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Sunday, September 26, 2021

अनुभव की खान, घर की शान

 साभार : दैनिक ट्रिब्यून




अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस 1 अक्तूबर

 इनसे सीखिए। इनसे समझिए। इनके पास बैठिए। बीते कल के बारे में इनसे पूछिए और आज आए बदलावों के बारे में इनको बताइए। ये बुजुर्ग हैं। ये अनुभव की खान हैं। उम्र के आधार पर इन्हें खारिज मत कीजिए। बुजुर्ग की अहमियत उनसे पूछिए जिनके सिर से अपने बड़ों का साया उठ गया। अगर आपके घर में बुजुर्ग हैं तो यकीन मानिए, जीवन के सफर में अगर आप कहीं डगमगाएंगे तो कांपते हाथ-पैरों वाले बुजुर्ग अपने अनुभव की ताकत से आपको निकाल ले जाएंगे। इसलिए आइए बुजुर्गों का सम्मान करते हुए उनसे सीखने की सतत कोशिश करें।
अनुभव की खान घर की शान

केवल तिवारी

हमारे घर में फैसलों में देरी नहीं होती,
हमारे घर बुजुर्ग रहते हैं।
सचमुच जिस घर में बुजुर्ग रहते हैं और उन बुजुर्गों का पूर्ण सम्मान होता है, वह घर स्वर्ग से सुंदर ही होता है। ऐसा इसलिए भी कि बुजुर्गों का अनुभव पूरे परिवार के काम आता है। यह तो सब जानते हैं कि बुजुर्ग अनुभवों की खान होते हैं, लेकिन उस खान से कुछ हीरे-मोती सहेजने का माद्दा कुछ लोगों में ही होता है। कहीं बुजुर्गों को ‘बोझ’ समझा जाने लगता है तो कुछ घरों में यह उम्मीद की जाती है कि बुजुर्ग चुपाचाप रहें और अपने से मतलब रखें। कुछ घर ऐसे भी होते हैं जहां बुजुर्गों को परिवार के हर कदम की जानकारी दी जाती है और उनसे रायशुमारी की जाती है। यही नहीं, परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों में उन्हें ही आगे रखा जाता है। यह सब जानते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ कई तरह की दिक्कतें आती हैं। सबसे महत्वपूर्ण है स्वास्थ्य। शरीर में बेशक थोड़ी शिथिलता रहे, लेकिन अगर बुजुर्गों को अपनापन दिया जाये, उन्हें सम्मान दिया जाए तो वे घर के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होते हैं। उनका अनुभव तो काम आता ही है, उनकी दुआवों की भी हमें जरूरत होती है। मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने लिखा है-
अभी ज़िंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा।
मैं घर से निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है।
सभी जानते हैं कि बुजुर्गावस्था हर इंसान के जीवन में आनी है। उम्र का यह एक ऐसा पड़ाव होता है जब उन्हें प्यार, सम्मान और अपनेपन की सबसे ज्यादा दरकार होती है। कहा भी जाता है कि बुजुर्ग बच्चों की तरह हो जाते हैं। यानी अगर उम्र के इस मोड़ पर हमारे परिजन पहुंच गए हों कि वे शारीरिक रूप से शिथिल हो गये हैं तो पूरे सम्मान के साथ उनका ध्यान रखा जाना चाहिए। हमें सही राह दिखाने वाले बुजुर्गों के अनुभव और सीख से जीवन में किसी भी कठिनाई से हम पार पा सकते हैं। इसीलिए बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा का भाव तो आना ही नहीं चाहिए। कई बार तर्क दिया जाता है कि पारिवारिक सामंजस्य में बुजुर्गों को भी संभलकर चलना चाहिए, लेकिन जानकार कहते हैं कि उम्र बढ़ते-बढ़ते सहनशक्ति कम हो जाती है। ऐसे में युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे बुजुर्गों की बातों को नकारात्मक रूप में बिल्कुल न लें। क्योंकि उम्र के इस पड़ाव से सभी को गुजरना है। कहते भी तो हैं बूढ़े-बच्चे एक समान।
घर के कामों में भी भागीदार बनाएं
जानकार कहते हैं कि बुजुर्गों को घर के कामों में ‘इनवाल्व’ करना चाहिए। अनेक घरों में छोटे बच्चे अपने माता-पिता से ज्यादा अपने दादा-दादी या नाना-नानी से घुलमिल जाते हैं। ऐसे में बच्चों को स्कूल तक छोड़ने या लाने, पार्क में खेलने ले जाने जैसे कामों में उन्हें शामिल करना चाहिए। कई बुजुर्गों को घर के काम में हाथ बंटाना अच्छा लगता है, उन्हें ऐसा करने दीजिए। हो सकता है कई बार आपकी मंशा होती है कि बुजुर्ग व्यक्ति से काम नहीं कराना चाहिए। इस ‘नहीं’ में आपकी चिंता शामिल हो सकती है, लेकिन गौर करेंगे तो बुजुर्गों का यदि मन है काम करने का तो उन्हें काम में शामिल होने में आनंद ही आएगा। इसे दो उदाहरणों से समझ सकते हैं। एक बहू कहीं बाहर से आती है और अपनी सास से कहती है, ‘मांजी एक कड़क चाय पिला दीजिए, मजा आ जाएगा।’ सास तुरंत किचन में जाती है और थोड़ी देर में खुशी-खुशी चाय लेकर आ जाती है। वहीं, कोई अन्य घर में एक बहू भी चाहती है कि उसकी सास चाय पिला दे, लेकिन वह संकोचवश नहीं कहती। सास अगर किचन में जाती भी है तो उन्हें रोकती है। बेशक बहू की मंशा गलत नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे बुजुर्ग सास और ज्यादा बुजुर्गियत की ओर अग्रसर होंगी और हो सकता है धीरे-धीरे बिस्तर ही पकड़ लें। जानकार कहते हैं कि घर के कामों में बुजुर्गों को इनवाल्व करने में कोई नुकसान नहीं। हां, यह देखना जरूरी है कि काम उनकी सेहत और उम्र के अनुरूप हो। असल में ज्यादातर बुजुर्ग काम में इनवाल्व होकर अपने होने का मतलब साबित करना चाहते हैं। उन्हें बुजुर्ग कहकर एक कोने में बिठा देंगे तो वे खुद को ही बोझ समझने लगेंगे। मशहूर शायर बशीर बद्र साहब ने ठीक ही लिखा है-
कभी धूप दे, कभी बदलियां,
दिलोजान से दोनों कुबूल हैं,
मगर उस नगर में ना कैद कर,
जहां जिन्दगी की हवा ना हो।
हकीकत यही है कि जिंदगी की हवा अपने परिवार के साथ घुलमिलकर रहने में ही है। कुछ घरों में बुजुर्गों से उम्मीद की जाती है कि वे टीवी पर धार्मिक चैनल ही देखें या ज्यादातर समय पूजा-पाठ या इबादत में ही बिताएं। ऐसी उम्मीद रखना भी अच्छी बात नहीं है। टीवी पर कई शो आते हैं, उन्हें देखने दीजिए अपनी मर्जी का शो। यदि वे अपनी मित्र मंडली में व्यस्त रहते हैं तो रहने दीजिए। इसी तरह पूजा-पाठ, इबादत में उन्हें अपनी सुविधा से समय लगाने दीजिए। खाने में कभी उनकी पसंद पूछिए। कभी अपनी पसंद उन्हें बताइए। यही तो है बुजुर्ग का परिवार में रहने का सुखद अनुभव। कई घरों में बेटे-बहू दोनों नौकरी करते हैं, वहां बुजुर्गों की अहमियत समझी जाती है। इसलिए बुजुर्ग को बोझ न समझकर घर का महत्वपूर्ण सदस्य समझा जाये और उनके अनुभवों को समझने की कोशिश की जानी चाहिए। कभी-कभी उनके पुराने किस्सों को भी सुनना चाहिए।
अपनों से दूर रहने को मजबूर
आज ऐसे बुजुर्गों की संख्या बहुत है जो अपनों से दूर रहने को मजबूर हैं। यह मजबूरी कई कारणों से है। कोई वृद्धाश्रमों में जीवन की सांझ बिता रहा है तो कोई अपने ही घर में अपनों से दूर है। वृद्धाश्रम में रहने की मजबूरी हो या फिर अपने घर में अपनों के बगैर रहने की जद्दोजहद, इसके कई कारण हैं। उन कारणों में से मुख्य हैं चार। एक तो वे बुजुर्ग जिनके बच्चे विदेश में बस गए हैं और उन देशों के कानून के मुताबिक वहां बुजुर्गों को नहीं ले जा सकते। ऐसे बच्चे आज के आधुनिक संचार माध्यमों से उनसे जुड़े रहते हैं। दूसरे, ऐसे बुजुर्ग जिनकी कोई संतान नहीं हुई और उन्होंने किसी को गोद भी नहीं लिया। वे या तो वृद्धाश्रमों में रहते हैं या फिर घर में अकेले। तीसरे, ऐसे बुजुर्ग हैं जिनकी एक या दो लड़कियां हैं और उनकी शादी हो गयी। ये लड़कियों के घर नहीं रहना चाहते और चौथे और सबसे भयावह स्थिति उनकी है जिनकी संतानों ने उन्हें या तो जबरन वृद्धाश्रमों में डाल दिया है या फिर घर की कलह से तंग आकर वे खुद ही वहां रहने लगे। अपनों से दूर रहने को मजबूर इन बुजुर्गों की स्थिति सचमुच बहुत चिंताजनक होती है। बेशक आज कई संस्थाएं हैं जो एकाकी जीवन बिता रहे बुजुर्गों के लिए काम करते हैं, लेकिन अपनों का जो साथ है, उसकी भरपाई भला कौन कर सकता है। यह तो समय चक्र है। हर किसी को इस चक्र से गुजरना है। इसलिए कोशिश करें कि बुजुर्गों के साथ रहें। उनकी भावनाओं को समझें। मशहूर शायर बशीद बद्र का यह शेर सही है-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो।
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।
जरा बुजुर्गों के हिसाब से सोचिए। अगर हम उन्हें उपेक्षित रखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा। उनके मन में यह भाव आना लाजिमी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो ले रहा है और न ही उनकी ओर से दी गयी राय को महत्व दे रहा है। वृद्ध समाज को इस निराशा और संत्रास से छुटकारा दिलाना वर्तमान हालात में सबसे बड़ी जरूरत और चुनौती है। बेशक कई कदम उठाये जा रहे हैं लेकिन इस दिशा में सामाजिक जागरूकता जैसी पहल का किया जाना बेहद जरूरी है।
इस तरह शुरू हुआ अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस
विश्व के अनेक देशों से बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचारों, उनकी बिगड़ती सेहत की खबरें आती रहती हैं। इसी को ध्यान में रखकर यह महसूस किया गया कि बुजुर्गों के लिए सरकारों को कुछ करना चाहिए। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1990 से अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाने की शुरुआत हुई। तय किया गया कि हर वर्ष 1 अक्तूबर को अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाया जाएगा। इस दिवस के शुरू होने के कुछ सालों बाद 1999 को बुजुर्ग वर्ष के रूप में मनाया गया। असल में संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने एवं बुजुर्गों के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से 14 दिसंबर, 1990 को यह निर्णय लिया कि हर साल 1 अक्तूबर 'अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। इस तरह 1 अक्तूबर, 1991 को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाया गया। बताया जाता है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में सर्वप्रथम अर्जेंटीना ने विश्व का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। इससे पूर्व 1982 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘वृद्धावस्था को सुखी बनाइए’ जैसा नारा दिया और ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ का अभियान शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुए अभियान के फलस्वरूप अनेक देशों की पुलिस ने बुजुर्गों के लिए विशेष अभियान चलाया, मसलन-पुलिसकर्मी इलाके के एकाकी बुजुर्गों की पहचान कर उनसे मिलेगा और उनको हो रही दिक्कतों को दूर करवाने के लिए संबंधित विभाग को जानकारी देगा। अनेक देश वृद्धावस्था पेंशन भी देते हैं जिनमें भारत अग्रणी देश है। इसके अलावा अनेक सार्वजनिक स्थानों पर बुजुर्गों के लिए विशेष काउंटर बना होता है ताकि उन्हें कतार में न लगना पड़े। साथ ही समय-समय पर अपील की जाती है कि लोग स्वयं बुजुर्गों के लिए अपनी बारी को छोड़ दें। इन कवायदों का असर दिख भी रहा है। अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर बुजुर्गों के सम्मान में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इनमें स्वास्थ्य की जांच भी प्रमुख है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी गोष्ठियां एवं सभाएं होती हैं। बेशक अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस का एक दिन तय किया गया हो। यानी पहली अक्तूबर को यह दिन तय किया गया हो, लेकिन भारत में तो सदियों से यह परंपरा रही है कि अपने से बड़ों का सम्मान एवं आदर किया जाना चाहिए। कहा भी गया है-
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनं:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं।।
अर्थात बड़े-बुजुर्गों का अभिवादन, उनका सम्मान और सेवा करने वालों की 4 चीजें-आयु, विद्या, यश और बल हमेशा बढ़ती हैं। इसलिए हमेशा वृद्ध और स्वयं से बड़े लोगों की सेवा व सम्मान करना चाहिए।
हमारे बुजुर्गों ने दिखाया है युवाओं सा हौसला
इरादे मजबूत हों तो कभी उम्र आड़े नहीं आती। हमारे तो कई बुजुर्गों ने युवाओं सरीखा हौसला दिखाया है। कौन नहीं जानता उड़न सिख या फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह को। कोरोना के कारण गत जून में 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। जीवन के अंतिम समय तक वह सबके प्रेरणास्रोत बने रहे और युवाओं का हौसला बढ़ाते रहे। उनके नाम अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्री रिकॉर्ड दर्ज हैं। इसी तरह शूटर दादी के नाम से मशहूर चंद्रो तोमर। दुखद है कि उनका भी कोरोना काल में 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। बागपत की शूटर दादी ने उम्र के उस पड़ाव में शूटिंग शुरू की जब लोग बुढ़ापा कहकर बैठ जाते हैं। 60 साल की उम्र में प्रोफेशनल शूटिंग शुरू करने वाली चंद्रो तोमर काफी कम समय में देश की मशहूर निशानेबाज बन गईं थी। उन पर फिल्म भी बन चुकी है। इसी तरह अमेरिका में टेक्सास में रहने वाले भारतीय रामलिंगम सरमा ने अपने 100वें जन्मदिन पर सुंदरकांड का अंग्रेजी में अनुवाद पूरा किया। उन्होंने 35 साल की उम्र में तमिल भाषा में सुंदरकांड पढ़ा था। अपनी इच्छा के मुताबिक रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत में सुंदरकांड का अध्ययन किया। फिर उन्हें लगा कि इसका अंग्रेजी में अनुवाद होना चाहिए। उन्होंने 88 साल की उम्र में टाइपिंग सीखी। कुल 12 साल अनुवाद में लगे और जीवन के सौवें साल में इसे पूरा कर जनता को समर्पित किया। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने साहित्य, कला आदि तमाम विषयों में उम्र के उस पड़ाव में शिखर छुआ जिसे लोग जीवन की सांझ कहते हैं। आज कोई पीएचडी तो कोई कानून की डिग्री भी बुजुर्ग अवस्था में ले रहे हैं। इसलिए उम्र तो ऐसे जीवट लोगों के लिए महज अंकगणित रहा है। उनके जोश में कोई कमी नहीं दिखती। ऐसे लोग प्रेरणास्रोत हैं अन्य लोगों के लिए।
स्वास्थ्य पर रखें ध्यान
बुजुर्ग हों या बच्चे, दोनों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान रखे जाने की जरूरत है। इसलिए घर के बड़े लोगों को अपनी दिनचर्या ऐसी बनानी चाहिए कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें कम से कम हों। डॉक्टरों का कहना है कि बुजुर्गोँ का खान-पान हल्का होना चाहिए। सुबह-शाम जितना संभव हो उन्हें सैर करनी चाहिए। इसके अलावा बाथरूम आदि में बहुत संभलकर चलने की आवश्यकता है क्योंकि फिसलने से चोट लग सकती है और उम्र के इस पड़ाव में ठीक होने में काफी वक्त लग सकता है। साथ ही समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी कराते रहना चाहिए। यदि कोई दवा लेते हों तो वह नियमित हो, इसका ध्यान घरवालों को रखना चाहिए। जानकार की देखरेख में योग एवं प्राणायाम करना चाहिए।

Wednesday, September 22, 2021

विमर्श, चर्चा, सच और झूठ

केवल तिवारी
पिछले दिनों एक कार्यक्रम में जाना हुआ। कार्यक्रम में एक शब्द बार-बार गूंजा। वह शब्द था विमर्श। इस विमर्श पर चर्चा के बाद उन बिंदुओं पर चर्चा करूंगा जो मेरे लिए महत्वपूर्ण थे। तो पहले आते हैं विमर्श पर। विमर्श शब्द का अनेक बार मैं भी इस्तेमाल करता हूं। या कहूं कि प्रयोग करता हूं। मैं इसका प्रयोग विवेचन के तौर पर करता हूं। कोई मुद्दा-तात्कालिक या तत्कालीन। कोई विषयवस्तु। कभी-कभी किसी लेख के संदर्भ में। लेकिन इस कार्यक्रम में विमर्श का अर्थ जो मैंने समझा और कुछ विद्वानों से चर्चा के बाद स्थिति स्पष्ट हुई, वह था विमर्श मतलब परीक्षण। किसी मुद्दे का परीक्षण। वह मुद्दा इतिहास से छेड़छाड़ का हो या वह मुद्दा समाज में फैलाये जा रहे झूठ या भ्रम को लेकर हो। विमर्श मीडिया को लेकर हो या विमर्श देश, काल और परिस्थिति पर। 'विमर्श' के उस दौर में कई विषयों पर 'चर्चा' हुई। विवेचना भी हुई। फिर एक बात वही सामने आई कि सच उतना ही नहीं है, जितना हम जानते हैं या जितना हमने जाना। सच उससे कहीं ज्यादा या कम भी हो सकता है।
असल में हमारा मीडिया, खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या न्यू मीडिया अभी भी शैशव काल से ही गुजर रहा है। वहां जब बहस मुबाहिसें होती हैं तो दो दिक्कतें आती हैं। एक-या तो मुद्दा ही आधा-अधूरा उठता है, दूसरा-विमर्श कर रहे लोग येन-केन प्रकारेण अपनी ही बात को सही साबित करने में तुले होते हैं। यहीं पर विमर्श भटक जाता है। आप किसी भी खबर को उठा लीजिए। खबर एक ही होती है, लेकिन अपनी-अपनी सुविधानुसार उस खबर से एंगल निकाल लिया जाता है।


शब्दावली पर बहस
इस विमर्श कार्यक्रम में लेखन की बात हुई। चूंकि बातचीत का माध्यम हिंदी बनी तो यह लेखन की बात हिंदी पर आकर टिकी और अच्छे लेखन की अन्य भाषाओं में अनुवाद का भी सबने पुरजोर समर्थन किया। संयोग से मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला। मुझसे पहले कुछ विद्वान अपनी राय रख चुके थे। बात लगभग ठीक ही हो रही थीं। जैसे कि लेखन में विषयों का वर्गीकरण हो। कुछ तात्कालिक विषय हो जाते हैं और कुछ स्थायी। कभी-कभी तात्कालिक समझे जाने वाले विषय स्थायी से बनते नजर आते हैं और कभी-कभी स्थायी विषय तात्कालिक से हो जाते हैं। मैंने एक बात का विरोध किया। कुछ लोगों ने कहा कि हिंदी लेखन या बोलचाल में शुक्रिया जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। कुछ ने इसी तरह कुछ अन्य शब्द भी बताये। जब मेरी बारी आई तो सबसे पहले मैंने भाषा और शैली की शालीनता पर जोर दिया। मैंने पिछले दिनों समीक्षार्थ पढ़ी गई एक पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि पुस्तक बहुत अच्छी है, लेकिन उसमें शैली और भाषा की शालीनता नहीं है। अनेक महापुरुषों के लिए भी तू-तड़ाक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। मेरी बात का कुछ लोगों ने समर्थन किया। असल में बोलचाल की भाषा में तो कभी-कभी मानवीय स्वभाव के मुताबिक हमारी भाषा थोड़ी भटक सकती है, लेकिन जब बात डाक्यूमेंटेशन की आती है तो फिर इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए। फिर शुक्रिया जैसे शब्दों से परहेज़ क्यों? हिन्दी तो अनेक शब्दों को आत्मसात कर चुकी है। हिन्दी सबको साथ लेकर चलने वाली है, इसलिए हिन्दी कमजोर नहीं हो सकती।
भाषा की जब बात आती है और उसमें शब्दों के चयन की बात आती है तो मुझे जाने-माने लेखक कुबेरनाथ राय जी की एक पंक्ति याद आती है। उन्होंने अपने निबंध भाषा बहता नीर में कहा था, 'भाषा को अकारण दुरूह या कठिन नहीं बनाना चाहिए। परंतु सकारण ऐसा करने में कोई दोष नहीं।' यानी जहां जरूरत नहीं है, वहां भाषा को बहुत क्लिष्ट नहीं बनाया जाना चाहिए। हां इसके पीछे कोई कारण हो तो ऐसा करने में परेशानी भी नहीं।


मातृभाषा है तो सब है...
भाषा और शैली के साथ-साथ जब हम मातृभाषा की बात करते हैं तो यह ध्यान रखना चाहिए कि राष्ट्र की एक सर्वमान्य भाषा होनी चाहिए। भारत के संदर्भ में यह भाषा हिंदी ही हो सकती है। अपने समय के मशहूर पत्रकार और लेखक रहे गणेश शंकर विद्यार्थी ने 2 मार्च, 1930 को गोरखपुर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के 19वें अधिवेशन में कहा था-'भाषा-संबंधी सबसे आधुनिक लड़ाई आयरलैंड को लड़नी पड़ी थी। पराधीनता ने मौलिक भाषा का सर्वथा नाश कर दिया था। दुर्दशा यहां तक हुई कि इने-गिने मनुष्यों को छोड़कर किसी को भी गैलिक का ज्ञान न रहा था, आयरलैंड के समस्त लोग यह समझने लगे थे कि अंग्रेजी ही उनकी मातृभाषा है, और जिन्हें गैलिक आती भी थी, वे उसे बोलते लजाते थे और कभी किसी व्यक्ति के सामने उसके एक भी शब्द का उच्चारण नहीं करते थे। आत्म-विस्मृति के इस युग के पश्चात् जब आयरलैंड की सोती हुई आत्मा जागी तब उसने अनुभव किया कि उसने स्वाधीनता तो खो ही दी, किंतु उससे भी अधिक बहुमूल्य वस्तु उसने अपनी भाषा भी खो दी। गैलिक भाषा के पुनरुत्थान की कथा अत्यंत चमत्कारपूर्ण और उत्साहवर्धक है। उससे अपने भाव और भाषा को बिसरा देने वाले समस्त देशों को प्रोत्साहन और आत्मोद्वार का संदेश मिलता है। इस शताब्दी के आरंभ हो जाने के बहुत पीछे, गैलिक भाषा के पुनरुद्वार का प्रयत्न आरंभ हुआ। देखते-देखते वह आयरलैंड-भर पर छा गयी। देश की उन्नति चाहने वाला प्रत्येक व्यक्ति गैलिक पढ़ना और पढ़ाना अपना कर्तव्य समझने लगा। सौ वर्ष बूढ़े एक मोची से डी-वेलरा ने युवावस्था में गैलिक पढ़ी और इसलिए पढ़ी कि उनका स्पष्ट मत था कि यदि मेरे सामने एक ओर देश की स्वाधीनता रक्खी जाए और दूसरी ओर मातृभाषा, और मुझसे पूछा जाये कि इन दोनों में एक कौन-सी लोगे, तो एक क्षण के विलंब के बिना मैं मातृभाषा को ले लूंगा, क्योंकि इसके बल से मैं देश की स्वाधीनता भी प्राप्त कर लूंगा। ...' यानी हिंदी की सर्वमान्यता धीरे-धीरे और व्यापक हो इस पर भी हमें विमर्श करना चाहिए।


अनेक जानकार मिले
विमर्श वाले इस कार्यक्रम में मेरे अनेक जानकार मिले। मेरे लिए यही बड़ी उपलब्धि थी। एक-दो लोगों को मैं पहचान नहीं पाया, लेकिन जब पुरानी बातें होने लगीं तो फिर लंबे समय तक चर्चा चलती रही। यहां भी कुछ विषय विमर्श के लिए तैयार हो गये। खैर... यह यात्रा सुखद रही। इस यात्रा के दौरान कई बातें हुईं क्योंकि साथ में थे हमारे पूर्व समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ जी। बातों-बातों में पूरा दिन निकल गया और यादों के भंडार में एक दिन और जुड़ गया। उनको साधुवाद।

Monday, August 23, 2021

अपना फ्रेम और दूसरों की नजर

केवल तिवारी 
हम लोगों में ज्यादा का खुद को देखने का एक 'फिक्स फ्रेम' होता है। इसी के चलते हमारी यह इच्छा भी बलवती होती है कि इसी फ्रेम में लोग हमें देखें। यानी मेरे बात करने का अंदाज सबको पसंद आना चाहिए। मैं खुद की कल्पनाओं में जैसा हूं, वैसा मुझे लोग स्वीकारें और यह सत्य है कि अपने बारे में गहराई से शायद कोई नहीं सोचता। यदि अपने बारे में गहराई से सोचना शुरू कर दे और कमियों को व्यक्ति समझने लग जाये तो शायद मैं महान या 'अहं ब्रह्मास्मि' वाली बात रहेगी ही नहीं। जब यह बात नहीं रहेगी तो आपसी कलह का तो सवाल ही नहीं उठता। अक्सर हम कहते हुए सुनते हैं, 'मैं हिसाब-किताब नहीं लगाता।' लेकिन उनके मित्र जानते हैं कि वह कितना ज्यादा हिसाबी है। इसका दूसरा पहलू यह हुआ कि बहुत ज्यादा हिसाबी होना अच्छी बात नहीं। यानी हर व्यक्ति बिंदास रहना चाहता है, थोड़ा-बहुत हिसाब-किताब में क्यों उलझें। एक और पहलू भी है, शायद वह हिसाब लगाता है, लेकिन संकोचवश प्रकट नहीं करता। और कभी-कभी समाज स्थिति वाले व्यक्ति के सामने खर्च में आगे नहीं बढ़ता या हमेशा ऐसे आगे बढ़ता है कि बाकी लोग समझ लेते हैं, भुगतान तो यही करता है। बात फ्रेम की। अलग-अलग आदत होती है लोगों की। आदत बोलने के अंदाज की। आदत खाने की। आदत हंसने की। आदत रोने की... वगैरह-वगैरह। आदतों में दो बातें शामिल होती है-एक, आपके जीन में ऐसे गुण हैं। ये गुण आपकी सोच की शक्ति को भी प्रभावित करते हैं यानी आप चाहकर भी उन्हें नहीं बदल पाते। दूसरे, ऐसे गुण जो आप समाज, देश और समय को देखकर बदल लेते हैं। मान लीजिए आप बहुत कड़वे अंदाज में बोलते हैं। कई लोग इस अंदाज को खरा बोलना भी कह सकते हैं, लेकिन हो सकता है आपका यह अंदाज सामने वाले को पसंद न हो और यह भी कि आप कहते हों कि मैं परवाह नहीं करता, मैं तो ऐसा ही हूं। यह भाव थोड़ा अजीब किस्म का है। आप हो सकता है व्यंग्यात्मक लहजे में बात करते हों-कभी कभार यह अंदाज अच्छा लगता हो, लेकिन सोचिए आपने कभी सामने वाले से वक्त बेवक्त इसी लहजे में बात की हो तो कैसा लगेगा। यह उसी तरह है कि आप किसी की अंत्येष्टि में गए हैं और अचानक आपके मोबाइल पर कोई पॉप म्यूजिक बज जाये। रिंग टोन के रूप में या किसी अन्य रूप में। यही रिंगटोन अगर किसी पार्टी के माहौल में बजे तो हो सकता है आपसे लोग कहें, वाह माहौल के अनुकूल है ट्यून। यानी हमेशा एक अंदाज भी नहीं चल सकता। बिना फ्रेम के चलेंगे तो शायद प्रसन्न रहने का लंबा अवसर मिलेगा। फ्रेम फ्री होने पर आपको जो विविध विचारधारा या तौर-तरीके वाले लोग राह में मिलेंगे आप उसमें समाहित होते चले जाएंगे क्योंकि आपका कोई फ्रेम नहीं है। फिक्स फ्रेम या एक जैसी आदत के नुकसान भी होते हैं। इसे इस तरह समझ सकते हैं- मान लीजिए दो लोग हैं-ए और बी। ए बहुत चुपचाप रहने वाला। लोगों के तानों को भी हंसकर टाल देने वाला है और अपने काम में बहुत निपुण है। उसकी आदत का हर कोई फायदा उठाता है। उससे नीचे रैंक वाले भी और ऊपर वाले भी। अब दूसरा व्यक्ति है बी, काम उतना नहीं जानता जितना हल्ला करता है। बात-बात पर तुनकमिजाजी दिखाता है। झगड़ने लगता है। ऐसे में जब मिस्टर ए कभी जोर से बोल दे या किसी से काम के लिए इनकार कर दे तो वह सुर्खी बन जाती है। अरे इसे क्या हो गया। लगता है पर लग गये। ऐसे ही कई ताने लोग देने लगेंगे। लेकिन अगर मिस्टर बी ऐसा करेगा तो सभी कहेंगे यह तो ऐसा ही है। या उसे कोई काम सौंपेंगे ही नहीं। ऐसे में मिस्टर ए और मिस्टर बी दोनों के लिए जरूरी है कि वे खुद को फ्लैक्सिबल रखें। अति होने पर अपनी बात को मजबूती से रख सकें। खैर ज्ञान की बातें हैं। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में बहुत चलती हैं। थोड़ा बहुत भी परिवर्तन आ सके या इतना सोचने लग जाएं कि हमारी बात या आदत से सामने वाले को कोई परेशानी तो नहीं होगी तो इतना ही बहुत है। खुद में झांकने से बड़ी बात कोई है ही नहीं। कबीर दास जी तो कई सौ साल पहले ही कह गये- 
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, 
जोो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।

Friday, August 20, 2021

पुलिस, पीएम और हकीकत से सामना

केवल तिवारी
कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के ट्रेनी आईपीएस (IPS) अधिकारियों को संबोधित किया। अन्य बातों के अलावा उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि पुलिस को अपनी छवि सुधारने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) में भी पुलिसकर्मी ही होते हैं। वे लोग जब अपने काम से लौटते हैं तो उनका फूल मालाओं से सम्मान होता है। वे जी-जान लगाकर लोगों को बचाते हैं, लेकिन क्या कारण है कि यही पुलिसकर्मी जब पुलिस में (ट्रैफिक या कानून व्यवस्था) में कार्यरत होते हैं तो इनकी छवि कुछ और होती है। लोगों के मन में विश्वास क्यों नहीं जगता। बात सही है। इस बात को सुनकर मुझे कुछ वाकये याद आ रहे हैं। प्रधानमंत्री के भाषण की विस्तृत विवरण से उन्हें साझा करना चाहता हूं- करीब डेढ़ दशक पुरानी बात होगी। गाजियाबाद के वसुंधरा में तब मैं रहता था। वहां आसपास के इलाकों में चेन स्नैचिंग (chain snatching) यानी झपटमारी की वारदातें बहुत बढ़ गयी थीं। हम खबरें सुनते थे, खबरें बनाते थे और कभी-कबार आसपास हुई वारदात की चर्चा लोगों से सुनते थे। एकबार एक जानकार के साथ ऐसा हो गया। हम लोग थाने पहुंचे। पुलिस पहले तो फरियादी को ही डांटने लगी कि क्यों सोना पहनकर चलते हो, जानते हो इतनी वारदातें हो रही हैं। फिर जब एफआईआर दर्ज कराने की हम लोगों ने कोशिश की तो पुलिस अधिकारी तैयार नहीं हुए। काफी बहस-मुबाहिशों के बाद यह तय हुआ कि अभी पीड़ित सिर्फ एक शिकायत दे दे, एक हफ्ते बाद तक अगर कहीं सुराग नहीं लगा तो फिर एफआईआर दर्ज कर लेंगे। शुरू में सोचा पुलिस की मजबूरी होगी। आंकड़े अच्छे दिखाने होते हैं, लेकिन साथ ही यह विचार भी आया कि कोई जाने या न जाने झपटमारों को पता तो होगा ही कि पीड़ित की औकात तो एफआईआर दर्ज कराने की भी नहीं। ऐसा ही मामला एक मित्र के बाइक चोरी होने पर हुआ। पुलिस ने पचास सवाल पीड़ित से ही पूछ लिये। एफआईआर के लिए दस चक्कर लगवाये। आखिरकार एक पहचान निकालकर पुलिस पर प्रेशर डलवाकर एफआईआर करवाई गयी। हाल ही में चंडीगढ़ से दिल्ली जाना हुआ। नियंत्रित गति, ट्रैफिक रूल को मानते हुए मैं जा रहा था। एक जगह दिल्ली में और दूसरी जगह ग्रेटर नोएडा के पास मुझे ट्रैफिक पुलिस वालों ने रोका। दोनों जगह कहा गया कि बस कागज दिखा दो। मैं समझ गया, चंडीगढ़ नंबर की गाड़ी देखकर मुझे रोका गया है। मैं उतरा और विनम्रता से पूछा कि बताइये कौन से कागज देखने हैं। दिल्ली में तो पता नहीं क्या हुआ। साथ खड़े दूसरे ट्रैफिक पुलकसकर्मी ने इशारा करते हुए कहा, जाओ। फिर ग्रेटर नोएडा। यहां पुलिस वाले ने पहले कागज मांगे फिर कहा मैं खुद ही चेक कर लेता हूं। उन्होंने गाड़ी का नंबर अपने मोबाइल में किसी एप पर डाला और पूछा कि केवल तिवारी के नाम है गाड़ी। मैंने कहा जी मैं ही हूं केवल तिवारी। कुछ देर रुकने के बाद वह सज्जन बोले जी इसमें दिखा रहा है कि पॉल्यूशन (Pollution under control certificate) सर्टिफिकेट नहीं है। मैंने कहा, सरजी गौर से देखिये, ये सीएजनी गाड़ी है और अभी सालभर भी नहीं हुआ है। ऐसी गाड़ियों में पीयूसी सालभर बाद ही बनता है। उन्होंने मेरी ओर देखा और बिना कुछ कहे दूसरी तरफ को चल दिये। मैं भी कुछ बड़बड़ाता हुआ आ गया। कुछ दिन पहले बेटे को उसके परीक्षा केंद्र छोड़ने जा रहा था। वह बगल में बैठा था और बातें चल रही थीं। बातों बातों में मेरा मास्क नाक से थोड़ा नीचे आ गया। कालोनी नंबर चार के पास एक पुलिस कर्मी दौड़कर आया और मुझे रुकने का इशारा किया। मैंने अपनी बेल्ट और बेटे की बेल्ट पर ध्यान दिया, सब ठीक था। मैंने गाड़ी साइड की और रोककर शीशा खोला। मैंने कहा जी बताइये। उनका सवाल ये मास्क कैसे पहना है। मैंने क्षमा मांगते हुए कहा, थोड़ा नीचे हो गया। उन्हें मुझ पर तरस आ गया या जो भी कारण हो, चेतावन देकर छोड़ दिया। बेटे ने सवाल किया, पापा आसपास तो इतने लोग बिना मास्क के घूम रहे हैं, उन्हें तो ये कुछ नहीं कह रहे। मैंने कहा, बेटे ये सवाल मेरे मन में भी था, लेकिन वह कह सकते थे कि हमारी ड्यूटी गाड़ियों में बैठे लोगों को देखने की है। खैर थोड़ा सा मुस्कुराकर हम चल दिये। सहयोग भी किया है पुलिस से परेशान होने के कई किस्से हैं, लेकिन सहयोग के भी किस्से हैं। अनेक बार ऐसा हुआ है जब पुलिस ने खूब सहयोग किया है। हिंदुस्तान अखबार में जब काम करता था तो रात को लौटते समय कई बार सड़कों पर दुर्घटनाएं देखीं। उस दौरान पुलिस को फोन किया, पुलिस कर्मियों ने कई बार साथ दिया और चोटिल को अस्पताल पहुंचाने में मदद की। ऐसे ही कई बार रास्ता बताने में भी मदद की है। पानी में भीगते पुलिसकर्मी को ट्रैफिक नियंत्रित करते देखा है। ऐसे पुलिसकर्मी सम्मानित भी हुए हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में पुलिस का असहयोगात्मक रवैया दुखी करता है। अब बात पीएम के भाषण की उस दिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पीएम मोदी ने ट्रेनी अधिकारियों से कहा कि आप जैसे युवाओं पर बड़ी जिम्मेदारी है। महिला अफसरों की भूमिका भी अहम है। प्रधानमंत्री ने कहा कि अफसरों की पढ़ाई देश सेवा में काम आती है। उन्होंने कहा कि आपको हमेशा ये याद रखना है कि आप एक भारत, श्रेष्ठ भारत के भी ध्वजवाहक हैं, इसलिए आपकी हर गतिविधि में राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम की भावना झलकनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आपकी सेवाएं देश के अलग-अलग जिलों और शहरों में होगी। आपको एक मंत्र हमेशा याद रखना होगा कि फील्ड में रहते हुए आप जो भी फैसले लें, उसमें देशहित और राष्ट्रीय परिपेक्ष्य होना चाहिए। इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय भी मौजूद थे। मोदी ने कहा कि नए संकल्प के इरादे से आगे बढ़ना है। अपराध से निपटने के लिए नया प्रयोग जरूरी है। पीएम मोदी ने सत्याग्रह आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि गांधीजी ने सत्याग्रह के दम पर अंग्रोजों की नींव हिलाई थी। इसके अलावा भी पीएम साहब ने बहुत बातें कीं, वे सभी ने सुनी होंगी।

Monday, August 9, 2021

हमारे ओलंपिक सितारे

साभार : दैनिक ट्रिब्यून www.dainiktribuneonline.com हमारे ओलंपिक सितारे कोरोना महामारी के चलते एक साल बाद हुए ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि मुश्किल हालात भी उन्हें डिगा नहीं सकते। टोक्यो में खेलों के इस महाकुंभ के दौरान तिरंगा शान से लहराया। जीत की नयी इबारत लिखी गयी जो भविष्य के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी। ओलंपिक 2020 के इन महानायकों का लंबा सफर कई पड़ावों और विभिन्न तरह के अनुभवों से गुज़रा है। देश का नाम रोशन करने वाले इन बड़े खिलाड़ियों से परिचय करा रहे हैं केवल तिवारी नीरज चोपड़ा वज़न कम करने की जद्दोजहद में थाम लिया भाला किसान के बेटे हैं। संयुक्त परिवार है। हरियाणा के पानीपत स्थित खांद्रा गांव के मूल निवासी हैं। खेलों में मिली उपलब्धि के बाद राजपूताना राइफल्स में सूबेदार बने। टोक्यो ओलंपिक के इस गोल्डन बॉय नीरज चोपड़ा को आज पूरा देश सलाम कर रहा है। नीरज बचपन में बहुत मोटे थे। वज़न कम कराने के लिए परिवार के लोगों ने कई जतन किए। उन्हें खूब दौड़ाया जाता था। उनके चाचा भीम चोपड़ा उन्हें गांव से काफी दूर शिवाजी स्टेडियम लेकर गये। दौड़ने-भागने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रखने वाले नीरज को स्टेडियम में भाला फेंक का अभ्यास करते हुए खिलाड़ी दिखे तो बस उसी खेल में आगे बढ़ने की ठान ली। परिवार ने साथ दिया और आज नीरज ने इतिहास रच दिया। वह देश के लिए व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाले पहले ट्रैक एंड फील्ड एथलीट हैं। नीरज ने अपने दूसरे प्रयास में 87.58 मीटर की दूरी के साथ पहला स्थान हासिल कर गोल्ड अपने नाम किया। वह 2016 जूनियर विश्व चैंपियनशिप में 86.48 मीटर के अंडर -20 विश्व रिकॉर्ड के साथ ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतने के बाद से लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। वर्ष 2018 राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 2017 एशियाई चैंपियनशिप में शीर्ष स्थान हासिल किया था। बेटे की उपलब्धि पर पिता सतीश चोपड़ा कहते हैं, ‘खुशियों को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। हम चार भाई हैं। नीरज भाग्यशाली रहा कि उसे पूरे परिवार का समर्थन मिला।’ मां सरोज कहती हैं, ‘नीरज सभी की उम्मीदों पर खरा उतरा और भारत का गौरव बढ़ाया।’ चाचा भीम चोपड़ा कहते हैं, ‘खिलाड़ी की कड़ी मेहनत और मजबूत दृढ़ संकल्प के साथ परिवार का समर्थन और अच्छे संस्कार भी महत्वपूर्ण होते हैं। नीरज के पास ये सब हैं और वह सफल हुआ।’ मीराबाई चानू सपने तीरंदाजी के और बन गयीं वेट लिफ्टर मणिपुर की रहने वाली मीराबाई छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं और कद की भी छोटी हैं। इम्फाल से करीब 20 किलोमीटर दूर उनका गांव नोंगपोक काकजिंग है। पहाड़ी इलाकों के जीवन की तरह इनका बचपन भी कठिन परिस्थितियों वाला रहा। चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी काटना और भोजन बनाने एवं पीने के लिए दूर-दराज से पानी भरकर लाना ही इनकी दिनचर्या थी। हां दिली रुझान खेलों के प्रति था। वह तीरंदाज बनना चाहती थी, लेकिन वेट लिफ्टर कुंजरानी के बारे में सुना तो इसी में आगे बढ़ने की ठान ली। मेहनत रंग लाई और रविवार 8 अगस्त को अपना जन्मदिन एक शानदार जश्न के साथ मनाया। हालांकि यह सफर इतना आसान नहीं था। स्पोर्ट्स अकादमी घर से बहुत दूर थी। ट्रक में लिफ्ट लेकर वह जातीं, खूब पसीना बहातीं और वापस आकर घर के काम भी निपटातीं। तभी तो जब वह टोक्यो से लौटीं तो ट्रक ड्राइवर के लिए विशेष भोज का इंतजाम किया। बचपन से ही कड़ी मेहनत करने वाली चानू का जोश और जज्बा आखिरकार रंग लाया। टोक्यो ओलंपिक में पहले ही दिन पदक तालिका में भारत का नाम अंकित करा दिया था। उन्होंने 49 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीतकर भारोत्तोलन में पदक के 21 साल के सूखे को खत्म किया। इस 26 साल की खिलाड़ी ने कुल 202 किलो भार उठाया। वह ओलंपिक मेडल जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला भारोत्तोल्लक हैं। मीराबाई चानू के बारे में प्रसिद्ध है कि वह अपने बैग में हमेशा देश की मिट्टी रखती हैं। पीवी सिंधु 8 साल की उम्र से ही खेलने लगीं बैडमिंटन महज 8 साल की उम्र में बैडमिंटन थाम लिया था। शौकिया खेल की तरह नहीं, जूनून के साथ। जुनून तो होना ही था। आखिर परिवार में माहौल ही खेल और खिलाड़ी का था। स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु के पिता पीवी रमन्ना और मां पी विजया राष्ट्रीय स्तर पर वॉलीबॉल खेल चुके हैं। मां तो अर्जुन अवार्डी हैं। बैडमिंटन पर अपना अलग स्टाइल बना चुकीं पीवी सिंधु का जोश और जज्बा ही था कि ओलंपिक में इनके जाने पर ही पदक की उम्मीद बंध चुकी थी और हुआ भी वैसा ही। इस 26 साल की खिलाड़ी ने इससे पहले 2016 रियो ओलंपिक में रजत पदक जीता था। वह ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली देश की पहली महिला और कुल दूसरी खिलाड़ी हैं। हैदराबाद की इस खिलाड़ी ने 2014 में विश्व चैंपियनशिप, एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी। पूरी दुनिया में स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी के तौर पर ख्याति पा चुकीं पीवी सिंधु को अब तक कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। बचपन से ही बैडमिंटन खेल रहीं सिंधु ने तब और दृढ़ संकल्प ले लिया जब 2001 में पुलेला गोपीचंद ऑल इंग्लैंड चैम्पियनशिप का खिताब जीते। सिंधु ने अपनी पहली ट्रेनिंग सिकंदराबाद में महबूब खान की देखरेख में शुरू की थी। इसके बाद सिंधु गोपीचंद की अकादमी से जुड़कर बैडमिंटन के गुर सीखने लगीं। कई अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में देश का नाम रोशन कर चुकीं सिंधु प्रसन्न रहकर अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहने को ही सफलता की सही डगर मानती हैं। रवि दहिया पिता की मेहनत पर जड़ दी चांदी हरियाणा का एक और कामयाब छोरा। सोनीपत का गांव नाहरी, मूल निवास। किसान परिवार। पिता राकेश कुमार ने रवि कुमार दहिया को 12 साल की उम्र में ही दिल्ली स्थित छत्रसाल स्टेडियम भेज दिया। बेशक आर्थिक तंगी थी, लेकिन पिता ने रवि पर पूरी ताकत झोंक दी और खुद रोज 60 किलोमीटर की दूरी तय कर बेटे के लिए दूध, मक्खन आदि लेकर जाते। इधर, पिता बेटे को कामयाब देखना चाहते थे और उधर, बेटा भी जी-जान से लगा हुआ था पिता के सपनों को साकार करने में। इरादे पक्के हों तो फिर जीत से कौन रोक सकता है। यही हुआ। रवि कुमार दहिया ने पिता के उस निर्णय को सही साबित कर दिखाया जो उन्होंने बचपन में ही ले लिया था। यानी स्टेडियम भेजकर बच्चे को भविष्य का सफल खिलाड़ी बनाने का फैसला। पिता की मेहनत और रवि की कसरत काम आई और टोक्यो ओलंपिक में रवि ने पुरुषों के 57 किग्रा फ्रीस्टाइल कुश्ती में रजत पदक जीत कर अपनी ताकत और तकनीक का लोहा मनवाया। रवि कुमार दहिया ने वर्ष 2019 विश्व चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीतकर ओलंपिक का टिकट पक्का किया और फिर 2020 में दिल्ली में एशियाई चैम्पियनशिप जीती और अलमाटी में इस साल खिताब का बचाव किया। रवि ने 1982 के एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने वाले सतपाल सिंह से ट्रेनिंग ली है। रवि ने वर्ष 2015 जूनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैम्पियनशिप में 55 किलोग्राम कैटेगरी में रजत पदक जीता। वह सेमीफाइनल में चोटिल हो गये थे। उन्हें ठीक होने में करीब एक साल लग गया। फिर 2018 वर्ल्ड अंडर 23 रेसलिंग चैम्पियनशिप में 57 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीता। यही नहीं कोरोना महामारी से पहले उन्होंने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था। बजरंग पूनिया घुटने की चोट को भुलाया हरियाणा के झज्जर का पहलवान। पहलवानी विरासत में मिली। शादी में आठ फेरे लिए। एक फेरा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नाम। ये बजरंग हैं। बजरंग पूनिया। घुटने में चोट के बावजूद पूरी मुस्तैदी से मुकाबला किया। कांस्य पदक मिला। देश को इस पदक पर गर्व, लेकिन खुद संतुष्ट नहीं। बजरंग पूनिया का टोक्यो का सफर बहुत कठिन रहा। उन्हें स्वर्ण पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। बजरंग का कहना है कि वह कुछ दिन आराम करने के बाद एक बार फिर पूरे जोश के साथ भविष्य की प्रतियोगिताओं की तैयारी में खुद को झोंक देंगे। जुनूनी बजरंग ने महज सात साल की उम्र में कुश्ती शुरू कर दी थी। कभी-कभी तो आधी रात को ही उठकर प्रैक्टिस करने लगते। बजरंग का जुनून ही था कि 2008 में अपने से कई किलोग्राम ज्यादा वजनी पहलवान से भिड़ गये और उसे चित्त कर दिया। बचपन से ही बजरंग के पिता जहां उन्हें कुश्ती के दांव सिखाते वहीं आर्थिक तंगी आड़े न आए, इस सोच के साथ काम करते। वह बस का किराया बचाकर साइकिल से अपने काम पर जाते थे। साल 2015 में बजरंग का परिवार सोनीपत में शिफ्ट हो गया, ताकि वह भारतीय खेल प्राधिकरण के सेंटर में ट्रेनिंग कर सकें। असल में बजरंग अभ्यास के लिए रूस गए, जहां एक स्थानीय टूर्नामेंट में उनका घुटना चोटिल हो गया। मीडिया कर्मियों से बातचीत में बजरंग ने कहा, ‘मेरे कोच और फिजियो चाहते थे कि मैं कांस्य मुकाबले में घुटने पर पट्टी बांधकर उतरूं, लेकिन मैं सहज महसूस नहीं कर रहा था। मैंने उनसे कहा कि अगर चोट गंभीर हो जाए तो भी मैं बाद में आराम कर सकता हूं लेकिन अगर मैं अब पदक नहीं जीत पाया तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। इसलिए मैं बिना पट्टी के ही मैट पर उतरा था।’ बजरंग पूनिया ने अब तक कई खिताब जीते हैं। लवलीना बारगोहेन पहले कोरोना को हराया, फिर विश्व चैंपियन को पिता टिकेन बारगोहेन का अपना व्यवसाय। माता मामोनी बारगोहेन हाउस वाइफ। बच्ची ने बचपन में ही अपने इरादे स्पष्ट कर दिए। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। मां ने पूरा सपोर्ट किया। पिता ने पैसे की तंगी नहीं आने दी और इस जुनूनी लड़की लवलीना बोरगोहेन ने 23 साल की उम्र में अपने करिअर के पहले ही ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह विजेन्दर सिंह और मैरी कॉम के बाद मुक्केबाजी में पदक जीतने वाली तीसरी भारतीय खिलाड़ी हैं। असम के गोलाघाट जिले के बरो मुखिया गांव की लवलीना पहले ‘किक-बॉक्सर’ बनना चाहती थीं। लवलीना और उनकी दो बहनों ने पिता के लिए चाय बागान के व्यवसाय को आगे बढ़ाने में भी बहुत सपोर्ट किया। धीरे-धीरे पिता का व्यवसाय अच्छा जम गया और लवलीना के सपनों को पंख लगने लगे। उन्होंने अपने इरादे जाहिर किए और लग गयीं पूरी धुन से। टोक्यो ओलंपिक की तैयारी के लिए उन्हें यूरोप जाना था। कुल 52 दिनों का टूर था। लेकिन ऐन मौके पर कोरोना वायरस से संक्रमित हो गयीं। उन्होंने कोरोनो को मात दी और ऐसी शानदार वापसी की कि 69 किलोग्राम वर्ग में चीनी ताइपे की पूर्व विश्व चैम्पियन निएन-शिन चेन को मात दे दी। असम की इस लड़की के जीवन में भले ही आर्थिक तंगी कभी रोड़ा न बनी हो, लेकिन सामाजिक ताने-बाने से इन्हें कई बार दो-चार होना पड़ा। समाज में कई लोग लड़कियों को आगे बढ़ते नहीं देख सकते थे। लेकिन लवलीना को घरवालों का सपोर्ट मिला तो उन्होंने अपनी ट्रेनिंग शुरू कर दी। मैरीकॉम को अपना आदर्श मानने वाली लवलीना ने आखिरकार खूब मेहनत की और उन्हें आगे बढ़ने का मौका मिलता रहा। शुरुआत छोटी-मोटी प्रतियोगिताओं से हुई और देखते-देखते ओलंपिक तक का पदकीय सफर शानदार रहा। हॉकी हर खिलाड़ी की अपनी खासियत 41 वर्षों का सूखा खत्म किया। बेशक कांस्य ही लपक पाए, लेकिन जो जोश और जज्बा इस टीम ने दिखाया उससे हॉकी का स्वर्णिम भविष्य लिखा जाएगा। यह हॉकी की टीम इंडिया का ही तो कमाल था कि महामारी की उदासी के दौरान टीम का जज्बा सामने आया और हर खेल प्रेमी ने जश्न मनाया। जी हां, यह भारत की हॉकी टीम है। बहुत लंबे अंतराल के बाद हॉकी में भारत को पदक मिला। टीम के प्रत्येक सदस्य को कई राज्य सरकारों एवं संस्थाओं ने सम्मानित करने का फैसला किया है। यूं तो हर भारतीय ने दिल से टीम इंडिया का सम्मान किया है। इस टीम ने ग्रुप चरण के दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 1-7 से बुरी तरह हारने के बाद मनप्रीत सिंह की अगुवाई में शानदार वापसी की। एक बारगी थोड़ा नर्वस हो चुकी टीम ने फिर से हिम्मत बांधी और आगे बढ़ी। पहले सेमीफाइनल में बेल्जियम से हारने के बाद टीम ने कांस्य पदक प्ले ऑफ में जर्मनी को 5-4 से मात दी। यह मात बेहद ऐतिहासिक रही। टोक्यो ओलंपिक में हॉकी की टीम इंडिया ने अपना बेस्ट परफारमेंस दिया। पूरे टूर्नामेंट के दौरान मनप्रीत की प्रेरणादायक कप्तानी के साथ गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने शानदार प्रदर्शन किया। कप्तान ने जहां बेहतरीन रणनीति बनायी वहीं श्रीजेश ने विरोधी टीम की ओर से दागे जा रहे कई महत्वपूर्ण गोल को पहले ही रोककर जीत का रास्ता सुगम किया। इस जीत के साथ ही हॉकी टीम ने पूरे देश में जश्न का माहौल बना दिया। आइये संक्षेप में जानते हैं हॉकी टीम के बारे में- टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह 19 साल की उम्र में ही टीम इंडिया में आ गए थे। वह विरोधी टीम की डिफेंस में सेंध लगाने के लिए जाने जाते हैं। इसी तरह पीआर श्रीजेश गोलकीपर हैं और टीम के सबसे वरिष्ठ खिलाड़ी। उन्होंने पूरे मुकाबले में कई गोल रोके। हरमनप्रीत सिंह रियो ओलंपिक में भी टीम इंडिया के हिस्सा थे। उन्हें पेनाल्टी कॉर्नर एक्सपर्ट माना जाता है। रुपिंदर पाल सिंह की लंबी हाइट का टीम को लाभ मिलता है। हरियाणा के सुरेंद्र कुमार को टीम डिफेंस की रीढ़ माना जाता है। अमित रोहिदास लंबे वक्त तक टीम इंडिया से बाहर रहे, अब शानदार वापसी हुई और जोरदार तरीके से खेल रहे हैं। बिरेंदर लाकरा का यह दूसरा ओलंपिक है। ओडिशा के हैं और हॉकी के ऑल राउंडर माने जाते हैं। हार्दिक सिंह ने इस बार खास पहचान बना ली। प्री-क्वार्टरफाइनल में किया गया हार्दिक का गोल बहुत महत्वपूर्ण था। विवेक सिंह प्रसाद का सबसे कम उम्र में टीम में आने वाले खिलाड़ियों में नाम है। टोक्यो में उन्होंने फॉरवर्ड लाइन का जिम्मा संभाला और टीम का बखूबी साथ दिया। मणिपुर के नीलकांत शर्मा, हरियाणा के सुमित वाल्मीकि, पंजाब के शमशेर सिंह और पंजाब के ही दिलप्रीत सिंह के अलावा गुरजंट सिंह और मनदीप सिंह भी हॉकी टीम इंडिया के अहम खिलाड़ियों में से हैं।

Thursday, July 29, 2021

मुबारक हो मित्रता, दोस्ती और फ्रेंडशिप डे

केवल तिवारी

दिवस यानी डे मनाने का देश-दुनिया में जो चलन है, वह अनूठा तो है। इधर कुछ दशकों से अपने देश में भी जिस तरह से यह ‘culture’ फैला है, वह भी काबिल-ए-गौर है। मदर्स डे हो या फादर्स डे। वेलेंटाइन डे हो या फ्रेंडशिप डे। डॉक्टर्स डे हो या फिर कोई अन्य। मैंने कई दिवसों पर लिखा है, मुझसे लिखवाया भी गया है। विरोध में कभी नहीं रहा मैं। हालिया मसला है फ्रेंडशिप डे का। लोग कहते हैं कोई एक दिन थोड़ी हो सकता है मित्रता का। मित्रता तो शाश्वत है। मैं भी मानता हूं कि मित्रता तो एक ऐसी ‘रिश्तेदारी’ है जो टूटती नहीं। मित्रता के जिक्र पर मुझे याद आया मशहूर लेखक प्रताप नारायण मिश्र (Pratap Narain Mishra) का एक निबंध जिसका शीर्षक ही था ‘मित्रता’ शायद यह हमारे हिंदी के कोर्स में भी था। नौवीं और दसवीं के दौरान। बात आगे बढ़ाऊं, यहां पर यह उल्लेख करना जरूरी है कि हाल ही में नौवीं और दसवीं के ही पुराने साथियों ने एक व्हाट्सएप ग्रूप (Whatsapp group) बनाया है। मित्र विमल तिवारी की शायद पहल थी। फिर तो कई मित्र उसमें जुड़े। मित्र भजनलाल से भी मैं कई बार इस तरह के ग्रूप को बनाने के लिए कह चुका था, क्योंकि उनके संपर्क में कई मित्र हैं। इसी दौरान पत्रकारिता के दौरान मित्रों का भी एक group बना। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में हम पढ़े। इस ग्रूप का नाम पंछी एक डाल के रखा गया। मित्र मनोज भल्ला ने इसकी पहल की। इन ग्रूप्स में विचारों में भिन्नता है, लेकिन मन में नहीं। यानी मतभेद हैं, मनभेद नहीं। परिवार के ग्रूप को छोड़ दें तो (क्योंकि ऐसे ग्रूप तो होने ही हैं आत्मीय) मेरे पसंदीदा ग्रूप में ‘हिंदी हैं हम’ शामिल हैं। बड़े भाई समान हीरावल्लभ शर्मा जी ने मुझे इसमें जोड़ा। अनेक विद्वजन इसमें हैं। विचारों का आदान-प्रदान होता है। अच्छे और सकारात्मक संदेश पढ़ने को मिलते हैं। इसी तरह बेसहरा एवं गरीब बच्चों के लिए सार्थक प्रयास कर रहे उमेश पंत की पहल पर बना एक समूह करीब डेढ दशक से निर्बाध चल रहा है। कोरोना काल को छोड़ दें तो महीने-दो महीने में 20-22 लोग मिलते हैं और साल में ये सभी परिवार। इस समूह के लोग धन संग्रह ग्रूप से जुड़े हैं। कोरोना काल में भी अनेक ग्रूप बने जो सिर्फ सहायतार्थ बने। किसी को कोई जरूरत थी तो उसके लिए या किसी का नंबर लेने के लिए। लेकिन वर्चुअल (Virtual) दुनिया तो वर्चुअल ही होती है। अंतत: लोग Good morning Good night पर आ ही जाते हैं।

खैर... बात मैं मित्रता दिवस यानी Friendship Day पर कर रहा हूं। मेरी बात पीछे छूट गयी थी प्रताप नारायण मिश्र जी की रचना मित्रता पर। उसी में शायद एक कहानी का जिक्र था जिसमें एक राजकुमार कुछ दिनों से अपने पिता के साथ नहीं आ-जा रहा था। यानी पिता से कटा-कटा सा रहता था। राजकुमार की जब राजा ने खैर ख्वाह ली तो उन्होंने संदेश भेजा, ‘मुझे बुखार है।’ राजा ने गौर किया कि इस दौरान राजकुमार के तमाम मित्र उससे मिलने आते हैं प्रसन्नचित्त दिखते हैं। आते हुए भी जाते हुए भी। पता चला कि राजकुमार आमोद-प्रमोद में लीन होने लग गए थे। उनके कथित मित्र इस सबका आनंद ले रहे थे। एक दिन राजा स्वयं राजकुमार का हालचाल लेने पहुंच गये। राजकुमार के मित्र इधर-उधर से नौ दो ग्यारह हो गये। पिताजी के अचानक आगमन से राजकुमार अचंभित। क्या कहें? डर भी कि पता नहीं राजाजी क्या करेंगे। राजा ने धैयै से पूछा, ‘अब बुखार कैसा है?’ राजकुमार को कुछ नहीं सूझा, बोले-‘पिताजी बुखार ने मुझे अभी-अभी छोड़ा है।’ राजा ने राजकुमार के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘बहुत अच्छी बात है, कुसंगति रूपी बुखार जितना जल्दी छोड़ दे, अच्छा है। ये न छोड़े तो व्यक्ति को स्वयं ऐसी संगत को छोड़ देनी चाहिए।’ यह एक कहानी थी मित्रता के बारे में बताने की। यानी अच्छी संगत है तो ठीक, बुरी संगत है तो सब गड्डमड्ड। संगति को लेकर भी अलग-अलग विचार हैं। एक विचार है कि यदि व्यक्ति स्वयं ठीक है तो कुसंगति उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इसका तर्क देने वाले कबीर दास जी को कोट करते हुए कहते हैं-

संत ना छोड़े संतई, जो कोटिक मिले असंत। चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

या इस तरह से

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत। चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।

दूसरी ओर संगति के असर पर तर्क दिया जाता है-

काजल की कोठरी से कैसे ही सयानो जाये, एक लीक लागि है, लागि है पै लागि है।

खैर मेरा विचार है कि संगत, कुसंगत का असर किशोरावस्था तक ही सीमित है। प्रैक्टिल लाइफ में तो आपको कितने ही लोग मिलते हैं और आप सबको टैकल करते हुए चलते हैं। वैसे मित्रता की परिभाषा समझाने वाले कहते हैं कि जरूरी नहीं समान विचारधारा वाले ही मित्र बनें। समान हैसियत वाले ही मित्र बनें। कृष्ण-सुदामा की मित्रता की चर्चा हमारे यहां की जाती है। एक समय बाद जब मैच्योरिटी आ जाती है तो संगत-कुसंगत गौण हो जाती है। विचार भिन्नता तो हो सकती है, लेकिन खुद को ही श्रेष्ठ और सबकुछ मानने वाले व्यक्ति के साथ शायद ही किसी की मित्रता हो सकती हो। तभी तो शायद रहीमदास जी ने कहा-

कह रहीम कैसे निभे, बेर-केर को संग। वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।

 

कोरोना का दौर और मित्रता

रहीम दास जी का एक दोहा है-

कह रहीम संपत्ति सगे, बनत बहुत बहु रीति, विपत्ति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत।

विपत्ति में काम आने वाला ही असली मित्र है। कोरोना काल में अनेक मित्र भी असहाय से हो गये थे। अस्पतालों में पद, पैसा और प्रतिष्ठा कोई चीज काम नहीं आ रही थी, लेकिन फिर भी लोगों ने कोशिशें कीं। सोशल साइट्स पर कई ग्रूप बने। जिससे जितना बन पड़ा, उतनी मदद की। किसी की मदद काम आ गयी, कोई उदास ही रह गया। वह दौर तो था ही ऐसा। अकल्पनीय।

 

कुछ तो बात है, वरना कैसे हो जाती है मित्रता?

बेशक मित्रता किसी का चुनाव या चयन करके नहीं की जाती, लेकिन कुछ तो ऐसा होता है जो दो लोगों को मित्र बना देता है। एक कहावत भी तो है कि आप एक मैदान में हजार लोगों को छोड़ दीजिए, कुछ ही देर में आपको 10-10 या 20-20 लोगों का समूह बना मिलेगा। यानी विचारों के मैच करने पर दोस्ती हो ही जाती है। कई बार आप ट्रेन में सफर कर रहे होते हैं तो आपके अनजान लोग मित्र बन जाते हैं। यह मित्रता लंबी चलती है। फिर भी आगाह किया जाता है कि-

गिरिये पर्वत शिखर ते, परिए धरनी मंझार। मूरख मित्र न कीजिए, बुड़ो काली धार।।

अच्छे मित्र की महत्ता को इस तरह से बताया गया है-

कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय। खीर खीड भोजन मिलै, साकट संग न जाय।।

इसी तरह तुलसीदास जी कहते हैं-

आवत ही हरषै नहीं नैनं नहीं सनेह। तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।

मित्रता हो जाये तो जरा-जरा सी बात पर उसमें दरार नहीं आनी चाहिए। मुझे याद है बचपन में एक बार बड़े साहब ने मित्रता के बारे में कहा था जब दो सत्यवादी सती हो जायें वही मित्रता है। उन्होंने दोस्ती को दो सती नाम दिया। इसका अर्थ उन्होंने समझाया कि जब दो लोगों के बीच हुई बातें तीसरे तक न पहुंचे, यही मित्रता है। इस मित्रता को अपने इगो या गलतफहमी में तोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि-

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े तो गांठ परि जाय॥

साथ ही यह भी कहा गया कि अच्छा व्यक्ति यदि रूठ जाता है तो उसे मनाना चाहिए। कहा गया-

टूटे सुजन मनाइये जो टूटे सौ बार। रहिमन फिरि-फिरि पोहिये, टूटे मुक्ताहार।।

इसी तरह रीतिकालीन कवि बिहारी ने भी आगाह किया कि मित्रता को शाश्वत बनाये रखने के उपाय यही है कि इसमें धन-वैभव न आने दें। -

जौ चाहत, चटकन घटे, मैलौ होइ न मित्त। रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह-चीकन चित्त॥

कहीं-कहीं रिश्तेदारी को भी मित्रता कहा जाता है। असल में वह भी मित्रता ही तो है। मित्रता को लेकर संस्कृत के दो श्लोक इस तरह से हैं-

 

कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:। अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा ॥ ...

जानीयात्प्रेषणेभृत्यान् बान्धवान्व्यसनाऽऽगमे। मित्रं याऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥ .

 

इस तरह शुरू हुआ इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे

इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक फ्रेंडशिप डे की शुरुआत वर्ष 1930 से 1935 के बीच अमेरिका से हुई थी। कहानी के मुताबिक एक व्यापारी ने इस दिन की शुरुआत की थी। जोएस हाल नाम के इस व्यापारी ने सभी लोगों को बधाई देने का सिलसिला शुरू किया। कहा जाता है कि इस खास दिन को मनाने के लिए उस व्यापारी ने 2 अगस्त के दिन को चुना था। बाद में यूरोप और एशिया के बहुत से देशों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। दुनियाभर के अलग-अलग देशों में फ्रेंडशिप डे अलग-अलग दिन मनाया जाता है। 27 अप्रैल 2011 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा ने 30 जुलाई को आधिकारिक तौर पर इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे घोषित किया था। हालांकि, भारत सहित कई दक्षिण एशियाई देशों में अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। ओहायो के ओर्बलिन में 8 अप्रैल को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। इस बार फ्रेंडशिप डे पहली अगस्त को है। सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं। Happy friendship day.

 

Monday, July 26, 2021

18 बरस का कुक्कू

 


प्रिय बेटे कुक्कू। सदा खुश रहो। खूब तरक्की करो। आज तुम 18 वर्ष को हो गये हो। इस उम्र का मतलब समझते हो। अब वह बैंक अकाउंट सिर्फ तुम्हारे नाम होगा जिसको अब तक आपकी मम्मा ऑपरेट करती थीं। वोटर कार्ड तुम्हारे नाम से बनेगा। यानी अब तुम वोटर बन जाओगे। और भी कई बदलाव होंगे और सबसे बड़ी बात कि अब तुम कॉलेज लाइफ में प्रवेश करोगे जहां तुम्हारा वास्ता बहुत अलग तरह की दुनिया से पड़ेगा। उस दुनिया से तालमेल बिठाते हुए जहां तुम्हारी नजर भविष्य पर अपने लक्ष्य पर होगी, वहीं कॉलेज लाइफ को एंजॉय भी करना होगा।

यह बर्थडे वास्तव में खास है, लेकिन इस खास में कोरोना महामारी का फीकापन सवार हो गया। नहीं तो इस वक्त शायद तुम नये संस्थान में एडमिशन लेने की जद्दोजहद में होते या शायद एडमिशन हो चुका होता। खैर कोई बात नहीं। सब समय का फेर है। इसी तरह आज के दिन मेरे और तुम्हारी मम्मा के भी बहुत कुछ करने के अरमान थे। जैसे सुबह पूजा-पाठ, फिर कहीं घूमने का कार्यक्रम। शाम को बर्थडे सेलिब्रेशन आदि। पूजा-पाठ नातक (प्रमोद का बेटा हुआ है, शुभ सूचना है। नातक में सूखी पूजा होगी) के कारण विस्तार से नहीं होगी। कुछ पकवान तो बनेंगे ही। बाकी कुछ न भी हो पाये तो भावना तो बहुत कुछ करने की है ही। कार्तिक तुमसे बेटा कुछ भी नहीं छिपा है। आर्थिक स्थिति से लेकर, सामाजिक व पारिवारिक। बस बेटा, इतना ध्यान रखना बड़ों का सम्मान करना। छोटों को प्यार देना। दोस्ती परखकर करना। बात सबसे करना, लेकिन जहां तुम्हें कुछ अटपटा लगे, खुद ही किनारे हो जाना। वैसे मैंने देखा है कि संगति के मामले में तुम्हारा चयन ठीक रहता है। अब एक बड़ा काम तुमको वैक्सीन लगाने का है। देखते हैं कब लग पाती है। जेईई एडवांस का पेपर देने के बाद जरूर तीन-चार दिन घूमने चलेंगे ताकि रिलैक्स होकर नयी शुरुआत कर सको। अपनी एक कविता के साथ तुम्हें फिर से ढेर सारी बधाइयां, शुभकामनाएं।

तुम बालिग हो गये हो तो क्या

हो तो जिगर के टुकड़े।

जिगर बड़ा नहीं होता

पर उसके बगैर

काम भी तो नहीं चलता।

जीवन की गति की मानिंद

अब तुम पकड़ोगे रफ्तार

रफ्तार पर नियंत्रण भी होगा रखना

हां, यही तो मेरा है कहना

अपना ध्यान तुम अब ज्यादा रखना।

बहुत कुछ तो सीखता हूं तुमसे

इस सिखाने को जारी रखना

नयी खोजों पर तुम्हारे ज्ञान का हूं कायल

हां जीवन की सीख तुम मुझसे लेते रहना।

केवल की भावना को तुम समझते रहना

धवल के पथ पर भी अनुभव बिखेरना।

ताऊ-ताई, बुआ-फूफा सबको प्रणाम करना

दद्दा, दीदी को भी बातें बताते रहना।

बहुत हुए उपदेश चलो अब आगे चलें

आओ बालिग कुक्कू का बर्थडे एंजॉय करें।

तुम्हारा पापा

केवल तिवारी

Thursday, July 22, 2021

अतीत से घबराना और अतीत को ही सहेजना

 केवल तिवारी

कुछ बुजुर्गों और कुछ ‘झिलाऊ’ लोगों की तरह कुछ-कुछ अपनी भी आदत है अतीत के कुछ किस्सों को सुनाने की। गनीमत है कि बीबी और बच्चे धैर्य से सुनते हैं और कभी-कभी लगता है इंट्रेस्ट भी ले रहे हैं। हां अनेक बार ऐसा भी हुआ है कि मैं किस्सा शुरू करता हूं और बच्चे उसे पूरा करते हुए कहते हैं, ‘आप इस बात को कई बार बता चुके हैं।’ फिर लगता है किस्सागोई में क्या मैं गरीब हो चुका हूं। फिर अपनी आत्मा से ही बात करते हुए कहता हूं कितनी बातें तो मैं एडिट करके बताता हूं। किस्से भी क्या होंगे मेरे जीवन के। आज इन बातों को लिखने का असल में एक खास कारण बना। अपने बचपन की बातों को याद करते हुए पत्नी भावना बोली, भगवान अगर मुझसे पूछे क्या चाहती हो मांगो तो मैं बोलूं, एक बार बचपन के उन दिनों में ले चलो। बड़े बेटे कार्तिक ने जवाब दिया, ‘फ्यूचर में जाना तो हो सकता है कभी संभव हो जाये, लेकिन भूतकाल में जान संभव नहीं।’ छोटा बेटा धवल बोला, ‘क्या मम्मा आपको अच्छा लगेगा नानी जी बीमार थीं, नाना जी भी बीमार थे।’ भावना बोली बेटा में बचपन की बातें कर रही हूं, जब हम भाई बहन लड़ते थे। पापा यानी आपके नाना जी हर हफ्ते दही-जलेबी लाते थे। हर इतवार को त्योहार जैसा होता था क्योंकि नानाजी शनिवार को आते थे और सोमवार को निकल जाते थे। असल में वह उन दिनों की बात कर रही थी जब वह आठवीं या नौवी में पढ़ती होगी। उनके पिता मनोहर दत्त जोशी नैनीताल में पोस्टेड थे। वे health department में जॉब करते थे। भावना की बात खत्म हुई तो फिर वैसा ही सवाल मुझसे भी हुआ। क्या कहता? मैंने कहा नहीं बच्चो मैं तो भविष्य की ओर देखने वाला व्यक्ति हूं। मैं अपने अतीत में जाना नहीं चाहता। फिर ज्यादा मैं कुछ नहीं बोला। धवल और कार्तिक एक साथ बोले, पुराने दिनों की अलग-अलग यादें होती हैं। जैसे हम कहेंगे कि हम लोग कैसे साथ खाना खाते थे। कभी-कभी प्रेस क्लब जाते थे। पापा पहले नाइट ड्यूटी करते थे तो हम लोगों से मुलाकात भी रोज कहां होती थी। पापा जब उठते थे हम स्कूल जा चुके होते थे। पापा जब रात को आते थे, हम सो चुके होते थे। बच्चों की यह बात तो यहीं खत्म हो गयी, लेकिन मैं न जाने क्यों अतीत की ओर झांकने लगा। दिमाग पर जोर देकर कि देखता हूं कहां तक पहुंचता हूं। पिताजी की छवि तो मेरे दिमाग में बिल्कुल भी नहीं है। हां पहाड़ में अपने घर की खिड़की पर बैठकर एक व्यक्ति सब्जी काटता हुआ मेरे जेहन में बचपन से है। शायद वो पिताजी ही होंगे। वैसे मैंने नाना-नानी भी नहीं देखे। जब पिताजी को नहीं देखा तो दादा-दादी की बात क्या करूं। असल में इसमें संपूर्ण दुर्भाग्य मेरा ही तो है। पहली बात तो मैं धरती पर आया, यही आश्चर्यजनक है, फिर जिंदा रहा यह भी आश्चयर्जजनक। ईजा बतातीं थी कि पिताजी जब अंत समय के दौर में थे तो कहते थे, भुवन ‌(बड़े भाई साहब) को इंटर ज़रूर करा देना, बेटियां अपनी किस्मत से खाएंगी और इसको (मेरे लिए) बचना नहीं है। खैर मैं बच गया और देखते-देखते जीवन के 50 बरस पूरे करने जा रहा हूं। खैर... अतीत में झांकने की कोशिश में मैं चला गया हूं कक्षा चार में। नयी किताबें ला नहीं सकते। माता जी करीब 10 किलोमीटर पहाड़ी सफर तय कर कहीं किताबें लेने गयीं, ‘सेकेंड हैंड।’ पहले दिन जवाब मिला, हम किताब बेचते नहीं.... दूसरे दिन फिर वही सफर। इस बार वो पिघल गये जिन्होंने एक दिन पहले किताबें देने को मना किया था और इस तरह मेरी ‘नयी’ किताबें आ गयीं। यह किस्सा में बच्चों को हर साल तब सुनाता हूं जब उनके लिए नयी कॉपी-किताबें आती हैं। मुझे याद है मैं और शीला दीदी कहीं शादी-व्याह में जाते थे तो जब कोई हमसे पूछता तुम किसके बच्चे हो तो हमारा जवाब होता हम ‘भुवन के भाई-बहन हैं।’ यानी बड़े भाई साहब भुवन चंद्र तिवारी के छोटे भाई-बहन हैं। यही तो पहचान थी हमारी। यही अब भी है। फिर एक धुंधली सी याद आती है प्रेमा दीदी की शादी की। मुझे आधी रात को बिस्तर से उठाया गया ताकि मैं खील देने की परंपरा का निर्वहन कर सकूं। फिर कई बातें। अभी शायद मेमोरी ठीक है, फिर तो कई किस्से याद हैं जो मैं बच्चों को बताता रहता हूं। मसलन, कक्षा 6 बाल विकास मांटेसरी स्कूल में मेरा एडमिशन और काउ (गाय) पर निबंध की बात। मैं तो काव मतलब काल समझता था। पुष्पा दीदी का मुझे कमांड हास्पिटल दिखवाने ले जाना। जीजा जी यानी स्व. ख्यालीराम जोशी का मुझे भगत कहना, आठवीं में बड़े भाई साहब द्वारा मेरा एडमिशन लखनऊ मांटेसरी में करवाना और मुझे खुद लिस्ट देखने के लिए भेजना और पीछे-पीछे चुपचाप उनका आना, लखनऊ मांटेसरी तक कई बार पैदल जाना, अनेक बार डॉ. अग्निहोत्री द्वारा लिफ्ट दिया जाना, पूरे तेलीबाग में कुछ ही घरों में टेलीविजन होना, बाद में हमारे घर में भी टीवी आना, छत पर जाकर एंटीना को ठीक करने में ही विशेष मजा आना, वो किस्से भी जब भाई साहब मुझे आकाशवाणी लेकर जाते थे। इसके बाद वह किस्सा भी जब मैं आठवीं में पढ़ता था जब भाभीजी को लेने गांव गया। फिर बाद में एक बार किस तरह हमने ट्रेन पकड़ी, फिर टिकट लेने लालकुआं स्टेशन पर उतरा। तब तक ट्रेन चलने लगी। भाभीजी और छोटा सा भतीजा दीपू उसमें बैठे थे। भाग-भागकर ट्रेन पकड़ी। अगले स्टेशन पर उस डिब्बे को ढूंढ़ने लगा जिसमें भाभीजी और भतीजा बैठे थे। बड़ी मुश्किल से वहां तक पहुंचा। ऐसे ही एक किस्सा जब मैं शाहजहांपुर से गांव गया तो रानीखेत से आगे बसें शाम सात बजे बाद नहीं चलती थीं, तब मैंने ठिठुरते-ठिठुरते रानीखेत में पूरी रात बिताई। ऐसे ही अनेक किस्से। शाहजहांपुर में विमला दीदी के यहां निवास के, बाद में भानजे पंकज का केंद्रीय विद्यालय मे एडमिशन की जद्दोजहद। उसके बाद यानी करिअर पथ के अनेक किस्से। फिर अपने बारे में सोचता हूं या जब कोई आत्मीय हो जाता है और मेरे बारे में पूछता है तो कहता हूं-

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता।

 

गालिब साहब के इस शेर की अगली पंक्तियां हैं-

हुआ जब ग़म से यूं बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का,

न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता।

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,

वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता।


क्या-क्या याद किया जाये। अतीत में जाना नहीं चाहता, यह मैं कहता जरूर हूं, लेकिन अतीत को सहेजते भी रहता हूं। वर्ष 1996 में जब दिल्ली आया तो डायरी लेखन को नियमित कर दिया। पहले भी लिखता था, लेकिन तब कुछ किंतु-परंतु उठ गये तो बंद सा किया। अब तो करीब 15 डायरियां भरी हुई रखी हैं। बाकी जारी हैं। दिल्ली आने के कुछ समय बाद मुझे लगा यह डायरी लेखन नहीं, यह तो ईश्वर से मेरा सीधा संवाद है। इसलिए जब परेशान होता हूं या खुश होता हूं तो डायरी तक खुद-ब-खुद कदम बढ़ जाते हैं। डायरी लेखन को कोई नियत समय नहीं। कभी भी, कहीं भी।

अब तक के जीवन पर नजर डालते हुए एक बात पर सचमुच आश्चर्य होता है कि मुझे मित्र बहुत अच्छे मिले हैं। कुछ बड़े भाई की तरह, कुछ छोटे भाई की तरह और कुछ जुड़वां भाई की तरह। मेरा अतीत शायद जानते हों या शायद न जानते हों, लेकिन मेरा वर्तमान तो उनके सामने ही रहा, हमेशा ही। यह अलग बात है कि कुछ ऐसे लोग भी मिले जिनसे मेरा सीधे कोई नाता नहीं, लेकिन एक अजब सी चिढ़ या कंपटीशन की भावना उन्होंने मेरे साथ रखी। कुछ को गलतफहमियां भी हुईं। उनमें से कुछ मित्रों की गलतफहमियां दूर करने का मेरा मन है, लेकिन कुछ का नहीं। उन्हें उसी अंदाज में चलते रहने देना चाहता हूं।

जरा सी बात पर मैं कहां से कहां चल दिया। वैसे मेरा मानना है कि छोटी-छोटी बातों को याद रखना चाहिए, लेकिन उन्हीं बातों को जो खुशी देती हों। जैसे परिवार संग कहीं घूमने गये तो कई बार उसकी चर्चा की। मित्रों संग घूमने गए तो कई यादें सहेज लीं, तभी तो गीत बना छोटी-छोटी बातों की है यादें बड़ी... भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी... लगता है कुछ ज्यादा लिख दिया है। स्वांत: सुखाय के लिए इससे ज्यादा लिखना ठीक नहीं। अपने आप को बहलाने के लिए कुछ और शेर और कॉपी पेस्ट कर देता हूं जिन्हें इंटरनेट से उठाया है जो मशहूर भी हैं-

ज़माना तो बड़े शौक से सुन रहा था, हम ही रो पड़े दास्तां कहते कहते..

 

मेरे जीवन का बस इतना फसाना है, कागज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है..

 

कर लो एक बार याद मुझको, हिचकियां आए भी ज़माना हो गया...

तमाम बातों को याद करते हुए अंत में उसी गीत को याद करूंगा जिसके बोल हैं-ये जीवन है, इस जीवन का यही है यही है यही है रंग रूप, थोड़े गम हैं, थोड़ी खुशियां हैं...

Tuesday, July 20, 2021

खुशी, गम, उत्साह, बेचैनी और जन्मदिन पर शानदार बधाइयां

केवल तिवारी

कभी खुशी, कभी गम या दुख, कभी बेचैनी और कभी उत्साह। दिनचर्या में ऐसे ही मनोभावों से तो गुजरते हैं हम लोग। कभी खुश हम अपने कारणों से होते हैं तो कभी दूसरों के कारण भी। इसी तरह दुख का कारण भी कभी हम खुद होते हैं तो कभी कोई और होता है। वैसे तो कारणों की पड़ताल करें तो कई बातें सामने आएंगी, लेकिन वर्तमान पल को जी लेने की जो शिक्षा हमारे बड़े-बुजुर्ग देते हैं, वह है बहुत शानदार। आप कोशिश करें खुशी के पलों को भरपूर जीने की। फिर कभी उदासी में उन्हें याद करें। इसी तरह कभी आप दुख वाले पलों को याद करें फिर कारण जानें संभव हो तो उनका निदान करने की कोशिश करें। मामला 18 जुलाई का है। यानी 18 जुलाई, 2021, मेरा जन्मदिन। बधाई संदेशों का तांता लग गया। मजे की बात यह है कि मैं खुद कई बार लोगों को जन्मदिन पर बधाई नहीं दे पाता। एक तो मैं फेसबुक नहीं देख रहा, दूसरे याददाश्त की कमी है। जन्मदिन पर मैसेज तो पहली रात से ही आने लगे थे, लेकिन 18 जुलाई की सुबह से ही बधाई के लिए फोन भी आने लगे। हमारे पूर्व समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ जी का फोन सबसे पहले आया। फिर ट्रिब्यून से ही रिटायर वरिष्ठ पत्रकार कमलेश भारतीय जी का। इसके बाद बैंकिंग क्षेत्र के शीर्ष पदाधिकारी एवं यूनियन में सक्रिय अश्विनी राणा जी का। ऑफिस आया तो संपादक जी ने आशीर्वाद दिया। फिर वरिष्ठ पत्रकार रास बिहारी जी का फोन आया। ऐसे ही अनेक मित्रों, अनुजों के फोन आये। कमलेश भारतीय जी ने उम्र पूछी तो मैंने कहा कि 50 के करीब पहुंच गया हूं। उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा, यानी 10 साल और दैनिक ट्रिब्यून की सेवा करनी है। उनकी ये blessing अच्छी लगी। उस दिन मैंने सुबह और शाम दोनों टाइम डायरी लिखी। ब्लॉग भी लिखने का मन था, लेकिन समय नहीं मिल पाया। शाम को डॉ चंद्र त्रिखा जी का मैसेज भी आया, उन्होंने आशीर्वाद दिया। उनके चैनल से भी कई जानकारियां मिलती हैं। birthday के बाद आज (मंगलवार 20 जुलाई, 2021) भी सुबह से ठानी थी कि ब्लॉग लिखूंगा। फिर मंगलवार का व्रत। सुबह पूजा-पाठ का लंबा कार्यक्रम चला। दोपहर को जब ऑफिस के लिए निकला तो मन उदास हो गया। मेरी गाड़ी के windscreen पर किसी ने पत्थर मारा था। पहला शक तो बच्चों पर ही जा रहा है जो कॉलोनी के बाहर की तरह बने घर की छत पर खेलते रहते हैं। करीब महीने भर पहले ही मैंने शीशा बदलवाया था। मारुति के सर्विस सेंटर से। बाकी तो बीमा क्लेम हो गया, लेकिन करीब डेढ़ हजार फिर भी लगे। दिनभर काम में व्यस्त रहा। ऑफिस आकर भी मूड खराब सा ही रहा। फिर सोचा, अब उदासी से क्या होगा। कुछ solution ढूंढ़ना होगा। शीशा तो  बदलना ही होगा, लेकिन उससे बड़ा झंझट सारे स्टीकर फिर से बनवाने का है। शाम होते-होते जब काम तो थोड़ा फारिग हुआ तो ब्लॉग लिखने बैठ गया। दिनभर इस मसले ने उदास ही करके रखा। असल में एक तो हम जैसे lower middle class वालों के लिए कार लेना भी घर लेने जैसा ही है, तिस पर इस तरह के खर्च और झंझट अंदर तक तोड़ देते हैं। दो दिन बाद ही कार से अंबाला जाना है। खैर चलिए क्या कर सकते हैं। इस बार का जन्मदिन बधाइयों के मामले में खास रहा। आज के समय में जहां अनेक लोग तोलमोल के बधाई देते हैं या नफा-नुकसान का अंदाजा लगाकर मैसेज या फोन करते हैं, उस दौर में बेहद आत्मीयता से मुझे बधाइयां मिलीं, मैं गदगद हुआ। अब इस नये संकट से भी उबर ही जाऊंगा। शाम को जब हमारे यहां से ही रिटायर हुए और Tribune Society Complex में मेरे पड़ोसी गणेश जी से बात हुई तो मन थोड़ा हल्का हुआ। जीवन के विविध आयाम हैं, चलते रहिए।

Friday, July 16, 2021

छोटी-छोटी बातों की यादें बड़ी

 ऑफिस के लिए तैयार हो चुका था। बेटे कार्तिक के पास फोन आया। वह बोला मैं बाहर आ रहा हूं। मेरी छठी इंद्रिय सक्रिय हो गयी। क्या मंगाया है? पूछा तो भावना बोली पता नहीं। छोटा बेटा धवल, जो ऑनलाइन क्लास ले रहा था, बोला मास्क मंगाये हैं। आपके ऑफिस जाने के लिए। पहले जो मंगाये थे, वे कम पड़ गये हैं। भावना, धवल बात कर भी रहे थे और मंद-मंद मुस्कुरा भी रहे थे। मैं ऑफिस के लिए तैयार तो हो गया था, बस जूते पहनने बाकी थे। जूते जिन्हें कई दिनों से धोने की योजना बन रही है। भावना कई बार कह चुकी है कि गंदे हो गये हैं, लेकिन धो देंगे तो सूखेंगे नहीं। कार चलाने में मुझे पता नहीं क्यों ये लाइटवेट जूते ही कंफर्ट लगते हैं। एक जोड़ी और भी जूते हैं जो हैवी हैं, उन्हें गाड़ी चलाते वक्त पहनता हूं तो अटपटा लगता है। खैर...। भावना बोली पांच मिनट रुक जाओ। तभी कार्तिक यानी कुक्कू एक पैकेट लेकर आ गया। बेहद उत्साहित। ये क्या हैं? फिर मैंने सवाल किया। फिर खुद ही जवाब भी दिया, लग रहा है जूते हैं। ओह... समझा। मेरे लिए गिफ्ट। दो दिन बाद मेरा जन्मदिन जो आ रहा था। यानी 18 जुलाई। इस 18 जुलाई को 49 सालों का हो जाऊंगा। यानी अर्धशतक से एक साल पीछे। अरे क्यों मंगाये। मैंने कपड़े दिए तो हैं सिलाने के लिए, मेरा सवाल था, पूरे परिवार से। ये कपड़े सिलवाने की जिद भी भावना की ही थी। कपड़े गिफ्टेड थे, बस उन्हें सिलवाना था। गिफ्ट का पैकेट आया और मैंने जूते कहा तो पैकेट को खोलने की तैयारी हो गयी। उसी वक्त धवल दौड़कर आया और पैकेट लाकर छिपाने लग गया, बोला नहीं आपके बर्थडे के दिन खोलेंगे। तभी देखना इसमें क्या है। कुक्कू बोला, पापा को पता लग गया है। भावना ने भी कहा, अब खोलकर पहन ही लो। धवल नाराज हो गया। मैं कहने लगा अरे बच्चे की जिद मान लेते। खैर... जूते खोले गये। बहुत शानदार। रंग भी बहुत शानदार। हल्के। मैंने पहन लिए। धवल की थोड़ी नाराजगी से परेशान हुआ, लेकिन उसकी नाराजगी का भी एक अलग मजा था। कुछ समय पहले वह मेरे से लिपटालिपटी कर रहा था। परिवार की यही खुशी तो अनमोल खजाना है। मैं कार चलाते वक्त भावुक हो गया। भावुकता में शायद थोड़ा सुबक भी गया। मुझे पहले वह गीत आया जिसके बोल हैं छोटी-छोटी बातों की है यादें बड़ी, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी। सोचता रहा। सचमुच ये बातें कितनी अनूठी होती हैं। गिफ्ट छोटा या बड़ा नहीं होता। मैं कितना खुश हो जाता था जब धवल और कुक्कू मुझे कागज पर हैप्पी बर्थडे पापा लिखकर देते थे। ऐसे ही जब मैं लखनऊ में ट्यूशन पढ़ाता था तो कई बच्चे मुझे न्यू ईयर कार्ड बनाकर देते थे। गिफ्ट परंपरा को मैं बहुत अच्छा नहीं मानता। लेकिन परिवार के बीच खुशियों के इस तरह के पल मुझे भावुक कर जाते हैं। मैं आज सुबह से तमाम बातें याद कर रहा था। हरेला के दौरान मुझे बचपन, फिर जवानी और अब बची-खुची जावानी याद आ रही थी। इसी दौरान मुझे याद आया एक शेर जिसके बोल हैं-

इस प्यारी सी दुनिया में एक छोटा सा मेरा परिवार है,
खुशियां मुझे इतनी मिलती है जैसे रोज कोई त्योहार है।

सचमुच त्योहार ही तो था यह। आज तो वैसे भी हरेला पर्व था। सुबह उसकी खुशी भी की सेलिब्रेट। हरेला काटा। एक दूसरे के सिर पर रखा। आशीर्वाद दिया। मंदिर गये। बच्चों के लिए कुछ पकवान बने। हम सबने खाये। फिर भावना को डॉक्टर के यहां ले गया क्योंकि उसके मुंह में कुछ छाले हो रहे थे। वहां डॉक्टर ने मेरा शुगर चेक कराया। डॉ कमल बहुत केयरिंग हैं। वह अक्सर मेरा हालचाल लेते हैं। शुगर आज 187 आया। अमूमन मेरा शुगर 220 या 230 आता है। मैंने लाइफ स्टाइल में बहुत बदलाव किया है। इस बदलाव में और शुगर लेवल कम करने में परिवार का पूरा हाथ है। असल में मीठे की यह बीमारी खत्म भी होती है मीठे से ही यानी घर में वातावरण अच्छा है, तनाव नहीं है तो बीमारी खत्म। बीमारी बढ़ने का कारण भी परिवार ही हो सकता है, लेकिन इतना विस्तार में क्या जाना। इस वक्त तो चार पंक्तियां और याद आ रही हैं जिसमें कवि ने कहा है-

मुसीबत में खड़ा जो साथ बन दीवार होता है, हमारा हौसला हिम्मत वही परिवार होता है,
बड़े मजबूत दुनिया में लहू के रिश्ते होते हैं, कहां सबके नसीबों में लिखा ये प्यार होता है।

थैंक्स धवल, थैंक्स कुक्कू और थैंक्स भावना।

Monday, July 12, 2021

‘ट्रेजडी किंग’ ने महसूस किया हर रंग



स्मृति शेष : दिलीप कुमार

साभार : दैनिक ट्रिब्यून

केवल तिवारी

रील लाइफ में ज्यादातर त्रासद-दुखद अभिनय के कारण ट्रेजडी किंग के नाम से मशहूर हुए दिलीप कुमार निजी जीवन में हर रंग से रू-ब-रू हुए। वह भरपूर जीवन जी गये। बीच के थोड़े से समय को छोड़ दें तो उनका जीवन बेहतरीन रहा। उन्हें मोहब्बत हुई, उन्होंने शोहरत की बुलंदियों को छुआ, मुफलिसी का दौर भी झेला, राजनीति के मंच पर चमके, परिवार की जिम्मेदारियों को भी निभाया। 25 साल की उम्र में बतौर अभिनेता अपनी पहचान बना चुके दिलीप साहब ने 54 साल के फिल्मी कॅरिअर में लगभग इतनी ही फिल्में कीं, जबकि उनके अभिनय से बहुत कुछ सीखने वाले कई दिग्गज अभिनेताओं ने अपने करिअर में फिल्मों का शतक लगाया और उससे आगे भी गये। अकसर यह सवाल उठता है कि दिलीप साहब जैसे महान अभिनेता ने कम फिल्में ही क्यों कीं, इस पर स्वयं एक बार उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि वह संख्या बढ़ाने पर विश्वास नहीं रखते। फिल्में ऐसी हों जो समाज को कोई संदेश दे। यहां उल्लेखनीय है कि दिलीप साहब ने स्वयं कई फिल्मों में अभिनय करने से इनकार कर दिया। वर्ष 1998 में बनी फिल्म किला के बाद उन्होंने किसी फिल्म में काम नहीं किया। उन्होंने 1961 में ‘गंगा-जमुना’ फिल्म का निर्माण भी किया, जिसमें उनके साथ उनके छोटे भाई नासिर खान ने काम किया। उनकी चर्चित फिल्में हैं-

सुपर-डुपर हिट :
जुगनू, मेला, अंदाज, आन, दीदार, आजाद, मुगल-ए-आजम, कोहिनूर, गंगा-जमुना, राम और श्याम, गोपी, क्रांति, विधाता, कर्मा और सौदागर।
 
सुपर हिट :
शहीद, नदिया के पार, आरजू, जोगन, अनोखा प्यार, शबनम, तराना, बाबुल, दाग, उड़न खटोला, इंसानियत, देवदास, मधुमती, यहूदी, पैगाम, लीडर, आदमी, संघर्ष।

हास्य अभिनय :
शबनम, आजाद, कोहिनूर, लीडर, राम और श्याम, गोपी।

दबंग भूमिका :
आन, आजाद, कोहिनूर, क्रांति।

नेगेटिव रोल :
फुटपाथ, अमर।

अधूरी रहीं फिल्में :
काला आदमी, जानवर, खरा-खोटा, चाणक्य-चंद्रगुप्त, आखिरी मुगल।

अभिनय से किया इनकार :
बैजू बावरा, प्यासा, कागज के फूल, संगम, दिल दौलत और दुनिया, नया दिन नयी रात, जबरदस्त, लॉरेंस ऑफ अरेबिया, द बैंक मैनेजर।

बनने गये थे लेखक, बन गये एक्टर

इसे समय का फेर कहिये या किस्मत का करिश्मा कि मुफलिसी के दौर में दिलीप कुमार बनने तो गये थे लेखक, लेकिन बन गये एक्टर। किस्सा कुछ इस तरह से है। पिता के व्यवसाय में घाटा हो जाने के कारण उनको कॉलेज की पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी। उन्होंने पुणे के फौजी कैंटीन में मामूली नौकरी कर ली और फलों का व्यवसाय भी जारी रखा। मुंबई में यूसुफ अपने पिता के व्यवसाय को फिर से बढ़ाने की सोच ही रहे थे कि अब्बा ने उन्हें राय-मशविरे के लिए पारिवारिक मित्र डॉ. मसानी के पास भेजा। डॉ. मसानी को पता था कि यूसुफ की उर्दू अच्छी है और साहित्य में भी उनकी रुचि है, इसलिए उन्होंने उन्हें देविका रानी से मिलने की सलाह दी जो उन दिनों बॉम्बे टॉकीज का संचालन कर रही थीं। बॉम्बे टॉकीज उन दिनों प्रसिद्ध फिल्म निर्माण संस्था थी। यूसुफ ने देविका रानी से भेंट की और लेखक के रूप में काम मांगा। यूसुफ को देखकर उन्होंने उन्हें एक हजार रुपए प्रतिमाह पर अभिनेता के रूप में नियुक्ति दे दी। देविका रानी ने ही उन्हें अपना फिल्मी नाम दिलीप कुमार रखने की सलाह दी थी।

शुरू में घरवालों से छिपायी एक्टिंग

यूसुफ खान से दिलीप कुमार बने इस नये अभिनेता ने बॉम्बे टॉकीज में काम शुरू करने की बात अपने अब्बा को नहीं बतायी। अब्बा की फिल्मी लोगों के बारे में अच्छी राय नहीं थी। इसीलिये दिलीप कुमार ने घरवालों से झूठ बोला। उन्होंने अपने घर पर बताया कि वे ग्लैक्सो कंपनी में काम करने लगे हैं। अब्बा खुश हुए और फरमान सुनाया कि रोज ग्लैक्सो कंपनी के बिस्किट घर में लाना। क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से खाद्यान्न का बड़ी किल्लत थी और परिवार भी बड़ा था। इससे दिलीप कुमार एक नयी मुसीबत में फंस गए। ऐसे में कॉलेज का एक मित्र काम आया, जो शहर में जहां भी ग्लैक्सो बिस्किट मिलते दिलीप तक पहुंचा देता। एक दिन राजकपूर के दादा दीवान बशेशरनाथ ने इसका भंडाफोड़ कर दिया। कुछ समय नाराज रहने के बाद अब्बा ने यूसुफ को माफ कर दिया। दिलीप कुमार की फिल्म ‘शहीद’ उन्होंने परिवार के साथ देखी और फिल्म उन्हें पसंद आई। फिल्म का अंत देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए थे और उन्होंने यूसुफ से कहा था कि आगे से अंत में मौत देने वाली फिल्में मत करना। यह भी अजीब इत्तेफाक है कि ‘ट्रेजडी किंग’ कहे जाने वाले दिलीप कुमार ने फिल्मों में जितने मृत्यु दृश्य किए हैं, उतने शायद किसी अन्य भारतीय अभिनेता ने नहीं दिए। फिल्म फेयर अवार्ड में रिकॉर्ड बनाने वाले दिलीप कुमार को वर्ष 1995 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1991 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण की उपाधि से नवाजा। 1998 मे उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ भी प्रदान किया गया।

मोहब्बत भी हुई

दिलीप कुमार अपने जमाने के नंबर वन हीरो थे। व्यक्तित्व आकर्षक था। स्वभाव रोमांटिक। मीना कुमारी और नरगिस से दिलीप कुमार के दोस्ताना ताल्लुकात थे। वैजयंतीमाला और वहीदा रहमान के साथ भी फिल्मों में उनकी भागीदारी अच्छी निभी, लेकिन उनके करीबी जानकारों के हवाले से कहा जाता है कि दो अभिनेत्रियों से दिलीप कुमार ने सचमुच प्यार किया। वे थीं कामिनी कौशल और मधुबाला। 1948 और 50 के बीच दिलीप-कामिनी ने चार फिल्मों में साथ काम किया था। कामिनी कौशल ब्याहता थीं। उनका वास्तविक नाम उमा कश्यप था। बड़ी बहन की असामयिक मृत्यु के कारण दीदी की छोटी बच्चियों की खातिर जीजा से विवाह करके मुंबई आ गई थीं। पति बन चुके जीजा ने कामिनी को फिल्मों में काम करने की आजादी दे रखी थी। सामाजिक ताना-बाना उस वक्त का ऐसा था कि दिलीप साहब और उमा ने अपने प्रेम को दबाया और जरा सी भनक लगने का अहसास हुआ तो कई सालों तक एक दूसरे के सामने भी नहीं पड़े। मधुबाला-दिलीप कुमार ने एक साथ सिर्फ चार फिल्में की। इनमें ‘मुगल-ए-आजम’ (1960) उनकी अंतिम फिल्म है, जिसे लोग इन दोनों की प्रेम कहानी के रूप में ही देखना पसंद करते हैं। दिलीप कुमार के जीवन में प्रेम संबंधों के कई नाटकीय मोड़ आये।

11 दिसंबर, 1922 को पेशावर (अब पाकिस्तान में) में जन्मे दिलीप साहब (यूसुफ खान) ने अभिनेत्री सायरा बानो से 1966 मे विवाह किया। विवाह के समय दिलीप कुमार 44 वर्ष के और सायरा बानो उनसे आधी उम्र की थीं। 1980 में उन्होंने असमा रहमान नाम की एक युवती से दूसरी शादी भी की, हालांकि यह ज्यादा नहीं चली।

46 साल बाद अमिताभ को मिला ऑटोग्राफ

यह बात शायद सबको अटपटी लगे कि उस दौर के बड़े अभिनेता का ऑटोग्राफ अमिताभ नहीं ले पाये थे। दिलीप कुमार का ऑटोग्राफ लेने के लिए अमिताभ को 46 बरस तक लंबा इंतजार करना पड़ा था। यह बात अमिताभ ने खुद अपने ब्लॉग पर लिखी है। बिग बी ने दिलीप साहब को पहली बार 1960 में देखा था। तब वह अपने पिता के साथ मुंबई गए थे। अमिताभ ने लिखा है कि उस समय साउथ बांबे के एक प्रसिद्ध रेस्तरां में वह अपने परिवार के साथ खानपान में जुटे थे कि उस समय के सुपर स्टार दिलीप साहब अंदर आए और अपने कुछ मित्रों से बात करने लगे। अमिताभ, दिलीप कुमार का ऑटोग्राफ लेने के लिए इतने उतावले थे कि रेस्तरां से निकले और भागकर पास की एक स्टेशनरी की दुकान से ऑटोग्राफ बुक खरीद लाये। हांफते हुए वह रेस्तरां के अंदर घुसे और डरते हुए दिलीप साहब के पास पहुंचे। ऑटोग्राफ लेने के लिए बुक उनकी ओर बढ़ा दी। दिलीप साहब की नजर इस बच्चे पर नहीं पड़ी। ब्लॉग में अमिताभ लिखते हैं कि कुछ ही समय बाद दिलीप साहब वहां से चले गये, उन्हें ऑटोग्राफ नहीं मिल पाया। धीरे-धीरे समय गुजरता गया। अमिताभ हिंदी सिनेमा के नए सुपरस्टार बन गए। इस बीच अमिताभ को दिलीप साहब के साथ एक फिल्म में काम करने का मौका मिला। रेस्तरां की घटना के बाद अमिताभ ने दिल्ली में तीन मूर्ति भवन में दिलीप साहब को देखा जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कलाकारों के सम्मान में पार्टी दी थी। उस समय बच्चन परिवार के नेहरू परिवार से बेहद घनिष्ठ संबंध थे और बच्चन परिवार को भी आमंत्रित किया गया था। यहां अमिताभ ने राज कपूर, देव आनंद तथा दिलीप साहब को एक साथ पहली बार देखा था। अमिताभ लिखते हैं कि समय बीत गया। 2006 में वडाला के आईमैक्स में उनकी फिल्म ‘ब्लैक’ का प्रीमियर था। फिल्म समाप्ति के बाद बाहर इंतजार कर रहे दिलीप साहब के पास अमिताभ गये। उन्होंने अमिताभ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। अमिताभ लिखते हैं, ‘उसके दो दिन बाद मुझे दिलीप साहब का एक खत मिला, जिसमें मेरी एक्िटंग की तारीफ की हुई थी। इसी खत में नीचे दिलीप कुमार के दस्तखत थे।’

राजनीति से हुआ मोहभंग

भले दिलीप साहब लंबे समय तक कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सांसद रहे, लेकिन राजनीति में उन्होंने लंबी दिलचस्पी नहीं दिखायी। यह अलग बात है कि उन्होंने कई बार नेताओं का प्रचार किया। इस सबके बावजूद जवाहरलाल नेहरू, शाहनवाज खान, मौलाना आजाद और फखरुद्दीन अली अहमद से उनके अच्छे रिश्ते रहे। सन 1980 में दिलीप कुमार को मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया।