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Wednesday, July 25, 2012

मौत की जिंदगी

केवल तिवारी
पंच-सात लोग थे। एक खोखला सा हो चुका अधेड़ उम्र का व्यक्ति। पास में लेटी एक महिला। महिला लेटी नहीं थी बल्कि लाश में तब्दील हो चुकी थी। कुछ लोगों ने उस कोठरीनुमा घर में झांका कुछ बुदबुदाए। कुछ रूक गए, दयाभाव की वहज से, मरने वाले के प्रति श्रद्धाभाव से या फिर किसी अनजाने डर से। अधेड़ सा व्यक्ति पहचान में न आने वाली एक अजीब सी आवाज में बोला, रोहताश नगर वालों को तो बता दो। ऐसा लगता था जैसे रोहताश नगर में ही सारा माजरा छिपा हो। तभी कुछ दूरी पर रहने वाले दो-चार और जानकार आ गए। मरने के बाद क्या-क्या होता है, इस पर बहस होने लगी। निगम बोध घाट किस तरह से पहुंचा जाए और उसके बाद की सारी बातें। गमगीन माहौल में चार-चार लोगों का झुंड इधर-उधर बना और कुछ कानाफूसी होने लगी। एक ओर मृत पड़ी महिला के अंतिम संस्कार की बात हो रही थी और तैयारियां चल रही थीं, दूसरी ओर कानाफूसी बंद होने के बजाय बढ़ती जा रही थी। परिवार के लोगों में से वे लोग तो आ गए जो पड़ोस में रह रहे थे, लेकिन रोहताश नगर से कोई अभी नहीं पहुंचा था। रिश्तेदारी में भी बताने में कुछ लोगों ने बड़ी सक्रियता दिखाई। किसी ने लखनउ फोन कर दिया तो किसी का संपर्क गोरखपुर हो गया। कोई दिल्ली के अन्य इलाकों में फोन करने लगा किसी ने आसपास के वरिष्ठों को बुलाने में भलाई समझी। कानाफूसी जारी थी। कोई कहता महिला के लिए आखिर कोई रो क्यों नहीं रहा। कोई कहता पति भी बातचीत में लगा है, अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है... वगैरह...वगैरह।
तैयारी पूरी हो गई। मोहल्ले की दो-तीन बुजुर्ग महिलाएं इस मर चुकी महिला को पर्दे की ओट में सजाने लगीं। जैसे दुल्हन को सजाते हैं। इन बुजुर्ग महिलाओं में से कोई अचानक फफक कर रोने भी लगता। इन महिलाओं को पता था कि जब कोई महिला पति के रहते मर जाती है तो उसका पूरा श्रृंगार किया जाता है। शव को उठाने का वक्त आया तो आखिर कानाफूसी का सुर तेज हो गया। कहीं से आवाज आई, इनके बेटे कहां हैं। कंधा कौन देगा। चारों तरफ निगाह दौड़ाई गई, लेकिन बेटों का पता नहीं चला। ऐसा नहीं कि महिला का देहांत अचानक हो गया और बेटों को पता नहीं चला होगा। असल में महिला तो जीबी पंत हाॅस्पिटल में डेढ़ माह से भर्ती थीं। ब्रेन ट्यूमर बताया था डाॅक्टरों ने। लोगों की मदद से कुछ इलाज भी हुआ लेकिन मर्ज हाथ से निकल चुका था। कहने को या दुनिया के दस्तूर के मुताबिक यह महिला किसी जमाने में खुशनसीब रही होगी। अच्छे घर में पली-बढ़ी और धूमधाम से व्याह दी गई। महिला के पति दिल्ली आकर कुछ करना चाहते थे। गांव के कई लोगों का उदाहरण था उनके सामने, जो दिल्ली आए, यहीं बस गए और उनके बच्चे अच्छी जगहों पर निकल गए। आज विधुर हो चुका यह अधेड़ तब युवा था। सपने थे। हालात शुरू में थोड़े प्रतिकूल रहे, लेकिन जैसे-तैसे परिवार का खर्च चलने लगा। नौकरी नहीं करके अच्छा व्यवसाय कर लेंगे। मन में ठानी और छोटा-मोटा काम शुरू किया। कभी पुलिस वालों के डंडे खाए और कभी पीने-खाने की आदत ने रास्ता दूसरा ही बना दिया। घर में नन्हे मेहमान आए। पहली बेटी हुई, बहुत सुंदर मानो चंद्रमा की चैदह कलाओं को साथ लेकर जन्मी हो। पढ़ने-लिखने में भी औसत से बेहतर। फिर एक के बाद एक दो बेटे हुए। कुछ दिनों के लिए लाश में तब्दील हो गई इस महिला को भी जो उस समय जवान थी बहुत अच्छा लगा। प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद लगा कि समय धीरे-धीरे अपने पक्ष में आ जाएगा। किसी के सरकारी मकान में एक कमरे में दिन गुजर बसर करने लगे। बेटी ने तो किसी तरह बारहवीं परीक्षा पास कर ली और कुछ ट्यूशन आदि पढ़ाने लगी, लेकिन किसी को शायद भनक भी नहीं लगी कि बेटे पढ़ाई के बजाय चोरी और जेबकतरी में डिग्री लेने की पूरी कोशिश में हैं। महिला अपने मायके से अच्छे खाते-पीते घर से ताल्लुकात रखती थी। तीन-चार भाइयों की इकलौती बहन। एक भाई भी दिल्ली में ही अच्छी नौकरी पर था। गाहे-बगाहे बहन की मदद करता रहता। लेकिन यह मदद उसके लिए जी का जंजाल बन गई। पति आलसी हो चले थे, बेटों की लाइन दूसरी हो गई थी और इस बीच बेटी को भी जवानी की दहलीज पर आते-आते हिन्दी फिल्मों की तरह इश्क-विश्क होने लगा था। इधर, जिस सरकारी मकान के एक कमरे में यह परिवार रह रहा था, वहां रहने वाले अन्य परिवार ने इनकी हरकतों के बारे में सबको बताया और इन्हें वहां छोड़कर किसी अनधिकृत कालोनी में दूर-दराज जाना पड़ा। बेटी के इश्क ने जोर मारा और बिना बिरादरी में किसी को बताए उसकी शादी कर दी गई। पर हाय री इस महिला की किस्मत कि कुछ दिनों बाद बेटी भी ज्यादातर मायके में ही रहने लगी। चारों तरफ से टूट चुकी महिला ने फिर कोशिश की परिवार को बनाने की। कुछ सिलाई का काम और घरों में चैका-बर्तन का काम कर उसने चाहा कि बेटे पढ़ें। लेकिन सब कोशिशें बेकार गईं। इधर आएदिन थाने से छुड़ाने के लिए गांव के ही बिरादरों की मदद लेनी पड़ती। बड़े बेटे ने पता नहीं कैसे एक आरटीवी बस में कंडक्टरी शुरू कर दी और छोटा बेटा करता तो कुछ नहीं था पर अपने घरवालों की स्थिति के सामने उसके पास पहनने को अच्छे कपड़े होते और पान-गुटखा, सिगरेट और शराब हर चीज का सेवन करता। घर का खाना भी कभी-कभी मजबूरी में खाता। नही ंतो उसे ढाबे का ही खाना पसंद था। लड़की भी अक्सर मायके आती और हजार-दो हजार लेकर कुछ दिनों के लिए फिर ससुराल चली जाती। अपने घर में नाजों से पली चार भाइयों की इकलौती बहन रही लाश बन चुकी इस महिला के तमाम सपने चूर-चूर हो गए। वह एकांत पसंद करने लगी। एकांत में पता नहीं कुछ सोचती थी या फिर कुछ नहीं सोचने का जतन करती थी। एक दिन सिर में तेज दर्द हुआ। पति डिस्प्रीन का एक पत्ता पकड़ाकर निश्चिंत हो गए। दर्द कम नहीं हुआ। एक हफ्ते बाद असहनीय दर्द हुआ तो बोली, जहर मिल जाता तो बहुत अच्छा होता। पति को लगा मुझपर कमेंट कर रही है। तुरंत पहुंच गए रोहताश नगर रिश्तेदारों के यहां। वहां से पहले तो दुत्कार मिली कि आखिर कब तक मदद करेंगे। फिर मानवता के नाते कुछ ने पैसे दिए और किसी ने जीबी पंत अस्पताल में पहचान के जरिए भर्ती करवा दिया। बेटों को भी पता चला कि करीब 30 हजार रिश्तेदारों ने दिए हैं। उसके बाद किसी को कुछ पता नहीं चला। और पता चला तो यह कि महिला अब इस दुनिया में नहीं रही।
लाश को कंधा तो मोहल्ले वालों ने दिया लेकिन निगम बोध घाट पर मुखाग्नि के लिए फिर बेटों की डिमांड हुई। तभी कोई परिचित आरटीवी गाड़ी में सो रहे उसके बड़े बेटे को उठाकर ले आए। मुंह से शराब की बदबू आ रही थी। पर उसने मुखाग्नि वैसे ही दी जैसे कोई होशवाला व्यक्ति देेता है। परिवार के लोगों ने सिर मुंडवाया। अब तेरहवीं की तैयारी हो रही है। महिला के पति ने इस बार रिश्तेदारों के पास दोनों बेटों से जाने को कहा है। अब पता नहीं महिला की किस्मत यहां काम करती है या नहीं। क्या उसकी तेरहवीं पर कोई भोज हो पाएगा या नहीं। लेकिन महिला को जानने वाला हर व्यक्ति यही कहता है मौत की जिंदगी जीने वाली यह महिला क्या कभी वाकई जी पाई होगी।

Monday, January 17, 2011

कहानी : पलंग के नीचे

केवल तिवारी
मेरी जिंदगी तो बस इसी पलंग के नीचे ही खप लेगी, विकास अपने कपड़े झाड़ते-पोछते चिल्लाया। बस हो गए परेशान, मैं दिनभर न जाने कितनी बार इस पलंग के नीचे घुसती हूं, चोट खाती हूं। तुम्हें एक बार क्या जाना पड़ा कि बस उठा लिया पूरे घर को अपने सिर पर। मीनाक्षी ने विकास को झड़पा। विकास बोला तुमने पलंग पर जो ये सिरहाना लगवाया है न, सारी फसाद की जड़ ही यही है। यह अगर न होता तो हमेशा काम आसान रहता। हां मैं तो जो करती हूं, गलत ही करती हूं। सारी अच्छाइयां तो तुम्हारे ही नाम दर्ज हैं, मीनाक्षी का जवाब आया। उनकी जुबानी जंग के बीच दूर खड़ा उनका बेटा आर्यन चुपचाप दोनों का चेहरे देखे जा रहा था। अबकी विकास कुछ बोला नहीं और ब्रश पर मंजन लगाकर दांत साफ करते हुए बालकनी की ओर जाने लगा। मीनाक्षी फिर बोली, खराब ही लग रहा है तो इस सिरहाने को कटवा दो। विकास मुंह में बने झाग को थूककर आया और लगभग चिल्लाने के अंदाज में बोला, अब बस करो। अब तक चुप रहा आर्यन बोला, मम्मा-पापा आप झगड़ते क्यों रहते हो। विकास कुछ बोले बिना फिर बालकनी की ओर बढ़ा, मीनाक्षी किचन में चली गई। तभी उनकी एक साल की बेटी शिप्रा उठ गई। वह अन्य बच्चों की तरह उठते ही रोती नहीं है। आज भी वह उठी और पास ही रखे सुई के डिब्बे की तरफ लपक गई। आर्यन ने देख लिया। वह चिल्लाते हुए आया मम्मा शिप्रा ने सुई का डिब्बा खोल दिया है। मीनाक्षी किचन से बाहर को भागी और विकास मंजन घिसना छोड़ मुंह में ब्रश दबाए अंदर को आया। फिर देखो अपनी हरकत, विकास बोला तुम्हें पता है शिप्रा कभी भी उठ जाएगी, यहां सुई के डिब्बे को रखने की ऐसी इमरजेंसी क्या आन पड़ी। इस बार मीनाक्षी ने कोई जवाब नहीं दिया। शिप्रा के बिखेरे हुए बटन, धागों की रील को ठीक करने लगी। शिप्रा विकास की गोद में थी। बेटा आर्यन एक बॉल के साथ खेलने लगा। बेटा शिप्रा को खेल लगाओ, मैं जरा कुल्ला कर लूं। विकास ने आर्यन की तरफ देखते हुए कहा। नहीं पापा, ये इधर-उधर तार छूने लगती है कहकर आर्यन फिर बॉल में किक मारने लगा। बॉल इस बार किचन की तरफ जा रही मीनाक्षी के सिर पर लगा। मीनाक्षी ने बॉल को अंदर के कमरे की तरफ फेंका और दो चपत आर्यन को लगा दिए। आर्यन सुबकता हुआ बाहर के कमरे में बैठ गया। विकास ने शिप्रा को नीचे चटाई में बिठाया, वॉश बेसिन में जाकर कुल्ला किया और मीनाक्षी पर गुर्राया, क्या हो गया है आज तुम्हें। मीनाक्षी भी लगी रोने, रोज मुझे ही होता है। तुम सब लोग तो ठीक हो। विकास की समझ में कुछ नहीं आया। वह बोला, कूल हो जाओ मीनाक्षी। आर्यन की छुट्टी है थोड़ी देर खेलेगा नहीं तो क्या करेगा। यह खेलने के लिए बाहर क्यों नहीं जाता। दिनभर इसकी खटपट झेलो, शिप्रा को देखो, खाना बनाओ, झाड़ू पोछा करो, मैं क्या-क्या करूं । तुम फिलहाल एक कप कॉफी बना लो, विकास हंसते हुए बोला। फिर आर्यन की तरफ देखते हुए बोला, बेटा बॉल निकालो हम लोग कैच-कैच खेलते हैं। आर्यन आंसू पोछता हुआ आया और बोला पापा बॉल तो आपको निकालनी पड़ेगी। वह पलंग के नीचे चली गई। यह कहते-कहते बच्चे को हंसी आ गई। उसको हंसता देख मीनाक्षी और विकास भी हंसने लगे। मीनाक्षी बोली मैं सीरियसली कह रही हूं या तो पलंग के चारों ओर लकड़ी का तख्ता लगवा दो या फिर इस सिरहाने को कटवा दो। विकास बोला या तो हमने गृहस्थी जल्दी बसा ली या फिर यह पलंग जल्दी बन गया। क्यों न पलंग को ही बेच दें। उस दिन देखो, शुक्ला जी आए तो भाभी के हाथ से चाबी नीचे गिर गई। पूरा आधा घंटा लगा चाभी निकालने में। पलंग खिसकाने में जो कमर दर्द हुआ वह अब तक है। शिप्रा रोज कुछ न कुछ नीचे फेंक देती है। क्यों न पलंग बेच दें। इसकी जगह दो खाट लगा लेते हैं। हां ऐसे ही घर में न सोफा है और न मेज। एक डबल बेड है तो उसे भी तुम बेच दो। इतने सारे कपड़े, सामान जो इसके बॉक्स में रखा है उसे कहां फेंकोगे। आर्यन बोला, पापा हम बंग्लो ले लें। विकास हंसा बोला, बेटा बंग्लो ऐसे ही नहीं मिल जाता है। अच्छा पापा ऐसा करो पलंग के पैरों को कटवा दो, फिर कोई सामान नीचे नहीं जाएगा और आपको उसे निकालने के लिए परेशान भी नहीं होना पड़ेगा। इससे पहले कि विकास कुछ बोलता, मीनाक्षी बोली चुप कर। अपनी सलाह अपने पास रख और चल किताब निकाल कल तेरा युनिट टेस्ट है। विकास बोला, मीनाक्षी तुम कॉफी बनाकर लाओ। फिर आर्यन की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, बेटा आर्यन क्यों न ऐसा करें कि तुम खुद पलंग के नीचे से सामान निकालने की प्रैक्टिस करो। जब सामान गिरे तो तुम बालकनी से डंडा उठाकर लाना और उसे निकाल लेना। नहीं पापा मैं यह कैसे कर पाऊंगा। बेटा कोशिश तो करो। उनका संवाद चल ही रहा था कि विकास के मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी। उसने चारों तरफ देखा, उसे सिर्फ घंटी सुनाई पड़ रही थी मोबाइल कहीं नहीं दिख रहा था। तभी उसने गौर किया कि घंटी पलंग के नीचे से सुनाई दे रही है। हे भगवान! यह यहां कैसे पहुंच गया। कहीं बॉस का फोन न हो। बेटा डंडा लाओ। आर्यन डंडा लेने भागा। विकास भी झाड़ू उठाकर लाया। तब तक घंटी बंद हो चुकी थी। विकास बोला, आर्यन लाइट जलाना। आर्यन के हाथ में बड़ा डंडा था, जैसे ही उसने स्विच ऑन किया, उसका डंडा नाइट बल्ब पर लगा। पहले से ही ढीला चल रहा बल्ब नीचे आ गिरा। विकास चिल्लाया, आर्यन। मीनाक्षी शांत होकर बोली, तुम कॉफी का प्याला उठाओ बाहर टेबल पर रखा है। विकास की गोद में रो रही शिप्रा को भी उसने उठा लिया। फिर आर्यन के हाथों से डंडा लेकर बोली, आर्यन तुम मेरे मोबाइल से पापा के नंबर पर घंटी मारो। डरा-डरा आर्यन मम्मा का फोन उठाकर लाया और कॉल करने लगा। तब तक विकास भी कॉफी की घूंट भरता आ गया। मीनाक्षी ने मोबाइल उसके हाथ में दिया और बोली, ये लो तुम्हारा मोबाइल। विकास चहकते हुए बोला, अरे इतनी जल्दी कैसे निकाल दिया। मीनाक्षी कुछ नहीं बोली, बल्ब के टुकड़ों को समेटने लगी। शिप्रा को उसने एक डिब्बा देकर खेल लगा दिया था। कांच के टुकड़ों को डस्टबिन में डालती हुई बोली, तुम आर्यन को अपने साथ नहला दोगे विकास। विकास बोला, हां हम दोनों साथ नहाएंगे। इतने में फिर फोन की घंटी बजी। इस बार वाकई विकास के बॉस का फोन था। बॉस का फोन है कहकर वह बालकनी की तरफ गया। वापस लौटा तो बोला, मीनाक्षी मैं नहा नहीं रहा हूं। ऑफिस में मीटिंग है। खाना भी वहीं खा लूंगा। आर्यन का चेहरा लटक गया। पापा के बॉस भी न........। मुंह भींचते हुए वह अंदर की तरफ चला गया। मीनाक्षी बोली, कम से कम बच्चों की छुट्टी के दिन तो ऑफिस आराम से चले जाया करो। रात में तो देर से ही आते हो। नौकरी है यह मीनाक्षी, कहते हुए विकास हाथ-मुंह धाने चला गया। लौटा तो देखा आर्यन शिप्रा को खेल लगा रहा था। मीनाक्षी फटाफट आटा गूंथने में लगी थी। विकास बोला, क्या कर रही हो, तुम लोग आराम से खाना बना लेना। मीनाक्षी बोली, जब तक तुम कपड़े पहनो मैं दो पराठे सेक देती हूं। विकास कपड़े पहन ही रहा था कि आर्यन चिल्लाया मम्मा.....। क्या हुआ विकास और मीनाक्षी एक साथ वहां पहुंचे, शिप्रा ने अपना सिर पलंग के नीचे फंसा लियाहै, आर्यन बोला। इस बार बेचारे आर्यन को फिर थप्पड़ पड़ी। कैसे देख रहा था, बहन को। विकास कुछ समझ नहीं पा रहा था। पलंग उठाने में बहुत भारी था, फिर भी वह जोर लगा रहा था। बड़ी मुश्किल से पलंग कुछ उठा तो शिप्रा की गर्दन बाहर निकल पाई। वह लगी जोर-जोर से रोने। मीनाक्षी भी ध्म्म से वहीं बैठ गई। बोली, विकास तुम ऑफिस जाओ। पलंग का कोई खरीदार मिले तो बात कर लेना...। शिप्रा की गर्दन ही नहीं हमारी जिंदगी फंस गई है इस पलंग के नीचे। केवल तिवारी

Sunday, December 26, 2010

इन 'पुत्रों" की लंबी उम्र नहीं चाहते लोग

इस बार भी 'बेटा" ही हो गया। चार दिन से ज्यादा नहीं बचेगा। उसे दूध ही नहीं दिया जाएगा। दूध पिलाएंगे भी क्यों। इतनी मतलबी दुनिया में जब ये किसी काम ही नहीं आएंगे फिर इन्हें पालकर क्या होगा। ज्यादा पुरानी बात नहीं कुछ साल पहले की ही बात है, कुछ काम तो ये आ जाते थे। हल जोतने के या फिर सामान ढोने के। लेकिन अब तो ये बेटे उस लायक भी नहीं रहे। जी हां! यही हो रहा है। इन बच्चों को तड़पाकर मारा जा रहा है। यह अलग बात है कि इनके मरने पर कोई रोने वाला नहीं। इनकी मां थोड़ी खटपट करेगी भी तो उसे भी डंडे के जोर पर जुल्म ढाकर ठंडा कर दिया जाएगा।
मैं बात कर रहा हूं। पशुओं के बेटों की। यानी गाय-भैंसों के बच्चों की। दिल्ली-एनसीआर में हाल बुरा है। एक तो जमीन कम हो गई है। उस पर मुआवजे का पैसा लोगों को मिला है। दूध के लिए गाय-भैंसें लोगों ने पाली हैं। यदि बछिया या पड़वा हो गया तो ठीक है, लेकिन बछड़ा या कटरा हो गया तो खैर नहीं। अब न तो कोई उन्हें खरीदता है और न ही वे सामान ढोने के कार आ रहे हैं। लोगों के पास महंगी गाड़ियां हो गई हैं। ट्रैक्टर हो गए हैं। रहट अब चलता नहीं। खेती-बाड़ी के काम में जानवरों को इस्तेमाल नहीं होता। गाय-भैसों को मशीन से गाभिन कर दिया जाता है। ऐसे में दूध के लिए गाय-भैंस पालने वाले ऐसी व्यवस्था कर देते हैं कि यह जानवरों का बेटा बस दो-चार दिन देख ले इस दुनिया को फिर नमस्ते। एक तरफ इनसान खुद का बेटा होने के लिए मन्न्तें मांगता है। भू्रण हत्या करने से भी बाज नहीं आता दूसरी तरफ ये जानवरों की दुर्दशा है। सब दुनियादारी है, हमारी-आपकी बनाई हुई। कोई ऐसा जानवर बच भी गया तो जल्दी ही कसाईयों के हवाले हो जाता है। दुनिया महान, दुनियादारी महान।

Friday, December 10, 2010

करीब सात साल पुराना एक ब्लॉ : फिर एक अपराध बोध

शायद और लोगों के साथ भी ऐसा होता हो, पर मेरे साथ यदा-कदा ऐसा होता है जब मुझे अपराध बोध होता है। हालिया घटना एक अजीबोगरीब है। मैं ऑफिस की सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था और मुझे मंडी हाउस जाने की जल्दबाजी थी। वहां मेरी दीदी आई हुई थी। कुछ देर वहां रुककर मुझे तुरंत ऑफिस वापस भी आना था। मेट्रो की भीड़ और शाम छह बजे की नजाकत (उल्लेखनीय है शाम का यह समय हम जैसे कथित पत्रकारों यानी डेस्क पर काम करने वालों के लिए बहुत ही व्यस्तता वाला होता है।) उस पर एक मीटिंग का, होगी या नहीं होगी का झंझट। अंतिम सीढ़ी के पास एक किशोर एक महिला के साथ वहां खड़े थे। वह महिला शायद उस किशोर की मां होगी। किशोर मेरी तरफ मुखातिब होकर बोला, सर यहां टॉयलेट कहां है। क्या बताता....., कनॉट प्लेस में सार्वजनिक टॉयलेट तो कहीं नजर आते ही नहीं। फिर हमारी बिल्डिंग के नीचे जो एक विश्वविद्यालय का फ्रेंचाइजी दफ्तर है, का एक टॉयलेट वहां पर था जहां उस समय तक ताला लग चुका था। शाम हो गई थी, उस दफ्तर के लोग घर जा चुके थे। मैंने वहां एक नजर दौड़ाई फिर कहा, यहां तो कहीं नहीं है। फिर उनकी तरफ देखे बगैर मैं भागने लगा। मैं दौड़ता हुआ राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ए ब्लॉक से नीचे उतर गया। साथी पत्रकार से मेट्रो स्मार्ट कार्ड मांगकर ले गया था, दनादन अंदर चला गया। मेट्रो में चढ़ने ही वाला था कि ऑफिस से कॉल आ गई तुरंत आओ मीटिंग होगी। वापस आया। मेट्रो के नियमानुसार कार्ड में से छह रुपए कट गए। ऑफिस के नीचे आकर उस युवक और महिला को इधर- उधर देखा। वे नहीं थे। चुपचाप आकर मीटिंग में बैठ गया। अपने काम के लिए जिस तेजी से भागा। फिर ऑफिस के लिए जिस तेजी से आया। इस बीच यही सोचता रहा काश मैं उस किशोर या महिला के लिए दो मिनट और खर्च कर लेता। मैं उन्हें अपने ऑफिस का टॉयलेट दिखा देता। वह बहुत परेशानी में थे। काश! ऐसा किया होता। उनके लिए महज दो मिनट खर्च न कर पाने के अफसोस के पीछे भी शायद मेरा ही स्वार्थ था कि यदि में इतना और रुक गया होता तो भागदौड़ बचती और जो बेवजह आठ रुपए स्मार्ट कार्ड से कट गए वह भी बच जाते। सही में हम लोग कितना आत्ममुखी, आत्मसुखी और स्वार्थी हो गए हैं।

Sunday, October 24, 2010

दायें या बायें नैनीताल फिल्म समारोह में भी

दीपक डोबरियाल अभिनीत फिल्म दायें या बायें को नैनीताल फिल्म समारोह में भी प्रदर्शित किया जाएगा।
एजेंसी वार्ता से जारी फिल्म के प्रदर्शन और अन्य जानकारियों के बारे में खबर
प्रतिरोध के सिनेमा का नैनीताल फिल्म समारोह 29 से
नई दिल्ली . 24 अक्टूबर . वार्ता . । प्रतिरोध के सिनेमा को परदा
मुहैया कराने वाला दूसरा नैनीताल फिल्म समारोह 29 से 3। अक्टूबर
तक आयोजित किया जाएगा ।
आयोजकों ने आज यहाँ बताया कि नैनीताल क्लब के शैले हाल में
आयोजित इस तीन दिवसीय समारोह में कुल तीन फीचर और लगभग
।5 डाक्यूमेंटरी फिल्में प्रदर्शित की जाएंगी । किसी प्रायोजक के
सहयोग के बिना आयोजित इस समारोह में हिस्सा लेने के लिए टिकट
या पास की जरूरत नहीं होगी ।
यह जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह . द ग्रुप . प्रतिरोध के सिनेमा का
।5 वां समारोह होगा । इससे पहले ए समारोह गोरखपुर में पांच .
लखनऊ में तीन . भिलाई में दो और इलाहाबाद . पटना . बरेली और
नैनीताल में एक बार आयोजित किए जा चुके हैं ।
गिर्दा और निर्मल पांडे की याद में आयोजित इस समारोह में दिखाई
जाने वाली फीचर फिल्में बेला नेगी की दाएं या बाएं . परेश कामदार की
खरगोश और संकल्प मेश्राम की छुटकन की महाभारत होगी ।
समारोह में वसुधा जोशी की तीन डाक्यूमेंटरी फिल्मों अल्मोडियाना .
फार माया और वायसेस फ्राम बलियापाल का प्रदर्शन किया जाएगा ।
इसके अलावा गिर्दा और निर्मल पांडे पर प्रदीप पांडे . मोहन जोशी और
प्रदीप दास की लघु फिल्में भी दिखाई जाएंगी ।
इसमें दिखाई जाने वाली अन्य डाक्यूमेंटरी फिल्में होंगी संजय
काक की जश्ने आजादी . अजय भारद्वाज की कित्ते मिल वे माही .
देवरंजन सारंगी की हिन्दू टू हिंदुत्व . अनुपमा श्रीनिवासन की आई
वंडर और अजय टी जी की अंधेरे से पहले ।
फिल्मकारों के साथ सीधे संवाद के अलावा इस समारोह में उत्तराखंड
में हाल में हुई प्राकृतिक आपदा पर फोटो पत्रकार जयमित्र बिष्ट की
तस्वीरों की प्रदर्शनी भी लगाई

Friday, October 22, 2010

फिल्म दाएं या बाएं से दीपक की जोरदार एंट्री


मित्र राजेश के मार्फत मित्र बने दीपक डोबरियाल की एक और फिल्म आ रही है दाएं या बाएं। वह इसमें मुख्य किरदार की भूमिका निभा रहे हैं। 29 अक्टूबर को रिलीज हो रही है। संभव हो तो देख लें


जनकवि एवं समाजसेवी स्व. गिरदा ने भी निभाया किरदार
छोटे बजट की सशक्त फिल्म साबित होने का दावा
अगले हफ्ते रिलीज होने वाली कम बजट की फिल्म दाएं या बाएं से कई लोगों की उम्मीदें जगी हैं। बेला नेगी निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है ओमकारा, 1971, दिल्ली-6, शौर्य, 13बी, गुलाल, मुंबई कटिंग, तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दीपक डोबरियाल ने। फिल्म का निर्माण्ा और लेखन भी किया है बेला नेगी ने। इसमें जाने माने समाजसेवी एवं जनकवि गिरीश तिवारी उर्फ गिरदा ने एक स्कूल प्रधानाचार्य की भूमिका निभाई है।
नईदुनिया से फोन पर बातचीत करते हुए मुख्य किरदार निभा रहे दीपक डोबरियाल और बेला नेगी ने कहा कि फिल्म कम बजट की जरूर है लेकिन इसमें संदेश बहुत सशक्त है। फिल्म में दीपक शहरों में पढ़ा-लिखा एक युवक है। वह पहाड़ के अपने गांव में आकर वहां अध्यापक लगता है। उसकी दिली इच्छा है कई तरह के परिवर्तन की। उसके रास्ते में आने वाली अड़चनों और अंतत: उनसे पार पाने को बहुत ही अच्छे ढंग से फिल्माया गया है। हिंदी भाषा में बनी इस फिल्म के सभी दृश्य पहाड़ी इलाकों की है। फिल्म में वहां के जन-जीवन को और उनसे जुड़ी अन्य बातों को भी बहुत सशक्त तरीके से दिखाया गया है। दीपक और गिरदा के अलावा फिल्म में मानव कौल, बदरुल इस्लाम, भारती भट्ट, प्रत्यूष डोकलन आदि हैं। फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि यह फिल्म अपने सशक्त पटकथा और पहाड़ों की पृष्ठभूमि को सशक्त माध्यम से उठाने के लिए तो चर्चित रहेगी ही महान आंदोलनकारी एवं कवि गिरीश तिवारी गिरदा, जिनका हाल ही में निधन हुआ था, को भी श्रद्धांजलि होगी।
केवल तिवारी

Tuesday, October 19, 2010

महाश्वेता देवी से बहुत प्रभावित हैं नुजहत हसन

करीब सालभर पूर्व नेश्ानल बुक ट्रस्ट की निदेशक नुजहत हसन (वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी) नईदुनिया दफ्तर में आईं थीं। उनके पति भी आईपीएस अफसर हैं। पुलिस प्रशासन में भी काम करने का उनका लंबा अनुभव है। उनसे नईदुनिया की मेट्रो टीम ने विस्तार से बातचीत की और मैंने बाद में उस बातचीत को खबर के रूप में लिखा। पेश है ब्लॉग पढ़ने वालों के लिए वह स्टोरी:
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन से बातचीत

सारे मनुष्य बुनियादी तौर पर एक जैसे हैं
काम कोई भी हो रमने पर अच्छा लगता है
पुलिस की वर्दी और नए काम से कुछ सीखा ही है
किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए
पुलिस अफसर से किताबों की दुनिया में बैठने का काम तो एकदम अलग है, लेकिन इससे बहुत कुछ नया सीखने को मिला है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक आईपीएस अधिकारी नुजहत हसन का मानना है कि चीजें बदलने से अनुभव ही मिलता है। नईदुनिया दफ्तर में आईं श्रीमती हसन ने अपने पुलिस सेवा के अनुभवों और निजी जीवन के बारे में विस्तार से बात की। पेश है बातचीत के कुछ अंश

कुछ मामले आर्थिक पहलुओं के चलते रुक जाते हैं और कुछ पर योजनाएं कारगर नहीं हो पाती। लेकिन आशाजनक यह है कि पुस्तक संस्कृति बेहतर तरीके से विकसित हो रही है। अच्छे विषयवस्तु के साथ तमाम भाषाओं में पुस्तकों के प्रकाशन से हमें बेहद खुशी है और एकदम बदले परिवेश में काम करने का अनुभव भी अच्छा मिल रहा है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक नुजहत हसन का कहना है कि किताबों की दुनिया में आकर बहुत कुछ नया सीखने को मिला। यहां आकर ही मैं महाश्वेता देवी के करीब आई और उनसे बहुत प्रभावित हुई।
बातचीत के दौरान पुरानी यादों को कुरेदने का जब सिलसिला शुरू हुआ तो तमाम यादों को उन्होंने बांटा। कोई यादगार लम्हे के बारे में पूछने पर श्रीमती हसन ने बताया कि एक छोटी सी घटना है, लेकिन है बहुत रोचक। उन्होंने बताया कि घटना तब की है जब वह पूर्वी दिल्ली में पुलिस उपायुक्त थीं। किसी इलाके में चोरी हो गई। घटना का विस्तृत विवरण लिखा जा रहा था, तभी एक किशोर बोला कि मेरे नए जूते खो गए हैं। जूते बहुत अच्छे थे। उस समय पुलिस ने इसे बहुत सामान्य अंदाज में लिया। असली मकसद चोरों का भांडा फोड़ना था। लेकिन बाद में जब रिकवरी हुई तो वे जूते भी बरामद हो गए। सामान जब सौंपा गया तो उस बच्चे की खुशी देखने लायक थी। हमें तब बेहद सुकून मिला।
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन ने कहा कि एक अजीब सा यह अनुभव भी रहा कि लोग पूरी जानकारी के बगैर आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। उन्होंने कहा कि एक बार बच्चा खोने की एक घटना में लोग पुलिस पर आरोप लगा रहे थे कि जांच ठीक नहीं हो रही। मुझसे लोगों ने लिखित शिकायत की। मैंने जब अपने स्तर पर मामले को देखा तो जांच सही दिशा में चल रही थी। कुछ दिनों बाद बच्चे को मुक्त भी करा लिया गया।
फिलहाल वर्दी का रौब छूट गया है, अजीब नहीं लगता, पूछने पर उन्होंने कहा कि किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। आज वर्दी है, कल नहीं भी हो सकती है। फिर एक जैसे काम से बोरियत भी तो हो जाती है। हां एनबीटी में आने पर शुरू में अजीब थोड़ा इसलिए लगा कि इस ढांचे को ठीक से जानती नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। उन्होंने कहा कि बुनियादी तौर पर मनुष्य एक जैसा होता है। श्रीमती हसन ने कहा कि वह कई बार खुद से ही सवाल करती हैं। यदि कोई अपने काम को ही ठीक से आंक ले तो सबकुछ ठीक हो जाता है।
खुद आईपीएस अधिकारी और जीवन साथी भी आईपीएस हैं, कैसे निभती है पूछने पर श्रीमती हसन बोलीं, मैं कुछ भी होती, लेकिन शादी पुलिस अफसर से ही करती। क्यों? नुजहत कहती हैं कि जो व्यक्ति इतने सारे पुलिसिया महकमे को देख रहा है, वह निश्चित रूप से पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी संतुलन बनाए रखेगा। पुलिस अधिकारियों का घर में भी समान रौब चलता है, पूछने पर श्रीमती हसन ने कहा कि दरवाजे तक पुलिस की वर्दी होती है, अंदर हर कोई आम इंसान होता है। बातों बातों में पुलिस और हिंदी फिल्मों की बात छिड़ गई। एक सवाल के जवाब में श्रीमती हसन ने कहा कि पुलिस की छवि का नुकसान जितना ज्यादा हिंदी ने किया है, उतना किसी ने नहीं। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि उनकी रुचि खुद फिल्मों के निर्माण की है, लेकिन कई बार आदमी चीजों को सिर्फ सोच ही पाता है। पुलिस सेवा में फिर कब से लौट रही हैं, सवाल पर पहले श्रीमती हसन हंसती हैं फिर कहती हैं आना तो है ही। जब हुक्म आ जाए।

Sunday, October 17, 2010

फ्लैट संस्कृति में कन्या पूजन कार्यक्रम से गदगद हुआ

शहरी जीवन खासतौर पर फ्लैट संस्कृति में एकाध मौकों को देखकर लगता है जैसे चहल-पहल लौट आई। जैस नवरात्र का ही मौका। लोग अचानक भक्ति में लीन दिखते हैं। इस दौरान शराब नहीं पीते। यह अलग बात है कि विजयदशमी के दिन से ही फिर कई रावण जिंदा हो उठते हैं। मुझे भक्ति का प्रदर्शन तो बहुत खराब लगता है जैसे माइक लगाकर फुल स्पीड में जागरण करना, रामायण पाठ करवाना, वगैरह-वगैरह। लेकिन इस बार की नवरात्र में मैं कन्या पूजन कार्यक्रम देखकर बहुत गदगद हो गया। पत्नी के विशेष आग्रह पर मैंने भी कन्याओं को खिलाने के कार्यक्रम के लिए सहमति दी। वह बच्चियों के लिए कुछ उपहार खरीद लाई। तय हुआ कि सुबह जल्दी उठकर पकवान बनाए जाएंगे, पूजा की जाएगी और कन्याओं को खिलाया जाएगा। कन्याओं का हिसाब लगाया गया फ्लैट नंबर से। हमारी कालोनी में 30 ब्लॉक हैं। प्रत्येक ब्लॉक में 16 फ्लैट हैं। मेरे ब्लॉक में एक घर अब तक बंद पड़ा है, यानी वहां कोई नहीं रहता। इस तरह 15 घर हैं। एक घर में स्टूडेंट्स ही रहते हैं। यानी घर में बच्चों वाला माहौल नहीं है। चार-पांच फ्लैट ऐसे हैं जिनमें फ्लैट के मालिक नहीं रहते। किराएदार अक्सर बदलते रहते हैं। इस तरह फ्लैट नंबरों से कन्याओं का हिसाब लगाया गया। जैसे एक बच्ची 3108 में है। एक 2109 में है। एक बगल के ब्लाक में 2080 में है, वगैरह-वगैरह। मेरे गदगद होने की यही मुख्य वजह थी। अपने परिवार, मोहल्ले, रिश्तेदारी में पहले भी कन्या पूजन कार्यक्रम देखे थे। ज्यादातर जगह देखा कन्या पूजन में भी जात-पात का खास ख्याल रखा जाता था। कभी गांव गया तो वहां तो पूरा गांव ही ब्राह्मणों का था। कभी कन्याएं कम हुईं तो यह कभी न सुना और न देखा कि किसी ठाकुर साहब की बेटी को बुला लिया गया हो या फिर किसी शिल्पकार (अनुसूचित जाति) की बेटी को। पंडित की ही बेटी होनी चाहिए। कम हो गई तो एक हिस्सा ऐसे ही रखकर किसी पंडित को दान दे दिया गया।
इस बार नवरात्र में इस फ्लैट संस्कृति में पत्नी के आग्रह पर कन्या पूजन कार्यक्रम में मैंने जिज्ञासावश पूछ ही लिया। ये बच्चियां कौन-कौन हैं। उसने फ्लैट नंबर गिना दिए। मैंने कुरेदा अरे भई ये बताओ कि पांडेजी की बेटी है, शर्माजी की बेटी है, तिवारी जी की है या किसकी। पत्नी ने कहा, मुझे नहीं मालूम। यह बच्ची तान्या है, यह श्रद्धा है। यह तीसरी बगल वाले ब्लॉक से आई है। दो ये नीचे यादव जी की बेटियां हैं और वह त्यागी जी की। यादवजी को और त्यागीजी को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं क्योंकि कभी आरडब्लूए में सक्रियता के चलते और कभी जीना उतरते-चढ़ते नमस्कार हो जाती है। उनकी बच्चियां भी अंकल नमस्ते करती हैं। मुझे बहुत खुश्ाी हुई। यह जानकर कि पत्नी ने कन्याओं के इंतजाम में जाति का ब्रेकर नहीं लगाया है। काश! ऐसा ही हो हर मामले में। कन्या पूजन में जैसे किसी पांडेजी, तिवारी जी, शर्माजी को नहीं ढूंढ़ा गया, इसी तरह अन्य मसलों पर भी यह सब नहीं देखा जाता। नवरात्र पर ऐसी कन्या पूजन से मैं वाकई खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं।
उधर विजय दशमी की शाम को ही नौ दिन के सूफी लोगों को रावण जैसा बनते भी मैंने देखा। कुछ तो प्यालों पर ऐसे टूट पड़े जैसे जेलखाने से छूटा आदमी बाहर की दुनिया देखता है। उनकी इस भगवत भक्ति पर वही शेर याद आया
मस्जिद में बैठकर पीने दे मुझे, नहीं तो वह जगह बता जहां खुदा नहीं।
केवल तिवारी

मित्र के ब्लॉग सोत्डू पर एक पीस अच्छा लगा हूँ ब हूँ यहाँ दे रहा hoon

बॉसत्व एक भाव है.... स्थिति नहीं, पद नहीं.... भाव। कुछ लोग इसी भाव के साथ पैदा होते हैं (प्रोफेशन में)..... कुछ लोग उम्र गुज़ारने के बाद भी- पद पाने के बाद भी इस भाव को प्राप्त नहीं हो पाते.... कुछ जो ज़्यादा स्मार्ट होते हैं, मौका मिलते ही भाव को प्राप्त हो जाते हैं.... लेकिन ऐसे विरले ही होंगे जो पद न रहने पर इस भाव से मुक्ति पा जाएं.....
पहले भी सोचता रहा हूं- पिछले कुछ वक्त से ज़्यादा साफ़ दिख रहा है कि - अपन बॉस मटीरियल नहीं हैं। बॉसत्व प्राप्त लोगों से अपनी कभी अच्छी पटी भी नहीं.... कुछ मित्र भी बॉसत्व को प्राप्त हो गए हैं लेकिन वो तभी तक मित्र हैं जब तक उनके साथ काम न करना पड़े (एक के साथ करना पड़ा तो अब वो मित्र नहीं है)।
वैसे बॉसत्व की एक स्थिति को मैं भी प्राप्त हो गया हूं (करीब साल भर से) लेकिन भाव को प्राप्त नहीं हो पाया। अब भी मैं एक टीम लीडर ही हूं। वही टीम लीडर जो अमर उजाला में था (चाहे टीम दो-तीन आदमियों की क्यों न हो)। निश्चित काम, काम की निश्चित शर्तें और उसे डिलीवर करने का निश्चित समय। इन चीज़ों के साथ अपन ठीक रहे..... थोड़ी-बहुत जॉब सेटिस्फेक्शन भी मिलती रही। लेकिन बॉस के मन को पढ़ लेने की कला में अपन हमेशा ही पिछड़े रहे.... इसलिए करियर में भी पिछड़े ही रहे।
ये बात अब पुरानी हो गई है कि जिन्हें हम चूतिया कहते थे (काम के लिहाज से) वो आगे बढ़ते रहे..... अब वो इतने आगे बढ़ चुके हैं कि उन्हें चूतिया कहना दरअसल खुद बनना है। पहले तो समझ नहीं आता था अब साफ़ दिखता है.... काम करने वाला हमेशा काम ही करता रहेगा और तरक्की करने वाला तरक्की का रास्ता ढूंढ ही लेगा।
अभी कुछ वक्त पहले एक ने पूछा-
कहां हो
यहीं
मतलब काम कहां कर रहे हो
काम या नौकरी
मतलब
मतलब काम क्या और नौकरी कहां
अच्छा नौकरी कहां कर रहे हो
साधना न्यूज़ नोएडा
(मुझे पता था वो कहां है) तुम क्या कर रहे हो
वही जो हमेशा करते थे
मतलब- बकलोली
वो बुरा मान गया
लेकिन वो बॉस हो ही नहीं सकता जिसे बकलोली न आती हो..... बॉस से दबना और जूनियर्स को दबाना... ख़बर या अफ़वाह सही आदमी तक पहुंचाना.... बॉस के मूड के हिसाब से काम करना और सही वक्त पर सही आदमी चुनकर उसके लटक जाना..... इसके अलावा तरक्की का क्या कोई और नुस्खा है ?
अगर जानते हो तो मुझे भी बताना
साभार सोत्डू

Sunday, October 10, 2010

व्यवस्था में भ्रष्टाचार का वायरस

भ्रष्टाचार एक वायरस की तरह आज पूरी व्यवस्था में घुस चुका है। इसकी गहरी जड़ों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार आधिकारिक रूप से लिए गए निर्णय और उसके बाद कार्रवाई पर भी इसका चाबुक बीस साबित हो जाता है। व्यवस्था में बने रहने की बात हो या उसी का हिस्सा बनने की, भ्रष्टाचार का गोल चक्कर ऐसा है कि यह जुमला बन गया कि 'मुफ्त में कुछ नहीं होता।"
मृत्यु प्रमाणपत्र बनाने की बात हो या फिर शवों की अंत्येष्टि का मामला, शल्य चिकित्सा और दवा आपूर्ति का मामला हो सामान्य ट्रैफिक चालान से लेकर एफआईआर दर्ज करने की बात या फिर कोर्ट में चल रहा ट्रायल, राशन कार्ड से लेकर भू रिकॉर्ड की बात हो या पार्किंग से लेकर रेहड़ी-पटरी की बात हो। निर्माण की अनुमति का मामला हो या फिर तोड़फोड़ कार्रवाई की बात, खरीद मामला हो, फाइल आगे बढ़ाने की बात हो, चेक भुगतान का मामला हो, विकास कार्य या कल्याण योजना की बात हो, विभिन्न् तरह के अनापत्ति प्रमाणपत्र की बात हो या फिर कर निर्धारण का मामला। बात किसी की नियुक्ति या प्रोन्न्ति का हो, स्थानांतरण या फिर दंडित करने की बात। या यह कहें कि कोई भी सरकारी कामकाज, सबमें आज स्थिति यह है कि लेने-देने की बात को जैसे आत्मसात कर लिया गया हो। शायद ही कोई ऐसा काम होगा जहां लेन-देन की प्रकिया या इसकी बात न होती हो।
भ्रष्टाचार के वायरस का एक भयावह पहलू यह भी है कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा व्यक्ति इससे बच निकलने का रास्ता भी जानता है। कैसे वह पकड़ से बाहर रहे और यदि पकड़ा भी जाए तो कैसे उससे बचा जाए उसे भलीभांति आता है। व्यवस्था के कई चक्र ऐसे हैं कि जांच में भी मुश्किल आती है। असल में लंबी न्यायिक प्रणाली, गवाहों की खरीद-फरोख्त और लंबा समय निकलने के बाद यह युक्ति का चल जाना कि 'वह तो अब तक दोषी साबित नहीं हुआ" इस मामले को और घातक बनाता है। लगता है हमारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जोश-ओ-खरोश दिखाने में कुछ हिचकिचाहट है। इससे इतर स्कैंडिनेवियाई जैसे न्यूजीलैंड या ऐसे ही कुछ और देशों में इसके स्तर को दसवें हिस्से तक लाया जा चुका है। अपने यहां हम यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि इस मामले में 'शून्य सहनशीलता" का फार्मूला अपनाएं या इसे छोड़ देने का। हमारे यहां भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में उत्साही कदम बढ़ाने के बजाय ज्यादातर ध्यान और शक्ति दिखावे के कामों में बर्बाद हो रही है।
कितना दुखद पहलू है कि सार्वजनिक सेवा में आने के बाद शपथ लेने वाले अगले ही पल उसका अनुपालन भूल जाते हैं। वह शपथ लेते हैं कि 'हम भारत के सार्वजनिक सेवा में जुड़े लोग सत्य और निष्ठा से शपथ लेते हैं कि अपने हर तरह के कार्य में पारदर्शिता बरतते हुए एकता को कायम रखते हुए भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए कार्य करते रहेंगे।" आज यह सर्वविदित है कि कितने लोग शपथ पर कायम रह पाते हैं।
भ्रष्टाचार उन्मूलन के मामले में एक महत्वपूर्ण बात सबके लिए विचारणीय है कि भ्रष्टाचार के विष को खत्म करने में अगर हम खुद को असमर्थ पाते हैं तो कम से कम उसके प्रसार को रोकने में तो कुछ भूमिका निभाई जा सकती है। इस संबंध में जोसेफ पुलित्जर ने संभवत: सही कहा है, 'किसी भी अपराध, चकमेबाजी, चाल, ठगी, अनैतिक कार्य गोपनीय नहीं रह सकते। इन सब चीजों को खुले दिमाग से मीडिया के माध्यम से सबके सामने रखें, गलत पर प्रहार करें, उनका तिरस्कार करें फिर देखिए जल्दी ही जनमत उन्हें साफ कर देगा।" यानी भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को सामाजिक बहिष्कार का कड़वा घूंट देना होगा। समाज को इस दिशा में अपना रुख बदलना होगा तभी सदियों पुरानी इस बीमारी का मुकाबला करने में कुछ सफलता मिल सकेगी।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार कोई एक दिन में पनपा विषाणु नहीं है। चाणक्य ने भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए कई कदम उठाए। अकबर ने भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने के लिए कई सख्त फैसले सुनाए। इसी तरह अंग्रेजों के शासनकाल में वारेन हेस्टिंग और रॉबर्ट क्लाइव के भ्रष्ट आचरण की बात सब जानते हैं। इस कारण ईस्ट इंडिय कंपनी को हुए नुकसान और भ्रष्टाचार मसले पर उनको दिए दंड की बहुत चर्चा होती है। आजादी के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि स्वशासन के लिए प्राप्त आजादी में कई लोगों के बलिदान, नैतिक समर्थन आदि को भुलाकर कुछ लोग निजी स्वार्थों के लिए तंत्र का उपयोग कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार को लेकर हमारे समाज में अजीब तरह का विरोधाभास है। एक तरफ सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, दूसरी तरफ भ्रष्ट लोगों को एक खास किस्म का सम्मान मिलता है। भ्रष्टाचार के कुछ बड़े मामले जैसे पशुपालन, जेएमएम घूसकांड, संसद में सवालों के लिए पैसा, ताज कॉरिडोर आदि इसके उदाहरण हैं। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि समाज का एक विशेष बड़ा तबका (सफेदपोश) ज्यादा खतरनाक भ्रष्ट लोगों में शुमार है। जनता के पैसे डकारना और सरकारी पैसे को चबा जाना जैसे आयकर की चोरी, स्टांप शुल्क, सीमा शुल्क आदि की चोरी या अधिनियम का उल्लंघन बहुत घातक है। इस तरह के मामलों में छोटी सी चोरी करने वाला तो पकड़ा जाता है, बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन चारों ओर से मशीनरी का दुरुपयोग करने वाले को या तो बख्श दिया जाता है या फिर उसे पकड़ने की नीयत साफ नहीं होती। कभी पकड़ होती भी है तो ऐसे लोग एक जनसमूह को अपने पक्ष में ला खड़ा करता है।
ऐसा नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम नहीं उठाए गए। बड़े-बड़े प्रयास हुए, अधिनियम आए लेकिन समय-समय पर बदली परिस्थितियों और अन्य कमियों के चलते वे कारगर नहीं हो पाए। असल में हमारी मशीनरी इस शक्तिशाली वायरस (भ्रष्टाचार) से लड़ने के लिए पर्याप्त रूप से सफल नहीं हो पाई। 1947 के पीसी अधिनियम की धारा 5 के तहत तीन साल की सजा का प्रावधान रखा गया। एक आशावादी धारणा थी कि भ्रष्टाचार पर इस तरह की सख्ती से अंकुश लग जाएगा। ऐसा नहीं होने पर 1950 में इसे पांच साल किया गया। 1952 में सजा के नाम पर इसे दस साल का प्रावधान किया गया। लेकिन सिर्फ प्रावधान बना देने से कुछ नहीं होता। फिर हुआ वही जिसकी आशंका थी, यह वायरस बढ़ता ही रहा।
ऐसा नहीं कि पूरी व्यवस्था में भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार व्याप्त है। लेकिन बाहुबलियों, सार्वजनिक सेवकों और कुछ नेताओं का ऐसा गठजोड़ है कि भ्रष्टाचार का भूत ज्यादा शक्तिशाली हो गया है।
भ्रष्टाचार के कई कारण हो सकते हैं लेकिन पिछले दशकों में यह बात सामने आई कि महंगा चुनाव राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारणों में प्रमुख है।
भ्रष्टाचार के बड़े पैमाने पर भांडा फोड़ने की जब हम बात करते हैं तो सबसे पहले तहलका का स्टिंग हमारे सामने आता है। मार्च 2001 में उसके खुलासे ने सनसनी फैला दी थी। रक्षा सौदों में घोटालों की यह बात उजागर होने से लोगों को गहरा धक्का लगा। फिर बीएमडब्लू हिट एंड रन मामले में न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का खुलासा एनडीटीवी ने किया।
भ्रष्टाचार के संदर्भ में अगर हम धोखाधड़ी की बात करें तो कई मामले सामने आते हैं। जैसे परिवहन विभाग में लाइसेंस धोखाधड़ी, एमसीडी से संबंधित नालों से गाद निकालने का मामला, सामाजिक कल्याण विभाग में आवंटित धन की बंदरबांट। इन सबमें वरिष्ठों द्वारा मातहत के कंधे पर बंदूक रखकर रिश्वत लेने के कई मामले सामने आए। संगठनात्मक रूप से भी भ्रष्टाचार के कई मामलों को पिछले कुछ समय में खुलासा हुआ। जैसे नई दिल्ली नगर पालिका परिषद में दो दर्जन के करीब लोगों का स्टिंग हुआ। ट्रैफिक पुलिस का भांडा फूटा। खुलासे होने के क्रम में एक परिवर्तन यह सामने आया कि कई पीड़ित अपनी ओर से टैप या रिकॉर्ड करके भ्रष्टाचार निरोधक शाखा या ब्यूरो के पास आने लगे। असल में शाखा या ब्यूरो की सफलता भी इस पर निर्भर करती है कि तमाम मामलों को गुप्त रखते हुए त्वरित कार्रवाई की जाए।
भ्रष्टाचार रूपी वायरस को खत्म करने या इसको धीरे-धीरे अपनी व्यवस्था से हटाने का कोई सेट फॉर्मूला नहीं बना है। नोटिस देने, पैंफलेट चिपकाने, होर्डिंग्स बनाने या भ्रष्टाचार निरोधक सप्ताह मनाने भर से कुछ नहीं होगा। शपथ लेना या उक्त अन्य कार्य हमारी मानसिकता को नहीं बदल सकते। हमें अरुणाचल प्रदेश या इसी तरह की कई अन्य इलाकों की कुछ प्रथाओं से सबक लेना चाहिए। वे ऐसे मामलों में अपने रीति-रिवाजों के हिसाब से दंडित करते हैं। भ्रष्टाचार के बारे में पता लगने पर ऐसे व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ तमाम कार्रवाई के साथ ही भ्रष्ट के सामाजिक बहिष्कार की भावना को बलवती करना होगा। ईमानदार लोगों को एक सामाजिक पुल के रूप में काम करना होगा। भ्रष्टाचार इसी गति से बढ़ता रहा तो यह उन चंद लोगों के विश्वास को डिगाएगा जिन्हें इस वायरस ने अभी नहीं छुआ है।

लेखक डॉ. एन दिलीप कुमार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त हैं उनके इस लेख को मैंने अनुवाद किया था : केवल तिवारी। साभार : नईदुनिया

Friday, September 10, 2010

जिस्म बिकता इनका, पेट भरता उनका

एक बार जिज्ञासावश रिपोर्टिंग के लिए कुछमित्रों संग दिल्ली के जीबी रोड इलाके में चला गया। इस इलाके के बारे में बताने की शायद जरूरी नहीं। हां एक बात यह बताना जरूरी है कि वहां मोटर पार्ट्स, जनरेटर आदि का कारोबार भी होता है। मूलत: जीबी रोड किसलिए जाना जाना जाता है, यह सभी जानते हैं। मैं वहां कोठों की स्थिति का जायजा लेने गया था, मैंने जो देखा उस पर खबरनुमा एक रिपोर्ट

उन गलियों में कोई जाता भी होगा तो चोरी-छिपे। वहां के बारे में किसी के जेहन में कोई बात आती भी होगी तो नकारात्मक। सड़कों पर घूम रहे वहां के सौदागर भी कहते हैं तो सिर्फ एक शब्द एंजॉय। लेकिन वहां छिपे दर्द, वहां की तकलीफों को या तो कोई समझ नहीं पाता या समझने की जहमत नहीं उठाना चाहता। कुछ संस्थाएं समझने या कुछ करने की कोशिश कर रही हैं तो उनके प्रयास पर सवालिया निशान लग रहे हैं। हम बात कर रहे हैं जीबी रोड यानी स्वामी श्रद्धानंद मार्ग की। यहां बने मकानों के निचले तले पर तमाम दुकानें हैं, जहां ऑटो पार्ट्स से लेकर बड़े-बड़े जनरेटर भी मिलते हैं। उनके ऊपर बने हैं कोठे। यहां पेट भरने के लिए सेक्स वर्कर्स ग्राहकों के लिए अपने जिस्म को परोसने को तैयार बैठी हैं।
समस्या यह नहीं है कि यहां जिस्म का धंधा होता है। समस्या इसके बाद शुरू होती है। जिस्म के धंधे पर कई धंधे होते हैं। कोई इनकी भलाई के नाम पर अपने संगठन रूपी दुकान को चमका रहा है तो कुछ नौजवान बिना इनकी सहमति के सड़कों पर राहगीरों या व्यावसायिक सिलसिले में वहां आए लोगों को जाल में फांसने में लिप्त हैं। किसी नए व्यक्ति को देखते ही दो-चार लोग उसे घेर लेते हैं। उनकी शब्दावली पर गौर कीजिए-'सर एंजॉय करेंगे", 'हर तरह का माल है", 'कम उम्र की", देशी-विदेशी..... वगैरह-वगैरह। ग्राहक इनके झांसे में आ गया तो ठीक नहीं तो उसके साथ जोर जबरदस्ती। यहां विभिन्न् कोठों पर सेक्स वर्कर्स ने इन दलालों से किसी तरह की नाइत्तेफाकी जताई। यहां के विभिन्न् कोठों पर रह रहीं सलमा, पुष्पा, रजिया जैसी तमाम महिलाओं ने उल्टे यह शिकायत की कि इन जैसे लोगों से धंधा चौपट हो रहा है।

कभी किसी कोठे की हूर थी, आज वहीं भिखारिन बनीं
सेक्स वर्कर्स के जीवन में चालीसवां साल आते-आते जैसे तूफान आने लगता है। शरीर ढल रहा है, ग्राहकों ने आंखें तरेरनी शुरू कर दी हैं। स्वयंसेवी संगठन कुछ करते तो हैं, लेकिन इतना नहीं कि दो जून की रोटी मिल जाए। थोड़ा बहुत पढ़ी-लिखी हैं तो बच्चों को पढ़ा सकती हैं, सिलाई-बिनाई आती है तो भी शायद काम चल जाए, लेकिन इनमें से कुछ नहीं है और कोठा मालिक या मालकिन भी नहीं चाहती तो कोई चारा नहीं बचता। विभिन्न् कोठों की सीढ़ियों से जब हम लोग गुजरे तो वहां कई महिलाएं भीख मां रही थीं। उम्र पचास या उससे अधिक होगी। जानकारी ली गई तो बताया गया 10-20 साल पहले इनकी जगह भी कोठों पर थीं। इन जैसी कई महिलाएं हैं। कुछ काम-धंधे में लग गई। किसी को कोठे पर ही चौका-बर्तन का काम मिल गया, लेकिन कुछ अब भीख मांगने को मजबूर हैं।

एक पहलू यह भी...
विभिन्न् कोठों पर एक अलग पहलू भी देखने को मिला। सर्वधर्म समभाव के लिए दिखावे के तौर पर भले बड़े-बड़े लोग हो-हल्ला करते हों, लेकिन यहां धार्मिक एकता का जीता-जागता नमूना दिखा। अनेक कोठों पर सेक्स वर्कर्स अलग-अलग धर्म से हैं और उसी पद्धति से वे पूजा भी करती हैं। दीवारों पर भगवानों की मूर्तियां लगी हैं, अगरबत्ती जल रही है तो वहीं मुसलिम धर्म के अनुयायियों ने अपने धर्म के हिसाब से कैलेंडर टांगे हैं। नमाज अदा की जाती है, आरती भी होती है।

पहचान पत्र बने
पतिता उद्धार समिति का कहना है कि इन लोगों के लिए सबसे बड़ा संकट पहचान का है। बैंक में खाता खोलकर अगर दो पैसा बचाना भी चाहें तो हर जगह पहचान पत्र की जरूरत होती है। हालांकि समिति के प्रयासों से पिछले दिनों कुछ महिलाओं के पहचानपत्र बने भी, लेकिन यहां भी कई किस्म की राजनीति हुई। समिति के अध्यक्ष खैराती लाल भोला का कहना है कि महिलाओं का पहचानपत्र बन जाए तो उनकी कई दिक्कतें दूर हो जाएंगी। यहां की महिलाएं ज्यादातर दक्षिण भारत की हैं। कभी इनके मूल पते की जांच नहीं हो पाती और कुछ मामलों में राजनीति आड़े आ जाती है।

समस्याएं और भी बहुत हैं
पतिता उद्धार समिति के दिल्ली इकाई का कार्यालय संभाल रहे इकबाल का कहना है कि पहचानपत्र बन जाए तो इनकी कई समस्याएं स्वत: दूर हो जाएंगी। उन्होंने भी दलालों की समस्याओं को उठाते हुए कहा कि इनकी वजह से कई बार महिलाएं चोटिल हो चुकी हैं। मीना, आशा, रचना, आदि महिलाओं के सिर, हाथ और पैर में चोट दिखाते हुए इकबाल ने बताया कि यह सब दलालों की गुंडागर्दी का नतीजा है।