केवल तिवारी
पिछले दिनों बॉलीवुड में लेखन-निर्देशन से जुड़े शैलेंद्र झा लिखित उपन्यास 'कंबोडिया कंपाउंड' पढ़ने को मिली। इस उपन्यास को शुरू किया ही था कि खत्म होने तक छोड़ा ही नहीं। कुछ जरूरी कारणों से बीच में थोड़ा ब्रेक लिया, फिर दो-तीन दिन में निपटा दी। लगातार पढ़ते रहने का कारण बेहतरीन शैली में लिखी गयी कहानी। सस्पेंस, थ्रिल और भी बहुत कुछ। हमारे अखबार दैनिक ट्रिब्यून के संपादकीय विभाग से मुझे यह किताब समीक्षार्थ मिली। उसी पर पूरी समीक्षा यहां पेश है-
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| साभार दैनिक ट्रिब्यून |
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रोमांस, थ्रिल, सस्पेंस और जिंदगी की जद्दोजहद। किसी धारावाहिक या फिल्म में यह सब हो तो आप उसे देखते रहते हैं, इस जिज्ञासा के साथ कि आगे क्या होगा? कभी आपकी कल्पना के अनुरूप और कभी कल्पनातीत होती है कहानी। ठीक उसी तरह जैसे उपन्यास 'कंबोडिया कंपाउंड' में है। लेखक हैं शैलेंद्र झा। पूरा उपन्यास एक चलचित्र की तरह लगता है।
कुछ स्थानों पर सेंसरशिप की कैंची जैसी बात अगर आ जाए तो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने जैसी फिल्म। सचमुच ऐसा उपन्यास जिसे आपने शुरू किया तो खत्म होने तक रहा नहीं जाएगा। और एक बेहतरीन लेखन की तरह कहानी के अंत में एक नयी शुरुआत सी लगती हुई। सामान्य परिवार की कहानी।मियां बीवी और चार बच्चे। हर किसी की जिंदगी अलग और सपना अलग। साथ चलते कुछ अन्य किरदार, जिनमें साइबर ठगों को अपनी पूरी जमा पूंजी लुटा देने वाला पत्रकार, एक बिल्डर, अपराध का भीषण नेटवर्क चलाने वाले कुछ लोग और भी कुछ अहम पात्र। कहानी कई पड़ावों पर रुकती, उतरती, चलती जाती है। पाठक के मन में सवाल उठता है आगे क्या? कभी आशंका से मन कांप उठता है और कभी उम्मीद से दिल भर जाता है, लेकिन होता कुछ और है। बेशक इस उपन्यास का अहम किरदार असीम सबकी नजरों में नाकारा होता है, लेकिन वह तो असली 'हीरो' साबित हुआ। मजबूरी में नौकरी कर रही राधिका मजबूत बहुत है। आनंद ऑटो चलकर गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, लेकिन उनकी छोटी बेटी तूलिका के सपने बहुत बड़े हैं। इसी में साइबर ठगों की एक अलग दुनिया है। नित नए शिकार को फंसाना, लूटना। अच्छा कमाने के लिए विदेश जाना कभी कबार कितना खौफनाक हो सकता है, यह अतुल की कहानी से साफ झलक जाता है। बेहतर यही होगा की समीक्षा में भी एक सस्पेंस बना रहे। शैलेंद्र झा की रचना सचमुच बहुत बेहतरीन है उसी तरह जैसे फिल्म लेखक और निर्देशक इम्तियाज अली का एक कोट किताब के कवर पृष्ठ पर लिखा गया है, 'यह उपन्यास आपको पन्ने पलटते रहने पर मजबूर करता है और फिर रात भर जगाए रहता है' भाषा शैली बिल्कुल आमजन की है क्योंकि कहानी ही आमजन की है।


1 comment:
कम शब्दों में सधी हुई समीक्षा। क्या बात
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