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Saturday, January 5, 2019

भाई साहब का रिटायरमेंट : फूल मालाएं बयां कर रही हैं इस व्यक्ति की शख्सियत



रिटायरमेंट स्पीच के बाद अपनी सीट पर वरिष्ठ सहयोगी संग भाई साहब।
माना की ये दौर बदलते जायेंगे। आप जायेंगे तो कोई और आयेंगे।

आपकी कमी इस दिल में हमेशा रहेगी। सच कहते हैं हम आपको इक पल न भूल पाएंगे।

मुश्किलों में जो साथ दिया याद रहेगा। गिरते हुए को जो हाथ दिया याद रहेगा।

आपकी जगह जो भी आये वो आप जैसा ही हो।

हम बस ये ही चाहेंगे। सच कहते हैं हम आपको इक पल न भूल पाएंगे।



जादा जादा छोड़ जाओ अपनी यादों के नुक़ूश, आने वाले कारवां के रहनुमा बन कर चलो

अल्फाज बदले हुए थे, लेकिन बातों का लब्बोलुआब यही था। मौका था भाई साहब के रिटायरमेंट का। मैं अपने भतीजे विपिन, जीजा जी रमेश चंद्र और भाभी के भाई विनोद जोशी जी संग भाई साहब के ऑफिस गया था, उन्हें रिसीव करने। उस वक्त भाषणों का दौर चल रहा था। तारीख थी 31 दिसंबर 2018, समय अपराह्न करीब 4 बजे। हर व्यक्ति अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा था। भाई साहब के दफ्तर में एक सीनियर साथी बोले, ‘भुवन चंद्र तिवारी के गले में पड़ी मालाएं इनकी शख्सियत के बारे में बता रही हैं।’ (असल में भाई साहब के चाहने वाले तमाम लोगों ने उन्हें फूल मालाओं से लाद दिया था। बाद में जब घर में कार से भाई साहब को लेकर आ गयी तो पूरी कार उन्हीं फूलों से भर गयी।) चतुर्थ श्रेणी का एक कर्मी बेहद भावुक था। वह लोगों को चाय पिला रहा था और आतुर था कि उसे दो मिनट के लिए माइक मिल जाये। उसके बाद उसने स्वरचित चंद लाइनें सुनाईं जिनका लब्बोलुआब यह था कि रिटायरमेंट गम का नहीं, खुशी का मौका है क्योंकि बेहतरीन तरीके से आपने नौकरी की पारी खेली। उसकी कविताएं खत्म होते ही मैं कुछ लोगों से बात करने लगा कि वास्तव में अगर बेदाग आप नौकरी कर निकल जाएं, इससे अच्छा कुछ नहीं। चतुर्थ
सेवानिवृत्ति के बाद तृप्ति के भाव में घर पहुंचे भाई साहब।
श्रेणी कर्मचारी यूनियन के एक पदाधिकारी बोले, ‘तिवारी जी छुट्टियों के दिन भी हमारे काम के लिए आते थे। कई बार कुछ काम अटकते थे तो तिवारी जी उसे निपटाने में देरी नहीं करते।’ एक महिला सहकर्मी ने भावुक कविता सुनाई। हर कोई अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा था। इसी दौरान वहां खाने के लिए मिठाई, समोसे आदि बंटने लगे। मेरा गला रुंधा हुआ सा था, मैंने नहीं लिया। फिर कॉपी का प्याला आया, मैंने उसके लिए भी इनकार कर दिया। तभी भतीजे विपिन ने कहा कि कॉफी पी लो चाचाजी। मैंने कॉफी का प्याला ले लिया। अब बारी आयी भाई साहब की। बेहद भावुक दिख रहे भाई साहब ने बहुत संक्षिप्त भाषण दिया। उन्होंने कहा, ‘अभी दो दिन पहले तक मुझे एक-एक दिन भारी लग रहा था। मन में यही हो रहा था कि रिटायरमेंट की घड़ी कब आएगी, लेकिन आज जब वह घड़ी आ गयी है तो मुझे बहुत अजीब लग रहा है। कितने अच्छे लोगों से बिछोह हो रहा है।’ विदाई कार्यक्रम पूरा होने के बाद मैं ऑफिस के लोगों से मिला।
मंदिर कक्ष में भाई साहब के साथ भाभी जी।
मैंने कहा, ‘भाई साहब सेवा से तो निवृत्त हो गये हैं, लेकिन संबंधों से आप लोग कभी निवृत्त मत होना।’ कई लोगों ने बताया कि भाई साहब मेरा भी जिक्र ऑफिस में करते रहते थे। इसके बाद भाई साहब के साथ सुबह से ही आये राजेंद्र अधिकारी ने कहा कि जिस सीट पर तिवारी जी बैठते थे, वहां चलो। वहां भाई साहब की फोटो खिंचवाई। इसके बाद हुई घर चलने की तैयारी। भाई साहब कार में बैठ चुके थे, मैं उनके सहकर्मियों से बातचीत कर रहा था। कुछ ने कहा, ‘हम शाम को घर आ रहे हैं।’ पता नहीं क्यों मैं भी उस पल बहुत भावुक हुआ जा रहा था। भावनाओं को नियंत्रण में रख हम
घर पर स्वागत करते वक्त भावुक होकर भाई साहब से लिपटकर रोतीं भाभीजी।
लोग कार में बैठे और घर की ओर आ गये। खुद को संयत कर घर में फोन किया। वहां कन्नू यानी भावना यानी भाई साहब की बेटी और दीपू-भाई साहब का बेटा और भाभी जी तमाम सगे-संबंधियों के साथ स्वागत को तैयार थीं। हम लोग घर पहुंचे तो बुजुर्ग दिनेश चाचा एक शॉल और फूल माला लेकर खड़े थे। उनके चेहरे पर बेहद स्नेह झलक रहा था। उन्होंने शॉल ओढ़ाया, माला पहनाई। फिर आईं भाभी जी। पूजा की थाल लेकर। उन्होंने आरती उतारी और माला पहनाई। तभी शीला दीदी ने एक माला भाई साहब को दी और कहा, आप भी पहनाओ। इसी दौरान भाभी बेहद भावुक हो गयीं। वह भाई साहब से लिपटकर रोने लगीं। बेटी कन्नू मेरी तरफ देखने लगीं। मैंने कहा, ये भावुक आसूं हैं। इन्हें निकलने दो। थोड़ी देर को माहौल भावुक हो गया। तभी मैंने कहा कि भैया और भाभी को मंदिर में भेजो। ऊपर की मंजिल में मंदिर बना है। उसी वक्त ढोल वाला आ गया। ढोल की थाप शुरू हुई, फिर केक कटने लगा और हम सब लोग थिरकने लगे। सभी को हाथ पकड़-पकड़कर थिरकाया। पूरा समां भावनाओं, खुशियों के माहौल से सुगंधित हो उठा। हम लोग रात के 12 बजे तक जगे रहे। खूब बातें हुईं। नये साल की मुबारकबाद
केक काटते भाई साहब और भाभीजी
भी दी गयी। भतीजे विपिन और उनकी पत्नी बीना का व्रत था, लेकिन उन्होंने पूरी तरह इस जश्न में साथ दिया। दिल्ली से आये अन्य भतीजे हरीश, दीप, प्रकाश ने खूब काम निभाया। विनोद जोशी जी, दिनेश जी, हेम जी सहित हमारे सभी संबंधियों ने बेहद साथ दिया। भांजे पंकज और नवीन ने भी खूब साथ दिया। इस जश्न का मुझे जो सबसे ज्यादा फायदा हुआ, वह यह कि कितने पुराने-पुराने वरिष्ठ जनों, अपने शिष्यों और साथियों से मुलाकात हुई। इस दौरान कई बार मुझे अपने अति उत्साह का अहसास भी हुआ। भैया के लिए एक वीडियो बनायी थी वह उस अंदाज में नहीं चला पाया, जैसा चाहता था, लेकिन उसके कारण उत्साह में कोई कमी नहीं लगी। रिटायरमेंट की यह पार्टी बेहद यादगार रही। ईश्वर भाई साहब और भाभीजी को
भाभीजी को केक खिलाते भाई साहब
स्वस्थ रखें। खुश रखें। घर में ऐसा ही खुशी का माहौल बना रहे, यही दुआ करता हूं।

और मेरी वह तैयारी
27 दिसंबर, 2018, दिन बृहस्पतिवार। लखनऊ जाने की जल्दबाजी। छोटा बेटा मुझसे ज्यादा उत्साहित। बार-बार बोले-‘पापा कितने बजे की ट्रेन है।’ लखनऊ जाने के लिए चार महीने पहले ही रिजर्वेशन करवा लिया था। मन पूरे परिवार सहित जाने का था, लेकिन पत्नी का ऑपरेशन होना था, बड़े बेटे के प्री बोर्ड की परीक्षाएं। इसलिए रिजर्वेशन अपना और धवल का ही
बेटे दीपू, दामाद पूरन चंद्र, बेटी कन्नू आदि के संग भाई-भाभी।
करवाया। हम लोग रात 10 बजे से पहले ट्रेन में बैठ गये। अगले दिन सुबह 11 बजे के करीब तेलीबाग भाई साहब के यहां पहुंच गये। 28 दिसंबर था वह दिन। भतीजी भावना का जन्मदिन। मैं पूरे

भाई, भतीजे और बहनों संग।
उत्साह में था। तैयारी की। कन्नू करीब 3 बजे पहुंची। बातें हुई। खाना खाया। भाई साहब भी ऑफिस से आ गये। शाम को पार्टी हुई। फिर तैयारी होने लगी आगामी फंक्शन की। संभवत: पहली बार छोटे बेटे को मां से अलग इतने दिनों के लिए लेकर गया। हम लोग लखनऊ में एक हफ्ते रहे। सब अच्छा रहा। कुछ बातें भी समझ आईं। इस बार के लखनऊ टूर पर जो अहसास हुआ उसे शायर दुष्यंत के शब्दों में बयां कर रहा हूं-
वर्षों बाद वह घर आया है, अपने साथ खुद को भी लाया है।


Friday, January 4, 2019

उमंग के साथ करें नये साल का स्वागत

केवल तिवारी
शुरुआत। नयापन। कुछ पाने का संकल्प। कुछ छोड़ देने की प्रतिज्ञा। कुछ छूटेगा। कुछ मिलेगा। यही तो है नया। बिना नव्यता के सुख कहां। ब्रह्मांड का, सृष्टि का नियम है, नवीनता होगी तभी तो सुखद अहसास होगा। इसीलिए एक बार और नयापन आ गया है। साल बीता। नया आया। कुछ लोग कहते हैं, खुशी क्या मनानी। एक साल चला गया। हम अगर मातम भी मनाएंगे तो पुराना साल जाएगा और नया आएगा। पुराने के गम में नया का स्वागत क्यों छोड़ें। उदास होने की जरूरत नहीं होती कि नव वर्ष का उत्साह मनाया...बस। उत्साह अल्पकालिक नहीं होता। भारतीय परंपरा में तो कदम दर कदम उत्साह है। कई नव वर्ष। जाने-माने कवि हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है- नव उमंग, नव तरंग, जीवन का नव प्रसंग। नवल चाह, नवल राह, जीवन का नव प्रवाह।
कई पर्व। कई उत्सव। असल में पर्व या उत्सव मनाने के पीछे तर्क भी यही है कि हम अंधेरों से उजालों की ओर जायें। पुराना बीत गया तो उसकी अच्छी बातों को याद रखें। उसी गीत की तरह जिसके बोल हैं, ‘यादों के चरागों को जलाये हुए रखना...लंबा है सफर।’ बीते साल की कई यादें होंगी जिन्हें हम सहेजे रखना चाहते हैं। जतन करते हैं उसके लिए। कभी अपने मन में उन्हें संजोये रखते हैं, कभी कुछ और तरीके से उसे बचाये रखते हैं। बचाना ही नयापन है। जब हम सहेजते हुए चल रहे हैं तो वह नयापन है। जिसे भुला रहे हैं, वह बीत गया। बीति ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि ले। गीता में भी तो कहा गया है जो बीत गया वह कल था, जो आने वाला है, उस पर किसी का जोर नहीं। वर्तमान में जीयें। वर्तमान आज है। आज ही नयापन है। नया जिसका इंतजार है। इंतजार उत्सवों का। नये मौसम का। हम सुबह का स्वागत करते हैं। सुबह नयी होती है। शाम को ढलने और फिर रात बनकर खत्म होने की तरह देखा-समझा जाता है।

 क्या रखना चाहते हैं याद
नये साल के स्वागत के तौर पर हमें यह ध्यान देने की जरूरत है कि हम याद क्या रखना चाहते हैं। जानकार कहते हैं कि कमियों को, गलतियों को जरूर याद रखना चाहिए। कुछ लोग सिर्फ अच्छी-अच्छी बातों को याद रखने का तर्क देते हैं, लेकिन कहा जाता है कि आपकी अच्छी बातें तो और याद रखें। वास्तव में हमें अपनी गलतियों को याद करते हुए उनमें सुधार की गुंजाइश आने वाले साल में रखनी चाहिए। अच्छी बातों का दोहराव होना चाहिए। कुछ जानकार बीते साल की यादगार चीजों को लिखकर रखने का भी सुझाव देते हैं। आजकल तो डिजिटल जमाना है। ऐसे में चित्रमयी यादों का कोलाज भी बनाया जाता है।

भारत में कई नव वर्ष
पहली जनवरी से तो नया साल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य है। इसे इस्वी सन कहते हैं। भारत हर धर्म, संप्रदाय के हिसाब से नव वर्ष मनाये जाने की परंपरा है। जिस तरह भारत कई मामलों में अनूठा है, उसी तरह नव वर्ष के मामले में भी यहां विविधता है। हर नव वर्ष पर उत्सव होता है। हिंदू नववर्ष का प्रारंभ हिन्दी पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होता है। इसी दिन से वासंतेय नवरात्र का भी प्रारंभ होता है। विक्रम संवत का अगला पड़ाव यहीं से शुरू होता है। इसी तरह मलयाली समाज में नया वर्ष ओणम से मनाया जाता है। यह अगस्त और सितंबर के मध्य मनाया जाता है। तमिल नववर्ष पोंगल से प्रारंभ होता है। पोंगल से ही तमिल माह की पहली तारीख मानी गई है। पोंगल प्रतिवर्ष 14-15 जनवरी को मनाया जाने वाला बड़ा त्योहार है। इस दौरान उत्तर भारत में उत्तरायणी पर्व भी मनाया जाता है। उत्तरायणी का मतलब सूर्य दक्षिणायन से उत्तर की तरफ आता है। महाराष्ट्र के लोग चैत्र माह की प्रतिपदा को ही नववर्ष की शुरुआत मानते हैं। इसे गुड़ीपर्व भी कहते हैं। पंजाब में नववर्ष बैसाखी में मनता है। नयी फसल आने की खुशी में मनाये जाने वाले इस पर्व पर खूब मस्ती की जाती है। पारसी समुदाय नये वर्ष का पर्व नवरोज के तौर पर मनाते हैं। यह 19 अगस्त को मनाया जाता है। जैन धर्म को मानने वाले लोग दीपावली के दिन नव वर्ष मनाते हैं। इसे वीर निर्वाण संवत भी कहते हैं। दीपावली के दूसरे दिन गुजराती लोग नववर्ष मनाते हैं। बंगाल के लोग नया वर्ष बैसाख की पहली तिथि को मनाते हैं। मुस्लिम समुदाय में नया वर्ष मोहर्रम की पहली तारीख से मनाया जाता है। मुस्लिम पंचांग की गणना चांद के अनुसार होती है इसे हिजरी सन कहते हैं। 
नोट : यह लेख दैनिक ट्रिब्यून में छप चुका है। 


Thursday, December 6, 2018

ऑस्ट्रेलिया बस गये पंजाबी युवक ने किसानों के लिए शुरू की कई याेजनाएं

पशुओं की ब्रीडिंग का समय कब है। किसानों को कहां उचित मूल्य मिलेगा। दूध कितना शुद्ध है। ऐसी ही तमाम बातें अगर एप के जरिये मिल जाये या फिर कॉलेज से निकले बच्चे ये सब बताएं तो कैसा रहेगा। निश्चित रूप से यह एक नयी पहल होगी। ऐसा ही हरियाणा और पंजाब के कई इलाकों में हो रहा है और इसका विस्तार पहले हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड फिर अन्य राज्यों में होगा। इस संबंध में 8 राज्यों में 11 हजार बच्चों के जरिये उदय एवं मू फार्म कार्यक्रम चला रहे परम सिंह ने बताया कि राह में कई चुनौतियां हैं, लेकिन निकल पड़े हैं तो इसके सकारात्मक परिणाम निकल रहे हैं। केंद्र सरकार के स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत चला रहे इस कार्यक्रम के संबंध में परम बताते हैं कि वह 11 क्षेत्रों में ऐसे कार्यक्रम चला रहे हैं जिसमें 45 तरह की नौकरियों की संभावनाएं हैं। इनमें खेतीबाड़ी, दुग्ध उत्पाद एवं भवन निर्माण शामिल है। उन्होंने बताया कि पंजाब के संगरूर, मानसा आदि में डेयरी बिजनेस के तहत ऐसे कदम उठाये गए हैं जिससे किसानों की लागत में कमी आई है। मूलरूप से पंजाब निवासी और अब ऑस्ट्रेलिया में बस चुके परम ने चंडीगढ़ में बताया कि वह मूफार्म एप के जरिये पहले उन किसानों को जोड़ रहे हैं जिनके पास दो से पांच तक गायें हैं। अब वह जल्दी ही हरियाणा के कुरुक्षेत्र, सोनीपत, पानीपत आदि इलाकों में भी मंडी विपणन सहित कई कार्यक्रम चलाएंगे। उनका दावा है कि वर्ष 2020 तक वह अपने विभिन्न माध्यमों से दो लाख किसानों को प्रशिक्षित करेंगे। उनका कहना है कि दूध की शुद्धता नापने के लिए भी उन्होंने 'द कलर ऑफ मिल्क' अभियान चलाया है। इसके तहत वह दूध कितना सफेद यानी शुद्ध है के संबंध में प्रशिक्षण देंगे। परम का मानना है कि हमारे पशु स्वस्थ रहेंगे तो दूध अच्छा होगा। इसके लिए जानकारी के साथ-साथ साफ-सफाई पर ध्यान देने की जरूरत है। कब क्या खिलाना है, क्या ध्यान रखना है इसकी जानकारी किसानों को एप के जरिये मिल जाएगी।

बॉलीवुड के खलनायकों का दस्‍तावेज, ‘मैं हूं खलनायक’

भारतीय सिनेमा के 100 साल से ज्यादा लंबे इतिहास में सैंकड़ों अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने रुपहले परदे पर अनगिनत खल किरदार अदा किये हैं, जिनसे हम न केवल अपने आस-पास मौजूद बुरे चरित्रों को भलि-भांति पहचान सकते हैं, बल्कि किसी संभावित खतरे से बच भी सकते हैं। 

यश पब्लिकेशंस दवारा प्रकाशित पुस्‍तक ‘’मैं हूं खलनायक’’, हिन्दी सिनेमा के खलनायकों और खलनायिकाओं पर लिखी गई ऐसी ही पुस्‍तक है। इस पुस्‍तक में हिन्दी सिनेमा के शुरूआती दौर से लेकर मौजूदा दौर के नामचीन खल चरित्र यानि निगेटिव किरदार निभाने वाले तमाम कलाकारों के साथ-साथ उन छोटे-मोटे खलनायकों का भी पूरी तफ्सील से जिक्र है, जो अक्सर मुख्य खलनायक के गुर्गे, प्यादे या कहिए वसूलीमैन के रूप में हमें याद दिखते तो रहे हैं, लेकिन याद नहीं रहे। 
वरिष्‍ठ पत्रकार फजले गुफरान की यह किताब खलनायकी के उस दौर को हमारे सामने लाती है, जब लोग खल चरित्र निभाने वाले कलाकारों को असल जिंदगी में भी बुरा इंसान ही समझते थे। दूसरी तरफ यह किताब कई कलाकारों से की गई एक मुकम्मल बातचीत का यादगार सफर है, जिसमें उनके अंदर से एक ऐसा इंसान बात करता दिखता है, जिसे शायद किसी ने सुनने की कभी जहमत ही नहीं उठाई। किताब में प्रसिद्ध अभिनेता रजा मुराद की बातें हैरान कर देने वाली हैं, और सोनू सूद की बातों से उत्साह और उम्मीदें झलकती हैं। दिग्गज अभिनेता प्रेम चोपड़ा अपने और मौजूदा दौर के खलनायकों के बारे में बेबाकी से बात करते दिखते हैं, तो मुकेश ऋषि दिल से प्राण साहब, अजित के बारे में बताते हैं। 
आज के इस दौर में जब हम ये मान बैठे हैं कि इंटरनेट पर हर तरह की जानकारी मौजूद है, यह किताब हिन्दी सिनेमा के खलनायकों के बारे में चार कदम आगे की और एक्सक्लूसिव बातें करती है और सिने प्रेमियों के साथ-साथ सिनेमा के छात्रों के लिए एक टेक्सटबुक का काम करती है, क्योंकि इसमें एक ओर अलग-अलग दौर के दिग्गज अभिनेताओं जैसे प्राण साहब, प्रेम चोपड़ा, अजीत, जीवन, प्रेम नाथ, मदन पुरी, अमरीश पुरी, अमजद खान, डैनी, अनुपम खेर, गुलशन ग्रोवर, शक्ति कपूर, कबीर बेदी और प्रकाश राज आदि के बारे में रोचक जानकारियां दी गयी हैं और बातें की गयी हैं, तो दूसरी ओर के. एन. सिंह, कन्हैयालाल, बीएम व्यास, कमल कपूर, अनवर हुसैन के साथ-साथ नादिरा, शशिकला, ललिता पंवार, हेलन और बिंदु जैसी खलनायिकाओं के भी बेहद दिलचस्प ब्यौरे दिये गये हैं। आप हैरान हो जाते हैं, 1940 के दौर में आयी अभिनेत्री कुलदीप कौर जैसी खलनायिका के बारे में पढ़कर, जिसे किसी ने कभी याद ही नहीं किया। वह एक ऐसी दिलेर महिला थी जो बंटवारे के समय अकेले कार चलाकर दिल्ली होते हुए लाहौर से बंबई आ गयी थी। पुस्‍तक ‘’मैं हूं खलनायक’’ यह एक दस्तावेज से कम नहीं। इसे पन्‍नों में समेटना नामुमकिन सा है लेकिन लेखक फजले गुफरान ने 352 पन्‍नों में समेटने की कोशिश की है। करीबन 150 से अधिक खलनायक और खल चरित्र निभाने कलाकारों के बारे में जिक्र है। इस पुस्‍तक की कीमत 299 रूपए है जो फिलवक्‍त अमेजन पर उपलब्‍ध है। फिल्‍म पत्रकारिता और मनोरंजन जगत से जुडे पाठकों के लिए यह एक उपयोगी पुस्‍तक साबित होगी ऐसी उम्‍मीद है।


Thursday, November 29, 2018

शिमला की वह यात्रा और चांद छूने की तमन्ना

हवा में ठंडक, पर चुभने वाली नहीं। दूर-दूर तक एक अनोखा नजारा। मानो सीढ़ीनुमा खेतों पर किसी ने दिवाली मनाई हो। अचानक नजर चांद पर गयी, अरे इतना विशाल और इतने नजदीक। चांद की ओर देखने पर लगा मानो हमसे कह रहा हो, इस वक्त तो मेरा सीना भी तन ही जाएगा सामने इतनी ऊंचाई पर तिरंगा जो फहरा रहा है। एक तो समुद्र तल से 2076 फुट की ऊंचाई। उस पर 100 फुट का ऊंचा ध्वज प्रवर्तक शिला और ऊपर शान से लहराता तिरंगा। वाकई नजारा बहुत मनमोहक था। यह था शिमला का रिज मैदान। तारीख 22 नवंबर, 2018...इतना खूबसूरत नजारा और साथ में तीन प्यारे भांजे, दीदी और जीजाजी। रिज के पास ही चर्च पर पड़ती रोशनी। देश और विदेश से आये लोगों का जमघट। मन कर रहा था बस यूं ही वहां घूमते रहें। बातें करते रहें। फोटो खींचने की बातें हुईं। कभी सब एक साथ खड़े होकर और कभी अकेले-अकेले। लखनऊ से भांजा कुणाल, गौरव और बेंगलुरू से आया था सौरभ। मुझसे कोई चार साल बड़ी शीला दीदी और जीजा जी (पूरन चंद्र जोशी) दो दिन पहले ये सब लोग चंडीगढ़ पहुंचे थे। दिल्ली से घूमते हुए। इन दिनों मेरी पत्नी आराम कर रही हैं, आपरेशन के बाद। यानी कहीं सफर नहीं कर सकतीं। बच्चों की परीक्षाएं थीं, इसलिए उनका शिमला आना तो नहीं हो पाया, अलबत्ता वे लोग एक दिन पहले और एक दिन बाद में साथ रहे। लोकल ही कुछ देर साथ घूमे।
रात के वक्त रिज पर खड़े तीनों भांजे
 
टॉय ट्रेन का वह बेहतरीन सफर
21 तारीख की शाम को ही कार्यक्रम बना कि शिमला टॉय ट्रेन से चलेंगे। इससे पहले ज्वालाजी या चिंतपूर्णी जाने का कार्यक्रम बन रहा था। दीदी-जीजाजी और मैं भी वहां जाना चाहते थे। लेकिन बच्चों का मन शिमला जाने और चिंतपूर्णी तक जाने की प्रॉपर व्यवस्था न हो पाने के कारण यही तय हुआ कि शिमला चला जाये। मैंने अपने संवाददाता ज्ञान ठाकुर जी को फोन किया। उन्होंने एक होटल में दो कमरों की बुकिंग करा दी। कार्यक्रम तो बन गया, लेकिन मेरे मन में टॉय ट्रेन को लेकर कई तरह की शंकाएं थीं। एक बार मेरे मित्र जैनेंद्र सोलंकी, धीरज ढिल्लों सपरिवार आये थे। हम लोग तब भी टॉय ट्रेन से जाने के लिए कालका तक गये भी, लेकिन ट्रेन में बिल्कुल जगह नहीं मिली। अंतत: सोलन तक गाड़ी से जाकर लौट आये। ऐसी ही आशंका इस बार भी लगी। हालांकि तब पीक टूरिस्ट सीजन था और इस बार वह सीजन शुरू होने में अभी काफी वक्त था। एक व्यक्ति से चंडीगढ़ के पुराने एयरपोर्ट चौक से कालकाजी तक छोड़ने के लिए किसी मित्र के जरिये पुछवाया तो उसने दो हजार की मांग की। हम लोगों ने तय किया कि ओला से चलेंगे। खैर अगले दिन समय पर सब तैयार भी हो गये। देर से उठने के आदत वाले मेरे दो भांजे भी समय पर उठ गये और ठीक आठ बजे मात्र आठ सौ रुपये में हम सब लोग कालकाजी पहुंच गये। वहां टिकट लिया। ट्रेन मिल गयी। ट्रेन में बैठ गये। पूरे रास्ते का सफर अद्भुत रहा। शुरुआत में मुझे अपनी मां की याद आयी। करीब 14 साल पहले मैं, भावना (मेरी पत्नी) और बेटा कुक्कू (तब एक साल का था आज दसवीं में पढ़ता है) टॉय ट्रेन से कुछ दूर तक गये थे फिर ज्वाला जी, चामुंडा देवी, चिंपूर्णी आदि मंदिरों का दर्शन करते हुए वैष्णोदेवी की यात्रा पर गये थे। थोड़ी देर बाद मैं भांजों और दीदी-जीजाजी के साथ पूरे पर्यटक की मस्ती वाले अंदाज में आ गया। हम लाेगों ने सुरंग आने पर खूब शोर किया। फोटो खींची, वीडियो बनाये। इस दौरान केजे फोटोज एवं वीडियोज खूब चर्चित हुआ। (केजे का मतलब कुणाल जोशी से है। छोटा भांजा। अच्छी फोटोग्राफी करता है।)
 
शिमला का रेलवे स्टेशन
आ गया पड़ाव
शाम करीब चार बजे हम लोग शिमला पहुंच गये। शिमला स्टेशन से हमारे होटल के बीच की दूरी करीब ढाई किलोमीटर थी। हम लोग पैदल ही चल पड़े। इस बीच मैंने गौर किया कि दीदी की तो वाकई हालत खराब हो चुकी है। उससे चला नहीं जा रहा था। मैं सोचने लगा कि यही वह दीदी है जो करीब 08 किलोमीटर दूर कॉलेज जाया करती थी। खड़ी चढ़ाई। पहाड़ी सफर। वहां से लौटने के बाद खेतों में भी जाती थी। पानी भरने के लिए भी और भी कई काम। असल में कुछ समय पहले दीदी को चिकुनगुनिया हुआ और तब से उसके पैरों में बहुत दिक्कत हो गयी है। खैर जैसे-तैसे यह सफर पूरा किया और हम होटल पहुंचे। चाय-पानी पीने और थोड़ा सुस्ताने के बाद हम रिज पर आ गये। रिज, मॉल रोड आदि इलाके में दो-तीन घंटे घूमे फिरे। कभी थके-थके से और कभी प्रफुल्लित।
 
जाखू मंदिर में स्थापित हनुमानजी की मूर्ति
 
विशालकाय हनुमानजी और बंदरों का आतंक
अगले रोज यानी 23 नवंबर की सुबह हम लोग शिमला घूमने के लिए फिर निकले। भांजों का मन तो कुफरी भी घूमने का था, लेकिन कई कारणों से वहां जाना ठीक नहीं लगा। हम लोगों ने पहली रात ही एक गाड़ी वाले ठाकुर साहब से बात कर ली थी। वह मंडी के थे। उन्होंने कहा कि शिमला आसपास घुमाने और चंडीगढ़ तक छोड़ने का .... इतना लूंगा। हमें वह रकम ठीक लगी। सुबह सबसे पहले हम जाखू मंदिर गये। वहां हनुमानजी की विशालकाय मूर्ति स्थापित है। ठाकुर से पहले ही ताकीद कर दी कि चश्मे को बचाकर रखना। दीदी ने तो अपना चश्मा पर्स में डाल लिया, लेकिन सौरभ के लिए चश्मा उतारकर लगातार चलना कठिन था। किसी तरह हम लोगों ने पूरे इलाके का भ्रमण किया। चारों ओर बंदरों की टोली थी। सभी ताक पर रहते थे कि किसी के हाथ में कुछ दिखे और वे झपट्टा मारें। उसके बाद हम लोग कालीबाड़ी मंदिर गये। कालीबाड़ी मंदिर से एक अपना नाता सा लगता है। एक तो ऐसा ही मंदिर चंडीगढ़ में भी है, जिसके बगल में एक कुष्ठ आश्रम है। अपनी माताजी की पुण्य तिथि और बच्चों के जन्मदिन पर मैं वहां जाता हूं। दूसरा कालीबाड़ी मंदिर लखनऊ में भी है। जब भी दीदी के यहां जाता हूं तो एक चक्कर वहां का लगाता हूं। इसके बाद हम लोग संकट मोचन मंदिर पहुंचे। वहां विदेशी पर्यटक बहुतायत से दिखे। एक अंग्रेजन आंटी के साथ सौरभ ने फोटो भी खिंचवाई। सचमुच पहाड़ों के मंदिरों की शांति और सफाई मन प्रसन्न कर देती है। मंदिर जैसी ही फीलिंग आती है।
 
रिज पर खड़े दीदी-जीजाजी
 
वापसी का सफर और लेह-लद्दाख तक का रूट
शिमला से वापसी सड़क मार्ग से हुई। पहाड़ी नजारों के अलावा कहीं-कहीं डरावने नजारे भी दिखे। कहीं भयानक भूस्खलन। कहीं टूटती रोड। रास्ते में करीब पांच-छह जगह सड़कों पर होता दिखा बहुत बड़ा काम। चंडीगढ़ आकर पता लगाया तो पता चला कि हिमाचल प्रदेश के रास्ते लेह-लद्दाख के लिए ऐसा रूट बनाया जा रहा है जो सालभर खुला रहेगा। सामान्यत: बर्फीले मौसम में लद्दाख जाना मुश्किल होता है। इस प्रोजेक्ट पर बहुत तेजी से काम चल रहा है। कुल मिलाकर यह सफर रहा बहुत मजेदार। लेकिन अगले ही दिन लगा जैसे क्या ये स्वप्न था।
 
कुक्कू की एक चोट
असल में शिमला से लौटकर 24 नवंबर को शाम को मैं ऑफिस आ गया। दीदी, जीजाजी और कुणाल सेक्टर 19 के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आ गये। सौरभ, गौरव अपनी मामी और दोनों भाइयों कुक्कू, धवल के साथ घर पर ही थे। ऑफस आने के दो घंटे बाद ही भावना का फोन आया कि फुटबॉल खेलते वक्त कुक्कू के पैर में चोट लग गयी है। मैंने इसका जिक्र अपने समाचार संपादक जी से किया। उन्होंने तुरंत घर जाने को कहा। घर आया। कुक्कू को डॉक्टर के पास ले गया। उन्होंने कहा कि पहली नजर में यह मोच लग रही है। फिलहाल दवा दे रहा हूं। तब तक दीदी-जीजाजी और कुणाल भी आ चुके थे। सबने कहा, परेशान मत होओ। हालांकि पैर में सूजन बढ़ रही थी। इसी दौरान ऑफिस से मीनाक्षी मैडम का भी फोन आ गया। वह छुट्टी पर थीं, लेकिन एक चाभी के चक्कर में उन्हें आना पड़ा था। उन्होंने भी पूरा मॉरल सपोर्ट दिया और कहा कि ऑफिस आने की स्थिति न हो तो आप रहने दो, मैं रुक जाती हूं। मैंने बताया कि स्थिति नियंत्रण में है और बस मैं पहुंच ही रहा हूं। मैं फिर ऑफस आ गया। अगले दिन लखनऊ बड़े भाई साहब और भाभी जी को भी चोट के बारे में पता चला। उन्होंने एक घरेलू नुस्खा बताया। चूने और शहद को मिलाकर चोट वाली जगह लगायें और उसे पट्टी से बांध दें। वाकई यह बहुत कारगर सिद्ध हुआ। कुक्कू दो दिन के इस उपचार से ठीक हो गया। दीदी-जीजाजी से अब फोन पर बातें हो रही हैं। लग रहा है फोन पर ही तो हो रही थीं, क्या वे वाकई आये थे। हां आये तो थे। तभी तो इतना कुछ लिख डाला है।
और ये मैं हूं, पर शिमला में नहीं।
 

Sunday, November 25, 2018

अपनेपन के साझीदार, मकान मालिक और किरायेदार


मिस्टर भाटिया पूरे तीन साल बाद आज अपने फ्लैट पर आये हैं। उनका फ्लैट दिल्ली के द्वारका सेक्टर 15 में है। भाटिया साहब पहले दिल्ली में ही जॉब करते थे, लेकिन पांच साल से बेंगलुरू में हैं। उनका जब ट्रांसफर हुआ तो पहले एक साल अकेले बेंगलुरू में रहे, फिर बच्चों को भी ले गये। इधर, फ्लैट भुवनेश कुमार नामक व्यक्ति को किराये पर दे गये। शुरू में छह-छह माह के अंतराल में आते रहे, लेकिन फिर आना-जाना कम होता गया। भुवनेश ऑन लाइन किराया भाटियाजी के अकांउट में डाल देते हैं। समय पर बिजली का बिल भी भर देते है। उधर, भाटिया जी स्वयं किराये के मकान में रह रहे हैं। उनके मकान मालिक इन दिनों हैदराबाद में रहते है। आज भाटिया जी दिल्ली के अपने फ्लैट में इसलिए आये हैं कि भुवनेश जी अब उनका मकान खाली कर रहे हैं। भुवनेश को अब मेरठ शिफ्ट होना है। भाटिया जी बेहद भावुक हैं। भुवनेश से कभी कोई दिक्कत नहीं हुई, बल्कि उन्होंने एक नये रिश्ते के बारे में नयी सीख दी। यह रिश्ता है मकान मालिक और किरायेदार का। अक्सर इस रिश्ते को एक दूसरे की शिकायत के तौर पर ही देखा जाता है, लेकिन अगर कोशिश की जाये तो इस रिश्ते से उपजता है विश्वास, अपनापन। तभी तो आज भाटिया जी भुवनेश से कह रहे हैं, आपको कभी भी दिल्ली आना हो तो आप बता देना। यह घर पहले आप का है। जाहिर है दोनों परिवारों के बीच एक नया रिश्ता बन गया है जो मकान मालिक और किरायेदार से इतर हैं। यह अलग बात है है कि इस रिश्ते की पहचान मकान-मालिक और किरायेदार से ही है। जाहिर है भुवनेश जब भी इस संबंध में चर्चा करेंगे तो यही कहेंगे कि भाटिया जी हमारे मकान मालिक थे। या भाटिया जी कहेंगे भुवनेश जी हमारे किरायेदार थे। उधर, बेंगलुरू में जिस मकान में भाटिया साहब गये हैं, वह डुपलेक्स है। पूरा मकान भाटिया जी के हवाले ही है। कभी कबार उनके मकान मालिक आते हैं तो वहीं रहते हैं। उन्होंने एक कमरा अपने लिए अलग रखा है। वह आने से पहले बता देते हैं। भाटिया जी उसमें साफ-सफाई करा देते हैं। आज हमारे-आपके बीच में अनेक लोग ऐसे मिल जाते हैं जो एक ही घर में कई सालों से रह रहे होते हैं। कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि वह किराये में रह रहे हैं या फिर वही मकान मालिक हैं। जाहिर है उनके संबंध अच्छे हैं। एक-दूसरे का खयाल रख रहे हैं। कहा जाता है कि किरायेदार जब अपना घर समझकर रहने लगे तो समस्याएं नहीं बढ़तीं, इसी तरह जब मकान मालिक किरायेदार को अपने बराबर ही समझता है तो भी स्थिति नहीं बिगड़ती। विशेषज्ञ कहते हैं कि कई बार किरायेदारों से आसपास के लोगों की इंटीमेसी इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वे देखते हैं कि कुछ दिन रहने के बाद तो इन्हें चले जाना है। इसलिए भावनात्मक रिश्ता नहीं जुड़ पाता, लेकिन अगर मामला दोनों तरफ से मिलने-जुलने और बातों के आदान-प्रदान का हो तो भावुकता बढ़ जाती है। जिस किरायेदार को कोई मकान मालिक आर्थिक रूप से कमजोर समझ रहा था, हो सकता है वह उससे ज्यादा धनाड्य हो, लेकिन नौकरी के कारण किराये पर रह रहा हो। या यह भी तो हो सकता है कि जिस किरायेदार से दूरी बनाये रखने की कोशिश हो रही हो, वह उन्हीं के मूल गांव के आसपास का ही रहने वाला हो। असल में बात इंसानियत की होती है। समझदारी दोनों पक्षों से आनी होती है। अपनापन हो तो वाकई यह रिश्ता भी खूबसूरत हो जाता है। मकान मालिक-किरायेदार भी सुख-दुख के साझीदार बन जाते हैं। इतने साझीदार कि मकान मालिक के घर कोई कार्यक्रम हो तो किरायेदार को दिये कमरे भी काम आने लगते हैं और किरायेदार को कोई फंक्शन कराना हो तो मकान मालिक का पूरा घर खुला होता है।
नोट : यह लेख दैनिक ट्रिब्यून के रिश्ते कॉलम में छप चुका है।