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Sunday, April 14, 2019

दुनिया के टॉप 10 रहस्य


(यह लेख 14 अप्रैल 2019 को दैनिक ट्रिब्यून के लहरें में कवर स्टोरी के तौर पर ‘दुनिया के अनसुलझे रहस्य’ शीर्षक से छप चुका है)
रहस्य। रोमांच। खौफ। जानने की ललक। किस्सागोई। वैज्ञानिक तथ्य। किसी खास मसले पर इन सारी चीजों का घालमेल करें तो एक अजीब सा माहौल बनेगा। सन्नाटा सा। सुना-सुनाया सा। जाना-अनजाना सा। असल में मनुष्य ही एकमात्र प्राणि है जो अपनी हदों से बहुत आगे बढ़कर जानने की ललक रखता है। जानता है। जानने-समझने की इसी भूख में छिपा होता है रहस्य और रोमांच। इन्हीं रहस्यों से पर्दा उठाते वक्त कभी मंजर खौफनाक भी आता है और कभी सफलता का ऐसा सतरंगी धनुष बनता है कि वह जानने के क्रम में और आगे बढ़ता है। जानने-समझने के इस विशाल समुंदर में हम बात करते हैं कुछ रहस्यों की। ऐसे रहस्य जिनकी चर्चा बहुत होती है, लेकिन वे अब तक रहस्य ही बने हैं। ऐसे किस्से लाखों होंगे, लेकिन यहां हम बात करते हैं दुनिया के टॉप 10 रहस्यों की।
1. बरमडूा ट्राइएंगल : इसे डेविल्स ट्रायंगल भी कहा जाता है। विशाल समुद्री इलाका। यह क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर में है। अभी तक इस त्रिकोण यानी ट्राइएंगल की ठोस व्याख्या भी नहीं हुई है। माना जाता है कि यह क्षेत्र  बरमूडा, मियामी (फ्लोरिडा) और सैन जुआन (प्यूर्टो रीको) के बीच है। यहां हवाई जहाज, शिप के अलावा लोगों के गायब होने की जो बात की जाती है, वह बहुत ही रहस्यमयी है। वैसे यहां के बारे में चर्चित है कि 19 वीं सदी में पहली बार जहाज लापता हुआ था। दुर्घटना की खबर आई लेकिन जहाज का मलबा नहीं मिला। कहा जाता है कि अमेरिका की खोज करने वाले कोलंबस भी इस इलाके में भटक गये थे। बताया जाता है कि कोलंबस ने इस इलाके में ‘समुद्र से निकलने वाली सुनहरी रोशनी की एक चमकती हुई गेंद’ देखी जो लगातार बड़ी होती चली गयी। इसके सैकड़ों साल बाद विभिन्न पायलटों और नाविकों ने दावा किया कि समुद्र के इस इलाके में पहुंचते ही वे विशाल बादलों के गुबार में फंस गये। इसके बाद वे अचानक उस युग में चले गये जब फ्रांसीसी क्रांति हुई। बाद में कहा तो यहां तक गया कि यहां समुद्री राक्षस भी दिखे। कई जहाज अपनेआप यहां खिंचे चले आए और गुम हो गए।
वैज्ञानिक तथ्य : वैज्ञानिक डरावनी बातों से इनकार करते हुए कहते हैं कि यहां जलवायु में अचानक बड़ा परिवर्तन होता है। भारी मात्रा में मीथेन के कारण पानी और धुंध का घनत्व कम होता है। इसके चलते भारी गुबार बनता है। इसी वजह से कई बार यहां का सीन डरावना बन जाता है।

2. डेंडेरा लाइट : डेन्डेरा लाइट रहस्य के बजाय विवादास्पद कहानी के रूप में ज्यादा प्रचलित है। कहा जाता है कि मिस्र के एक मंदिर की दीवारों में देवी हाथोर में एक आकृति दिखती है। जबसे इस आकृति की खोज हुई तब से यह सभी के लिए रहस्यमयी बनी हुई है। पहली नज़र में इसमें ऐसा लगता है कि सांप रूपी धागे जैसी किसी चीज से कोई दीपक या लैंपनुमा वस्तु बंधी है। साथ ही दिखता है कि एक पुजारी ने इस लैंप को पकड़ा है। मंदिर के अंदर का कॉरिडोर बहुत ही जटिल बना हुआ है। अंदर सूरज की रोशनी नहीं पहुंच सकती। लेकिन दीपक की लौ की कतार की स्थिति बहुत ही रहस्यमयी लगती है। मिस्र के इस रहस्य के बारे में कहा जाता है कि उस समय रोशनी के तथ्यों के बारे में खोज आज से कहीं अधिक थी।
वैज्ञानिक तथ्य : अध्ययन और शोध बताते हैं कि वहां की दीवारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। अंदर प्रकाश पहुंचाने के लिए प्रतिकृति या प्रतिबंब थ्योरी का इस्तेमाल किया गया होगा।

3. शैतान की बाइबिल
ईसाइयों के पवित्र ग्रंथ बाइबिल के बारे में हम-आप सब जानते हैं। लेकिन एक बाइबिल ऐसी भी है जिसको लेकर रहस्य बना हुआ है। यह है कोडेक्स गिगास या शैतान की बाइबिल। यह बाइबिल बहुत विशाल है। इसकी लंबाई से इसके आकार का पता लगाया जा सकता है। यह 92 सेमी (36 इंच) लंबी पुस्तक है। चर्म पत्र पर लिखी हुई। पहले पन्ने पर एक विशालकाय शैतानी चित्र है। बताया जाता है कि मध्य काल में एक भिक्षु ने अपनी एक प्रतिज्ञा तोड़ दी। उसके मठ ने उन्हें दीवार में चिनवाने की कठोर सजा सुना दी। इस पर भिक्षु ने सजा से मुक्ति चाहते हुए वादा किया कि वह एक रात में एक ऐसी विशाल पुस्तक लिखेंगे जिसमें दुनिया का सारा ज्ञान होगा। आधी रात होते-होते उसे अहसास हो गया कि वह इस काम को नहीं कर पाएगा। उसने खास तांत्रिक तरीके से शैतान को बुलाया। शैतान ने किताब पूरी कर दी और भिक्षु सजा से बच गया। किताब को लेकर एक और बड़ा रहस्य है। मई 1697 की एक रात स्टॉकहोम के शाही महल में भीषण आग लग गई और रॉयल लाइब्रेरी बुरी तरह से जल गई। इस किताब को आग से बचाने के लिए खिड़की से बाहर फेंका गया। उसी दौरान इसके कुछ पन्ने अलग हो गये। कहा जाता है कि वे पन्ने आज तक नहीं मिले। बेशक इसे शैतान की बाइबिल कहा जाता है, लेकिन इसमें चिकित्सा पद्धति, तपस्या आदि जैसे कई मसले भी दिये गये हैं। आज यह पुस्तक स्वीडन के राष्ट्रीय पुस्तकालय में संरक्षित है।
वैज्ञानिक तथ्य : शोधकर्ताओं का कहना है कि उस समय की परिस्थितियां और सुविधाओं के हिसाब से ऐसी पुस्तक को लिखने में करीब 30 साल लगते। इसलिए एक रात वाली कहानी गले नहीं उतरती। हो सकता है इसे लिखकर पहले से रखी गयी हो। हालांकि इसमें राइटिंग एक ही व्यक्ति की है।

4. चंगेज खान का मकबरा  : चंगेज खान के बारे में कहा जाता है कि वह दुनिया का बेहद शक्तिशाली सम्राट था। कहा यह भी जाता कि अगर उसका साम्राज्य आज भी चल रहा होता तो दुनिया के 16 फीसदी हिस्से पर उसका कब्जा होता। वैसे इतिहास में कई लेखकों ने चंगेज खान को हत्यारा और निर्दयी तानाशाह भी माना है। कई लोग उसे मंगोलिया के संस्थापक और धार्मिक नेता के तौर पर याद करते हैं। असल में चंगेज खान के बारे में रहस्य उसके मकबरे को लेकर है। बताया जाता है कि चंगेज खान की इच्छा थी कि उसकी कब्र अनजान जगह पर बने। साथ में मकबरे का पता किसी को न हो। माना जाता है कि कब्र के स्थान को छुपाने के लिए, अंतिम संस्कार में जाने वाले हर व्यक्ति को मार दिया गया था ताकि कोई गवाह न रहे। यह भी कहा गया कि चंगेज खान को दफनाने के बाद वहां हजारों घोड़ों को दौड़ाया गया ताकि वहां जमीन समतल हो सके। वर्ष 2004 में एक बात यह भी सामने आई कि मकबरे को उनके जन्मस्थान के पास खेंटी प्रांत में, ओन नदी के करीब कहीं बनाया गया होगा। हालांकि 1950 के दशक में, चीन ने चंगेज खान की याद में एक भव्य मकबरा बनवाया, लेकिन यह मूल मकबरे के स्थान पर नहीं है। कुछ लोग यह तक कहते हैं कि अगर चंगेज खान का मकबरा मिल गया तो तबाही आ जाएगी।
वैज्ञानिक तथ्य : जानकार कहते हैं कि जब चंगेज खान ने खुद ही अपनी कब्र का खुलासा नहीं करने की बात अपनी वसीयत में लिखी तो जाहिर है वहां कोई मकबरा बनाया ही नहीं गया होगा। उन्हें दफनाकर जमीन समतल कर दी गयी होगी और यह काम बहुत गोपनीय तरीके से हुआ होगा।

5. ईस्टर आईलैंड की विशालकाय मोआई मूर्तियां : वर्ष 1722 में एक डच खोजकर्ता ने ईस्टर द्वीप की खोज की। जिस जगह को वीरान समझा जाता था वहां दो से तीन हजार लोगों को देखकर वह हैरान हो गया। हैरानी इस बात की थी वह द्वीप ज्वालामुखी से बना था और वहां आबादी होने की किसी को उम्मीद नहीं थी। इससे भी हैरानी की बात थी कि मूल आबादी वाले इलाके से 17 किलोमीटर दूर 887 भीमकाय मूर्तियों का होना। हर मूर्ति 33 फुट से अधिक लंबी थी। एक-एक मूर्ति का वजन 87 टन से अधिक था। सवाल यह था कि पूरी दुनिया से कटे हुए इन लोगों ने इन मूर्तियों को तराशा कैसे और फिर इतनी दूर इसे ले कैसे आये। एक और खास बात थी कि ये मूर्तियां लगभग एक जैसी थीं। जैसे कि एक ही सांचे में इन्हें ढाला गया हो। सवाल यह था कि इन मूर्तियों को लाने या बनाने का कारण क्या रहा होगा? कहा यह भी जाता है कि द्वीप पर सालों पहले एलियंस ने यहां आकर इनका निर्माण किया था और वे इन्हें बीच में ही आधा छोड़कर चले गए थे।
वैज्ञानिक तथ्य : जानकार कहते हैं कि अपने पूर्वजों की याद में यहां रहने वाले रापा नुई जनजाति के लोगों ने इन मूर्तियों को बनाया। धीरे-धीरे मूर्तियां बनाना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। इन्हें बनाने के चक्कर में जंगल उजड़ रहे थे। एक समय ऐसा आया कि वहां खाने के लाले पड़ गये और अंतत: वहां के लोग इसे छोड़कर चले गये।

6. चीन के पहले सम्राट की रहस्यमयी कब्र : चीन के पहले सम्राट चिन बेहद शक्तिशाली थे। चिन राजशाही वंश के इस सम्राट का पूरा नाम चिन शी हुआंग था। उनके ही नाम से चीन का नामकरण हुआ। उनके मकबरे के बारे में कई रहस्य हैं। सबसे बड़ा तो यही कि उसे अब तक कभी जानकारी जुटाने के नाम पर छेड़ा ही नहीं गया। कहा जाता है कि तकनीक के मामले में अव्वल रहने वाले चीन जैसा देश भी इस मकबरे में जा नहीं सका। कई जानकार कहते हैं कि इस मकबरे की खुदाई करने की बेहतरीन तकनीक नहीं आई है। मिस्र के कुछ रहस्यमयी मकबरों को हुए नुकसान का हवाला देते हुए इस मकबरे को लेकर और भी कई तरह की बातें की जाती हैं। यह मकबरा एक पहाड़ के अंदर गुफानुमा क्षेत्र में है। यह भी कहा जाता है कि मूल मकबरे के पास विषैले पारे की झील है। हालांकि मकबरे के आसपास की खुदाई में एक टेराकोटा सेना का पता चला। वहां खुदाई में पता चला कि 16 हजार टेराकोटा सैनिक हैं। हर कोई अलग-अलग। कई दशकों की खुदाई के बाद पुरातत्वविदों को कई अहम जानकारियां भी मिलीं। इस पहले चीनी सम्राट के बारे में कहा जाता है कि उनका निधन 39 वर्ष की आयु में हो गया। असल में उनकी प्रबल इच्छा बहुत अधिक जीने की थी। अमर बनने के लिए उन्होंने पारे की कई गोलियां ले लीं। इसी से उनका निधन हो गया।
वैज्ञानिक तथ्य : इस कब्र की खुदाई की कोशिश जनभावना को भी देखते हुए नहीं की गयी। लोगों का मानना है कि खुदाई से प्रलय आ जाएगा। वैसे आस्था के आगे कई चीजों को दबा भी दिया जाता है।

7. आखिर कहां चला गया वह पानी का जहाज : बात 1947 की है। जून का महीना था। मलक्का जलडमरूमध्य में व्यस्त मार्ग से यात्रा करने वाले कई जहाजों को पास के एक स्थान से एसओएस संदेश मिला। इस मैसेज में लिखा था, ‘कप्तान सहित सभी अधिकारी चार्ट रूम और पुल में पड़े हुए हैं। संभवतः पूरी तरह से मृत चालक दल।’ संदेश पढ़कर हर कोई भयभीत था। इसी दौरान अंतिम मैसेज आया, ‘मैं मर गया।‘ जिस जहाज पर यह सिग्नल आया वह एक डच फ्रीटर, एसएस औरंग मेडन के नाम से जाना जाता था। इससे वहां पहुंचने वाला पहला जहाज सिल्वर स्टार था। एसएस औरंग मेडन में मारे गए लोगों में से किसी के ऊपर कोई चोट या मारपीट का थोड़ा सा भी संकेत नहीं था। पूरे दल के अचानक निधन का कोई अन्य कारण भी नहीं था। सिल्वर स्टार के चालक दल ने इसके साथ जहाज को वापस भेजने का फैसला किया। लेकिन अचानक दुर्भाग्य से जहाज के तहखाने से धुआं निकलने लगा। सिल्वर स्टार चालक दल जान बचाने के लिए भागने लगे। उसी समय एसएस औरंग मेडन में विस्फोट हो गया और समुद्र में डूब गया। आज तक कोई इस रहस्य को समझ नहीं पाया। आखिर पहले संदेश किसने भेजे फिर वह जहाज डूबा कैसे।
वैज्ञानिक तथ्य : संदेश वाली बात तो रहस्यमयी है, लेकिन जानकार कहते हैं कि समुद्र में फिसलन से जहाज में फंसी प्राकृतिक गैसों के बादल घिर गये। इसी घेरे में जहाज आ गया और कोई रासायनिक गतिविधि होने से विस्फोट हो गया। 

8. सौ साल ईसापूर्व की वह चमत्कारी मशीन : माना जाता है कि मशीनों का निर्माण गैलीलियो के जमाने में किया गया। हालांकि तब तक उनका रूप इतना विकसित नहीं था। सही मायने में औद्योगिक क्रांति 1800 के दशक में आई। लेकिन कितना आश्चर्य होगा यह सुनकर कि ईसा पूर्व 100 साल पहले की मशीनें उस समय से भी अधिक विकसित थीं। असल में वर्ष 1900 में गोताखोरों के एक समूह को एक ग्रीक जहाज़ का मलवा मिला। इसमें कुछ मशीनों जैसी सामग्री भी मिली। कार्बन डेटिंग की मदद से देखा गया तो इन मशीनों को 100 साल ईसा पूर्व का माना गया। बाद में कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के नये रूप से इसे स्कैन किया गया और तब भी इन मशीनों के इतने पुराने होने का खुलासा हुआ। तब वैज्ञानिकों ने पाया कि इसमें तो गियर्स भी हैं। बता दें कि गियर्स के बारे में कहा जाता है कि इसकी खोज तो बहुत बाद में हुई। यही नहीं इस मशीन में खगोलीय घटनाक्रमों की जानकारी जुटाने जैसे उपकरण लगे हुए थे। यह बात भी आश्चर्यजनक थी क्योंकि खगोल विज्ञान का उन्नत रूप तो बाद में आया। बता दें कि गैलीलियो 16वीं और न्यूटन 17वीं सदी में आये। वास्तव में यह मशीन आश्चर्यजनक है।
वैज्ञानिक तथ्य : जानकार कहते हैं कि वैज्ञानिक खोजें प्राचीन काल में भी बहुत हुईं। संभव है कि 100 साल ईसा पूर्व भी ऐसी खोज हुई हो।

9. चरवाहा स्मारक शिलालेख : इंग्लैंड के स्टेफोर्डशायर में एक प्रसिद्ध स्मारक है। यहां की खूबसूरती कई शताब्दियों से लोगों को आकर्षित करती है। यहां पर एक शिलालेख है। इसे चरवाहा स्मारक शिलालेख कहा जाता है। लेकिन इस शिलालेख पर कोडनुमा लिखे कुछ शब्दों का आज तक रहस्य नहीं सुलझ पाया। असल में चरवाहा स्मारक में धातु की प्लेट पर अंकित शूरवीरों और योद्धाओं की कुछ तस्वीरें भी दिखाई गई हैं। लेकिन उस पर अंकित कोड को डीकोड नहीं किया जा सका है। इस पर कई शोध हो चुके हैं और कई चल रहे हैं, लेकिन सटीक बात अब तक सामने नहीं आयी है। अनेक शोधकर्ताओं ने इस कोड को क्रैक करने की कोशिश की है। ऐसा करने वालों में चार्ल्स डिकेंस और चार्ल्स डार्विन भी शामिल हैं। अब इसके पीछे का रहस्य क्या है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन चरवाहों के संबंध में इस शिलालेख की चर्चा होती दुनियाभर में है।
वैज्ञानिक तथ्य : ज्यादातर शोधकर्ता यह मान चुके हैं कि इसका कोई अर्थ नहीं है। यह सिर्फ कुछ अक्षरों का एक समूह है। हालांकि कुछ को पूरा विश्वास है कि कोड में कोई न कोई संदेश छिपा है। खैर सच्चाई जो भी हो, चर्चा तो इसकी दुनियाभर में है।

10. झील का वह राक्षस : 1930 के दशक तक स्कॉटलैंड के हाइलैंड्स में लोकनेस एक सामान्य झील थी। उसी दौरान वहां घूमने गए एक जोड़े ने दावा किया कि झील में एक विशालकाय राक्षस था। कहा गया कि उसकी बहुत लंबी गर्दन थी, पीठ पर कूबड़ निकले थे। कुछ लोगों ने कहा कि यह राक्षस डायनासोर की तरह दिखता था। इसकी आवाज भी डरावनी थी। इसके बाद वर्ष 1934 में इस कथित राक्षस की एक तस्वीर भी सामने आ गई। इसके बाद तो लोग हर जगह इसकी चर्चा करने लगे। एक सर्कस ने तो राक्षस के लिए 20000 डॉलर का इनाम भी रखा। धीरे-धीरे कहा जाने लगा कि झील में राक्षस तो है। फिर खुलासा हुआ कि 565 ईसा पूर्व में सेंट कोलंबा ने भी इसे देखा। उस वक्त कहा गया था कि कोई बड़ी चीज झील में तैरती हुई दिखी। वर्ष 1934 में नेस्सी की पहली तस्वीर आई। आज भी लोग दावा करते हैं कि वहां कोई राक्षस है।
वैज्ञानिक तथ्य : राक्षस जैसी कोई चीज नहीं। हो सकता है किसी चीज से कोई ऐसी आकृति बन गयी हो कि लोग ऐसा कहने लगे। इलाके को बदनाम करने या ज्यादा प्रसिद्धि दिलाने के लिए भी ऐसा कहा जा सकता है।

Wednesday, April 10, 2019

वृंदावन-मथुरा की वह यादगार यात्रा



वृंदावन में हम सब लोग। फोटो खींचने वाला बच्चा बाद में दिखेगा
श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव। नमो भगवते वासुदेव। राधे-राधे। भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना में अक्सर गुनगुनाये जाने वाले इन वाक्यों/शब्दों के साथ ही साझा करता हूं उस यात्रा का वर्णन जिसका कार्यक्रम अचानक बना। ऐसे अचानक जैसे कि हम अक्सर कहते हैं कि बुलावा आया होगा। पहले प्रोग्राम बना सपरिवार चलना है। फिर हुआ अभी नहीं, दूसरी बार। फिर सारा कार्यक्रम अमृतसर का बना और आखिरकार पहुंचे वृंदावन और मथुरा। विस्तार से जिक्र करने के लिए आइये चलते हैं सिलसिलेवार ढंग से-
31 मार्च की सुबह सवा सात बजे का समय। भास्कर जोशी (मेरे ब्रदर इन लॉ) के मोबाइल की घंटी बजी। फोन था उनके पड़ोसी सीबी अग्रवाल साहब का। हेलो कहते ही पहला सवाल, ‘कहां पहुंचे।’ जवाब दिया गया, ‘बस वृंदावन की तरफ मुड़ चुके हैं।’ ‘आ जाओ, अभी हमने भी परिक्रमा शुरू नहीं की है।’ अग्रवाल साहब ने अगली बात कही और फोन काट दिया। मैं, मेरा बेटा कार्तिक, भास्कर की पत्नी प्रीति और उनका बेटा भव्य साथ थे। बच्चों को छोड़कर सभी बड़ों ने कहा, चलो अच्छा है साथ ही परिक्रमा और दर्शन हो जाएंगे। हम लोग मुश्किल से 10 मिनट में वृंदावन पहुंच गये। पास में ही एक हाउसिंग सोसाइटी के बाहर अग्रवाल साहब सपरिवार खड़े थे। उन्होंने पहले कार पार्क करवाई और हम सब चल पड़े। चलते-चलते ही नमस्कार हुई। मन में एक अनूठी उमंग थी। भास्कर लोग पहले भी आ चुके थे। अग्रवाल साहब तो थे ही यहीं के और महीने में एक या दो बार यहां आते रहते हैं। हम लोगों ने फैसला किया था कि पैदल ही परिक्रमा पूरी करेंगे। उस दिन एकादशी थी और शायद इसकी वजह से भी भीड़ अच्छी खासी थी। 47 साल की उम्र में यह पहला मौका था जब में वृंदावन, मथुरा आया था। भास्कर लोग फरीदाबाद रहते हैं। वहां तक अक्सर आता-जाता रहता हूं। उनसे वृंदावन और मथुरा जाने की बात भी होती रहती थी। इस बार भी बात की तो भास्कर ने कहा कि व्यस्तता तो है। मार्च का महीना है। आ जाना देख लेंगे। हां-ना करते-करते पहुंच ही गये और शानदार यात्रा रही। बेहद यादगार।
ये हैं भव्य जोशी। इन्होंने ही ऊपर वाली फोटो खींची।

वह स्थानीय बोली और मंदिर-मंदिर दर्शन
अग्रवाल साहब अपनी पत्नी और बेटी-बेटे के साथ थे और हम सब लोग। सबसे पहले मैंने खुशी जताई कि चलिए आज मैं भी आप लोगों के साथ दर्शन कर लूंगा। उनकी पत्नी बोली, सब ‘राधा की कृपा है।’ फिर कहा, धन्यवाद तो कुक्कू (मेरा बेटा कार्तिक) का है। असल में उससे ही मैंने वादा किया था कि परीक्षा के बाद कहीं चलेंगे। पहले शिमला का बना, फिर अमृतसर का। अमृतसर में होटल बुकिंग तक हो गयी। वाघा बॉर्डर के लिए दिल्ली से राजीव ने पास की भी व्यवस्था कर दी, लेकिन दर्शन तो बांके बिहारी और राधारानी के होने थे सो हुए। हम लोग जब परिक्रमा कर रहे थे अग्रवाल साहब किसी से पूछते, ‘कौन को लाला है’ यानी किसके बेटे हो। हर जगह उनके पहचान वाले मिले। काफी मदद मिली। वहां कोई वाहन चालक पास मांगता है तो वह भी ‘राधे-राधे’ कहता है।

रसखान और मीरा की भी रचनाएं आईं
परिक्रमा के दौरान कई बार ऐसा दौर आया जब हम कभी रसखान को तो कभी सूरदास को याद करते। एक जगह हमें कुछ गायें दिखीं। मैंने बेटे से कहा रसखान ने लिखा है, ‘जो पशु हों तो कहा वश मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मझारन।’ मेरे साथ सुरबद्ध होकर अग्रवाल साहब बोले, ‘मानुष हों तो वही रसखान, बसों ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।’ ऐसे ही बीच-बीच में पाहन हों तो वही गिरि को। फिर एक जगह सुदामा-कृष्ण को लेकर वह रचना भी याद आई जिसमें कहा गया है, ‘शीश पगा न झगा तन पे प्रभु जाने को आही बसे केहि ग्रामा...’ कुछ ही देर में मीरा का वह पद आया, ‘बसों मेरे नैनन में नंदलाल।’

अग्रवाल साहब की निष्काम मदद
इस सबके बीच अग्रवाल साहब और उनके परिवार की निष्काम मदद ने मुझे बेहद प्रभावित किया। भास्कर तो उनके पड़ोसी हैं, लेकिन मेरे साथ भी उनका अपनत्व। सचमुच मैं तो ऐसा नहीं हो सकता। वह अपने घर भी ले गये। खाना भी खिलाया। परिक्रमा के दौरान भी खर्च किया। हम लोगों को कोई खर्च नहीं करने दिया। शाम तक हम थक चुके थे, वे भी थके थे। इसके बावजूद वे हमें इस्कान मंदिर, मथुरा जन्मभूमि आदि स्थानों पर ले गये। पर उन्होंने मेरा एक धन्यवाद तक लेने से इनकार कर दिया। उनके दोनों बच्चों के व्यवहार में भी उनके संस्कार झलकते हैं। हरे कृष्ण।
भास्कर की सेल्फी में समाये सब लोग।

लालकिले और नेशनल साइंस सेंटर की भी एक यात्रा
दो दशक तक दिल्ली रहने के बावजूद मैं कभी ऐतिहासिक लालकिले के अंदर नहीं गया। इस बार बेटे ने जिद की तो उसे और भव्य को लेकर चला गया। सचमुच वहां का विहंगम नजारा देखने लायक था। हाल ही में बना नेताजी सुभाष मेमोरियल भी लाजवाब था। इस दौरान मासूम भव्य के कई सवालों और उसके बाद की प्रतिक्रियाओं से बहुत प्रसन्न हुआ। पहले वह बच्चा सवाल करता, जब उसे पूरी कहानी समझायी जाती तो उसका मासूम सा सवाल फिर आता, ‘मैं समझा नहीं।’ इस दौरान वह बेहद थक गया। मुझे भी उस पर दया आयी। पहले दिन करीब 15 किलोमीटर पैदल चला आज फिर यही हाल। उसे बाहर लाया। मेट्रो पकड़कर पहले प्रगति मैदान तक गये फिर दूसरी तरफ के गेट तक ऑटो से। वहां नेशनल साइंस सेंटर में दोनों बच्चों ने जो एंजॉय किया, वह लाजवाब था। वहां दो छोटी-छोटी मूवी देखी। उस दौरान बच्चे ने अंतरिक्ष के संबंध में कई जानकारियां भी साझा की। सुबह 10 बजे के निकले हम लोग रात साढ़े आठ बजे घर पहुंचे। पूरी यात्रा अच्छी रही। अगले दिन मैं और बेटा कार्तिक चंडीगढ़ आ गये। इस यात्रा के सभी साथियो को बहुत-बहुत साधुवाद। 
लालकिले मैं और भव्य (ऊपर) और बेटे कार्तिक के साथ।

Thursday, March 28, 2019

‘मजबूत’ कमजोरी वाली ताई


विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक की कहानी ताई : यह लेख दैनिक ट्रिब्यून के क्लासिक किरदार कॉलम में छप चुका है


मन में भावनाओं का ज्वार-भाटा उमड़ता-घुमड़ता है। अपनी संतान की ललक है। दूसरों के बच्चों को भी प्यार करने को दिल चाहता है, लेकिन उमड़ते वात्सल्य पर नियंत्रण की भी ‘कला’ है। वह मजबूत है। वह कमजोर है। वह दुलारती है। वह दुत्कारती है। वह ताई है। रिश्ते की। उम्र में अभी युवा है। जाने-माने कथाकार विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक की कहानी की ताई। यह ताई जिसका नाम कहानी में रामेश्वरी है, मुझे इसीलिए भाती है कि वह आदर्श नहीं है। बिल्कुल सफेद-हीरो या बिल्कुल ग्रे-विलन की तरह नहीं। मिला-जुला रूप है। इंसान ऐसे ही तो होते हैं। ऐसे ही मनोभाव तो आते हैं। वह देवर के बच्चों के मरने की तक कल्पना कर डालती है, लेकिन असल में उस बच्चे के चोटिल होते ही खुद बीमार पड़ जाती है। ताऊ यानी इनके पति आदर्श व्यक्ति हैं। भाई के बच्चों को अपना ही समझते हैं। मान चुके हैं कि अब उनके बच्चे नहीं होंगे। लेकिन ताई हैं कि उम्मीद का दिया जलाये हुए हैं। ताई के इसी मिक्स किरदार को लेकर लेखक ने उनके बारे में लिखा है, ‘यद्यपि रामेश्वरी को माता बनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था, तथापि उनका हृदय एक माता का हृदय बनने की पूरी योग्यता रखता था। उनके हृदय में वे गुण विद्यमान थे, जो एक माता के हृदय में होते हैं, परंतु उसका विकास नहीं हुआ था। उसका हृदय उस भूमि की तरह था, जिसमें बीज तो पड़ा है, पर उसको सींचकर और इस प्रकार बीज को प्रस्फुटित करके भूमि के ऊपर लानेवाला कोई नहीं। इसीलिए उसका हृदय उन बच्चों की और खिंचता तो था, परंतु जब उसे ध्यान आता था कि ये बच्चे मेरे नहीं, दूसरे के है, तब उसके हृदय में उनके प्रति द्वेष उत्पन्न होता था, घृणा पैदा होती थी। विशेषकर उस समय उनके द्वेष की मात्रा और बढ़ जाती थी, जब वह यह देखती थी कि उनके पतिदेव उन बच्चों पर प्राण देते हैं, जो उनके नहीं हैं।’
ताई शीर्षक वाली इस कहानी की शुरुआत बच्चे की उस जिद से होती है जब वह अपने ताऊ से रेलगाड़ी (खिलौना) लाने की जिद करता है। ताऊ पूछते हैं कि उसमें ताई को बिठाएगा कि नहीं? बच्चा पहले मना करता है फिर जब ताऊ आश्वासन देते हैं कि ताई प्यार करेगी तो वह मान जाता है। हालांकि ऐसा होता नहीं है। ताई यानी रामेश्वरी तो पति से भी चिढ़ने लगी है। उसे लगता है कि देवर के बच्चों के प्रति यह स्नेह ठीक नहीं। उसे तंत्र-मंत्र पर विश्वास है। पति का मानना है कि नाम रोशन करने के लिए संतान जरूरी नहीं। अपनी औलाद का सुख चाहते दोनों हैं, लेकिन ताऊ यानी बाबू साहब मान चुके हैं कि उनकी संतान नहीं होगी। कहानी ऐसे ही बढ़ती है। कभी ताई उन बच्चों (देवर का बेटा और बेटी) के चेहरों को देखती है तो उसका मन करता है कि उन्हें खूब पुचकारे, लेकिन पलभर बाद ही वह अपने दिल को कठोर कर लेती है।

ऐसे किसी मौके पर अगर बाबू साहब पूछते, ‘तुम्हारा हृदय न जाने किस धातु का बना है?' तो रामेश्वरी का जवाब होता, ‘पराये धन से भी कहीं घर भरता है?' ताई ताने मारती, ‘आदमी संतान के लिए न जाने क्या-क्या करते हैं-पूजा-पाठ करते हैं, व्रत रखते हैं, पर तुम्हें इन बातों से क्या काम? रात-दिन भाई-भतीजों में मगन रहते हो।' बाबू साहब इन सबको ढकोसला करार देते हैं।
खैर कहानी ऐसे ही ताई की तुनकमिजाजी और एक दूसरे को कोसते हुए आगे बढ़ती है। बीच-बीच में बच्चे आ जाते हैं। कभी कुछ मांगने की जिद करते और कभी ताई की डांट सुनकर चले जाते। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब एक दिन दोनों बच्चे खेलते-खेलते ताई की गोद में बैठ जाते हैं और बहुत देर तक वहीं धमाचौकड़ी मचाते हैं। ताई को यह सब अच्छा लगता है। तभी वहां बाबू साहब आ जाते हैं बच्चों का खिलौना लेकर। बाबू साहब यह दृश्य देखकर खुश होते हैं, लेकिन उनके तर्क और उनकी खुशी और उनका लाया हुआ खिलौना ताई को आग बबूला कर देता है। नौबत दोनों पति-पत्नी में झगड़े तक पहुंच जाती है। बात आई-गई हो गयी। ताई जब-जब इन बच्चों को देखती उसे अपनी संतान की ललक होने लगती। एक दिन ऐसे ही विचारों में मग्न वह छत पर टहल रही थीं। बच्चा आ जाता है। आसमान में पतंगों को उड़ता देख उसका मन ललचाता है। बच्चा तो बच्चा है। ताई से लिपटकर कहता है, ‘ताई मुझे पतंग मंगवा दो ना।’ पहले ताई डपट देती है। थोड़ी देर बाद बच्चा फिर ताई की टांगों के इर्द-गिर्द लिपटते हुए कहता है, ‘मंगवा दो ना ताई पतंग।’ ... इस बार ताई का वात्सल्य उमड़ पड़ा। शायद वह यही बच्चे को पुचकार कहने ही वाली थी कि मंगवा देंगे। लेकिन बच्चा तो चंचल है। उससे इंतजार कहां होना है। वह तुरंत कह उठता है, ‘नहीं मंगवाओगी तो ताऊ से पिटवा दूंगा।’ बस फिर क्या था, ताई के मन में बच्चों के प्रति हद से अधिक नफरत हो गयी। उसने बच्चे को झिटका और फिर वह उनके मरने तक की कामना कर बैठी। लेकिन बच्चा तो बच्चा है। फिर खेलने में मगन हो गया। तभी एक पतंग कटकर आती है और उसे लूटने के चक्कर में छज्जे से गिर जाता है। इस दौरान उसकी कातर पुकार सुनकर ताई उसे बचाने के लिए दौड़ती तो है, लेकिन बच्चा गिर ही जाता है। इस दृश्य को देख ताई जोर से चीखती है और बीमार हो जाती है। बच्चा कुछ दिन बाद जब ठीक होकर ताई के सामने जाता है तो ताई का पूरा वात्सल्य उमड़ पड़ता है। कहानी में लेखक ने ताई के तमाम मनोभावों को बहुत खूबसूरती से उकेरा है। वाकई ताई का किरदार इसमें बेहद रोचक है।

Thursday, January 24, 2019

इस प्यार के सामने गुस्सा उड़न-छूं

क्लासिक किरदार कॉलम में भीष्म साहनी की कहानी दो गौरैया पर दैनिक ट्रिब्यून में छपा मेरा लेख

केवल तिवारी
प्यार के सामने गुस्सा उड़नछूं हो जाता है। प्यार जब वात्सल्य वाला हो तो फिर तो गुस्सा कहीं नहीं टिकता। यही तो हुआ भीष्म साहनी की कहानी ‘दो गौरैया’ में। अजब इत्तेफाक है कि हाल ही में अपनी 10 साल पुरानी कहानी ‘गौरैया का पंख’ यूं ही पढ़ रहा था तो मन किया कि इसे गूगल सर्च कर देखें। शायद कहीं दिखे। इस सर्च में मुझे भीष्म साहनी साहब की ‘दौ गौरैया’ नजर आ गयी। सबकुछ छोड़कर इसे पढ़ने बैठ गया। बिना विराम के कहानी पूरी पढ़ डाली। सचमुच कितने सरल अंदाज में एक व्यक्ति के गुस्से को दिखाया गया है, उस पर कसे जा रहे तंज को दिखाया गया है और अंतत: वात्सल्य प्रेम के आगे उस व्यक्ति के नतमस्तक होने पर कहानी का बेहतरीन समापन किया गया है। घर में तीन लोग हैं। एक उसका मुखिया, दूसरा उनकी पत्नी और एक उनका बेटा। घर में पंछी कहीं भी अपना डेरा डाल देते हैं। इसे लेकर ही घर का बच्चा कहता है, ‘जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुंचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुंच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहां कभी तोते पहुंच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैया। ऐसा शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएं, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!’ घर की अस्त-व्यस्तता का विवरण भी कहानी में बड़े ही रोचक और हास्य अंदाज में किया गया है। देखिये किस खूबसूरती से लेखक ने लिखा है, ‘घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अंगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गर्मी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झांक जाती है। मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही ‘फिर आऊंगी’ कहकर चली जाती है।’ इन सब दिक्कतों के बीच बड़ी समस्या पंछियों की है। कहीं कबूतरों की गुटरगूं और कहीं दूसरे पक्षियों का शोर। एक दिन घर के मुखिया को दो गौरैया दिखीं। वह कभी इधर उड़तीं और कभी उधर। मानो घर का निरीक्षण कर रही हों। अगले दिन देखा मो ये गौरैया पंखा लटकाने वाले जगह पर ऊपर खोल में घोसला बना चुकी थीं। यहीं से शुरू होता है हंसी ठट्ठा। घर की महिला सदस्य दावा करती हैं कि अब ये नहीं जाने वाली। उनके पति यानी मुखिया का दावा है कि इन्हें हटाकर ही दम लेंगे। वह पूरे जी-जान से जुट जाते हैं, गौरैया को भगाने में। तभी महिला व्यंग्य करती हैं, ‘छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!’ तभी गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर चींची की। मानो घर के मुखिया को चिढ़ा रही हों। इसके बाद लेखक ने गौरैया को भगाने का जो दृश्य पेश किया है सचमुच वह रोचक है। कभी गौरैयों को भगाने के क्रम में अपने बेटे को डांटना और कभी महिला का हंसना। एक दिन चला गया, दो दिन बीत गये...गौरैया नहीं हट पाईं। अंतत: उनके घर को ही उजाड़ने का फैसला होता है। वह घोंसला तोड़ने के लिए हाथ उठाते हैं और कुछ तिनकों को बाहर खींच लेते हैं। तभी घोंसले से चींचीं की आवाज आती है। मुखिया तो धक्का लगा। वह तो गौरैयों को भगा चुके थे। तभी बाहर देखते हैं गौरैया का वह जोड़ा तो चुपचाप बाहर बैठा था। मुखिया अभी पूरी तरह घोंसला तोड़ भी नहीं पाये थे कि नन्हीं-नन्हीं दो गौरैया झांक रही थीं। मानो कह रही हों, ‘हम आ गई हैं। हमारे मां-बाप कहां हैं?’ यहीं कहानी का समापन शुरू होता है। मुखिया लाठी फेंक देता है। दरवाजा खोलने का हुक्म होता है। दोनों गौरैया चींचीं करतीं अंदर आ जाती हैं और बच्चों के मुंह में कुछ डालती हैं। पूरा परिवार यह मंजर चुपचाप देखता है। इस बार ‘गुस्सैल’ मुखिया भी हंस पड़ते हैं।

Saturday, January 5, 2019

भाई साहब का रिटायरमेंट : फूल मालाएं बयां कर रही हैं इस व्यक्ति की शख्सियत



रिटायरमेंट स्पीच के बाद अपनी सीट पर वरिष्ठ सहयोगी संग भाई साहब।
माना की ये दौर बदलते जायेंगे। आप जायेंगे तो कोई और आयेंगे।

आपकी कमी इस दिल में हमेशा रहेगी। सच कहते हैं हम आपको इक पल न भूल पाएंगे।

मुश्किलों में जो साथ दिया याद रहेगा। गिरते हुए को जो हाथ दिया याद रहेगा।

आपकी जगह जो भी आये वो आप जैसा ही हो।

हम बस ये ही चाहेंगे। सच कहते हैं हम आपको इक पल न भूल पाएंगे।



जादा जादा छोड़ जाओ अपनी यादों के नुक़ूश, आने वाले कारवां के रहनुमा बन कर चलो

अल्फाज बदले हुए थे, लेकिन बातों का लब्बोलुआब यही था। मौका था भाई साहब के रिटायरमेंट का। मैं अपने भतीजे विपिन, जीजा जी रमेश चंद्र और भाभी के भाई विनोद जोशी जी संग भाई साहब के ऑफिस गया था, उन्हें रिसीव करने। उस वक्त भाषणों का दौर चल रहा था। तारीख थी 31 दिसंबर 2018, समय अपराह्न करीब 4 बजे। हर व्यक्ति अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा था। भाई साहब के दफ्तर में एक सीनियर साथी बोले, ‘भुवन चंद्र तिवारी के गले में पड़ी मालाएं इनकी शख्सियत के बारे में बता रही हैं।’ (असल में भाई साहब के चाहने वाले तमाम लोगों ने उन्हें फूल मालाओं से लाद दिया था। बाद में जब घर में कार से भाई साहब को लेकर आ गयी तो पूरी कार उन्हीं फूलों से भर गयी।) चतुर्थ श्रेणी का एक कर्मी बेहद भावुक था। वह लोगों को चाय पिला रहा था और आतुर था कि उसे दो मिनट के लिए माइक मिल जाये। उसके बाद उसने स्वरचित चंद लाइनें सुनाईं जिनका लब्बोलुआब यह था कि रिटायरमेंट गम का नहीं, खुशी का मौका है क्योंकि बेहतरीन तरीके से आपने नौकरी की पारी खेली। उसकी कविताएं खत्म होते ही मैं कुछ लोगों से बात करने लगा कि वास्तव में अगर बेदाग आप नौकरी कर निकल जाएं, इससे अच्छा कुछ नहीं। चतुर्थ
सेवानिवृत्ति के बाद तृप्ति के भाव में घर पहुंचे भाई साहब।
श्रेणी कर्मचारी यूनियन के एक पदाधिकारी बोले, ‘तिवारी जी छुट्टियों के दिन भी हमारे काम के लिए आते थे। कई बार कुछ काम अटकते थे तो तिवारी जी उसे निपटाने में देरी नहीं करते।’ एक महिला सहकर्मी ने भावुक कविता सुनाई। हर कोई अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा था। इसी दौरान वहां खाने के लिए मिठाई, समोसे आदि बंटने लगे। मेरा गला रुंधा हुआ सा था, मैंने नहीं लिया। फिर कॉपी का प्याला आया, मैंने उसके लिए भी इनकार कर दिया। तभी भतीजे विपिन ने कहा कि कॉफी पी लो चाचाजी। मैंने कॉफी का प्याला ले लिया। अब बारी आयी भाई साहब की। बेहद भावुक दिख रहे भाई साहब ने बहुत संक्षिप्त भाषण दिया। उन्होंने कहा, ‘अभी दो दिन पहले तक मुझे एक-एक दिन भारी लग रहा था। मन में यही हो रहा था कि रिटायरमेंट की घड़ी कब आएगी, लेकिन आज जब वह घड़ी आ गयी है तो मुझे बहुत अजीब लग रहा है। कितने अच्छे लोगों से बिछोह हो रहा है।’ विदाई कार्यक्रम पूरा होने के बाद मैं ऑफिस के लोगों से मिला।
मंदिर कक्ष में भाई साहब के साथ भाभी जी।
मैंने कहा, ‘भाई साहब सेवा से तो निवृत्त हो गये हैं, लेकिन संबंधों से आप लोग कभी निवृत्त मत होना।’ कई लोगों ने बताया कि भाई साहब मेरा भी जिक्र ऑफिस में करते रहते थे। इसके बाद भाई साहब के साथ सुबह से ही आये राजेंद्र अधिकारी ने कहा कि जिस सीट पर तिवारी जी बैठते थे, वहां चलो। वहां भाई साहब की फोटो खिंचवाई। इसके बाद हुई घर चलने की तैयारी। भाई साहब कार में बैठ चुके थे, मैं उनके सहकर्मियों से बातचीत कर रहा था। कुछ ने कहा, ‘हम शाम को घर आ रहे हैं।’ पता नहीं क्यों मैं भी उस पल बहुत भावुक हुआ जा रहा था। भावनाओं को नियंत्रण में रख हम
घर पर स्वागत करते वक्त भावुक होकर भाई साहब से लिपटकर रोतीं भाभीजी।
लोग कार में बैठे और घर की ओर आ गये। खुद को संयत कर घर में फोन किया। वहां कन्नू यानी भावना यानी भाई साहब की बेटी और दीपू-भाई साहब का बेटा और भाभी जी तमाम सगे-संबंधियों के साथ स्वागत को तैयार थीं। हम लोग घर पहुंचे तो बुजुर्ग दिनेश चाचा एक शॉल और फूल माला लेकर खड़े थे। उनके चेहरे पर बेहद स्नेह झलक रहा था। उन्होंने शॉल ओढ़ाया, माला पहनाई। फिर आईं भाभी जी। पूजा की थाल लेकर। उन्होंने आरती उतारी और माला पहनाई। तभी शीला दीदी ने एक माला भाई साहब को दी और कहा, आप भी पहनाओ। इसी दौरान भाभी बेहद भावुक हो गयीं। वह भाई साहब से लिपटकर रोने लगीं। बेटी कन्नू मेरी तरफ देखने लगीं। मैंने कहा, ये भावुक आसूं हैं। इन्हें निकलने दो। थोड़ी देर को माहौल भावुक हो गया। तभी मैंने कहा कि भैया और भाभी को मंदिर में भेजो। ऊपर की मंजिल में मंदिर बना है। उसी वक्त ढोल वाला आ गया। ढोल की थाप शुरू हुई, फिर केक कटने लगा और हम सब लोग थिरकने लगे। सभी को हाथ पकड़-पकड़कर थिरकाया। पूरा समां भावनाओं, खुशियों के माहौल से सुगंधित हो उठा। हम लोग रात के 12 बजे तक जगे रहे। खूब बातें हुईं। नये साल की मुबारकबाद
केक काटते भाई साहब और भाभीजी
भी दी गयी। भतीजे विपिन और उनकी पत्नी बीना का व्रत था, लेकिन उन्होंने पूरी तरह इस जश्न में साथ दिया। दिल्ली से आये अन्य भतीजे हरीश, दीप, प्रकाश ने खूब काम निभाया। विनोद जोशी जी, दिनेश जी, हेम जी सहित हमारे सभी संबंधियों ने बेहद साथ दिया। भांजे पंकज और नवीन ने भी खूब साथ दिया। इस जश्न का मुझे जो सबसे ज्यादा फायदा हुआ, वह यह कि कितने पुराने-पुराने वरिष्ठ जनों, अपने शिष्यों और साथियों से मुलाकात हुई। इस दौरान कई बार मुझे अपने अति उत्साह का अहसास भी हुआ। भैया के लिए एक वीडियो बनायी थी वह उस अंदाज में नहीं चला पाया, जैसा चाहता था, लेकिन उसके कारण उत्साह में कोई कमी नहीं लगी। रिटायरमेंट की यह पार्टी बेहद यादगार रही। ईश्वर भाई साहब और भाभीजी को
भाभीजी को केक खिलाते भाई साहब
स्वस्थ रखें। खुश रखें। घर में ऐसा ही खुशी का माहौल बना रहे, यही दुआ करता हूं।

और मेरी वह तैयारी
27 दिसंबर, 2018, दिन बृहस्पतिवार। लखनऊ जाने की जल्दबाजी। छोटा बेटा मुझसे ज्यादा उत्साहित। बार-बार बोले-‘पापा कितने बजे की ट्रेन है।’ लखनऊ जाने के लिए चार महीने पहले ही रिजर्वेशन करवा लिया था। मन पूरे परिवार सहित जाने का था, लेकिन पत्नी का ऑपरेशन होना था, बड़े बेटे के प्री बोर्ड की परीक्षाएं। इसलिए रिजर्वेशन अपना और धवल का ही
बेटे दीपू, दामाद पूरन चंद्र, बेटी कन्नू आदि के संग भाई-भाभी।
करवाया। हम लोग रात 10 बजे से पहले ट्रेन में बैठ गये। अगले दिन सुबह 11 बजे के करीब तेलीबाग भाई साहब के यहां पहुंच गये। 28 दिसंबर था वह दिन। भतीजी भावना का जन्मदिन। मैं पूरे

भाई, भतीजे और बहनों संग।
उत्साह में था। तैयारी की। कन्नू करीब 3 बजे पहुंची। बातें हुई। खाना खाया। भाई साहब भी ऑफिस से आ गये। शाम को पार्टी हुई। फिर तैयारी होने लगी आगामी फंक्शन की। संभवत: पहली बार छोटे बेटे को मां से अलग इतने दिनों के लिए लेकर गया। हम लोग लखनऊ में एक हफ्ते रहे। सब अच्छा रहा। कुछ बातें भी समझ आईं। इस बार के लखनऊ टूर पर जो अहसास हुआ उसे शायर दुष्यंत के शब्दों में बयां कर रहा हूं-
वर्षों बाद वह घर आया है, अपने साथ खुद को भी लाया है।