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Thursday, November 5, 2026

कार्तिक मास में क्यों जलाते हैं 'आकाश दीप' कहां रहती है सबसे ज्यादा जगमग

 केवल तिवारी 

बांस की टोकरी में जलता दीपक। साभार सोशल मीडिया 


हम-आप में से अनेक लोगों ने सुना होगा कि कार्तिक के महीने में यानी 15 अक्तूबर से 15 नवंबर के बीच या कहीं-कहीं 24 नवंबर तक संध्या काल में या अल्लसुबह सरसों के तेल के दीये को ऊंचाई वाले स्थान पर जलाया जाता है। अनेक लोग इस प्रथा को मानते हैं। भारत में कई धार्मिक स्थल भी हैं जहां ऐसी जगमग पूरे महीने रहती है। ऊंचाई से मतलब है आपके समतल इलाके से कुछ फुट की ऊंचाई पर। कुछ लोग किसी रस्सी के सहारे उसे टांग देते हैं और कुछ लोग हैंगिंग गमले में दीप जलाते हैं। असल में माना जाता है कि हम अपने पितरों के सम्मान में ऐसा करते हैं जिनकी वजह से हम धरती पर हैं। साथ ही परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना के निमित्त भी ऐसा किया जाता है। इसके अलाव भी एक कहानी है। आइये पहले जानते हैं वह कहानी क्या है।

असल में महाभारत युद्ध में प्राण त्यागने वाले वीरों की स्मृति में पितामह भीष्म ने कार्तिक मास में दीप जलाकर उनका तर्पण किया था। पैराणिक ग्रंथों में इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। प्रात:काल में गंगा जी के किनारे गंगा स्नान और संध्या के समय आकाश -दीप का दान किया जाता है। अगर पूरे कार्तिक मास कोई ऐसा नहीं कर सकता तो वह महीने में लगातार किसी भी तीन दिन में गंगा स्नान और आकाश- दीप दान कर सकता है। जानकार कहते हैं कि लोग पितरों और देवताओं को समर्पित करते हुए अपने घरों की छत या घर के आंगन में भी दीप दान कर सकते हैं। मान्यता है कि आकाश दीप पितरों के मार्ग को प्रकाशमान करते हैं।

बनारस में सुबह-शाम होती है जगमग

धार्मिक नगरी काशी यानी बनारस यानी वाराणसी में आकाश-दीप जलाने की प्राचीन परंपरा है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन देव उत्सव मनाते हैं और कार्तिक मेले में देवता मृत्यु लोक में आते हैं। यहां तो हजार दीपक जलाने की भी मान्यता है। यहां के घाटों पर शाम होते ही लोग बांस की टोकरी में दीप जलाकर उसे बांस के लंबे लट्ठ पर लटकाते हैं। यहां के पंचगंगा घाट पर देव दीपावली के दिन इस पर 1008 दीपक जलाए जाते हैं। एक महीने तक चलने वाला आकाशदीप जलाने का यह आयोजन कार्तिक पूर्णिमा के दिन संपन्न होता है। बनारस में शाम होते ही लोग टोकरियों में दीये लिए दिख जाते हैं। जानकार कहते हैं कि अगर ब्रह्म मुहूर्त में दीप नहीं भी जलाया जाये तो शाम को ऐसा किया जा सकता है। बनारस के अलावा भी कई धार्मिक स्थलों पर दीपदान का यह पर्व मनाया जाता हुआ दिखता है। अनेक धार्मिक लोग अपने घरों में भी आकाश दीप जलाते हैं और पितरों का स्मरण करते हैं। आकाश मार्ग में उनके लिए रोशनी करते हैं। पर्व जो भी हों, उसके मूल मंत्र को हमने सीखना चाहिए। पितरों को याद करने का मतलब है कि हम अपनी नयी पीढ़ी को अपने बुजुर्गों के बारे में बताते रहें और नेक पथ पर चलने की सीख दें। जय हो

जीवन सफर में कुछ लोग छाप छोड़ जाते हैं... ईपीएफ संबंधी काम, इंदौर के सिद्धार्थ जी बने जरिया और बेहतरीन अनुभव

केवल तिवारी

हारी-बीमारी में डॉक्टर के पास हम-आप सभी लोग जाते हैं। डॉक्टरों की परख और दवा पर तो हम बातचीत करते ही हैं, अनेक बर उनके व्यवहार पर भी खूब चर्चा होती है। अनेक लोगों को कहते सुना जाता है कि फलां डॉक्टर तो आधी बीमारी बातों से ही ठीक कर देते हैं। प्रसंग स्वरूप मेरे एक-दो ब्लॉग ऐसे ही डॉक्टरों पर ही इसी साइट में हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि जो ठीक से बात नहीं करते, वे अच्छे नहीं होते। ऐसा भी तो सुनते हैं, बेशक वह डॉक्टर बोलते नहीं हैं या यह भी कि है बहुत खड़ूस टाइप लेकिन उसकी परख और दवा होती है एक नंबर। इसी तरह पब्लिक डीलिंग में रहने वाले लोगों से अक्सर उम्मीद की जाती है कि उनका व्यवहार या उनका लहजा तो कम से कम अच्छा होना ही चाहिए। इंसानों के बीच ही इंसान के न मिल पाने को शायद सदियों पहले मिर्जा गालिब समझ गए होंगे तभी तो वह लिख गये-

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना। आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना। 

सिद्धार्थ जी से पिछले कुछ दिनों से बात होती रही है। असल में मेरे पीएफ रिकॉर्ड में सर्विस हिस्ट्री नहीं जुड़ पा रही थी। पत्रकारीय जीवन में दैनिक जागरण, हिंदुस्तान फिर नईदुनिया होते हुए अब दैनिक ट्रिब्यून में हूं। तमाम कोशिशों के बावजूद जब थक-हार गया तो दिल्ली से कुछ व्यवस्था की। चूंकि इससे पहले मेरा नाता इंदौर के ही अखबार नईदुनिया से था तो मामला वहां रेफर हो गया। इंदौर पीएफ ऑफिस से एक दिन फोन आया। फोन करने वाले व्यक्ति सिद्धार्थ जैन जी। उन्होंने कहा कि यह काम तो ऑनलाइन ही हो जाएगा। उन्होंने तरीका बताया, लेकिन चूंकि पहले मैं इस तरह की कोशिश कर चुका था, नहीं हुआ था सो इस बार भी नहीं हुआ। मैंने उनसे कहा कि यह नहीं हो पा रहा है। काम भले नहीं हुआ, लेकिन सिद्धार्थ जी से मेरी बातचीत होती रही। वैसे उन्होंने पहली या दूसरी बातचीत में ही कह था, 'केवल जी यह काम तो हर हाल में होगा, ऑनलाइन नहीं हो रहा है तो ऑफ लाइन होगा।' मैंने जवाब दिया, 'सिद्धार्थ जी काम होना तो अब सेकेंडरी है, आपके बातचीत के अंदाज ने मोह लिया।' असल में पब्लिक डीलिंग में होने ही ऐसे व्यक्ति चाहिए। खैर फिर उन्होंने ऑफ लाइन तरीका बताया। फिर मेरे पुराने संस्थान में वह कागज गया। उसके पहले के कई कटु अनुभव हैं क्योंकि जब मैंने हायर पेंशन के लिए अप्लाई किया था तो 'नो रिकॉर्ड फाउंड' जैसे मैसेज के कारण काम अटक गया। वैसे इस वक्त उन नकारात्मक बातों को क्यों याद करना। गनीमत है कि मेरे पास सारे डॉक्यूमेंट पड़े थे, आखिरकार पुराने संस्थान ने भी कागज आगे बढ़ा दिए। सिद्धार्थ जी से अनेक बार बातें हुई, हर बार वह यही बोलते कि काम तो होएगा ही। मुझे लगता कि मैंने तो कहां-कहां चक्कर काटे, लेकिन ये इतना आश्वस्त कैसे हैं। आज बृहस्पतिवार 29 अक्तूबर 2026 को सिद्धार्थ जी का फोन आया कि केवल जी आप अपना यूएन आईडी पर जाकर चेक कर लीजिए और मुझे बता दीजिए, आपका काम हो गया है। उस वक्त मैं कहीं गया था, थोड़ी देर बाद देखा तो उसमें पुराना रिकॉर्ड शो होने लगा। प्रसंगवश यहां बता दूं कि जब इस प्रकरण की शुरुआत हुई और ऑनलाइन इस काम के होने की बात हुई तो मैंने सिद्धार्थ जी से कहा कि जरूरत हो तो आप मेरा यूजर आईडी और पासवर्ड ले लीजिए। हालांकि इस बात को सुन रहे मेरे घरवाले बाद में बोले कि ऐसे ही किसी को यूजर आईडी और पासवर्ड देने की बात क्यों करते हो? वैसे सिद्धार्थ जी ने यूजरआईडी और पासवर्ड के लिए साफ इनकार कर दिया और बोले कि आप खुद कोशिश करें, जहां जरूरत हो तो बताना आपकी मदद करेंगे। वैसे वह काम ऑनलाइन होना नहीं था, इसलिए नहीं हुआ। एक बार सिद्धार्थ जी और इस कड़ी में जुड़े मेरे सभी साथी और जिन्होंने पहले भी प्रयास किए उन सभी का दिल से आभार।