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Friday, August 21, 2026

सात राज्यों में चुनाव : सत्ताईस में सत्ते पे सत्ता

सात राज्य चुनाव की दहलीज पर हैं। संबंधित मुद्दे पर दैनिक ट्रिब्यून में एक लेख छपा। उसकी फोटो साभार और मूल लेख





केवल तिवारी

करीब साढ़े चार दशक पहले बॉलीवुड फिल्म 'सत्ते पे सत्ता' लोगों, खासतौर से युवाओं को बहुत पसंद आई थी। सात भाइयों पर आधारित फिल्म का कथानक तो रोचक था ही, इसका गीत 'दुक्की पे दुक्की हो या सत्ते पे सत्ता, गौर से देखा जाए तो बस है पत्ते पर पत्ता... कोई फर्क नहीं अलबत्ता' सबकी जुबान पर चढ़ गया था। वह थो ती रील लाइफ, अब इस वक्त की सियासत की रियल लाइफ को लेकर आगामी 'सत्ते पे सत्ता' पर सबकी नजर है। यानी अगले साल 2027 में सात राज्यों में होने वाले चुनाव पर। युवाओं को भायी थी फिल्म सत्ते पे सत्ता और अब देशभर में यही युवा सियासतदानों की नजर में है। असल में जेनजी वर्ग (वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्म लेने वाले) चर्चाओं में है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफे के लिए मजबूर करने के बाद इन्होंने झारखंड में तो अपनी ताकत दिखाई ही, सोशल मीडिया के ज्यादातर प्लेटफॉर्म पर इन्हीं का दबदबा है। एक अनुमान के मुताबिक आगामी चुनावों में 50 से 55 फीसदी के बीच मतदाता युवाशक्ति है। ऐसे में हर सियासी दल किसी न किसी रूप में युवाओं को आकर्षित करने में जुटे हैं। उन्हीं के अंदाज में उन्हीं की बात।
गौरतलब है कि अगले साल पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। हर राज्य के अपने विशेष मुद्दे हैं। सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष, हर कोई मुद्दों को घुमाने, तोड़ने-मरोड़ने में जुटा है। कहीं उपलब्धियों का गुणगान है तो कहीं खामियों का बखान। जहां तक युवाओं के मुद्दों का मामला है, उनमें सबसे अहम शिक्षा की अच्छी व्यवस्था और रोजगार के अवसर सबसे पहले हैं। जिस जेन-जी की बात की जा रही है उनमें से कुछ तो नये वोटर होंगे जबकि कुछ ऐसे भी हैं जो वोटर पहले से हैं और गृहस्थी की दहलीज पर कदम रख चुके हैं। यानी 18 से 29 आयुवर्ग की यह जनता आगामी चुनाव में बड़ा 'खेला' कर सकती है। अगर बात करें कुल मतदाताओं में इनकी भागीदारी की, तो यह हर राज्य में अलग-अलग है, लेकिन संख्या अच्छी खासी है। पंजाब में इस आयुवर्ग के मतदाताओं की संख्या 21-22 प्रतिशत के बीच है। अगले साल की चुनावी डगर पर चल रहे दो पहाड़ी राज्यों- हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में इनकी संख्या 31 से 32 फीसदी के बीच है। उत्तर प्रदेश और गोवा की तो आधी आबादी युवा है। जाहिर है युवा मतदाताओं की संख्या भी वहां बहुत ज्यादा है। गुजरात में जेन-जी वर्ग की संख्या करीब 22 फीसदी है। मणिपुर में तो 35 फीसदी से ज्यादा मतदाता युवा हैं। इन राज्यों में चुनावी रणनीतिकार युवाओं पर विशेष नजर रख रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया आंदोलन में उभरे युवाओं के नये वर्ग में जात-पात से इतर, सीधे मुद्दों को उठाने का माद्दा है। अगर इस विचार में सत्यता है तो ज्यादातर सियासतदानों का गणित बिगड़ सकता है। लेकिन इसी विचार के उलट यह भी कहा जा रहा है कि आरक्षण का मुद्दा भले यह वर्ग नहीं उठा रहा हो, लेकिन उससे छेड़खानी या उसके खिलाफ बोलना भी किसी दल को भारी पड़ सकता है। ऐसे में पूर्व के मुद्दों के साथ ही इस वक्त राजनीतिक दलों की पूरी कोशिश युवा वर्ग को आकार्षित करने की है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल के प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से उस वर्ग के हिसाब से ही उनसे मुखातिब हुए यानी इंस्टाग्राम एवं अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो डालकर, उसे इसी संदर्भ में जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष लगातार युवाओं से संवाद कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड के देहरादून और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में राहुल गांधी की 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में सीधी बातचीत तो की ही, साथ ही ऑनलाइन 'मुझसे कुछ भी पूछो' अभियान भी चलाया। इसके साथ ही जेन-जी को लेकर प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने या तो बयान जारी किया है या कार्यक्रम चलाया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने तो संवाद कार्यक्रम भी चलाया।
अगर बात करें मुद्दों को सीधे जोड़ने की तो किसान आंदोलन से लेकर आरक्षण आंदोलन तक हर जगह युवाओं की भागीदारी ठीकठाक रही। पेपर लीक मामले को तो युवाओं ने सीधे अपने ही हाथ में ले लिया। श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में हेराफेरी पर अभी युवाओं को सीधे नहीं जोड़ा जा सका है, लेकिन इसे भी युवाओं से जोड़ने की भरपूर कोशिश की जा रही है। रोजगार युवाओं का सबसे बड़ा मुद्दा है। रोजगार के मुद्दे पर ही विपक्ष ने अग्निवीर मामले को छोड़ा नहीं है। भाजपा नीत एनडीए का दावा है कि इस योजना से युवाओं को रोजगार मिल रहा। चार वर्ष फौज की नौकरी के बाद उन्हें अर्धसैनिक बलों समेत कई राज्य सरकारों में प्राथमिकता से नौकरी मिल रही है। उधर, कांग्रेस समेत अनेक विपक्षी दल वादा कर रहे हैं कि वे सत्ता में आने पर अग्निवीर योजना को समाप्त करेंगे। उधर, गोवा में बेशक कई स्थानीय मुद्दे हावी हैं, लेकिन यहां युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने को हर दल मुहीम चला रहे हैं। मणिपुर में दो समुदायों के बीच लगातार चले हिंसक संघर्ष के बीच सियासी दल युवाओं को मुख्य धारा में लौटकर काम करने का आग्रह कर रहे हैं। युवा शक्ति हमेशा ही किसी भी देश की ताकत होती है। बदले माहौल में इस ताकत को अपनी ओर खींचने में फिलहाल राज्य स्तर पर जुटे सियासी दलों का दांव कितन सटीक बैठता है यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन सत्ताईस में सात राज्यों की सत्ता पर ये युवा सटीक निशाना लगाएंगे, यह तो निश्चित है। क्योंकि ये जेन-जी है, ये सब जानती है।

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