केवल तिवारी
हर जगह की तरह हमारी कालोनी में भी फेरी वाले यानी सब्जी या अन्य सामान बेचने वाले अक्सर आते रहते हैं। इन्हीं में से कुछ के साथ व्यवहार और विश्वास के कारण अपनेपन का सा भाव आने लगता है। आपके पास दस-बीस रुपये कम हैं तो कोई बात नहीं, उसके पास खुले नहीं हैं तो भी नहीं। हालांकि यूपीआई वाली सुविधा के बाद ऐसी दिक्कत अब ज्यादा होती नहीं, लेकिन कुछ लोग यूपीआई नहीं चलाते। खैर जिन राम की बात कर रहा हूं, उनके पास यूपीआई, कैश सभी तरह की व्यवस्था थी। थी शब्द इसलिए कि सब्जी वाले इस राम ने करीब महीने भर इस दुनिया को ही राम-राम बोल दिया। राम हमेशा एक विशेष तरह की आवाज लगाता आता और हमारे घर के पास ही पेड़ की छांव में रुक जाता। कभी-कबार मुझसे या पत्नी से कहता, 'साहब अरबी के पत्ते बड़े हो गये क्या?' असल में मेरी छोटी सी खेती में अरबी, धनिया, पालक, मेथी अक्सर होती है। राम का आग्रह होता कि आपकी खेती की अरबी के पत्तों का स्वाद अच्छा है। राम से हम अक्सर सब्जी लेते। कभीब-कबार वह फल भी लाता तो विशेषतौर पर बताता कि आज फल अच्छे हैं। कई बार खुद ही कोई सब्जी नहीं लेने की ताकीद करता, कहता यह अच्छी नहीं। क्या करोगे खराब सब्जी का पूछने पर हंस देता, कहता यह सब ढाबों में बिक जाएगी। पिछले दिनों उसका आना बंद हो गया था। पता चला कि वह गांव गया है। फिर खबर आई कि उसके गॉल ब्लॉडर में पथरी थी, ऑपरेशन हुआ है। असल में राम का भाई और अनेक जानकार भी आसपास ही दिख जाते हैं। एक दिन खबर आई कि उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गयी है। चंडीगढ़ पीजीआई लाया जा रहा है। एक दिन हमने किसी से पूछा कि अब उसकी तबीयत कैसी है, पता चला वह तो दुनिया से ही चल दिया। बहुत दुख हुआ। पता चला कि कालोनी में अनेक लोगों ने उसके पैसे देने हैं। अब इन दिनों उसका बेटा जो अभी-अभी बारहवीं पास हुआ है, अपने मामा के साथ सब्जी बेचने आ रहा है। उससे भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा, फिलहाल वह मेहनत कर रहा है और कहता है पढूंगा। कुछ लोगों ने पैसे दे दिए हैं, शायद कुछ के अभी बाकी हैं। राम के जाने के बाद एक सूनापन सा अया है, मन कुछ दिनों तक खिन्न रहा, लेकिन ... इस लेकिन के आगे कुछ है ही नहीं... खुश रहना राम, उस जहां में भी।

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