केवल तिवारी
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| बांस की टोकरी में जलता दीपक। साभार सोशल मीडिया |
हम-आप में से अनेक लोगों ने सुना होगा कि कार्तिक के महीने में यानी 15 अक्तूबर से 15 नवंबर के बीच या कहीं-कहीं 24 नवंबर तक संध्या काल में या अल्लसुबह सरसों के तेल के दीये को ऊंचाई वाले स्थान पर जलाया जाता है। अनेक लोग इस प्रथा को मानते हैं। भारत में कई धार्मिक स्थल भी हैं जहां ऐसी जगमग पूरे महीने रहती है। ऊंचाई से मतलब है आपके समतल इलाके से कुछ फुट की ऊंचाई पर। कुछ लोग किसी रस्सी के सहारे उसे टांग देते हैं और कुछ लोग हैंगिंग गमले में दीप जलाते हैं। असल में माना जाता है कि हम अपने पितरों के सम्मान में ऐसा करते हैं जिनकी वजह से हम धरती पर हैं। साथ ही परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना के निमित्त भी ऐसा किया जाता है। इसके अलाव भी एक कहानी है। आइये पहले जानते हैं वह कहानी क्या है।
असल में महाभारत युद्ध में प्राण त्यागने वाले वीरों की स्मृति में पितामह भीष्म ने कार्तिक मास में दीप जलाकर उनका तर्पण किया था। पैराणिक ग्रंथों में इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। प्रात:काल में गंगा जी के किनारे गंगा स्नान और संध्या के समय आकाश -दीप का दान किया जाता है। अगर पूरे कार्तिक मास कोई ऐसा नहीं कर सकता तो वह महीने में लगातार किसी भी तीन दिन में गंगा स्नान और आकाश- दीप दान कर सकता है। जानकार कहते हैं कि लोग पितरों और देवताओं को समर्पित करते हुए अपने घरों की छत या घर के आंगन में भी दीप दान कर सकते हैं। मान्यता है कि आकाश दीप पितरों के मार्ग को प्रकाशमान करते हैं।
बनारस में सुबह-शाम होती है जगमग
धार्मिक नगरी काशी यानी बनारस यानी वाराणसी में आकाश-दीप जलाने की प्राचीन परंपरा है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन देव उत्सव मनाते हैं और कार्तिक मेले में देवता मृत्यु लोक में आते हैं। यहां तो हजार दीपक जलाने की भी मान्यता है। यहां के घाटों पर शाम होते ही लोग बांस की टोकरी में दीप जलाकर उसे बांस के लंबे लट्ठ पर लटकाते हैं। यहां के पंचगंगा घाट पर देव दीपावली के दिन इस पर 1008 दीपक जलाए जाते हैं। एक महीने तक चलने वाला आकाशदीप जलाने का यह आयोजन कार्तिक पूर्णिमा के दिन संपन्न होता है। बनारस में शाम होते ही लोग टोकरियों में दीये लिए दिख जाते हैं। जानकार कहते हैं कि अगर ब्रह्म मुहूर्त में दीप नहीं भी जलाया जाये तो शाम को ऐसा किया जा सकता है। बनारस के अलावा भी कई धार्मिक स्थलों पर दीपदान का यह पर्व मनाया जाता हुआ दिखता है। अनेक धार्मिक लोग अपने घरों में भी आकाश दीप जलाते हैं और पितरों का स्मरण करते हैं। आकाश मार्ग में उनके लिए रोशनी करते हैं। पर्व जो भी हों, उसके मूल मंत्र को हमने सीखना चाहिए। पितरों को याद करने का मतलब है कि हम अपनी नयी पीढ़ी को अपने बुजुर्गों के बारे में बताते रहें और नेक पथ पर चलने की सीख दें। जय हो


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