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Friday, June 16, 2017

पच्चीस नंबर



सजल ने अब चौथी बार रघु से सवाल पूछा कि इस बार कहां गये थे? रघु का वही जवाब '25 नंबर।' दोनों हंस पड़े। असल में पिछले चार-पांच दिनों से यही हो रहा था। रघु को हर बार 25 नंबर काउंटर पर जाना पड़ रहा था। अस्पताल में 25 नंबर का आलम यह था कि न तो वह 24 के करीब था और न ही 26 के आसपास। उसका निशान (साइन बोर्ड) जरूर कई जगह बने थे। दूसरी मंजिल से भी एक एरो बना हुआ था। वहां से अंदाजा लगाया जा सकता था कि 25 नंबर काउंटर है कहां? दूसरी मंजिल पर ही बने वार्ड में सजल भर्ती थे। दिक्कत यह थी कि 25 नंबर वार्ड वहां था ही नहीं, जहां उसे होना था। रघु चूंकि अब अभ्यस्त हो गया था। इसलिए ज्यादा परेशानी नहीं होती। लेकिन कई बार अगर रात 11 बजे बाद वहां जाना होता तो वह रास्ता भूल जाता। असल में जो रास्ता रघु को मालूम था, वह रात 10 बजे बंद हो जाता था। बाकी काउंटर जैसे 22, 23, 27 आदि एक ही फ्लोर पर थे, लेकिन 25 नंबर था तीसरी मंजिल पर। असल में 25 नंबर का वास्ता रघु का भी तभी से पड़ा जब से सजल यहां भर्ती थे। सजल एक बेहतरीन फोटोग्राफर माने जाते थे। फोटोग्राफी के प्रति उनके लगाव का आलम यह था कि वह अस्पताल के बेड पर पड़े वक्त भी एंगल की बात करते। कभी कहते, 'रघु सामने जो पेड़ है, उसको अगर तुम इस बिल्डिंग की छत पर जाकर कैमरे में कैप्चर करो तो एक अलग नजारा दिखेगा।' रघु बात से सहमत होते हुए सिर हिला देता। रघु भी था तो फोटोग्राफर, लेकिन एंगल और नयेपन का इतना जुनून उसमें नहीं था, जितना सजल साहब में। फिर सजल साहब रघु से तकरीबन 12 साल बड़े भी तो थे। फोटोग्राफी की कई बारीकियां तो रघु ने सजल साहब से ही सीखी थीं। यूं तो कई अन्य वरिष्ठ फोटोग्राफरों से रघु का वास्ता पड़ा, लेकिन सजल साहब के एंगल उसे एकदम अलग लगते। सजल की बातों को सुनने के बाद कई बार रघु का मन करता कि चलो छत पर चढ़कर एक फोटो इस पेड़ की ले ली जाये, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। सजल साहब का एंगल के प्रति जुनून का आलम यह था कि एक बार तो पता ही नहीं चला कि उन्होंने कब रघु की चाय पीते तस्वीर ले ली। वह तस्वीर इतनी खूबसूरत आयी कि लगा नहीं कि वह किसी अस्पताल के वार्ड में किसी मरीज का तीमारदार बना हुआ है। रघु को सजल साहब से खुलकर बात करने में भी संकोच होता था। लेकिन इन दिनों अस्पताल में थे तो लंबी खामोशी भी तो नहीं चल सकती थी। तीमारदारी के दौर में ही एक बार तो हिम्मत करके रघु ने पूछ ही लिया, 'सर ये आइडियाज कैसे आते हैं आपको।' सजल मुस्कुरा दिये और बोले आज घर जाते वक्त अमलताश के पेड़ों की कतार देखना और ऐसे ही क्लिक कर देना। वाकई गजब हो गया। रघु की वह तस्वीर उसके अखबार के पेज वन पर छप गयी। अगले दिन सुबह 11 बजे जब रघु अस्पताल पहुंचा तो सजल साहब मुस्कुराये। बोले, ‘देखा अच्छी बन गयी ना तस्वीर।’ फिर उन्होंने पूछा, ‘ये कैप्शन किसका है?’ 'मिलजुलकर बनाया है।' रघु का जवाब था। सजल साहब थोड़ा गुस्सा सा हुए। बोले, 'खुद नहीं बनाया है तो दूसरों को क्रेडिट देना सीखो।' ऐसे ही कई मौके होते थे जब सजल साहब प्रैक्टिकल बातें करते और कुछ अच्छी बातें भी समझाते। असल में सजल साहब पिछले कुछ दिनों से बहुत बीमार हो गये थे। वह तसवीरों के एंगल को लेकर बातें तो करते, लेकिन काम जैसे उन्होंने खुद करना लगभग बंद कर दिया था। रघु से कोई खास इंटीमेसी उनकी नहीं थी। हां जान-पहचान बहुत पुरानी थी। बल्कि वह तो रघु के कई बार बॉस भी बने रहे। सजल साहब के साथ एक अजीब बात थी कि वह हमेशा प्रोफेशनल बातें ही करते। तसवीर कैसी है। तसवीर का एंगल क्या हो। कैसे कोई फोटो बहुत अच्छी हो सकती है, वगैरह-वगैरह। रघु-सजल कई बार बॉस और मुलाजिम रहे। फिर अलग-अलग हो गये। पिछले कुछ सालों से दोनों का साथ हुआ। वह रघु से पता नहीं क्यों निजी बातें शेयर करने लगे थे। बेशक बच-बचकर। जैसे बेटे को एक ट्रॉफी मिली है। बिटिया ने बीटेक का कोर्स पूरा कर लिया है। जॉब सर्च कर रही है। वाइफ आने वाली हैं। आदि-आदि। सजल और रघु इन दिनों जयपुर में थे। दोनों दिल्ली से आये थे। रघु तो अपनी फैमिली साथ ले आया, लेकिन सजल साहब के बच्चों की पढ़ाई बीच में थी। बेटा हॉस्टल में, बेटी बीटेक की पढ़ाई कर रही थी। पत्नी भी स्कूल में पढ़ाती थीं। वह जयपुर में अकेले ही रहने लगे। अपने आदत के अनुसार वह फोटो के एंगल तो खूब तलाशते, लेकिन पता नहीं लगता जैसे जिंदगी का उन्होंने एक ही एंगल देखा। तन्हा रहना, किसी से कुछ शेयर न करना उनकी आदत सी थी। रघु और सजल की प्रोफेशनल बातें होतीं। कभी-कबार मुलाकात होती। लेकिन पिछले कुछ दिनों से जब सजल साहब बीमार पड़े तो उन्होंने पता नहीं क्यों रघु से इस बात को शेयर करना चाहा। रघु को कुछ-कुछ तो पता था, लेकिन सजल साहब की हमेशा इच्छा रहती थी कि बेचारगी, लाचारी भरे माहौल में न जीयें। वह यह भी पसंद नहीं करते थे कि बार-बार कोई उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछे। लेकिन इस बीच उन्होंने रघु और अपने ही साथ के एक-दो लोगों को घर बुलाकर बताया कि वह बेहद अस्वस्थ हैं। बीमारी है किडनी की। शायद ट्रांसप्लांट करनी पड़ जाये। रघु तो यह सुनकर ही सन्न रह गया। फिर खुद सजल साहब ने कहा कि घबराने की जरूरत नहीं। सब क्यूरेबल है। फिलहाल दवा चलेंगी। डायलिसिस होगी। जरूरत पड़ी तो बाद में ट्रांसप्लांट करा लेंगे। उन्होंने रघु से कहा कि संभव हो तो कुछ समय निकालकर मेरे साथ अस्पताल में रह जाना। क्योंकि उन्हें फिलहाल एक हफ्ते के लिए भर्ती होना है। रघु को इसमें कोई दिक्कत नहीं थी। दो-चार घंटे जाने के बाद वह थोड़ा काम कर आएगा और फिर तीमारदार की तरह अस्पताल चला जाएगा। लेकिन वह चाहता था कि सजल साहब इस वक्त पूरे परिवार को साथ बुला लें। उनके साथ रहने से बात दूसरी ही होगी। हालांकि यह बात रघु सीधे कह नहीं पाया। तय हुआ कि तीन दिन बाद अस्पताल जाना है। डॉक्टर से पहले ही टाइम ले लिया गया। डॉक्टर ने बताया कि एक दिन आईसीयू में रखेंगे फिर प्राइवेट रूम दिला देंगे। तीन दिन बाद सजल के साथ रघु एवं उनके दो मित्र अस्पताल चले गये। वहां उन्हें भर्ती करा दिया गया। इसी बीच सजल साहब की पत्नी का फोन रघु के पास आ गया। रघु को आश्चर्य हुआ कि उन्हें कैसे पता कि हम अस्पताल में हैं। तभी सजल साहब बोले, ‘मैं बता चुका हूं। वह शाम तक पहुंच जाएंगी।‘ दिनभर रघु वहीं रहा। इस बीच सजल साहब के कई सैंपल जांच के लिए रघु देकर आया। हर सैंपल के साथ डॉक्टर कहते कि पहले 25 नंबर में जाना वहां से पर्ची मिलेगी फिर 24 नंबर में या 20 नंबर में जमा करा आना। रघु को 25 नंबर ढूंढ़ने में बहुत वक्त लग गया। असल में 25 नंबर के लिए साइन बोर्ड तो जगह-जगह लगे थे, लेकिन उसे ढूंढ़ना बहुत आसान नहीं था। 25 नंबर काउंटर तीसरी मंजिल पर था। रघु को जब इस काउंटर पर पहुंचने का अच्छा अभ्यास हो गया तो वह सजल साहब के पास से उठकर अक्सर उस गलियारे में आ जाता जहां से लोग 25 नंबर गलियारे का रास्ता ढूंढ रहे होते। एक दिन तो उसने कम से कम 50 लोगों को इसका रास्ता बताया होगा। गलियारे में अक्सर अस्पताल से अनजान लोग ही भटकते रहते। गार्ड से पूछो तो वो ऐसे ही आगे को हाथ से इशारा कर देते। उनका काम तीमारदारों की भीड़ को हटाना ही ज्यादा होता। बड़ा सरकारी अस्पताल, तमाम तामझाम फिर भी कुछ बातें अधूरी-अधूरी सी।
एक दिन रात में सजल साहब ने रघु से रुक जाने का आग्रह किया। रघु ने सजल साहब को ऐसी लाचारगी वाले अंदाज में कभी नहीं देखा था। रघु ने तुरंत हां कर दी और घर पर फोन कर बता दिया कि वह कल शाम तक ही घर आएगा। इस बीच सजल साहब ने पत्नी से घर जाने को कह दिया। वह लगातार एक हफ्ते से उनके पास ही थीं। उन्हें भी थोड़ा आराम मिल जाएगा। चूंकि रघु का ऑफ था, इसलिए दफ्तर की भी बहुत चिंता नहीं थी। रात में सजल साहब बहुत देर तक रघु से बात करते रहे। बीच में दोनों ने दो बार कॉफी भी पी। ‘आपके लिए ज्यादा कॉफी नुकसानदायक तो नहीं‘ रघु ने सजल साहब से पूछा। ‘अरे नहीं डॉक्टर तो कहते हैं खूब कॉफी पीओ।’ सजल साहब कह देते। उस रात सजल साहब ने घर-परिवार की कई बातें रघु से कीं। रघु की बातें भी सुनीं। दूसरे दिन सुबह-सुबह सजल साहब ने अपने आईपैड पर कई मधुर गीत लगा दिये। कभी भूपेन हजारिका का ‘विस्तार है अपार’ गीत बजता तो कभी लता जी का ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा।’ सजल साहब ने देखा कि रघु को भी गीतों में आनंद आ रहा है। उन्होंने यहां भी एक एंगल जैसा तलाशा। बोले-‘रघु इन गीतों को सुनकर नहीं लगता जैसे शब्द बाहर निकलकर हवा में तैर रहे हों।’ रघु थोड़ी देर के लिए उनकी बातों पर गौर करता रहा। सचमुच यही तो लग रहा था कि जैसे शब्द तैर रहे हों। फिर उन्होंने हंसते हुए पूछा, ’25 नंबर कब से जाना नहीं हुआ।’ रघु मुस्करा दिया। फिर सजल साहब बोले, पता नहीं 25 नंबर से मुझे अपना नाता सा जुड़ता महसूस हो रहा है। जानते हो सजल यूं तो मैं कोई ज्योतिष आदि में विश्वास नहीं करता, लेकिन पता नहीं 7 नंबर से मेरा अनजाना सा नाता है। मेरे मोबाइल नंबर के अंत में 7 है। कार के नंबर में सात है। घर का नंबर सात है। जन्मतिथि सात और अगर इस 25 नंबर के दोनों अंकों को जोड़ो तो ये भी सात बनते हैं। क्या पता अंतिम दिन का भी योग सात बने। सजल बस सुनता रहा। फिर बोले, मुझे लगता है इस 25 नंबर से अब नाता टूट जाएगा। रघु ने कहा, ‘सर आप परेशान मत होइये। सब ठीक होगा। ऐसे भी अब कोई दिक्कत नहीं है। अब तो इस अस्पताल के किसी भी गेट से भेज दीजिए मैं 25 नंबर तक हो ही आऊंगा।’ वैसे वहीं फीस जमा क्यों होती है। सजल साहब ने पूछा। रघु ने कहा, ‘सर कुछ खास टेस्ट की फीस वहां जमा होती है और रिपोर्ट भी वहीं से मिलती है।‘ फिर रघु ने पूछ लिया, ‘सर आप किडनी ट्रांसप्लांट का प्रोसेस तो शुरू करवाइये। डोनर मिल जाते हैं।’ सजल साहब बोले, ‘डोनर की कोई समस्या नहीं है। मैं सोच रहा हूं अगर यूं ही यह जिंदगी चार-पांच साल चल जाए तो ज्यादा जीकर करना क्या है?’ उनके इस जवाब की रघु को उम्मीद नहीं थी। उसने कोई तर्क करना उचित नहीं समझा। अगले दिन शाम को सजल साहब ने कहा, ‘रघु तुम घर जाओ। कल से बच्चे अकेले होंगे।’ फिर वह धाराप्रवाह बोलते चले गये, ‘हमारे शहजादों को तो मैसेजभर की फुर्सत है। कभी आकर मुझे देख लें, इतनी फुर्सत उन्हें कहां।’ रघु ने जवाब दिया, ‘आप कहें तो रुक जाऊं। कल सुबह निकल जाऊंगा।’ सजल ने बात पलट दी और बोले, सामने देखो पेड़ों के बीच से गौर से चांद को देखो, ऐसा लग रहा है वह दो है और पेड़ की टहनी जैसे पांच। सजल समझ गया कि वह 25 नंबर कह रहे हैं। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिये। तभी सजल साहब की पत्नी भी पहुंच गयीं। उन्होंने भी रघु से घर जाने को कहा। जाते-जाते सजल साहब बोले, ‘रघु कभी-कभी तो मुझे लगता है कि 25 भी बजते हैं। रात को 12 बजे जिसे हम 24 बजे भी कह सकते हैं, उसके एक घंटे के समय को जब बिल्कुल सन्नाटा सा होता है उसे हम 25 बजे कह सकते हैं।’ रघु को लगा फोटो में एंगल तलाश करने वाले सजल साहब आज कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं। खैर रघु घर आ गया। घर पर बात की। वहां भी सजल साहब की बीमारी से सब परेशान थे। रघु की पत्नी ने पूछा, क्या लगता है? रघु ने कहा, ‘कल तक सब ठीक लग रहा था, आज अजीब-अजीब।’ खाना खाकर सब सो गये। रात एक बजे रघु के फोन पर घंटी बजी। फोन महेंद्र का था। रघु का दोस्त और सजल साहब का भी पुराना परिचित। रघु ने सवाल किया, ‘हां महेंद्र इतनी रात फोन कैसे।’ ‘अरे यार मैं अस्पताल में हूं।’ महेंद्र का जवाब था। ‘क्या हुआ।’ रघु ने पूछा। ‘सजल साहब सो सीरियस।’ बातचीत जारी रही-अरे मैं आऊं। नहीं सुबह आ जाना। जल्दी।
रघु को उसके बाद नींद नहीं आयी। कभी वह याद करता कि रात एक बजे भी 25 बजता है। कभी यह कि अब 25 नंबर से वास्ता टूट जाएगा। कभी यह कि मेरे जीवन में 7 नंबर अहम है। सोचते-सोचते उसे हल्की आंख लग गयी। सुबह 6 बजे रघु की पत्नी ने चाय लाकर दी। रघु ने कहा कि मैं तुरंत नहाकर निकलूंगा। रात फोन आया था। अजब इत्तेफाक था कि करीब सात बजे वह अस्पताल पहुंचा। सजल साहब को कई तरह की मशीनें लगी थीं। बेटा और बेटी भी पहुंच चुके थे। उनकी पत्नी से रघु ने पूछा अचानक सब लोग आ गये। सजल साहब की यकायक तबीयत कैसे बिगड़ गयी। वह सुबकने लगीं। बोलीं, आपके जाने के बाद इन्होंने ही सबको आ जाने के लिए कहा था। फ्लाइट से अभी-अभी सब पहुंचे हैं। ओह। रघु को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह डॉक्टर के पास गया। डॉक्टरों का वही जवाब, ‘वी आर डूइंग अवर बेस्ट।’ इधर-उधर दौड़ते-दौड़ते करीब 11 बज गये। आधे घंटे बाद डॉक्टर ने तीन-चार पर्चियां दी और एक लिक्विड सा देकर कहा, इसे 25 नंबर में जमा कराके आओ। रघु ने पर्चियां पकड़ीं और बाहर को निकला ही था कि डॉक्टर ने रोक दिया। पर्ची और लिक्विड वापस ले लिया। फिर डॉक्टर ने रघु की तरफ गौर से देखकर कहा, ‘आप इनके कौन हैं।’ मैं-मैं-मैं, रघु अपना कोई परिचय नहीं दे पाया। तभी महेंद्र बोला, 'उनके भाई हैं। मतलब पुराने साथी हैं।' डॉक्टर ने कहा, 'सबको संभालिये, अब 25 नंबर जाकर इन जांचों की जरूरत नहीं।' रघु ने देखा 12 बज चुके थे। क्या दिन में भी 25वां घंटा होता है। 12 बजे के बाद। रघु रुआसा सा होकर पीछे को पलटा। महेंद्र की तरफ देखकर बोला, आज तारीख कितनी हैं। महेंद्र ने कहा '16 तारीख।' 'ओह आज भी सात हैं।' रघु बुदबुदाया। महेंद्र ने कहा, 'क्या। सात नहीं सोलह। हां भाई सोलह।' रघु बुदबुदाता रहा। शायद अब न 25 नंबर होगा और न ही सात नंबर। थोड़ी देर बाद रोने-धोने की आवाज से अस्पताल परिसर गूंज उठा। दुनिया वैसे ही चल रही थी। सामने का पेड़ भी हवा में हिल रहा था। आसमान में बादलों का एक झुरमुट इस तरह से घूम रहा था जैसे उसकी आकृति 25 नंबर की बन रही होगी। रघु चुपचाप एक बार 25 नंबर काउंटर पर हो आया। वहां वैसी ही गहमागहमी थी। सीढ़ियों से उतरते वक्त उससे पांच लोगों ने 25 नंबर का रास्ता पूछा, आज वह सिर्फ हाथों से इशारा कर पाया।

Wednesday, March 22, 2017

कद्दू, पेठा और घीया या लौकी

लौकी का ही एक रूप

लौकी जिसे घीया भी कहते हैं

पेठा जिसकी मिठाई बनती है

पेठा से बनती है यह मिठाई

खबरों में उलझे रहने, देर रात घर पहुंचने, कभी डांट और कभी तारीफ के बीच ऑफिस में शाम को 15 से 20 मिनट बहुत अच्छा गुजरता है। यह समय है जब हम पांच या छह लोग कैंटीन में डिनर के लिए जाते हैं। 'बड़ी खबरों वाला दिन' न हो तो इस दौरान हम लोग बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में बात करते हैं। कोई दुखड़ा नहीं रोना। कोई 'निंदा रस' नहीं लेना। कभी घर के खाने की चर्चा तो कभी किसी की मजेदार टिप्पणी को याद
और यह है फसाद का जड़ कद्दू
कर हंसना। हमारे समाचार संपादक हरेश जी, हमारी इंचार्ज मीनाक्षी जी और अन्य साथी जतिंदरजीत, नरेंद्र और दिनेश होते हैं। पिछले कुछ दिनों से एक चर्चा रोचक हो चली है। चर्चा का विषय है, 'कद्दू, पेठा और घीया।' कुछ साथियों का कहना है कि कद्दू और पेठा एक ही है। कुछ इसे अलग-अलग बताते हैं। मैं भी अलग-अलग मानने वालों में हूं। फिर बात आयी देशज शब्दावली पर। पंजाब में लौकी नहीं सिर्फ घीया कहते हैं। ऐसे ही कद्दू को ही पेठा कहते हैं। बात जो भी हो, चर्चा है बड़ी रोचक। इसी दौरान मैंने कहा, 'लगता है सभी सब्जियों का एक-एक पीस (टुकड़ा नहीं, पूरा)' लेकर आऊंगा। हरेशजी बोले-'इनकी अलग-अलग सब्जी भी आपको बनवाकर लानी है और इस पर ब्लॉग भी लिखना है।' सब्जी कब बन पायेगी, यह तो मैं भी स्पष्ट नहीं बता पाऊंगा। लेकिन लिखना मेरे हाथ में था सो लिख दिया। कुछ फोटो भी इस पोस्ट के साथ अटैच कर रहा हूं। देखिये।

Tuesday, March 14, 2017

अब तो सब हो गये स्मार्ट

कौस्तुब के हाथ में जब स्मार्ट फोन आया तो उसे लगा जैसे अपने परिवार में सबसे पहले उसी के हाथ में एक ऐसी वस्तु आ गयी है जिसमें फेसबुक है, जिसमें व्हट्सएप है और जिसके जरिये अब वह हर समय ऑन लाइन रह सकता है। कुछ पल के लिये वह ऑफिस का तनाव भी भूल गया। असल में ऑफिस में भी उससे कई बार कहा गया कि स्मार्ट फोन ले लो, अर्जेंट मेल देखने के लिये ठीक रहता है। वीडियो, ऑडियो, टैक्ट्स मैटर सबकुछ तो अब उसकी तुरंत प्रभाव से पहुंच में था। इस बीच जिन लोगों को पता चला उन्होंने व्हटसएप मैसेज भेजने शुरू कर दिये। वह खुश होकर घर में कभी बच्चों को तो कभी पत्नी को बताता देखो फलां ने मैसेज भेजा है। उसे कैसे पता चल गया, यह सवाल उठता? इससे पहले कि वह कोई जवाब देता बच्चे ही बोल पड़ते, अरे मम्मा आजकल पता चल जाता है कि किसके पास स्मार्ट फोन है और किसके पास नहीं। इस बीच मोबाइल कंपनियों के भी फोन आये कि आप 3 जी ले लो, 4जी ले लो। ये स्कीम है वगैरह-वगैरह। मित्र लोग तो कौस्तुब को कब से ताकीद कर रहे थे, जल्दी से स्मार्ट फोन ले लो फिर हम लोग अपना ग्रूप बनायेंगे। देखते-देखते कई ग्रूप बन गये। कुछ को तो वह जानता भी नहीं था। लोगों ने कहा जानकार नहीं हैं तो ग्रूप से एग्जिट हो जाओ। अब तक तो ग्रूप बनाने में जैसे कौस्तुभ खुद को माहिर मानने लगा।
उसके मन में आया कि वह भी एक ग्रूप बनाये। इस बीच उसे पता चल चुका था कि उसके तो परिवार में ही कई लोग स्मार्ट फोन वाले हैं। कई लोग व्हट्सएप इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे पहले कौस्तुब को कई बार तब ग्लानि होती थी जब बच्चे के स्कूल में टीचर्स कहते कि आप व्हट्सएप पर हैं। इसमें ये जानकारी शेयर कर देंगे, वो जानकारी शेयर कर देंगे वगैरह-वगैरह। लेकिन तब स्मार्ट फोन उसके पास था ही नहीं। बहुत जरूरत भी महसूस नहीं हुई। अब स्मार्ट फोन आने पर कौस्तुभ ने अपने परिवार के लोगों में उन लोगों की सूची बनायी जिनके पास स्मार्ट फोन था और जो व्हट्सएप इस्तेमाल कर रहे थे। इसमें उसने नजदीकी या दूरी जैसा कोई पैमाना नहीं बनाया। व्हट्सएप ग्रूप का नाम उसने रखा ‘मेरा परिवार।’ इसमें वह अपने सगे संबंधियों को धड़ाधड़ जोड़ने लगा। कुछ लोगों को यह पहल बहुत अच्छी लगी। किसी ने लोगो भेजकर सुझाव दिया कि इसे प्रोफाइल पिक्चर बना लो तो किसी ने इसे बेहतरीन पहल बताया। कुछ लोग सुस्त भी लगे। कोई रेस्पांस नहीं। धीरे-धीरे इसके सदस्यों का दायरा बढ़ता गया। इसमें कौस्तुभ के ससुराल के लोग थे, कौस्तुभ के भतीजे-भतीजी थे, भांजे-भांजी थे। ससुराल के रिश्तेदारों के रिश्तेदार थे, तो भाई के रिश्तेदारों के रिश्तेदार भी। बस ग्रूप में जोड़ते वक्त वह यही देखता कि उनके पास स्मार्ट फोन है कि नहीं। इन्हीं में से किसी ने अपने भाई का नंबर दिया जोड़ने के लिये तो कुछ ने अपनी पत्नी का। फेसबुक पर लाइक, कमेंट के रोग की तरह ही अब कौस्तुभ एक दिन में कई बार अपना परिवार ग्रूप में नजर दौड़ाता। कोई भी मैसेज, वीडियो या टैक्स्ट आता तो वह तुरंत घरवालों को बताता। देखो-देखो फलां ने यह मैसेज भेजा है। अरे देखो ललित ने आज अपने प्रोफाइल में चिंटू की फोटो डाली है। अरे मुन्ना जी तो आज बड़े स्मार्ट लग रहे हैं। नितिन ने देखो समुद्र किनारे की फोटो डाली है। घर में रोजमर्रा की चर्चाओं में अब मेरा परिवार की ग्रूप की बातें होना भी शामिल हो गयी। कभी-कभी तो बच्चे भी कहते पापा आज ये फोटो परिवार ग्रूप में डाल दो। कभी छोटा बच्चा कोई डांस करता तो उसकी वीडियो बनाकर डाल देता। धीरे-धीरे एक अजीब सा परिवर्तन आने लगा ग्रूप में। इस ग्रूप में ही जैसे ग्रूपबाजी होने लगी। एक दिन कौस्तुभ की पत्नी ने उसे बहुत उदास सा देखा। ऐसा तब भी होता जब कभी ऑफिस के मामले में कौस्तुभ का मूड उखड़ा होता। उस दिन कौस्तुभ से पत्नी ने पूछ ही लिया, क्या बात है। पहले वह टालता रहा फिर बोला आज दो लोगों ने ग्रूप छोड़ दिया। पत्नी बहुत तेज हंसी। ये भी कोई बात है उदास होने की। हो सकता है फोन खराब हो। हो सकता है कोई डिस्टरबेंस महसूस हो रहा हो। चलो एक-एक कप चाय पीते हैं, अपना वो प्रोजेक्ट पूरा कर लो। पत्नी की बात सुनने के बाद कौस्तुभ अपना डेस्कटॉप खोलकर कुछ काम करने लगा। लेकिन अंदर की एक उदासी उसे छोड़ न सकी। हालांकि ग्रूप छोड़ने वाले लोगों में से ज्यादातर वे थे जो मिलने पर तो खूब अपनापन दिखाते थे, शायद कौस्तुभ का एडमिन होना और उसके द्वारा बनाया गये ग्रूप से वे खुद को नहीं जोड़ना चाहते थे। कुछ दिन शायद ऐसे ही बने रहे, फिर उससे अलग हो गये। तमाम तरह के तर्क-वितर्कों से खुद को संयत कर धीरे-धीरे कौस्तुभ सामान्य हो गया। अब फिर से ग्रूप में परिवार के अन्य लोगों की बातें शुरू होने लगीं। कभी कौस्तुभ को ही तारीफ मिलने लगती। कभी उसको छोटों का प्रणाम और बड़ों का आशीर्वाद मिलने लगता। इस बीच एक वाकया और हुआ कि कुछ लोगों ने आपसी बातें भी उसी में शुरू कर दीं। कुछ ऐसी बातें जो अपने-अपने निजी व्हट्सएप पर भी हो सकती थीं। ये बातें लगभग वे ही लोग कर रहे थे जो उम्र में न भी सही तो रिश्ते में कौस्तुभ से छोटे थे। एक दिन कौस्तुभ ने खुद को बड़ा समझते हुए ऐसी अपील कर डाली कि उसके रिएक्शन का उसे भी गुमान नहीं था। उसकी अपील थी, ‘यह ग्रूप परिवार का है। निजी बातों के बजाय हम लोग सामूहिक चीजों को उठायें। प्रहसन भेजें। आरोप-प्रत्यारोप के लिये और भी फोरम हैं। उम्मीद है सब ध्यान रखेंगे कि परिवार के लोग रोचक चीजों का आदान-प्रदान करेंगे। नेगेटिव चीजों से बचेंगे।’ कौस्तुभ के इस बयान पर कई प्रतिक्रियाएं आयीं। किसी ने इस तरह का निशान पोस्ट किया जिससे लगा कि उन्होंने सहमति जताई है। कुछ ने कोई रेस्पांस नहीं दिया और कुछ तो आक्रामक मुद्रा में आ गये। जिनको कौस्तुभ अपना बेहद करीबी मानता था, जिनसे वह कोई ऐसे किसी जवाब की उम्मीद नहीं रखता था, जिनको लेकर वह अक्सर दंभ भरता था, उन्होंने ही बड़ी प्रतिक्रिया दी। एक का जवाब ऐसा आया जिसका लब्बोलुआब था कि ग्रूप है तो ऐसा होगा ही। बेहतर हो दो ग्रूप बन जायें। फिर कुछ लोगों ने आपस में तय किया कि इसमें अब कोई पोस्ट नहीं भेजनी है, कोई रेस्पांस नहीं देना है। कौस्तुभ कभी सोचता शायद सभी व्यस्त होंगे, इसलिये कोई मैसेज नहीं आ रहे हैं। शायद ये, शायद वो। धीरे-धीरे कौस्तुभ का मन भी पक्का हो चला। वह उन दो-तीन लोगों की तारीफ करता जो तुरंत रिएक्शन नहीं करते थे। कभी-कभी उनके मैसेज आते, लेकिन वह नेगेटिव या पॉजिटिव पर कोई जोर नहीं देते। जैसे उधो न माधो। कौस्तुभ अपने काम में रहता। व्हट्सएप के इस अनुभव से उसे अब अच्छा-अच्छा सा लगने लगा। रहीम के उस दोहे की तरह – रहिमन रहिला की भली जो थोड़े दिन होय, हित अनहित या जगत में जान परत सब कोय। अब तो बस वह देखना चाहता था कि इस ग्रूप में आखिर उसके साथ रह कितने जाते हैं। किसी की बात किसी से खराब लगे, असहमति हो सकती है, लेकिन इस ग्रूप का सारा दारोमदार तो कौस्तुभ खुद पर समझता था। शायद था भी। बल्कि कभी-कभी उसे परिवार के बहुत छोटे से सदस्य का वह मैसेज बहुत अच्छा लगता जिसमें लिखा होता-चाय वाला पीएम बन गया, दसवीं फेल सीएम बन रहे हैं और एमबीए पास व्हट्सएप ग्रूप एडमिन बनकर सोच रहे हैं जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया। कौस्तुभ की यही इच्छा रहती कि उसके ग्रूप में इसी तरह के प्रहसन हों। उसे लेकर भी हों। लेकिन उसके साथ कभी भी कहां हुआ ऐसा। इस ग्रूप की बातों के बहाने वह अपनी बातें रखना चाहता, दूसरों की सुनना चाहता। इस ग्रूप के कई ग्रूप बन गये। कुछ पर गुजारिश काम आई कि अब इसमें मैसेज मत भेजा करो। कुछ पर किसी के करीबी होने के बावजूद कोई असर नहीं रहा। वह लगातार इसके संपर्क में बने रहते। कभी गुड मार्निंग तो कभ गुड नाइट और कभी-कभी कोई जोक। बीच-बीच में कुछ अतिवादी मैसेज आ जाते। कौस्तुभ का मन करता कि ऐसे लोगों को टोके, लेकिन ‘नाकवालों’ की चिंता उसे होती। बुरा न मान जायें। फिर भी वह कभी-कभी अपनी बात कह जाता। ‘अतिवादी मैसेज न भेजें, यह तो प्रहसन का मंच है।’ इस तरह के मैसेज वह फारवर्ड कर देता। धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह ही इसका क्रेज भी कम होता चला गया। जरूरी मैसेज पर वह नजर डालता। परिवार ग्रूप में मैसेज आते, जानकारी आती। कौस्तुभ भी कभी-कभी अपने मैसेज या कभी कोई खास लिंक भेज देता। अब रुटीन का दुखी होना उसने छोड़ दिया। कोई ग्रूप छोड़ रहा है, कोई जोड़ने के लिए कह रहा है। किसी ने बातचीत बिल्कुल बंद कर दी है। इन सब बातों का अब कौस्तुभ पर असर नहीं पड़ रहा था। वह तो अब इस आभासी दुनिया से अलग हकीकत की दुनिया में लोगों के सही बने रहने की दुआ करने लगता। क्योंकि व्हट्सएप पर ज्ञान की जितनी बातें होतीं, वह पढ़ने में लगतीं तो अच्छी, लेकिन कई लोगों ने ज्ञान की बातों का उलटा ही किया। अब वह हकीकत की दुनिया में जी रहा है। ग्रूप में आये मैसेज को पढ़ लेता। कभी खुश होता है तो एकाध मैसेज खुद भी डाल देता कभी उदास होता तो दूसरे लोगों के भेजे जोक्स को पढ़ लेता। वह समझ गया था कि एक आभासी दुनिया के ग्रूप से वह परिवार को पूरी तरह तो नहीं जोड़ सकता। किसी पर जोर जबरजस्ती भी कैसे करे, अब तो सब सयाने हो गये हैं, बिल्कुल फोन की तरह स्मार्ट।
-केवल तिवारी

Sunday, February 26, 2017

हरियाणा घूमने की शुरुआत एक विवाह समारोह से

सेल्फी पूरी नहीं आ पायी। अनाड़ी
हुक्का गुड़गुड़ाते ताऊ
पिछले शुक्रवार शाम कुछ खबरें निपटाने के बाद कुछ खबरों की ही चर्चा में मशगूल थे कि दीपक जी (दैनिक ट्रिब्यून आने के बाद मेरे उन साथियों में शुमार जिनसे जल्दी करीबियत बनी) ने कहा, 'कल एक शादी में जाना है चलेंगे।' बिना यह सवाल किए कि कहां, कैसे? पूछे, मैंने कह दिया, 'हां चलिये।' कितने बजे निकलना होगा? सुबह 8 से 8:30 के बीच। शाम तक पहुंच जाएंगे ना? ड्यूटी भी करनी है? हां-हां, मुझे भी आना है। जाना तय हो गया। अपने संकोची स्वभाव के मुताबिक फिर एक सवाल पूछा, आपके साथ और कौन-कौन हैं? दीपक जी ने कहा, 'कोई नहीं?' मैं मन से तैयार हो गया। असल में मुझे लगा, ऐसा न हो कि दीपक जी सपिरवार जा रहे हों और मुझसे ऐसे ही पूछ लिया और मैंने हां भी कर ली। खैर... अपने पूरे यात्रा विवरण की भूमिका के लिए यह लिखना जरूरी था।
हम लोग सुबह 8 बजे के करीब एयरपोर्ट चौक रायपुर खुर्द लालबत्ती के पास मिले और शुरू हो गया सफर। असल में हमें जाना था कुरुक्षेत्र से आगे, कैथल के पास बटेठी गांव। मुझ कुछ चीजों का अलग अनुभव हुआ, जिसके लिए मैं अपने ब्लॉग में उन्हें साझा करने को आतुर हो गया। एक तो दीपक जी ने सुनाया फोटो वाला किस्सा। किस्सा कुछ यूं था कि जिस 'जीत्ते' (दीपक जी लोग इसी नाम से पुकार रहे थे) के बेटे और बेटी की शादी में हम लोग जा रहे थे उनकी शादी के दौरान फोटोग्राफी का चलन नहीं था। लेकिन मिस्टर जीत्ते की इच्छा हुई कि फोटोग्राफर को बुलाया जाए। जिम्मेदारी दीपक जी को दी गयी। इन्होंने एक फोटोग्राफर को बुक कर दिया। लेकिन वह बटेढी और बटेठी गांव में अंतर नहीं कर पाया और दूसरी जगह पहुंच गया। दोनों गांवों के बीच तकरीबन 15 किलोमीटर का फर्क होगा। खैर किसी तरह वह फोटोग्राफर थकाहारा शादी में पहुंचा। फेरे चल रहे रहे थे। उसने फटाफट कैमरा तैयार किया और क्लिक करने लगा। तभी कुछ लोग आये और उसे पीटते हुए बाहर लाये। तब पता चला कि फोटो तो खींच ही नहीं सकते। पूरा माजरा सबके सामने स्पष्ट होने से पहले वह बेचारा पिट चुका था। अब समय बदल गया। इस दिन जब हम वहां पहुंचे तो जगह-जगह फोटो खिंचवाने के लिए लोग समूह में खड़े हो रहे थे।
एक बात मुझे वहां पहुंचकर अच्छी लगी कि किसी ने भी यह अहसास नहीं होने दिया कि मैं 'बिन बुलाया मेहमान हूं।' अनजान भी दुआ-सलाम करते रहे। एक जगह तो मैं कुछ देर अकेला बैठा रहा (असल में दीपक जी की कार के पीछे एक और कार खड़ी हो गयी, जब चलने लगे तो उनका पता नहीं था, उसी को ढूंढने दीपकजी चले गये) वहां दो-चार बुजुर्ग आये। सबने राम-राम की। हालचाल लिया। कई बातें होने के बाद यह पूछताछ हुई कि मैं कौन हूं? उसके बाद एक बुजुर्ग हुक्का भरकर लाये और मेरी तरफ खिसका दिया। मैं मुस्कुरा दिया। मैंने कहा, 'हुक्का आप पीयो मैं आपकी फोटो खींचता हूं।' वैसे पहले वाले किस्से के बाद मैं थोड़ा घबरा रहा था, लेकिन 'ताऊ' तुरंत फोटो खिंचवाने को तैयार हो गये और उन्होंने कैमरे की तरफ देखते ही गुड़गुड़ शुरू कर दी।
इससे पहले एक और वाकया हुआ, जिसका जिक्र करना चाहता हूं। कुछ बुजुर्ग हमारे साथ बैठे थे। मैं और दीपक जी अपने कुछ दोस्तों के बारे में बात कर रहे थे। ऐसे दोस्त जो 'प्रयोगधर्मी' बहुत हैं। कुछ उसमें से सफल नहीं हो पाये। तभी बुजुर्ग महोदय बोले, 'पूरा बाणिया बणणा पड़ै सै तब जाकर बिजनेस हुआ करै।' मैंने उनकी बात से इत्तेफाक जताते हुए सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपनी बात बतायी कि उनके पास 35 भैंसे हैं। अच्छा धंधा चल रहा है। उन्होंने कहा कुछ झोटे (भैंसा) हैं। एक नाम 'आसाराम' है। हम मुस्कुराये बिना रह नहीं पाये।
हरियाणा की सदाबहार मिठाई को कैसे नजरअंदाज कर दें। जिस शादी में हम लोग गये थे वहां अन्य चीजों के अलावा सबसे बड़ा स्टॉल मिठाई का था। मजे की बात यह थी कि लोग मिठाई भी भोजन की तरह थाली में परोसकर ले रहे थे। मुझे इस मौके पर हरियाणा के मिठाई के कई किस्से याद आए। एक वह भी कि एक जगह एक हरियाणवी बहुत देरी से पहुंचे। खाना खत्म हो चुका था। मिठाई भी। किसी बुजुर्ग ने सलाह दी कि चीनी पीसकर (खांड) उसमें घी मिलाकर फटाफट लड्डू बना दो। लड्डू तैयार कर ताऊ को दिये गये। पूछा गया मिठाई कैसी थी, वह सज्जन बोले, 'सब ठीक था बस थोड़ा मीट्ठा कम रह गया।'
एक दुखद वाकया भी हुआ। जिस शादी में हम गये वहां कोई धूम-धड़ाका नहीं था। पता लगा ढाई लाख में बुक किया गया डीजे कैंसल कराया गया। इसकी वजह थी शादी की पिछली रात पास के ही एक युवक का सड़क हादसे में मारा जाना। लोग उस वाकये को लेकर दुखी भी थे। सड़क हादसों पर कब नियंत्रण लगेगा। कभी हमारी गलती से होते हैं, कभी दूसरों की और कभी सड़क निर्माण की गलतियों की वजह से। लापरवाही का कॉकटेल अक्सर जानलेवा हो जाती है।

Friday, January 27, 2017

इस संजय से सीखिये हंसते रहना



यह संजय है। हमारे ऑफिस की कैंटीन में कार्यरत। ठिठुरती सर्दी में भी एक शर्ट में घूमने वाला। लेकिन ये बातें इसका मूल परिचय नहीं हैं। असल में संजय के जिस परिचय ने मुझे आकर्षित किया, वह है उसका 'हरदम हंसते रहना।' उसी गीत की तरह जिसके बोल हैं, 'हंस लो हरदम, खुशियां हों या गम।' संजय की तारीफ में अगर ज्यादा फिल्मी गीतों या शेर-ओ-शायरी की बातें लिखने लगूंगा तो उसके खास अंदाज, जिसे सब पसंद करते हैं, को ही न बदल बैठूं इसलिए सिर्फ उतना ही लिखूंगा जितना मैं जान पाया। असल में पिछले लगभग सालभर से संजय को देख रहा हूं। कभी-कबार ही मेरा नाता उससे पड़ता। मैंने उसे जब भी देखा वह हंसता मिला। सुबह के दस बजे भी। रात को आठ बजे भी। एक दिन हल्का उदास दिखा। वाश बेसन पर हाथ धोते वक्त। मैंने पूछ लिया, 'क्या हुआ आज कुछ उखड़े-उखड़े नजर आ रहे हो।' उसने मेरी तरफ देखा। हंसा। फिर बोला, 'अरे नहीं सर।' फिर गुनगुनाता हुआ कैंटीन की किचन की ओर चला गया। एक दिन फिर मैंने जबरन पूछा, 'कभी उदास नहीं होते हो।' वह कुछ नहीं बोला। मेरी तरफ देखा और हंसते हुए चला गया। एक दिन हम लोग (हमारे समाचा संपादक हरेश जी, मीनाक्षी जी के अलावा साथी नरेंद्र, दिनेश, जतिंदरजीत) कैंटीन में भोजन कर रहे थे। हरेश जी ने कहा, 'अभी आना तुम्हारी फोटो खींचनी है।' उसने पूछा, 'क्यों सर?' उससे मजाक किया गया, 'पुलिस को देनी है इसलिए।' वह अपनी आदत के मुताबिक हंसा और चला गया। थोड़ी देर बाद वह अपने कामों में लग गया। उसे पुकारा तो आ गया सामने और फोटो खिंचाने के लिए सामने खड़ा हो गया। मैंने पूछा, 'संजय तुम कहां के रहने वाले हो।' उसने जवाब दिया, 'उन्नाव का।' मैंने कहा, 'अरे वाह, तुम तो मेरे पड़ोसी हो। मैं लखनऊ का हूं।' वह फिर आदतन हंसा और बात आगे नहीं बढ़ाई। संजय क्यों इतना मुस्कुराता रहता है? इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए। उससे सीख जरूर लेनी चाहिए कि अगर सबसे हंस-बोलके रहा जाए तो इसमें बुराई कैसी? ऐसा नहीं कि संजय को गुस्सा नहीं आता। वह मुंहफट भी है। कभी-कबार तीखा जवाब भी देता है। लेकिन थोड़ी देर में ही अपने मूल रूप में आ जाता है। संजय से खुश रहना सीखिये। ... खुद से कह रहा हूं यह बात।

Thursday, December 8, 2016

भरपूर उम्र की महिला का चले जाना

चंडीगढ़ में पिछले चार सालों से रह रहा हूं। जाहिर है यहां रहना हुआ तो धीरे-धीरे लोगों के सुख-दुख में भी आना-जाना शुरू हो गया। यहां के सेक्टर 25 स्थित अंत्येष्टि स्थल पर भी अनेक बार जाना हुआ। हमेशा की तरह मुझे अपनी मां की याद आ जाती है। कैसे लखनऊ के अंत्येष्टि स्थल पर मां की चिता को जलते देखता रहा। कोई आंसू नहीं। 12 दिनों की पूरी रस्म भी निभाई। उसके बाद जो सालभर रोया और आज भी गाहे-ब-गाहे मां कभी सपनों में कभी हकीकत सी अगल-बगल घूमती सी महसूस होती है। बृहस्पतिवार 8 दिसंबर की दोपहर भी कुछ ऐसा ही नजारा था। हमारे ऑफिस के सहयोगी मोहित सभरवाल की दादी की अंत्येष्टि थी। हमारे समाचार संपादक हरेश जी ने इसकी जानकारी दी। मैंने भी चलने की इच्छा जताई। वहां पहुंचे तो देखा एक बुजुर्ग महिला को अंतिम यात्रा पर लाया गया है, पूरे सजधज के साथ। सिर पर मुकुट। फूलों से लकदक। लोगों से पता चला कि उनकी उम्र 99 वर्ष की थी। यह भी मालूम हुआ कि वह 15 दिन पहले ही परिवार के साथ माउंट आबू घूमकर आई थीं। एक बात और कि दो दिन पहले तक वह पूरी तरह स्वस्थ थी। बात सिर्फ इतनी नहीं कि एक महिला भरपूर उम्र जीकर इस दुनिया से रुखसत हो गयीं। बात यह भी नहीं थी कि उनकी अंतिम यात्रा को इस तरह से शुरू किया गया कि वह तो पूरी उम्र सही-सलामत रहकर गयी हैं। बात यह थी कि उस महिला के लिए तमाम आंखों में आंसू थे। उनके पड़पोते, उनकी बहू, बेटा हर कोई तो रो ही रहा था और भी लोगों की आंखें नम थीं। मेरा भी उनसे एक अनजाना सा रिश्ता था। कुछ दिन पहले ही मुझे पता चला था कि इन महिला की याददाश्त बहुत तेज है। वह ट्रिब्यून को लाहौर के जमाने से जानती हैं। मोहित के दादाजी लाहौर ट्रिब्यून में थे। मेरी दिली इच्छा थी कि कभी मोहित की दादी के साथ बैठूं। उनके संस्मरण सुनूं और कुछ लिखूं। यह हसरत दिल में ही रह गयी। बृहस्पतिवार सुबह जब सब लोगों को रोते देखा तो मेरी भी आंखें भर आईं। आंखें इस बात के लिए भी भर गयीं कि वाकई इस महिला का सबके प्रति गजब स्नेह होगा तभी तो बेटा-बहू, बेटियों के अलावा छोटा सा बच्चा भी खूब रो रहा था, मानो कह रहा था दादी तुम जल्दी चली गयी, हमें थोड़ा और बड़ा होता तो देख लेती। इन महिला को मेरा नमन। उनके परिवार को भी जिन्होंने उन्हें लंबी उम्र तक भरपूर स्नेह दिया, पूरा सम्मान दिया।

Friday, September 23, 2016

कहानी बूढ़ा ससुराल

बूढ़ा ससुराल
केवल तिवारी
पता तो यही बताया था। लेकिन पहाड़ी इलाकों में पता लगाना जितना आसान है, उतना ही कठिन भी। मन में बुदबुदाता अधेड़ उम्र का यह युवक तेज-तेज डग भरता हुआ चला जा रहा था। उसे पता था कि पहाड़ के जिस इलाके में वह जा रहा है, उसके लिए बेहद अनजान है। यदि रात हो गई तो कहीं रुकने का ठौर-ठिकाना नहीं। जाएगा कहां। साथ में पत्नी भी है। दोनों के बीच सौ-दो सौ मीटर का फासला। कई बार फासला बढ़ जाता तो बीवी की डांट के बाद कदम या तो धीमे हो जाते या वहीं ठिठक जाते। वह ताकीद करता कि मैडम कदम तेज बढ़ाओ। रात हो गई तो बुरे फंसेंगे। ऊपर से मौसम खराब हो रहा है। अरे सही से पता मालूम नहीं था तो दोपहर बाद बाजार से इधर को आने की क्या जरूरत थी। कल सुबह आ जाते। चले तो ऐसे कान्फीडेंस से थे कि जैसे सबकुछ पता हो। अब भी देर नहीं हुई है। लौट चलो। कल आ जाएंगे या जब मौका लगेगा तब आ जाएंगे। बीबी ने एक सांस में अपनी बात खत्म की और वहीं धम्म से बैठ गई। पति महोदय भी बीस कदम उल्टे आकर पास में ही बैठ गए। दूर-दूर तक देवदार और चीड़ के घने जंगल दिख रहे थे। एक अजीब सी खामोशी पूरे जंगल में फैली हुई थी। आसपास कोई दिखता भी नहीं कि पता पूछें और पहुंच जाएं अपनी मंजिल तक। दोनों पास-पास बैठ तो गए पर खामोश। उनकी खामोशी के बीच मे तेज हवा के बीच लंबे-लंबे पेड़ों से निकलती सांय-सांय की आवाज थी। पति ने ही बातचीत शुरू की, कल कैसे आ सकते हैं। यहां आकर एक रात रुकना पड़ेगा और फिर मुझे परसों ड्यूटी भी तो ज्वाइन करनी है। तो फिर आ जाएंगे, ऐसी कौन सी आग लगी है। जब दो-चार दिन की छुट्टी होगी तो आ जाएंगे। आज किसी को बताया भी नहीं है। दोबारा आएंगे तो इन लोगों को खबर करके आएंगे। या फिर इन्हें ही बाजार तक बुला लेंगे। चलो वापस चलते हैं। पत्नी अपनी बात खत्म कर खड़ी हो गई। पति ने हाथ पकड़ा, कैसी बात करती हो। आज ही पहुंचना जरूरी है। तुम समझने की कोशिश करो। आग तो लगी ही है। बेटा बार-बार बीमार हो रहा है। तुम गाहे-बगाहे बीमार हो जाती हो। पुछ्यारी ने कहा तो है कि इसका एकमात्र इलाज यही है, जिसके लिए हम जा रहे हैं। जिद छोड़ो और तेज-तेज चलो। पति ने आगे बढ़ने का जतन किया। पत्नी कुछ नहीं बोली और साथ चल दी। थोड़ी दूर जाकर पत्नी ने ही खामोशी तोड़ी। उसने कहा, देखो जी! बात तो ठीक है कि घर में दिक्कतें हैं, मुझे भी परेशानी हो जाती है, लेकिन मेरी समझ में यह कतई नहीं आता कि करे कोई और भरे कोई। आपके पिताजी का किया-धरा हम लोग भोगें, यह बात मेरी समझ से परे है। पति ने लंबी सांस छोड़ी और बोले, हां...! तुम बात तो सही कहती हो, आखिर हम लोगों का क्या कसूर है। लेकिन कभी-कभी मैं सोचता हूं कि यह सब इसलिए भी हो रहा होगा या भगवान ने कोई ऐसी लीला रची होगी कि आगे चलकर हम लोग कोई ऐसी गलती नहीं करें। पत्नी कुछ नहीं बोली। कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी। खामोशी के बीच बस आवाज आती तो उनके कदमों की या फिर कई बार पैरों से फिसलकर गिर रहे पत्थरों के टकराने की। करीब एक किलोमीटर चलने के बाद उन्हें एक गांव नजर आया जिसमें 10-12 मकान होंगे। पति ने चहकते हुए कहा, शायद यही गांव है। क्योंकि बाजार में जो लोगों ने बताया था उस हिसाब से हम लोग ठीक आ रहे हैं। अरे वह देखो मोबाइल फोन का टाॅवर। पत्नी बोली, गांव में और सुविधाएं हों या न हों पर ये मोबाइल टाॅवर हर जगह दिख जाते हैं। पति ने कहा इसमें हर्ज क्या है। कम से कम लोगों को एक सुविधा तो मिली है। लेकिन ऐसी सुविधा किस काम की। कहकर पत्नी फिर बैठ गई और बोली थोड़ी देर रुको फिर चलेंगे। पत्नी बैठ गई और पति खड़े रहकर ही इस बात का अंदाजा लगाने लगा कि आखिर गांव है कितनी दूर। पत्नी बोली, दिख रहा है पास में होगा, लेकिन अभी बहुत चलना पड़ेगा, थोड़ा बैठ जाओ। हां... कहकर पति बैठ गया और वहां बिखरे कुछ चीड़ के फलों को एक जगह रखने लगा, जैसे मानो इन्हें उसे झोले में डालकर ले जाना होगा। पत्नी ने दो छोटे-छोटे पत्थर उठाए और खुद में बुदबुदाने लगी, मरने के बाद भूत लगने के तो कई किस्से सुने थे, लेकिन मरने से पहले ही भूत लगने का यह अनोखा मामला हम लोगों के गले पड़ गया है। पति ने यह बुदबुदाहट सुन ली और बोला, देखो इस तरह भूत-भूत लगना मत बोलो। यह कोई भूत का मामला नहीं है। तो फिर क्या है। पत्नी झल्लाते हुए बोली। पति बोला, देखो वह महिला सच्चरित्र रही होगी। तभी तो उसके बुढ़ापे में ही सही हम सबको उसकी याद तो आई। पत्नी तर्क को मानने को तैयार नहीं थी। उसने पूछा-याद-वाद हम लोगों को दिलाने के पीछे भगवान की क्या मंशा हो सकती है। पति इस बार चुप रहा। खड़ा हुआ और बिना पत्नी से चलने के लिए कहे, कदम बढ़ा दिया। करीब दो सौ मीटर आगे जाकर पीछे मुड़कर देखा। पत्नी भी हौले-हौले चली आ रही थी। शाम लगभग घिर आई थी। थोड़ी भी अगर देर हुई तो रास्तों पर कुछ दिखेगा नहीं और बाकी का सफर पूरा करना कठिन होगा। तभी कंधे पर भारी बोझ लादे दो महिलाएं, एक बच्चा और एक पुरुष दिखा। पति-पत्नी ने उनके पास आते ही एक सवाल दागा, भाई साहब गुलेटी गांव कहां है। कोई उनकी बात का जवाब देता उससे पहले ही बच्चा बोल पड़ा हम वहीं जा रहे हैं। साथ चल रही दो महिलाओं में से एक बोली, बेटा इनका झोला पकड़ ले। बच्चे ने उस दंपती से झोला लेने की कोशिश की तो पति बोले, नहीं धन्यवाद, बस यह बताइए कितना समय और लगेगा। उसके बोलने के अंदाज से इन लोगों ने अंदाजा लगा लिया कि ये पहाड़ों में चलने के आदी तो नहीं हैं। एक महिला बोली, बस 15 मिनट और। आपके 15 मिनट का मतलब है हमारा पौन घंटा, पति बोला। वे लोग हंसते हुए बोले नहीं धीरे-धीरे भी आएंगे तो आधे घंटे में पहुंच जाएंगे। इतना कहते ही यह पूरा परिवार तेजी से आगे बढ़ गया। थोड़ी दूर जाकर एक महिला ठिठकी, जैसे कुछ पूछना अभी बाकी रह गया हो। उसने इस दंपती से सवाल दागा, आखिर आप लोगों को किसके घर जाना है। मियां-बीबी ने एक दूसरे को देखा। कुछ देर दोनों चुप रहे, फिर बोले, बद्रीदत्त जी के यहां। अच्छा... आप उनके कौन हुए, महिला ने एक और सवाल पूछ लिया। दूर के रिश्तेदार, इस बार पति ने बिना देर लगाए जवाब दे दिया। फिर महिला ने कुछ नहीं पूछा और वह तेजी से आगे बढ़ गई। रात घिरते-घिरते यह दंपती आखिरकार गुलेटी गांव पहुंच गए। बद्री दत्त जी, उनकी पत्नी माधुरी और बेटा सुरेश घर के बाहर ही थे। उन तक खबर लग गई थी कि एक महिला और पुरुष उनके घर आने वाले हैं। क्योंकि रास्ते में मिले कुछ लोग इन लोगों से 20-25 मिनट पहले पहुंच गए थे। गांव में कुल मिलाकर 12 घर थे। उनमें से दो पर ताला जड़ा था।    रात घिर रही थी, लोग अपने मवेशियों को चारा दे रहे थे। कुछ लोग सिर पर पानी की गगरी लेकर आ रहे थे। अंधेरी होती रात में एक अजीब रौनक थी, ठीक वैसे ही जैसे दिन की शुरुआत होती है। पति ने बद्री दत्त जी से ही पूछ लिया, यहां बद्रीदत्तजी का घर कहां पर है। मैं ही बद्रीदत्त हूं, उन्होंने जवाब दिया। उनके बेटे सुरेश ने पूछा आप कहां से आए हैं। माधुरी बोली, पहले अंदर बिठा लो। यह कहते हुए उन्होंने पत्नी की तरफ इशारा किया और पांच-सात सीढ़ियों को पार कर अंदर पहले कमरे में ले गईं। कमरे में एक बड़ी चारपाई थी। चार कुर्सियां पड़ी थीं और नीचे बैठने के लिए चटाई बिछी थी। माधुरी ने चप्पल उतारे तो लगभग अंदर जा चुकी महिला ने वापस आकर अपनी सैंडिल उतारीं। तब तक सभी लोग अंदर आ चुके थे। आवाजें सुनकर अंदर से एक बुजुर्ग महिला भी बाहर आ गई। कौन है माधुरी, महिला ने पूछा। दीदी तू यहां बैठ जा, अभी बताते हैं। कहकर बद्री दत्त जी ने सवाल किया, शाम होने को आई है, ठंडा पानी पीएंगे क्या। यहां तो झरने का पानी बहुत ठंडा है, कहिए तो गर्म करा दें। इस बार महिला ने जवाब दिया, हां ठंडा ही पिला दीजिए। बहुत थक गए हैं। बुजुर्ग महिला से फिर नहीं रहा गया, उसने फिर सवाल किया, कहां से आए हो तुम लोग। इस बार उस पुरुष ने ऐसा बोला कि अंदर चाय की तैयारी करने जा रही माधुरी और सुरेश भी जहां के तहां ठिठक गए। पुरुष ने कहा, मैं आपका बेटा हूं। बाकी लोग कुछ पूछते या कहते, बुजुर्ग महिला बोली अरे तू दिनेश है। पुरुष बोला हां और यह आपकी बहू, इसका नाम नीता है। क्या कहा गीता, नहीं नीता या नीतू, कुछ भी कह लीजिए। माजरा बद्रीदत्त जी को भी समझ में आ गया। बोले आप रुद्रपुर में रहते हैं। दिनेश बोले, हां परिवार वहां है, मैं इन दिनों नैनीताल में पोस्टेड हूं। किस विभाग में। रोडवेज में। फिर दिनेश ने पूछा और आप। बद्रीदत्त जी बोले, अध्यापक था अब रिटायर हो चुका हूं। फिर बिना रुके बोले, कुछ-कुछ कहानी इन्होंने बताई तो थी, लेकिन आप यहां तक आ जाएंगे, इसका अंदाजा नहीं था और न ही उम्मीद थी। आपकी पत्नी इनकी बहन हुई न, दिनेश ने पूछा। हां। बस इतना ही जवाब दिया बद्रीदत्त जी ने और अंदर चले गए। कुछ देर पूरे घर में सन्नाटा छाया रहा। फिर बुजुर्ग महिला से नहीं रहा गया। बोली, कितने बच्चे हैं दिनेश तेरे। मां दो बेटे हैं और एक की शादी होने वाली है। अच्छा इतने बड़े हो गए हैं। फिर दिनेश ने कहा, मैं तुम्हें लेने आया हूं। तब तक बद्री दत्त जी बाहर के कमरे में आ चुके थे। अरे आप अचानक कैसे ले जा सकते हैं। मुझे इनके मायके वालों से पूछना पड़ेगा। आखिर इनको यहां मेरी जिम्मेदारी पर छोड़ा गया है। माधुरी को बद्रीदत्त जी के स्वभाव का पता था, डर था कहीं झगड़ न पड़ें। अरे अभी थोड़ी ले जा रहे हैं। चाय पी लो, खाना खा लो। फिर कल आराम से हो जाएंगी बातें। उन्होंने नीतू से कहा, तुम चाहो तो हाथ-मुंह धोने पीछे जा सकती हो। एक छोटा सा गुशलखाना बना रखा है। पहाड़ों में तो ऐसा ही ठहरा। उसका उत्तर जाने बिना माधुरी ने पूछा, खाने में क्या पसंद है। पहाड़ की कोई चीज पसंद हो तो बताना, वह भी बन जाएगी। नीतू बोली हां चाय पी लूं, फिर हाथ-मुंह धो लूंगी। खाने में आप कुछ भी बना लो, कोई विशेष भूख नहीं है। बुजुर्ग महिला चुपचाप चाय सुड़कने में व्यस्त हो गई। बद्री दत्त जी अब कुछ नहीं बोल रहे थे। दिनेश ने बात शुरू की। आप कल सुबह इनके मायके वालों से फोन पर बात कर लीजिए। असल में मेरा इनको ले जाना बहुत जरूरी है। घर में आए दिन कोई न कोई समस्या हो जाती है। सबकुछ होते हुए भी हम लोग परेशान रहते हैं। एक जगह पूछ कराई तो इनके बारे में पता चला, उसके बाद सीधे इनको लेने आ गए हैं। आपको पता ही नहीं था, बद्रीदत्त जी ने आश्चर्य से पूछा। दिनेश ने कहा, सही में हमें नहीं मालूम था। जब पूछ करने पर पता चला तो हम सीधे अपने गांव गए। वहां पिताजी छोटे भाई के साथ रहते हैं और बहुत बीमार हैं। उनसे भी जब हमने सवाल किया तो पहले वे गुस्से में थे, बातों को टाल रहे थे, लेकिन अंततः उन्होंने हामी भर दी कि हां, यह बात सही है कि तुम्हारी एक मां और है। फिर हमने तमाम जगह से पता लगाया और यहां पहुंचे हैं। लेकिन अब लेजाकर क्या इनकी देखभाल कर पाओगे, अब तो इनके भाई भी इस दुनिया में नहीं रहे। दिनेश ने कहा, आप चिंता न करें। कुछ और बातें करने के बाद और बिना बुजुर्ग महिला की सहमति के खाना खाकर सब सो गए। अगले दिन गाजियाबाद रह रहे बुजुर्ग महिला की भाभियों और भतीजों को फोन लगाया गया। सारी कहानी बताई गई और पूछा गया कि क्या भेज दें। इधर इन लोगों ने मंत्रणा के लिए आधे घंटे का वक्त मांगा। बड़े भाई के बेटे के यहां यह बुजुर्ग महिला अक्सर आती रहती थी, जब तक उनकी मां जीवित थी। लोगों ने एक दूसरे से पूछा, बात हुई। फिर कहा गया कि इसमें बुराई कैसी। आधे घंटे बाद गुलेटी गांव फोन किया गया कि ले जाने दीजिए। तय हो गया कि महिला को अब दिनेश के साथ जाना है। पैदल रास्ता था, बुजुर्ग महिला के साथ दिनेश और उनकी पत्नी सुबह आठ बजे चल पड़े। लोगों ने कुछ सवाल पूछने चाहे। कुछ को बद्रीदत्त जी ने चुप करा दिया और कुछ से माधुरी ने कहा कि बाद में सब बताएंगे। असल में यह सब जानते थे कि ये बुजुर्ग महिला जो इतने समय से इनके साथ रह रही है माधुरी की बहन है। यह भी सब जानते थे कि बचपन में उनकी शादी हुई थी और कुछ ही समय बाद कुछ अनबन की वजह से उनके पिताजी उनको मायके ले आए थे। आज न उनके पिता जीवित हैं, न माताजी। और तो और भाई भी एक के बाद एक चलते बने, बस एक भाई हैं, उनकी भी हालत खराब है। भाभियों में एकमात्र भाभी बची हैं। खैर आज इस बुजुर्ग महिला को ससुराल जाना था। जाते वक्त माधुरी और उनकी बड़ी बहन यानी यह बुजुर्ग महिला गले मिलीं। कुछ देर को सुबकीं। आंसू पोछे और चलते बने। माधुरी ने कहा, चिंता मत कर हम वहां आते रहेंगे। और बजुर्ग महिला अपने बेटे और बहू के साथ चल पड़ीं ससुराल को। उस ससुराल की ओर जहां के लोगों को भी इस मां या दादी-नानी के बारे में तब पता चला, जब वहां कुछ लोगों को दिक्कतें आनी शुरू हो गईं। रास्ते में दिनेश ने अपनी मां से बेहद औपचारिक भाव से खाने या पानी पीने के लिए पूछा। बुजुर्ग महिला बस ना में सिर हिला देती। बहू नीतू से कोई बात नहीं हुई।
रूद्रपुर पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई। इनके वहां पहुंचते ही आसपास के लोग वहां आ गए। कुछ ने कहा, अच्छा किया बेचारी को ले आए, कुछ बिन मांगी सलाह देने लगे। बुजुर्ग महिला को उनका कमरा दिखा दिया गया। यह भी कहा गया कि तीन दिन बाद गांव जाना है पीपलकोट। वहां पिताजी अंतिम सांसें ले रहे हैं। बुजुर्ग महिला के पास आधे घंटे बाद एक गरीब सा दिखने वाला युवक जो था तो 35 वर्ष के करीब का, पर लग रहा था 50 का, एक गिलास में चाय ले आया। बुजुर्ग महिला चाय हाथ में लेते हुए उसकी तरफ कुछ पूछने के अंदाज में देखने लगीं। खुद ही बोल पड़ा युवक-मैं आपका छोटा बेटा हूं महेश। नौकरी नहीं है, यूं ही कभी-कबार कुछ काम कर लिया करता हूं। शादी हो गई। नहीं। दोनों के बीच बात के बाद कुछ देर सन्नाटा। तब तक बाहर से आवाज आती है, महेश वहीं रुक गया। वह दौड़ा-दौड़ा चला आता है। बुजुर्ग महिला के समझ में कुछ-कुछ आ रहा था।
तीन दिन बाद सब लोग पीपलकोट पहुंच गए। वहां एक बुजुर्ग खाट पर लेटे थे। कुछ तीमारदार आसपास बैठे थे। पास में एक बर्तन में कुछ मिट्टी डाल रखी थी। बुजुर्ग अचानक तेज खांसी खांसते कुछ कफ उस बर्तन में थूकते, फिर लेट जाते। इनके जाते ही वहां कुछ हलचल हुई। बुजुर्ग ने इशारों में सबको आशीर्वाद दिया। दिनेश बोला, पिताजी ये... ईजा...वो ... कहते-कहते वह रुक गया। बहू ने कहा, तमाम पूछ कराने के बाद पता चला कि इनके कारण दिक्कतें आ रही हैं तो हम इन्हें लिवा लाए हैं। बुजुर्ग ने एक नजर महिला की तरफ देखा और आंखें बंद कर ली। रात के खाने की तैयारी घर में अन्य लोगों ने की। सबने ताकीद की कि पिताजी की तबीयत बहुत नासाज है। रातभर बारी-बारी से जगना पड़ता है। बुजुर्ग महिला बोली, आज मैं जग जाऊंगी, कोई दिक्कत होगी तो आप लोगों को उठा दूंगी। बहुत मुश्किल से बुजुर्ग पुरुष यानी इस महिला का पति बोला, नहीं तू सो जा... थकी है.. बच्चे हैं, देखभाल के लिए। महिला के आंखों में आंसू आ गए। पुरुष भी किसी तरह अपने आंसुओं को छिपाने की कोशिश करने लगे। इतने में चाय आ गई। सब चाय सुड़कने लगे। अचानक बुजुर्ग पुरुष खांसते-खांसते उठे और महिला की ओर देखकर हाथ जोड़ने लगे और वहीं खाट पर गिर पड़े। सब हड़बड़ाकर उठ बैठे। बुजुर्ग पुरूष को देखा गया। आंखें खुली थीं, पर कोई हरकत नहीं। सांस भी थम गई है, एक व्यक्ति बोला। महेश जोर-जोर से रोने लगा। सबने उसे चुप कराया। महिला रो तो नहीं पा रही थी, पर बेचैन बहुत हो रही थी।
पूरे पंद्रह दिन लग गए। गांव में क्रिया-कर्म और खेती-बाड़ी सौंपने और अन्य काम में। महेश ने एक बार इच्छा व्यक्त की कि उसे और मां को गांव में ही रहने दिया जाए, लेकिन भैया-भाभी तैयार नहीं हुए। सब लोग फिर से रूद्रपुर आ गए। अब दिनेश के पास बिल्कुल छुट्टी नहीं बची थी। उसे अगले ही दिन नैनीताल निकलना था। यूं वह हर हफ्ते आते रहते। धीरे-धीरे एक साल होने को आया। दिनेश के पिताजी की बरसी करीब आ गई। तय हुआ कि गांव में ही चलकर बरसी की जाए। सबलोग गए, पर बुजुर्ग महिला को इस बार ले जाने के लिए कोई राजी नहीं हुआ। मुरादाबाद उनके भतीजे को फोन लगाया गया। मजबूरी बताई गई। भतीजा रातोंरात जाकर बुआ को ले आया। अब आएदिन बुजुर्ग महिला को मुरादाबाद भेजने के कारण या बहाने ढूंढ़े जाते। इस बीच दिनेश के बेटे की शादी तय हो गई। तैयारियों के सिलसिले में इधर-उधर जाना होगा, इस बहाने से बुजुर्ग महिला को मुरादाबाद भेजने की तैयारी हुई। इस बार भतीजा सख्त हो गया। उसने सख्त लहजे में कहा, 75 साल रखा है अपनी बुआ को आगे भी रख लेंगे, लेकिन ये रोज-रोज का ड्रामा नहीं चलेगा। ससुराल पक्ष को लगा, बेटे की शादी के दौरान बुढ़िया कोई शाॅप न दे दे। डर के मारे बुजुर्ग महिला को अपने पास ही रखा। बेटे की शादी भी हो गई। अब तो बस इंतजार था, बुढ़ापे में ससुराल आई इस औरत के इसके पति के पास जाने का। जिस पति के साथ जीते जी नहीं रह पाई, क्या वह किसी और जहां में मिलेगा, कौन जाने।

Thursday, September 15, 2016

कहानी कृष्ण पक्ष की चांदनी



कृष्णपक्ष की चांदनी
माथे पर हथेली की छतरी बनाकर वह दूर-दूर तक देखने की कोशिश करती। अभी आये नहीं … फिर दौड़कर आंगन से होती हुई घर में दाखिल हो जाती। चूल्हे पर रखी दाल को देखने के लिये। पकने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा क्योंकि मिली-जुली दाल जो है। असल में बहू और उसके बच्चों को यही दाल बहुत पसंद है। बेटा तो कुछ भी खा लेता है। वैसे बेटे ने कभी अपनी पसंद भी कहां जाहिर की। छोटा बेटा जरूर नाक-भौं सिकोड़ता। नाराज भी हो जाता। प्यार भी जताने लगता। लेकिन बड़े बेटे की चंचलता का कोई वाकया शायद ही याद होगा। वैसे चंद्रकला देवी उर्फ चांदनी का अतीत में झांकने को कोई मन भी नहीं करता। अगर वह भविष्य की भी चिंता न करती तो शायद महान हस्ती होती। गीता का ज्ञान उसे पूरा हो लेता, कल बीत चुका है, आने वाला कल किसने देखा है, क्यों चिंता कर रहे हो। वर्तमान चल रहा है, उसमें जीयो। बीते कल की बातें वह करतीं जरूर, पर कोई भावनात्मक रूप से नहीं। वर्तमान में खूब जीती, लेकिन भविष्य की चिंता हमेशा रहती। वैसे वह अब इस दौर में थी कि उसे भविष्य की चिंता करनी ही नहीं चाहिए थी। लेकिन मन है, पता नहीं कैसा भविष्य होगा। ऐसे ही खयाल आते। पर यह कभी नहीं सोचा जिस भविष्य की वह चिंता कर रही है, वह कितना बडा होगा और कब आयेगा।
आज चंद्रकला देवी उर्फ चांदनी का बड़ा बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ पूरे दो साल बाद आ रहा था। यह बेटा उसके पास रहा ही बहुत कम। दसवीं पास करने के बाद हास्टल चला गया। वहीं से एक नौकरी के लिए परीक्षा दी तो उसमें सफल हो गया और पहली ही पोस्टिंग मिली मुरादाबाद में। छोटा बेटा मस्तमौला। पिता कभी-कबार उसे डांटते, पर बेटा सबकुछ अपने हिसाब से ‘मैनेज’ कर लेता। बड़े की नौकरी लग गयी। छोटा अभी पढ़ रहा था, पिता के काम में भी हाथ बंटाता। वैसे पिता का कोई कारोबार नहीं था। वह तो छोटे-मोटे किसान थे। पंडिताई भी जानते थे तो शादी-व्याह के सीजन में छोटा बेटा भी साथ चल देता। पंडिताई अच्छी चलती थी। बाहर के काम तो इनके पिता अच्छे से करते, लेकिन घर में वह आराम को ही प्राथमिकता देते। चांदनी यानी चंद्रकला देवी आज अपने बड़े बेटे मोहन, उसकी पत्नी सुजाता और पोते मनन और पोती अनु का इंतजार कर रही थी। उसके पति पंडित राधेश्याम पांडेय आज किसी यजमान के बेटे की शादी कराने गये थे। छोटा बेटा भी उनके साथ गया था। छोटा बेटा चंचल तो था, पर पढ़ाई में बुरा नहीं। माता-पिता का हाथ बंटाता, पिता के साथ पुरोहिती करने भी जाता, लेकिन उसका मन कोई एक जगह नहीं लगता था। तमन्ना उसकी भी बाहर जाकर नौकरी करने की होती। चंद्रकला देवी के पति यानी इन्हीं दो बेटों के पिता पंडित राधेश्याम पांडेय परिवार का खर्च चलाने के लिए पुरोहिती तो करते, पर बाकी कुछ नहीं। जैसे कि कभी घर के कामों में हाथ बंटाना, दूर झरने से पानी भरकर लाना, वगैरह-वगैरह। यह अलग बात है कि कभी-कबार हारी-बीमारी में वह काम करते। पर उन्हें अच्छा लगता अगर ऐसे मौकों पर भी गांव का कोई परिवार उनकी मदद कर देता। घर के कामों में चंद्रकला देवी का कोई मददगार भी नहीं होता और कभी उसे इसकी शिकायत भी नहीं रही। ऐसा माहौल उसने बचपन से देखा था। ससुराल में भी ऐसा ही माहौल था। असल में चंद्रकला देवी का जीवन रहा ही ऐसा कि शायद शिकायत, शिकन, परेशानी जाहिर करने वाला कैमिकल उसमें कभी पनप ही नहीं पाया। 9 भाई बहनों में पांचवे नंबर की चंद्रकला को पंडित राधेश्याम पांडे के साथ 17 वर्ष की उम्र में व्याह दिया गया। पिताजी घर-परिवार के तमाम मसलों पर ऐसे उलझे कि असमय ही चल बसे। भाई तीन थे। उनमें से एक चंद्रकला की शादी के चंद वर्षों बाद ही चल बसे। एक का पता ही नहीं चला कि गया कहां? और तीसरे की पत्नी से तकरार हो गयी तो अलग-थलग रहने लगा। चंद्रकला देवी की जिस गांव में शादी हुई, वहां उसकी दीदी और बुआ पहले से ही व्याही थीं। बहुत कम ही उम्र थी शादी के वक्त चंद्रकला देवी की, लेकिन बुआ और दीदी का गांव है, इसलिए चंद्रकला देवी यानी चांदनी थोड़ी सी आश्वस्त थी।
कम उम्र में शादी और उस पर गांव ऐसा कि पहले दिन से ही नयी नवेली बहू को पानी लाना है, खेतों में जाना है, गाय भैंसों को भी देखना है। ये सारे काम तो वह मायके से भी करती आ रही थी, इसलिए दिक्कत नहीं हुई, लेकिन अब इन कामों के अलावा कुछ जिम्मेदारियां और बढ़ गयीं, मसलन, बहू बनकर भी रहना है, पति की इच्छाओं का भी ध्यान रखना है। नये माहौल में खुद को एडजस्ट भी करना है। समय बीतता गया। कभी बुआ से बातें कर ली, कभी दीदी के यहां चली गयी और मौका लगा तो कभी-कबार मायके भी। ससुराल में कई दिक्कतें आईं। पति का फक्कड़ स्वभाव, गाय-भैंसों की खास जिम्मेदारी। यही तो होता है ‘लड़कियों’ के भाग में, यह सोचकर चंद्रकला देवी रम गयी गृहस्थी में। शादी के दो साल बाद एक बेटा हुआ। बधाइयों के तांते लग गये। मायके में बेटियां ही बेटियां थीं। पिता की भी और दादाजी की भी। कहीं उसकी भी बेटियां ही न हों, इस दंश और पति की आशंकाओं से पहली मुक्ति तो मिली। बेटा खूबसूरत था। स्वस्थ भी। दिनोंदिन बढ़ता गया। अपने में मस्त रहने वाले उसके पति पंडित राधेश्याम बेटे का पूरा ध्यान रखते। उसे नहला भी देते, मालिश कर देते। कई बार तो बेटे का इतना ध्यान रखते कि पुरुष प्रधान समाज में हंसी का पात्र भी बन जाते। फिर दिखावे के लिए वह चांदनी को कभी फटकारते भी कि देखो बच्चा गंदगी से सना है, ध्यान नहीं रखती। सच तो यह था कि चांदनी को बहुत जरूरत होती ही नहीं थी बच्चे का ध्यान रखने की। वह उसे दूध पिलाने और अपने साथ सुलाने के अलावा ज्यादा ध्यान नहीं रखती। राधेश्याम जी खुश थे। पति खुश तो सारे जहां की खुशियां चांदनी को मिल गयीं।
तीन साल बाद दूसरा बच्चा हुआ। इस बार भी बेटा ही। फक्कड़ी स्वभाव का पति अब मस्त भी रहने लगा। दो बेटे हो गये। गृहस्थी अच्छी चल रही थी, और क्या चाहिए। इस बीच कुछ बुरी खबरें भी आईं। कभी मायके से तो कभी ससुराल से। ससुराल में पड़ोस में ही व्याही गयी बुआ के पति का अचानक निधन हो गया। छोटे-छोटे बच्चे। भविष्य के प्रति ज्यादा चिंतित रहने वाली चंद्रकला देवी को बुआ और उनके बच्चों के भविष्य के प्रति चिंता होने लगी। लेकिन परिवार को ही अपना संसार मानने वाली चंद्रकला कुछ मदद करने की स्थिति में नहीं थी। शायद थी भी तो कर नहीं पाती। वह चिंता कर लेती, यही क्या कम था। मायके से भी कभी पिता के गुजरने की खबर आयी तो कभी माता के। एक भाई भी चल बसे। तमाम दुखद सूचनाओं को विधि का विधान मान चंद्रकला देवी रमी रही अपनी गृहस्थी में। दोपहर में लोग भोजन के बाद आराम करते, लेकिन वह खेतों में जाती घास काटने के लिए। दो गाय और एक भैंस जो पाल रखी थी। शाम को भोजन बनाना, दूर से पानी लाना और इसी बीच कुछ समय निकालकर पास-पड़ोस की महिलाओं के साथ गप्पें भी मारना। वह अपने संसार में खुश रहती। शायद ही मन में यह बात होगी कि आराम कब मिलेगा। पति बाकी काम करें या न करें, लेकिन बच्चों को पढ़ाने और उनके नहलाने-धुलाने का काम जरूर कर देते। समय बीता और बड़ा बेटा 10वीं पास कर गया। छोटा पहुंच गया छठी में। दसवीं के बाद गांव के करीब वाले स्कूल में विज्ञान की पढ़ाई नहीं होती थी। यानी साइंस साइड नहीं थी। आर्ट्स या कामर्स ही था। बेटा दूर एक जगह हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करने लगा। वह पढ़ाई में ठीक था। 12वीं करते-करते एक परीक्षा दी पास हो गया और नौकरी लग गयी। इस बीच पड़ोस में रहने वाली बुआ के पुश्तैनी मकान में रौनक खत्म सी हो गयी। सभी बच्चे बाहर सैटल हो गये। बेटियों की शादी हो गयी और एक दिन बुआ भी दुनिया छोड़कर चल बसी। उस दिन चांदनी बहुत दुखी हुई। ऐसे तो बुआ बुढ़ापे में इधर-उधर जाती। कभी बेटे के पास तो कभी बेटी के पास। घर पर कम ही रहती, लेकिन बुआ के होने का अहसास ही चांदनी के लिए बहुत था। अब वह भी नहीं रही। परेशानियों से जूझने में माहिर चांदनी ने यहां भी बाजी मार ली। बुआ के बच्चों ने उसी को घर दे दिया देखभाल के लिए। चांदनी ने बुआ के घर में कुछ जरूरी सामान रख दिया। एक तरह से स्टोर रूम की तरह घर बन गया। कभी बुआ के बच्चे आते तो वह घर को साफ सुथरा कर देती। चाय पानी की भी व्यवस्था करती। हरदम भागती सी रहने वाली चांदनी कुछ पल बैठकर हालचाल जरूर लेती।
समय तेजी से बीता। चंद्रकला देवी के बड़े बेटे बाहर सैटल हो गये। छोटा बेटा पिता के साथ काम में लगा रहता और नौकरी की तैयारी भी कर रहा था। लेकिन चंद्रकला की भागदौड़भरी जिंदगी में कोई ठहराव नहीं आया। उसे देखकर और लोग थकान महसूस करने लगते, लेकिन चंद्रकला को कभी उफ कहते किसी ने नहीं सुना। वह खुश रहती और वर्तमान में जीती, थोड़ी चिंता करती उसे पता नहीं क्यों भविष्य भयावह लगता। आज वह बहुत खुश थी। बेटा-बहू और बच्चे आ रहे थे।
दाल पक चुक थी। आम की चटनी बनाने की तैयारी करने से पहले एक बार फिर आंगन में गयी। अब दिख गये। बहुत दूर थे। लेकिन वह तो अपनी बहू और बेटे के चलने के अंदाज से ही समझ गयी कि यही लोग हैं। फोन होता तो शायद वह छोटे बेटे को भी तुरंत बुला लेती। ऐसा नहीं हुआ। वह दौड़कर कमरे में आयी। पानी की गगरी उठायी और झरने की ओर भागी। बहू-बेटे को आते ही ठंडा पानी पिलायेगी। बहू-बेटे के घर आने से पहले ही वह एक गगरी पानी भर लायी। झरने पर भीड़ थी, लेकिन वहां लोगों से विनती कर अपनी बारी पहले लगाकर वह घर आ गयी। घर आकर उसने बाहर के कमरे में कालीन बिछा दी। बगल में रखे एक बेड पर चादर बदल ली। यूं तो सब तैयारी उसने पहले से ही कर रखी थी, लेकिन पता नहीं क्या सूझा कि फिर से कालीन और चादर बदल दिये। इसी बीच बच्चे घर पहुंच गये। बेटा तो कम ही बोलता था, लेकिन बहू, पोते-पोती से बहुत देर वह बतियाती रही। सबको ठंडा पानी पिलाया। हालचाल लिया। थोड़ी देर बाद ही सबको भोजन के लिए आने को कहा। आम-पुदीने की चटनी और मिक्स दाल से बहू और बच्चे बड़े खुश हुए। उनको खुश देखकर चांदनी यानी चंद्रकला का तो जैसे एक पाव खून बढ़ गया।
इसी तरह की छोटी-छोटी खुशियों को ही जीने के लिए चंद्रकला शायद हाड़तोड़ मेहनत करती थी। इस बार बड़े बेटे ने अपने साथ चलने की जिद की। चंद्रकला ने कहा छोटे बेटे जतिन की शादी हो जाये तो जरूर चलेगी। चांदनी को ले जाने की जिद ज्यादा बढ़ती, चांदनी ना-नुकर करके शायद मान ही जाती। शायद मन के एक कोने में उसके जाने की इच्छा दबी थी, जो उभर सकती, लेकिन इन सबका मौका नहीं मिला। कुछ दिन रुककर बहू-बेटे चले गये। चांदनी को थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अजीब लगने से क्या होता है? वह उसी तरह लग गयी अपने कामों में, जैसे हमेशा से करती आती है। पानी भरना, खेतों में जाना, घास काटकर लाना, वगैरह-वगैरह।
समय बीतता गया। कुछ ही सालों में छोटा बेटा भी राजस्थान में एक कंपनी में नौकरी पर लग गया। बस इसी का तो इंतजार था चंद्रकला देवी को। नौकरी लगते ही शादी तय कर दी और धूमधाम से उसकी शादी कर दी। एक अजब बात थी चंद्रकला देवी में। वह खुद हमेशा गांव में रही। खूब काम किया। लेकिन उसने कभी बहुओं से कोई काम नहीं कराया। शादी के कुछ ही महीनों बाद बहुओं को बेटों के पास भेज दिया। बेटे कहते भी कि कुछ माह बहू को अपने साथ रखो। काम में हाथ बंटा देंगी, लेकिन चंद्रकला को यह कतई गंवारा नहीं था। इस बात को कोई नहीं समझ पाता। वह तो बहुओं को तब भी कुछ नहीं करने देतीं, जब वह कभी-कबार एक या दो महीनों के लिए गांव आतीं। इससे और कुछ समझ आये या न आये, यह तो लगता कि उसके मन में अत्यधिक काम किये जाने की टीस तो है। यदि घर परिवार और भविष्य की चिंता में मरे जाना ही असली जिंदगी होती तो वह बहुओं को इसमें शामिल करती। यदि महिलाओं की यही नियति है, वह मानती तो वह बहुओं से खूब काम कराती। अब तो लगता जैसे वह हाड़तोड़ मेहनत कोई विरोध स्वरूप कर रही हो। उसी तरह जैसे कई देशों में हड़ताल के दौरान श्रमिक दोगुनी मेहनत करते हैं। इस अंदाज में कि ‘देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।’ पर चांदनी के लिए ऐसा कुछ नहीं था कि वह किसी कातिल को देख रही हो। वह विरोध किसका कर रही थी? न सास, न कोई और। परिवार में और लोग थे, लेकिन सब अलग-अलग रहते थे। तो क्या वह अपनी किस्मत को अपनी मेहनत से पलट रही थी? क्या उसे नियति से रंज था? या फिर मेहनत उसकी नियति बन चुकी थी। क्या उसे आराम पसंद नहीं था। वह भागती रहती। भागती रहती। दोपहर में भी। सांझ को भी। रात में ही जो नींद निकाल पाती होगी। सुबह लोग उठते तो देखते चांदनी न जाने कब भैंस को दुह चुकी है। नहा चुकी है। नाश्ता बना चुकी है। कभी-कभी तो घास काटकर भी ला चुकी है। काम का ऐसा भूत क्यों सवार है चांदनी पर। चाहे कोई कितना भला बुरा कहे, एक बात तो सब कहते, कि यह लंबी उम्र जीयेगी। क्योंकि शारीरिक रूप से फिट है। मेहनत करती है। चांदनी से लोग यह बात सीधे भी कहते, लेकिन वह बस हंसकर रह जाती। कुछ लोग बताते हैं कि शुरू-शुरू में उसके पति उसे तेज काम करने को कहते। डांटते भी। कभी-कभी शायद हाथ भी उठा देते। लेकिन अब वह कुछ नहीं कहते। शायद इसलिए कि चांदनी में अब ढीलापन दिखता ही नहीं। हमेशा चौकन्नी। काम करते दिखती। गांव की देवकी ने एक दिन समझाया, ‘चंद्रकला अब बस कर। अब नाती-पोतों वाली हो गयी हो। कोई तनाव है नहीं। थोड़ा आराम किया कर।’ असल में देवकी कोई सलाहकार नहीं थी। एक दिन भरी दुपहरी उसने चांदनी को देखा था दूसरे गांव में जाते हुए। चांदनी एक पेड़ के नीचे लगभग हांफ सी रही थी। देवकी भी कहीं से आ रही थी। पूछा, ‘कहां जा रही हो।’ ‘सूखी घास लेने।’ असल में गर्मियों के मौसम के लिए कुछ लोग सूखी घास बेचते थे। चंद्रकला को भी लगा कि अभी सही रेट पर मिल जायेगा तो वह अकेले ही चल पड़ी घास लेने। देवकी ने पहली बार आज एक थकी-हारी सी चंद्रकला को देखा तो सलाह दे दी। चंद्रकला यहां भी हंसकर रह गयी और उस गांव तक जाते-जाते करीब 20 जगह बैठकर आराम किया होगा, जहां वह कभी बिना एक बार भी विश्राम किये चली जाया करती थी। करीब 40 किलो घास को बड़े से जाल में बांधकर वह सिर पर रखकर चल पड़ी। थोड़ी देर में हड़कंप मच गया, जब खबर आयी कि चांदनी घास सहित गिर गयी है। पंडित राधेश्याम कहीं गये हुए थे। चांदनी के आस-पास के लोग वहां गये। तब तक वह संभल चुकी थी और किसी तरह घास के जाल को अपने सिर पर रखने की कोशिश कर रही थी। लोगों ने पूछा क्या हुआ। चांदनी ने कहा पता नहीं क्यों अचानक चक्कर आ गया। सिर दर्द हो रहा है। लोगों ने घास को पांच-छह हिस्सों में बांटा और ले आये। चांदनी भी साथ-साथ चली आयी। हमेशा मदद से सीधे इनकार कर देने वाली चांदनी आज इस मदद पर कुछ नहीं बोली। न वह बहुत कृतज्ञता दिखा पायी और न ही उसके चेहरे से खुशी झलकी।
पंडित राधेश्याम शाम को घर पहुंचे। तब तक चांदनी खाना बनाने की तैयारी में लगी थी। आने पर पति को पानी पिलाया। चाय बनायी। आज पता नहीं कैसे चांदनी के चेहरे से छलक रहा था कि वह ठीक नहीं है। पति ने पूछ लिया, क्या हुआ? चांदनी ने फिर सिर दर्द वाली बात बतायी। पंडितजी ने कहा, ‘चल कल दवा ले आयेंगे।’ अगले दिन पंडित जी कुछ दूरी पर स्थित एक दुकान पर गये क्रोसीन लेने। इसी दौरान उन्हें पहले दिन वाले वाकये के बारे में पता चला। वह दवा तो ले आये, लेकिन इस बात से बेहद खफा थे कि चांदनी को चक्कर आया, आसपास के लोग घास लाये यह बात उन्हें बाहर से पता चली। घर आये तो देखा चांदनी लेटी हुई थी। ऐसा कभी नहीं होता था कि सुबह दस बजे के करीब चांदनी सोयी मिले। पंडितजी अपना गुस्सा पी गये। उन्होंने चंद्रकला को क्रोसीन खिलायी और सो जाने को कहा। खुद वह गांव के पास चौपाल पर चले गये। दोपहर को भोजन का वक्त आया तो, पंडितजी को ध्यान आया, अरे आज तो घर पर ही उन्हें रहना चाहिए था। चांदनी अकेले भोजन बना रही होगी। उसका सिरदर्द अलग से हो रहा है। वह घर पहुंचे तो देखा चांदनी चादर ओढ़कर सो रही है। पहले सोचा जगाऊं कि नहीं। लेकिन फिर बोले, ‘चंद्रकला उठो, अब तो बहुत देर सो चुकी है।’ लेकिन चंद्रकला नहीं उठी। पंडितजी अब चिल्लाये, ‘अरे कुछ खाने का तो बताओ।’ चंद्रकला अब भी नहीं बोली। पंडितजी पास गये और चादर हटाई। चंद्रकला को देखा तो घबरा से गये। कोई हरकत नहीं। दौड़कर आसपास के कुछ लोगों को बुला लाये। देवकी भी आ गयीं। नब्ज टटोली गयी। चंद्रकला शायद बहुत थक चुकी थी। वह पूरी तरह सो चुकी थी। ऐसी नींद, जहां उसे न काम की फिक्र है, न गाय-भैंसों की और न ही अपने बहू-बेटों के पसंद के भोजन बनाने की।