवल का ही रहा। कार्तिक तो हॉस्टल में है और पिछले दो सालों से उसकी पढ़ाई की डगर अलग है, कॉपी किताबों का वह खुद ही खेवनहार है (@IIT ROPAR)। खैर पहले धवल का रिजल्ट आया फिर किताबें। हर बार की तरह इस बार भी मुझे ईजा की याद आई। यूं तो मेरे जीवन में भी ऐसे अवसर कम से कम 12 बार तो आए ही होंगे। यानी पहली से 12वीं कक्षा तक, लेकिन मुझे याद आता है चौथी क्लास का ही वह मंजर जब ईजा करीब 10 किलोमीटर पहाड़ी चढ़ाई पार कर किसी के घर गयीं। उनसे सेकेंड हैंड किताबें देने की अनुनय विनय की। यह भी कहा कि आधी कीमत दे देंगे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। ईजा को खाली हाथ देखकर मैं उदास हो गया। हमारी मां बहुत गंभीर थी। भावनाओं का उमड़-घुमड़ उसके मन में खूब था, लेकिन बाहर से सख्त लगती थी। शायद हालात ने ऐसा बना दिया होगा। रोते हुए मैंने उसे बहुत कम देखा। कभी-कभी देखा भी तो चुपचाप सिसकते हुए। खैर मेरी हालत देखकर उसने ढांढस बंधाया और अगले दिन फिर उसी व्यक्ति के घर गयी। इस बार वह व्यक्ति पसीज गए और उन्होंने किताबें दे दी। मुझे शौक था कि जैसे ही किताब आएगी मैं वह कविता पढूंगा जिसके शब्द थे, ‘उठो लाल अब आंखें खोलो, पानी लाई हूं मुंह धो लो।’ बच्चों को यह किस्सा कई बार सुना चुका हूं, लेकिन मेरे मन में इस किस्से की याद है। 

किस्से अपने-अपने 

जब मैं यह बात बच्चों को बताता हूं तो पत्नी भावना भी कहती है कि उनके लिए कंट्रोल से थोक में कॉपियां आती थीं। वे लोग भी जिल्द चढ़ाने में एक उत्सव जैसे माहौल को जीते थे। धवल ने इस बार भी कुछ सवाल अपनी मां से पूछे। एक दिन बातों बातों में बच्चों ने पूछ ही लिया कि बचपन की बातें बताओ, इसकी चर्चा अगले किसी ब्लॉग में फिलहाल कुछ शेर ओ शायरी के जरिये इन्हीं भावनाओं की बातें पेश हैं- 

मां के संबंध में :  

आप के बा'द हर घड़ी हम ने, आप के साथ ही गुज़ारी है  

 

सब की यादों को लेकर-  

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं, सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी। 

इतनी सारी यादों के होते भी जब दिल में, वीरानी होती है तो हैरानी होती है।  

Wednesday, March 29, 2023

भाजपा, बसपा, और सपा तो फिर आपा क्यों नहीं

 केवल तिवारी

पिछले दिनों एक यात्रा के दौरान एक सज्जन ने राजनीतिक बहस छेड़ दी। हालांकि राजनीति पर बहस मुझे ज्यादा सुहाती नहीं, सिवा किसी खबर के संबंध में चर्चा के। लेकिन वह व्यक्ति कई लोगों से मुखातिब था, उनमें से मैं भी एक था। रोचक यह था कि उसकी चर्चा किसी की जीत हार को लेकर नहीं थी या पक्ष-विपक्ष पर भी नहीं। उसकी चर्चा थी आम आदमी पार्टी (आप) के नाम को लेकर। वह बोले, 'आप अखबार वाले (इशारा मेरी ओर था) जब भारतीय जनता पार्टी को भाजपा, बहुजन समाज पार्टी को बसपा और समाजवादी पार्टी को सपा लिखते हैं तो आम आदमी पार्टी को आप क्यों लिखते हैं, आपा क्यों नहीं।' मुझे उसकी बात में कुछ दम तो लगा, फिर मैंने कहा कि कई वरिष्ठ नेता भाजपा को भी कभी-कभी भाजप कह देते हैं। वह इस तर्क को नहीं माने, बोले कहने और लिखने की बात हो रही है। तभी कुछ लोग आम आदमी पार्टी को आप ही रहने देने के पक्ष में दिखे। बोले, 'अब जब आप नाम ही चलन में आ गया है तो उस पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए।' बहस इस कदर बढ़ी कि लोग शहरों, सड़कों के नामकरण की बातों पर बोलने लगे। कुछ का कहना था कि क्या जरूरत है नाम बदलने की, कुछ बोले- अगर कोई सड़क, शहर या रेलवे स्टेशन विदेशी आक्रमणकारियों के नाम पर है तो उसमें बदलाव में हर्ज ही क्या? बहस बढ़ते-बढ़ते जोर-जोर से चिल्लाने तक में भी बढ़ गयी। तभी मैं बोला, मुद्दा भटक गया है। राजनीतिक दल के नाम पर आइये। इसी दौरान मेरे उतरने का वक्त आ गया। उतरते-उतरते एक सज्जन मुस्कुराते हुए बोले, अब आप क्या लिखेंगे। मैं बोला आप बहस पूरी कर लो, फिर देखते हैं। वैसे आप लोग क्या कहते हैं। भाजपा, बसपा, सपा की तरह आपा या आप?