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Monday, July 11, 2022

इतना आसान भी नहीं 'होम मेकर' की भूमिका

 केवल तिवारी

कभी गृहिणी, कभी घरवाली और कभी हाउस वाइफ के पद से नवाजी जाने वाली महिला का काम सचमुच बहुत आसान नहीं है। इसी कठिनाई को ध्यान में रखते हुए कुछ लोगों ने इस पद को 'होम मेकर' बना दिया। होम मेकर शब्द थोड़ा सम्मानजनक लगता है। ऐसे में इस सम्मानजनक पद को अनचाहे तौर पर इन दिनों मुझे भी संभालना पड़ा। कहानी लंबी है, शुरुआत संक्षेप से करता हूं। एक दुर्घटना में पत्नी के दाएं हाथ की हड्डी टूट गयी। 
प्लास्टर लगने के बाद उदास भावना


पहले सलाह मिली कि कोई मेड रख ली जाए। फिर सलाह में संशोधन हुआ कि मेड तो एक या दो घंटे के लिए आएंगी फिर कुछ 'रिस्टिक्शंस' भी हैं कि खाना खुद बनाना होगा वगैरह-वगैरह। फिर कहा गया कि किसी रिश्तेदार को बुला लें, रिश्तेदार को बुलाने की बात पर सीधे प्रेमा दीदी की याद आई। लेकिन वह कैसे आ सकती है, उस पर तो खुद ही दुखों का पहाड़ टूटा पड़ा है। उसकी याद सबसे पहले इसलिए आई कि न जाने कितनी बार उसने हमारी गृहस्थी की गाड़ी को सामान्य बनाने में मदद की है। उससे पहले हमेशा मां का साथ रहा। खैर... बात बहुत लंबी हो जाएगी क्योंकि जब मां का जिक्र होगा तो सारा मंजर सिमट जाएगा।
फाइनली पत्नी भावना की भाभी ममता जोशी जी ने वालिंटियरी काठगोदाम से आना स्वीकार कर लिया। इसके बावजूद कि वह खुद भी अस्वस्थ हैं, घर में उनकी उपस्थिति बनी रहनी आवश्यक है। पहले मैं उन्हें न बुलाने पर पूरा जोर डाल रहा था, लेकिन नौकरी के साथ गृहस्थी की गाड़ी भी खींचने में दिक्कत आई तो मैंने भी पत्नी से कह दिया कि बुला ही लो। वह आ गयीं। कुछ दिन मुझे काम का पता नहीं चला। सब काम समय पर हो रहे थे। लेकिन आखिरकार उन्होंने हमारा ख्याल रखा तो हमें भी उनका ख्याल रखना था और हमने उन्हें सस्मान काठगोदाम भेज दिया। पत्नी के हाथ का प्लास्टर कट चुका था और गरम पट्टी लगाने एवं सिकाई करने की ताकीद की गयी थी। इसी दौरान डॉक्टर ने सलाह दी कि फिलहाल प्रभावित हाथ से कोई काम न करें। यानी अभी काम मुझे करना ही था। तीन दिन में ही पता चल गया कि सचमुच 'होम मेकर' का काम कितना कठिन है। इतने कठिन काम को इतनी सहजता से कर लिया जाता है। 
मनसा देवी मंदिर प्रांगण में अपनी भाभी संग प्रसन्न मुद्रा में।


मुझे याद आता है घर के बड़े लोगों की जिन्होंने भरे-पूरे परिवार का दायित्व भी संभाला और हंसी-खुशी संभाला। साथ ही कई जानकारों के बारे में पता है कि कैसे कामकाजी महिलाएं घर का सारा काम करती हैं और साथ में जॉब भी। ऐसी महिलाओं को तो सैल्यूट है। खैर जब महिलाओं को सैल्यूट की बात आती है तो पत्नी को एक सैल्यूट इस बात का बनता है कि उन्होंने बाएं हाथ से काफी काम करना शुरू कर दिया है। मानो कह रही हो, तुम इतना परेशान मत होओ कई काम निपटाना तो हमारे बाएं हाथ का खेल है। फिर फरीदाबाद में भव्य की वह बात भी तो स्मरणीय है जब उसने कहा, बुआ आप कुछ दिनों के लिए हमारे पास आ जाओ, ताकि फूूूफा जी को भी पता चले कि पत्नी के बगैर कितनी दिक्कत होती है। हंसी मजाक। खैर भावना के जल्द स्वस्थ होने की कामना के साथ। चूंकि बात घर-गृहस्थी, मां-बहन और पत्नी पर घूमी तो हर बार की तरह इस बार भी ऐसी देवियों को समर्पित कुछ शेर जिन्हें इधर-उधर से टीपा है-

कोई टूटे तो उसे सजाना सीखो, कोई रूठे तो उसे मनाना सीखो …
रिश्ते तो मिलते है मुकद्दर से, बस उसे खूबसूरती से निभाना सीखो … ।।

जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है, माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।

दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूँ, कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए।

चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है, मैंने जन्नत तो नहीं देखी है, माँ देखी हैै

शरीफ़े के दरख़्तों में छुपा घर देख लेता हूँ, मैं आँखें बंद कर के घर के अंदर देख लेता हूँ।

उसने सारी कुदरत को बुलाया होगा, फिर उसमें ममता का अक्स समाया होगा,
कोशिश होगी परियों को जमीन पर लाने की, तब जाके खुदा ने बहनों को बनाया होगा।

सफ़र वही तक हैं जहाँ तक तुम हो, नजर वहीं तक हैं जहाँ तक तुम हो,
हजारों फूल देखे हैं इस गुलशन में मगर, ख़ुशबू वही तक हैं जहाँ तक तुम हो।

Tuesday, June 28, 2022

रेलवे ई टिकट... और झांसे से बचिए

केवल तिवारी

हो सकता है कि आप लोगों को रेलवे के नियमों का पता हो। यह भी हो सकता है कि आप लोगों में से कई लोग मेरे जैसे अनाड़ी हों। जो भी हो झांसे से बचिएगा। अक्सर सुनता था कि यह सरकार कदम दर कदम कुछ ऐसा कर रही है कि आपको पता नहीं होता और आपकी जेब चुपचाप कट चुकी होती है, लेकिन कहते हैं न कि 'बात समझ में तब आई, जब खुद पर बीत गई।'
आईआरसीटीसी से आया जवाब


असल में 5 जून को भतीजे की शादी के लिए लखनऊ जाना था। महीनेभर पहले ईटिकट लिया। वेटिंग का। लोगों ने उम्मीद जताई कि शायद कनफर्म हो जाए। कुछ 'जुगाड़' की भी व्यवस्था की, लेकिन कुछ काम नहीं आया। कुछ लोगों ने तत्काल टिकट कराने की सलाह दी। ऐन मौके पर उसकी कोशिश की तो पता चला कि तत्काल में भी कई तत्काल हैं। प्रीमियम और पता नहीं क्या-क्या? खैर.... अपनी स्थिति तो वही है
जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
चंडीगढ़ से लखनऊ की ट्रेन में तीन लोगों के लिए कराया गया रिजर्वेशन (वेटिंग) आखिरकार ऐन मौके पर आरएसी हो गया। (पीएनआर नंबर 2341282924) दो लोगों का आरएसी हुआ और तीसरा टिकट वेटिंग ही रहा। एक नंबर पर अटक गया। यानी वेटलिस्ट नंबर एक। मैंने हमेशा की तरह रेलवे पर भरोसा करते हुए जाने का फैसला किया और बेटे धवल जिसका टिकट कनफर्म नहीं हो पाया यानी वेटलिस्ट एक था, उसके लिए काउंटर टिकट ले लिया। किसी तरह एक ही सीट पर बैठकर पूरी रात गुजारी। रात में एक दो लोगों से बात हुई और इस बात पर मैंने आश्चर्य जताया कि आरएसी तो दो ही लोगों का है, लेकिन टीटीई ने बच्चे के टिकट के बारे में क्यों नहीं पूछा। एक - दो लोग हंसते हुए बोले, 'आपने टिकट लिया है ना इसलिए, अगर नहीं लिया होता तो जरूर पूछता।' मैंने भी उनकी बात में हामी भरी। खैर हम लोग पहुंच गये। गनीमत है कि 13 तारीख को वापसी का टिकट कनफर्म था। कुछ दिन इंतजार के बाद भी जब ईटिकट वेटलिस्ट का पैसा नहीं आया तो मैंने अपने मित्रों से बात की। उन्होंने भी कहा कि पैसा तो वापस आ जाना चाहिए था। मैंने फिर आईआरसीटीसी को एक मेल कर दिया। एक दिन बाद मेल का जवाब आया। उसका लब्बोलुआब यह था कि एक नये अधिनियम के तहत नियम बदल गए हैं। अगर टिकट में से किसी का भी आरएससी या कनफर्म हुआ है तो बाकी का पैसा तभी आएगा जब आप ट्रेन छूटने से तीन घंटे पहले उसे कैंसल कराएंगे और एक फॉर्म भरकर देंगे। नहीं तो कोई पैसा नहीं मिलेगा। अब यह नियम कब बन गया, कितनों को पता है, नहीं मालूम। मेरे संपर्क के तो ज्यादातर लोगों को इसका पता नहीं। मैं बेवकूफ था, काउंटर टिकट भी लिया, परेशानी भी झेली और रेलवे वालों ने भी बेवकूफ साबित किया। आप लोगों को भी ऐसी दुश्वारी न झेलनी पड़े, सावधान रहें। यह तो एक बानगी भर है, मामले न जाने कितने होंगे। बात छोटी सी है लेकिन कहनी जरूरी थी। क्योंकि
ख़ामोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है,
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।

Saturday, June 25, 2022

दीपू की शादी, खुशियों की सौगात

 केवल तिवारी

दीपू की शादी, खुशियों की सौगात।

शगुन की हल्दी, मेहंदी की रात।

परिवार का संगम, अपनों से मिलन।

कुछ दौड़ धूप, कुछ बातें-वातें।

चाय की चुस्की, व्यंजन का स्वाद।

पूजा-पाठ और पूर्वजों की याद।

ऐसे ही नजारे रहे प्रिय भतीजे दीपू की शादी के। भावनाओं के उमड़-घुमड़ के बीच तीखी धूप में भी कोई थकान नहीं। खुशियों के इस मौके पर भाभीजी-दाज्यू और प्रिय भतीजी कन्नू का उत्साहपूर्वक अतिथियों का स्वागत और अतिथियों का भरपूर सहयोग सचमुच दिल को छूने वाला नजारा रहा। रिजर्वेशन की मारामारी के बीच डेढ़ घंटे ट्रेन के विलंब के बीच 6 जून को जब हम लखनऊ पहुंचे तो एकदम तरोताजा। ठीक एक महीने पहले भी तो लखनऊ पहुंचा था जब मेरे पहुंचते ही आनन-फानन में दुल्हन (जया) को टीके का कार्यक्रम बनाया गया। उसी दिन दीपू के ससुराल पक्ष से मुलाकात हुई। गजब संयोग है कि दोनों समधी समान नामराशी के हैं। दोनों का नाम भुवन चंद्र। खैर...। बड़े बेटे कार्तिक का मन बहुत था कार्यक्रम में शामिल होने का, लेकिन उसकी पढ़ाई की व्यस्तता के चलते वह हॉस्टल में ही रहा। जिस दिन हम पहुंचे, उसी दिन दीपू (प्रमाणपत्र में नाम प्रदीप) के छोटे मामा विनोद जोशी जी का परिवार भी पहुंचा था। चूंकि पारिवारिक मित्रता के अलावा उनसे तब से प्रगाढ़ संबंध हैं जब से मैं नोएडा गया हूं। यानी लगभग 20 साल पुराना। हालांकि लखनऊ छोड़े हुए मुझे करीब 28 साल हो चुके हैं। चलिए बात फिर से खुशियों की सौगात पर आकर टिकाते हैं। एक-दो दिनों बाद मेहमानों का आना शुरू हुआ। इस बीच, लखनऊ के स्थानीय निवासी भी आते-जाते रहे। कुछ को पहचान पाया, कुछ ने अपना परिचय खुद ही दिया। मैं सबको उसी तरह का लगा, जैसे पहले था, लेकिन मुझे बड़ा परिवर्तन दिखा, लोगों में भी और उस इलाके में भी। विकास की तेज रफ्तार पूरे इलाके में चल चुकी है। आगे वृंदावन कालोनी, फिर नये-नये रूट, सचमुच बहुत बदल गया था तेलीबाग। मैं और कन्नू कई बार बाजार गए। कई बार अकेले भी गया। मन में उमंग, शादी की तरंग। दूल्हे राजा यानी हमारे भतीजेश्री 8 को लखनऊ पहुंचे। उसके बाद जाहिर है रौनक और बढ़नी ही थी और बढ़ी। गणेश पूजन, हल्दी आदि के कार्यक्रम होने लगे। धीरे-धीरे पारिवारिक लोग पहुंच रहे थे और हम सब आनंदित थे। सचमुच ऐसे कार्यक्रम कितने अच्छे होते हैं। 9 जून को दिल्ली से हमारे परिवार के अनेक लोग पहुंच गए। उनके पहुंचने पर खुशी का मंजर देखने लायक था। भतीजा दीप तिवारी, उसका परिवार, प्रकाश और उसका परिवार, आदरणीय बड़ी भाभी जी, बीना, मिन्नीनी, नीरा, प्रेमा और गौरव जी। वातावरण और आनंदमय हो गया।

नौ जून को सुआल पथाई का कार्यक्रम चला। उस दिन गीत-संगीत होते रहे और धार्मिक कार्यक्रम भी। इसी दौरान आवदेव आदि भी हुआ। यहां बता दूं कि हमारे यहां एक बेहतरीन परंपरा है कि हर शुभकार्य में आवदेव होता है, इसमें अपने पूर्वजों दादा-दादी, परदादा-परदादी आदि को याद किया जाता है। यही नहीं मातृ पक्ष से भी यह याद करने का सिलसिला चलता है। इसमें परनाना-परनानी आदि को याद किया जाता है। यह धार्मिक कार्य इस बात की सीख देता है कि हमने अपने से बड़ों का हमेशा सम्मान करना है। पारिवारिक माहौल इसी संदर्भ में बेहतरीन होता है कि बड़ों का सम्मान हो, उनके अनुभवों का लाभ लिया जाए और कुछ सीखा जाये। नयी पीढ़ी को यह समझाया जाये कि पूर्वज हैं तो हम है। खैर... इसी सुआल पथाई का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद उत्सव का प्रतीक माने जाने वाली महिला मंडली ने मेहंदी लगाई। कुछ लोग पहले ही मेहंदी लगा चुके थे। इस दौरान पूरे परिवार की महिलाओं के अलावा पड़ोस की बहुओं ने बढ़चढ़कर भाग लिया। कोई किसी को खाना खिला रहा है, कोई एक-दूसरे की मेहंदी की तारीफ कर रहा था।

हल्दी और गीत संगीत

कार्यक्रम के बीच में ही भतीजी कन्नू से मुझसे कहा, ‘चच्चा मैं चाहती हूं कि ऑरिजनल फूलों की मालाओं की लड़ियां लगाई जाएं।’ मैंने उसकी बात में हामी भरी। दीवाली पर मैं भी गेंदे के फूलों की लड़ियां जरूर लगाता हूं। एक फूलवाले से बात हुई और मालाएं लगा दी गयीं। इन मालाओं ने एक अलग रौनक दी। इसी दौरान मेहंदी और हल्दी का स्टेज भी लगा दिया गया। हल्दी वाले दिन सब लोग एक अलग ही रौनक में दिख रहे थे। जाहिर है पीला रंग खुशी का रंग है। हल्दी वाला रंग है। हम सबने पीले वस्त्र पहने थे। एक अलग खुशी झलक रही थी। इसी दौरान दिल्ली से भतीजा हरीश,  जवांई दर्शन जी और बच्चे प्रशांत, अमित आदि पहुंच गये। उनके आने के बाद खुशियां और बढ़ गयीं। दोपहर बाद महिला संगीत में एक अलग रौनक आई। गीतों का चयन। मैं और भतीजी गीतों को स्पीकर में लगाने लगे। हॉल में नृत्य का कार्यक्रम चला। साथ-साथ चाय-पकौड़े भी। इसी दौरान मेरे कई जानकार मिले। जल्दी-जल्दी में हालचाल लिए। प्रसन्नता व्यक्त की गयी।

शानदार विवाहोत्सव

ऊं ग्वेल देवताय नम:, भगवती माताये नम:, कुल देवियाये नम: सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:। आखिरकार वह घड़ी आई जब हमारा प्यारा भतीजा दूल्हा बना। हम सब सजधज के तैयार हो गये। ढोल बजने लगे। बारात प्रस्थान के लिए सब खड़े थे। दिल्ली से आए भतीजे के साथ आसपास के कुछ लोगों को गाड़ी में स्टीकर चिपकाने का काम दिया। बारात में चलने वाली महिला मंडली के लिए मिनी बस वहीं पहुंच गयी। पुरुषों के लिए बस थोड़ी दूर पर थी। इसमें अंतर का कारण सिर्फ गलियों का संकरी होना था। कुछ मित्र अपने वाहन ले आये। नाचते-कूदते हम लोग चल दिये, जया को बतौर दूल्हन अपने घर लिवाने। कल्याणपुरी के पास बारात पहुंची। शानदार स्वागत हुआ। कुछ देर वहां बैंड बाजे के साथ नाच-गाना हुआ। फिर धूलिअर्ग्घ। उसके बाद जयमाल फिर भोजन।  रात्रि में विवाहोत्सव के दौरान हंसी-मजाक। उधर से आ रही बोलियों का इधर से प्रतिउत्तर। बड़ा मजा आया। कभी कोई महिला दाज्यू के लिए प्रिय समधी जी कहतीं तो यहां से दाज्यू के माध्यम से हम लोग जवाब देते। कभी कुछ तो कभी कुछ। साथ में पूजा-अर्चना। उनके पंडित जी से मेरी मुलाकात महीनेभर पहले ही हुई थी, इसलिए बातचीत हुई। इधर आदरणी पूरन तिवारी जी पुराने जानकार। 







मंत्रोच्चार में भानजे आचार्य नवीन पांडे नानू ने भी खूब रंग जमाया। कुल मिलाकर पूरी रात कब निकल गयी पता ही नहीं चला। इस कार्यक्रम में कुछ फोटो शानदार बनीं। जैसे प्रिय भतीजी प्रेमा का निर्मला और कन्नू के साथ मेरा फोटो खिंचवाना। कभी कन्नू का अपनी मम्मी, चाची और दिल्ली से आईं बहुओं संग फोटो। सचमुच ऐसे शुभकार्यों में ऐसी रौनक भीतर से प्रफुल्लित कर देती है। ईश्वर प्रदीप (दीपू) और जया को खूब प्रसन्न रखे। हम सबका आशीर्वाद है। यहां कुछ फोटो और वीडियो साझा कर रहा हूं। आप लोग देखिए, सुनिये आनंद लीजिए।



Wednesday, June 15, 2022

सुनना सीखिए... ज्ञान की गंगा और कर्णधारों से मिलन का सार्थक प्रयास

 केवल तिवारी

मुझे विलंब हो गया। जिस प्रकरण का यहां जिक्र कर रहा हूं, उसके बाद तो हमारे धन संग्रह परिवार की एक बैठक और हो चुकी है। लेकिन खुद को समझाने जैसी कवायद कि चलो देर आयद, दुरुस्त आयद। बात है 8 मई, 2022 की। बेंगलुरू से विनोद पांडे जी ने पहले से कार्यक्रम बनाकर मेरी राय ली, मैंने धन संग्रह परिवार से और हो गया कार्यक्रम तय। कौन कैसे और कहां से में बात लंबी हो जाएगी... इसलिए आते हैं असल मुद्दे पर। बैठक हमने सबकी सहमति से सार्थक प्रयास के पुस्तकालय में की। यह इच्छा विनोद पांडे जी और मेरी थी। सामाजिक संगठन सार्थक प्रयास के अध्यक्ष उमेश पंत जी ने कहा कि जब बच्चों से मुलाकात का कार्यक्रम तय ही है तो क्यों न हम उनसे कुछ अनौपचारिक बातचीत भी कर लें। इत्तेफाक से उस दिन मदर्स डे था। सबने अपनी भावनाओं को अपने ढंग से व्यक्त किया। इस दौरान बच्चों की जिजीविशा को देखकर बहुत कुछ सीखने को मिला। प्रसंगवश बता दूं कि इस ब्लॉग को इतना विलंब हो गया कि इसी दौरान खबर आई कि सार्थक प्रयास का एक बच्चे रोहित की जॉब लग गयी है और जॉब लगने के बाद वह सबसे पहले सार्थक प्रयास के अपने जानकारों से मिलने आये। मेरी दुआ है कि ऐसे ही अनेक बच्चे आगे बढ़ें और पीछे से आ रहे बच्चों के लिए कुछ न कुछ योगदान करें। खैर... पिछली बात को आगे बढ़ाते हैं।

बच्चों के साथ बातचीत के दौरान पुनीत भट्ट जी और ममगाई जी का भावुक होना एकदम अलग अहसास कराने वाला था। एकदम अलग अंदाज में दिख रहे हमारे भाई भुवन चंद्र सती ने भी बेहतरीन तरीके से बच्चों का हौसला बढ़ाया। मेरे अग्रज हीराबल्लभ शर्मा जी ने बच्चों को बहुत सी प्रेरक बातें बताईं जिनमें से मुझे जिस बात ने सबसे अधिक प्रभावित किया, वह था सुनने की क्षमता को बढ़ाना। उन्होंने कहा कि आलोचना भी करें, निंदा भी करें लेकिन पहले सुनने की क्षमता को विकसित करें। सुनेंगे नहीं तो उसकी अच्छाई या बुराई का विश्लेषण कैसे करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने मेहनत, लगन की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। भास्कर जोशी, सिद्धांत सतवाल, चंदन दा, विनोद जी, उमेश पंत जी, पांडे जी, संजय वर्मा जी, रघुबर सिंह जी, प्रकाश पंत जी आदि ने बच्चों के साथ सार्थक बात की। साथ ही यह भी कहा कि बहुत कुछ इन बच्चों की बातों से भी सीखने को मिला है। मां पर कुछ भावुक टिप्पणियां हुईं और कुछ अन्य कवियों की बातें। थोड़ा विलंब होने पर हर बच्चे का नाम और रचना स्मृति पटल पर नहीं है, लेकिन यकीनन यह संवाद बहुत शानदार रहा। सार्थक प्रयास के बच्चों और पंत जी का विशेष आभार। अधिकतम लोग मौजूद रहे, इसलिए आनंद दोगुना हो गया। कुछ अन्य बातें हैं जिन्हें एक कहानी के रूप में आगामी ब्लॉग में साझा करूंगा। इस ब्लॉग के साथ उस दिन की कुछ फोटो साझा कर रहा हूं।








Thursday, May 19, 2022

घुमंतू जनजातियां... बात सिर्फ इतनी सी नहीं है

 केवल तिवारी

घुमंतू जनजातियों के बारे में आप कुछ जानते होंगे। शायद यह भी कि अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें और भी कई उपनामों से जाना जाता है। हो सकता है इतिहास खंगालने की कोशिश में आप कुछ और जान गए होंगे, लेकिन इन सबसे भी इतर इनके बारे में कई बातें हैं। कुछ पुराने समय की और कुछ वर्तमान की। ज्यादातर बातें हैं रौंगटे खड़े करने वालीं। इनके संबंध में पिछले दिनों एक अनौपचारिक परिचर्चा में चर्चा हुई। घुमंतू जनजातियों के जीवन के संबंध में लंबे समय से काम कर रहे अनिल जी ने बताया कि अंग्रेजों ने इनके संबंध में कड़ा कानून बनाया। इन्हें अपराधी घोषित किया गया। किसी व्यक्ति को जन्म से ही अपराधी मानने वाली अंग्रेजी मानसिकता का यह जहर आजाद भारत में भी बहुत लंबे समय तक चलता रहा, बल्कि यूं कहें कि अब भी कई जगह है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कुछ जगह इनकी स्थिति सुधारने की कोशिश हुई। इस कोशिश में अंग्रेजों के जमाने का वह कानून तो हटाया गया जिसमें इन्हें जन्मजात अपराधी घोषित किया गया था, लेकिन इन्हें आदतन अपराधी बताया गया। इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि घुमंतू जनजाति के इन लोगों को पुलिस जब-तब पकड़ लेती। कई जगह तो हद ही हो गयी। अपराध कोई और करता, लेकिन जब पुलिस किसी को पकड़ने में फेल रहती तो इनके समाज से किसी व्यक्ति को अरेस्ट कर लिया जाता। अनिल जी ने बताया कि लंबे प्रयासों के बाद हरियाणा में इनके समाज के लिए बहुत कुछ किया गया। आलम यह है कि आज हर राजनीतिक पार्टी का ‘घुमंतू जनजाति प्रकोष्ठ’ है। केंद्र सहित कई राज्य सरकारों ने इन्हें आदतन अपराधी कानून को निरस्त किए जाने के मुद्दे पर विचार शुरू कर दिया गया है। इसके लिए बाकायदा आयोग गठित किया गया।

घुमंतु, अर्धघुमंतु और विमुक्त समाज

इस समुदाय के लोग सरकारी दस्तावेजों में तीन तरह के होते हैं। एक घुमंतु, दूसरे अर्धघुमंतु और विमुक्त। घुमंतु तो वे हैं जो हमेशा यहां से वहां चलते रहते हैं और अर्ध घुमंतु वे हैं जो कुछ समय तक एक जगह ठहरते हैं या उनका परिवार ठहरता है और कमाऊ पुरुष इधर से उधर जाते रहते हैं और विमुक्त वे हैं जिन्हें कठोर कानून से छुटकारा मिल चुका है। इस संदर्भ में बता दें कि संसद में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री कृष्णपाल सिंह गुर्जर ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान बताया कि राष्ट्रीय विमुक्ति घुमंतु तथा अर्धघुमंतु जनजाति आयोग की अंतरिम रिपोर्ट में आदतन अपराधी अधिनियम को निरस्त करने का सुझाव दिया गया है। द्रमुक सदस्य तिरुची शिवा के सवाल पर गुर्जर ने बताया कि देश के तमाम इलाकों में इन जनजातियों को आदतन अपराधी की नजर से देखा जाता है इसलिए पुराने समय से चले आ रहे इस कानून की वजह से इन समुदायों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करना मुश्किल हो रहा है। गुर्जर ने बताया कि साल 2005 में गठित आयोग की 2008 में पेश रिपोर्ट में इस बारे में कोई संस्तुति नहीं की गई थी। इस समस्या को देखते हुए 2015 में फिर से इस आयोग का गठन किया गया। मनोनीत सदस्य के टी एस तुलसी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के हवाले से आदतन अपराधी कानून निरस्त करने की सिफारिश के पूरक प्रश्न के जवाब में गुर्जर ने कहा नवगठित आयोग की जुलाई 2017 में पेश अंतरिम रिपोर्ट में भी इसे निरस्त करने की संस्तुति की गई थी। सरकार भी इस कानून को निरस्त करने के पक्ष में है।

हरियाणा में उत्थान के लिए व्यापक प्रयास

हरियाणा सरकार इन्हें आदतन अपराधी के दायरे से बाहर ले आई है। इस संबंध में बने एक्ट में प्रदेश में 26 जातियां शामिल हैं तथा प्रदेश में करीब 20 लाख आबादी है। असल में घुमंतू जातियों पर आदतन अपराधी एक्ट अंग्रेजों द्वारा थोपा गया था, जिसकी वजह से विमुक्त घुमंतू जातियां देश आजाद होने के बाद भी अपराधी होने का दंश झेल रही हैं। इन जातियों में शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, रोहतक, पानीपत, करनाल, रेवाड़ी, फरीदाबाद कुरुक्षेत्र में काफी काम चल रहा है।

वकील पारधी किताब और एक खौफनाक सच

अनौपचारिक चर्चा के दौरान पता चला कि इन जनजातियों में एक समुदाय ऐसा भी है जिसमें लड़कियों से देह व्यापार कराया जाता है। इस समाज में सामान्यत: महिलाओं का ही वर्चस्व होता है। इस समाज के लोग पको कुछ काम करते दिख जाएंगे। मसलन-सब्जी बेचना, सड़क किनारे पानी बेचना, जूते पॉलिश करना, लेकिन असल में ये ग्राहकों से बातचीत करने के लिए यह सब करते हैं। यह पूछने पर कि क्या किसी लड़की ने प्रतिरोध नहीं किया, बताया गया कि अब तक ऐसा मामला सामना आया नहीं क्योंकि उनकी ग्रूमिंग ही ऐसी हुई है, लेकिन अब स्वास्थ्य, सफाई को लेकर इन लोगों में जागरूकता आ रही है। बातों के दौरान मुझे लक्ष्मण गायकवाड़ की किताब वकील पारधी की याद आई। मैंने यह किताब समीक्षार्थ पढ़ी थी। उसमें इसी समुदाय के लोगों का खौफनाक सच उकेरा गया है। पहले मुझे उस किताब में कुछ नाटकीय मिश्रण लगा, लेकिन अब पता चला कि सचमुच कितना दंश झेलता आ रहा है यह समाज। हालांकि कुछ लोगों के कारण बदनामी का दौर अभी भी जारी है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि ये राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ेंगे।

Thursday, May 5, 2022

ज्योति की छवि, मधु मैडम और मदर्स डे

 डॉ. ज्योति अरोड़ा

मैं अपने छोटे मुख से कैसे करूं तेरा गुणगान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


भाव यही हैं, शब्दों में बयां मैं कर रही हूं। बात कर रही हूं अपनी बच्ची छवि की। यह मौका है मां की फीलिंग को समझने का। मदर्स डे। यूं तो हर दिन मां का होता है, लेकिन इस हर पल हर दिन के संबंध को किसी एक दिवस के रूप में मनाने का मौका हो तो क्यों न इसे अनुभव किया जाये। मेरी बच्ची छवि अभी छोटी बच्ची है, जैसा कि कहते हैं न कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, सचमुच उसी सच्चाई से घर से बाहर यानी स्कूल में मां जैसी टीचर मिलीं मधु। मधु मैडम को वह कितना प्यार करती है, इसका अंदाजा तब लगा जब उसकी क्लास बदल गई। टीचर बदल गई। स्कूल के ऐसे नियम शायद बच्चों के हित में ही बनते होंगे। जैसे कि ट्रांसफर के नियम। खैर, बच्ची हैै, परेशान हो गयी। उसके इस लगाव को देख अनायास ही चंद पंक्तियां निकल पड़ीं-



घर से स्कूल के लिए निकली नन्ही जान
छवि ने मधु मधुर में जैसे पा लिया अपना जहान
मुझे लगता मानो मिला हो खुशियों का आसमान
मदर्स डे पर दो-दो बधाइयां देती हूं
ये मेरी अरमानों की ज्योति और वो मधु सी मुस्कान।
मधु मैडम



नन्ही बिटिया छवि की जो भावनाओं को समझ सकी, वो उपरोक्त चंद पंक्तियों की मानिंद ही है। पता नहीं क्या था कि उसमें स्कूल का खौफ नहीं था। निश्चित रूप से यह खौफ इसलिए नहीं था कि स्कूल का वातावरण बहुत शानदार था। लेकिन उससे भी ज्यादा इसलिए कि छवि को मां सरीखी टीचर मधु मिली थीं। वह कितनी तो बातें शेयर करतीं। जब इस टीचर से थोड़ी सी दूरी बन गयी तो वह टूट सी गयी। घर में मेरे साथ प्यार और मनुहार, लेकिन स्कूल में वह ढूंढ़ती रहती मधु सी दुलार। खैर जीवन चक्र में ऐसे बदलाव आते रहते हैं, लेकिन बच्ची की ओर से मदर्स डे पर दो-दो बधाइयां। मधु जी को बहुत-बहुत साधुवाद। आप यूं ही हंसते रहिए, मुस्कुराते रहिए।
कुछ पंक्तियां पेश हैं, इन भावनाओं के समान में

घुटनों से रेंगते-रेंगते, कब पैरों पर हो गई खड़ी
तेरी ममता की छाँव में, जाने कब होने लगी बड़ी
 काले टीके के साथ, टीकों का रखा ध्यान
तेरे लाड़ को मां कोटि कोटि सम्मान
खाना पीना और दूध मलाई
आज भी सब कुछ वैसा है,
मैं ही मैं हूँ हर जगह,
माँ प्यार ये तेरा कैसा है?
सीधा-साधा, भोला-भाला,
मैं ही सबसे अच्छी हूूं
कितना भी हो जाऊं बड़ी,
मैं तो तेरी बच्ची हूं।


हम बड़े हुए तो क्या हुआ। मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हो तो बच्चों की बातों के जरिए ही सही। 
मधु मैडम का मधुर प्यार आज बना भावुक अंदाज
ज्योति की ऐसी छवि बनी कौन खुश और नाराज।
धन्यवाद।

Wednesday, April 27, 2022

महाभारत का संजय, पत्रकार धर्म और प्रो कुठियाला, केजी सुरेश व विजय क्रांति की खास बातें

 केवल तिवारी

महाभारत का एक महत्वपूर्ण किरदार है संजय। उसका झुकाव पांडवों की ओर है, लेकिन जब वह अपना काम करता है यानी धृतराष्ट्र को युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाता है तो उसकी वाणी में कोई अंतर नहीं होता। जब अभिमन्यु बध का दृश्य होता है तब भी वह शांत स्वभाव से सबकुछ बताता है और जब दुर्योधन का बध होता है तब भी। यानी पहले न तो उसके स्वर में कोई पीड़ा झलकती है और न ही बाद में खुशी। उसका धर्म और कर्त्तव्य सूचना देना था। वह समावेशी भाव से ऐसा कर रहा था। यही एक पत्रकार का धर्म भी होता है। उसे निष्पक्षता बनाये रखते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा, साथ ही समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह तय करे कि मीडिया किस तरह का हो। खासतौर से आज के बदले परिप्रेक्ष्य में समाज का यह दायित्व और बढ़ जाता है। इस तरह की बातें पिछले दिनों हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद, पंचकूला के अध्यक्ष प्रोफेसर बृज किशोर कुठियाला ने कहीं। 



कुठियाला एक संगोष्ठी में बोल रहे थे। संगोष्ठी का विषय था 'समाज के प्रति मीडिया की जवाबदेही।' कुठियाला ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि मीडिया को समाज पोषित होना चाहिए। साथ ही यह भी चिंतन का विषय होना चाहिए कि समाज की मीडिया के प्रति क्या जिम्मेदारी है। इस संगोष्ठी का आयोजन वरिष्ठ पत्रकार एवं पत्रकारों के हक में लड़ाई रहते रहे श्याम खोसला की पहली पुण्यतिथि पर किया गया। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व कुलपति प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला ने श्याम खोसला को बौद्धिक योद्धा बताते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्र की परिभाषा, हिंदुत्व की व्याख्या और धर्म एवं रिलीजन पर अपनी अलग चिंतन पद्धति दी। श्याम खोसला के साथ दो किताबें लिखने वाले प्रो. कुठियाला ने कहा कि पत्रकारिता का धर्म क्या है और समाज के प्रति एक पत्रकार का दायित्व बोध क्या होना चाहिए, इस पर श्री खोसला का विशेष फोकस रहता था। उन्होंने श्याम खोसला के शब्द ‘बौद्धिक योद्धा।’ पर जोर दिया। उन्होंने पत्रकार का समाज को और समाज का मीडिया को बौद्धिक योगदान के महत्व को रेखांकित किया। कुठियाला ने कहा कि मीडिया को समाजपोषित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को उच्च मानदंडों पर ले जाने वाले बौद्धिक योद्धा के महत्व को आज का समाज समझे। इस कार्यक्रम में अन्य वक्ता भी रहे। वक्ताओं ने कहा कि खबर सही हो और उसके निर्माण में ईमानदारी बरती जाये, इसके लिए जरूरी है कि खबरनवीस जानकार हो और तथ्यों का महत्व समझता हो। साथ ही जरूरी है कि खबरों एवं पत्रकारिता के संबंध में राष्ट्रीय मीडिया पॉलिसी बने।  

संगोष्ठी में मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति केजी सुरेश, वरिष्ठ पत्रकार विजय क्रांति रहे। कार्यक्रम में हरियाणा के शहरी निकाय मंत्री डॉ कमल गुप्ता ने फोन के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए। पूर्व मंत्री एवं हरियाणा के मुख्यमंत्री से संबद्ध कृष्ण बेदी ने बातचीत की शुरुआत करते हुए बताया कि किस तरह हरियाणा सरकार ने पत्रकारों के हित में अनेक कदम उठाये हैं। वरिष्ठ पत्रकार विजय क्रांति ने कहा कि आज परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। प्रतिस्पर्धा की गलाकाट लड़ाई में गलती होने की आशंका तो अनेक हैं ही, साथ ही चुनौतियां भी अपार हैं। उन्होंने कहा कि सूचना एकत्र करने में ईमानदारी की दरकार है। साथ ही सूचना एकत्र करने वाले पत्रकार को खुद भी इतना ज्ञानशील होना चाहिए कि उसे इस बात का भान हो कि उसकी जरा सी चूक बहुत बड़ी वारदात का कारण भी बन सकती है। उन्होंने कहा कि समाज के प्रति जवाबदेही सिर्फ मीडिया की नहीं, बल्कि समाज को भी मीडिया के प्रति जवाबदेह होना होगा। समाज को तय करना होगा कि उसे कैसी मीडिया चाहिए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति केजी सुरेश ने नेशनल मीडिया पॉलिसी बनाये जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने तथ्यों के सटीक होने पर जोर दिया। इस मौके पर श्याम खोसला के साथ लंबे समय तक काम कर चुके एवं उनके साथ कई मौकों पर साथ रहे वरिष्ठ पत्रकार वीपी प्रभाकर, बीडी शर्मा, डॉ केएस आर्य ने भी अपने विचार रखे। मंच संचालन वरिष्ठ पत्रकार अशोक मलिक ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सीजेए के अध्यक्ष दीपक वाशिष्ठ एवं इंडियन मीडिया सेंटर-चंडीगढ़ के राकेश शर्मा ने किया। सभी वक्ताओं ने श्याम खोसला की विभिन्न खूबियों के बारे में बताया और उनके बताए मार्ग पर चलने की जरूरत पर बल दिया।
कुछ लिंक भी शेयर कर रहा हूं।

The ForeFront :
https://youtu.be/3BXcvageBFo

https://youtu.be/EwzcviRSXy4

https://youtu.be/E87u5ASiPC8

Sunday, April 24, 2022

मयंक की शादी : भांजियों का समागम और संत सरीखी उपस्थिति

केवल तिवारी

भांजियों के इस समागम में संत सरीखी उपस्थिति रही। अनेक परिजन ऐसे थे जिनसे 20-25 साल के अंतराल में मुलाकात हुई। किस्मत से मेरी पांच भांजियां हैं और इतने ही भांजे। किस्मत के एक कदम आगे की बात कि इस बार बड़ी भांजी के बेटे ललित मोहन उर्फ मयंक की शादी थी। लता और हरीश पंत जी का फोन महीनेभर पहले आ गया था। 15 अप्रैल की दोपहर जब हल्द्वानी के कठघरिया स्थित उनके निवास स्थल पर पहुंचा तो मन प्रसन्न हो गया। 

दादी और नानी के साथ दूल्हा मियां। साथ में भाई


भांजियों, उनके पतियों और बच्चों से तो मुलाकात हुई ही, उस दीदी से विशेष मुलाकात हुई जिसके नाती की आज शादी थी। यानी विमला दीदी। जाहिर है दीदी के करीबी अनेक लोगों से मिला। चूंकि मेरे जीवन में शाहजहांपुर का दो साल का निवास एक अहम पड़ाव वाला है, इस लिहाज से वहीं से दीदीयों की ननदों और अन्य परिजनों से मिलने या बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ था, आज फिर उनमें से कई लोगों से मुलाकात हुई। समय तो काफी लंबा निकल गया, लेकिन बदलाव बहुत ज्यादा कहां आता है। मुझे भी अनेक लोगों ने पहचान लिया और मैंने भी उन्हें पहचाना। जानने-पहचानने के इस क्रम में हंसी मजाक भी चलती रही और कार्यक्रम भी संपन्न होते रहे। 



कुछ कार्यक्रमों से मैं पहली बार परिचित हुआ और इसे आत्मसात किया क्योंकि बदलते समय के साथ अगर कदमताल करते रहें तो उसमें हर्ज कैसा। जैसा कि परिवार के कुछ लोगों को हल्दी की रस्म के बाद दी गयीं विशेष टी शर्ट और उन पर लिखे कमेंट। पंत जी यानी दूल्हे के पिताश्री की टीशर्ट पर लिखा था ‘मैं सब जानता हूं।’ बन्ना भांजी जहां ‘मौसी ब्यूटीफुल थी’ वहीं उसके पति अनुज का पुष्पा स्टाइल ‘झुकेगा नहीं साला।’ वैसे इस कमेंट से मैंने इत्तेफाक नहीं रखा। रमा भांजी ‘बिंदास मौसी’ बनी तो उसके पति को ‘कभी-कभी खुद के जवान होने का गुबान था।’ वैसे संजय यानी हमारे प्रिय संजू हमेशा जवान हैं। उनका गांभीर्य स्वभाव मुझे भाता है। उनकी बेटी के कमेंट पर मैं पूरी तरह सहमत था। ‘एटीट्यूड क्वीन’ की तो आंखों से शरारत टपकती है। प्यारी है बच्ची। अविरल बाबू हैं ही स्मार्टी, ऐसे ही निक्कू आदि भी कमेंट के मुताबिक। लखनऊ से पहुंचे दूल्हेराजा के चाचा नित्यानंद जी वाकई वही कर रहे थे जो उन्हें कमेंट मिला था, ‘रिस्पोंसेबल चाचा।’ ऐसे ही दूल्हे के छोटे भाई वाकई ‘शर्मीला देवर’ लग रहे थे। वैसे मुकुल बाबू की एक जिम्मेदारी वाला भाव मुझे इतना भाया कि अब तक उसकी चर्चा करता हूं। वह हर रस्मो रिवाज पर दादी का हाथ पकड़कर उस समारोह स्थल पर लाना नहीं भूले। गुड मुकुल बेटे। फिर लखनऊ से पधारे पंडित नानू मामा का वह कमेंट तो सचमुच जोरदार था, ‘मामा का भौकाल, जय महाकाल।’ कमेंट की बातों के बीच प्रिय भांजे पंकज की पत्नी मनीषा और इनकी बिटिया अग्रणी के साथ नवीन पंडितजी उर्फ नानू की बिटियाएं रिद्धि-सिद्धि का भी जिक्र जरूरी है। मनीषा को मैंने बुलाकर प्रणाम करवाया। भीड़ थी, मैं लोगों को दिख नहीं रहा था। ऐसे भी अपने स्टैंडर्ड साइज के कारण दिख कहां पाता हूं। ऑफिस में भी जब कहा कि भांजी के बेटे की शादी में जाना है तो लोग गौर और हैरत से मुझे देख रहे थे। खैर जब मैं बच्चों से कह रहा था कि मैं तुम सबका नाना हूं तो अविरल बाबू आये और बोले, अगर आप इनके नाना हैं तो मेरे भी होंगे। मैंने कहा बिल्कुल। पैर छू लो और अपनी मम्मी का नाम बताओ। जैसे ही उसने बन्ना का नाम लिया मैं समझ गया इसी बच्चे को दिल्ली में नामकरण के बाद आज पहली बार यहां हल्द्वानी में देख रहा हूं। मनीषा के पिताजी से मिला और उनसे सीखा कि जिजीविषा बहुत जरूरी है। पूरे कार्यक्रमों में पंकज को मिस करते रहे। हालांकि उससे चैटिंग चलती रही। 



चार दीदीयां और फिर पांच भांजे एवं पांच भांजियां। बहुत सौभाग्यशाली हूं। साथ ही जीवन के अनेक किंतु-परंतु। खैर यहां ज्यादा जिक्र नहीं। भांजी रुचि उसके पति दीपेश, भांजी रेनु उसके पति कंचन और कंचन की माताजी से भी कार्यक्रम में मुलाकात हुई। इन मुलाकातों के बीच में अगर ससुराल का जिक्र नहीं करूंगा तो... तो... तो...। ससुराल वाले भी आए। उन्हें भी निमंत्रण था। लखनऊ प्रवास के समय से ही मेरे मित्र शेखर जोशी एवं उनकी पत्नी यानी हमारी भाभी भी पहुंची थीं। अच्छा लगा। खूब बातें हुईं। इस विशेष समारोह की बातें तो इतनी हैं कि न जाने कितना लिख जाऊं, लेकिन इसी लेख में कुछ फोटो भी तो साझा करूंगा जो खुद कहानी बयां करेंगे। लेकिन यह सच है कि सभी सज्जनों की मौजूदगी और हरीश पंत जी के पारिवारिक बौंडिंग ने भाव विभोर कर दिया। दूर-दूर तक के रिश्तेदार आए हुए थे। लता-हरीश जी को बहुत-बहुत बधाई।



और उर्मिला दीदी को विशेष धन्यवाद

सुआल पथाई वाली शाम भावना की थोड़ी तबीयत बिगड़ गयी। मैंने बन्ना से इसका जिक्र किया। उसने तुरंत पड़ोस में उर्मिला दीदी के यहां व्यवस्था कर दी। पंतजी एवं बन्ना लोगों की दोस्ती का असर तो होगा ही, उर्मिला दीदी का भी स्वभाव होगा कि उन्होंने खूब आतिथ्य सत्कार किया। सुबह गर्म पानी, बेहतरीन चाय से लेकर पूरे घर को हमारे हवाले करने जैसे उनके स्वभाव ने दिल जीत लिया। दो दिन बाद रिसेप्शन के मौके पर उन्होंने अपनी बहू से हमारी मुलाकात कराई। उर्मिला दीदी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना, बस यही कहना आप यूं ही हंसते-मुस्कुराते रहें, स्वस्थ रहें। थैंक्स ए लॉट।

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सुख-दुख दोनों जहां, जीवन है वो गांव... कहीं धूप तो कहीं छांव

जीवन चक्र है, यहां सबकुछ चलता है। शादी कार्यक्रम संपन्न होने के अगले दिन यानी रिसेप्शन वाले दिन नानू के ससुर जी का निधन हो गया। चारों तरफ ध्यान रखने वाली हमारी साहसी दीदी विमला दीदी नानू एवं उसके परिवार को लेकर वहां पहुंची। आवश्यक रस्में पूरी करवाईं। शाम को नानू मिला तो संवेदनाएं प्रकट कीं। मनीषा और नानू ने बताया कि कुछ दिन से वह ज्यादा ही कष्ट में थे। इसी आवागमन की बात पर बता दूं कि मैं शादी से पहले यानी 14 अप्रैल को सीधे चोरगलिया गया और वहां प्रेमा दीदी के गले लगकर एक बार फिर खूब रोया। कुछ दिन पहले तक जीजाजी रमेश चंद्र मिश्र जी  कहते थे हल्द्वानी में शादी में मिलेंगे। लेकिन इससे पहले ही वह अनंत यात्रा पर निकल गए। भावना, धवल के साथ था। वहां मनोज आदि खेती-बाड़ी भी समेट रहे थे और हर मौके पर जीजाजी को याद कर रहे थे। उधर, बातों-बातों में भतीजे बिपिन का भी जिक्र हो रहा था जिसकी बरसी अभी 20 अप्रैल को हुई है। ईश्वर से प्रार्थना है सबको शक्ति देना। महामारी के इस रूप को अब खत्म करना।

Saturday, April 9, 2022

कुछ तो लोग कहेंगे ... आशीष सर से मुलाकात का संयोग और योग

 केवल तिवारी

बहुत लंबे समय बाद स्कूल में चहल-पहल दिखी। चंडीगढ़ के सेक्टर 29 स्थित ट्रिब्यून मॉडल स्कूल। बेटा धवल 7वीं में गया है। बड़े बेटे कार्तिक ने यहीं से 10वीं की थी। कोविड काल के बाद दो साल बाद जब 2 अप्रैल को स्कूल में जाना हुआ तो आनंद की अनुभूति हुई। बच्चे तो कम ही थे, क्योंकि पीटीएम थी, लेकिन माहौल में उत्साह साफ नजर आ रहा था। अलग-अलग ग्रूप बनाए हुए थे। काउंसलर मैडम निकिता अपने संबोधन में सहभागिता की जरूरत को समझा रही थीं। चूंकि हमारा टर्म अभी आना बाकी था, इसलिए पहले संगीत कक्ष में गए। वहां अतुल सर से बात हुई। फिर स्पोर्ट्स रूम में गए। वहां सचिन सर और अनुज सर मिले। फिर बेटे ने कहा कि चलो लाइब्रेरी चलते हैं। लाइब्रेरी में जाना ही संयोग था। वहां आशीष सर मिले। आशीष शुक्ला। योग टीचर।


औपचारिक मुलाकात के बाद अनौपचारिक बातचीत शुरू हो गयी। पूछा हालचाल। मैंने उनसे मंडूकासन के बारे में पूछा। उन्होंने कुछ बातें बताईं। फिर सेहत, कम होते वजन पर मैंने उनसे कुछ बातें शेयर कीं। कुछ देर मेरी बातों को समझने के बाद वह बोले, किशोर कुमार का वह गाना एकदम सही है जिसके बोल हैं, 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।' फिर उन्होंने एक उदाहरण दिया। एक व्यक्ति अगर किसी तरह इंतजाम करके फाइव स्टार होटल में अपने बेटे या बेटी की शादी की रिसेप्शन देता है तो कई लोग कहेंगे, 'अथाह पैसा है तो देगा ही फाइव स्टार में पार्टी।' अगर वह साधारण सी दावत देता है तो फिर उनके अल्फाज हो जाएंगे, 'इतना पैसा होते हुए भी फटीचर ही बना रहता है।' इसलिए छोड़िए इन बातों को। तनाव कम कीजिए। साथ खड़ी पत्नी ने सहमति जताते हुए कहा कि ये छोटी-छोटी बातों का तनाव ले लेते हैं। 
योगासन करते आशीष शुक्ला।

कुछ दिन पहले होमियोपैथ डॉक्टर ने भी कहा था कि तनाव से कई रोग जन्म लेते हैं। अनेक बातें होने के बाद उन्होंने एक दो आसन बताए और प्राणायाम के बारे में समझाया। आशीष सर से बातें करके बहुत अच्छा लगा। ऐसी अनौपचारिक बातें कई बार मेरा मार्गदर्शन करती हैं, लेकिन अनेक बार ऐसा होता है कि अपनत्व की बातें आगे बढ़ते-बढ़ते मैं बहुत कुछ शेयर करने लगता हूं और फिर शुरू होता है तनाव का एक नया अध्याय। हालांकि शेयर करने में कोई दिक्कत नहीं। एक बार एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा था कि कितना ही अविश्वास हो, कुछ लोगों को तो आपको अपना बनाना पड़ेगा जिनसे आप बहुत कुछ शेयर कर पाएं। आशीष सर की बताई कुछ बातों को फॉलो कर रहा हूं। उम्मीद है कि अगली मुलाकात में कह सकूं कि जो वेट लॉस हुआ था, वह अब गेन हो रहा है क्योंकि दुआ और दवा साथ चल रही है। प्रयास भी जारी हैं।



Thursday, April 7, 2022

बदले नजारे और नजारों का बदलाव

 केवल तिवारी

डॉक्टरी सलाह पर सुबह टहलना जरूरी हो गया है। वैसे तो संभव हो तो सभी को सुबह टहलना चाहिए। सुबह उठने, टहलने की जब सिर्फ बात होती है तो ती तरह के नजारों का रेखाचित्र बनता है। एक वे हैं जिनके पास सुबह समय ही नहीं है। हालांकि समय की कमी का रोना महज रोना ही है। समय तो सभी के लिए 24 घंटों का होता है। खैर...। दूसरे वे हैं जिनके पास सुबह-सुबह समय ही समय है, लेकिन या तो देर रात तक जगने के कारण या आलस्य के कारण वे कहीं नहीं जाते। तीसरी श्रेणी वह है जिन्हें डॉक्टर ने सलाह दी है कि समय निकालकर टहलना ही टहलना है या एक्सरसाइज करनी है। तीसरी श्रेणी में खुद को रखते हुए इन दिनों पार्क में नियमित तौर पर जाना होता है। वहां का नजारा देखकर लगा कि फिटनेस को लेकर कितनी जागरूकता है। बुजुर्ग व्यक्ति भी एक्सरसाइज कर रहे हैं। युवा भी योग आदि में व्यस्त हैं। कुछ बच्चों का झुंड भी है। पहले तो देखकर अच्छा लगा कि बच्चे भी सुबह-सुबह टहल रहे हैं फिर मन में सवाल उठा कि इनका तो स्कूल टाइम है, ये कैसे यहां। लेकिन बच्चे मस्त होकर खेल रहे थे। गौर से देखा तो उनकी बातचीत सन्न करने वाली थी। गाली-गलौज। झूलों में तोड़फोड़। कुछ के पास स्मार्ट फोन। उसे लेकर कहीं कोने में बैठे हैं। सोचा, इन्हें कुछ समझा दूं, लेकिन मैं राउंड लगाता रहा। मन में मंथन चलता रहा। तभी एक बुजुर्ग से सज्जन उनके पास आए और पूछा कि उन्हें पार्क में आना कैसा लग रहा है। दो-तीन बोले, बहुत अच्छा। फिर उन्होंने समझाया जब अच्छा लग रहा है तो इसे अच्छा बनाए रखो। झूलों में तोड़ फोड़ करोगे तो फिर कौन ठीक करेगा। कुछ की समझ में बात आयी या डर गए, वे वहां से चले गए। तभी कुछ बच्चे स्कूली ड्रेस में दिखे। कुछ 'जोड़े' भी दिखे। वे टहलने आए हैं, ऐसा तो कदापि नहीं लग रहा था। चलिए सुबह की इस चहचहाहट को कुछ दिन और गौर से देखा जाए। फिर संभवत: कुछ सार्थक लिखना हो पाएगा। अभी तो नजारे बदले हैं और बदलाव में भी नजारे हैं।

Monday, March 21, 2022

स्टार थे, स्टार बन गए...खुश रहना जीजा जी, मिश्रा जी

 केवल तिवारी

कल्पना से परे भी चीजें चली जाती हैं।

अस्वस्थता के कारण जीवन की कुछ-कुछ कल्पना मैं भी करने लगता हूं, लेकिन जिंदादिली भी तो कोई चीज होती है। जब जिंदादिली के मायने हैं तो मौत कैसे आ गई...और यह मौत दबे पांव आई क्योंकि डरती थी वह जिंदादिल इंसान से। ऐसे इंसान से जो सचमुच महात्मा था। उसने गरीबी को भी ठाठ से जिया। उसने अफसोस जताने के बजाय आगे की ओर देखा। वर्तमान में जीने वाला आदमी... रमेश चंद्र मिश्रा। यही नाम था जीजा जी का।

खुशी के वे फल

विष्णु भगवान का ही नाम होता है या रमेश मतलब विष्णु। और छोड़ गए हैं हमें। अपने पीछे परिवार... यादें... विचार। मेरे साथ रिश्ता तो जीजा जी का था, लेकिन वह मेरे अभिभावक जैसे भी थे। मेरे दोस्त जैसे भी थे और मेरे दोस्तों के भी दोस्त। अक्सर तो पूछते थे फलां कैसा है, उनके क्या हाल हैं। करीब 3 माह पूर्व आए थे चंडीगढ़। प्रेमा दीदी के साथ मंदिर में गए हम लोग। ज्वाला जी माता मंदिर में उनको चक्कर आ गया। मैं और प्रेमा दीदी फटाफट उनको रेस्टोरेंट में लाए। उनके लिए खाना लिया उन्होंने खाना खाया। तब तक शीला दीदी, जीजाजी भांजा कुणाल भी पहुंच गए। सभी ने खाना खाया। इतने में जीजा जी खाना खा चुके थे। प्रेमा दीदी ने उनकी तरफ देखा। समझ गए थे वह कि दीदी स्वास्थ्य के बारे में सवाल पूछना चाह रही है। अपने आप बोले अब मैं ठीक हूं और उठकर काउंटर पर गए और खुशी-खुशी सभी के खाने का भुगतान करा आए। यहां बता दूं जब मैं छोटा था यानी विद्यार्थी वह केएमओ स्टेशन पर हमें समोसे और मिठाई खिलाते थे। मुझे लगता था, मेरे जीजा जी कितने अमीर हैं, बाद मैं...। खैर मंदिर में दीदी जीजाजी ने एक दूसरे को देखा और दोनों निश्चिंत कि सब ठीक है। उस दिन यानी 11 मार्च को अपनी सालगिरह की अगली सुबह जब उन्होंने इस संसार से रवानगी डाली तो प्रेमा दीदी की यही इच्छा तो थी कि वह एक बार तो उनकी ओर देखते। एक बार तो कहते कि अब मैं ठीक हूं या नहीं हूं। इतना बोलने वाला व्यक्ति जब अंतिम सफर पर निकला, तो एकदम चुपचाप। इतने चुपचाप जाना ही था तो एक दिन पहले सबसे इतना क्यों बोले। बधाई वाली हंसी। मजाक किया। फिर चल दिए। जीजा जी हमें भी कहां पता था कि आपके विवाह की वर्षगांठ 10 मार्च को होती है। वह तो 10 मार्च 2010 को धवल हुआ तो दीदी ने बताया। दीदी और आपने कितना साथ दिया। कुक्कू होने वाला था, डॉक्टर ने डरा दिया। तुरंत आपको फोन किया कि ईजा को लेकर आओ। आप अगली शाम पहुंच गए, ईजा को लेकर। धवल होने वाला था तो आप दीदी को छोड़ गए। भावना का आपरेशन हुआ तो आप आए। क्या कहूं। सालगिरह की बधाई देते महज 12 साल हुए थे। आज शायद ठीक उसी समय जब करीब 44 साल पहले हमारी दीदी को दुल्हन बना कर विदा कराकर चले होंगे हमारे घर से डोली से दीदी को ले गए होंगे आप दीदी को छोड़कर चले गए। 11 मार्च को भांजी रेनू का फोन सुबह 6:00 बजे आया। थोड़ी सी घबराहट तो हुई, फिर विचार आया कि शायद मेरे बेटे धवल को जन्मदिन की बधाई देने के लिए किया होगा क्योंकि यही तो यादगार दिन था जब धवल का जन्मदिन और दीदी जीजाजी की सालगिरह एक ही दिन पड़ता था। फोन उठाते उठाते भावना से पूछा कल भूल गए थे शायद। इसलिए आज कर रहे होंगे। लेकिन यह क्या? फोन पर भांजी के पति कुलदीप प़ंत यानी कंचू थे। बोले, मामाजी चोरगलिया पापा जी एक्सपायर हो गए हैं। यही शब्द थै।  कितना चिल्लाकर बोला मैं क्या कह रहे हो... फिर कुछ नहीं बोल पाया। पंत जी बोले आप परिवार में अन्य लोगों को भी बता देना। मैं रोने लगा। पत्नी रोने लगी। बगल के कमरे से पहली रात 2:00 बजे सोया बेटा कुक्कू भी उठ गया वह भी रोने लगा। वहीं पर सोया धवल भी जग गया। बड़ी हिम्मत की। सबसे पहले लखनऊ दाज्यू को फोन किया। क्या बात होती। बस इस अभागी सूचना का आदान प्रदान हुआ। अब क्या करूं? क्या गाड़ी लेकर निकल जाऊं? सवाल-जवाब मंथन।  फिर हिम्मत की। शीला दीदी को फोन किया‌ रो रो कर बुरा हाल। एक दिन पहले ही जीजा-साली ने कितनी बातें की थीं। शीला दीदी के सामने असमंजस का चौराहा था। समझाया मैंने। पता नहीं कहां से आ गई हिम्मत। कसम दी मैंने। अपनी विदेश यात्रा को टालना मत। जीजा जी भगवान बन गए हैं। पुण्य आत्मा को मोक्ष मिल गया है। क्या करता।  मुझे भी डॉक्टर के पास जाना था,  अपनी मेडिकल रिपोर्ट लेकर। फटाफट डॉक्टर के पास बेटे कार्तिक के साथ गया। बस का पता किया और चल दिया चोरगलिया के लिए। कैसे...क्या... क्यों... सवालों का उमड़ घुमड़ जारी था। यहीं से थोड़ी दूर नानकमत्ता में कुछ माह पहले लखनऊ भाभी जी के जीजा जी का निधन हुआ था। भाभी जी को मैसेज किया था मैंने। मन किया वहां जाऊं, लेकिन बेदर्द प्राइवेट नौकरी। आजकल बड़ा परिवर्तन है...। खैर 

काठगोदाम से मेरे ससुराल वाले फोन करते रहे। नंदू भाई साहब ने चोरगलिया पहुंचाया। रेनू सबसे पहले मिली। फिर दीदी। उफ क्या रूप देखा दीदी का। हमारे परिवार की सबसे सुंदर लड़की बताया जाता था उसको। अत्यधिक गोरी होने के कारण उसे कुरुली यानी सफेद दूध जैसी कहते थे। यह कुरुली आज कुरूप हो गई। बहुत समझाया। धीरे-धीरे पीतांबर जीजाजी मिले। हरिद्वार से लौटे चंद्रशेखर जीजाजी मिले। सभी बच्चे, दीदीयां। सब अपनी यादें बताने लगे। आसपास के लोग बोलने लगे अपने जेठ के लिए बहुओं को ऐसे रोते हुए हमने पहली बार देखा है। आंखें नम। साथ में काम भी। भांजा मनोज तो बस एक ही रट लगाए रहा। बहुत मलाल रह गया मामा। पापा कुछ तो मौका देते। मैंने लखनऊ पंकज भांजे का हवाला दिया। कितने मलाल रह गये उसके मन में। मैं जितना बोलता,  उसकी आंखें भर आती। मनोज की छोटी अबोल बच्ची की आंखें दादा को तलाशतीं। नहीं दिखते तो रो जाती। जीवा, काव्या को थोड़ा समझाया मैंने। कहा आपके दादा, आपके नाना अब स्टार बन चुके हैं। बच्चे का सवाल रात को दिखेंगे? मैंने कहा हां,  लेकिन तब, जब आप सो चुके होगे। जीजा जी आप हमारे स्टार थे। स्टार हो। और स्टार हो गए हो। आपने खूब संघर्ष किया। रेनू कितने किस्से बता रही थी। रुचि रो रही थी मौसा जी की याद में। आपने जीवन के कठिन दौर देखे। आपका निजी जीवन भी अजीब रहा, वह एक अलग संघर्ष था। अब आपके लिए थोड़ा चैन भरे दिन आए थे। लेकिन आप तो स्थाई शांति में चले गए। कोई बात नहीं, मौत की परिकल्पना अगर कोई करता तो ऐसी ही मौत मांगता। कोई भी। मैं भी। आप खुश रहना। आशीर्वाद बनाए रखना। जीवन चलायमान है। सब चल रहे हैं। मैं भी। अगले दिन चंडीगढ़ के लिए चल पड़ा। यह कहकर कि सब चलते रहिए। स्टार का स्टार में विलीन होना। बच्चों का समझना और समझाना। रोते हुए देख कर जीवा का दुखी होना और छोटी बच्ची कनिष्का का कुछ ढूंढना। दीदी का रोना। सबका दुखी होना। जीजा जी आपका चले जाना। आप यादों में हमेशा रहेंगे। यही रीत है जीवन की। चल रही है। चलते रहेंगे। खुश रहना आप अपने नए जहां में। सुख दुख के साथी  रहे भविष्य में भी पूरे परिवार पर आशीर्वाद बनाए रखना। जीजा जी आपको नमन।