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Monday, February 10, 2025

एक महाकुंभ पुस्तकों का... मैंने भी लगाई डुबकी

 


केवल तिवारी

प्रयागराज महाकुंभ की चहुंओर हो रही चर्चा के बीच, पिछले दिनों पुस्तकों के एक महाकुंभ में मैंने भी डुबकी लगाई। नयी दिल्ली स्थिति प्रगति मैदान में बने भारत मंडपम में 25वें विश्व पुस्तक मेले में जाने का मौका मिला। दिल्ली में एक-दो काम थे, साथ ही इंदौर निवासी वरिष्ठ पत्रकार हेमंत पाल जी का भी आग्रह था कि पुस्तक मेला जाना हो तो मेरी पुस्तक 'फ्लैश बैक' भी देखना। पुस्तक मेले में गया तो खुश होने के कई कारण थे। एक तो किताबों के प्रति हर वर्ग के लोगों का अनुराग, दूसरे अनेक विद्वानों से मुलाकात और सार्थक चर्चा। कुछ भावुक बातें और कुछ यादों का भी दौर चला। सिलसिलेवार करता हूं चर्चा।

चंडीगढ़ से जब दोपहर के करीब भारत मंडपम के पास गया तो



















लंबी कतार लगी थी पुस्तक मेले में जाने के लिए। बेशक वह वर्किंग डे यानी कार्यदिवस था फिर भी लोग उमड़ रहे थे। मैं भी लग गया कतार में और पहुंच गया भारत मंडपम में। सबसे पहले मैं हॉल नंबर दस में गया। कुछ किताबें देखीं, फिर हॉल नंबर दो की तरफ चल दिया। वहां कुछ स्टॉल्स से किताबें खरीदीं और वहां आए लोगों से बातचीत करने लगा। घूमते-घूमते जब एक किताब 'उड़न छूं गांव' की खोज में इधर-उधर घूम रहा था तो एक आवाज आई। देखा तो बड़े भाई समान एवं वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार चारू तिवारी जी मुझे बुला रहे थे। उन्होंने 'दुदबोली' पत्रिका भेंट की और गैरोला जी से मुलाकात करवाई। साथ ही कुछ और साहित्यानुरागी मिले। इसके बाद कुछ देर हम लोगों ने वहीं बैठकर चर्चा की और चल दिए पुस्तक मेले का एक और दौरा लगाने। इस बीच कई प्रकाशकों के स्टॉल्स पर हम लोग गये। तभी एक जगह वरिष्ठ साहित्यकार रामशरण जोशी जी मिल गये। चारू जी के जरिये हमारी मुलाकात हुई। आजकल हर हाथ में मोबाइल रूपी कैमरा है तो कुछ फोटो भी खींचे। फिर हम चले गए आगे की ओर। बातों-बातों में मैंने पंकज बिष्ट जी का जिक्र किया। पंकज जी के अनेक उपन्यास पढ़े हैं। उनकी रचनाओं पर अनेक लोगों से चर्चा भी की है। वह लंबे समय से 'समयांतर' पत्रिका निकाल रहे हैं। गैर व्यावसायिक, लेकिन सारगर्भित। उनके साथ कुछ देर बात हुई। मैंने उनके स्वास्थ्य का हालचाल जाना तो उनकी एक पंक्ति में उत्तर देना अच्छा लगा कि जब तक पत्रिका चल रही है, तब तक हम भी चल रहे हैं। यानी लिखने-पढ़ने वालों की यही तो खुराक है। इसी दौरान चारू जी से विभिन्न मुद्दों पर बात होती रही है। चारू जी ने क्षेत्रीय पत्रकारिता के साथ ही उत्तराखंड के विभिन्न विषयों और रचनाधर्मियों पर शोध कार्य किया है। एक तरह से उन्हें उत्तराखंड का इनसाइक्लोपीडिया कहा जा सकता है। अपनी शोध प्रवृत्ति के कारण ही उन्होंने मुख्य धारा की पत्रकारिता जिसे बतौर रोजी-रोटी वह चला रहे थे, उससे किनारा कर लिया। खैर... बातों-बातों में हम लोग अनेक स्टॉल्स पर गये। इसी दौरान वरिष्ठ पत्रकार अनिल तिवारी जी मिले और साथ थीं उनकी बेटी गौरा। बाद में पता चला कि गौरा अच्छा लिखती हैं और एक-दो किताबों से उनको रॉयल्टी भी मिली है। पुस्तकों की इस खरीदारी के बाद मैं राजेश की बताई दो पुस्तकों की खोज में निकला। एक मिल गयी, दूसरी नहीं। समय तेजी से निकलता गया और अंतत: चारूजी से विदा लेकर मैं बाहर निकल आया। पुस्तकों के इस महाकुंभ में थोड़ी सी डुबकी लगाने की इस यात्रा को दिल में सहेजकर मैं लौट आया।

बेटे को किया फोन और वह भावुक पल

पुस्तक मेले में कुछ देर भ्रमण के बाद मैं थोड़ी देर के लिए भारत मंडपम परिसर के लॉन में आकर बैठ गया। तब तक खरीदी हुई पुस्तकों को बैग में ठीक से रखने लगा। इसी दौरान बड़े बेटे कार्तिक से पूछा कि कोई किताब तो नहीं लानी है। वह भी पढ़ने का शौकीन है। हालांकि कहीं भी जाता है तो अपने लिए खुद ही किताबें ले आता है। कई बार कुछ पुस्तकों के कथानक को लेकर मुझसे भी चर्चा करता है। एक-दो किताबें मुझे भी दी हैं। उसने कहा कि अभी फोन पर तो क्या बताऊं। लेकिन साथ ही एक भावुक बात भी की। उसने कहा, 'पापा आपको याद है कि जब बचपन में आप मुझे लाए थे तो मैंने एक मॉडल खरीदवाया था जिसके टुकड़ों को जोड़कर हमने अलग-अलग मॉडल बनाए थे।' (असल में जब वह चौथी या पांचवी में था, मैं उसे लेकर पुस्तक मेले में आया था। यहां बच्चों के एक स्टॉल पर उसे एक क्राफ्ट पीस पसंद आया जिसके टुकड़ों को जोड़कर चांद, बिल्डिंग, नाव आदि बनाई जा सकती थीं। वह कई साल तक उसके साथ प्रयोग भी करता रहा और मैंने उसे कुछ किताबें भी दिलवाईं।) मैं भावुक हो गया और उससे कहा कि हां मुझे याद है। उसने कहा कि देखना वैसा ही कुछ मिले तो धवल (उसका छोटा भाई यानी मेरा छोटा बेटा) के लिए ले लेना। मैं फिर अंदर गया। भरा बैग पीठ पर लदा हुआ था, लेकिन वैसा कुछ इस बार नहीं मिला। पर पुरानी बातों को याद कर मैं कब मेट्रो स्टेशन तक पहुंच गया पता नहीं चला और बैग के भार से कंधे दुखने का भी असर तब महसूस हुआ जब मैं मेट्रो में बैठ गया।

पुस्तक मेला और पैदल चलने के दौरान की कुछ तस्वीरें यहां साझा कर रहा हूं।


Wednesday, February 5, 2025

हम सब तो मिलते रहेंगे... भाटिया जी का साथ

केवल तिवारी

शुरुआत बशीद बद्र साहब की शायरी से करता हूं, जिसके बोल इस तरह से हैं-
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।






यूं तो हम सब दुनिया में ही एक मुसाफिर हैं, फिर ऑफिसियल मसले की बात करें तो यहां तो मुसाफिर हैं ही। एक निश्चित अवधि के बाद हमें यहां से रुखसत होना ही होता है। ट्रिब्यून संस्थान की बहुत अच्छी बात है कि यहां पारिवारिक संबंध लोगों के बने होते हैं क्योंकि लंबे समय से सब साथ काम करते हैं। एक दशक से अधिक समय से मैं भी ट्रिब्यून में हूं और विभागीय, गैर विभागीय अनेक लोगों से अच्छे ताल्लुकात बने हैं। ऐसे ही एक अजीज राम कृष्ण भाटिया जी पिछले दिनों सेवानिवृत्त हुए। भाटिया जी उन चंद लोगों में से हैं जिनके साथ 'from first day' मेरी मित्रता हो गयी। फिर उनकी बिटिया मेरे बेटे की सीनियर रहीं, इससे बातचीत में और प्रगाढ़ता आई। कोविड काल के दौरान हालात जब थोड़े नकारात्मक होने लगे तो भाटिया जी से मैं पूछता था कि वो दिन... मेरे सवाल के बीच में ही वह कह डालते फिर आएंगे, फिर आएंगे। वाकई फिर माहौल सामान्य हुआ। आदरणीय नरेश कौशल जी दैनिक ट्रिब्यून के संपादक बनकर आए और ऑफिस के माहौल में नये उत्साह का संचार हुआ। इसी उत्साह और मिलनसार संपादकत्व का कमाल था कि भाटिया जी की रिटायरमेंट पार्टी में हम अनेक लोगों को जाने का मौका मिला और न्यूजरूम की अच्छी खासी भागीदारी रही। उनके विभाग के अनेक लोगों की प्रतिभाएं भी सामने आईं और सभी ने अपने उद्गार व्यक्त किए। मेरे दिल में कई तरह की बातें हैं, जिन्हें व्यक्त करना चाहता हूं, लेकिन कई बातें तस्वीरें भी कह देती हैं। यहां तस्वीरों को साझा कर रहा हूं, साथ ही कुछ शायरियां जो कम शब्दों में बहुत कुछ कह देती हैं। भाटिया जी को सेवानिवृत्ति की हार्दिक शुभकमानाएं। आप स्वस्थ रहें और मस्त रहें।
आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई
ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई

आज नागाह हम किसी से मिले
बा'द मुद्दत के ज़िंदगी से मिले

काफ़ी नहीं ख़ुतूत किसी बात के लिए
तशरीफ़ लाइएगा मुलाक़ात के लिए

हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले
ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना

Tuesday, January 14, 2025

निर्मल हैं, नरेंद्र हैं... बाल साहित्यकार की साधना में लगी एक सम्मानित मुहर

केवल तिवारी

आज बात एक ऐसे शख्स की जो निर्मल हैं और नरेंद्र हैं। संयोग देखिए कि जिस वक्त मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूं, उस वक्त युवा दिवस की खबरों और लेखों की चर्चा हो रही है। युवा दिवस यानी स्वामी विवेकानंद जी और उनकी शिक्षाओं को समर्पित। स्वामी विवेकानंद यानी नरेंद्र। सीधे जुड़ गयी बात। विवेकानंद जी की शिक्षा के सागर में से कुछ बूंदें भी सहेज पाए तो यही बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। निर्मल जी यही तो बताते हैं कि लक्ष्य साधे रखिए। ऊर्जावान बने रहिए। किसी का बुरा करने की सोचिए भी मत। बाकी कुछ नहीं कर पाएं तो इतना ही बहुत है। आज उनकी बात इसलिए कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने वरिष्ठ पत्रकार, साहित्कार एवं फीचर संपादक नरेंद्र निर्मल को सम्मानित करने का ऐलान किया है। 



सम्मान सूची संबंधी एक खबर मैंने तैयार की थी, जिसका विवरण इसी ब्लॉग में आगे जाकर मिल जाएगा। अभी निर्मल जी की बात। मेरे लिए बड़े भाई जैसे और पथ प्रदर्शक जैसे। बच्चों को लेकर कोई बात करनी हो या फिर दफ्तर की कार्यशैली पर। चूंकि हमारा पेशा समान है। कई तरह की बातें होती हैं। कई बारीकियों को समझना होता है और कई बातों को इग्नोर करना होता है। निर्मल जी से जब भी बात होती है वह 'चुपचाप' कुछ कह देते हैं। असल में कई बार उन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल किया है। मुझसे कहते हैं कि चुपचाप अपना काम करते रहना चाहिए। विभिन्न अखबारों में फीचर के कलेवर और फ्लेवर बदलते रहने वाले नरेंद्र निर्मल भाई साहब सलाह पर भी गौर करते हैं, अपना तर्क भी रहते हैं। परिवार के प्रति समर्पित व्यक्ति का काम के प्रति भी उतना ही समर्पण। हिंदी संस्थान से सम्मानित होने की सूचना को उनके जानकार और वरिष्ठ पत्रकार संजय जी ने फेसबुक पर साझा किया तो कमेंट्स की बौछार लग गयी। उन्होंने कुछ खास कमेंट्स का जिक्र करते हुए कहा कि इन महानुभावों से बहुत कुछ सीखा है। एक स्क्रीन शॉट यहां साझा करूंगा। 





असल में निर्मल जी ने जिनसे सीखा या जिनसे प्रेरित हुए, उनका निस्संकोच जिक्र करते हैं। साथ ही बहुत बेबाकी से कहते हैं कि अब भी सीखने में लगा हूं। उनके आइडियाज दिल को छूने वाले होते हैं। जो काम उन्हें चुपचाप करना होता है, करते हैं। जिसको लेकर चर्चा करनी होती है, करते हैं। यानी सहज रहते हैं। जैसे स्वयं हैं, वैसे ही संस्कार बच्चों में हैं। इनका भाग्य अच्छा था कि इन्हें पत्नी भी उतनी ही अच्छी मिलीं। सुधा भाभी ने घर के अभिभावक की तरह हमें समय-समय पर अच्छी सलाह दी हैं। बच्चों को खिलाया है, समझाया है। एक बार फिर निर्मल परिवार को इस सम्मान की हार्दिक बधाई। उनके साथ ही उन सभी सम्मानित साहित्यकारों को दिल की गहराई से बधाई। सभी अपने-अपने क्षेत्र के महारथी हैं। अब नीचे साझा कर रहा हूं, वह खबर जो इन सबके सम्मानित होने की सूचना पर मैंने बनाई थी।
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वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र निर्मल को सम्मानित करेगा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र निर्मल को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान सम्मानित करेगा। निर्मल के साथ ही नौ अन्य साहित्यकारों को भी सम्मानित किया जाएगा। इस संबंध में जारी बयान के मुताबिक नरेंद्र निर्मल को लल्ली प्रसाद पांडेय बाल साहित्य पत्रकारिता सम्मान के लिए चयनित किया गया है। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने बाल साहित्य संवर्धन योजना के तहत राज्य के नौ साहित्यकारों को बाल साहित्य सम्मान 2023 देने की घोषणा की है। संस्थान की निदेशक डॉ. अमिता दुबे ने बताया कि प्रत्येक साहित्यकार को 51 हजार की धनराशि, अंगवस्त्र और प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित किया जाएगा। इनके सम्मान का निर्णय पिछले दिनों समिति की बैठक में लिया गया। जिन अन्य साहित्यकारों को सम्मान के लिए चुना गया है उनका विवरण इस प्रकार है- लखनऊ की डॉ. करुणा पांडेय को सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मान, सहारनपुर के डॉ. आरपी सारस्वत को सोहनलाल द्विवेदी बाल कविता सम्मान, शाहजहांपुर के डॉ. मोहम्मद अरशद खान को अमृत लाल नागर बाल कथा सम्मान, अलीगढ़ के दिलीप शर्मा को शिक्षार्थी बाल चित्रकला सम्मान, गौतमबुद्ध नगर के बलराम अग्रवाल को डॉ. रामकुमार वर्मा बाल नाटक सम्मान, मथुरा के देवी प्रसाद गौड़ को कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान, लखनऊ के डॉ. दीपक कोहली को जगपति चतुर्वेदी बाल विज्ञान लेखन सम्मान, प्रतापगढ़ के अनिल कुमार ‘निलय’को उमाकांत मालवीय युवा बाल साहित्य सम्मान। बता दें कि उत्तर प्रदेश के नोएडा निवासी नरेंद्र निर्मल पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र प्रतिष्ठित नाम है। पिछले 4 दशक से वह विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के फीचर विभाग में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे। उन्होंने बाल साहित्य को नया कलेवर और फ्लेवर दिया है।

Monday, January 13, 2025

'घर' की एक और यात्रा, हालचाल और वार्ता

केवल तिवारी








सुखद संयोग है कि दो-तीन महीने के अंदर ही एक बार फिर अपनी जन्मस्थली जाने का मौका मिला। उत्तराखंड के रानीखेत के पास स्थित अपने गांव खत्याड़ी (डढूली)। असल में बच्चों की छुट्टी थी, बड़े बेटे की बेंगलुरू (Bengluru, Microsoft ) में अगस्त में जॉइनिंग से पहले यही मौका सही था और छोटा धवल भी अब दसवीं में चला जाएगा। तमाम कार्यक्रम बनाते-बनाते यही तय हुआ कि घर चलना है। इसी बीच, गांव की धूनी बंबईनाथ स्वामी मंदिर में भंडारा होने की सूचना व्हट्सएप ग्रुप के जरिये मिली। ईश्वर की कृपा ही थी कि कार्यक्रम बन गया। काठगोदाम बच्चों के बड़े मामा, उनकी बेटी, बीच वाले मामा और मामी को भी साथ ले लिया। यात्रा छोटी, लेकिन यादगार रही और सबसे अहम रहा अपने लोगों से मुलाकात करना। कुछ मिले, कुछ की बातें हुईं और कुछ के बारे में जानकारी ली। लेकिन इतनी सी बातों से मन कहां भरता है। इसीलिए शायद किसी शायर ने कहा है-
ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है, बात होती है मगर बात नहीं होती है।
खैर... जो भी हो। यह सत्य है कि यात्रा हुई। शानदार नजारे देखे। ऐसे नजारे जिन्हें बचपन में भी देखा था। तब वह रोजमर्रा के थे, आज कभी-कभी होते हैं। सिलसिलेवार इस यात्रा का जिक्र करता हूं।






हल्द्वानी से बिनसर महादेव और ताड़ीखेत विश्राम






कार्यक्रम बनने के बाद जाने के तमाम विकल्पों पर विचार किया गया। चंडीगढ़ से सीधी ट्रेन सेवा है नहीं। कभी-कबार वाली कोई ट्रेन है भी तो दिन के हिसाब से हमें सूट नहीं करती। फिर बस के विकल्प पर विचार किया गया। अंतत: हमने तय किया कि हल्द्वानी तक अपनी कार से जाया जाये, वहां से कैब कर लेंगे। बच्चों के मामा नंदाबल्लभ जी के माध्यम से कैब बुक हो गयी। तीन जनवरी की सुबह हम लोग चले। पहले कोटाबाग वाले यानी मेरे साढू भाई सुरेश पांडे जी के निर्माणाधीन स्टे होम (बैलपड़ाव) पहुंचे। कुछ देर वहां रुककर हम शेखर जी के यहां पहुंचे। वहां उनकी पत्नी लवली जी एवं पुत्र सिद्धांत जोशी ने गर्मजोशी से स्वागत किया। कई बातें हुईं और अगले दिन जल्दी से जल्दी चलने का कार्यक्रम बना। अगली सुबह करीब 8 बजे हम लोग काठगोदाम पहुंचे और वहां से सभी लोग कैब से सीधे बिनसर महादेव पहुंचे। लंबे समय बाद इस मंदिर में जाना हुआ। शांत सुरम्य। सचमुच मंदिर ऐसे ही होने चाहिए जहां लूट न हो, जहां कोई डिमांड न हो। आध्यात्मिक माहौल। कुछ देर मंदिर और फिर मंदिर प्रांगण में हम सब लोग रहे। संबंधित वीडियो यहां साझा कर रहा हूं। इसके बाद हम पहुंच गए ताड़ीखेत। ताड़ीखेत में व्यंजन होम स्टे में हमने ठहरने के लिए पहले से ही कह दिया था। असल में करीब तीन माह पहले जब आया था तो यहीं ठहरे थे। अच्छा लगा। इस होम स्टे में जहां भोजन एकदम घर जैसा है वहीं आवास और रहने का माहौल भी वैसा ही। संयोग देखिए इसी दिन यानी चार जनवरी को इसके ऑनर के भतीजे नवीन जोशी का जन्मदिन था। शाम को वहां बच्चे और परिजन गीत-संगीत के आयोजन में व्यस्त थे और उन्होंने हम सबको भी शामिल कर लिया। सबके साथ हंसी-मजाक और गीत संगीत कार्यक्रम में बहुत अच्छा लगा। इससे पहले हम लोग ताड़ीखेत बाजार में घूमने गए। वहां एक बुजुर्ग मिले जो मेरे ससुर और पिताजी दोनों को जानते थे। उन्होंने कई यादें साझा कीं। संबंधित वीडियो भी यहां साझा कर रहा हूं। मुझे संभवत: पहले बुजुर्ग मिले होंगे जिन्होंने कहा कि वह मेरे पिताजी यानी स्व. दामोदर तिवारी को भी जानते हैं। इसके बाद हम लोग व्यंजन होम स्टे पहुंचे, भोजन के बाद अगले दिन का कार्यक्रम बनाकर सो गये।
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घर की राह, बड़ों का स्नेह और ईश्वर का आशीर्वाद




पांच जनवरी की सुबह करीब नौ बजे हम लोग ताड़ीखेत से घर के लिए निकले। रास्ते में कुछ लोकेशन देखते हुए मैंने अपने संबंधियों को वह जमीन भी दिखाई जिसकी आजकल चर्चा है। उसका नाम है सिवाड़। वहां से हिमालय व्यू एकदम क्लीयर है। रास्ते में कुछ निर्माणों को भी देखा। सरना में कुंदन मिले। कुछ देर बात करने के बाद हम लोग पैदल गांव की ओर चल पड़े। रास्ते में सबसे पहले तलबाखई भोपका की मांताजी मिलीं। उम्र करीब सौ वर्ष। उन्होंने बहुत भावुक किया। वह बोलीं, 'तुमर ईजक ब्या लै मैंल देख राखो, मकण भगवान कदिन उठाल।' यानी तुम्हारी माताजी का विवाह होते मैंने देखा है। मुझे भगवान कब उठाएगा। मैंने कहा, चाची चिंता मत करो, जब बारी आएगी, पता भी नहीं चलेगा। असल में यह अच्छी बात है कि हमारे गांव सभी को रिश्तों से बुलाते हैं। प्रसंगवश बता दूं कि पांच जनवरी को हम अपने गांव पहुंचे और पांच जनवरी को ही हमारी माताजी की 17वीं पुण्यतिथि थी। पहले मुझे इसका भान नहीं रहा क्योंकि कुछ दिन पहले ही हिंदी कैलेंडर में तिथि के हिसाब से उनका श्राद्ध हुआ था। बातों-बातों में शीला दीदी ने याद दिलाई तो लगा ईजा के आशीर्वाद से आज गांव आना तय हुआ। इसके बाद हम लोग पहले अपने घर पहुंचे। पनदा के घर में भाभी जी मिलीं। बहुत अपनेपन से उनसे मुलाकात हुई फिर बसंत दा और भाभी से मुलाकात हुई। फिर कैलाश मिला और उसके बाद प्रयागदा के यहां चायपानी हुई। फिर हम ताऊजी के पोते यानी अपने भतीजे बिपिन के आंगन में गये। बिपिन की यादों में आंखें नम हो गयीं। कोरोना काल में वह इस नश्वर संसार से विदा ले गया। अपने घर के आंगन में दीया बत्ती करने के बाद हम ग्वेल देवता के मंदिर गये। उसके बाद फिर से नीचे सरना आए और गाड़ी में बैठकर डढूली गांव पहुंचे। वहां ललदा मिले। उन्होंने बहुत खुशी जताई। फिर पैदल चल पड़े बंबईनाथ स्वामी मंदिर की ओर यानी धूनी की ओर। रास्ते में अनेक लोग मिले। दोभण सनुदा ने पहचान लिया। नाम से मुझे पुकारा तो बहुत अच्छा लगा। मंदिर में चिंतामणि चाचा, बबलू भाई, मधीदा और भाभीजी, शिवदा सर (शिवदत्त तिवारी), मीना बुआ, उर्वीदा, उनके बेटे मुन्ना, महेश दा, प्रकाश दा और बाद में पप्पूदा यानी दिनेशदा भी आ गए। इसी दौरान रिश्ते में भतीजा और स्कूल का दोस्त मदन मिला। उसीने हमारी पूजा करवाई। वह अक्सर गांव के बारे में सूचना देता रहता है। होली आदि त्योहारों के दौरान वीडियो कॉल करवाता है। उसके बड़े भाई नवीन, भाई एवं व्यास जी ललित तिवारी, राजू आदि अनेक लोगों से मुलाकात हुई। इस दौरान पूजा होती रही और प्रयागदा मेरे लिए भी धोती लेकर आए थे। मैं भी धोती पहनकर चौखंडी की परिक्रमा करने लगा। परंपरागत पूजा हुई और इसी दौरान आदेश हुआ कि सावन के महीने में फिर से यहां पहुंचूं। ईश्वर का हुक्म होगा तो पूरी कोशिश होगी जाने की। अनेक लोगों ने आते रहने की ताकीद की। इस मुलाकात पर दो-दो पंक्तियां दोहराऊंगा-
आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई, ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई।
काफ़ी नहीं ख़ुतूत किसी बात के लिए, तशरीफ़ लाइएगा मुलाक़ात के लिए।
दिन भी है रात भी है सुब्ह भी है शाम भी है, इतने वक़्तों में कोई वक़्त-ए-मुलाक़ात भी है।
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हल्द्वानी वापसी, भानजियों संग समागम और कुछ भावुक यादें





गांव के यादगार सफर के बाद हम लोग हल्द्वानी वापस आ गये। यहां सबसे पहले साढू भाई सुरेश पांडे जी के यहां गये। उनसे कई बातें हुईं। अगले दिन कार्यक्रम बना भानजियों के यहां जाने का। यहां मेरी बड़ी भानजी लता, उससे छोटी रुचि और फिर रेनू रहते हैं। रुचि के पति दीपेश ने लंच का अपने यहां फिक्स कर दिया। फिर रेनू के पति कुलदीप पंत जी ने अपना पता बताया। उनकी बिटिया काव्या से बातचीत करना अच्छा लगा। उनकी माताजी से कई बातें साझा हुईं। वह बहुत जीवट महिला हैं। यहां प्रेमा दीदी का भी आने का कार्यक्रम था, लेकिन कुछ व्यस्तताओं के कारण वह नहीं आ सकी। उम्मीद है कि जल्दी ही मुलाकात होगी। इस मुलाकात के बाद कुलदीप जी ने हमें लता के यहां छोड़ दिया। परिवार में नन्हे कान्हा यानी लता के पोते को पहली बार देखा। छोटी भानजी बन्ना के बेटे अविरल से मिलकर भी बहुत अच्छा लगा। नन्हे कान्हा के पिता यानी मयंक और मम्मी से भी मुलाकात हुई। संक्षिप्त भेंट के बाद हम चले आए भानजी रुचि के यहां। यहां रुचि का बड़ा ऋषि यानी रिषु हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहा था। उसका भाई अपनी नटखट शरारतों में व्यस्त था। रिषु हम लोगों से लगातार रुकने का आग्रह करता रहा। हम लोगों ने लंच किया। फिर दीपेश हमें माताजी से मिलाने ले गये। माताजी अस्वस्थ हैं और कुछ ही समय पहले दीपेश के पिता जी यानी हम सबके दद्दू इस नश्वर संसार से विदा ले गये। वह बहुत मिलनसार और स्पष्टवादी थे। दीपेश के बड़े भाई सुबोध, पत्नी से भी मुलाकात हुई। कुछ देर पुरानी बातों को याद किया। कभी भावुक तो कभी रोचक पलों का आदान-प्रदान हुआ। उस शाम भी पांडे जी के यहां पहुंचे। अगली सुबह जल्दी उठकर हल्द्वानी कालूसाई मंदिर फिर काठगोदाम भूमि देवता की पूजा-अर्चना के बाद वहीं रहना हुआ। अगली सुबह हम सभी लोग साथ में शेखरदा चल पड़े चंडीगढ़। यहां आकर शुरू हो गयी रुटीन लाइफ। यूं ही चलती रहे जिंदगी। सभी के स्वास्थ्य की कामना। अब फोन पर परिजनों के साथ इस यात्रा के बाबत वार्तालाप चल रही है। - जय हो।
और इस ब्लॉग के अंत में कुछ वीडियो 






Friday, December 27, 2024

संस्था जैसे व्यक्तित्व का प्रभावी ‘चित्रण’

डॉ. चंद्र त्रिखा जी किसी परिचय के मोहताज नहीं। पिछले दिनों उन पर आयी पुस्तक पढ़ने का मौका मिला। संपादित समीक्षा हमारे अखबार दैनिक ट्रिब्यून में छपी। उसी को यहां पोस्ट कर रहा हूं।

साभार : दैनिक ट्रिब्यून 



केवल तिवारी

पत्रकार, साहित्यकार, कवि, शायर और कहानीकार डॉ. चन्द्र त्रिखा एक ‘संस्था’ की तरह हैं। डॉ. त्रिखा सरीखे विविधि आयामों वाले संस्थागत व्यक्ति का फलक इतना विस्तृत होता है कि उसे चंद शब्दों में समेटना आसान नहीं होता। लेकिन प्रो. लालचंद गुप्त ‘मंगल’ के संपादकत्व में ऐसा हुआ। डॉ. त्रिखा पर हाल ही में पुस्तक प्रकाशित हुई। नाम है, ‘विलक्षण कलम-साधक चन्द्र त्रिखा।’ चूंकि जब ऐसे ख्यात लोगों की बात होती है तो जाहिर है उनका लेखकीय दायरा सीमित नहीं होता। आलोच्य पुस्तक में भी डॉ. त्रिखा के साथ-साथ अन्य महान विभूतियों के बारे में, प्रसंगवश ही सही, जानकारी मिल जाती है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. त्रिखा के जीवन के जितने पहलू हैं, उतनी ही विविधता पुस्तक की सामग्री में मिल जाती है। साहित्य और पत्रकारिता क्षेत्र के धुरंधरों ने रोचक शैली में डॉ. त्रिखा और उनकी लेखनी पर अपनी राय रखी है। अनेक किताबें लिख चुके डॉ. त्रिखा औरों को भी लिखने-पढ़ने के लिए प्रेरित करते साथ ही आसपास के इलाकों में ही जानकारी लेने के उद्देश्य से घूमने के लिए प्रेरित करते। उन्होंने साहित्य प्रेमियों को हरियाणा साहित्य अकादमी में ‘पुस्तकों के लंगर’ में आने का न्योता भी दिया। प्रस्तुत किताब में अपने अतीत का संक्षिप्त विवरण डॉ. त्रिखा ने ही दिया है। विभाजन के खौफनाक मंजर से लेकर वर्तमान समय तक के विवरण का चित्रांकन उन्होंने ‘गागर में सागर भरने’ की तरह कर दिया। पुस्तक के संपादकीय संयोजन और लिखने वालों का कमाल ही है कि कहीं भी चीजों का दोहराव नहीं है। जाने-माने साहित्यकार माधव कौशिक ने डॉ. त्रिखा के संपूर्ण जीवन पर अपने ही अंदाज में प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं, ‘समर्पित पत्रकार व साहित्यकार के नाते उन्होंने अपनी समकालीन पीढ़ी के साथ अनवरत संघर्ष किया तथा आने वाली पीढ़ी के रचनाकारों व पत्रकारों के समक्ष नये क्षितिज व आयाम प्रस्तुत किये। पंद्रह वर्ष की अल्पायु से लेकर आज तक उनका व्यक्तित्व संघर्ष की आग में निरंतर तप रहा है।’ पत्रकार डॉ. किरण चोपड़ा ने तत्कालीन समाज की विभूतियों, अखबारों और संघर्षों का बेहतरीन चित्रण किया है। किताब के संपादक डॉ. लालचंद गुप्त ‘मंगल’ ने ‘विभाजन की विभीषिका के आख्याता’ शीर्षक से डॉ. त्रिखा की रचनाओं के हवाले से पृष्ठ संख्या के साथ बिंदुवार वर्णन किया है। पुस्तक में अपने दूसरे लेख ‘डॉ. चन्द्र त्रिखा का आध्यात्मिक चिन्तन’ में डॉ. मंगल लिखते हैं, ‘संतई प्रकृति और सूफियाना मस्ती के धनी, सादा जीवन : उच्च विचार के पोषक… डॉ. चन्द्र त्रिखा की लेखनी से सांस्कृतिक सरोकारों को संबोधित करते हुए, जब भी कोई नयी कृति प्रस्फुटित होती है तो एक नया सवेरा उदित होता है…।’ ‘कैसे उम्र गुजारी लिख…’ शीर्षक से ज्ञानप्रकाश विवेक ने डॉ. त्रिखा के शायराना और कवित्व अंदाज पर प्रकाश डाला है। डॉ. सुभाष रस्तोगी ने उनकी रचनाओं पर विशेषतौर से प्रकाश डाला है। डॉ. जगदीश प्रसाद ने इतिहासकार के तौर पर डॉ. त्रिखा की रचनाओं के हवाले से दिल्ली दर्शन कराया है। साथ में हरियाणा और आसपास की ऐतिहासिकता की भी संक्षिप्त एवं सारगर्भित जानकारी दी है। उपरोक्त के अलावा डॉ. त्रिखा पर डॉ. उषा लाल, चरणजीत ‘चरण’, डॉ. शमीम शर्मा, डॉ. रामफल चहल, डॉ. विजेंद्र कुमार ने भी अपने अनुभव साझा किए हैं। भाषा-शैली की विविधता के साथ विभिन्न लेखकों ने डॉ. चन्द्र त्रिखा पर जो जानकारी इस किताब में दी है उससे किताब सचमुच संग्रहणीय बन पड़ी है।
पुस्तक : विलक्षण कलम-साधक चन्द्र त्रिखा, संपादक : प्रो. लालचंद गुप्त ‘मंगल’, प्रकाशक : अद्विक पब्लिकेशन, पटपड़गंज- दिल्ली, पृष्ठ : 144, मूल्य : 220 रुपये

Saturday, December 14, 2024

अच्छी संगत से ही चलेगा नशे पर नश्तर



साभार: दैनिक ट्रिब्यून 

https://www.dainiktribuneonline.com/news/features/only-good-company-can-cure-addiction/

पिछले दिनों डॉ अरदास संधू से मुलाकात हुई। बात हुई। फिर बनी एक स्टोरी। दैनिक ट्रिब्यून के लिए। सावधान और सीख देने वाली। 

विरोध के स्वर ‘बुलंद’ होने के बावजूद नशे का ‘जाल’ देशभर में बुरी तरह से फैल रहा है। अब सबसे बड़ी चुनौती भावी पीढ़ी को बचाने की है। अच्छी संगत, दृढ़ इच्छाशक्ति और स्वस्थ जीवनशैली जैसे कुछ उपायों से नशे के जाल को कैसे काटा जा सकता है, पढ़िये पूरा विवरण…

केवल तिवारी
महापुरुषों के दिखाए रास्ते के मुताबिक संगत यानी दोस्ती-यारी की बात करें तो दो तरह की सीख सामने आती हैं। एक, जिसमें रहीम दास जी कहते हैं, ‘कह रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग। वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।’
और दूसरा, जिसमें कबीरदास जी कहते हैं, ‘संत ना छोड़े संतई, कोटिक मिले असंत। चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।’
पहले दोहे में रहीम दास जी के कहने का अर्थ है कि दो विपरीत प्रवृत्ति (सज्जन-दुर्जन) के लोग साथ नहीं रह सकते। उन्होंने बेर और केले के पेड़ का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर दोनों आसपास होंगे तो उनकी संगत कैसे निभ सकती है? दोनों का अलग-अलग स्वभाव है। बेर को अपने रसीले होने पर घमंड है, लेकिन कांटेदार है। केले के पेड़ को अपने पत्ते पर घमंड है, लेकिन बेर के कांटों से वह छिल जाते हैं।
दूसरे दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि सज्जन पुरुषों को जितने मर्जी गलत लोग मिल जाएं, लेकिन उसकी सज्जनता पर कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने उदाहरण दिया कि चंदन के पेड़ पर जहरीले सांप लिपटे रहते हैं, लेकिन वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता
इन दोनों उदाहरणों से इतर एक प्रसिद्ध उद्धरण है, ‘काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाए, एक लीक काजर की लागिहै पे लागिहै।’ इसमें कवि कहते हैं कि आप कितने ही अच्छे हों, संगत अगर बुरी है तो उसका असर तो पड़ ही जाता है।
संगत के संबंध में उपरोक्त उदाहरणों के माध्यम से बात कर रहे हैं नशे की गिरफ्त में आती हमारी नयी पीढ़ी की। पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड हो या फिर कोई अन्य राज्य। नशे के कारण नाश की ओर बढ़ते बच्चों की दर्दनाक कहानियां अक्सर सुनने, पढ़ने और देखने को मिल जाती हैं। अत्यंत दुखद स्थिति तो तब होती है जब यह पता चलता है कि जिनके कंधों पर नशे के सौदागरों को रोकने की जिम्मेदारी थी, वे ही नशे के कारोबारी बने मिले।
असल में अच्छी या बुरी संगत की बात आज हम नशे की लत के साथ जोड़कर कर रहे हैं। क्योंकि पिछले दिनों अनेक जगहों से ऐसी खबरें आयीं जिनका लब्बोलुआब यह था कि खराब संगत से चिट्टे की लत लग गई। सिल्वर पन्नी पर रखकर इस सफेद जहर को पीना शुरू किया। लत ऐसी लगी कि घर के बर्तन तक बेच दिए। नशा सिर्फ चिट्टे का ही नहीं, और भी कई तरह का, जिसने नाश की ओर ही धकेला। जानकार कहते हैं कि अपनी इच्छाशक्ति दृढ़ रखने वाले विरले ही होते हैं, खासतौर पर किशोरावस्था-युवावस्था की दहलीत पर पहुंचे बच्चे। इसलिए ऐसे मौकों पर बच्चों पर नजर रखनी बहुत जरूरी है। संगत की बात इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि सफलता की कुंजी कहती है कि जीवन की सफलता अच्छी आदतों में ही निहित है। अच्छी आदतें और ज्यादा डेवलप हों और बरकरार रहें, इसके लिए अच्छी दोस्ती जरूरी है। अभिभावक इस बात को जितनी जल्दी समझ जाएं अच्छा है। क्योंकि समय निकल जाने के बाद किया गया प्रयास व्यर्थ ही होता है। जानकार कहते हैं कि किशोरावस्था और युवावस्था में बुरी आदतें अधिक प्रभावित करती हैं। इसलिए उम्र की इन अवस्थाओं में विशेष सतर्कता और सावधानी बरतने की जरूरत है। नशा व्यक्ति की बुद्धि का नाश करता है। सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की कार्य क्ष गई मेंमता प्रभावित होती है। इसलिए इससे दूर रहने से ही तरक्की के दरवाजे खुलते हैं। इसी तरह बुरी संगत से नकारात्मकता आती है। सफलता प्राप्त करने के लिए नकारात्मकता से दूर रहना चाहिए। बुरी संगत से विचार भी बुरे आते हैं। इसलिए बुरी संगत से दूर रहना जरूरी है।
खेप पकड़ी गयी, कहां खप रहा नशा
आयेदिन खबरें आती हैं कि नशे की इतनी खेप पकड़ी गयी। जो नशा पकड़ा गया, हो सकता है उसे नष्ट कर दिया जाता हो, लेकिन जो पहुंच गया, वह कहां खप रहा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि नशा कहां खप रहा है। जवान होते बच्चे उनकी गिरफ्त में आ रहे हैं, आखिर तंत्र कहां छिपा रहता है। हो-हल्ला मचाने के अलावा ठोस रणनीति बनायी जानी बहुत जरूरी है।

युवाओं को बर्बाद करने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश

जानकार कहते हैं कि देश की भावी पीढ़ी को बर्बाद करने की यह अंतर्राष्ट्रीय साजिश है। ओवरडोज से मौत, नशे के लिए घर-बार की बिक्री जैसी खौफनाक खबरें आयेदिन आती रहती हैं। विभिन्न सीमाओं से अलग-अलग तरीके से अलग-अलग तरह के नशे की सामग्री पहुंच रही है। सीमाओं पर नशे की इस घुसपैठ के खिलाफ एनकाउंटर अभियान चलाया जाना बेहद जरूरी है। नहीं तो स्थिति और भयावह होने से कोई नहीं रोक पाएगा।

 क्या कहते हैं विशेषज्ञ
 ‘बेहतर कल के लिए आज जरूरी अच्छी संगत’
डॉ. अरदास संधु
न्यूरो साइकियेट्री


संगत यानी दोस्ती-यारी एवं स्कूल का माहौल अच्छा हो, बेहतरीन पैरेन्टिंग, महिलाओं के सम्मान की बचपन से ही शिक्षा, सरकारी इच्छाशक्ति। ये सारी चीजें सुदृढ़ हों तो कोई ताकत नहीं कि हमारी भावी पीढ़ी को नशे के गर्त में धकेल सके। यह कहना है न्यूरो साइकियेट्री डॉ. अरदास संधु का। नैतिक शिक्षा को जरूरी मानते हुए डॉ. अरदास कहते हैं कि नशा हो या कोई भी असामाजिक गतिविधि, बच्चों पर सीधा असर संगत का पड़ता है। बच्चे को जैसी संगत मिलेगी, उसका असर वैसा ही पड़ेगा। संगत दो-तीन तरह की हो सकती हैं। एक तो आपके सीनियर आपके अच्छे दोस्त हो सकते हैं। उनके साथ आपकी अच्छी बनती है। दूसरे, आपके जूनियर यानी आपसे कम उम्र के लोग आपके मित्र हो सकते हैं। या फिर आपके हमउम्र ही आपके दोस्त होते हैं। हमउम्र दोस्त तो आदर्श माने ही जाते हैं। अगर सीनियर यानी आपसे ज्यादा उम्र के आपके दोस्त हैं तो इस पर नजर रहनी चाहिए कि आपका वह दोस्त जो आपका ‘रोल मॉडल’ है, वह कैसा है? क्या आपका रोल मॉडल वह है जो बहुत ज्यादा खर्च करता है, उसकी लाइफस्टाइल एकदम अलग तरीके की है वह पिज़्ज़ा, बर्गर खाने वालों में से है। या आपका रोल मॉडल वह है जो बच्चा लाइब्रेरी जा रहा है, पढ़ाई के प्रति गंभीर है। अच्छी आदतों वाला है। बेवजह नहीं घूमता। इसी क्रम में यह बात भी आती है कि आपका साथी किस तरह के गाने सुन रहा है। किस तरह की जिंदगी जी रहा है। उसकी धार्मिक प्रवृत्ति कैसी है। धार्मिक होना बुरी बात नहीं, लेकिन कट्टरता खराब है। 
डॉ. अरदास कहते हैं कि स्कूल की जिम्मेदारी बहुत सशक्त है। बेशक बच्चों की संगत पर नजर रखने की जिम्मेदारी बहुत ज्यादा माता-पिता की है, लेकिन स्कूल ने इनीशिएटिव लेना चाहिए। बच्चे का ज्यादातर समय स्कूल में व्यतीत होता है। वह किस तरह का व्यवहार करता है इस बात को लेकर बच्चे के माता-पिता से स्कूल का संपर्क रहना चाहिए और माता-पिता को भी चाहिए कि बच्चे के व्यवहार में तब्दीली पर वे स्कूल से संपर्क करें। घर से और स्कूल से शुरुआत से ही यह सिखाया जाना चाहिए कि महिलाओं का सम्मान करें। इसके साथ ही परिवार के लोग आपस में बातें करें। कई बार हम परिवार में देखते हैं कि लोग साथ तो बैठे हैं, लेकिन हर कोई अपने-अपने फोन पर लगा रहता है। इसकी वजह से भी अनजाने में ही बच्चे के कोमल मन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। वह वर्चुअल लाइफ को ही दुनिया समझने लगता है।
नशे की समस्या से निजात पाने के लिए डॉ. अरदास शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन को भी जरूरी मानते हैं। वह कहते हैं कि जिस तरह से समय बदला है, उस हिसाब से शिक्षा व्यवस्था में भी बदलाव जरूरी है। बच्चों को नैतिकता सिखाई जाये। साथ ही वह ‘हेल्दी डाइट’ को भी आवश्यक तत्व मानते हैं। डॉ. संधु का मानना है कि स्वस्थ भोजन शैली का तन-मन पर बहुत असर पड़ता है। नशा रोकने में सरकार की भूमिका के सवाल पर वह कहते हैं कि इच्छाशक्ति हो तो सब हो सकता है। कई बार ऐसी खबरें आई हैं कि सरकारी अफसर ही नशा तस्करी में पकड़े गये। अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो, लोग अपने कर्तव्यों को समझें तो कोई ताकत नहीं है जो सीमा क्षेत्र से अंदर नशे को हमारे देश में पहुंचा सके। हमारी नयी पीढ़ी को बर्बाद करने वाली साजिशों को बेनकाब किया जाना जरूरी है। इसके साथ ही डॉ. संधु कहते हैं कि बच्चों को ना कहना जरूर सिखाएं। क्योंकि ना कह सकने की आदत या हिम्मत ही हमें नशाखोरी से दूर रख पाएगी। पहले शौकियां, फिर दोस्तों की जिद में हां, हां करते-करते जीवन की खुशियां हमसे ना कहने लगती हैं। इसलिए गैर जरूरी बातों पर ना कहना जरूरी है।

Monday, December 2, 2024

ड्यूटी चार्ट, गिनती और राजीव जी की भावभीनी सेवानिवृत्ति

केवल तिवारी

दैनिक ट्रिब्यून की हमारी समाचार संपादक मीनाक्षी जी ने कुछ दिन पहले तीन-चार दिन के ड्यूटी चार्ट पर नजर डालने को कहा। मैंने 30 नवंबर तक के ड्यूटी चार्ट देखे। एक दिसंबर के चार्ट में एक साथी कम लगा। मैं बार-बार गिनूं, लेकिन समझ नहीं आया कि एक व्यक्ति कम कौन हो रहा है। फिर एक-एक नाम को देखा। अचानक ध्यान आया, ओह राजीव जी एक दिसंबर से दैनिक ट्रिब्यून के न्यूजरूम का हिस्सा नहीं रहेंगे। मन भावुक हुआ। फिर मन को ही समझाया कि यह तो कार्यालयी या यूं कहें नौकरीपेशा का एक सिस्टम है। अथवा जैसा कि, प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में संपादक नरेश कौशल जी ने कहा कि जब व्यक्ति परिपक्व होता है, अनुभवी होता है उसी समय एसे रिटायर होना पड़ता है, राजीव जी एनर्जेटिक हैं, हंसमुख हैं, काम को बहुत अच्छी तरह निष्पादित करते हैं। 


खैर जब ड्यूटी चार्ट वाली बात आ गयी और देखते-देखते 30 नवंबर भी आ गया तो प्रेस क्लब में राजीव जी को लेकर सब अनुभवों को साझा करने लगे। शायद ही कोई होगा जिसने राजीव जी के हंसमुख व्यक्तित्व और हाजिर जवाब व्यवहार की प्रशंसा न की हो। साथ आयीं भाभी जी ने भी राजीव जी को बेहतरीन पति बताया जो हर वक्त साथ खड़े होते हैं। यह बात तो जग जाहिर है कि जो व्यक्ति घर से अच्छा है वह हर जगह अच्छा होगा ही। प्रेस क्लब से लौटने के बाद भी हम राजीव जी की ही बातें करते रहे। शाम को राजीव जी ऑफिस पहुंचे। कुछ देर मीनाक्षी मैडम के साथ बातचीत के बाद वह सभी से मिलने गये और फिर हम सभी लोग उन्हें गेट तक छोड़ने गये। इससे पहले राजीव जी ने मैं पल दो पल का शायर हूं गीत की दो पंक्तियां सुनाईं जिसमें मशरूफ जमाना... शब्द हैं। इस गीत को मैंने अगले दिन फिर ध्यान से सुना और इस बार इसका कुछ और ही मतलब समझ आया। विदाई कार्यक्रम में मैं तो दो ही पंक्ति गुनगुना पाया जिसके बोल थे, हर मुलाकात का अंजाम जुदाई क्यों है, अब तो हर वक्त यही बात सताती है हमें।' राजीव जी भले ही ऑफिस से सेवानिवृत्त हुए हैं, लेकिन संबंधों से नहीं। उनसे मिलना-जुलना बना रहेगा। बातें होती रहेंगी। छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते...। राजीव जी स्वस्थ रहें और प्रसन्न रहें। कुछ फोटो साझा कर रहा हूं। 







Tuesday, November 26, 2024

संविधान, सियासत, कुछ तथ्य और‌ राष्ट्र प्रथम की भावना

 केवल तिवारी

वर्ष 2024 में हुए 18वीं लोकसभा चुनाव में विपक्षी पार्टियों के गठबंधन 'इंडिया' ने 'संविधान' को मुख्य मुद्दा बनाया। संविधान खतरे में है, आरक्षण खतरे में है जैसे विमर्श गढ़े गये। इसका कितना फायदा हुआ यह तो राजनीति के पंडित ही बता सकते हैं, लेकिन इस आम चुनाव के बाद संविधान शब्द खूब प्रचलन में आया है। सत्ता पक्ष भी इसको लेकर सजग दिखती है और आयेदिन कई कार्यक्रम इसको लेकर करती है। इन सबके बीच यह बात भी महत्वपूर्ण है कि भावना यही होनी चाहिए कि राष्ट्र प्रथम। देश को ही सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।
 संयोग से इसी बीच, 26 नवंबर को संविधान दिवस आ गया। संविधान को बने 75 साल हो गये। बेशक हम 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं, लेकिन संविधान सभा ने 26 नवंबर की तारीख को लिखित संविधान को अपनाया था। बताया जाता है कि कुल 274 सदस्यों ने 167 दिनों तक बहस की और लगभग 36 लाख शब्द संविधान में समाहित किए गए। इस तरह दुनिया के सबसे लंबे लिखित भारतीय संविधान का स्वरूप सामने आया। कहा जाता है कि संविधान के हर अनुच्छेद पर संविधान सभा के सदस्यों ने बहस की। यह तो ज्ञात ही है कि संविधान निर्माण में दो साल, 11 महीने और 18 दिन लगे। संविधान के मुख्य वार्ताकार माने जाने वाले बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को उनकी अध्यक्षता वाली मसौदा समिति के सदस्यों ने सहायता प्रदान की थी। भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद 75 साल पहले इस ऐतिहासिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले पहले व्यक्ति थे। यह दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है और इसका पहला संस्करण न तो मुद्रित किया गया था और न ही टाइप किया गया था। इसे हिंदी और अंग्रेजी दोनों में हाथ से सुलेख के रूप में लिखा गया था। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक संविधान की पांडुलिपि प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने हाथ से लिखी थी और देहरादून में उनके द्वारा प्रकाशित की गई थी। हर पृष्ठ को शांति निकेतन के कलाकारों ने सजाया था, जिसमें बेहर राममनोहर सिन्हा और नंदलाल बोस शामिल थे। भारत के संविधान में फिलवक्त 395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं। संविधान में अब तक 106 बार संशोधन किया जा चुका है। संविधान सभा ने नवंबर 1948 से अक्तूबर 1949 तक, संविधान के प्रारूप पर खंड-दर-खंड चर्चा के लिए बैठकें कीं। इस अवधि के दौरान सदस्यों ने 101 दिनों तक बैठकें कीं। संविधान के मसौदे के भाग-तीन में मौलिक अधिकारों को शामिल किया गया और इस पर 16 दिनों तक चर्चा हुई थी। कुल खंड-दर-खंड चर्चाओं में से 14 प्रतिशत मौलिक अधिकारों के लिए समर्पित थी। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को भाग-चार में शामिल किया गया था और इस पर छह दिनों तक चर्चा हुई थी। खंड-दर-खंड चर्चा का चार प्रतिशत निर्देशक सिद्धांतों के लिए समर्पित था। नागरिकता से संबंधित प्रावधानों को भाग-दो में शामिल किया गया था। इस भाग पर चर्चा का दो प्रतिशत समर्पित था। छह सदस्यों ने एक लाख से अधिक शब्द बोले। आंबेडकर ने 2.67 लाख से अधिक शब्दों का योगदान दिया। संविधान सभा के सदस्य, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 73,804 शब्द बोले। मसौदा समिति ने संवैधानिक सलाहकार बीएन राव द्वारा बनाए गए मसौदे की पड़ताल की और उसमें संशोधन किया तथा इसे सभा के समक्ष विचार के लिए प्रस्तुत किया। समिति के सदस्यों ने चर्चा के दौरान अन्य सदस्यों द्वारा की गई टिप्पणियों पर अक्सर प्रतिक्रिया दी। कुछ वैसे सदस्य जो मसौदा समिति का हिस्सा नहीं थे, (फिर भी) उन्होंने संविधान सभा की बहसों में व्यापक रूप से भाग लिया। ऐसे पांच सदस्यों ने एक-एक लाख से ज्यादा शब्दों का योगदान किया। संविधान सभा के पूरे कार्यकाल के दौरान पंद्रह महिलाएं इसका हिस्सा थीं। उनमें से 10 ने बहस में भाग लिया और चर्चाओं में दो प्रतिशत का योगदान दिया। महिलाओं में सबसे ज्यादा भागीदारी जी. दुर्गाबाई ने की, जिन्होंने लगभग 23,000 शब्दों का योगदान किया। उन्होंने बहस के दौरान न्यायपालिका पर विस्तार से बात की। अम्मू स्वामीनाथन, बेगम ऐजाज रसूल और दक्ष्याणी वेलायुधन ने मौलिक अधिकारों पर बहस में भाग लिया। हंसा मेहता और रेणुका रे ने महिलाओं के लिए न्याय से संबंधित बहस में हिस्सा लिया। दिलचस्प बात यह है कि संविधान सभा की बहसों में प्रांतों के सदस्यों ने 85 प्रतिशत योगदान दिया। संविधान सभा में प्रांतों से चुने गए 210 सदस्यों और रियासतों द्वारा मनोनीत 64 सदस्यों ने चर्चा में हिस्सा लिया। औसतन, प्रांतों के प्रत्येक सदस्य ने 14,817 शब्द और रियासतों के एक सदस्य ने 3,367 शब्द बोले। पीठासीन अधिकारियों द्वारा दिए गए भाषणों और हस्तक्षेपों ने चर्चाओं में नौ प्रतिशत का योगदान दिया। संविधान सभा की पहली बैठक नौ दिसंबर, 1946 को दिल्ली में ‘संविधान सदन' में हुई। इसे पुराने संसद भवन के केंद्रीय कक्ष के रूप में भी जाना जाता है। सदस्य राष्ट्रपति के मंच के सामने अर्धवृत्ताकार पंक्तियों में बैठे थे। अगली पंक्ति में बैठने वालों में नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, आचार्य जेबी कृपलानी, प्रसाद, सरोजिनी नायडू, हरे-कृष्ण महताब, गोविंद बल्लभ पंत, आंबेडकर, शरत चंद्र बोस, सी. राजगोपालाचारी और एम. आसफ अली थे। नौ महिलाओं सहित दो सौ सात प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। भारत के संविधान के कुछ धाराओं पर कई बार बहस-मुबाहिशें भी होती रही हैं। कुछ पुराने कानूनों को हटाने की कवायदें भी हो चुकी हैं। संविधान में परिवर्तन के भी अलग-अलग मानक हैं। जितने महत्व का आर्टिकल, उसके संशोधन को उतना ही क्लिष्ट बनाया गया। कुछ प्रावधानों को कुछ ही समय के लिए रखा गया जिन्हें कालांतर में बढ़ाया ही गया। आरक्षण का मामला इनमें से एक है। तो संविधान को लेकर कुछ तथ्यों को इधर-उधर से जुटाकर आपके सामने रखा है। आशा है काम आएगा। 

Sunday, November 24, 2024

हर्षित मोहित, प्रफुल्लित भजन, उर्मिल... विवाह समारोह और मित्र मिलन, शानदार यादें

केवल तिवारी

हर्षिता के हुए मोहित तो खुशियों के पुष्प गए खिल, उर्मिला-भजनलाल के आयोजन में मित्रों से सजी महफिल
दशकों के बाद मित्र मिलन की ऐसी सुंदर घड़ी आई, पूरे मौर्य परिवार को हम सबकी ओर से हार्दिक बधाई।
पुत्र और पुत्रवधू 

सचमुच मित्र और शादीशुदा जीवन में हम सब मित्रों के सीनियर और हमारे बच्चों के ताऊ भजनलाल को दिल से हार्दिक बधाई के साथ धन्यवाद कि उन्होंने एक खास मौका दिया मित्रों को मिलने का। करता हूं विस्तार से बातचीत। इससे पहले बता दूं कि बेटे मोहित और बहू हर्षिता की सुंदर जोड़ी है। समारोह में सभी ने यह बात कही। मेरा आशीर्वाद। दोनों खुश रहें और स्वस्थ रहें।
असल में बुधवार, 20 नवंबर की शाम एक अनूठी शाम रही। दसवीं तक साथ पढ़े अनेक मित्र मिले, कुछ से फोन पर बात हुई। वर्ष 1987 में मैंने लखनऊ मांटेसरी स्कूल से दसवीं पास की थी। उनमें से कुछ से मित्रता बनी रही, कुछ के नाम से ही परिचित हूं और कुछ के चेहरे याद आए।
सेल्फी लेता मित्र वसंत। साथ में भाभी जी, मैं और विमल

 बुधवार की शाम मिलने का खूबसूरत माध्यम बने मित्र भजनलाल। उनके सुपुत्र मोहित की शादी हो चुकी थी। मुझसे जोर देकर तो यह भी कहा गया था कि मुझे शादी समारोह में बहराइच भी बाराती बनकर चलना था। मेरी भी दिली इच्छा थी कि मैं पहुंचूं, लेकिन मनुष्य तो कर्म के अधीन है, इसलिए कर्म और जिम्मेदारी का ऐसा कॉकटेल बना कि बाराती बनकर न पहुंच सका, लेकिन रिसेप्शन पर पहुंचना ही है, इसे ठान लिया। इसलिए कनफर्म रिजर्वेशन न होने पर भी पहुंचने की ठान ली। मंगलवार शाम चंडीगढ़ से ट्रेन पकड़ी, बुधवार सुबह तेलीबाग स्थित अपने घर पहुंचा। भाई साहब-भाभी जी और पड़ोस में ही रह रही दीदी से भी मुलाकात करनी थी। भजनलाल का आग्रह था कि मैं दिन में ही उनके घर पहुंच जाऊं, मैं भी चाह रहा था, लेकिन समय ऐसे निकला कि शाम को ही रिसेप्शन स्थल डॉ. राममनोहर लोहिया ट्रांजिट हॉस्टल पहुंच पाया। मैं मेहमानों के आगमन से बहुत पहले ही पहुंच चुका था, भजनलाल वहां व्यवस्था देख रहे थे। चूंकि पर्याप्त समय था तो पहले एक राउंड पूरे परिसर का लगाया फिर बहन सुशीला, बिटिया मीनू और भाई अर्पित से मुलाकात हुई। कुछ पुरानी बातें भी हुईं। इसी दौरान दीक्षित जी मिल गए। दीक्षित जी से कुछ माह पहले ही केनाल कालोनी में मुलाकात हुई थी। इस बार उनकी पत्नी और उनके दोनों बेटों से भी मुलाकात हुई। बहुत अच्छा परिवार है। बातों और आसपास टहलने के क्रम में ही मैंने भजनलाल से कह दिया कि वह व्यवस्था देखें एवं मेहमानों का स्वागत करें, मैं अन्य मित्रों से बात करता हूं। तभी बाहर फूल की दुकान दिखी, मन किया कि एक बुके ले लिया जाए और लेकर हॉस्टल के रिसेप्शन पर रखवा लिया। 
कुछ ही देर में मित्र विमल यानी पार्षद विमल तिवारी आ गए। उनके आते ही पुराने दिन याद आ गए। हम लोग विमल को अजय देवगन कहते थे। विमल एकमात्र ऐसा मित्र था, उस दौर में जिसके मुंह से कभी कोई गाली नहीं निकलती थी। बहुत ज्यादा गुस्सा होने पर वह कहता, 'तेरी नानी की नाक में रस्सी।' वैवाहिक जीवन के मामले में विमल हम सबसे जूनियर है। उनकी एक बिटिया है। विमल ने कुछ मित्रों से फोन पर बात कराई। बहुत अच्छा लगा। कुछ ही देर में वसंत और उनकी पत्नी भी पहुंच गए। मित्र वसंत की वजह से ही मेरा दिल्ली आना हो पाया था। यह बात है वर्ष 1996 की। एमए करने के बाद भजनलाल, शदाब अहमद और मैंने एलएलबी में एडमिशन ले लिया था। तब तक मेरी समझ में आ गया था कि लक्ष्यविहीन पढ़ाई हो रही है। मैं कुछ अखबारों में लिखने लगा था। क्लर्की मुझे पसंद नहीं थी। दैनिक जागरण के दफ्तर में जाता था तो वहां हाथ से लोगों को लेख संपादित करते देखता था। मुझे यह बहुत भा गया। कुछ मित्रों ने कहा पत्रकारिता करनी है तो दिल्ली से बेहतर कुछ नहीं। दिल्ली एकमात्र मित्र था वसंत। वह भी एक बिजली के मीटर बनाने वाली फैक्टरी में एकाउंटेंट। उन दिनों फोन भी नहीं थे। मैंने वसंत को पत्र लिखा, वसंत का हफ्तेभर में ही जवाब आ गया कि आ जाओ। चला गया। कुछ दिन साथ काम किया। इसी दौरान मुझे अपनी लाइन मिल गयी और इसके बाद मैंने फिर से पढ़ाई भी की। पहले बीजेएमसी यानी पत्रकारिता में स्नातक फिर एमजेएमसी की। इसी दौरान तमाम उठापटक के साथ खूब लिखने और छपने लगा। दौड़ती-भागती जिंदगी में मैं अब चंडीगढ़ में हूं और वसंत ने अब लखनऊ में ही अपना काम जमा लिया है।
कार्यक्रम में वसंत के पहुंचते ही फिर पुरानी बातों का सिलसिला चल निकला। भाभी जी को बताया कि इसका टिफिन हम लोग खूब खाते थे। इसे धनिया पसंद नहीं था और आंटी या दीदी इसकी सब्जी में धनिया पत्ता कई बार डाल देती थीं। भाभी ने बताया कि आज भी धनिया नहीं खाते। ऐसी ही कई बातें कीं तो कुछ मित्रों ने मेरी याददाश्त की दाद दी। मैंने बताया कि स्कूल के दौर की कुछ बातें तो याद हैं बाकी मेरी भी स्मृति अब कमजोर हो रही है। सफेदी अपने आगोश में घेरने लगी है। तभी मित्र सपन सोनकर भी पहुंचा। सबसे ज्यादा बुजुर्ग लग रहा था। उसकी आंखों में काफी विकार आ गया है। ठीक से नहीं दिखता। खैर वह प्रसन्न है। प्रसन्नता ही उसे ठीक कर देगी। हम लोगों की बातें चलती रहीं, कुछ-कुछ स्टाटर भी चलता रहा। सामने ऑर्केस्ट्रा धीरे-धीरे रंगत में आ रहा था। कलाकार अपनी प्रस्तुति दे रहे थे। मोहित और हर्षिता को आशीर्वाद देने का क्रम भी जारी था। बातों-बातों में कब दस बज गये पता ही नहीं चला। पहले वसंत फिर विमल भी निकल गये। अन्य मित्र भी जाने लगे। बारह बजे के आसपास तक मेहमान भी लगभग जा चुके थे। एक बार फिर मैं और भजनलाल साथ-साथ थे। इसी दौरान ऑकेस्ट्रा को समेटा जाने लगा। मैंने भी एक गीत गुनगुना दिया। फिर दूल्हा-दुल्हन, उनके परिजन साथ में मैं और समस्त परिवार का भोजन शुरू हुआ। हंसी-मजाक, भोजन आदि में एक बज गया। सबको विदा करने के बाद मैं और भजनलाल रसोई आदि से सामान पैक कराने में व्यस्त हो गये। रात करीब दो बजे मैं हॉस्टल के कमरा नंबर 11 में सोने चला गया। बाकी लोग भी अपने-अपने घर चले गये। सुनहरी यादों की यह शाम स्मृति पटल पर स्थायी रूप से अंकित हो गयी। अगले दिन कुछ और मुलाकातों के साथ ही यात्रा संपन्न हो गयी। अब चंडीगढ़ में अपने काम में पूर्व की भांति लग गया हूं। ईश्वर सबको स्वस्थ रखे। हार्दिक शुभकमनाएं। 
भाभी जी के साथ मैं 







Friday, November 22, 2024

जवानी की दहलीज पर खड़े हो तो पढ़ो ये प्यारा संदेश- इस परीक्षा में हार जाओ बच्चो !


केवल तिवारी

अक्सर हम कामना करते हैं बच्चों की सफलता की। उनके जीतने की। जीवन की तमाम परीक्षाओं में विजयी होने की। लेकिन जीवन की इस आपाधापी में कुछ परीक्षाएं ऐसी होती हैं जिनमें हार जाने की सीख यदि बच्चों को दी जाये तो माहौल ही सुखद हो जाएगा। असल में कुछ समय पहले चंडीगढ़ के आसपास ही एक अनौपचारिक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला। वहां कुछ हमउम्र लोग अपने जवान होते बच्चों की बातें कर रहे थे। कोई अति तारीफ कर रहा था, कोई संयत था। किसी के पास सिवा शिकायत के कुछ था ही नहीं। इन्हीं बातों के सिलसिले में एक बात निकलकर आई कि बच्चे जब बड़े हो जाएं। यानी किसी धंधे-पानी में लग जाएं या फिर गृहस्थी की दहलीज पर कदम रखने वाले हों तो उन्हें एक सीख दीजिए कि परिवार की परीक्षाओं में हार जाओ। हार जाओ यानी जितना संभव हो अपने से बड़ों या बुजुर्गों की बातों में टोकाटाकी न करें, उनकी बात को सुनें। अति जानकार न बनें और उनके सामने हर जाएं। याद रहे बच्चो, हर मां-बाप की तमन्ना होती है कि उनके बच्चे कम से कम इतनी तरक्की करें कि उनसे आगे निकल जाएं। यह आगे निकलना सेहत की दृष्टि से है। यह आगे निकलना पढ़ाई को लेकर है और पेशेवर तरक्की को लेकर भी है।

अब ये असफल होना या हार जाना क्या है

जनरेशन गैप का मामला हमेशा रहता है। नयी पीढ़ी को लगता है कि जमाना हमारा है और चीजें भी हमारे हिसाब से होनी चाहिए। उधर, बुजुर्गों का तर्क होता है उनके पास अनुभव का खजाना है, इसलिए उनकी चलनी चाहिए। अब चलनी चाहिए, नहीं चलनी चाहिए तो दूसरी बात है, अहम बात है हारने या असफल होने का। एक छोटा सा उदाहरण समझिए। मान लीजिए परिवार के किसी बुजुर्ग से हम बात कर रहे हैं। बात आगरा शहर की हो रही हो। वह बोलें, मैं भी उस इलाके में कुछ दिन रहा हूं। दो बड़े-बड़ चौक वहां पर बने थे। कोई युवा तपाक से बोल उठे, वहां कोई चौक कभी था ही नहीं। इतने साल से मैं ही देख रहा हूं। मैं कहता हूं हो सकता है युवा ही सही हो, लेकिन अगर इसकी जगह वह चुपचाप सुन ले या यह कह दे कि हां बदल तो अब सारे शहर गए हैं। कहीं मेट्रो आ गयी है और कहीं फ्लाईओवर बन गए हैं। लेकिन कई बार देखने में आया है कि कुछ युवा अड़ जाते हैं। ऐसे कई मसले हैं। खान-पान की बातों पर भी। कुछ और बातें भी हैं। बड़ों के रुटीन से भी अगर दिक्कत हो तो कई बार उसे इग्नोर करना कितना अच्छा होता है। आपको मालूम भी हो कि मैं जो कह रहा हूं, सही कह रहा हूं फिर भी आप उसे जाहिर नहीं करते तो यही है असफल होना। परिजनों के बीच ऐसी असफलता बहुत सुकून देती है। नयी पीढ़ी को भी पुरानी पीढ़ी को भी।

फलों से लदा पेड़ बनिये

कार्यस्थल पर आपकी शैली अलग हो सकती है, लेकिन घर में उस शैली को मत अपनाइये। घर तो घर है। यहां फलों से लदे पेड़ सरीखे बन जाइये। यानी विनम्र और सरल। साथ में सहजता भी। धौंस जमाने की आदत भी कई बार युवाओं में होती है। धौंसपट्टी से काम बिगड़ते ही हैं, बनते नहीं हैं। साथ ही परिवार के बीच सबसे खुशी की बात है फैमिल फर्स्ट। अपने सबसे नजदीकी परिवार के साथ हमेशा संपर्क में रहिए, फिर धीरे-धीरे उसे विस्तारित कीजिए। इस संबंध में अपरे अखबार के 'रिश्ते' कॉलम में मैंने बहुत कुछ लिखा था, जैसे जो मां जैसी वह मौसी। पापा का बचपन जानने वाली यानी बुआ। ताऊ-चाचा यानी इनको है सब पता। इनसे जानिये पापा के बचपन की कहानियां। ताई तो होती ही है न्यारी। मामा यानी दो बार मां। मतलब मां से भी ज्यादा प्यार करने वाला रिश्ता। तो चलिए आज कुछ ज्ञान की बातें हो गयीं। अगले ब्लॉग में कुछ और...। 

Sunday, November 10, 2024

जी गये दद्दू, जीवटता से चले गये

केवल तिवारी

दद्दू चले गये, लेकिन मैं तो कहूंगा कि दद्दू आप जी गये। चले गये कहना ही पड़ रहा है, पर जीवटता से गये। जीवट रहे दद्दू। जिंदादिल इंसान। प्रैक्टिल इंसान। मददगार इंसान। 

दद्दू की व्हाट्सएप डीपी 

दद्दू को तब से जानता हूं जब नौवीं-दसवीं में पढ़ता था। अक्सर मिलते थे। दूर से ही नमस्कार कर खिसक लेते थे। पहला असल आमना-सामना हुआ जब एक बार उनके यहां कुछ सामान लौटाने गया। मैं और मेरा एक मित्र उनके लखनऊ स्थित सरकारी आवास में गये। देहरी से थोड़ा अंदर पहुंचकर खुद को अच्छा बच्चा साबित करने की लालसा में मैंने पूछ लिया, अंदर आ जाऊं। दद्दू बोले- आधे तो अंदर आ चुके हो और अब पूछ रहे हो। अब आ ही जाओ। उन्होंने बड़ी बेरुखी से बैठने का इशारा किया। हम दोनों बैठ गये। थोड़ी देर में दद्दू दो कटोरियों में खीर लेकर आये। मैंने दो चम्मच खाते ही कहा, अरे वाह बहुत अच्छी खीर है, घर में बनायी होगी। दद्दू बोले- नहीं तुम्हारे लिए बाजार से मंगाई है। फिर बोले, बच्चे को बच्चे की ही तरह रहना चाहिए। बेवहज मक्खनबाजी मत करो। मैं घर आया, बड़े भाई साहब से शिकायती लहजे में कहा, कहां भेज दिया आज मुझे। बहुत ही रूखे आदमी हैं। भाई साहब हंसे, बोले- अरे वह तो बहुत बेहतरीन इंसान हैं। धीरे-धीरे समझोगे। सच में धीरे-धीरे समझा तो दद्दू बेहद जिंदादिल इंसान निकले। उतनी ही जिंदादिल उनकी पत्नी। उनके बच्चे भारती, सुबोध और दीपेश हमें मामा कहते। दीपेश को हम दीपू कहते। कालांतर में दीपेश को मैं दीपेश जी कहने लगा। दीपेश हमारे दामाद बन चुके हैं। यानी मेरी भानजी रुचि के पति। शनिवार 9 नवंबर की दोपहर रुचि का फोन आया, मामा पापा नहीं रहे। मेरे मुंह से एकदम से निकला, अरे दद्दू चले गये। हे भगवान। वह इतना ही बोल पायी, हां मामा चले गये। फोन कट हो गया। मैं बीमार चल रहा था। एक-दो दिन से ऑफिस जाने की स्थिति में नहीं था। पत्नी भावना ने कुछ देर ढांढस बंधाया। मैंने खुद को संयत किया और बोला, अरे नहीं दद्दू आप तो जी गये। आप जहां भी गये, वहीं से सबको आशीर्वाद दोगे। दद्दू को हम तो दद्दू कहते ही थे, हमसे बड़े और हमारी नयी पीढ़ी के लिए भी वह दद्दू थे। दद्दू आप हमेशा याद आओगे। whattsapp पर आपके अक्सर आने वाले मैसेज हमेशा याद रहेंगे। आप दिलों में जिंदा हैं। ऊं शांति।